Tuesday, 14 April 2026

अक्षय तृतीया : जब धर्म ने उठाया परशु, अन्याय के अंत का हुआ उद्घोष

अक्षय तृतीया : जब धर्म ने उठाया परशु, अन्याय के अंत का हुआ उद्घोष 

वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया, अर्थात् अक्षय तृतीया, भारतीय सनातन परंपरा में केवल एक तिथि नहीं, बल्कि अनंत शुभता और अक्षय पुण्य का दिव्य संगम है। यह वह क्षण है, जब प्रकृति स्वयं पवित्रता के द्वार खोलती है और मनुष्य को धर्म, दान और साधना के पथ पर अग्रसर होने का अवसर प्रदान करती है। इसी शुभ दिवस पर भगवान परशुराम का अवतरण हुआ, एक ऐसा अवतार, जिसमें ज्ञान का प्रकाश, तप का तेज और न्याय का शस्त्र एक साथ प्रकट हुआ। जब पृथ्वी पर अत्याचार अपनी सीमा लांघ चुका था, जब सत्ता अहंकार में डूब चुकी थी, तब भगवान विष्णु ने परशुराम के रूप में अवतार लेकर धर्म की पुनर्स्थापना का संकल्प लिया। उनका जीवन केवल युद्ध की कथा नहीं, बल्कि धर्म, संयम, तपस्या और सामाजिक संतुलन का अद्वितीय संदेश है। आज के दौर में, जब समाज अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है, परशुराम जयंती हमें यह स्मरण कराती है कि सत्य और न्याय का मार्ग कभी क्षीण नहीं होता, वह सदा अक्षय रहता है 

सुरेश गांधी  

फिरहाल, भारतीय सनातन संस्कृति में कुछ तिथियां केवल कैलेंडर की तारीख नहीं होतीं, वे स्वयं में युगों की चेतना, परंपरा की ऊर्जा और आस्था की अमर धारा लेकर आती हैं। ऐसी ही एक दिव्य तिथि है अक्षय तृतीया, वह दिन, जब किया गया हर शुभ कर्म अक्षय फल देता है, जब दान-पुण्य अनंत हो जाता है, और जब धर्म की स्थापना के लिए स्वयं भगवान अवतरित होते हैं। इसी पावन दिवस पर भगवान परशुराम का अवतरण हुआ, एक ऐसा अवतार, जिसमें ब्राह्मण का ज्ञान, क्षत्रिय का पराक्रम और तपस्वी का तेज तीनों समाहित थे। यह केवल एक जयंती नहीं, बल्कि धर्म और अधर्म के संघर्ष की जीवंत गाथा है, एक ऐसी कथा, जो आज भी समाज को दिशा देती है।

भगवान परशुराम को सनातन धर्म में एक अद्वितीय स्थान प्राप्त है। वे उन विरले अवतारों में हैं, जिन्होंने जन्म से ब्राह्मण होते हुए भी क्षत्रिय धर्म का पालन किया। उनके पिता ऋषि जमदग्नि महान तपस्वी थे और माता रेणुका पतिव्रता और तेजस्विनी। इस दिव्य वंश में जन्म लेकर परशुराम ने बचपन से ही असाधारण तेज और पराक्रम का परिचय दिया। कठोर तपस्या के फलस्वरूप उन्हें भगवान शिव सेपरशुप्राप्त हुआ, जो उनके धर्मयुद्ध का प्रतीक बना। त्रेता युग में जब सहस्त्रबाहु अर्जुन जैसे राजाओं से उनकी भिडंत हुई तो इतिहास बन गया. उस दौर में जब ऋषि जमदग्नि की हत्या हुई तो उससे परशुराम आग बबुला हो गए. उसी क्षण परशुराम ने प्रतिज्ञा ली, अधर्म का अंत कर, धर्म की स्थापना करूँगा। उन्होंने 21 बार पृथ्वी को हय वंशी क्षत्रियों से मुक्त किया, यह केवल युद्ध नहीं, बल्कि धर्म की पुनर्स्थापना का यज्ञ था।

