गरबा : डांडिया की टकराहट में गूंजता शक्ति-संग्राम
गरबा महज़ नृत्य नहीं, यह हमारी सांस्कृतिक चेतना का उत्सव है, जहां भक्ति, उल्लास और लोककला एकाकार होते हैं। शारदीय नवरात्र हमें स्मरण कराते हैं कि शक्ति की उपासना मंदिरों में ही नहीं, हमारे सामूहिक नृत्य और संगीत में भी उतनी ही प्राणवान है। यह परंपरा पीढ़ियों को जोड़ते हुए कहती है, सृष्टि का चक्र अनंत है, और उस चक्र की धुरी पर है माता की अदम्य शक्ति। खास यह है कि जब नवरात्र की रात गहराती है और डांडिया की खनक आकाश तक पहुंचती है, तो लगता है मानो देवी की तलवारें फिर से महिषासुर के अभिमान को चीर रही हों। चमकदार डांडिया स्टीक मां की तलवार का रूप ले लेती है। गोल घेरे में पुरुष और महिलाएं जब एक साथ लयबद्ध थिरकते हैं, तो यह केवल नृत्य नहीं, देव-दानव संग्राम का नाट्यरूप होता है. मतलब साफ है यह केवल नृत्य नहीं, यह विजय का उत्सव, भक्ति का आलोक और शक्ति का शाश्वत उद्घोष है। नवरात्रि का नाम लेते ही मन में जैसे अनगिन दीपों का उजास फैल जाता है। कानों में ढोल-नगाड़ों की थाप गूंजती है, पांवों में अपने आप लय उतर आती है। मां अंबे की आराधना का यह पर्व केवल उपवास और पूजा का नहीं, बल्कि आनंद, उल्लास और रंगीन लोकजीवन का भी महोत्सव है। इस महोत्सव का सबसे जीवंत, सबसे आकर्षक और सबसे जादुई रंग है, गरबा और डांडिया
सुरेश गांधी
नवरात्रि की रात जैसे ही उतरती है, आसमान में चांदनी घुलने लगती है और धरती पर रंगीन दीपकों का समंदर चमक उठता है। ढोल की थाप पर जब चमकदार डांडिया स्टीक आपस में टकराती हैं, तो वह सिर्फ संगीत की लय नहीं होती, वह मां दुर्गा और महिषासुर के बीच हुए उस प्राचीन युद्ध की प्रतिध्वनि होती है, जिसने अच्छाई की विजय और शक्ति की अजेयता का संदेश दिया। डांडिया का हर प्रहार, हर टकराहट मां दुर्गा की तलवार की चमक का प्रतीक है। गोल घेरे में थिरकते पुरुष और महिलाएं मानो देवासुर संग्राम का मंचन कर रहे हों। डांडिया की जोड़ी एक ओर युद्ध का आभास कराती है तो दूसरी ओर भक्तिभाव से भरे हृदय की प्रार्थना भी सुनाई देती है। यह नृत्य बताता है कि शक्ति और सौंदर्य, साधना और उत्सव, सब साथ-साथ चल सकते हैं।
संस्कृत का शब्द गर्भदीप,
जिसका अर्थ है ‘अंतरतम
में जलता दीप’, काल
के प्रवाह में गरबा बन
गया। मिट्टी के छिद्रयुक्त घट
में जब एक दीपक
प्रज्वलित होता है, तो
वह केवल लौ नहीं,
चेतना का प्रतीक होता
है। उसी घट को
केंद्र में रख महिलाएं
गोल घेरे में नृत्य
करती हैं, मानो अपनी
आत्मा की परिक्रमा कर
रही हों।
दीपक की लपट जैसे आकाश की ओर उठती है, वैसे ही मानव चेतना भी ऊर्ध्वगामी हो, यही इसकी साधना है। आरती से पहले किया जाने वाला यह नृत्य देवी के चरणों में समर्पित एक मूक प्रार्थना है।
