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Tuesday, 13 October 2026

हार का हिसाब नहीं, आयोग से सवाल!

हार का हिसाब नहीं, आयोग से सवाल!

चुनाव में हार लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन हार के कारणों से मुंह मोड़ना किसी भी राजनीतिक दल के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। कांग्रेस आज इसी दोराहे पर खड़ी दिखाई देती है। एक ओर वह चुनाव आयोग और मतदाता सूची की पारदर्शिता पर सवाल उठा रही है, दूसरी ओर भाजपा उसके नेतृत्व और संगठन की कमजोरियों को मुद्दा बना रही है। सवाल यह नहीं कि कांग्रेस निर्वाचन व्यवस्था पर सवाल क्यों उठाती है। सवाल यह है कि क्या वह अपनी चुनावी विफलताओं की भी उतनी ही गंभीरता से समीक्षा कर रही है? तमिलनाडु में 1967, पश्चिम बंगाल में 1977, बिहार में 1990, गुजरात में 1995 और ओडिशा में 2000 के बाद कांग्रेस का मुख्यमंत्री नहीं बना। ये आंकड़े किसी चुनावी गड़बड़ी का प्रमाण नहीं, लेकिन पार्टी के बदलते जनाधार और क्षेत्रीय राजनीति की पड़ताल जरूर मांगते हैं। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यह बहस और महत्वपूर्ण हो सकती है। मतदाता सूची में गड़बड़ी के आरोपों की निष्पक्ष जांच जरूरी है, मगर आरोपों की पुष्टि भी तथ्यों से होनी चाहिए। भाजपा कांग्रेस पर हमले तेज कर रही है, लेकिन उसे भी अपने राजनीतिक दावों का आधार स्पष्ट रखना होगा। लोकतंत्र में आयोग से जवाब मांगना अधिकार है, मगर जनता के बदलते विश्वास का जवाब देना भी राजनीति की जिम्मेदारी है

सुरेश गांधी

भारतीय राजनीति में इन दिनों एक दिलचस्प, लेकिन गंभीर बहस चल रही है। सवाल केवल चुनाव में हार-जीत का नहीं, बल्कि उस राजनीतिक सोच का है, जिसके सहारे कोई दल जनता के बीच अपनी विश्वसनीयता बनाए रखना चाहता है। कांग्रेस चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची से जुड़े सवालों को लोकतंत्र के भविष्य से जोड़ रही है। भाजपा इसे कांग्रेस के नेतृत्व, संगठन और चुनावी पराजयों से जोड़कर देख रही है। दोनों पक्षों के अपने तर्क हैं, लेकिन इस राजनीतिक टकराव के बीच एक बड़ा प्रश्न खड़ा है—क्या चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाना और अपनी राजनीतिक कमजोरियों का आकलन करना एक-दूसरे के विरोधी हैं, या लोकतंत्र में दोनों की समान रूप से जरूरत है? केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान की प्रेस कॉन्फ्रेंस ने इस बहस को और धार दी। उन्होंने कांग्रेस की चुनावी पराजयों के लिए चुनाव आयोग के बजाय उसके नेतृत्व को जिम्मेदार ठहराया। उनका आरोप था कि कांग्रेस अपनी हार के कारणों पर आत्ममंथन करने के बजाय संवैधानिक संस्थाओं को निशाना बना रही है। उन्होंने कांग्रेस के भीतर नेतृत्व संबंधी मतभेदों और क्षेत्रीय दलों पर उसकी निर्भरता का भी उल्लेख किया। भाजपा का तर्क है कि चुनावी राजनीति में लगातार कमजोर पड़ने के कारणों की तलाश कांग्रेस को अपने भीतर करनी चाहिए। इसके जवाब में कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों का जोर इस बात पर है कि मतदाता सूची की पारदर्शिता और चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठाना उनका लोकतांत्रिक अधिकार है। 12 अक्टूबर को विपक्षी नेताओं के सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च और कथित चुनावी अनियमितताओं के संबंध में न्यायिक हस्तक्षेप की पहल ने विवाद को एक नए चरण में पहुंचा दिया। इस तरह राजनीतिक संघर्ष अब केवल सड़कों और प्रेस कॉन्फ्रेंस तक सीमित नहीं रहा, बल्कि चुनावी व्यवस्था की पारदर्शिता और संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही से भी जुड़ गया है।

दशकों से सत्ता से दूरी, क्या यह केवल चुनावी व्यवस्था का सवाल है?