परशुराम को चिरंजीवी माना जाता है, इसलिए उनका प्रभाव त्रेता से द्वापर तक दिखाई देता है। उन्होंने भीष्म, द्रोणाचार्य और कर्ण जैसे महान योद्धाओं को शिक्षा दी। इससे स्पष्ट होता है कि वे केवल योद्धा ही नहीं, बल्कि एक महान गुरु भी थे। अक्षय तृतीया का महत्व केवल परशुराम जयंती तक सीमित नहीं है। धार्मिक मान्यता है, गंगा का अवतरण इसी दिन हुआ. कुबेर को धन का स्वामी बनने का वरदान मिला. महाभारत की रचना प्रारंभ हुई. यही वजह है इस दिन किया गया हर शुभ कार्यअक्षयफल देता है। आज जब समाज भ्रष्टाचार, अन्याय और असंतुलन से जूझ रहा है, तब परशुराम का आदर्श और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। वे हमें सिखाते हैं, अन्याय के खिलाफ खड़े होना ही धर्म है. सत्य और नैतिकता का मार्ग कभी नहीं छोड़ना चाहिए.

अक्षय तृतीया और परशुराम जयंती का यह संगम हमें यह सिखाता है कि धर्म और सत्य कभी समाप्त नहीं होते। भगवान परशुराम का जीवन एक शाश्वत प्रेरणा है, जब भी अधर्म बढ़ेगा, धर्म का परशु अवश्य उठेगा। इस तिथि की महत्ता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है बिना मुहूर्त देखे विवाह, गृह प्रवेश, व्यापार आरंभ किए जा सकते हैं. इस दिन किया गया दान अनेक जन्मों तक फल देता है. तप, जप और साधना का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है. यह तिथि केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति का भी सर्वोत्तम अवसर मानी गई है। कहा जाता है कि बाल्यकाल से ही उनमें असाधारण तेज और पराक्रम था। उन्होंने कठोर तप कर भगवान शिव को प्रसन्न किया और उनसेपरशु” (कुल्हाड़ी) प्राप्त की। परशुराम का व्यक्तित्व भारतीय दर्शन का एक अनोखा उदाहरण है, वे जन्म से ब्राह्मण थे, पर कर्म से क्षत्रिय. वे तपस्वी भी थे और योद्धा भी. वे गुरु भी थे और दंडदाता भी. उन्होंने यह सिद्ध किया कि धर्म की रक्षा के लिए केवल ज्ञान ही नहीं, बल्कि शक्ति भी आवश्यक है। एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, भगवान परशुराम ने अपने परशु को समुद्र में फेंका और समुद्र को पीछे हटने का आदेश दिया। जहाँ तक परशु गिरा, वहाँ तक समुद्र पीछे हट गया और नई भूमि का निर्माण हुआ, इसी भूमि को आज केरल कहा जाता है। यह कथा उनके तप और दिव्य शक्ति का प्रतीक है।

अक्षय तृतीया के दिन देशभर में परशुराम जयंती बड़े श्रद्धा भाव से मनाई जाती है। पूजा विधि में, स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं. भगवान परशुराम की प्रतिमा या चित्र की स्थापना होती है. गंगाजल, चंदन, अक्षत, पुष्प अर्पित किए जाते हैं. व्रत और कथा का आयोजन होता है. कई स्थानों पर शोभायात्राएँ, भजन-कीर्तन और धार्मिक सभाएँ भी आयोजित होती हैं। भगवान परशुराम का जीवन केवल पौराणिक कथा नहीं, बल्कि एक गहन दार्शनिक संदेश है। धर्म की रक्षा सर्वोपरि, जब अन्याय बढ़े, तो उसका विरोध करना ही धर्म है। शक्ति का उपयोग तभी उचित है, जब वह धर्म की रक्षा के लिए हो। परशुराम का जीवन तपस्या और त्याग का आदर्श उदाहरण है। समाज में किसी एक वर्ग का अत्यधिक प्रभुत्व संतुलन बिगाड़ सकता है। अक्षय तृतीया केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि जीवन को सकारात्मक दिशा देने का अवसर है। यह हमें सिखाती है, शुभ कार्यों की शुरुआत कभी भी की जा सकती है. दान और सेवा से जीवन सार्थक बनता है. आध्यात्मिक उन्नति ही सच्चा धन है.

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