Thursday, 28 August 2025

चिंतामणि गणेशः भक्तों की चिंता हरने वाले विघ्नहर्ता

चिंतामणि गणेशः भक्तों की चिंता हरने वाले विघ्नहर्ता 

काशी की धार्मिक और आध्यात्मिक पहचान केवल बाबा विश्वनाथ और गंगा मैया से ही नहीं, बल्कि यहां स्थित अनगिनत देवालयों से भी जुड़ी है। इन्हीं में से एक है केदारखंड स्थित श्री श्री 1008 चिंतामणि गणेश मंदिर, जिसे भक्त चिंताओं का हरने वाला विघ्नहर्ता मानते हैं। 

यहां आने वाले श्रद्धालु मानते हैं कि भगवान गणेश अपने इस स्वरूप में उनकी हर चिंता, दुःख और विघ्नों को अपने ऊपर लेकर उन्हें सुख, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं. 

मान्यता है कि यदि कोई भक्त लगातार 40 दिन तक दूर्वा, लावा और लड्डू अर्पित करे तो उसकी सभी चिंताएं समाप्त हो जाती हैं। काशी का यह इकलौता मंदिर हैपौराणिक कथा के अनुसार, गणेश जी ने असुर से चिंता हरने वाली मणि को मुक्त कर भक्तों को दिया। तभी वे चिंतामणि कहलाए। 

हर कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को उपवास और चंद्रदर्शन के बाद गणपति पूजन करने से सभी संकट दूर होते हैं और जीवन में शांति आती है 

सुरेश गांधी

देवों के देव महादेव की नगरी काशी की हर गली-चौराहे पर कोई कोई देवालय आस्था का केन्द्र बना हुआ है। बाबा विश्वनाथ की नगरी में केदारखंड स्थित श्री श्री 1008 चिंतामणि गणेश मंदिर भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है। यहां विराजमान गणेश जी का स्वरूप ऐसा है, जो भक्तों की हर चिंता अपने ऊपर लेकर उन्हें निश्चिंत कर देता है। मान्यता है कि यह गणेश स्वरूप केवल विघ्नहर्ता ही नहीं, बल्कि भक्तों के मन की चिंता हरने वाले चिंतामणि भी हैं। यही कारण है कि देशभर से श्रद्धालु यहां आते हैं और विश्वास के साथ गणपति से आशीर्वाद पाते हैं।

चिंतामणिशब्द दो खंडों से बना है, चिंता मणि। जिस प्रकार मणि (रत्न) से प्रकाश निकलकर अंधकार को दूर करता है, उसी प्रकार भगवान गणेश का यह रूप भक्तों की चिंताओं को हरकर उनके दुखों का नाश कर जीवन में प्रकाश और आनंद भरता है। काशी खंड में भगवान गणेश को लंबोदर विनायक के रूप में भी वर्णित किया गया है, जबकि केदारखंड में उन्हें चिंतामणि गणेश कहा गया है। भक्तों का विश्वास है कि इस मंदिर के दर्शन मात्र से ही मानसिक शांति मिलती है और नकारात्मक विचार दूर होते हैं। यही कारण है कि यहां दूर-दराज़ से श्रद्धालु अपनी व्यथा और चिंता लेकर आते हैं और हल्का मन लेकर लौटते हैं।

काशी के इस प्राचीन मंदिर की विशेषता यह है कि यहां विराजमान गणेश जी की प्रतिमा स्वयंभू मानी जाती है। और सबसे अद्वितीय बात यह है कि यहां गणेश जी अपने पूरे परिवार सहित विराजते हैं। ऊपर शुभ-लाभ और नीचे रिद्धि-सिद्धि का विग्रह है। साथ ही अष्टभुजा का स्वरूप भी यहां विद्यमान है। यह अद्वितीय संयोग अन्यत्र कहीं नहीं मिलता। मंदिर के महंत चल्ला सुब्बाराव के अनुसार, “यह इकलौता मंदिर है जहां श्री गणेश सपरिवार निवास करते हैं। प्रतिमा दक्षिणावर्त है और मान्यता है कि जो भक्त श्रद्धा से पूजन करता है उसकी चिंता भगवान गणेश स्वयं ले लेते हैं।

काशी की गलियों में स्थित यह मंदिर भक्तों के लिए शांति और समाधान का आश्रय है। भगवान गणेश को विघ्नहर्ता और प्रथम पूज्य कहा गया है। चिंतामणि स्वरूप में वे केवल विघ्नों को ही नहीं, बल्कि जीवन की गहरी चिंताओं और दुखों को भी दूर करते हैं। इस प्रकार चिंतामणि गणेश मंदिर केवल काशी की आस्था का केन्द्र नहीं, बल्कि जीवन के हर दुख-दर्द से मुक्ति का प्रतीक भी है। यहां के दर्शन से मन को शांति मिलती है और विश्वास दृढ़ होता है कि सच्ची श्रद्धा से की गई प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं जाती।