कांग्रेस की मौजूदा राजनीतिक स्थिति को समझने के लिए उसके उन राज्यों के इतिहास पर नजर डालना जरूरी है, जहां लंबे समय से उसका मुख्यमंत्री नहीं बना है। तमिलनाडु में 1967 के बाद कांग्रेस मुख्यमंत्री पद तक नहीं पहुंच सकी। पश्चिम बंगाल में 1977 के बाद यही स्थिति रही। बिहार में 1990, गुजरात में 1995 और ओडिशा में 2000 के बाद कांग्रेस का मुख्यमंत्री नहीं बना। महाराष्ट्र में 2014 के बाद पार्टी मुख्यमंत्री पद से दूर है। ये आंकड़े अपने आप में किसी चुनाव में गड़बड़ी का प्रमाण नहीं हैं। इसके बजाय वे कांग्रेस की दीर्घकालिक राजनीतिक चुनौतियों की पड़ताल का अवसर देते हैं। इन राज्यों में सत्ता परिवर्तन के पीछे क्षेत्रीय अस्मिता, सामाजिक समीकरण, स्थानीय नेतृत्व, संगठनात्मक क्षमता और मतदाताओं की प्राथमिकताओं जैसे अलग-अलग कारण रहे हैं। तमिलनाडु में द्रविड़ राजनीति ने राष्ट्रीय दलों के लिए सीमित राजनीतिक गुंजाइश छोड़ी। पश्चिम बंगाल में वामपंथी दलों और बाद में तृणमूल कांग्रेस ने अपना मजबूत आधार बनाया। बिहार में क्षेत्रीय दलों की राजनीति ने कांग्रेस के पारंपरिक सामाजिक आधार को प्रभावित किया। गुजरात में भाजपा ने लंबे समय तक संगठन और नेतृत्व के आधार पर अपनी स्थिति मजबूत रखी। ओडिशा में नवीन पटनायक के नेतृत्व वाली बीजू जनता दल ने वर्षों तक कांग्रेस को सत्ता से दूर रखा। महाराष्ट्र की स्थिति कुछ अलग रही। कांग्रेस ने 2014 से पहले राज्य में मुख्यमंत्री पद संभाला था और गठबंधन सरकारों में उसकी भूमिका भी रही। इसलिए वहां मुख्यमंत्री पद से दूरी को पार्टी के पूरी तरह राजनीतिक रूप से अप्रासंगिक हो जाने के बराबर नहीं माना जा सकता। इन उदाहरणों से एक बात स्पष्ट होती है—कांग्रेस की राजनीतिक कमजोरी का विश्लेषण राज्यवार परिस्थितियों को समझे बिना नहीं किया जा सकता। यह कहना भी सही नहीं होगा कि दशकों तक मुख्यमंत्री नहीं बना पाने का अर्थ है कि हर जगह मतदाताओं ने कांग्रेस को पूरी तरह नकार दिया। लेकिन यह सवाल जरूर उठता है कि पार्टी ने अपने पुराने जनाधार को दोबारा मजबूत करने के लिए कितनी प्रभावी रणनीति बनाई।

कांग्रेस के लिए राजनीतिक नुकसान

कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि चुनाव आयोग पर उसके आरोप और संगठनात्मक आत्ममंथन की जरूरत—दोनों मुद्दे एक साथ चर्चा में हैं। यदि पार्टी चुनावी अनियमितताओं के संबंध में स्पष्ट दस्तावेज, आंकड़े और सत्यापन योग्य प्रमाण सामने रखती है, तो उसकी मांगों को गंभीरता से परखा जा सकता है। लेकिन यदि सार्वजनिक बहस केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रहती है, तो उसके मूल सवालों पर चर्चा पीछे छूटने का खतरा रहेगा। दूसरी ओर, भाजपा कांग्रेस के लंबे चुनावी इतिहास को सामने रखकर यह तर्क दे रही है कि पार्टी को अपनी राजनीतिक रणनीति की समीक्षा करनी चाहिए। दशकों से मुख्यमंत्री पद से दूरी का मुद्दा कांग्रेस के लिए असहज जरूर हो सकता है, लेकिन केवल पुराने चुनावी आंकड़ों के आधार पर उसकी वर्तमान राजनीति का पूरा मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। कांग्रेस ने कई राज्यों में गठबंधन के माध्यम से अपनी राजनीतिक भूमिका बनाए रखी है। कुछ जगहों पर वह प्रमुख विपक्षी दल है, जबकि अन्य राज्यों में उसकी स्थिति कमजोर रही है। इसलिए किसी एक निष्कर्ष पर पहुंचने के बजाय राज्यवार चुनावी प्रदर्शन, संगठन की स्थिति और मतदाताओं के समर्थन का विश्लेषण जरूरी है। यह भी ध्यान रखना होगा कि चुनावी राजनीति में आरोपों का असर स्थायी नहीं होता। किसी मुद्दे पर राजनीतिक लाभ या नुकसान इस बात पर निर्भर करता है कि जनता उसे कितना महत्वपूर्ण मानती है, संबंधित दल अपने तर्कों को कितनी विश्वसनीयता से प्रस्तुत करते हैं और उस समय मतदाताओं की प्राथमिकताएं क्या हैं। कांग्रेस के लिए जोखिम तब बढ़ सकता है, जब चुनावी पारदर्शिता की बहस उसके संगठनात्मक सवालों को ढकने लगे और पार्टी अपने पक्ष में विश्वसनीय प्रमाण तथा व्यावहारिक राजनीतिक विकल्प प्रस्तुत न कर पाए। लेकिन यदि उसके आरोपों की पुष्टि होती है, तो निर्वाचन व्यवस्था में सुधार की मांग को गंभीरता से लेना भी उतना ही जरूरी होगा।

