Saturday, 10 October 2026

शक्ति की आराधना से जगमगाएगी काशी, सज उठे मां के दरबार

शक्ति की आराधना से जगमगाएगी काशी, सज उठे मां के दरबार 

कलश स्थापना के साथ आज से शारदीय नवरात्र का शुभारंभ, नौ दिनों तक गूंजेगा मां दुर्गा का जयकारा

512 सार्वजनिक पूजा पंडालों में सजेगी देवी प्रतिमा, देश के प्रसिद्ध मंदिरों और समसामयिक विषयों की झलक बनेंगे आकर्षण

कहीं 30 फीट की प्रतिमा तो कहीं 16 फीट के सिंह पर विराजेंगी मां दुर्गा; आदियोगी, इलेक्ट्रॉनिक शो और अनूठी आकृतियां भी बनेंगी आकर्षण

सुरेश गांधी

वाराणसी। शरद ऋतु की दस्तक के साथ ही काशी की गलियों में भक्ति का रंग गहराने लगा है। कहीं मां दुर्गा की प्रतिमाओं को अंतिम रूप दिया जा रहा है तो कहीं बांस, कपड़े और आकर्षक सज्जा से भव्य पूजा पंडाल आकार ले रहे हैं। घरों में पूजन सामग्री जुटाई जा रही है और बाजारों में चुनरी, नारियल, कलश, दीपक, फूल-माला तथा देवी के शृंगार की वस्तुओं की खरीदारी तेज हो गई है। रविवार से शारदीय नवरात्र की शुरुआत के साथ ही काशी नौ दिनों तक शक्ति की आराधना में डूब जाएगी।

आश्विन शुक्ल प्रतिपदा पर शुरू होने वाला यह पर्व केवल पूजा-पाठ का अनुष्ठान नहीं, बल्कि शक्ति, साधना और सामाजिक उल्लास का उत्सव भी है। घरों में कलश स्थापना और देवी के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की आराधना होगी। मंदिरों में दर्शन-पूजन के लिए श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ेगी तो शाम ढलते ही पूजा पंडालों में सजी रोशनी, देवी प्रतिमाओं और कलात्मक सज्जा के दर्शन के लिए लोगों की भीड़ उमड़ने लगेगी।

शुभ मुहूर्त

शारदीय नवरात्र का आरंभ आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि पर होगा। पंचांग के अनुसार, प्रतिपदा तिथि 10 अक्टूबर की रात 9:19 बजे शुरू होकर 11 अक्टूबर की रात लगभग 9:30 बजे तक रहेगी। उदया तिथि के आधार पर रविवार को नवरात्र का पहला दिन माना जाएगा। घट स्थापना के शुभ मुहूर्त को लेकर अलग-अलग पंचांगों में कुछ अंतर है। सामान्य पंचांग गणना के अनुसार सुबह लगभग 6:19 से 10:12 बजे तक घट स्थापना का समय दिया गया है। वहीं, बीएचयू के ज्योतिषाचार्य प्रो. विनय पांडेय के हवाले से प्रकाशित काशी की स्थानीय गणना में सुबह 11:20 से दोपहर 12:07 बजे तक 47 मिनट का अभिजित मुहूर्त बताया गया है। इस वर्ष चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग का संयोग होने के कारण मुहूर्त के चयन में विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी जा रही है।

घर पर ऐसे करें कलश स्थापना

घट स्थापना के लिए पूजा स्थल की सफाई करके उसे गंगाजल अथवा स्वच्छ जल से पवित्र करें। लकड़ी की चौकी या उपयुक्त स्थान पर लाल अथवा पीला वस्त्र बिछाएं। उसके पास मिट्टी के पात्र में स्वच्छ मिट्टी भरकर जौ बोएं। जौ को समृद्धि और शुभता का प्रतीक माना जाता है। इसके बाद तांबे, पीतल अथवा मिट्टी के स्वच्छ कलश में जल भरें। परंपरा के अनुसार उसमें अक्षत, सुपारी, सिक्का और सुगंधित द्रव्य रखे जा सकते हैं। कलश के मुख पर आम अथवा उपलब्ध पवित्र पत्ते रखें और ऊपर नारियल स्थापित करें। कलश पर रोली से स्वस्तिक बनाएं तथा मौली बांधें। अब मां दुर्गा की प्रतिमा अथवा चित्र के सामने दीपक जलाकर गणेश वंदना करें। इसके बाद मां शैलपुत्री का स्मरण करते हुए कलश स्थापना का संकल्प लें। घट स्थापना के समय यह मंत्र पढ़ सकते हैं— ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। यह देवी उपासना का प्रसिद्ध मंत्र है। कलश स्थापना के पारंपरिक वैदिक मंत्र और संकल्प अपने पुरोहित से भी पढ़वाए जा सकते हैं। इसके बाद मां शैलपुत्री को पुष्प, अक्षत, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। दुर्गा सप्तशती, देवी कवच अथवा दुर्गा चालीसा का पाठ करके आरती करें।

