जहां आस्था, वहां हनुमान : पूर्णिमा पर बरसेगा कृपा का अमृत
बीरों के महाबीर, भक्तों के परम भक्त है हनुमान। हर मुराद के पालनहार है हनुमान। दर्शन मात्र से होते है पलभर में प्रसंन और लगा देते है भक्तों का बेड़ापार। उपर से चैत पूर्णिमा भी है। चैत्र पूर्णिमा का वह दिव्य प्रभात, जब आस्था अपने चरम पर होती है और विश्वास का सूरज नई ऊर्जा के साथ उगता है, यही वह क्षण है जब हर भक्त के हृदय में एक ही नाम गूंजता है, बजरंगबली। 2 अप्रैल गुरुवार को मनाया जाने वाला हनुमान जन्मोत्सव केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि जीवन की जड़ता को तोड़कर साहस, शक्ति और समर्पण की ओर बढ़ने का आह्वान है। यह वह दिन है, जब माना जाता है कि हनुमान स्वयं अपने भक्तों के दुख-दर्द सुनते हैं, उनकी बाधाओं को हरते हैं और निराशा के अंधकार में आशा का दीप प्रज्वलित करते हैं। भक्ति की सच्ची पुकार पर तुरंत प्रसन्न होने वाले संकटमोचन, अपने भक्तों को न केवल भयमुक्त करते हैं, बल्कि उन्हें सफलता और आत्मविश्वास की नई ऊंचाइयों तक पहुंचाते हैं। इस दिन की गई पूजा, व्रत और सेवा केवल अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि का माध्यम बन जाती है। सिंदूर की एक चुटकी, सच्चे मन की एक प्रार्थना और सेवा का एक छोटा-सा प्रयास, यही वह सूत्र है, जिससे जीवन की दिशा बदल सकती है
सुरेश गांधी
चैत्र मास की पूर्णिमा
केवल एक तिथि नहीं,
बल्कि आस्था का वह उजास
है जिसमें भक्त अपने भीतर
की दुर्बलताओं को त्यागकर शक्ति,
साहस और सेवा के
मार्ग पर अग्रसर होता
है। यह वही पावन
अवसर है, जब बीरों
के महाबीर और भक्तों के
परम आराध्य भगवान हनुमान का जन्मोत्सव पूरे
देश में श्रद्धा, उल्लास
और आध्यात्मिक ऊर्जा के साथ मनाया
जाता है। इस वर्ष
यह महापर्व 2 अप्रैल को मनाया जाएगा,
क्योंकि उदया तिथि के
अनुसार उसी दिन सूर्योदय
के समय पूर्णिमा विद्यमान
रहेगी।
धर्मशास्त्रों की मान्यता है कि जिस दिन सूर्योदय में पूर्णिमा हो, उसी दिन व्रत और पर्व का विधान श्रेष्ठ माना जाता है। चैत्र पूर्णिमा का प्रारंभ 1 अप्रैल को सुबह 7ः06 बजे से होकर 2 अप्रैल को सुबह 7ः41 बजे तक रहेगा। अतः व्रत, स्नान, दान और पूजा का श्रेष्ठ समय 2 अप्रैल को सूर्योदय से पूर्णिमा समाप्ति तक का है। यह संयोग केवल कालगणना नहीं, बल्कि श्रद्धा का वह सूत्र है, जिसमें विश्वास, अनुशासन और आध्यात्मिक चेतना का संगम होता है।
हनुमान केवल शक्ति के
प्रतीक नहीं, बल्कि निस्वार्थ सेवा और अटूट
भक्ति के जीवंत आदर्श
हैं। रामकाज में जीवन अर्पित
करने वाले हनुमान का
संदेश स्पष्ट है, भक्ति में
समर्पण, कर्म में निष्ठा
और सेवा में विनम्रता
ही जीवन को सफल
बनाती है।
मान्यता है कि इस दिन व्रत और पूजा करने से शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है.
संकटों से मुक्ति मिलती है. आत्मबल और आत्मविश्वास बढ़ता है. जीवन में सुख-समृद्धि का संचार होता है.
