Friday, 23 January 2026

कुम्भ की धरती पर कालनेमी का षड्यंत्र

कुम्भ की धरती पर कालनेमी का षड्यंत्र 

प्रयागराज का कुम्भ आस्था का महासंगम है, लेकिन इस बार उसी पवित्र भूमि को सनातन-विरोधी राजनीति का अखाड़ा बनाने की कोशिश हुई। शंकराचार्य पद की मर्यादा को ताक पर रखकर स्वयंभू दावे, प्रशासन से टकराव और राजनीतिक बयानबाज़ी ने कुम्भ की गरिमा पर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा ऐसे आचरण कोकालनेमीकहना केवल एक टिप्पणी नहीं, बल्कि सनातन समाज के लिए वैचारिक चेतावनी है। शंकराचार्य का पद साधना, शास्त्र और संयम की पराकाष्ठा का प्रतीक है कि शक्ति-प्रदर्शन और राजनीति का मंच। ज्योतिर्मठ को लेकर न्यायालय में मामला लंबित होने के बावजूद स्वयं को निर्विवाद शंकराचार्य बताकर सार्वजनिक टकराव खड़ा करना परंपरा का अपमान है। मौनी अमावस्या जैसे संवेदनशील दिन पर नियमों की अवहेलना और विशेष प्रोटोकॉल की मांग ने स्पष्ट कर दिया कि मामला श्रद्धा का नहीं, प्रभाव जमाने का था। इस विवाद में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी की त्वरित एंट्री ने संदेह को और गहरा किया। वही दल, जिन्होंने वर्षों तक सनातन प्रतीकों को हेय दृष्टि से देखा, आजधार्मिक अपमानकी आड़ लेकर सरकार पर हमला कर रहे हैं। यह सनातन प्रेम नहीं, बल्कि पुरानी राजनीति का नया संस्करण है। कुम्भ सत्ता का नहीं, साधना का पर्व है। जो इसे राजनीतिक युद्धभूमि बनाना चाहते हैं, वे कुम्भ की आत्मा के विरोधी हैं। सनातन को सबसे बड़ा खतरा बाहरी नहीं, भीतर छिपे कालनेमियों से हैऔर उन्हें पहचानना अब अनिवार्य है

सुरेश गांधी

प्रयागराज का कुम्भ केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है। यह भारत की सभ्यतागत स्मृति, सनातन चेतना और सांस्कृतिक राष्ट्रबोध का सबसे विराट सार्वजनिक उत्सव है। गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम पर लगने वाला यह महापर्व सत्ता के प्रदर्शन का नहीं, बल्कि साधना, संयम, त्याग और आत्मशुद्धि का प्रतीक रहा है। यही कारण है कि कुम्भ की धरती पर घटने वाली प्रत्येक घटना केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और वैचारिक महत्व रखती है। वर्तमान कुम्भ में शंकराचार्य के नाम पर खड़ा किया गया विवाद इसी संदर्भ में गंभीर चिंता का विषय बनता है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा स्वयंभू शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद कोकालनेमीकहे जाने के बाद यह मुद्दा केवल व्यक्ति विशेष तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सनातन धर्म की आत्मा, उसकी परंपराओं और उसकी मर्यादा से जुड़े गहरे प्रश्नों को सामने ले आया है। कुम्भ की भूमि पर साधु का अर्थ सत्ता से टकराने वाला नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने वाला होता है। लेकिन जब कोई साधु-वेशधारी व्यक्ति राजनीतिक भाषा बोलने लगे, प्रशासन से टकराव को आंदोलन का रूप दे और स्वयं को परंपरा से ऊपर स्थापित करने का प्रयास करे, तब प्रश्न उठना स्वाभाविक है।

