रील्स के दौर में रियल इतिहास : काशी में जीवंत हुआ विक्रमादित्य युग
अद्भुत…अकल्पनीय…रोमांचक
: घोड़ों की टाप, रणघोष
और
न्याय
की
गूंज
‘विक्रमकाल’ की
मंच
पर
दिखा
सुशासन,
शौर्य
और
संस्कृति
का
संगम
दर्शकों ने कहा, ये
नाटक
नहीं
था…
इतिहास
था
सुरेश गांधी
वाराणसी. डिजिटल स्क्रीन और रील्स के इस दौर में जब मनोरंजन कुछ सेकंड के फ्रेम में सिमटता जा रहा है, तब काशी की धरती पर एक ऐसा दृश्य साकार हुआ जिसने समय की सीमाओं को तोड़ दिया। 225 कलाकारों का विराट समूह जब सम्राट विक्रमादित्य की गाथा को जीवंत करने मंच पर उतरा, तो पूरा सूर्य सरोवर मैदान तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।
यह केवल एक नाटक नहीं था—यह इतिहास का पुनर्जन्म था, जिसे दर्शकों ने आंखों से नहीं, हृदय से महसूस किया। वाराणसी के बीएलडब्ल्यू स्थित सूर्य सरोवर मैदान में प्रस्तुत “सम्राट विक्रमादित्य” महानाट्य ने यह सिद्ध कर दिया कि भारत की सांस्कृतिक आत्मा आज भी उतनी ही सशक्त है, जितनी हजारों वर्ष पहले थी। जैसे ही मंच पर पहला दृश्य उभरा, दर्शकों की आंखें ठहर गईं।
घोड़ों की टाप, रथों
की गर्जना, युद्ध के दृश्य, राजदरबार
की गरिमा और सम्राट विक्रमादित्य
का तेजस्वी व्यक्तित्व—सब कुछ इतना
जीवंत था कि लोगों
को यकीन ही नहीं
हुआ कि वे किसी
मंचन को देख रहे
हैं। ऐसा प्रतीत हो
रहा था मानो इतिहास
स्वयं वर्तमान में उतर आया
हो।
225 कलाकारों ने रचा जीवंत इतिहास
जब तालियों ने रचा इतिहास का संगीत
रील्स के दौर में ‘रियल भारत
’ का अनुभवआज के समय
में जब मनोरंजन मोबाइल
स्क्रीन तक सीमित हो
गया है, यह आयोजन
एक सशक्त संदेश बनकर उभरा। यह
दिखाता है कि भारत
की वास्तविक शक्ति उसकी परंपराओं, कथाओं
और मूल्यों में निहित है—जो किसी भी
डिजिटल माध्यम से कहीं अधिक
प्रभावशाली हैं। यह मंचन
केवल मनोरंजन नहीं था, बल्कि
एक सांस्कृतिक प्रतिरोध भी था—उस
प्रवृत्ति के खिलाफ, जो
इतिहास को भूलने और
मूल्यों को कमजोर करने
का काम करती है।
विक्रमादित्य: सुशासन का शाश्वत आदर्श
कहते हैं कि
भगवान श्रीराम के बाद यदि
किसी राजा ने सुशासन
की सर्वोत्तम मिसाल प्रस्तुत की, तो वह
सम्राट विक्रमादित्य थे। इस महानाट्य
ने यह स्पष्ट किया
कि— शासन केवल शक्ति
का प्रदर्शन नहीं, बल्कि सेवा का संकल्प
है. न्याय केवल निर्णय नहीं,
बल्कि धर्म का पालन
है और एक राजा
का वास्तविक वैभव उसकी विनम्रता
में होता है. विक्रमादित्य का
चरित्र इस मंचन के
माध्यम से केवल एक
ऐतिहासिक कथा नहीं, बल्कि
एक जीवंत आदर्श बनकर उभरा।
परंपरा, तकनीक और सौंदर्य का अद्भुत संगम
इस प्रस्तुति में
पारंपरिक तत्वों के साथ आधुनिक
तकनीक का शानदार समन्वय
देखने को मिला। पालकी,
रथ, घोड़े, युद्ध दृश्य—इन सबके साथ
एलईडी ग्राफिक्स, लाइटिंग और डिजिटल इफेक्ट्स
ने मंचन को भव्यता
की नई ऊंचाई दी।
हर दृश्य ऐसा प्रतीत हो
रहा था जैसे किसी
महाकाव्य का सजीव चित्रण
हो।
मध्य प्रदेश की झलक, संस्कृति का विस्तार






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