योग : आत्मा की जागृति, स्वयं से साक्षात्कार और सभ्यता की सबसे बड़ी साधना
योग केवल व्यायाम नहीं है; यह मनुष्य और उसके अस्तित्व के बीच खोए हुए संवाद की पुनर्स्थापना है। इस वर्ष योग दिवस का संदेश केवल निरोग रहने का नहीं, बल्कि गरिमापूर्ण, सक्रिय और आत्मनिर्भर वृद्धावस्था का है। सरकार का मानना है कि यदि योग जीवनचर्या का हिस्सा बन जाए, तो बढ़ती उम्र भी बोझ नहीं, बल्कि अनुभव और ऊर्जा का उत्सव बन सकती है। मनुष्य ने विज्ञान के सहारे आकाश की ऊँचाइयों को माप लिया, समुद्र की गहराइयों तक पहुँच गया और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से भविष्य की नई इबारत लिखनी शुरू कर दी। किंतु जितना वह बाहर की दुनिया को जीतता गया, उतना ही अपने भीतर की शांति से दूर होता चला गया। तनाव, अवसाद, असंतुलित जीवनशैली, सामाजिक विखंडन और आत्मिक रिक्तता आज वैश्विक चुनौती बन चुके हैं। ऐसे दौर में भारत की प्राचीन ऋषि-परंपरा से निकला योग केवल स्वास्थ्य का साधन नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित करने वाला सार्वकालिक दर्शन बनकर विश्व के सामने खड़ा है। योग शरीर को सुदृढ़ करने की प्रक्रिया भर नहीं, बल्कि विचार, व्यवहार, चरित्र और चेतना को परिष्कृत करने की साधना है। यह मनुष्य को प्रकृति से, परिवार को संस्कारों से, समाज को समरसता से और आत्मा को उसके मूल स्वरूप से जोड़ने का मार्ग प्रशस्त करता है। यही कारण है कि आज योग किसी देश, धर्म या संस्कृति की सीमाओं में बंधा विषय नहीं रहा, बल्कि संपूर्ण मानवता की साझा धरोहर बन चुका है। भारत ने विश्व को युद्ध की नहीं, बुद्ध की; प्रतिस्पर्धा की नहीं, संतुलन की; उपभोग की नहीं, संयम की संस्कृति दी है। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस इसी सांस्कृतिक चेतना का वैश्विक उत्सव है। यह केवल एक तिथि नहीं, बल्कि स्वयं से साक्षात्कार का अवसर है—एक ऐसा निमंत्रण, जो मनुष्य को याद दिलाता है कि सभ्यता की सबसे बड़ी उपलब्धि बाहर की विजय नहीं, बल्कि अपने अंतर्मन पर प्राप्त किया गया नियंत्रण है
सुरेश गांधी
सभ्यताओं का मूल्यांकन केवल
इस आधार पर नहीं
होता कि उन्होंने कितने
नगर बसाए, कितने साम्राज्य स्थापित किए या कितनी
वैज्ञानिक उपलब्धियाँ अर्जित कीं। किसी भी
सभ्यता की वास्तविक ऊँचाई
इस बात से मापी
जाती है कि उसने
मानवता को जीने की
कौन-सी कला दी।
भारत की हजारों वर्षों
पुरानी सांस्कृतिक यात्रा ने विश्व को
अनेक अमूल्य उपहार दिए—वेद, उपनिषद,
आयुर्वेद, शून्य, ध्यान और इन्हीं में
सबसे जीवंत, सबसे सार्वकालिक और
सबसे मानवीय उपहार है—योग। 21 जून
को विश्व के करोड़ों लोग
जब योग दिवस मनाते
हैं, तब यह केवल
एक अंतरराष्ट्रीय आयोजन नहीं होता। यह
उस भारतीय चिंतन का वैश्विक अभिनंदन
होता है जिसने सदियों
पहले उद्घोष किया था कि
मनुष्य की सबसे बड़ी
विजय संसार पर नहीं, स्वयं
पर होती है। आज
जब मनुष्य चाँद और मंगल
तक पहुँच चुका है, कृत्रिम
बुद्धिमत्ता नई-नई संभावनाओं
के द्वार खोल रही है,
विज्ञान ने जीवन को
अभूतपूर्व सुविधाएँ दी हैं, तब
भी यदि कोई प्रश्न
सबसे अधिक बेचैन करता
है तो वह है—क्या मनुष्य सचमुच
भीतर से शांत है?
