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Thursday, 8 October 2026

शक्ति की उपासना से समाज में शक्ति का संचार

शक्ति की उपासना से समाज में शक्ति का संचार 

महिषासुर के वध से नारी सम्मान तक, नवरात्र का संदेश केवल पूजा नहीं, अन्याय के विरुद्ध खड़े होने और भीतर की बुराइयों को परास्त करने का संकल्प भी है। शारदीय नवरात्र केवल नौ रातों की उपासना नहीं, मनुष्य के भीतर सोई शक्ति को जगाने का पर्व है। मां दुर्गा के नौ रूप हमें याद दिलाते हैं कि साहस, करुणा, धैर्य और विवेक के बिना न व्यक्ति संपूर्ण बनता है, न समाज। महिषासुर का वध इसी शाश्वत संघर्ष का प्रतीक है—सत्य और असत्य, न्याय और अन्याय तथा आत्मबल और अहंकार के बीच। लेकिन देवी की आराधना का अर्थ केवल मंदिरों में शीश झुकाना नहीं। उसका असली अर्थ उस स्त्री का सम्मान करना भी है, जिसकी स्वतंत्रता आज भी रूढ़ियों, भेदभाव और हिंसा से चुनौती पाती है। कन्या पूजन तभी सार्थक होगा, जब बेटियों को सुरक्षा, शिक्षा, अवसर और निर्णय लेने की स्वतंत्रता मिले। नवरात्र हमें अपने भीतर झांकने का अवसर भी देता है। क्रोध, लोभ, छल, अहंकार और दूसरों के प्रति उपेक्षा—यही वे असुर हैं, जिन्हें परास्त किए बिना विजय अधूरी है। भूखे को भोजन, निराश को सहारा और पीड़ित को न्याय देना भी शक्ति की साधना है। मां दुर्गा की सच्ची आराधना वही है, जिसमें माथा श्रद्धा से झुके, मन करुणा से भरे और अन्याय के सामने आत्मसम्मान कभी न झुके 

सुरेश गांधी

शरद ऋतु की आहट के साथ जब वातावरण में भक्ति के स्वर घुलने लगते हैं, मंदिरों में घंटे-घड़ियाल गूंजते हैं और घरों में मां दुर्गा के स्वागत की तैयारियां होने लगती हैं, तब शारदीय नवरात्र केवल एक धार्मिक पर्व बनकर नहीं आता। वह मनुष्य को अपने भीतर झांकने, अपनी कमजोरियों को पहचानने और जीवन को नए संकल्पों से जोड़ने का अवसर भी देता है। मां दुर्गा के नौ रूपों की आराधना वस्तुतः उस शक्ति की साधना है, जो भय के सामने साहस, अन्याय के सामने प्रतिरोध और निराशा के बीच आशा बनकर खड़ी होती है। प्रश्न यह है कि मां दुर्गा की पूजा का वास्तविक अर्थ क्या केवल मंत्रोच्चार, अनुष्ठान और दीपों की रोशनी तक सीमित है, या उसका कोई गहरा सामाजिक और मानवीय संदेश भी है? यदि देवी को शक्ति, ज्ञान, करुणा और न्याय का स्वरूप माना जाता है, तो उनकी आराधना का प्रभाव हमारे विचारों, व्यवहार और सामाजिक जीवन में भी दिखाई देना चाहिए। आस्था की सार्थकता तभी है, जब वह मनुष्य को भीतर से बेहतर बनाए और समाज को अधिक संवेदनशील तथा न्यायपूर्ण बनाने की प्रेरणा दे।

