ट्रंप की ‘ट्रेड वॉल’ टूटी : कारपेट सहित इक्सपोर्ट इंडस्ट्री को मिली नई ऊर्जा
अमेरिकी अदालत ने ट्रंप की ‘ट्रेड वॉल’ को तोड़कर लोकतंत्र और मुक्त व्यापार की जीत सुनिश्चित की है। भारत के लिए यह फैसला खासतौर पर कालीन उद्योग के लिए जीवनदायी साबित हो सकता है, जिसने पिछले कुछ वर्षों में टैरिफ की मार झेली है। अब जबकि रास्ता खुल गया है, भारत को अपने निर्यातकों को सहयोग और प्रोत्साहन देकर इस अवसर को दीर्घकालिक उपलब्धि में बदलना होगा. निर्यात से जुड़े ईकाईयों का मानना है कि अमेरिकी बाजार में भारत का कालीन, टेक्सटाइल और रेडीमेड गारमेंट उद्योग सबसे ज्यादा प्रभावित था। अब टैरिफ हटने से इनकी प्रतिस्पर्धा फिर से मजबूत होगी। स्टील और एल्युमिनियम निर्यातकों को भी सीधा फायदा मिलेगा। चाय, मसाले, बासमती चावल और दवाइयों जैसे कृषि व औषधि उत्पादों की मांग अमेरिका में और बढ़ेगी। आईटी और सर्विस सेक्टर, जिन्हें ‘नेशनल इमरजेंसी’ की आड़ में वीज़ा व आउटसोर्सिंग नीतियों से अप्रत्यक्ष दबाव झेलना पड़ा था, अब अपेक्षाकृत सहज माहौल पाएंगे. भदोही और वाराणसी जैसे बुनकर-बहुल क्षेत्र, जो हाल तक निराशा में डूबे थे, अब फिर से उम्मीद की डोर पकड़ सकते हैं. ‘ट्रंप ट्रेड वॉल’ के टूटने से भारत के कालीनों की चमक दुनिया के सबसे बड़े बाजार में लौटेगी और यह न केवल निर्यातकों बल्कि लाखों बुनकर परिवारों के भविष्य को नई रोशनी देगा
सुरेश गांधी
अमेरिका की फेडरल अपील कोर्ट ने हाल ही में डोनाल्ड ट्रंप द्वारा थोपे गए टैरिफ (आयात शुल्क) पर रोक लगाकर वैश्विक व्यापार जगत को बड़ी राहत दी है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति को असीमित अधिकार नहीं दिए जा सकते। संविधान के अनुसार टैरिफ लगाने की शक्ति मूलतः कांग्रेस के पास है, न कि राष्ट्रपति के पास। ट्रंप ने “राष्ट्रीय आपातकाल“ घोषित कर 1977 के इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (आईईपीए) का हवाला देते हुए मनमाने ढंग से कई देशों पर भारी-भरकम शुल्क थोप दिए थे। परंतु अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि “इमरजेंसी“ का बहाना बनाकर व्यापार नीति को निजी एजेंडे के लिए हथियार नहीं बनाया जा सकता। यह फैसला न केवल अमेरिकी लोकतंत्र की जीत है, बल्कि उन सभी देशों के लिए भी राहत है जिनके निर्यात पर ट्रंप के टैरिफ ने गहरी चोट पहुंचाई थी।
भारत उनमें सबसे प्रमुख हैं निर्यातपरक उद्योग. फेडरल अपील कोर्ट का यह फैसला केवल ट्रंप की नीति की हार नहीं, बल्कि वैश्विक व्यापार में भरोसा लौटाने वाला कदम है। भारत के लिए यह अवसर है कि वह अमेरिकी बाजार में न केवल अपने पारंपरिक उत्पादों, जैसे कालीन, टेक्सटाइल और मसालों को मजबूत करे, बल्कि आईटी और औद्योगिक क्षेत्र में भी अपनी हिस्सेदारी बढ़ाए।
ट्रंप प्रशासन की टैरिफ नीति ने दुनिया भर के बाजारों में अनिश्चितता पैदा कर दी थी। जापान, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ जैसे देशों ने समझौते कर राहत पा ली थी, लेकिन भारत, लाओस, अल्जीरिया सहित कई देशों पर 30 से 50 प्रतिशत तक शुल्क जारी रहे। इससे अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पाद महंगे हो गए और निर्यातक प्रतिस्पर्धा से बाहर होने लगे। अदालत के आदेश से अब यह आशंका कम हुई है कि कोई भी राष्ट्रपति व्यापार नियमों को राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर सकेगा। भारत का कालीन उद्योग, विशेषकर भदोही, मिर्जापुर और वाराणसी का कालीन बेल्ट, ट्रंप के टैरिफ से सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ था। भारतीय हैंडमेड कालीन विश्वभर में अपनी गुणवत्ता और शिल्पकला के लिए प्रसिद्ध हैं। अमेरिका अकेला ऐसा देश है जहां भारत के कुल कालीन निर्यात का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा जाता है।