जब शब्द मर्यादा तोड़ें, तो सवाल सत्ता से भी बड़ा हो जाता है

सनातन परंपरा में संत का स्थान विचार, विवेक और वैराग्य का होता हैविषवमन का नहीं। ऐसे में अविमुक्तेश्वरानंद (अवन्मुक्तन्यूनंद) द्वारा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कोऔरंगज़ेब-बाबर की औलादकहना केवल अनुचित, बल्कि नैतिक, वैचारिक और सांस्कृतिक पतन का संकेत है। यह बयान राजनीति से ज़्यादा सभ्यता पर हमला है। औरंगज़ेब और बाबर भारतीय इतिहास में आक्रांताओं के रूप में दर्ज हैंजिनकी पहचान मंदिर विध्वंस, धार्मिक दमन और सांस्कृतिक विनाश से जुड़ी है। ऐसे शासकों से किसी निर्वाचित जनप्रतिनिधि की तुलना करना, वह भी एक संत के मुख से, इतिहास का अपमान और लोकतांत्रिक चेतना का अवमूल्यन है। योगी आदित्यनाथ एक निर्वाचित मुख्यमंत्री हैं, महंत हैं, गोरक्षपीठ के उत्तराधिकारी हैं। उनसे वैचारिक असहमति हो सकती है, नीतियों पर सवाल उठ सकते हैंलेकिन वंश, औलाद और आक्रांताओं से जोड़ना तर्क नहीं, विषवमन है। यह भाषा वही है, जो सड़क से संसद तक समाज को बांटने का काम करती रही है। यह भी विचारणीय है कि क्या इस तरह के बयान सनातन की मर्यादा, संत परंपरा और शास्त्रों की शिक्षाओं के अनुरूप हैं? शंकराचार्य परंपरा संयम, संवाद और शास्त्रार्थ सिखाती हैशब्दों से आग लगाना नहीं। आज सवाल योगी का नहीं, विचार और आचरण की गिरती सीमा रेखा का है। अगर संत भी राजनीतिक कुंठा में इतिहास को हथियार बनाएंगे, तो समाज को दिशा कौन देगा?

कुम्भ: साधना का पर्व, राजनीति का मंच नहीं

कुम्भ की परंपरा वैदिक काल से जुड़ी मानी जाती है। यह आयोजन किसी सरकार, शासन या राजनीतिक दल की देन नहीं है। यह सनातन समाज की सामूहिक चेतना और आत्मिक अनुशासन का परिणाम है। कुम्भ में साधु-संत सत्ता के निकट नहीं, बल्कि उससे ऊपर नैतिक पथप्रदर्शक की भूमिका में रहे हैं। इतिहास गवाह है कि कुम्भ में कभी शक्ति-प्रदर्शन, भीड़-राजनीति या मंचीय आक्रामकता का स्थान नहीं रहा। यहाँ आचार्य का सम्मान उसके तप, त्याग और मौन से होता है। यही कारण है कि कुम्भ में अनुशासन केवल प्रशासनिक नियम नहीं, बल्कि आध्यात्मिक मर्यादा का हिस्सा है।  

शंकराचार्य परंपरा : 1200 वर्षों की तपस्वी विरासत

आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार आम्नाय पीठज्योतिर्मठ, शारदा पीठ, श्रृंगेरी और गोवर्धन पीठसनातन धर्म की बौद्धिक और आध्यात्मिक रीढ़ हैं। शंकराचार्य का पद कोई सामाजिक पद नहीं, बल्कि ब्रह्मचर्य, शास्त्र, त्याग और संयम की पराकाष्ठा है। इतिहास में शंकराचार्य सत्ता के नैतिक आलोचक रहे हैं, लेकिन कभी सत्ता-संघर्ष के खिलाड़ी नहीं बने। उन्होंने मौन, तर्क और शास्त्रार्थ के माध्यम से समाज का मार्गदर्शन किया। यही कारण है कि शंकराचार्य पद के साथ मर्यादा, गंभीरता और संयम अनिवार्य रूप से जुड़ा रहा है।  

ज्योतिर्मठ विवाद: उत्तराधिकार या अराजकता

ज्योतिर्मठ की गद्दी को लेकर दशकों से न्यायालयों में विवाद लंबित है। अंतिम वैधानिक निर्णय के अभाव में किसी भी व्यक्ति द्वारा स्वयं को पूर्ण शंकराचार्य घोषित करना केवल विधिक रूप से संदिग्ध है, बल्कि परंपरागत दृष्टि से भी प्रश्नों के घेरे में है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद द्वारा सार्वजनिक मंचों से राजनीतिक भाषा में वक्तव्य देना, प्रशासन से सीधा टकराव और समर्थकों के माध्यम से शक्ति-प्रदर्शन करना शंकराचार्य परंपरा के विपरीत प्रतीत होता है। यह व्यवहार पद की गरिमा को कमजोर करता है।