महिषासुर की कथा, अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का प्रतीक

देवी दुर्गा और महिषासुर की कथा भारतीय धार्मिक परंपरा की अत्यंत महत्वपूर्ण गाथाओं में से एक है। पौराणिक आख्यान के अनुसार, महिषासुर के अत्याचारों से त्रस्त देवताओं की शक्तियां एकत्र हुईं और उनसे देवी दुर्गा का प्राकट्य हुआ। देवी ने महिषासुर का वध कर संसार को उसके आतंक से मुक्त कराया। इस कथा का धार्मिक महत्व अपनी जगह है, लेकिन इसके भीतर छिपा प्रतीकात्मक संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है। महिषासुर केवल एक पौराणिक पात्र नहीं, बल्कि उस प्रवृत्ति का प्रतीक भी माना जा सकता है, जो शक्ति पाकर निरंकुश हो जाती है। जब सामर्थ्य सेवा के बजाय शोषण का साधन बन जाए, जब अधिकार दूसरों को दबाने लगें और जब अहंकार विवेक को पराजित कर दे, तब समाज में महिषासुरी प्रवृत्तियां जन्म लेने लगती हैं। इनके विरुद्ध संघर्ष के लिए केवल व्यक्तिगत साहस पर्याप्त नहीं होता; सामूहिक चेतना, दृढ़ संकल्प और न्याय के प्रति प्रतिबद्धता भी आवश्यक होती है। देवी दुर्गा की कथा यही प्रेरणा देती है कि अन्याय कितना भी शक्तिशाली क्यों न दिखाई दे, उसके सामने विवेक और साहस के साथ खड़ा होना जरूरी है। मौन कभी-कभी विवशता हो सकता है, लेकिन अन्याय को स्थायी व्यवस्था बनने देना समाज की आत्मा को कमजोर करता है। शक्ति का वास्तविक अर्थ किसी को भयभीत करना नहीं, बल्कि निर्बल को निर्भय बनाना है।

नारी शक्ति : श्रद्धा से आगे सम्मान का प्रश्न

भारतीय परंपरा में स्त्री को शक्ति का स्वरूप माना गया है। दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती के रूपों में सृजन, समृद्धि, ज्ञान और सामर्थ्य की प्रतिष्ठा की गई है। देवी की अवधारणा यह बताती है कि स्त्री केवल परिवार की धुरी नहीं, बल्कि समाज के निर्माण और विकास की महत्वपूर्ण शक्ति भी है। इसके बावजूद जब किसी स्त्री को उसके अधिकारों से वंचित किया जाता है, उसकी प्रतिभा को सीमित किया जाता है या उसकी स्वतंत्रता पर अनुचित पहरे लगाए जाते हैं, तब आस्था और व्यवहार के बीच एक गहरी दूरी दिखाई देती है। नारी सम्मान का अर्थ केवल स्त्री के प्रति सद्भाव जताना नहीं, बल्कि उसे समान मनुष्य के रूप में स्वीकार करना है। उसकी शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, आर्थिक आत्मनिर्भरता और निर्णय लेने की स्वतंत्रता को महत्व देना ही वास्तविक सम्मान है। समाज की प्रगति का आकलन इस आधार पर भी होना चाहिए कि वहां महिलाएं कितनी सुरक्षित हैं, उन्हें कितने अवसर मिलते हैं और उनके विचारों को कितनी गंभीरता से सुना जाता है। मां दुर्गा की आराधना हमें इस विरोधाभास पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है। जिस समाज में स्त्री को देवी कहकर सम्मानित किया जाता है, वहां उसके साथ भेदभाव या हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए। श्रद्धा का सबसे सुंदर रूप वह है, जो मनुष्य के व्यवहार में उतरकर दूसरे के सम्मान और अधिकारों की रक्षा करे। नारी शक्ति का अर्थ केवल असाधारण परिस्थितियों में साहस दिखाना भी नहीं है। रोजमर्रा के जीवन में शिक्षा प्राप्त करने, अपने पैरों पर खड़े होने, परिवार और समाज में अपनी बात रखने तथा कठिन परिस्थितियों में निर्णय लेने की क्षमता भी शक्ति का ही रूप है। जब स्त्री को आगे बढ़ने के समान अवसर मिलते हैं, तब उसका लाभ केवल एक व्यक्ति या परिवार तक सीमित नहीं रहता; पूरा समाज अधिक सक्षम बनता है।

