बेटियों के हक पर घेराबंदी, बिकती पैतृक जमीनें
भारतीय समाज में बेटी के जन्म पर अब मिठाइयां बांटी जाती हैं, "बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ" के नारे लगाए जाते हैं, बेटियों को सेना से लेकर अंतरिक्ष तक पहुंचने पर सम्मानित किया जाता है, लेकिन जैसे ही बात पैतृक संपत्ति की आती है, प्रगतिशीलता का मुखौटा उतरने लगता है। यही वह मोड़ है जहां समाज की वास्तविक मानसिकता सामने आ जाती है। विडंबना देखिए, जिस बेटी को माता-पिता की सेवा, बीमारी, संकट और बुजुर्गावस्था में बेटे के बराबर जिम्मेदार माना जाता है, वही बेटी विरासत की चर्चा होते ही कई परिवारों में "बाहरी" घोषित कर दी जाती है। कानून ने बेटी को बराबरी का अधिकार दे दिया, लेकिन क्या समाज ने उसे बराबरी का दर्जा दिया? यही सवाल आज गांव से लेकर शहर तक हजारों परिवारों को बेचैन कर रहा है। पैतृक संपत्तियों की जल्दबाजी में हो रही बिक्री, परिवारों के भीतर बढ़ती गोपनीय रजिस्ट्रियां, अदालतों में बढ़ते उत्तराधिकार विवाद और रिश्तों के बीच खिंचती अदृश्य दीवारें संकेत दे रही हैं कि संघर्ष केवल जमीन का नहीं, सोच का है। यह लड़ाई रकबे और रजिस्ट्री से कहीं बड़ी है। यह उस मानसिकता की परीक्षा है जो बेटी को देवी तो मानती है, लेकिन उत्तराधिकारी मानने में अब भी हिचकती है। आने वाले वर्षों में यह प्रश्न केवल कानून का नहीं, भारतीय परिवार व्यवस्था के भविष्य का भी होगा
सुरेश गांधी
देश में बेटियों को पैतृक संपत्ति में समान अधिकार दिलाने की दिशा में न्यायपालिका और विधायिका ने पिछले दो दशकों में ऐतिहासिक कदम उठाए हैं। सर्वोच्च न्यायालय के अनेक फैसलों ने स्पष्ट कर दिया है कि बेटी केवल परिवार की सदस्य नहीं, बल्कि पैतृक संपत्ति में बेटे के समान अधिकार रखने वाली उत्तराधिकारी भी है। यह बदलाव केवल कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण क्रांति है। लेकिन कानून की किताबों में दर्ज यह न्याय जमीनी स्तर पर एक नए सामाजिक और पारिवारिक संकट का कारण बनता दिखाई दे रहा है। गांवों से लेकर शहरों तक संपत्ति को लेकर बढ़ते विवाद, अदालतों में पहुंचते मुकदमे और रिश्तों में बढ़ती कड़वाहट इस बात का संकेत हैं कि समाज अभी भी इस बदलाव को सहज रूप से स्वीकार नहीं कर पाया है।
हिंदू उत्तराधिकार कानून में हुए संशोधनों का उद्देश्य परिवारों में बेटियों के साथ होने वाले आर्थिक भेदभाव को समाप्त करना था। लेकिन वास्तविकता यह है कि आज भी बड़ी संख्या में परिवार बेटियों को संपत्ति में हिस्सा देने को सहज नहीं मानते। विवाह के समय दिए गए दहेज, उपहार या सामाजिक खर्च को ही उनका हिस्सा मान लिया जाता है। परिणामस्वरूप जब कानूनी अधिकार की बात आती है तो अनेक परिवारों में तनाव पैदा हो जाता है।
यही कारण है
कि आज एक साथ
कई सवाल समाज के
सामने खड़े दिखाई देते
हैं। क्या बेटियों का
हक एक नए मुकदमेबाजी
बाजार को जन्म दे
रहा है? क्या हक
के नाम पर घर-परिवार टूट रहे हैं?
क्या जमीन बिक रही
है और रिश्ते बिखर
रहे हैं? क्या कानून
जीत रहा है, लेकिन
परिवार हार रहा है?