विडंबना यह है कि
आज मनुष्य के पास साधन
अधिक हैं, लेकिन साधना
कम; सम्पर्क अधिक हैं, लेकिन
संबंध कम; सूचनाएँ अधिक
हैं, लेकिन आत्मबोध कम। इसी विखंडित
समय में योग केवल
एक अभ्यास नहीं, बल्कि जीवन का पुनर्संतुलन
बनकर सामने आता है। "योग"—यह केवल एक
शब्द नहीं, बल्कि भारतीय दर्शन का वह बीज
है जिसमें सम्पूर्ण जीवन-दृष्टि समाई
हुई है। संस्कृत की
धातु "युज्" से निकले इस
शब्द का अर्थ है—जोड़ना। लेकिन यह जोड़ केवल
शरीर और श्वास का
नहीं, बल्कि मन और आत्मा
का, व्यक्ति और प्रकृति का,
मानव और परम चेतना
का है। यही कारण
है कि भारतीय मनीषा
ने योग को कभी
व्यायाम नहीं माना; उसने
इसे जीवन जीने की
सर्वोच्च कला कहा। आज
जब मनुष्य कृत्रिम बुद्धिमत्ता की
ऊँचाइयों को छू रहा
है, तब विडंबना यह
है कि वह अपने
ही भीतर से कटता
जा रहा है। तकनीक
ने संसार को निकट ला
दिया, लेकिन मनुष्य अपने आप से
दूर होता चला गया।
ऐसे संक्रमणकाल में यदि कोई
जीवन-दर्शन सबसे अधिक प्रासंगिक
होकर सामने आया है, तो
वह योग ही है।
विश्व के लगभग प्रत्येक
देश में आज योग
का अभ्यास हो रहा है।
संयुक्त राष्ट्र द्वारा 21 जून को अंतरराष्ट्रीय
योग दिवस घोषित किया
जाना केवल एक तिथि
का चयन नहीं था,
बल्कि भारत की हजारों
वर्षों पुरानी ऋषि-परंपरा के
प्रति वैश्विक सम्मान का उद्घोष था।
यह उस सभ्यता की
स्वीकारोक्ति थी जिसने दुनिया
को विजय का नहीं,
विवेक का मार्ग दिखाया।
योग—जिसे समझने में दुनिया को सदियाँ लगीं
योग का शाब्दिक
अर्थ है—जोड़ना। लेकिन
यह जोड़ केवल शरीर
और श्वास का नहीं है।
यह मन और विवेक
का, प्रकृति और पुरुष का,
व्यक्ति और समाज का,
आत्मा और परमात्मा का
मिलन है। भारतीय दर्शन
ने कभी योग को
केवल शारीरिक क्रिया नहीं माना। महर्षि
पतंजलि ने जब योगसूत्र
की रचना की, तब
उन्होंने शरीर से पहले
मन को साधने की
बात कही। उन्होंने स्पष्ट
किया कि योग का
उद्देश्य शरीर को आकर्षक
बनाना नहीं, बल्कि चित्त को स्थिर करना
है।\ आज योग की
तस्वीरें सोशल मीडिया पर
दिखाई देती हैं—कठिन
आसन, पर्वतों की चोटियों पर
ध्यान, समुद्र किनारे सूर्य नमस्कार। लेकिन योग की वास्तविक
तस्वीर कहीं अधिक सरल
है—एक शांत मन,
संयमित जीवन और करुणा
से भरा व्यवहार। यदि
योग केवल शरीर की
लचक होता, तो सर्कस का
कलाकार सबसे बड़ा योगी
होता। योग का वास्तविक
अर्थ है—चरित्र की
दृढ़ता, विचारों की निर्मलता और
जीवन की संतुलित गति।
समय का सबसे बड़ा संकट शरीर नहीं, मन है
इक्कीसवीं सदी को यदि
किसी एक बीमारी ने
सबसे अधिक प्रभावित किया
है तो वह केवल
मधुमेह, रक्तचाप या हृदय रोग
नहीं हैं। सबसे बड़ा
संकट है—मानसिक अशांति।