नौ रूप, जीवन के नौ मूल्य

मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की उपासना जीवन के विविध मूल्यों को समझने का अवसर भी देती है। शैलपुत्री स्थिरता और दृढ़ता की याद दिलाती हैं। ब्रह्मचारिणी तप, अनुशासन और लक्ष्य के प्रति समर्पण की प्रेरणा देती हैं। चंद्रघंटा साहस और सजगता का बोध कराती हैं, जबकि कूष्मांडा सृजन और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक मानी जाती हैं। स्कंदमाता वात्सल्य और संरक्षण की भावना से जुड़ी हैं। कात्यायनी अन्याय के विरुद्ध संकल्प और प्रतिरोध का स्मरण कराती हैं। कालरात्रि भय का सामना करने की शक्ति का प्रतीक हैं, तो महागौरी पवित्रता, शांति और आत्मशुद्धि का संदेश देती हैं। सिद्धिदात्री साधना, ज्ञान और उपलब्धि की आकांक्षा को अभिव्यक्त करती हैं। इन स्वरूपों की व्याख्या अलग-अलग धार्मिक परंपराओं में विविध रूपों में मिलती है, लेकिन इनके माध्यम से जीवन के जिन गुणों पर जोर दिया जाता है, वे सार्वकालिक हैं। मनुष्य को दृढ़ भी होना चाहिए और करुणामय भी; उसे अन्याय का विरोध करना चाहिए, लेकिन अपने विवेक को नहीं खोना चाहिए। उसे लक्ष्य के प्रति समर्पित रहना चाहिए, पर सफलता के अहंकार से बचना भी जरूरी है। नवरात्र का आध्यात्मिक अनुशासन इसी संतुलन की याद दिलाता है। उपवास, ध्यान, प्रार्थना और संयम जैसे अभ्यास तभी अधिक अर्थपूर्ण बनते हैं, जब वे व्यक्ति को आत्मनिरीक्षण के लिए प्रेरित करें। शरीर और मन पर नियंत्रण का उद्देश्य जीवन से विमुख होना नहीं, बल्कि उसे अधिक संतुलित, सजग और उद्देश्यपूर्ण बनाना है।

असली युद्ध अपने भीतर भी है

मनुष्य अक्सर अपनी परेशानियों के लिए बाहरी परिस्थितियों को जिम्मेदार मानता है। इसमें कई बार सच्चाई भी होती है, क्योंकि गरीबी, भेदभाव, हिंसा और अन्याय जैसी समस्याएं व्यक्तिगत प्रयासों से कहीं बड़ी होती हैं। लेकिन यह भी सच है कि कई संघर्ष हमारे अपने भीतर जन्म लेते हैं। क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, छल, अहंकार और दूसरों के प्रति उपेक्षा धीरे-धीरे हमारे विवेक को कमजोर कर देते हैं। इन प्रवृत्तियों को पहचानना आसान नहीं, क्योंकि मनुष्य प्रायः अपनी गलतियों को उचित ठहराने के लिए तर्क खोज लेता है। वह अपने क्रोध को स्वाभिमान, लालच को आवश्यकता और अहंकार को आत्मविश्वास का नाम दे सकता है। ऐसे में आत्मनिरीक्षण ही वह पहला कदम है, जो व्यक्ति को अपनी कमजोरियों के प्रति ईमानदार बनाता है। मां दुर्गा की आराधना का एक अर्थ यह भी है कि मनुष्य अपने भीतर की नकारात्मक प्रवृत्तियों से संघर्ष करने का साहस जुटाए। इसका मतलब अपनी भावनाओं को दबाना नहीं, बल्कि उन्हें सही दिशा देना है। क्रोध अन्याय के विरुद्ध ऊर्जा बन सकता है, यदि उसके साथ विवेक हो। महत्वाकांक्षा प्रगति का माध्यम बन सकती है, यदि उसमें दूसरों के अधिकारों का सम्मान बना रहे। आत्मविश्वास व्यक्ति को आगे बढ़ा सकता है, यदि वह अहंकार में न बदले। बाहरी संसार को बदलने की आकांक्षा रखने वाले व्यक्ति के लिए अपने भीतर की दुनिया को समझना भी जरूरी है। समाज में ईमानदारी की अपेक्षा करने से पहले अपने आचरण को परखना, दूसरों से संवेदनशीलता की उम्मीद करने से पहले उनके दुख को समझना और न्याय की मांग करते समय अपने व्यवहार में निष्पक्षता बनाए रखना इसी साधना के हिस्से हैं।