आखिर क्यों बेटियों के हक पर
घेराबंदी की जा रही
है? क्या पैतृक संपत्ति
बचाने के नाम पर
अधिकार छीने जा रहे
हैं? क्या अदालतें पारिवारिक
विवादों का नया अखाड़ा
बनती जा रही हैं?
ये सवाल केवल कानूनी
नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक भी
हैं।
चुपचाप हो रही संपत्तियों की बिक्री
सबसे गंभीर सवाल
यह है कि क्या
बेटियों के अधिकारों से
बचने के लिए संपत्तियों
की जल्दबाजी में बिक्री की
जा रही है? ग्रामीण
क्षेत्रों से लेकर शहरों
तक ऐसे अनेक उदाहरण
सामने आ रहे हैं,
जहां माता-पिता या
परिवार के बुजुर्ग बेटों
के दबाव में जमीन,
मकान या अन्य संपत्तियां
बाजार मूल्य से कम कीमत
पर बेच रहे हैं।
कई बार यह बिक्री
परिवार के भीतर या
परिचितों के बीच कर
दी जाती है, ताकि
भविष्य में किसी हिस्सेदारी
के दावे को कमजोर
किया जा सके। निश्चित
रूप से कानून की
दृष्टि से हर बिक्री
अवैध नहीं होती। यदि
संपत्ति स्व-अर्जित है
तो मालिक को उसे बेचने
का अधिकार है। लेकिन यदि
बिक्री के पीछे किसी
वैधानिक उत्तराधिकारी को उसके अधिकार
से वंचित करने की मंशा
दिखाई देती है, तो
ऐसे मामलों पर भविष्य में
कानूनी सवाल खड़े हो
सकते हैं। यही कारण
है कि कई कानूनी
विशेषज्ञ मानते हैं कि संपत्ति
बेचकर विवाद समाप्त करने की सोच
कई बार विवाद को
और जटिल बना देती
है।
क्या मुकदमेबाजी बन रही है नया उद्योग?
इस पूरे घटनाक्रम
का सबसे चिंताजनक पहलू
मुकदमेबाजी का बढ़ता कारोबार
है। समाज में ऐसे
सलाहकारों, दलालों और स्वयंभू कानूनी
विशेषज्ञों की संख्या बढ़
रही है जो पारिवारिक
विवादों को सुलझाने के
बजाय उन्हें अदालत तक पहुंचाने में
अधिक रुचि रखते हैं।
एक ओर बेटियों को
यह कहकर मुकदमा करने
के लिए प्रेरित किया
जाता है कि उनका
अधिकार छीना गया है,
तो दूसरी ओर भाइयों को
भरोसा दिलाया जाता है कि
मामला वर्षों तक अदालत में
उलझा रहेगा और विरोधी पक्ष
थक जाएगा। विडंबना यह है कि
ऐसे मामलों में जीत और
हार से पहले सबसे
अधिक लाभ मुकदमे की
प्रक्रिया से जुड़े लोगों
को होता है। तारीख
पर तारीख, फीस पर फीस,
दस्तावेजों की तैयारी, अपीलें
और अन्य कानूनी प्रक्रियाएं
वर्षों तक चलती रहती
हैं, जबकि परिवार आर्थिक,
मानसिक और सामाजिक रूप
से टूटता जाता है। यह
कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि
कई मामलों में जमीन से
अधिक मूल्यवान वकालत की फीस और
मुकदमेबाजी का खर्च हो
जाता है। ऐसे में
प्रश्न उठना स्वाभाविक है
कि आखिर फायदा किसका
हो रहा है—परिवार
का, बेटियों का, बेटों का
या केवल मुकदमेबाजी के
तंत्र का?
अदालत न्याय दे सकती है, परिवार नहीं लौटा सकती
क्या समाधान केवल अदालत है?
कानून के सामने नई चुनौती
आज सबसे बड़ी
चुनौती कानून नहीं, बल्कि कानून की भावना को
समझना है। बेटियों को
अधिकार देने का उद्देश्य
परिवारों को बांटना नहीं
था, बल्कि उन्हें आर्थिक न्याय देना था। यदि
लोग अधिकार से बचने के
लिए संपत्तियां बेचने लगें, फर्जी व्यवस्थाएं करने लगें या
मुकदमेबाजी को हथियार बना
लें, तो यह कानून
की मूल भावना के
विरुद्ध होगा। समाज को यह
समझना होगा कि बेटी
को हिस्सा देना कोई कृपा
नहीं, उसका वैधानिक अधिकार
है। उसी तरह बेटियों
को भी यह समझना
होगा कि अधिकार की
लड़ाई का पहला रास्ता
संवाद होना चाहिए, मुकदमा
नहीं।
सेल्फ-एक्वायर्ड प्रॉपर्टी: क्या बेटी बिक्री के बाद भी दावा कर सकती है?
