Saturday, 30 August 2025

नगर कीर्तन पहुंचा काशी, गूंजी “सतनाम-वाहेगुरु”

नगर कीर्तन पहुंचा काशी, गूंजी “सतनाम-वाहेगुरु”

गुरु ग्रंथ साहिब को रुमाला साहिब भेंट कर प्रदेश सरकार ने किया स्वागत

सुरेश गांधी

वाराणसी। श्री गुरु तेगबहादुर साहिब जी, भाई मती दास जी, भाई सती दास जी और भाई दियाला जी की 350वीं शहीदी शताब्दी को समर्पित “महान नगर कीर्तन“ शनिवार को उत्तर प्रदेश की सीमा में प्रवेश करते ही श्रद्धा और सम्मान के साथ स्वागत किया गया। यह ऐतिहासिक नगर कीर्तन 21 अगस्त को गुरुद्वारा श्री गुरु तेगबहादुर साहिब जी धोबड़ी साहिब (असम) से प्रारंभ हुआ था। अलग-अलग राज्यों से होता हुआ यह यात्रा अंततः श्री आनंदपुर साहिब (रोपड़, पंजाब) में संपन्न होगी। 

प्रदेश सरकार की ओर से कृषि राज्य मंत्री सरदार बल्देव सिंह औलख ने श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी को रुमाला साहिब भेंट कर नतमस्तक स्वागत किया। उन्होंने कहा कि सिखों का इतिहास बलिदान और त्याग की अद्वितीय मिसाल है। धर्म और देश की रक्षा के लिए सिख गुरुओं का योगदान अविस्मरणीय है। इस प्रकार की धार्मिक यात्राएं समाज को नई ऊर्जा देती हैं और युवाओं को अपने धर्म से जोड़ने का कार्य करती हैं। वाराणसी में नगर कीर्तन पहुंचने पर श्रद्धालु संगत ने उत्साहपूर्वक स्वागत किया। धर्मनगरी काशी ने गुरु तेगबहादुर साहिब और उनके साथियों की शहादत को श्रद्धा व भक्ति से नमन करते हुए इस ऐतिहासिक नगर कीर्तन की गरिमा को और बढ़ाया। इस अवसर पर उत्तर प्रदेश सिख मिशन एसजीपीसी के प्रभारी सरदार बृजपाल सिंह और पूर्व राज्य मंत्री सरदार हरपाल सिंह जग्गी (लखनऊ) सहित बड़ी संख्या में सिख संगत और श्रद्धालु मौजूद रहे।

पीएम मोदी के क्षेत्र में योगी का पहला ‘जनता दर्शन’ उमड़ा भरोसा, सुनीं हर फरियादी की पीड़ा

पीएम मोदी के क्षेत्र में योगी का पहला ‘जनता दर्शन’ उमड़ा भरोसा, सुनीं हर फरियादी की पीड़ा 

सेवा, सुरक्षा और सुशासन का जीवंत उदाहरण

मुख्यमंत्री बोले– सेवा, सुरक्षा और सम्मान ही सरकार का ध्येय

सौ से अधिक लोगों की समस्याएं सुनीं, अधिकारियों को फीडबैक सहित त्वरित निस्तारण का निर्देश

सीवर, सड़क, राजस्व और पुलिस संबंधी मामलों पर आए फरियादी; बच्चों से भी किया आत्मीय संवाद

फरियादियों के चेहरे खिले, सीएम ने समस्याएं सुनीं और अधिकारियों को दिए निर्देश

गरीब और वंचित वर्ग की शिकायतें होंगी प्राथमिकता पर दूर

सुरेश गांधी

वाराणसी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में शनिवार की सुबह जन-आकांक्षाओं और उम्मीदों का संगम देखने को मिला, जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सर्किट हाउस में ‘जनता दर्शन’ कर सीधे काशीवासियों की समस्याएं सुनीं। फरियादियों का सैलाब सुबह से ही उमड़ पड़ा और मुख्यमंत्री ने एक-एक कर सभी की समस्याओं को न केवल सुना, बल्कि समाधान का आश्वासन भी दिया। 