प्रतिस्पर्धा, प्रदर्शन, डिजिटल व्यस्तता, अकेलापन, अवसाद, अनिद्रा और निरंतर तुलना
ने मनुष्य के भीतर एक
ऐसा शोर पैदा कर
दिया है, जिसमें वह
स्वयं की आवाज़ ही
नहीं सुन पा रहा।
योग इसी शोर के
बीच मौन का संगीत
है। जब मनुष्य अपनी
श्वास को सुनना सीखता
है, तभी वह अपने
भीतर के व्यक्ति से
परिचित होता है। योग
हमें बाहर की दुनिया
से भागना नहीं सिखाता, बल्कि
भीतर इतनी शक्ति देता
है कि हम दुनिया
का सामना संतुलन के साथ कर
सकें।
भारत ने विश्व को शक्ति नहीं, शांति का मार्ग दिया
इतिहास में अनेक राष्ट्र
अपनी सैन्य शक्ति के कारण प्रसिद्ध
हुए। किसी ने तलवार
दी, किसी ने बारूद,
किसी ने औद्योगिक क्रांति।
भारत ने संसार को
वह दिया जिसकी आवश्यकता
हर युग में बनी
रही—आत्मिक शांति। यही कारण है
कि आज विश्व के
लगभग हर महाद्वीप में
योग केवल भारतीय संस्कृति
का प्रतीक नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवनशैली का आधार बन
चुका है। यह भारत
की उस सांस्कृतिक विजय
का उदाहरण है जिसमें किसी
पर अधिकार नहीं किया गया,
बल्कि विश्वास अर्जित किया गया। योग
भारत की सॉफ्ट पावर
नहीं, बल्कि उसकी आध्यात्मिक शक्ति
का प्रमाण है।
योग और प्रकृति—दोनों एक ही सत्य के दो रूप
योग हमें सिखाता
है कि मनुष्य प्रकृति
से अलग नहीं है।
जिस प्रकार नदी अपने प्रवाह
में सुंदर है, वृक्ष अपनी
जड़ों से जुड़े रहने
में जीवित हैं और आकाश
अपनी विशालता में पूर्ण है,
उसी प्रकार मनुष्य भी तभी संतुलित
रह सकता है जब
वह अपनी मूल चेतना
से जुड़ा रहे। आज पर्यावरण
संकट केवल जंगलों के
कटने का संकट नहीं
है। यह मनुष्य और
प्रकृति के बीच टूटते
संबंधों का संकट भी
है। योग उस संबंध को
पुनः स्थापित करता है। जो
व्यक्ति अपनी श्वास का
सम्मान करता है, वह
वायु को प्रदूषित करने
से पहले अवश्य सोचता
है।
बाजार के युग में योग का मौन प्रतिरोध
आज योग भी
उपभोक्तावाद के घेरे में
है। महंगे योग स्टूडियो, ब्रांडेड
परिधान, आकर्षक विज्ञापन और सोशल मीडिया
की चमक ने कई
बार योग को उसके
मूल स्वरूप से दूर कर
दिया है। किन्तु भारत
का योग कभी बाजार
का विषय नहीं रहा।
ऋषियों ने न तो
वातानुकूलित कक्षों में योग किया
और न ही किसी
प्रदर्शन के लिए। योग
का सबसे बड़ा विद्यालय
प्रकृति रही, सबसे बड़ा
गुरु अनुशासन और सबसे बड़ी
प्रयोगशाला स्वयं मनुष्य का अंतर्मन।
योग दिवस नहीं, योगमय जीवन की आवश्यकता
यदि वर्ष में
केवल एक दिन योग
कर लेने से जीवन
बदल सकता, तो दुनिया की
सारी समस्याएँ समाप्त हो चुकी होतीं।
योग दिवस का वास्तविक
उद्देश्य किसी रिकॉर्ड का
निर्माण नहीं, बल्कि जीवन में नियमितता
का संस्कार स्थापित करना है। योग
