‘जनता’
के मनमाफिक होगा ‘2019 बजट’

सुरेश
गांधी

मोदी सरकार
के इस कार्यकाल
का ये आखिरी
बजट इस लिहाज
से हो सकता
है कि लोगों
को चौंका दे।
जैसा कि आप
जानते हैं कि
देश की इकोनॉमी
तीन मुख्य भागों
पर निर्भर कर
रही है जो
कि कृषि, मैन्यूफैक्चरिंग
और सर्विस सेक्टर
हैं। तीनों सेक्टर्स
के लिए भारी
मात्रा में काम
करने वाले लोगों
की जरुरत होती
है। इसमें से
भी ज्यादातर कार्यशक्ति
मिडिल क्लास से
आती है जिनके
लिए बचत ही
उनकी सबसे बड़ी
पूंजी होती है।
लिहाजा सरकार की तरफ
से अगर इनकम
टैक्स स्लैब में
बदलाव किया जाता
है तो ये
खास तौर पर
मिडिल क्लास के
लिए अच्छी खबर
होगी और उनकी
जेब में ज्यादा
पैसा आएगा। इसके
तहत अगर इनकम
टैक्स स्लैब में
4 लाख या 5 लाख
रुपये तक की
आय टैक्स फ्री
कर दी जाती
है तो ये
मोदी सरकार के
लिए लोगों का
रुझान और ज्यादा
पॉजिटिव करने में
मददगार साबित होगा। मोदी
सरकार का एक
और महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट
रहा है मेक
इन इंडिया स्कीम।
इसके जरिए देश
में ही निर्मित
उत्पादों, स्वदेशी उपकरणों का
ज्यादा से ज्यादा
इस्तेमाल करने के
लिए लोगों को
प्रोत्साहित करने का
लक्ष्य रखा गया।
साथ ही देश
के स्किल्ड लोगों
के काम को
आगे लाने की
भी कोशिश की
गई। इस स्कीम
के जरिए जहां
कई तरह के
टैक्स बेनेफिट लोगों
को देने की
कोशिश की गई
जैसे कि -टैक्स
हॉलीडे, स्टार्टअप्स को दिए
जा रहे टैक्स
फायदे, स्टार्टअप्स के लिए
किए जा रहे
निवेश पर फायदे,
रिसर्च और डेवलपमेंट
के लिए किए
जा रहे प्रयासों
पर मिलने वाले
टैक्स फायदे जैसे
कई और तरह
के भी लाभ
शामिल हैं। हालांकि
स्टार्टअप्स के लिए
ये भी जरूरी
है कि वो
ग्लोबल मोर्चे पर अपनी
पहचान बना सकें।
इसके लिए इस
बजट में कुछ
और टैक्स इंसेटिव्स
मिलने की उम्मीद
कारोबारी कर रहे
हैं।
सरकार के एजेंडा
में ये शामिल
है कि देश
के स्टार्टअप्स और
आंत्रप्रेन्योर्स को वैश्विक
पहचान दिलाई जाए।
इसके लिए सरकार
बजट में कुछ
ऐसे प्रावधान कर
सकती है जिससे
मेक इन इंडिया
को और बूस्ट
मिल सके। चूंकि
ये एक अंतरिम
बजट होगा इसलिए
सरकार छोटे-छोटे
कदम भी अगर
लेती है तो
ये बेहतर भारत
बनाने की दिशा
में अर्थपूर्ण कदम
होगा। छोटे बदलावों
के जरिए भी
देश की अर्थव्यवस्था
को आगे ले
जाने की कोशिशों
को सहारा मिल
सकता है और
सरकार की यही
कोशिश होनी भी
चाहिए। हाल ही
में दिसंबर में
हुई जीएसटी काउंसिल
की 31वीं बैठक
में सरकार ने
23 वस्तुओं के जीएसटी
स्लैब को कम
करनेेे के साथ
ही 3 सेवाओं पर
भी जीएसटी रेट
घटाया है, जो
1 जनवरी से लागू
हो चुका है।
इसके जरिए सरकार
उम्मीद कर रही
है कि आम
जनता और कारोबारियों
की तरफ से
सरकार को समर्थन
मिलेगा क्योंकि इस फैसले
का सीधा फायदा
उन्हें मिलने वाला है।
इसके अलावा
कंपनियों की कॉर्पोरेट
टैक्स में कटौती
की मांग को
भी न माने
जाने के ही
आसार नजर आ
रहे हैं। सरकार
को अभी भी
अपना 3 साल पुराना
वादा पूरा करना
है जिसके तहत
कहा गया था
कि बड़ी कंपनियों
पर कॉर्पोरेट टैक्स
30 फीसदी से घटाकर
25 फीसदी किया जाएगा।
बड़ी कंपनियों को
आज तक उस
वादे के सच
होने का इंतजार
है। किसानों के
राहत पैकेज के
लिए भी सरकार
को काफी मशक्क्त
करनी पड़ सकती
है क्योंकि इसका
अनुमानित व्यय करीब
1400 करोड़ डॉलर आ
सकता है। इतने
भारी खर्च को
उठाने की स्थिति
में आगे चलकर
सरकार का वित्तीय
बैंलेंस बिगड़ सकता
है और देश
का वित्तीय घाटा
बेतहाशा बढ़ सकता
है। ये कदम
चुनाव में भले
ही मोदी सरकार
को फायदा पहुंचाए
लेकिन चुनाव खत्म
होने के बाद
इसका वास्तविक असर
देश की इकोनॉमी
पर निगेटिव रूप
से आ सकता
है। पिछले हफ्ते
ही आरबीआई के
