योग : सभ्यता की सबसे शांत क्रांति
सुबह की पहली किरण जब धरती को छूती है, तब प्रकृति कोई शोर नहीं करती। पक्षियों का कलरव भी धीरे-धीरे शुरू होता है। हवा भी मानो मौन साध लेती है। इसी मौन में एक मनुष्य अपनी आंखें बंद कर बैठता है। बाहर से देखने वाले को लगता है कि वह कुछ नहीं कर रहा, लेकिन भीतर एक पूरा ब्रह्मांड जाग रहा होता है। यही योग है। योग केवल शरीर को मोड़ने की कला नहीं, बल्कि स्वयं को जोड़ने की प्रक्रिया है। यह मांसपेशियों का प्रदर्शन नहीं, बल्कि मन, बुद्धि, प्राण और आत्मा के बीच संवाद है। आधुनिक दुनिया ने योग को फिटनेस का माध्यम माना, जबकि भारतीय मनीषा ने इसे जीवन का विज्ञान कहा। आज जब दुनिया तनाव, अवसाद, अकेलेपन, प्रदूषण, असंतुलित जीवनशैली और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में मानवीय संवेदनाओं के संकट से गुजर रही है, तब योग पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है। इस वर्ष का अंतरराष्ट्रीय योग दिवस भी स्वस्थ और सक्रिय वृद्धावस्था पर विशेष बल देता है, जो बताता है कि योग केवल युवाओं के लिए नहीं, बल्कि हर आयु के लिए जीवन का सहारा है
सुरेश गांधी
तन का संतुलन, मन का अनुशासन और आत्मा
का आलोक—यही है भारत का वह शाश्वत संदेश, जिसे आज पूरी दुनिया योग
के रूप में अपना रही है। "योग"
संस्कृत की 'युज्' धातु
से बना है, जिसका
अर्थ है—जोड़ना। लेकिन
यह जोड़ केवल शरीर
और श्वास का नहीं, बल्कि
मन और विवेक का,
आत्मा और परमात्मा का,
व्यक्ति और समाज का
तथा प्रकृति और सृष्टि का
है। सभ्यताओं का मूल्यांकन केवल
इस आधार पर नहीं
होता कि उन्होंने कितने
नगर बसाए, कितने साम्राज्य खड़े किए या
कितने युद्ध जीते। किसी भी सभ्यता
की वास्तविक पहचान इस बात से
होती है कि उसने
मानवता को जीने की
कौन-सी दृष्टि दी।
मिस्र ने पिरामिड दिए,
यूनान ने दर्शन दिया,
रोम ने शासन व्यवस्था
दी, आधुनिक पश्चिम ने विज्ञान और
प्रौद्योगिकी का विस्तार किया;
किंतु भारत ने विश्व
को जो सबसे अमूल्य
उपहार दिया, वह है—योग।
योग केवल एक पद्धति
नहीं, बल्कि भारतीय चिंतन की वह कालजयी
धारा है, जो हजारों
वर्षों से मानव जीवन
को संतुलन, संयम और समरसता
का संदेश देती आई है।
यह संयोग नहीं कि आज
जब पूरी दुनिया तनाव,
अवसाद, अकेलेपन, उपभोक्तावाद और कृत्रिम बुद्धिमत्ता
के युग में मानवीय
संवेदनाओं के संकट से
जूझ रही है, तब
उसकी दृष्टि फिर भारत की
ओर उठी है। कारण
स्पष्ट है—दुनिया को
तकनीक मिल गई, पर
शांति नहीं; साधन मिल गए,
पर संतोष नहीं; गति मिल गई,
पर दिशा नहीं। योग
इसी दिशा का नाम
है।
योग की सबसे बड़ी शक्ति—यह मनुष्य को मनुष्य बनाता है
दुनिया ने विज्ञान से
मशीनें बनाईं, भारत ने योग
से इंसान बनाए। विज्ञान ने गति दी,
योग ने दिशा दी।
विज्ञान ने सुविधाएं बढ़ाईं,
योग ने संतोष सिखाया।
आज हमारे पास सब कुछ
है, लेकिन चैन नहीं। घर
बड़े हैं, परिवार छोटे
हैं। मोबाइल स्मार्ट हैं, लेकिन रिश्ते
कमजोर हैं। सूचनाएं अनगिनत
हैं, पर आत्मबोध दुर्लभ
है। ऐसे समय में