तब सार्थक होगा जब विद्यालयों
में बच्चों को प्रतियोगिता से
पहले संतुलन सिखाया जाएगा। जब कार्यालयों में
उत्पादकता के साथ मानसिक
स्वास्थ्य की भी चर्चा
होगी। जब परिवार दिन
की शुरुआत मोबाइल की स्क्रीन से
नहीं, बल्कि कुछ क्षणों के
मौन से करेंगे। जब वृद्धावस्था
को बोझ नहीं, गरिमा
के साथ जीने की
कला योग के माध्यम
से मिलेगी।
भारत की भविष्य-दृष्टि
आज विश्व जिस
"वेलनेस" की बात कर
रहा है, भारत उसे
हजारों वर्षों से "स्वस्थ जीवन" के रूप में
जीता आया है। योग
का अर्थ केवल रोगों
से मुक्ति नहीं, बल्कि जीवन को उसकी
सम्पूर्णता में स्वीकार करना
है। भारत यदि इक्कीसवीं
सदी में विश्वगुरु बनने
का स्वप्न देखता है, तो उसकी
सबसे बड़ी शक्ति उसके
हथियार नहीं, उसकी सांस्कृतिक विरासत
होगी। योग उसी विरासत
का सबसे जीवंत अध्याय
है। योग हमें यह
नहीं सिखाता कि जीवन में
संघर्ष नहीं होंगे। वह
यह सिखाता है कि संघर्षों
के बीच भी मनुष्य
कैसे संतुलित रह सकता है।
वह हमें यह नहीं
बताता कि संसार बदल
जाएगा। वह यह विश्वास
देता है कि यदि
मनुष्य स्वयं बदल जाए, तो
संसार बदलने की दिशा स्वतः
बन जाती है। शायद
इसी कारण भारत की
ऋषि-परंपरा ने कभी योग
को केवल आसनों तक
सीमित नहीं किया। उन्होंने
इसे जीवन की ऐसी
साधना माना, जिसमें मनुष्य अपने भीतर की
अशांति को पराजित कर,
आत्मबोध के प्रकाश तक
पहुँच सके। 21 जून का योग
दिवस इसलिए केवल एक उत्सव
नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का अवसर है।
यह हमें याद दिलाता
है कि मनुष्य की
सबसे लंबी यात्रा पृथ्वी
से आकाश तक नहीं,
बल्कि स्वयं से स्वयं तक
की होती है—और
उस यात्रा का सबसे विश्वसनीय
पथ है—योग। प्रधानमंत्री
की थीम और पतंजलि
के योग को एक
सूत्र में पिरोना होगा।
महिला योगी तो परिवार निरोगी
इस वर्ष प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी ने योग
दिवस को केवल स्वास्थ्य
अभियान तक सीमित नहीं
रखा। उन्होंने इसे "महिला योगी तो परिवार
निरोगी" के भाव से
जोड़ते हुए महिला सशक्तीकरण
का भी संदेश दिया।
यह केवल एक नारा
नहीं, बल्कि भारतीय परिवार व्यवस्था का गहन सामाजिक
दर्शन है। भारतीय संस्कृति
में स्त्री केवल परिवार की
सदस्य नहीं, बल्कि उसकी जीवन-ऊर्जा
मानी गई है। यदि
घर की महिला शारीरिक
और मानसिक रूप से स्वस्थ
है, तो उसका प्रभाव
पूरे परिवार पर पड़ता है।
वह बच्चों के संस्कारों की
पहली पाठशाला है, परिवार की
संवेदनाओं की धुरी है
और सामाजिक संतुलन की आधारशिला भी।
योग इसलिए केवल व्यक्ति को
नहीं, पूरे परिवार को
निरोग बनाने की साधना है।
योग दिवस नहीं, जीवन-दिवस
21 जून वर्ष का
सबसे लंबा दिन माना
