Wednesday, 29 April 2026

डमरू की ध्वनि, त्रिशूल की टंकार… और काशी का स्पंदित हृदय : जब बाबा के द्वार पर झुका सत्ता का शिखर

डमरू की ध्वनि, त्रिशूल की टंकारऔर काशी का स्पंदित हृदय : जब बाबा के द्वार पर झुका सत्ता का शिखर 

विश्वनाथ धाम में गूंजाहर-हर महादेव’, आस्था और नेतृत्व का अलौकिक संगम बना ऐतिहासिक क्षण

सुरेश गांधी

वाराणसी. काशी ने एक बार फिर इतिहास को वर्तमान में उतरते देखा। यह केवल एक दौरा नहीं थायह उस सनातन परंपरा का पुनर्पाठ था, जिसमें सत्ता का शिखर भी श्रद्धा के समक्ष विनम्र होकर झुकता है। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बाबा के दरबार में त्रिशूल और डमरू उठाकर भक्तों का अभिवादन किया, तो वह दृश्य किसी राजनीतिक घटना से कहीं ऊपर उठकर काशी की आत्मा का उत्सव बन गया।

सुबह की सुनहरी किरणों के साथ जैसे ही प्रधानमंत्री का काफिला श्री काशी विश्वनाथ मंदिर की ओर बढ़ा, काशी की गलियों ने स्वयं को एक भव्य उत्सव में बदल लिया। बरेका से लेकर विश्वनाथ धाम तक का हर मोड़ जनभावनाओं का तीर्थ बन गयाजहां पुष्पवर्षा केवल स्वागत नहीं, बल्कि श्रद्धा की वर्षा बन गई; जहां ढोल-नगाड़ों की थाप केवल ध्वनि नहीं, बल्कि हृदय की धड़कन बन गई।

मंडुवाडीह से लेकर लहुराबीर, मैदागिन और चौक तक, हर चौराहा एक जीवंत चित्रपट की तरह सजा हुआ था। 

बालकनियों से झांकती आंखें, हाथों में तिरंगा और मोबाइल कैमरों में कैद होते क्षणयह सब मिलकर उस ऐतिहासिक पल को अमर बना रहे थे। काशी की यह प्रतीक्षा केवल प्रधानमंत्री के लिए नहीं थी, बल्कि उस भाव के लिए थी, जो वर्षों से इस शहर की आत्मा में प्रवाहित है।

    विश्वनाथ धाम परिसर में प्रवेश करते ही 51 ब्राह्मणों के शंखनाद और डमरुओं की गूंज ने वातावरण को अलौकिक बना दिया। पंडित ओम प्रकाश मिश्र के नेतृत्व में षोडशोपचार विधि से संपन्न हुआ पूजन केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आस्था की पूर्णता का प्रतीक था। गर्भगृह में मंत्रोच्चार के बीच झुका हुआ प्रधानमंत्री का मस्तक उस भारतीय परंपरा की पुनर्पुष्टि करता दिखा, जहां नेतृत्व का सर्वोच्च स्वरूप भी संस्कृति के चरणों में समर्पित होता है। 

और फिर आया वह क्षण, जिसने इस यात्रा को प्रतीकात्मक ऊंचाई दे दीजब प्रधानमंत्री ने त्रिशूल और डमरू उठाकर भक्तों का अभिवादन किया। यह दृश्य किसी छवि-निर्माण का प्रयास नहीं था, बल्कि काशी की जीवंत परंपरा के साथ एकात्म होने का सहज भाव थामानो स्वयं समय ठहर गया हो और काशी अपनी प्राचीन स्मृतियों में लौट आई हो।

इस पूरे घटनाक्रम में प्रधानमंत्री का मानवीय पक्ष भी उतनी ही सहजता से उभरकर सामने आया। मंदिर परिसर में बच्चों से उनकी आत्मीय बातचीत, उनकी मुस्कान और बच्चों के हाथों में छोटे-छोटे उपहारयह सब उस विश्वास का प्रतीक था, जो भविष्य की पीढ़ी अपने नेतृत्व में देखती है।

लहुराबीर चौराहे पर एनसीसी कैडेट्स और महिलाओं का उत्साह, शंखध्वनि के बीच गूंजता स्वागतयह केवल आयोजन नहीं, बल्कि जनसंपर्क का जीवंत उत्सव था। 

करीब एक वर्ष बाद विश्वनाथ धाम पहुंचे प्रधानमंत्री का यह दौरा कई स्तरों पर संदेश देता है। 

यह काशी के विकास की निरंतरता का संकेत है, यह सांस्कृतिक पुनर्जागरण का उद्घोष है, और यह उस राजनीतिक संवाद का भी हिस्सा है, जिसमें आस्था और जनभावना का समन्वय स्पष्ट दिखता है। सुरक्षा के कड़े इंतजामों के बीच उमड़ा जनसैलाब यह बताने के लिए पर्याप्त था कि काशी केवल एक शहर नहीं, बल्कि भावनाओं का महासागर हैजहां हर लहर में आस्था की चमक है। 

प्रधानमंत्री का यह रोड शो और विश्वनाथ धाम में उनकी उपस्थिति उस महासागर में एक नई तरंग की तरह थी, जिसने पूरे वातावरण को स्पंदित कर दिया। अंततः, यह क्षण केवल एक दिन की घटना नहीं रहेगायह काशी की स्मृतियों में एक ऐसे अध्याय के रूप में दर्ज होगा, जहां त्रिशूल की टंकार, डमरू की गूंज औरहर-हर महादेवका उद्घोष मिलकर यह संदेश दे रहे थे कि भारत की आत्मा आज भी अपनी जड़ों से उतनी ही गहराई से जुड़ी हुई है।

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