योगी आदित्यनाथ ने अधिकारियों को जनता की उपेक्षा न करने और विशेषकर गरीब-वंचित वर्ग की समस्याओं को प्राथमिकता पर हल करने का निर्देश देकर सुशासन की संवेदनशीलता को रेखांकित किया। सुशासन केवल नीतियों से नहीं, बल्कि जनता के साथ सीधे संवाद से स्थापित होता है। जनता दर्शन लोकतंत्र में विश्वास की इस कड़ी को और मजबूत करता है। करीब 100 से अधिक लोग अपनी-अपनी व्यथा लेकर पहुंचे थे। इनमें राजस्व विवाद, मुआवजा, पुलिस कार्रवाई, सीवर कनेक्शन, कच्ची सड़क को पक्का करने और रोजगार जैसे मुद्दे प्रमुख रहे।

एक दिव्यांग ने नेत्रहीनों के लिए डिजिटल लाइब्रेरी की मांग रखी तो एक कलाकार ने प्रदर्शनी हॉल की दर कम करने की अपील की। मुख्यमंत्री ने सभी मांगों को गंभीरता से सुना और संबंधित अधिकारियों को तत्काल निस्तारण का निर्देश दिया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि केवल कार्रवाई करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि “फरियादी से फीडबैक लेना भी अधिकारियों की जिम्मेदारी होगी।”

मुख्यमंत्री ने जनता दर्शन में उपस्थित बच्चों से आत्मीय संवाद किया। उनकी पढ़ाई के बारे में पूछकर उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार का संकल्प है कि नागरिकों के जीवन में सेवा, सुरक्षा और सम्मान की भावना स्थापित की जाए। “हर नागरिक के चेहरे पर खुशहाली लाने के लिए सरकार निरंतर प्रयत्नशील है।”इस दौरान आयुक्त, पुलिस आयुक्त, जिलाधिकारी समेत तमाम वरिष्ठ अधिकारी और जनप्रतिनिधि मौजूद रहे।

लोकतंत्र में सीधे संवाद का अनोखा उदाहरण

लोकतंत्र का सबसे बड़ा आधार यह है कि जनता अपनी समस्याएं सीधे शासक तक पहुंचा सके। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा वाराणसी में किया गया पहला जनता दर्शन इसी आधार को मजबूत करता है। फरियादियों को अपनी समस्या सीधे रखने और तत्काल कार्रवाई का भरोसा मिलने से उनका विश्वास गहरा हुआ। आज आम नागरिक की सबसे बड़ी कठिनाई यही है कि वह अपनी बात ऊपर तक कैसे पहुंचाए। जनता दर्शन ने यह दूरी मिटाई है। 

उन्होंने कहा कि शासन का मूल मंत्र सेवा, सुरक्षा और सुशासन है और इसमें लापरवाही किसी भी स्तर पर बर्दाश्त नहीं होगी। मुख्यमंत्री ने खास तौर पर गरीब और वंचित वर्ग की समस्याओं पर ध्यान देने को कहा। उन्होंने स्पष्ट किया कि शासन का असली उद्देश्य तभी पूरा होगा, जब अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक न्याय और सुविधा पहुंचे।

जनता दर्शन से जनता का विश्वास और मजबूत

सीएम योगी ने गरीब, वंचित और जरूरतमंद वर्ग की शिकायतों को प्राथमिकता पर हल करने का आदेश दिया। जनता दर्शन में पहुंचे लोगों ने अपनी समस्याएं सीधे मुख्यमंत्री तक पहुंचाने का अवसर पाकर राहत और संतोष महसूस किया। विशेष बात यह रही कि यह मुख्यमंत्री का वाराणसी में पहला जनता दर्शन था। भीड़ में आए लोगों ने अपनी फरियाद सीधे मुख्यमंत्री के सामने रखीं और समाधान की उम्मीद जताई। फरियादियों में खुशी और आत्मविश्वास झलक रहा था। जनता दर्शन ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि मुख्यमंत्री जनता के बीच खड़े हैं, न कि दूर। यही लोकतंत्र की असली पहचान है, जहां जनता और सरकार के बीच सीधा संवाद हो।

 

 

 

विपक्ष बोला फोटोशूट, सरकार ने बताया नई उम्मीद

विवादों के घेरे में सीएम योगी का जनता दरबार

विपक्ष बोला फोटोशूट, सरकार ने बताया नई उम्मीद 

अजय राय का आरोप : योगी का जनता दर्शनः राहत का मंच या फोटोशूट का प्रबंधन?