योग हमें याद दिलाता
है कि सबसे बड़ी
यात्रा बाहर नहीं, भीतर
की होती है।
'युज्' से योग तक—एक शब्द में समाया संपूर्ण दर्शन
संस्कृत की 'युज्' धातु
से बना "योग" शब्द अपने भीतर
भारतीय दर्शन की संपूर्ण यात्रा
समेटे हुए है। इसका
सामान्य अर्थ है—जोड़ना।
किंतु यह जोड़ बाहरी
नहीं, भीतरी है। यह मनुष्य
को उसके मूल स्वरूप
से जोड़ने की साधना है।
भारतीय मनीषियों ने बहुत पहले
समझ लिया था कि
मनुष्य का सबसे बड़ा
संघर्ष बाहर नहीं, भीतर
है। युद्ध सीमाओं पर कम, मन
के भीतर अधिक लड़े
जाते हैं। इसलिए उन्होंने
अस्त्रों से पहले आत्मा
को साधने का मार्ग खोजा।
यही योग है। उपनिषदों
ने कहा कि आत्मा
नित्य, शुद्ध और अविनाशी है,
किंतु मनुष्य अपनी इच्छाओं, मोह,
अहंकार और विषय-वासनाओं
में उलझकर अपने वास्तविक स्वरूप
को भूल जाता है।
योग उसी विस्मृत सत्य
का पुनर्स्मरण है।
ऋग्वेद से पतंजलि तक—योग की हजारों वर्ष पुरानी यात्रा
योग का इतिहास
किसी एक व्यक्ति से
प्रारंभ नहीं होता। इसके
बीज वैदिक साहित्य में दिखाई देते
हैं। ऋषियों ने ध्यान, तप,
प्राण और आत्मचिंतन के
माध्यम से उस चेतना
का अनुभव किया, जिसे बाद में
योग का स्वरूप मिला।
महर्षि पतंजलि ने इस बिखरे
हुए ज्ञान को व्यवस्थित कर
योगसूत्र की रचना की।
केवल 195 सूत्रों में उन्होंने मानव
मन का जितना गहरा
विश्लेषण किया, वह आज भी
मनोविज्ञान के लिए आश्चर्य
का विषय है। उनका
पहला और सबसे प्रसिद्ध
सूत्र है— "योगश्चित्तवृत्ति निरोधः।" अर्थात् चित्त की चंचल वृत्तियों
का निरोध ही योग है।
यही योग का वास्तविक
स्वरूप है। आश्चर्य की
बात यह है कि
आज जिसे योग समझ
लिया गया है—विभिन्न
आसन और शारीरिक मुद्राएँ—पतंजलि ने उन्हें योग
का अंतिम उद्देश्य कभी नहीं माना।
उनके लिए आसन तो
योग की यात्रा का
केवल एक सोपान था।
योग केवल आसन नहीं, आचरण भी है
अक्सर लोग योग को
केवल प्राणायाम और आसनों तक
सीमित कर देते हैं,
जबकि महर्षि पतंजलि ने योग के
आठ अंग बताए—यम,
नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार,
धारणा, ध्यान और समाधि। यदि
कोई व्यक्ति प्रतिदिन एक घंटा योग
करे लेकिन पूरे दिन क्रोध,
छल, अहंकार और हिंसा में
डूबा रहे, तो वह
योग का वास्तविक साधक
नहीं हो सकता। योग
का पहला पाठ शरीर
नहीं, चरित्र है।
भारत ने दुनिया को सबसे शांत क्रांति दी
इतिहास गवाह है कि
अधिकांश सभ्यताओं ने दुनिया को
हथियार दिए, साम्राज्य दिए,
युद्ध दिए। भारत ने
दुनिया को बुद्ध दिए,
आयुर्वेद दिया, ध्यान दिया और योग
दिया। संयुक्त राष्ट्र द्वारा 21 जून को अंतरराष्ट्रीय
योग दिवस घोषित किया
जाना केवल भारत की
सांस्कृतिक उपलब्धि नहीं, बल्कि यह स्वीकार करना
था कि मानवता के
भविष्य के लिए योग
आवश्यक है। आज 190 से
अधिक देशों में करोड़ों लोग
योग से जुड़ चुके
हैं।
डिजिटल युग का सबसे बड़ा उपचार
आज की सबसे
बड़ी बीमारी केवल मधुमेह या
उच्च रक्तचाप नहीं है। सबसे
बड़ी बीमारी है—'ध्यान का
बिखर जाना'। हर
कुछ मिनट में मोबाइल
देखना, लगातार सूचनाओं की बौछार, तुलना