पूर्व गवर्नर रघुराम
राजन ने कहा
कि भारत को
लचीले लेबर और
लैंड लॉ की
जरूरत हैं जिनके
जरिए देश के
विकास की राह
में जो रोड़े
हैं उन्हें दूर
किया जा सके।
इसके अलावा गुड्स
एंड सर्विसेज टैक्स
(जीएसटी) की खामियों
को भी सुधारने
की जरूरत है।
लिहाजा ये माना
जा सकता है
कि इस बार
सरकार फिर से
आर्थिक रिफॉर्म के बड़े
कदम लेने से
बच सकती है
और इस तह
का सामान्य और
लोकप्रिय बजट पेश
कर सकती है।
सरकार आयकर स्लैब
में बदलाव कर
सकती है और
4 या 5 लाख रुपये
की आमदनी वालों
को टैक्स से
छूट दे सकती
है। हां अगर
ऐसा होता है
तो निश्चित तौर
पर मोदी सरकार
को इसका बेहद
बड़ा फायदा आने
वाले चुनाव में
देखने को मिल
सकता है।
इस बजट
से पहले 31 जनवरी
को सेंसेक्स 35 हजार
970 के स्तर पर
रहा। वहीं निफ्टी
11,020 के स्तर के
पार कारोबार कर
रहा था। एक साल
बाद 31 जनवरी 2019 को सेंसेक्स
35,750 के स्तर पर
है.। जबकि
निफ्टी करीब 50 अंकों की
तेजी के साथ
10,700 के स्तर पर
है। ऐसे में
यह बजट शेयर
बाजार की चाल
को तय करने
वाला बन सकता
है। पिछले साल
के बजट से
पहले 31 जनवरी 2018 को डॉलर
के मुकाबले रुपया
63.66 के स्तर पर
था। जबकि 1 साल
बाद 31 जनवरी 2019 को एक
डॉलर, 71.06 रुपये के बराबर
है। 31 जनवरी 2018 को सोना
की कीमत 31, 230 रुपये
प्रति दस ग्राम
थी तो वहीं
1 साल बाद इसका
भाव 34,200 रुपये प्रति दस
ग्राम पर है।
चांदी की बात
करें तो इसकी
कीमत 31 जनवरी 2018 को 42,200 रुपये
प्रति किलोग्राम पर
थी। वहीं 31 जनवरी
2019 को यह
41,400 रुपये के स्तर
पर है। एक
साल पहले 31 जनवरी
को दिल्ली में
पेट्रोल की कीमत
72.92 रुपये प्रति लीटर थी
तो वहीं 2019 में
इसी दिन यह
71.09 रुपये के भाव
पर है। डीजल की
बात करें तो
यह 31 जनवरी 2019 को
65.81 रुपये प्रति लीटर के
भाव पर है
जबकि एक साल
पहले इसी दिन
यह 64 रुपये के
भाव पर था।
जनवरी 2018 में सब्सिडी
के साथ एलपीजी
सिलेंडर की कीमत
495.64 रुपये थी। वर्तमान
में यह 854.99 रुपये
के भाव पर
है। रिजर्व बैंक
ऑफ इंडिया ने
जनवरी 2018 में रेपो
रेट को 6 फीसदी
पर बरकरार रखा
था। वहीं फिलहाल
यह 6.5 फीसदी पर बरकरार
है। अगर तुलना
करें तो 1 साल
में 0.5 फीसदी रेपो रेट
बढ़ गया है।
आसान भाषा में
समझें तो रेपो
रेट बढ़ने से
होम लोन के
ग्राहकों पर ब्याज
का बोझ बढ़
जाता है। रेपो
रेट के बढ़ने
के बाद बैंक
भी लोन पर
अपनी ब्याज दरों
को बढ़ा देते
हैं।
वैसे तो
जनवरी के महंगाई
दर के आंकड़े
अभी नहीं आए
हैं लेकिन दिसंबर
से तुलना करें
तो इस बार
थोक कीमतों पर
देश की
सालाना महंगाई दर दिसंबर
में घटकर 3.80 फीसदी
रही है। जबकि
एक साल पहले
दिसंबर 2017 में यह
आंकड़ा 3.58 फीसदी के स्तर
पर आ गई
थी। अगर खुदरा
महंगाई दर की
बात करें तो
दिसंबर में यह
2.19 रही। जबकि 1 साल पहले
2017 दिसंबर में उपभोक्ता
मूल्य सूचकांक आधारित
महंगाई दर दिसंबर,
2017 में 5.21 फीसदी पर थी।
इसके अलावा सरकार
बचत की सीमा
बढ़ाने पर भी
काम कर रही
है और इससे
सबसे ज्यादा फायदा
मिडिल क्लास को
ही होगा। इस
बार के बजट
को देखें तो
सरकार चार तरह
के मुख्य फायदे
मिडिल क्लास को
दे सकती है।
फिलहाल ढाई लाख
रुपये तक की
आय पर लोगों
को कोई टैक्स
नहीं देना होता
है। इस टैक्स
छूट की सीमा
को बढ़ाकर 4 लाख
रुपये तक किया
जा सकता है।
लंबे समय से
टैक्स स्लैब में
बदलाव करने की
मांग की जा
रही है। ढाई
लाख रुपये से
5 लाख रुपये तक
की आय वर्ग
वालों को 5 फीसदी
की दर से
टैक्स देना होता
है। 5 लाख रुपये
से 10 लाख रुपये
तक की आय
वालों को 20 फीसदी
की दर से
टैक्स देना होता
है। 10 लाख रुपये
से ज्यादा आय
इनकम वालों पर
30 फीसदी की दर
से टैक्स लगता
है।