गरबा की थिरकन में जब तीन तालियां गूंजती हैं, तो वह केवल संगीत का हिस्सा नहीं रहतीं; वे ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रति श्रद्धा का घोष बन जाती हैं।
लोककथाएं कहती हैं कि इन तालियों की गूंज से मां भवानी स्वयं जागृत होती हैं, भक्तों का निमंत्रण स्वीकार करती हैं।
नवरात्र की रातें रंगों से भीगी रहती हैं। युवतियां चनिया-चोली, पुरुष केडिया और पगड़ी पहनकर जब गरबा की मंडलियों में उतरते हैं, तो हर ओर झिलमिलाता लोक-सौंदर्य दिखाई देता है। दीपक की लौ की तरह जब हमारी चेतना भी ऊपर उठे, जब पांवों की थिरकन में आत्मा की प्रार्थना घुल जाए, तभी गरबा का असली अर्थ प्रकट होता है। नवरात्र की हर रात जब ढोल-ढमाकों की थाप पर जगमग दीपों के बीच यह गोल घेरे में नाचता भारत दिखता है, तो लगता है मानो सम्पूर्ण सृष्टि मां अंबे के चरणों में आनंद-विभोर होकर नृत्य कर रही हो।
दिल्ली, कोलकाता,
वाराणसी से लेकर मुंबई
तक लोग धर्म, जाति
और भाषा की सीमाओं
से ऊपर उठकर मां
अंबे के इस नृत्य
में एकाकार हो जाते हैं।
गर्भदीप की अनंत ज्योति
‘गरबा’ शब्द की जड़ ‘गर्भ’ है, सृजन का केन्द्र। गोल घेरे में निरंतर घूमता यह नृत्य ब्रह्मांड की अनवरत गति का प्रतीक है। बीच में रखा दीपक मातृशक्ति का प्रतिनिधि बनकर जीवन के अखंड प्रवाह की याद दिलाता है। जन्म, जीवन और मृत्यु, संसार का समूचा चक्र इसी गोल घेराव में जैसे मूर्तिमान हो उठता है। डांडिया की शुरुआत ‘गरबा’ से होती है।
छिद्रयुक्त मिट्टी के कुंभ में प्रज्वलित दीपक, गर्भदीप यानी ज्ञान का वह प्रकाश है जो अंधकार को चीर देता है।
उसकी लौ ऊपर उठती है, संकेत देती है कि चेतना भी देह की सीमाओं से ऊपर उठे।
गरबा में बजती तीन तालियां ब्रह्मा, विष्णु और महेश को नमन करती हैं, जबकि डांडिया उस आराधना का चरम बिंदु है, जहां नृत्य युद्ध बन जाता है और युद्ध पूजा।
रंग और संगीत का संग्राम
डांडिया रातों में रंगों का जो जादू बिखरता है, वह किसी स्वप्न से कम नहीं।शक्ति और स्वास्थ्य का संगम
यह नृत्य केवल आध्यात्मिक नहीं, शारीरिक साधना भी है। गरबा केवल आंखों का सुख नहीं, तन और मन दोनों का उत्सव है। तेज गति, निरंतर घूमना और लयबद्ध थिरकन शरीर को ऊर्जा से भर देती है।सीमाओं से परे एकता
परंपरा और आधुनिकता का मेल
समय के साथ
डांडिया में फिल्मी गीतों
और इलेक्ट्रॉनिक बीट्स ने नई चमक
भरी है। कहीं सजीव
लोकगीत गूंजते हैं तो कहीं
आधुनिक रिमिक्स। परंतु असली आत्मा वही
है, तलवार सी टकराती स्टीक्स,
दीपशिखा की उजास और
मां की अजेयता का
स्मरण।
ग्राम्य लोक से विश्व मंच तक
आधुनिक
संगीत ने इसकी लय
को नया रंग दिया
है, किंतु इसकी आत्मा अब
भी वहीकृमां की उपासना में