अखंड ज्योति जलाने से पहले इन बातों का रखें ध्यान

नवरात्र में अनेक घरों में अखंड ज्योति प्रज्ज्वलित की जाती है। धार्मिक विश्वास के अनुसार, यह निरंतर भक्ति, आस्था और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है। अखंड ज्योति के लिए स्थिर और अग्निरोधी आधार पर रखा हुआ उपयुक्त दीपक चुनें। उसमें परंपरा के अनुसार शुद्ध घी अथवा तेल का इस्तेमाल किया जा सकता है। रूई या कलावे की बाती रखें और दीपक को ऐसी जगह स्थापित करें, जहां हवा का सीधा झोंका न लगे। ज्योति जलाने से पहले मां दुर्गा का ध्यान करें और अपनी श्रद्धा के अनुसार संकल्प लें। दीपक के पास पर्दे, कागज, कपड़े, फूलों की सूखी माला अथवा अन्य ज्वलनशील वस्तुएं न रखें। दीपक को बच्चों और पालतू जानवरों की पहुंच से दूर रखें। लगातार जलने वाली ज्योति की नियमित निगरानी जरूरी है। घी या तेल भरते समय आग से बचाव के उपाय अपनाएं। यदि घर में नौ दिनों तक अखंड ज्योति की व्यवस्था करना संभव न हो तो नियमित समय पर दीप प्रज्ज्वलित करके भी श्रद्धापूर्वक पूजा की जा सकती है। ज्योति के सामने पढ़ा जाने वाला सरल प्रार्थना मंत्र— ॐ दीपज्योतिः परब्रह्म दीपज्योतिर्जनार्दनः। दीपो हरतु मे पापं दीपज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ यह प्रचलित दीप प्रार्थना है। इसे पढ़कर मां दुर्गा का ध्यान किया जा सकता है।

मां शैलपुत्री की आराधना से होगी शुरुआत

नवरात्र के पहले दिन मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। मान्यता है कि हिमालयराज की पुत्री होने के कारण उनका नाम शैलपुत्री पड़ा। उनके एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे में कमल है तथा वे वृषभ पर सवार हैं। मां शैलपुत्री की पूजा के दौरान यह मंत्र पढ़ा जाता है—

वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।

वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥

श्रद्धालु मंत्र का उच्चारण करते हुए पुष्प अर्पित कर सकते हैं। इसके बाद दुर्गा चालीसा अथवा दुर्गा सप्तशती का पाठ किया जा सकता है।

कहीं हवा महल, कहीं बदरीनाथ तो कहीं दिखेगी स्वर्ण मंदिर की झलक

दुर्गा पूजा के दौरान काशी का दृश्य किसी विशाल सांस्कृतिक उत्सव जैसा हो जाता है। इस बार भी पंडालों की सजावट में धार्मिक आस्था के साथ स्थापत्य कला और रचनात्मकता का मेल दिखाई देगा। जयपुर के हवा महल की तर्ज पर शिवपुर मिनी स्टेडियम में पंडाल तैयार किया जा रहा है। नई सड़क स्थित सनातन धर्म इंटर कॉलेज में बदरीनाथ धाम की शैली का पंडाल श्रद्धालुओं को आकर्षित करेगा। शहर के अन्य हिस्सों में भी प्रसिद्ध मंदिरों, धार्मिक स्थलों और समसामयिक विषयों को केंद्र में रखकर सजावट की जा रही है। केंद्रीय दुर्गा पूजा समिति से संबंधित प्रकाशित जानकारी के मुताबिक, जिले में 512 सार्वजनिक पूजा पंडालों में प्रतिमाएं स्थापित की जानी हैं। शहर में कई बड़े पंडालों पर विशेष सजावट, विद्युत प्रकाश और झांकियों की तैयारी है। प्रतिमाओं के निर्माण में पारंपरिक शिल्प के साथ पर्यावरण के प्रति सजगता पर भी जोर दिया जा रहा है। कई स्थानों पर गंगा की मिट्टी से प्रतिमाएं तैयार करने की बात सामने आई है।

काशी के प्रमुख दुर्गा पूजा पंडाल और उनकी खासियत

क्षेत्र/पंडाल

शिवपुर मिनी स्टेडियम : जयपुर के हवा महल की तर्ज पर भव्य पंडाल

नई सड़क, सनातन धर्म इंटर कॉलेज : बदरीनाथ धाम की शैली का पंडाल; 30 फीट ऊंची प्रतिमा की तैयारी

शिवपुर न्यू कॉलोनी : स्वर्ण मंदिर की झलक

लहरतारा : मुंबई के मुंबा देवी मंदिर की थीम

बौलिया : कांतारा थीम और पारंपरिक मुखौटों की सज्जा

सूर्या बुलानाला : वैष्णो देवी गुफा और त्रिकूट पर्वत की झलक

शास्त्री नगर : नृसिंह अवतार की थीम

जैतपुरा : ऑपरेशन सिंदूर और वीर जवानों की विजय गाथा

प्रह्लाद घाट : विशाल गुंबद और लेजर शो

आस्था के साथ कला और परंपरा का उत्सव

काशी की दुर्गा पूजा की खासियत यह है कि यहां पूजा पंडाल केवल दर्शन का स्थान नहीं रहते, बल्कि कला, शिल्प और सामुदायिक सहभागिता के केंद्र भी बन जाते हैं। बंगाल से आए कारीगरों की मेहनत, स्थानीय शिल्पकारों की कल्पनाशीलता और पूजा समितियों की तैयारियां मिलकर उत्सव को भव्य रूप देती हैं। कहीं पारंपरिक देवी स्वरूप केंद्र में हैं तो कहीं आधुनिक तकनीक से सजी झांकियां श्रद्धालुओं को आकर्षित करने की तैयारी में हैं। नवरात्र के पहले दिन घरों में कलश स्थापना के साथ नौ दिनों के पूजन-व्रत का संकल्प लिया जाएगा। प्रतिदिन मां के अलग-अलग स्वरूप की पूजा होगी। दुर्गा सप्तशती का पाठ, दुर्गा चालीसा, मंत्र-जप और आरती से वातावरण भक्तिमय बनेगा। व्रत रखने वाले श्रद्धालु अपनी परंपरा और सामर्थ्य के अनुसार फलाहार या सात्विक भोजन ग्रहण करेंगे।

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