कहा, सर्किट हाउस के हॉल में भाजपा पदाधिकारियों का कब्ज़ा, गेट पर खड़ी रही आम जनता

भाजपा व सरकार का दावा : मुख्यमंत्री ने जनता की समस्याएं सुनीं, त्वरित निस्तारण का निर्देश दिया

सुरेश गांधी

वाराणसी। वाराणसी का सर्किट हाउस शनिवार को उस समय चर्चा का केंद्र बन गया, जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र में जनता दर्शन किया। पहली नज़र में यह आयोजन जनता को सीधे मुख्यमंत्री से जोड़ने वाला और उनकी समस्याओं का समाधान देने वाला मंच प्रतीत हुआ। लेकिन जैसे-जैसे तस्वीरें और प्रतिक्रियाएं सामने आईं, वैसे-वैसे यह जनता दरबार राजनीतिक विवाद का अखाड़ा भी बन गया। विपक्ष ने इसे “फर्स्ट डे फर्स्ट शो फ्लॉप” करार देते हुए सवाल उठाया है कि जब दरबार जनता के लिए था तो उसमें भाजपा नेताओं और पदाधिकारियों का जमावड़ा क्यों रहा?

भाजपा और सरकार का पक्ष साफ है, मुख्यमंत्री ने लगभग 100 से अधिक फरियादें सुनीं, हर पीड़ित तक जाकर उनकी समस्याएं जानीं और तत्काल निस्तारण के आदेश दिए। सीवर कनेक्शन से लेकर कच्ची सड़कों के पक्केकरण तक, राजस्व विवाद से लेकर पुलिस शिकायतों तक, तमाम मुद्दे मुख्यमंत्री के सामने आए। दिव्यांगजन ने नेत्रहीनों के लिए डिजिटल लाइब्रेरी की मांग रखी, तो एक कलाकार ने प्रदर्शनी स्थल की सुविधा मांगी। चंदौली से आए फरियादी ने मुआवजे की समस्या रखी। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को न केवल तत्काल कार्रवाई का निर्देश दिया, बल्कि फरियादियों से फीडबैक लेने को भी कहा। सरकार इस आयोजन को “जनता की सीधी पहुंच” के रूप में प्रचारित कर रही है। योगी आदित्यनाथ ने भी स्पष्ट कहा कि “नागरिकों की सेवा, सुरक्षा और सम्मान ही सरकार का ध्येय है। प्रदेश के हर नागरिक के चेहरे पर खुशहाली लाने के लिए सरकार निरंतर प्रयत्नशील है।” जनता के साथ आई बच्चों से बातचीत कर मुख्यमंत्री ने मानवीय पहलू भी सामने रखा, उनकी पढ़ाई के बारे में पूछना और उज्ज्वल भविष्य की शुभकामना देना भी जनता दर्शन की सकारात्मक छवि को उभारता है। 

विपक्ष की तस्वीरः निराशा और आरोप

लेकिन इस सकारात्मक तस्वीर के समानांतर एक और तस्वीर भी उभरी, वह तस्वीर जिसमें हॉल के भीतर भाजपा पदाधिकारी और कार्यकर्ता आराम से कुर्सियों पर बैठे नजर आए, जबकि बाहर गेट पर असली जनता अपनी बारी के इंतजार में खड़ी रही। कांग्रेस नेता अजय राय ने इसी आधार पर जनता दरबार को “फर्स्ट डे फर्स्ट शो फ्लॉप” और “फोटोशूट दरबार” करार दिया। उनका आरोप है कि जिन नेताओं और जनप्रतिनिधियों की नाकामी और उपेक्षा से जनता महीनों से परेशान थी, वही लोग दरबार के भीतर जगह बनाए बैठे रहे। उनका कहना है कि मंत्री अनिल राजभर के प्रतिनिधि संजय सिंह, दीनदयाल मंडल पदाधिकारी अर्चना सेठ और चांदनी श्रीवास्तव समेत आधे से ज्यादा भाजपा पदाधिकारी हॉल के भीतर आराम से कुर्सियों पर बैठे दिखे, जबकि बाहर असली जनता अपनी समस्याओं के समाधान के लिए कतार में धूप झेल रही थी। 