ट्रंप द्वारा लगाए गए 50 प्रतिशत तक के अतिरिक्त शुल्क ने इस उद्योग को भारी झटका दिया। अमेरिकी खरीदारों ने या तो ऑर्डर कम कर दिए या फिर तुर्की, नेपाल और बांग्लादेश जैसे प्रतिस्पर्धी देशों की ओर रुख किया। इसके चलते हजारों बुनकरों की रोजी-रोटी प्रभावित हुई और निर्यात में भारी गिरावट आई। अब अदालत के आदेश के बाद अमेरिकी बाजार में भारतीय कालीनों की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति बहाल होगी। विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले महीनों में भारत का कालीन निर्यात फिर से रफ्तार पकड़ सकता है। इससे न केवल विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत होगा बल्कि उत्तर प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और राजस्थान जैसे राज्यों में बुनकरों को प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा।कालीन और टेक्सटाइल उद्योग में नई उड़ान
अमेरिका भारतीय हैंडमेड कालीन, टेक्सटाइल और रेडीमेड गारमेंट्स का सबसे बड़ा खरीदार है। ट्रंप के टैरिफ से इन उत्पादों की लागत बढ़ गई थी और भारतीय निर्यातकों को प्रतिस्पर्धा में नुकसान हुआ। अब शुल्क हटने से ये उत्पाद फिर से अमेरिकी बाजार में आकर्षक कीमत पर उपलब्ध होंगे। यह वाराणसी, भदोही, मिर्जापुर जैसे केंद्रों के कालीन उद्योग के लिए राहत की खबर है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि भारत के कुल कालीन निर्यात का लगभग 60-65 प्रतिशत हिस्सा अमेरिका में जाता है। जब ट्रंप प्रशासन ने इन पर अतिरिक्त टैरिफ लगाया, तो भारतीय कालीन अमेरिका में महंगे पड़ने लगे और तुर्की, नेपाल और ईरान
जैसे प्रतिस्पर्धी देशों को अप्रत्याशित बढ़त मिलने लगी। अब अदालत के आदेश के बाद स्थिति पलटेगी। भारतीय कालीन फिर से अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धी दाम पर उपलब्ध होंगे। यह बदलाव खासकर उन लघु और मध्यम उद्यमियों (एमएसएमई) के लिए जीवनदान साबित होगा जो निर्यात-आधारित उत्पादन पर निर्भर हैं। भदोही और मिर्जापुर जैसे क्षेत्र जहाँ हजारों बुनकर परिवारों की आजीविका केवल कालीन निर्यात पर टिकी है, उन्हें यह राहत नई ऊर्जा देगी।भारतीय कालीन उद्योग पहले से ही
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी
गुणवत्ता, डिजाइनों और हस्तनिर्मित कलाकारी
के लिए प्रसिद्ध है।
लेकिन अमेरिकी टैरिफ ने मांग घटा
दी थी। अब इसके
हटने से आने वाले
वर्षों में कालीन निर्यात
20-25 प्रतिशत तक बढ़ने की
संभावना है। इससे न
केवल विदेशी मुद्रा आय में वृद्धि
होगी, बल्कि ग्रामीण और अर्द्धशहरी क्षेत्रों
में रोजगार भी बढ़ेगा। इसके
अलावा, कालीन उद्योग से जुड़ी सप्लाई
चेन, यार्न उद्योग, रंगाई-प्रिंटिंग, ट्रांसपोर्ट और पैकेजिंगकृभी लाभान्वित
होगी। इस प्रकार यह
राहत केवल निर्यातकों तक
सीमित नहीं रहेगी, बल्कि
स्थानीय स्तर पर हजारों
परिवारों की रोज़ी-रोटी
को मजबूत करेगी.