डूबी भक्ति।सौभाग्य का भी प्रतीक है गरबा
गरबा को सौभाग्य का भी प्रतीक माना जाता है। इसीलिए महिलाएं नवरात्र में गरबा को नृत्योत्सव के रूप में मनाती है।
इस दौरान पति-पत्नी हो या अन्य सभी लोग पारंपरिक परिधान पहनते हैं। लड़कियां चनिया-चोली पहनती हैं और लड़के गुजराती केडिया पहनकर सिर पर पगड़ी बांधते हैं। नवरात्र पर्व मां अंबे दुर्गा के प्रति श्रद्धा प्रकट करने तथा युवा दिलों में मौज-मस्ती के साथ गरबा-डांडिया खेलने और अपनी संस्कृति से जुड़ने का सुनहरा अवसर भी है।
नवरात्र में माता का पंडाल सजाकर युवक-युवतियां पारंपरिक वस्त्र कुर्ता-धोती, कोटी, घाघरा (चणिया)-चोली, कांच और कौड़ियां जड़ी पोशाक पहन कर पारंपरिक नृत्य डांडिया और ‘गरबे की रात आई, गरबे की रात आई..., सनेडो सवेडो लाल लाल सनेडो‘, ‘अंबा आवो तो रमीये’ गाते हुए गरबा खेलती है।गरबे की बदलती परंपरा
नवरात्रि का पर्व आते ही गुजरात की धरती पर गरबे की गूंज फैल जाती है। मां अंबे की भक्ति में डूबे इस पारंपरिक उत्सव में जहां एक ओर रंग-बिरंगे परिधान, ताली की लय और डांडियों की टनक मन मोह लेती है, वहीं बदलते समय ने इसकी सादगी और आत्मिकता पर बाज़ार की परछाईं भी डाली है।
कभी यह आयोजन केवल आराधना का था, कच्चे घड़े को फूल-पत्तियों से सजाकर, चार दीप जलाकर, लयबद्ध तालियों और मधुर भजनों में डूब जाने वाला। “मीठी लहक में कोई गा रहा होता है, ढोलीड़ा ढोल धीमो बगाड़...” जैसे गीतों की गूंज वातावरण को देवीमय कर देती थी। कहा जाता है कि प्राचीन काल में जंगलों में बांस के पेड़ आपस में टकराते तो एक अनोखी ध्वनि निकलती, उसी से प्रेरित होकर डांडियां तैयार की गईं।लेकिन जैसे-जैसे समाज और बाजार का दायरा बढ़ा, गरबा भी नए रंग में ढलने लगा। अब ऊंचे पंडाल, चमकदार रोशनियां, सेलिब्रिटी की मौजूदगी और महंगे टिकट कई आयोजनों की पहचान बन चुके हैं। जहां कभी चार दीपों की लौ श्रद्धा का प्रतीक थी, वहां अब रंगबिरंगी आतिशबाज़ी उसकी आभा ढक लेती है। गुजराती लोकगीतों की जगह फिल्मी धुनें बजने लगी हैं। फिर भी, इस आधुनिकता के बीच पारंपरिक गरबे का आकर्षण कम नहीं हुआ। चनिया-चोली में सजी युवतियां, केडिया और पगड़ी में सजे युवक जब दो, छह, आठ या बारह तालियों के साथ झूमते हैं तो पुरानी संस्कृति की आत्मा आज भी महसूस होती है। यही वजह है कि नवरात्रि के अलावा विवाह और अन्य हर्षोल्लास के अवसरों पर भी गरबा नृत्य ने अपनी जगह बना ली है। बदलाव चाहे जितना हो, गरबा आज भी मां अंबे की उपासना का जीवंत प्रतीक है। उत्साह, रंग और भक्ति का यह अद्भुत संगम समय की हर परत को पार कर हमारे जीवन में वैसा ही उल्लास भरता है, जैसा सदियों पहले भरता था.










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