की संस्कृति, सोशल मीडिया का
दबाव—इन सबने मनुष्य
की एकाग्रता को कमजोर किया
है। योग हमें फिर
से वर्तमान में लौटना सिखाता
है। जब हम श्वास
पर ध्यान देते हैं, तब
हम स्वयं से जुड़ते हैं।
यही जुड़ाव मानसिक स्वास्थ्य का पहला कदम
है।
योग और पर्यावरण—दोनों का रिश्ता सांसों का है
पेड़ ऑक्सीजन देते
हैं, योग उसे सही
ढंग से ग्रहण करना
सिखाता है। नदियां शरीर
को जल देती हैं,
योग मन को निर्मल
करता है। यदि प्रकृति
बाहर का संतुलन है,
तो योग भीतर का
संतुलन है। इसलिए योग
केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य का विषय नहीं,
बल्कि पर्यावरणीय चेतना का भी आधार
है।
योग और भारतीय परिवार
यदि किसी घर
में दिन की शुरुआत
पांच मिनट के सामूहिक
योग और ध्यान से
होने लगे, तो वहां
तनाव कम होगा, संवाद
बढ़ेगा और पीढ़ियों के
बीच दूरी घटेगी। योग
परिवारों को केवल स्वस्थ
नहीं बनाता, बल्कि उन्हें जोड़ता भी है।
स्वस्थ वृद्धावस्था की नई राह
दुनिया तेजी से वृद्ध
होती आबादी की चुनौती का
सामना कर रही है।
योग शरीर की लचक
बनाए रखने, संतुलन सुधारने, मानसिक सक्रियता बढ़ाने और जीवन की
गुणवत्ता को बेहतर बनाने
का एक सरल और
सुलभ माध्यम माना जा रहा
है। यही कारण है
कि इस वर्ष योग
दिवस का केंद्रीय संदेश
भी स्वस्थ वृद्धावस्था पर केंद्रित है।
बाजार बनाम योग
आज योग भी
बाजार का हिस्सा बन
गया है। महंगे मैट,
ब्रांडेड कपड़े, प्रीमियम स्टूडियो और सोशल मीडिया
पर आकर्षक तस्वीरें—इन सबके बीच
योग का मूल दर्शन
कहीं पीछे छूटता दिखता
है। सच यह है
कि योग को किसी
महंगे उपकरण की आवश्यकता नहीं।
एक शांत मन, खुला
आकाश और नियमित अभ्यास—यही योग की
सबसे बड़ी पूंजी है।
योग का अगला अध्याय
अब समय केवल
योग दिवस मनाने का
नहीं, बल्कि योगमय जीवन जीने का
है। यदि योग केवल
21 जून तक सीमित रहा
तो उसका उद्देश्य अधूरा
रह जाएगा। योग तब सफल
होगा जब— विद्यालयों में
अंक से पहले मानसिक
स्वास्थ्य पर चर्चा होगी।
कार्यालयों में तनाव प्रबंधन
का साधन बनेगा। गांवों
में बुजुर्गों के लिए योग
केंद्र होंगे। बच्चे स्क्रीन से पहले सूर्य
नमस्कार सीखेंगे। परिवार दिन की शुरुआत
सामूहिक प्राणायाम से करेंगे।
योग—भारत की आत्मा का वैश्विक परिचय
योग हमें यह नहीं सिखाता कि दुनिया को कैसे बदलें। योग पहले यह सिखाता है कि स्वयं को कैसे बदलें। और इतिहास गवाह है—जब-जब मनुष्य ने स्वयं को बदला है, तब-तब समाज भी बदला है। 21 जून का यह दिन केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं, बल्कि एक निमंत्रण है—अपने भीतर लौटने का, अपनी सांसों को पहचानने का और उस भारतीय ज्ञान परंपरा को फिर से अपनाने का, जिसने हजारों वर्षों पहले कह दिया था— "जिस दिन मनुष्य स्वयं से जुड़ जाएगा, उसी दिन संसार से उसका संघर्ष समाप्त हो जाएगा।" यही योग है। यही भारत की सबसे बड़ी सांस्कृतिक धरोहर है। और शायद यही भविष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता भी।


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