नीति सुझाव
भारत को चाहिए
कि वह इस अवसर
का उपयोग केवल तात्कालिक लाभ
तक सीमित न रखे, बल्कि
दीर्घकालिक दृष्टिकोण से अमेरिकी बाजार
में रणनीतिक साझेदारी बनाए। इसके लिए कालीन
उद्योग को प्रोडक्ट डायवर्सिफिकेशन
और नवाचार पर जोर देना
होगा। छोटे कारीगरों तक
निर्यात के लाभ पहुँचाने
के लिए डायरेक्ट मार्केटिंग
चैनल विकसित हों। टेक्सटाइल और
कालीन सेक्टर में ग्रीन और
सस्टेनेबल प्रोडक्ट्स को प्रोत्साहित किया
जाए, क्योंकि अमेरिकी बाजार में पर्यावरणीय मानकों
का महत्व बढ़ रहा है।
निर्यात बढ़ाने के लिए वित्तीय
संस्थानों से लो-कॉस्ट
क्रेडिट उपलब्ध कराया जाए। इसके अलावा
निर्यात क्षेत्रों में उत्पाद की
गुणवत्ता और अंतरराष्ट्रीय मानकों
का सख्त पालन हो।
छोटे और मझोले उद्योगों
को अमेरिकी बाजार तक पहुँचाने के
लिए सरकारी स्तर पर निर्यात
प्रोत्साहन पैकेज तैयार किया जाए। द्विपक्षीय
व्यापार समझौतों में भारत अपनी
प्राथमिकता स्पष्ट कर निवेश आकर्षित
करे। साथ ही यूरोप,
एशिया और अफ्रीका के
बाजारों में भी समानांतर
अवसर तलाशे जाएँ ताकि अमेरिकी
अस्थिरता का असर कम
हो।
टेक्सटाइल और गारमेंट सेक्टर की संभावनाएं
कालीनों के साथ-साथ
भारतीय टेक्सटाइल और गारमेंट सेक्टर
को भी राहत मिलेगी।
अमेरिकी बाजार में भारतीय परिधान
पहले से ही मजबूत
पकड़ रखते हैं। टैरिफ
हटने से यह उद्योग
चीन और वियतनाम जैसे
बड़े खिलाड़ियों के मुकाबले और
सशक्त स्थिति में आ सकता
है। बता दें, भारत
का कुल निर्यात 450 अरब
डॉलर के आसपास है,
जिसमें अमेरिका सबसे बड़ा व्यापारिक
साझेदार है। टैरिफ हटने
से न केवल कालीन
और टेक्सटाइल, बल्कि स्टील, ऑटो पार्ट्स, कृषि
उत्पाद और आईटी सेवाओं
को भी फायदा होगा।
अनुमान है कि यदि
यह राहत स्थायी बनी
रहती है तो अगले
दो वर्षों में भारत का
अमेरिका को निर्यात कम
से कम 10-12 प्रतिशत तक बढ़ सकता
है। इसका सीधा असर
रोजगार सृजन पर होगा।
विशेष रूप से कालीन
उद्योग में, जहां हर
ऑर्डर हजारों कारीगरों की मेहनत से
जुड़ा होता है, रोजगार
के अवसर फिर बढ़
सकते हैं।
न्यायिक फैसले का व्यापक संदेश
अमेरिकी अदालत का यह फैसला
एक गहरा संदेश भी
देता है, लोकतांत्रिक संस्थाओं
की सीमाएं किसी भी नेता
के लिए लांघने योग्य
नहीं हैं। ट्रंप ने
बार-बार यह दावा
किया कि वे कांग्रेस
की मंजूरी के बिना भी
विदेशी सामानों पर टैक्स लगा
सकते हैं। अदालत ने
इस अहंकार को तोड़ा और
यह सुनिश्चित किया कि वैश्विक
व्यापार का भविष्य किसी
एक व्यक्ति की राजनीतिक महत्वाकांक्षा
पर निर्भर न हो। वैसे
भी भारत, अमेरिका का एक अहम
ट्रेड पार्टनर है। पिछले वर्षों
में दोनों देशों का द्विपक्षीय व्यापार
लगभग 200 अरब डॉलर तक
पहुँच चुका है। ट्रंप
के टैरिफ का असर भारत
पर गहराई से पड़ा था।
अब जब अदालत ने
इन शुल्कों पर रोक लगा
दी है, तो भारत
के लिए कई नए
दरवाजे खुलेंगे।
भारत की कूटनीति और आगे की राह
भारत को अब
इस मौके का लाभ
उठाते हुए अमेरिकी कंपनियों
और बाजारों के साथ अपने
संबंधों को और गहरा
करना चाहिए। ‘मेक इन इंडिया’
और ‘वन डिस्ट्रिक्ट, वन
प्रोडक्ट’ (ओडीओपी) जैसी योजनाओं के
तहत कालीन, टेक्सटाइल और अन्य पारंपरिक
उद्योगों के लिए अमेरिका
सबसे बड़ा अवसर बन
सकता है। साथ ही,
भारत को यह भी
ध्यान रखना होगा कि
अमेरिका में सत्ता परिवर्तन
के साथ नीतियां बदल
