नमो घाट की मौत और काशी का मौन : जब सुरक्षा के हाथों कुचली जाए इंसानियत
घाटों से लेकर बड़े आयोजनों और कई सार्वजनिक स्थलों तक निजी बाउंसरों की मौजूदगी तेजी से बढ़ी है। सुरक्षा व्यवस्था के नाम पर कई जगह इनकी भूमिका भी बढ़ी है। हालांकि सवाल यह उठने लगा है कि क्या कहीं यह व्यवस्था नियंत्रण से आगे जाकर भय का कारण तो नहीं बन रही? शहर में चर्चाएं यह भी हैं कि अनुशासन और कठोरता के बीच की सीमा कई बार धुंधली होती दिखाई देती है। काशी पूछ रही है... ◆ क्या सुरक्षा के नाम पर शक्ति प्रदर्शन का लाइसेंस बांटा जा रहा है? ◆ क्या कानून अब वर्दी या निजी ड्रेस देखकर बदल जाएगा? ◆ क्या पहले उठी शिकायतों पर समय रहते ध्यान दिया गया होता तो यह घटना टल सकती थी? ◆ क्या घाटों पर आने वाले श्रद्धालु और पर्यटक सुरक्षित महसूस कर रहे हैं? काशी की पहचान श्रद्धा से है, भय से नहीं
सुरेश गांधी
काशी केवल एक शहर नहीं है। यह भारत की
आत्मा है, सभ्यता की चेतना है और वह आस्था है जहां आने वाला हर व्यक्ति अपने भीतर एक
शांति लेकर लौटने की उम्मीद करता है। यहां आने वाला पर्यटक केवल घाट नहीं देखता, वह
संस्कृति देखता है; वह मंदिरों के शिखर नहीं, बल्कि भारत की आध्यात्मिक विरासत का दर्शन
करता है। लेकिन जब इसी काशी में सुरक्षा के नाम पर खड़े लोग किसी युवक को पीट-पीटकर
मौत के घाट उतार दें, तब सवाल केवल कानून-व्यवस्था का नहीं रह जाता, बल्कि समाज की
संवेदनशीलता और प्रशासनिक व्यवस्था की आत्मा पर भी उठता है।
नमो घाट पर हुई कथित बर्बर पिटाई और उसमें
एक युवक की मौत ने पूरे शहर को झकझोर दिया है। आरोप है कि मामूली विवाद के बाद एक पर्यटक
को निजी सुरक्षा गार्डों और बाउंसरों ने हॉकी, रॉड और डंडों से बेरहमी से पीटा, जिससे
उसकी जान चली गई। यदि यह आरोप जांच में पूरी तरह सही साबित होते हैं तो यह केवल हत्या
नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता का ऐसा उदाहरण होगा, जिसने काशी के चेहरे पर एक गहरा
दाग लगा दिया है। यह घटना कई ऐसे सवाल छोड़ गई है जिन्हें केवल पुलिसिया कार्रवाई से
शांत नहीं किया जा सकता। चार लोगों की गिरफ्तारी निश्चित रूप से कानूनी प्रक्रिया का
हिस्सा है, लेकिन क्या केवल कुछ गिरफ्तारियां उस मानसिकता को समाप्त कर देंगी, जो सुरक्षा
की आड़ में शक्ति प्रदर्शन को अधिकार समझने लगती है?