56 विनायकों में स्थान

काशी में कुल 56 विनायक पूजित माने जाते हैं। हर विनायक का अपना महत्व है। इन्हीं में से चिंतामणि गणेश का स्थान विशेष है। मान्यता है कि ये श्री काशी विश्वनाथ तक की चिंता को हरते हैं। इसलिए भक्तों के मन में इनका महत्व और भी बढ़ जाता है। पुजारी का कहना है कि काशी के केदारखंड में स्थित श्री श्री 1008 चिंतामणि गणेश मंदिर केवल पूजन स्थल नहीं, बल्कि भक्तों की चिंताओं से मुक्ति का केंद्र माना जाता है। मान्यता है कि इस मंदिर में विराजमान दक्षिणावर्त स्वयंभू विग्रह भक्तों की हर चिंता को अपने ऊपर लेकर उन्हें सुख, शांति और समृद्धि का वरदान देते हैं। यही कारण है कि भगवान गणेश का यह रूपचिंतामणिकहलाता है।

पूजा विधि और मान्यता

चिंतामणि गणेश की पूजा विशेष विधान से की जाती है। भक्त दूर्वा घास, धान का लावा और बेसन के लड्डू अर्पित करते हैं। लगातार 40 दिन तक पूजा करने से सभी चिंताएं और बाधाएं दूर हो जाती हैं। मान्यता है कि दूर्वा चढ़ाने से धन और ऐश्वर्य, लावा चढ़ाने से यश-कीर्ति और विद्या, और लड्डू अर्पण करने से मनोकामना पूर्ण होती है। मन्नत पूरी होने पर भक्त नारियल चढ़ाते हैं। महंत सुब्बाराव बताते हैं कियदि कोई बच्चा पढ़ाई में मन लगा पाए तो उसके माता-पिता 40 दिन तक लावा चढ़ाएं और ध्यान करें। गणपति प्रसन्न होकर उसे विद्या और बुद्धि का वरदान देते हैं।

उत्सव और पर्व

हर बुधवार और गणेश चतुर्थी को यहां विशेष पूजा होती है। भक्तों की लंबी कतारें लगती हैं। संकष्टी चतुर्थी पर उपवास कर रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देकर पूजन करने से सभी संकट दूर होते हैं। शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है। विशेष रूप से भाद्रपद मास की चतुर्थी पर 11 दिन तक चलने वाला उत्सव धूमधाम से आयोजित होता है। इस दौरान शोभायात्रा, भजन-संध्या, सांस्कृतिक कार्यक्रम और विशिष्ट कार्य करने वालों का सम्मान होता है। भक्तों का मानना है कि चिंतामणि गणेश केवल सांसारिक ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक चिंताओं का भी शमन करते हैं। कोई व्यवसाय में हानि से परेशान हो, विद्यार्थी शिक्षा को लेकर चिंतित हो, परिवार में कलह हो या जीवन में कोई कठिनाई, हर भक्त यहां आकर अपनी व्यथा गणपति को समर्पित करता है और हल्का मन लेकर लौटता है।

आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व

काशी के देवालय केवल पूजा-अर्चना का स्थल नहीं, बल्कि समाज और संस्कृति के केन्द्र भी रहे हैं। चिंतामणि गणेश मंदिर का उत्सव केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक एकता का प्रतीक भी है। यहां हर वर्ग और हर आयु के लोग श्रद्धा से जुड़ते हैं। मंदिर के महंत चल्ला सुब्बाराव बताते हैं कि यदि कोई भक्त लगातार 40 दिन तक दूर्वा, धान का लावा और लड्डू अर्पित कर पूजा करता है तो उसकी सभी चिंताएं दूर हो जाती हैं।

पौराणिक मान्यताएं

चिंतामणि गणेश की महिमा का वर्णन पुराणों और लोककथाओं में मिलता है। कथा है कि राजा अभिजीत ने तपस्या कर भगवान गणेश से एक मणि प्राप्त की, जो हर चिंता को हर लेती थी। दुष्ट गणेशासुर ने छल से वह मणि छीन ली। तब गणपति ने उसका वध कर वह मणि भक्तों को लौटाई। तभी से वे चिंतामणि कहलाए। काशी में स्थित चिंतामणि गणेश भी उसी महिमा के विस्तार माने जाते हैं। यहां मान्यता है कि जो भी भक्त अपनी चिंता उन्हें अर्पित करता है, वे उसे निश्चिंत कर देते हैं।

40 दिन की पूजा की शक्ति

मंदिर की मान्यता है कि यदि कोई भक्त लगातार 40 दिन तक दूर्वा, लावा और लड्डू अर्पित करे तो उसकी सभी चिंताएं समाप्त हो जाती हैं।

सपरिवार गणपति

काशी का यह इकलौता मंदिर है जहां गणेश जी अपने पूरे परिवार, रद्धि-सिद्धि और शुभ-लाभकृसहित विराजमान हैं।

चिंता हरने वाली मणि की कथा

मोरगांव की पौराणिक कथा के अनुसार, गणेश जी ने असुर से चिंता हरने वाली मणि को मुक्त कर भक्तों को दिया। तभी वे चिंतामणि कहलाए।

संकष्टी चतुर्थी का महत्व

हर कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को उपवास और चंद्रदर्शन के बाद गणपति पूजन करने से सभी संकट दूर होते हैं और जीवन में शांति आती है।

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