धुरंधर’ फिल्म के सच्चाई से तिलमिलाई सियासत?
माफिया पर शिकंजा, सियासत में सुलगता सवाल! ‘न्याय’ बनाम ‘बदले’ की जंग में किसका सच?
अतीक के काले साम्राज्य के खुलासों के बीच सदन से लेकर सड़क तक में बयानबाजी व तीखी टकराहट देखने को मिल रही है. ऐसे में बड़ा सवाल तो यही है क्या यह कानून की बहस है या वोटबैंक की गणित? मतलब साफ है उत्तर प्रदेश की राजनीति इन दिनों एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां अपराध, कार्रवाई और आरोप, तीनों मिलकर एक विस्फोटक सियासी माहौल बना रहे हैं। उमेश पाल हत्याकांड को लेकर विधानसभा में जो टकराव देखने को मिला, उसने यह साफ कर दिया कि यह मुद्दा अब सिर्फ कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सियासी अस्तित्व की लड़ाई में तब्दील हो चुका है
सुरेश गांधी
उत्तर प्रदेश की राजनीति में
इन दिनों जो कुछ घट
रहा है, वह केवल
सत्ता और विपक्ष के
बीच टकराव नहीं, बल्कि “न्याय बनाम बदले” की
खतरनाक बहस में बदलता
जा रहा है। उमेश
पाल हत्याकांड को लेकर विधानसभा
में उठे सवालों ने
एक बार फिर यह
साबित कर दिया कि
प्रदेश में कानून-व्यवस्था
का मुद्दा जितना गंभीर है, उतना ही
संवेदनशील भी, और दुर्भाग्य
से उतना ही राजनीतिक
भी। अखिलेश यादव ने जिस
आक्रामकता के साथ मुख्यमंत्री
योगी आदित्यनाथ को घेरा, वह
केवल सवाल नहीं था,
वह सीधी चुनौती थी।
आरोप यह कि सरकार
अपराधियों को संरक्षण दे
रही है। जवाब आया
“मिट्टी में मिला देंगे।”
और यहीं से शुरू
हुआ वह शब्दयुद्ध, जिसने
पूरे घटनाक्रम को और ज्यादा
विस्फोटक बना दिया। लेकिन
इसके पीछे छिपे राजनीतिक
संकेतों को नजरअंदाज नहीं
किया जा सकता। सवाल
उठता है कि क्या
यह लड़ाई वास्तव में
न्याय के लिए है,
या फिर उस सियासी
जमीन को बचाने की
कोशिश है, जो माफिया
के खिलाफ सख्त कार्रवाई के
चलते दरकती नजर आ रही
है?
अतीक का अंत और खुलती परतों से बढ़ी बेचैनी
अतीक अहमद का
नाम कभी उत्तर प्रदेश
में अपराध और सत्ता के
गठजोड़ की पहचान बन
चुका था। वर्षों तक
उसका नेटवर्क न केवल सक्रिय
रहा, बल्कि सत्ता के गलियारों तक
उसकी पहुंच की चर्चाएं भी
आम रहीं। लेकिन जब उसके गुनाहों
की परतें एक-एक कर
खुलनी शुरू हुईं, जब
उसके पूरे तंत्र पर
कार्रवाई तेज हुई, तब
सियासत के कुछ चेहरे
अचानक असहज क्यों दिखने
लगे? यह वही दौर
है जब “धुरंधर” जैसी
चर्चित घटनाओं और मामलों के
खुलासों के बाद माफिया
तंत्र पर लगातार शिकंजा
कसता गया। खुलासों के
बाद यह साफ हो
गया कि अब माफिया
के लिए जमीन सिमट
रही है। ऐसे में
अपेक्षा थी कि पूरा
राजनीतिक वर्ग एक स्वर
में अपराध के खिलाफ खड़ा
होगा। लेकिन हुआ इसके उलट,
बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप
का दौर तेज हो
गया। सवाल यह है
कि क्या यह महज
संयोग है? या फिर
माफिया के कमजोर पड़ने
से कुछ सियासी समीकरण
भी हिल गए हैं?
‘बदला’ की भाषा, क्या यही है न्याय का रास्ता?
सबसे ज्यादा चौंकाने
वाली बात तब सामने
आई जब रामगोपाल यादव
जैसे वरिष्ठ नेता की ओर
से “बदला लेने” जैसे
शब्द सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बने।
लोकतंत्र में न्याय की
मांग स्वाभाविक और आवश्यक है,
लेकिन जब यह मांग
“बदले” की भाषा में
ढलने लगे, तो यह
न केवल चिंताजनक है,
बल्कि खतरनाक भी। उन्हें समझना
होगा, क्योंकि इस तरह की
बयानबाजी केवल राजनीतिक नहीं
रहती, बल्कि उसका असर समाज
के ताने-बाने पर
भी पड़ता है। क्या
इस तरह की भाषा
समाज में शांति और
विश्वास पैदा करती है?
