अहंकार का दहन, संवेदनाओं का स्पंदन : रंगों की आध्यात्मिक साधना है होली
सुरेश गांधी
फाल्गुन का महीना जैसे
ही प्रकृति के आंगन में
उतरता है, वातावरण में
एक अदृश्य उल्लास घुलने लगता है। हवा
में मादकता, वृक्षों पर नवांकुरों की
हरियाली, आम के बौरों
की सुगंध और मन के
भीतर अनायास जागती प्रसन्नताकृयह सब संकेत देते
हैं कि होली आने
वाली है। होली केवल
रंगों का उत्सव नहीं,
बल्कि मनुष्य के भीतर बसे
अहंकार, द्वेष और कटुता को
जलाकर प्रेम, समरसता और संवेदना को
पुनर्जीवित करने का सांस्कृतिक
और आध्यात्मिक पर्व है। होली
का नाम आते ही
जैसे दिल और दिमाग
पर मस्ती का रंग चढ़ने
लगता है। बिना किसी
मदिरा के भी मन
आनंद में झूम उठता
है। शरीर का पोर-पोर संकेत देने
लगता है कि जीवन
के कठोर अनुशासन से
कुछ क्षण बाहर निकलकर
सहजता और आत्मीयता के
रंगों में भीगने का
समय आ गया है।
यह वही क्षण होता
है जब मनुष्य अपने
सामाजिक आवरणों से मुक्त होकर
मानवीय संवेदनाओं के मूल स्वरूप
के करीब पहुंचता है।
होली का मूल
आधार भक्त प्रह्लाद की
अटूट भक्ति और असुरराज हिरण्यकश्यप
के अहंकार की कथा से
जुड़ा है। हिरण्यकश्यप स्वयं
को ईश्वर से भी श्रेष्ठ
मान बैठा था, जबकि
उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का अनन्य भक्त
था। अहंकार और आस्था का
यह संघर्ष केवल पौराणिक प्रसंग
नहीं, बल्कि हर युग का
सत्य है। जब-जब
सत्ता अहंकार में डूबती है
और सत्य को दबाने
का प्रयास करती है, तब-तब प्रह्लाद जैसी
आस्था जन्म लेती है।
हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को
अनेक यातनाएं दीं, कभी पर्वत
से गिराया, कभी उबलते तेल
में डाला, कभी विष दियाकृपरंतु
भक्ति अडिग रही। अंततः
उसकी बहन होलिका, जिसे
अग्नि से न जलने
का वरदान प्राप्त था, प्रह्लाद को
गोद में लेकर अग्नि
में बैठी। किंतु दैवी न्याय ऐसा
हुआ कि होलिका भस्म
हो गई और प्रह्लाद
सुरक्षित बच निकले। यही
घटना आज “होलिका दहन”
के रूप में मनाई
जाती है, अर्थात भीतर
की बुराइयों का दहन।
होली केवल आध्यात्मिक
पर्व ही नहीं, बल्कि
लोकजीवन की जीवंत अभिव्यक्ति
भी है। ब्रज की
गलियों में कृष्ण और
राधा की रंग-लीलाओं
के प्रसंग आज भी लोकगीतों
और फागों में गूंजते हैं।
ढोल की थाप, मंजीरों
की झंकार और फागुन की
मस्ती, ये सब मिलकर
होली को केवल त्योहार
नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अनुभव बना देते हैं।
लोककवि ईसुरी के फाग हों
या गांवों की चौपालों पर
गूंजती ठिठोली, हर जगह एक
ही भाव मिलता है,
मनुष्य के भीतर छिपे
आनंद को बाहर लाने
का अवसर। होली का समय
भारतीय कृषि चक्र से
भी गहराई से जुड़ा है।
नई फसल घर आने
का उल्लास, खेतों की हरियाली और
किसानों की संतुष्टि इस
पर्व को और अर्थपूर्ण
बना देती है। फाल्गुन
पूर्णिमा की रात अग्नि
प्रज्ज्वलित कर नई ऊर्जा
का स्वागत किया जाता है।
प्रकृति भी जैसे रंगों
के वस्त्र धारण कर लेती
है, सरसों का पीला, पलाश
का लाल और गेहूं
की बालियों का सुनहरा रंग।
यह पर्व हमें याद
दिलाता है कि मनुष्य
और प्रकृति का संबंध केवल
उपयोग का नहीं, बल्कि
उत्सव का भी है।
यदि गहराई से
देखें तो ब्रह्मांड में
स्वयं कोई रंग नहीं
है। रंग प्रकाश का
खेल है। वस्तुएं जिस
रंग को परावर्तित करती
हैं, हम वही देखते
हैं। यही सिद्धांत जीवन
पर भी लागू होता
है, हम जैसा व्यवहार
दुनिया को देते हैं,
वही हमारे व्यक्तित्व का रंग बन
जाता है। यदि हम
प्रेम देंगे तो प्रेम लौटेगा,
यदि कटुता देंगे तो कटुता ही
वापस आएगी। इसीलिए होली हमें सकारात्मक
भावों का चयन करना
सिखाती है। आज का
समय तेज़ी से बदलते
सामाजिक ढांचे और डिजिटल संवाद
का समय है। रिश्ते
अक्सर औपचारिक होते जा रहे
हैं। ऐसे में होली
वास्तविक मिलन का अवसर
बनती है। यह त्योहार
हमें याद दिलाता है
कि जीवन केवल उपलब्धियों
का नहीं, संबंधों का भी नाम
है। हालांकि, उत्सव की आड़ में
उच्छृंखलता का प्रवेश इस
पर्व की गरिमा को
प्रभावित करता है। होली
का वास्तविक आनंद मर्यादा, संयम
और संवेदनशीलता में ही है।
रंग तभी सुंदर लगते
हैं जब उनमें सम्मान
का भाव भी हो।
“होली” शब्द का एक अर्थ यह भी माना जाता है, “हो ली”, अर्थात जो बीत गया उसे छोड़कर आगे बढ़ना। यही जीवन का सबसे बड़ा सूत्र है। गिले-शिकवे मिटाकर, संबंधों को नया रंग देकर और मन को निर्मल बनाकर ही होली का वास्तविक उत्सव मनाया जा सकता है। जब मनुष्य अपने भीतर के अहंकार को जलाकर विनम्रता अपनाता है, तब वह पूर्णता की ओर बढ़ता है। ज्ञान का पहला लक्षण विनय है और विनय ही मनुष्य को श्रेष्ठ बनाता है। होली हमें सिखाती है कि जीवन को रंगीन बनाने के लिए बाहरी रंगों से अधिक आवश्यक है आंतरिक उजास। यह पर्व हमें जोड़ता है, जगाता है और संवेदनाओं को पुनर्जीवित करता है। यदि हम हर वर्ष होली के संदेश को अपने जीवन में उतार लें, तो समाज में समरसता और मानवता का रंग कभी फीका नहीं पड़ेगा। यही होली का वास्तविक अर्थ है, अहंकार का दहन, प्रेम का अभिनंदन और जीवन का.


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