अजर-अमर शक्ति : अष्टचिरंजीवी हनुमान
हनुमान जी को अष्टचिरंजीवी
में स्थान प्राप्त है, अर्थात वे
कालातीत हैं, आज भी
जीवित हैं और भक्तों
की रक्षा करते हैं। त्रेतायुग
से लेकर महाभारत काल
तक उनकी उपस्थिति के
प्रसंग पुराणों में मिलते हैं।
शायद यही वजह भी
है कि बजरंगबली की
उपासना करने वाला भक्त
कभी पराजित नहीं होता। तभी
तो तुलसीदास जी से पहले
हनुमान जी की मुलाकात
त्रेतायुग में महाभारत युद्ध
के दौरान पाण्डु पुत्र भीम से हुई
थी।
भीम की विनती पर युद्ध के समय हनुमान जी ने पाण्डवों की सहायता करने का आश्वासन दिया था। माना जाता है कि महाभारत युद्ध के समय अर्जुन के रथ का ध्वज थाम कर महावीर हनुमान बैठे थे।
इसी कारण तीखे वाणों से भी अर्जुन का रथ पीछे नहीं होता था और संपूर्ण युद्ध के दौरान अर्जुन के रथ का ध्वज लहराता रहा। कहां यह भी जाता है कि जहां भी राम कथा होती है वहां हनुमान जी अवश्य होते हैं।
इसलिए
हनुमान की कृपा पाने
के
लिए श्री राम
की भक्ति जरूरी है। जो राम
के भक्त हैं हनुमान
उनकी सदैव रक्षा करते
हैं। भक्ति की पराकाष्ठा का
उदाहरण संत तुलसीदास के
जीवन में भी देखने
को मिलता है। जब मुगल
सम्राट अकबर ने उनसे
चमत्कार दिखाने की मांग की
और अस्वीकार करने पर उन्हें
कारागार में डाल दिया,
तब तुलसीदास ने हनुमान आराधना
की। इसके बाद बंदरों
ने महल में उत्पात
मचा दिया। भयभीत होकर अकबर ने
तुलसीदास से क्षमा मांगी
और उन्हें मुक्त किया। यह प्रसंग केवल
चमत्कार नहीं, बल्कि भक्ति की शक्ति का
प्रतीक है।
सूर्य को फल समझने वाले बाल हनुमान
पूजा-विधि : सरलता में ही सिद्धि
हनुमान जन्मोत्सव पर पूजा का
मूल भाव दिखावा नहीं,
बल्कि सच्ची श्रद्धा है। पूजा के
प्रमुख चरण : ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान
कर पीले या स्वच्छ
वस्त्र धारण करें, हनुमान
जी के प्रतिमा के
सामने बैठकर हाथ में जल
लेकर ’ॐ केशवाय नमः,
ॐ नाराणाय नमः, ॐ माधवाय
नमः, ॐ हृषीकेशाय नमः
मंत्र का उच्चारण करें।
इसके बाद सूर्यदेव को
भी नमन करें और
उगते हुए सूरज को
जल अर्पित करें। हनुमान चालीसा, सुंदरकांड या रामनाम का
जाप करें, सिंदूर, चोला, चंदन और लाल
पुष्प अर्पित करें, बूंदी, लड्डू या गुड़-चना
का भोग लगाएं, प्रसाद
वितरण और दान अवश्य
करें.
उपाय : संकट से समाधान तक
शनि और हनुमान : श्रद्धा का अद्भुत संबंध
ज्योतिष मान्यता के अनुसार, हनुमान
की उपासना से शनि के
कुप्रभाव शांत होते हैं।
कहते है शनिदेव ने
स्वयं वचन दिया था,
जो हनुमान का भक्त होगा,
उसे वे कष्ट नहीं
देंगे। इसलिए शनि दोष, साढ़ेसाती
या ढैय्या से पीड़ित जातकों
के लिए यह दिन
विशेष फलदायी माना जाता है।
सामाजिक संदेश : सेवा ही सच्ची भक्ति
आस्था से आत्मबल तक
हनुमान जन्मोत्सव केवल धार्मिक अनुष्ठान
नहीं, बल्कि आत्मबल जागरण का उत्सव है।
यह हमें सिखाता है
कि जीवन की हर
चुनौती के सामने अगर
हनुमान जैसी निष्ठा, साहस
और सेवा भावना हो,
तो कोई भी संकट
बड़ा नहीं रह जाता।
जब-जब जीवन डगमगाए,
तब-तब यह विश्वास
संबल देता है, “जहां
राम हैं, वहां हनुमान
हैं... और जहां हनुमान
हैं, वहां भय का
स्थान नहीं।” इस बार 2 अप्रैल
को, श्रद्धा के दीप जलाइए...भक्ति के मार्ग पर
चलिए...और संकटमोचन के
आशीर्वाद से जीवन को
उज्ज्वल बनाइए।
मंत्र व उपाय
हनुमान जी के 12 चमत्कारी नाम
महाबलि, महावीर जितेंद्रिय का विशेष मान
है। शनि पीड़ा से
मुक्ति, मंगल दोष निवारण
या कोई काम बनाने
के लिए महाबलि को
पूजना उपयुक्त है।
पौराणिक मान्यताएं
तब भगवान शिव ने पवन देव के के रूप में अपनी रौद्र शक्ति का अंश यज्ञ कुंड में अर्पित किया था और वही शक्ति अंजनी के गर्भ में प्रविष्ट हुई थी। फिर चौत्र शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को हनुमान का जन्म हुआ था।
यानी रुद्रावतार भगवान हनुमान माता अंजनी और वानर राज केसरी के पुत्र हैं। हालांकि कुछ लोग नरक चतुर्दशी यानी कार्तिक कुष्ण चतुदर्शी के दिन को हनुमान जी का जन्म बताते है।
लेकिन मान्यता है कि चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि भगवान राम का जन्म हुआ था और उसी दौरान भगवान राम की सेवा के उद्देश्य से ही अंजना के घर हनुमान के रूप में जन्म लिया था।कहा जाता है कि 16वी सदी के महान संत कवि तुलसीदास जी को हनुमान की कृपा से राम जी के दर्शन प्राप्त हुए।
क्योंकि तुलसीदास जी की भक्ति से प्रभावित होकर उनकी इच्छा पर हनुमान जी को बताया था कि राम और लक्ष्मण चित्रकूट में प्रतिदिन आते हैं। वहां आपकी भेंट हो सकती है। मैं वृक्ष पर तोता बनकर बैठा रहूंगा, जब राम और लक्ष्मण आएंगे तो मैं आपको संकेत दे दूंगा।
हनुमान जी की आज्ञा के अनुसार तुलसीदास जी चित्रकूट घाट पर बैठ गये और सभी आने जाने वालों को चंदन लगाते रहे।राम और लक्ष्मण जब आये तो हनुमान जी गाने लगे चित्रकूट के घाट पै, भई संतन के भीर। तुलसीदास चंदन घिसै, तिलक देत रघुबीर।।
हनुमान के यह वचन सुनते ही तुलसीदास प्रभु राम और लक्ष्मण को निहारने लगे। इस प्रकार तुलसीदास को राम जी के दर्शन हुए।








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