करुणा भी शक्ति है, सेवा भी साधना

शक्ति की चर्चा अक्सर साहस, संघर्ष और पराक्रम के संदर्भ में होती है, लेकिन करुणा भी उतनी ही बड़ी शक्ति है। किसी पीड़ित की बात धैर्य से सुनना, कठिन समय में किसी का साथ देना, जरूरतमंद की सहायता करना और किसी कमजोर व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा करना ऐसे कार्य हैं, जिनमें संवेदनशीलता के साथ साहस भी चाहिए। आज के जीवन में सफलता और प्रतिस्पर्धा की दौड़ कई बार मनुष्य को दूसरों के दुख से दूर कर देती है। लोग एक-दूसरे की उपलब्धियों को देखते हैं, लेकिन उनकी कठिनाइयों को समझने का समय कम निकालते हैं। ऐसे वातावरण में करुणा का महत्व और बढ़ जाता है। किसी की पीड़ा को पहचानना कमजोरी नहीं, बल्कि मनुष्यता के प्रति सजग होने का प्रमाण है। मां दुर्गा को संकटों से रक्षा करने वाली शक्ति के रूप में स्मरण किया जाता है। इस भावना को सामाजिक जीवन में उतारने का अर्थ है कि हम अपने आसपास मौजूद संकटों के प्रति उदासीन न रहें। किसी महिला के साथ अन्याय हो, किसी बच्चे की शिक्षा बाधित हो, कोई बुजुर्ग उपेक्षित हो या कोई परिवार कठिन आर्थिक परिस्थिति से गुजर रहा हो—जहां संभव हो, वहां सहयोग का हाथ बढ़ाना भी आस्था का मानवीय विस्तार है। सेवा के लिए हमेशा बड़े संसाधनों की आवश्यकता नहीं होती। कभी किसी को सही जानकारी देना, किसी जरूरतमंद को अवसर तक पहुंचाना, किसी पीड़ित की आवाज बनना या किसी अकेले व्यक्ति को यह भरोसा दिलाना कि वह अकेला नहीं है—ये छोटे दिखने वाले प्रयास भी जीवन में बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं। समाज की वास्तविक शक्ति केवल उसकी संपन्नता या सामर्थ्य से नहीं, बल्कि इस बात से भी पहचानी जाती है कि वह अपने सबसे कमजोर लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है।

आस्था का अर्थ, व्यवहार में परिवर्तन

धार्मिक पर्व मनुष्य को अपनी परंपराओं से जोड़ते हैं और सामूहिक जीवन में उत्साह तथा एकता का संचार करते हैं। नवरात्र भी इसी सांस्कृतिक चेतना का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन परंपराओं की जीवंतता तभी बनी रहती है, जब उनकी मूल भावना समय के साथ हमारे आचरण को दिशा देती रहे। पूजा-पाठ व्यक्ति को मानसिक शांति दे सकता है, प्रार्थना उसे कठिन परिस्थितियों में आशा दे सकती है और धार्मिक अनुशासन उसे संयम सिखा सकता है। लेकिन इन अनुभवों का व्यापक महत्व तब सामने आता है, जब व्यक्ति अपने परिवार, कार्यस्थल और समाज में अधिक जिम्मेदार व्यवहार करने लगे। यदि आराधना के बाद भी उसके भीतर दूसरों के प्रति घृणा, भेदभाव या अन्याय के प्रति उदासीनता बनी रहती है, तो उसे अपनी आस्था के उद्देश्य पर फिर से विचार करना चाहिए। मां दुर्गा का स्वरूप शक्ति और करुणा, साहस और विवेक, प्रतिरोध और संरक्षण के संतुलन का संदेश देता है। यह संदेश किसी एक धर्मस्थल या अनुष्ठान तक सीमित नहीं है। यह जीवन के हर क्षेत्र में प्रासंगिक है—घर में संबंध निभाने से लेकर समाज में जिम्मेदारी उठाने तक, व्यक्तिगत निर्णयों से लेकर सार्वजनिक आचरण तक। शारदीय नवरात्र इसी आत्ममंथन का अवसर है। यह पूछने का समय है कि क्या हमारा साहस किसी कमजोर के काम आ रहा है, क्या हमारा ज्ञान अज्ञान को दूर कर रहा है, क्या हमारी सफलता दूसरों के लिए अवसर पैदा कर रही है और क्या हमारी आस्था हमें अधिक विनम्र तथा संवेदनशील बना रही है। मां दुर्गा की आराधना का मर्म केवल शक्ति की कामना करना नहीं, बल्कि शक्ति का सदुपयोग करना है। ऐसी शक्ति, जो भय नहीं, भरोसा पैदा करे; जो विभाजन नहीं, न्याय और सम्मान का मार्ग खोले; जो केवल अपने हित की रक्षा न करे, बल्कि दूसरों के अधिकारों के प्रति भी सजग रहे। क्योंकि मां दुर्गा की सच्ची साधना वहीं पूर्ण अर्थ पाती है, जहां श्रद्धा से विनम्रता, शक्ति से साहस, ज्ञान से विवेक और आस्था से मनुष्यता जन्म लेती है।

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