जाता है। प्रतीकात्मक रूप
से यह केवल सूर्य
के अधिक समय तक
आकाश में रहने का
दिन नहीं, बल्कि मनुष्य के जीवन को
दीर्घ, संतुलित और सार्थक बनाने
का संदेश भी है। इसीलिए
योग दिवस का वास्तविक
उद्देश्य एक दिन सामूहिक
आसन करना नहीं, बल्कि
जीवन भर योगमय रहना
है। हमारे यहां कहा गया—
"योग भगाए रोग, तन
चंगा, मन गंगा। रोज
करो अभ्यास, नकारात्मकता न फटके पास।"
यह केवल तुकबंदी नहीं,
बल्कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और भारतीय अनुभव
दोनों का साझा निष्कर्ष
है।
योग : जहाँ विज्ञान और अध्यात्म मिलते हैं
आज चिकित्सा विज्ञान
भी स्वीकार करता है कि
नियमित योग तनाव कम
करता है, प्रतिरक्षा प्रणाली
को मजबूत बनाता है, हृदय, फेफड़ों
और तंत्रिका तंत्र को स्वस्थ रखता
है। लेकिन भारतीय दर्शन इससे भी आगे
जाकर कहता है कि
योग केवल रोगों से
मुक्ति नहीं, बल्कि भोग से योग
की यात्रा है। महर्षि पतंजलि ने योग की
परिभाषा देते हुए कहा—
"योगश्चित्तवृत्ति
निरोधः।" अर्थात् चित्त की चंचल वृत्तियों
का निरोध ही योग है।
यही योग का सबसे
बड़ा वैज्ञानिक पक्ष भी है।
शरीर की प्रत्येक क्रिया
का नियंत्रण अंततः मन के माध्यम
से होता है। यदि
मन स्थिर है, तो जीवन
संतुलित है। यदि मन
विचलित है, तो बाहरी
उपलब्धियाँ भी सुख नहीं
दे सकतीं।
योग का अर्थ केवल आसन नहीं
आज योग को
प्रायः कठिन आसनों और
शारीरिक लचीलेपन तक सीमित कर
दिया गया है। जबकि
पतंजलि के योगसूत्र में
किसी विशेष आसन का नाम
तक नहीं मिलता। उन्होंने
केवल इतना कहा— "स्थिरसुखमासनम्।"
अर्थात् जो आसन स्थिर
और सुखपूर्वक किया जा सके,
वही श्रेष्ठ है। योग का वास्तविक स्वरूप
यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार,
धारणा, ध्यान और समाधि—इन
आठ सोपानों से निर्मित होता
है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह केवल
नैतिक उपदेश नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य के आधार हैं।
योग भारत की सबसे बड़ी सांस्कृतिक कूटनीति
यदि भारत ने
विश्व को शून्य दिया,
तो योग ने जीवन
को पूर्णता दी। यदि विज्ञान
ने मनुष्य को गति दी,
तो योग ने उसे
दिशा दी। यदि आधुनिकता
ने सुविधाएँ दीं, तो योग
ने संतुलन दिया। आज जब विश्व
अशांति, तनाव, जलवायु संकट और मानसिक
अवसाद से जूझ रहा
है, तब योग भारत
का वह कालजयी संदेश
है, जो केवल रोगमुक्त
शरीर नहीं, बल्कि संतुलित मन, संवेदनशील समाज
और शांत विश्व का
स्वप्न प्रस्तुत करता है। योग
अंततः शरीर को मोड़ने
की कला नहीं, बल्कि
जीवन को सही दिशा
में मोड़ने की साधना है।





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