अजय राय ने तंज कसते हुए कहा, “योगी जी का जनता दरबार नहीं, फोटोशूट दरबार था। जिन जनप्रतिनिधियों की नाकामी और उपेक्षा से लोग महीनों से परेशान हैं, वही नेता अंदर सबसे आगे बैठे रहे। जनता बाहर गेट पर खड़ी रही। यह जनता के साथ धोखा है।”  विपक्ष का सवाल है, जब दरबार जनता के लिए था, तो नेताओं को विशेषाधिकार क्यों? सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीरों ने विपक्ष को और हथियार थमा दिया है। एक तरफ मंच पर भाजपा चेहरे और दूसरी तरफ गेट पर इंतजार करती भीड़ ने इस बहस को और गहरा कर दिया। 

जनता दरबार में उम्मीदें भी, उलझनें भी

जनता दरबार के पहले दिन की हकीकत यह है कि इसमें उम्मीदें भी हैं और उलझनें भी। सरकार इसे जनता से सीधा संवाद और त्वरित समाधान का मंच बताती है, वहीं विपक्ष इसे महज दिखावा और फोटोशूट करार देता है। असली सवाल यही है कि जनता दरबार वास्तव में जनता की फरियादों को कितना सुलझा पाएगा।

भरोसे की पहल या दिखावे का खेल?

हकीकत यह है कि जनता दरबार का मकसद तभी पूरा होगा, जब इसमें जनता को प्राथमिकता दी जाएगी, न कि नेताओं और पदाधिकारियों को। यदि यह मंच सिर्फ सियासी चेहरों की भीड़ से घिरा रहा तो जनता का भरोसा टूटेगा और यह आयोजन औपचारिकता बनकर रह जाएगा। लेकिन यदि मुख्यमंत्री के निर्देशों के अनुरूप हर फरियाद का त्वरित और ठोस समाधान हुआ, तो यही जनता दरबार सरकार की सबसे बड़ी ताकत और जनता के विश्वास का नया आधार बन सकता है। जनता अब ज्यादा भोली नहीं है। वह देख भी रही है और परख भी रही है। जनता दरबार सरकार के इरादों की असली परीक्षा है, यह जनता को राहत देगा या केवल नेताओं के लिए मंच बनकर रह जाएगा, यह आने वाले दिनों में तय होगा।

भाजपा का बचाव 

भाजपा नेताओं का कहना है कि मुख्यमंत्री ने जनता की समस्याओं को गंभीरता से सुना और तत्काल निस्तारण के आदेश दिए। पार्टी के मुताबिक, पदाधिकारी वहां जनता की मदद और व्यवस्थाएं देखने के लिए मौजूद थे। उनका कहना है कि विपक्ष सिर्फ नकारात्मक राजनीति कर रहा है।

विवाद के प्रमुख बिंदु

सर्किट हाउस के हॉल में भाजपा पदाधिकारी और कार्यकर्ता जमे रहे

आम जनता गेट के बाहर घंटों कतार में खड़ी रही

विपक्ष ने कहाकृ“फर्स्ट डे फर्स्ट शो फ्लॉप”

अजय राय का आरोप, “योगी जी का जनता दरबार नहीं, फोटोशूट दरबार”

सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीरों ने आरोपों को हवा दी

जनता की उम्मीदें

मुख्यमंत्री से सीधे मिलकर समस्याओं का समाधान

अफसरों और जनप्रतिनिधियों की अनदेखी का विकल्प

न्याय और राहत की गारंटी का भरोसा

भीड़ और राजनीति से दूर, आम लोगों के लिए खुला मंच

वाराणसी से लखनऊ-गोरखपुर भटकने की मजबूरी खत्म होने की आस  

तस्वीरों से बढ़ा विवाद

सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीरों में भी यही तस्वीर सामने आई—हॉल में भाजपा पदाधिकारी और कार्यकर्ता तो गेट के बाहर अपनी समस्याओं का समाधान पाने की उम्मीद में खड़े आम लोग। विपक्ष ने इन तस्वीरों को हथियार बनाकर सरकार पर सीधा हमला बोला और कहा कि यही वजह है कि लोग महीनों से अपनी फरियाद लेकर लखनऊ और गोरखपुर के जनता दरबार तक भटकने को मजबूर थे। 

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