2027 से पहले भाजपा और विपक्ष के लिए अहम बहस

उत्तर प्रदेश में इस विवाद का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि यहां 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं। प्रदेश की राजनीति में भाजपा और समाजवादी पार्टी प्रमुख प्रतिद्वंद्वी हैं, जबकि कांग्रेस की भूमिका भी विपक्षी गठबंधन के संदर्भ में महत्वपूर्ण हो सकती है। उत्तर प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्ष अजय राय के बजाय आराधना मिश्रा 'मोना' हैं—इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए पार्टी की ओर से मतदाता सूची पर उठाए गए सवालों को समझना जरूरी है। आठ अक्टूबर को प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष आराधना मिश्रा ने विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद मतदाता सूची से लगभग 2.04 करोड़ नाम हटाए जाने का दावा किया था। उन्होंने निर्वाचन आयोग से नाम हटाने के कारणों और जिलेवार तथा बूथवार विवरण सार्वजनिक करने की मांग की थी। उन्होंने नए मतदाताओं के नाम जोड़ने से जुड़े आंकड़ों में अंतर पर भी सवाल उठाए। ये कांग्रेस की ओर से प्रस्तुत आरोप और आंकड़े हैं; इन्हें निर्वाचन आयोग के आधिकारिक विवरण और संबंधित अभिलेखों से मिलाकर देखना आवश्यक है। मतदाता सूची का मुद्दा उत्तर प्रदेश में केवल कांग्रेस तक सीमित नहीं रहेगा। यदि किसी पात्र मतदाता का नाम सूची से हटता है, तो उसके मतदान के अधिकार पर सीधा असर पड़ सकता है। दूसरी ओर, मृत मतदाताओं, स्थान बदल चुके लोगों और दोहरी प्रविष्टियों को हटाना भी मतदाता सूची को शुद्ध बनाने की प्रक्रिया का हिस्सा है। इसलिए किसी नाम को हटाए जाने की संख्या से ही यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पुनरीक्षण सही था या गलत। सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह होगा कि हटाए गए नामों का सत्यापित विवरण क्या है, पात्र मतदाताओं को अपना नाम जुड़वाने का पर्याप्त अवसर मिला या नहीं और शिकायतों के निस्तारण की व्यवस्था कितनी पारदर्शी है। यदि कांग्रेस इन सवालों पर ठोस दस्तावेज और बूथ स्तर के प्रमाण प्रस्तुत करती है, तो वह निर्वाचन प्रक्रिया में पारदर्शिता की बहस को आगे बढ़ा सकती है। यदि उसके आंकड़ों की पुष्टि नहीं होती या उसके आरोपों में पर्याप्त प्रमाण नहीं मिलते, तो भाजपा को उन्हें चुनौती देने का अवसर मिलेगा। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी चुनाव आयोग के समर्थन में विपक्षी दलों पर संवैधानिक संस्थाओं को कठघरे में खड़ा करने का आरोप लगाया था। इस तरह प्रदेश में यह मुद्दा पहले से ही भाजपा और विपक्ष के बीच राजनीतिक बहस का हिस्सा बन चुका है।

भाजपा को क्या राजनीतिक अवसर मिल सकता है?

भाजपा इस विवाद को तीन प्रमुख सवालों के माध्यम से उठा सकती है। पहला, कांग्रेस के नेतृत्व और संगठन की स्थिति। दूसरा, चुनावी पराजयों के बाद आत्ममंथन की आवश्यकता। तीसरा, निर्वाचन आयोग जैसे संवैधानिक संस्थानों पर लगाए गए आरोपों के समर्थन में प्रमाण प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी। यह रणनीति भाजपा को कांग्रेस के खिलाफ राजनीतिक जवाब देने का अवसर देती है। लेकिन इसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि जनता किन मुद्दों को अधिक महत्व देती है। उत्तर प्रदेश में रोजगार, महंगाई, किसानों की आय, कानून-व्यवस्था, स्थानीय विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक समीकरण भी चुनावी विमर्श को प्रभावित करेंगे। केवल कांग्रेस की कमजोरियों पर बहस होने से भाजपा के सामने मौजूद अन्य राजनीतिक सवाल समाप्त नहीं हो जाते। सत्तारूढ़ दल को भी अपने कामकाज और वादों के आधार पर जनता के सामने जवाबदेह होना पड़ेगा।

समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के संबंधों पर भी पड़ेगा असर?