सकती हैं। इसलिए दीर्घकालिक
रणनीति के तहत यूरोप,
खाड़ी देशों और एशियाई बाजारों
में भी निर्यात का
संतुलन बनाना जरूरी है। मतलब साफ
है भारत को इस
अवसर का लाभ उठाने
के लिए अमेरिकी बाजार
में अपनी हिस्सेदारी मजबूत
करने की दिशा में
ठोस रणनीति बनानी होगी। चीन और वियतनाम
जैसे देशों से प्रतिस्पर्धा भी
तेज़ होगी। इसलिए भारत को क्वालिटी,
समय पर डिलीवरी और
तकनीकी श्रेष्ठता पर जोर देना
होगा। अदालत का यह निर्णय
सिर्फ ट्रंप की हार नहीं,
बल्कि वैश्विक व्यापार जगत के लिए
भरोसा लौटाने वाला कदम है।
भारत के लिए यह
समय है कि वह
न केवल अपने परंपरागत
उत्पादों बल्कि नए क्षेत्रों में
भी अमेरिकी बाजार में पैठ बनाए।
जब अमेरिका जैसी महाशक्ति की
नीतियों में न्यायपालिका संतुलन
कायम कर सकती है,
तो यह पूरी दुनिया
के लिए सबक है
कि व्यापारिक न्याय और पारदर्शिता ही
दीर्घकालिक समृद्धि की असली कुंजी
है।
भारत पर पांच प्रमुख आर्थिक लाभ
1. कालीन और
टेक्सटाइल
उद्योग
को
प्रतिस्पर्धा
में
राहत।
2. स्टील और
एल्युमिनियम
निर्यात
को
बढ़ावा।
3. कृषि और
मसाला
उत्पादों
की
मांग
में
वृद्धि।
4. आईटी और
सर्विस
सेक्टर
के
लिए
सकारात्मक
माहौल।
5. व्यापार घाटे
में
सुधार
और
अर्थव्यवस्था
को
मजबूती।
स्टील और एल्युमिनियम
2018 से ही अमेरिका
ने स्टील और एल्युमिनियम पर
भारी आयात शुल्क लगाए
थे। भारत इस क्षेत्र
का बड़ा निर्यातक है।
टैरिफ हटने से भारतीय
कंपनियों को अमेरिकी बाजार
में दोबारा प्रतिस्पर्धा का मौका मिलेगा।
यह भारत के औद्योगिक
उत्पादन और रोजगार दोनों
के लिए सकारात्मक होगा।
कृषि और औषधि निर्यात
भारत अमेरिका को
मसाले, चाय, बासमती चावल
और दवाइयों का निर्यात करता
है। शुल्क घटने से इनकी
अमेरिकी उपभोक्ताओं तक पहुँच आसान
और सस्ती होगी। भारतीय किसानों और दवा उद्योग
को इसका सीधा फायदा
मिलेगा।
आईटी और सर्विस सेक्टर
भले ही आईटी
सेवाओं पर प्रत्यक्ष शुल्क
नहीं लगे थे, लेकिन
ट्रंप प्रशासन ने ‘नेशनल इमरजेंसी’
का हवाला देकर वीज़ा और
आउटसोर्सिंग पर दबाव बनाया।
अब माहौल अपेक्षाकृत सहज होगा और
भारतीय आईटी कंपनियों के
लिए अमेरिका में कारोबार आसान
होगा।
राजनीतिक दबाव और भविष्य की अनिश्चितताएं
यह सच है
कि अदालत ने ट्रंप के
कदम पर रोक लगा
दी है, लेकिन यह
लड़ाई यहीं समाप्त नहीं
होगी। ट्रंप प्रशासन या आने वाले
राष्ट्रपति सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं,
या फिर कांग्रेस से
नया कानून पारित करवा सकते हैं।
इसलिए भविष्य में स्थिति अस्थिर
बनी रह सकती है।
भारत को चाहिए कि
वह इस अस्थिरता को
देखते हुए अपनी व्यापारिक
नीतियों को बहुआयामी बनाए
और अमेरिकी बाजार पर अत्यधिक निर्भर
न रहे। भारत को
इस मौके का लाभ
उठाने के लिए एक
ठोस रणनीति बनानी होगी। खासकर कालीन उद्योग में भारतीय बुनकरों
के लिए क्लस्टर विकास
योजनाओं को बढ़ावा देना
होगा। अमेरिकी बाजार के लिए डिजाइन
और ट्रेंड के मुताबिक उत्पाद
तैयार करने होंगे। सरकारी
स्तर पर एक्सपोर्ट इंसेंटिव
और लॉजिस्टिक सपोर्ट दिया जाना चाहिए
ताकि छोटे निर्यातकों को
भी प्रतिस्पर्धा में अवसर मिले।
डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग कर
भारतीय कालीनों की ‘ब्रांड इंडिया’
पहचान को मजबूत करना
होगा।
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