या फिर यह एक
ऐसा माहौल बनाती है, जहां कानून
से ज्यादा भावनाएं हावी होने लगती
हैं? यह सवाल केवल
राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक भी है। क्या
यह बयान किसी खास
वर्ग को संदेश देने
की कोशिश है? क्या यह
भावनाओं को भड़काने का
एक सियासी औजार बनता जा
रहा है?
योगी का तेवर, सख्ती या जवाबी राजनीति?
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का
“मिट्टी में मिला देंगे”
वाला बयान भी कम
विवादित नहीं रहा। समर्थकों
के लिए यह माफिया
के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई का संदेश है,
तो विरोधियों के लिए यह
आक्रामक राजनीति का प्रतीक। लेकिन
यह भी सच है
कि जब विपक्ष तीखे
आरोपों के साथ मैदान
में उतरता है, तो सत्ता
पक्ष भी उसी तेवर
में जवाब देता है।
सवाल यह है कि
इस शब्दयुद्ध में असली मुद्दा,
यानी कानून-व्यवस्था, कहीं पीछे तो
नहीं छूट रहा?
वोटबैंक की राजनीति, पुराना पैटर्न, नई रणनीति?
भारतीय राजनीति में वोटबैंक का
गणित कोई नया विषय
नहीं है। लेकिन जब
गंभीर आपराधिक मामलों पर भी बयानबाजी
इस तरह होने लगे
कि उसका सीधा असर
किसी विशेष वर्ग पर पड़े,
तो संदेह होना स्वाभाविक है।
क्या “बदले” की बात करना
और लगातार एक खास नैरेटिव
को हवा देना, दरअसल
एक वर्ग विशेष को
साधने की कोशिश है?
क्या यह वही पुराना
खेल नहीं है, जिसमें
न्याय और कानून जैसे
विषयों को भी चुनावी
रणनीति का हिस्सा बना
दिया जाता है?
सदन की गरिमा पर भी सवाल
विधानसभा जैसे मंच, जहां
नीति और विकास पर
गंभीर चर्चा होनी चाहिए, वहां
इस तरह की तीखी
और कभी-कभी व्यक्तिगत
होती भाषा लोकतांत्रिक मर्यादाओं
को भी चुनौती देती
है। अखिलेश यादव और योगी
आदित्यनाथ, दोनों ही बड़े नेता
हैं, और उनके हर
शब्द का व्यापक असर
होता है। ऐसे में
उनसे अपेक्षा भी अधिक होती
है कि वे बहस
को दिशा दें, न
कि उसे भटकाएं।
न्याय की लड़ाई या सियासी पटकथा?
सबसे अहम सवाल
यही है क्या इस
पूरे घटनाक्रम में कहीं भी
पीड़ितों को न्याय दिलाने
की ठोस चर्चा हो
रही है? क्या कोई
ठोस समाधान, कोई नीति, कोई
सुधार की बात सामने
आ रही है? या
फिर यह पूरा घटनाक्रम
एक ऐसी पटकथा बन
चुका है, जिसमें हर
पक्ष अपनी-अपनी भूमिका
निभा रहा हैकृऔर असली
मुद्दा, यानी न्याय, कहीं
पीछे छूट गया है?
जनता सब देख रही है
उत्तर प्रदेश की जनता अब
पहले से कहीं ज्यादा
जागरूक है। वह समझती
है कि कब मुद्दा
उठाया जा रहा है
और कब उसे राजनीतिक
लाभ के लिए इस्तेमाल
किया जा रहा है।
माफिया के खिलाफ कार्रवाई
होनी चाहिए, सख्ती से और निष्पक्षता
के साथ। विपक्ष को
सवाल उठाने का पूरा अधिकार
है, लेकिन वह सवाल न्याय
की दिशा में होने
चाहिए, न कि “बदले”
की भाषा में। आज
जरूरत इस बात की
है कि राजनीति अपनी
सीमाएं पहचाने। न्याय को हथियार न
बनाए, बल्कि उसे उसका सम्मान
दे। क्योंकि अगर न्याय भी
सियासत के शोर में
दब गया, तो सबसे
बड़ा नुकसान लोकतंत्र का होगा, और
उससे भी बड़ा नुकसान
उस आम नागरिक का,
जो केवल सुरक्षा और
न्याय की उम्मीद करता
है।


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