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की राजनीतिक स्थिति का एक महत्वपूर्ण पहलू समाजवादी पार्टी के साथ उसका संबंध है। विपक्षी गठबंधन की सफलता केवल साझा मुद्दे उठाने पर निर्भर नहीं करती, बल्कि सीटों के बंटवारे, स्थानीय नेतृत्व, कार्यकर्ताओं के तालमेल और मतदाताओं के बीच विश्वसनीयता पर भी निर्भर करती है। यदि कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर चुनावी पारदर्शिता का मुद्दा उठाती है, तो समाजवादी पार्टी के सामने यह तय करने का प्रश्न होगा कि इस मुद्दे पर उसका रुख कितना साझा और कितना स्वतंत्र होगा। दोनों दलों के बीच तालमेल बना रहता है या राजनीतिक रणनीति को लेकर मतभेद उभरते हैं, इसका असर विपक्ष की एकजुटता पर पड़ सकता है। फिर भी, केवल इस विवाद के आधार पर गठबंधन के भविष्य या चुनावी परिणाम का अनुमान लगाना उचित नहीं होगा। गठबंधन की राजनीति में स्थानीय परिस्थितियां और चुनाव के निकट बनने वाले समीकरण भी महत्वपूर्ण होते हैं।

जनता किसे सुनेगी—आरोप, जवाब या समाधान?

राजनीति में आरोप ध्यान खींचते हैं, लेकिन लंबे समय तक जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए समाधान प्रस्तुत करना जरूरी होता है। कांग्रेस यदि मतदाता सूची की शुद्धता और चुनावी पारदर्शिता पर सवाल उठाती है, तो उसे यह भी बताना होगा कि वह किन प्रक्रियागत सुधारों की मांग कर रही है। भाजपा यदि कांग्रेस के नेतृत्व पर सवाल उठाती है, तो उसे अपने तर्कों के साथ कांग्रेस के आरोपों का तथ्यात्मक जवाब भी देना होगा। निर्वाचन आयोग की भूमिका इस बहस में केंद्रीय है। उसे मतदाता सूची से जुड़े सवालों पर पारदर्शी जानकारी उपलब्ध करानी चाहिए, पात्र मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए और शिकायतों का समयबद्ध निस्तारण सुनिश्चित करना चाहिए। राजनीतिक दलों को भी आरोप लगाने के साथ प्रमाण प्रस्तुत करने चाहिए और गलत सूचना से बचना चाहिए। लोकतंत्र में संस्थाओं की विश्वसनीयता किसी एक राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं होती। वह पूरे देश की साझा पूंजी है। इसलिए निर्वाचन प्रक्रिया को लेकर उठने वाले सवालों का जवाब राजनीतिक नारों के बजाय तथ्यों, दस्तावेजों और निष्पक्ष जांच से मिलना चाहिए।

राजनीतिक बहस का असली पैमाना जनता का विश्वास

इस विवाद का वास्तविक महत्व किसी एक दल की राजनीतिक जीत या हार से बड़ा है। चुनावी व्यवस्था पर उठने वाले सवालों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और राजनीतिक दलों को अपने आरोपों के समर्थन में प्रमाण देने चाहिए। कांग्रेस को अपने संगठन और नेतृत्व की चुनौतियों पर भी विचार करना होगा। भाजपा को भी अपने राजनीतिक दावों को तथ्यों के आधार पर प्रस्तुत करना चाहिए। उत्तर प्रदेश में इस बहस का असर 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक विमर्श पर पड़ सकता है। लेकिन उसका वास्तविक चुनावी प्रभाव इस बात से तय होगा कि मतदाता सूची के सवालों पर कितनी स्पष्टता आती है, विपक्षी दलों में कितना तालमेल रहता है और राजनीतिक दल जनता के रोजमर्रा के मुद्दों पर कितने विश्वसनीय समाधान प्रस्तुत करते हैं। लोकतंत्र में किसी दल की असली ताकत उसके आरोपों की तीव्रता से नहीं, बल्कि उसके तर्कों की विश्वसनीयता, संगठन की मजबूती और जनता के विश्वास से तय होती है। चुनाव आयोग से सवाल पूछना जरूरी है, लेकिन राजनीतिक दलों का आत्ममंथन भी उतना ही आवश्यक है। अंततः जनादेश का रास्ता न आरोपों से अकेले बनता है, न जवाबी हमलों से—उसकी बुनियाद तथ्यों, जवाबदेही और जनता के भरोसे पर टिकी होती है।

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