किसी भी विवाद
में अदालत सबसे पहले यह
देखती है कि संपत्ति
स्व-अर्जित है या पैतृक।
यदि संपत्ति पिता ने स्वयं
अर्जित की है, तो
कानून उन्हें उसे बेचने, दान
करने या किसी के
नाम हस्तांतरित करने का अधिकार
देता है। केवल बेटी
को हिस्सा नहीं मिला, यह
बिक्री रद्द करने का
स्वतः आधार नहीं बनता।
हालांकि यदि बिक्री में
धोखाधड़ी, दबाव, फर्जीवाड़ा, मानसिक अक्षमता या कानूनी प्रक्रिया
के उल्लंघन के प्रमाण मिलते
हैं, तो न्यायालय हस्तक्षेप
कर सकता है। यदि
बाजार मूल्य से बहुत कम
कीमत पर संपत्ति बेची
गई हो और उसके
पीछे किसी वारिस के
अधिकार को प्रभावित करने
की मंशा दिखाई दे,
तो ऐसे सौदे जांच
के दायरे में आ सकते
हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि अधिकांश
विवाद अधिकारों की जानकारी के
अभाव, समय रहते पारिवारिक
सहमति न बनने और
गलत सलाह के कारण
पैदा होते हैं। इसलिए
अदालत को पहला नहीं,
अंतिम विकल्प होना चाहिए।
क्या हम अपनी ही बेटियों के साथ न्याय कर रहे हैं?
संपत्ति का विवाद केवल जमीन, मकान या धन का सवाल नहीं है। यह परिवार के संस्कार, न्यायबोध और भविष्य की पीढ़ियों को दिए जाने वाले संदेश का भी प्रश्न है।
सदियों तक भारतीय समाज में बेटियों को "पराया धन" मानकर देखा गया। शादी के बाद उनका रिश्ता भावनाओं तक सीमित कर दिया गया, जबकि बेटों को परिवार की विरासत का स्वाभाविक उत्तराधिकारी माना गया।
कानून ने इस असमानता को दूर करने का प्रयास किया, लेकिन क्या समाज की सोच भी उतनी ही तेजी से बदली है? आज भी अनेक परिवारों में बेटी को हिस्सा देने की बात आते ही कहा जाता है—"उसे तो शादी में सब कुछ दे दिया गया", "अब उसका दूसरे घर से क्या लेना-देना?" लेकिन यही तर्क तब नहीं दिए जाते जब बेटी माता-पिता की बीमारी, संकट या बुजुर्गावस्था में बेटे के बराबर जिम्मेदारी निभाती है।
महाभारत में धृतराष्ट्र की सबसे बड़ी भूल यह नहीं थी कि वे अपने पुत्रों से प्रेम करते थे, बल्कि यह थी कि पुत्रमोह में न्याय और अन्याय का भेद खो बैठे थे। जब परिवार में न्याय की जगह पक्षपात ले लेता है, तो परिणाम केवल संपत्ति का बंटवारा नहीं होता, बल्कि रिश्तों का विघटन और पीढ़ियों तक चलने वाली कटुता होती है। प्रश्न यह नहीं है कि बेटी को कानून ने अधिकार दिया है या नहीं।
प्रश्न यह है कि
क्या हम उसे परिवार
का समान सदस्य मानने
को तैयार हैं? यदि बेटी
सुख-दुख में बराबर
की भागीदार है, तो विरासत
में उसका हिस्सा बोझ
क्यों दिखाई देता है? कहीं
ऐसा न हो कि
आज का पुत्रमोह कल
की पारिवारिक महाभारत बन जाए। न्याय
से बचाकर बचाई गई संपत्ति
शायद बच जाए, लेकिन
उससे टूटे रिश्ते और
बिखरा परिवार फिर कभी नहीं
जुड़ते।








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