इस घटना का एक सामाजिक पक्ष भी है, जो
कहीं अधिक दर्दनाक है। जिस युवक की जान गई, वह किसी बड़े परिवार या प्रभावशाली पृष्ठभूमि
से नहीं था। बताया जा रहा है कि वह सब्जी बेचकर अपने परिवार का भरण-पोषण करता था। घर
की जिम्मेदारियां उसके कंधों पर थीं। एक सामान्य परिवार का बेटा कुछ दोस्तों के साथ
घूमने निकला था, लेकिन घर लौटने के बजाय उसकी अर्थी लौट आई। यह केवल एक व्यक्ति की
मौत नहीं, बल्कि एक परिवार के सपनों की मृत्यु भी है। इस समय आवश्यकता केवल अपराधियों
को पकड़ने की नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की समीक्षा करने की है। निजी सुरक्षा एजेंसियों
के चयन, प्रशिक्षण, जवाबदेही और अधिकारों की स्पष्ट सीमाएं तय होनी चाहिए। सार्वजनिक
स्थलों पर तैनात कर्मियों के लिए आचार संहिता का कड़ाई से पालन कराया जाना चाहिए। यह
भी सुनिश्चित करना होगा कि किसी व्यक्ति को कानून अपने हाथ में लेने की छूट न मिले।
काशी की पहचान भय से नहीं, विश्वास से
बनी है। यह शहर मृत्यु को भी मोक्ष का दर्शन देने वाला माना जाता है, लेकिन यदि यहां
जीवन ही असुरक्षित हो जाए तो यह चिंता केवल प्रशासन की नहीं, पूरे समाज की होनी चाहिए।
नमो घाट की यह घटना केवल एक अपराध की कहानी नहीं है। यह चेतावनी है कि यदि शक्ति और
जिम्मेदारी के बीच संतुलन बिगड़ जाए, तो सुरक्षा भी कभी-कभी भय का दूसरा नाम बन सकती
है। और यदि समाज इस पर मौन रहा, तो कल यह प्रश्न किसी और घाट, किसी और सड़क और किसी
और परिवार के सामने खड़ा हो सकता है।
घाट पर दर्शन नहीं, डर की चर्चा
नमो घाट पर
हुई घटना के बाद
घाटों पर आने वाले
लोगों के बीच सबसे
ज्यादा चर्चा सुरक्षा व्यवस्था नहीं, बल्कि कथित तौर पर
बढ़ती दबंगई की सुनाई दी।
कई लोगों का कहना है
कि घाटों पर तैनात कुछ
निजी सुरक्षा कर्मियों का व्यवहार कई
बार जरूरत से अधिक आक्रामक
दिखाई देता है। लोगों
का कहना है कि
श्रद्धालुओं को निर्देश देने
और उनके साथ व्यवहार
करने के तरीके पर
गंभीर प्रश्न खड़े होते रहे
हैं। एक स्थानीय युवक ने कहा,
सुरक्षा जरूरी है, लेकिन सुरक्षा
के नाम पर किसी
को अपमानित करने या डराने
का अधिकार किसी को नहीं
होना चाहिए।
सवालों के घेरे में निजी सुरक्षा का सिस्टम
वाराणसी में घाटों, आयोजनों
और कई सार्वजनिक स्थलों
पर बड़ी संख्या में
निजी सुरक्षा एजेंसियों के कर्मचारी तैनात
हैं। सवाल यह उठ
रहा है कि इन
कर्मियों को किस प्रकार
का प्रशिक्षण दिया जाता है?
क्या उन्हें भीड़ नियंत्रण और
संवाद की तकनीक सिखाई
जाती है या केवल
शक्ति प्रदर्शन ही व्यवस्था का
माध्यम बनता जा रहा
है? विशेषज्ञों का मानना है
कि सुरक्षा कर्मी और कानून लागू
करने वाली एजेंसियां अलग-अलग जिम्मेदारियां निभाती
हैं। निजी सुरक्षा का
काम व्यवस्था बनाए रखना है,
कानून हाथ में लेना
नहीं।
एक बेटे की मौत, घर में बुझ गया चूल्हा
सोनभद्र के गांव में जैसे ही राजेश उर्फ चिंटू की मौत की सूचना पहुंची, पूरे इलाके में सन्नाटा पसर गया। बताया जा रहा है कि वह परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी संभालता था। रोज सब्जी बेचकर घर चलाने वाला युवक दोस्तों के साथ घूमने निकला था, लेकिन वापस लौटा तो शव बनकर। परिवार के लोगों की आंखों में एक ही सवाल था — घूमने गया बेटा आखिर किस अपराध की सजा लेकर लौटा?




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