मौनी अमावस्या और प्रशासनिक टकराव

कुम्भ के सबसे संवेदनशील दिनों में मौनी अमावस्या प्रमुख है। इस दिन करोड़ों श्रद्धालु संगम स्नान के लिए पहुँचते हैं। ऐसे में प्रशासन द्वारा वीआईपी संस्कृति पर रोक लगाना सुरक्षा की दृष्टि से अनिवार्य हो जाता है।अविमुक्तेश्वरानंद प्रकरण में प्रशासन ने अनुशासन और सुरक्षा का हवाला दिया, जबकि समर्थकों ने इसे धार्मिक अपमान का मुद्दा बना दिया। यहीं से यह विवाद धार्मिक से राजनीतिक बनने लगा।  

राजनीतिक दलों की भूमिका : अवसरवाद का चेहरा

कांग्रेस और समाजवादी पार्टी द्वारा इस विवाद को सनातन बनाम सरकार की लड़ाई के रूप में प्रस्तुत करना कोई नया प्रयोग नहीं है। यही वे दल हैं जिन्होंने अतीत में राम मंदिर आंदोलन का विरोध किया, साधु-संतों को पिछड़ेपन का प्रतीक बताया औरभगवा आतंकवादजैसे शब्द गढ़े। आज वही दल स्वयंभू शंकराचार्य को ढाल बनाकर सरकार पर हमला कर रहे हैं। यह सनातन प्रेम नहीं, बल्कि अवसरवादी राजनीति है।  

कालनेमीका संदर्भ : अपमान नहीं, वैचारिक चेतावनी

रामायण का कालनेमी साधु का वेश धारण कर भ्रम फैलाने वाला असुर था। मुख्यमंत्री द्वारा इस प्रतीक का प्रयोग किसी व्यक्ति के अपमान के लिए नहीं, बल्कि उस प्रवृत्ति के विरुद्ध चेतावनी के रूप में देखा जाना चाहिए जो धर्म की आड़ में राजनीति करती है। योगी आदित्यनाथ स्वयं संन्यासी परंपरा से आते हैं। ऐसे में उनका यह कथन सनातन समाज को आत्ममंथन का संदेश देता हैकि हर भगवा वस्त्रधारी साधु नहीं होता।

कुम्भ रहेगा, कालनेमी बेनकाब होंगे

प्रयागराज कुम्भ किसी व्यक्ति या विवाद से कलंकित नहीं हो सकता। लेकिन यह विवाद चेतावनी देता है कि सनातन की रक्षा केवल बाहरी शत्रुओं से नहीं, बल्कि भीतर छिपे कालनेमियों से भी करनी होगी। कुम्भ रहेगादिव्य, पवित्र और अखंडयदि हम उसे राजनीति की प्रयोगशाला बनने से बचा सकें।

शंकराचार्य पद: परंपरा क्या कहती है, कानून क्या कहता है

शंकराचार्य पद की परंपरा गुरु-शिष्य परंपरा से जुड़ी रही है। उत्तराधिकार केवल घोषणा से नहीं, बल्कि परंपरागत स्वीकृति, शास्त्रीय योग्यता और संस्थागत मान्यता से तय होता है। ज्योतिर्मठ प्रकरण में न्यायालय में मामला लंबित होना इस बात का प्रमाण है कि अंतिम निर्णय अभी शेष है। ऐसे में किसी भी व्यक्ति द्वारा स्वयं को निर्विवाद शंकराचार्य घोषित करना परंपरा और कानूनदोनों के प्रति असंवेदनशीलता दर्शाता है।

कुम्भ में अनुशासन क्यों जरूरी है: आस्था बनाम अराजकता

कुम्भ में अनुशासन केवल नियमों का पालन नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं के जीवन की सुरक्षा से जुड़ा प्रश्न है। वीआईपी संस्कृति, विशेष प्रोटोकॉल और शक्ति-प्रदर्शन ने अतीत में कई बार अव्यवस्था को जन्म दिया है। आस्था तब ही सुरक्षित रहती है, जब व्यवस्था मजबूत हो। कुम्भ की मर्यादा भी यही सिखाती है।

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