अबीर-गुलाल से दैदीप्यमान हुई काशी, रंगभरी एकादशी पर ‘हर-हर महादेव’ से गुंजा श्रीकाशी विश्वनाथ धाम
रजत पालकी
में
बाबा-गौरा
के
दर्शन
को
उमड़ा
आस्था
का
सैलाब,
हल्दी-गुलाल
अर्पित
कर
शुरू
हुआ
छह
दिवसीय
रंगोत्सव
घाटों से
गलियों
तक
भक्ति,
परंपरा
और
उत्साह
का
अद्भुत
संगम,
देश-विदेश
से
आए
श्रद्धालु
हुए
भावविभोर
सुरेश गांधी
वाराणसी। आस्था, परंपरा और उल्लास की त्रिवेणी में डूबी काशी ने रंगभरी एकादशी पर एक बार फिर अपने आध्यात्मिक वैभव का अद्भुत स्वरूप प्रस्तुत किया। देवाधिदेव महादेव की नगरी काशी में जब भक्तों ने अपने आराध्य काशी विश्वनाथ मंदिर में बाबा विश्वनाथ और माता गौरा को हल्दी-गुलाल अर्पित किया, तो मानो भक्ति स्वयं रंग बनकर वातावरण में घुल गई। हर-हर महादेव के गगनभेदी उद्घोष, डमरू की अनुगूंज और शंखध्वनि के बीच काशी का कण-कण रंगोत्सव में सराबोर हो उठा। द्वापर के लीला पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण की जन्मभूमि वृंदावन की तरह काशी में भी रंगों का आध्यात्मिक उत्सव जीवंत हो उठा। मान्यता है कि रंगभरी एकादशी के दिन स्वयं बाबा विश्वनाथ अपने भक्तों को होली खेलने की अनुमति देते हैं और उसी क्षण से काशी में होली की औपचारिक शुरुआत होती है।
भक्ति और रंगों का अद्भुत समागम
परंपरागत वेशभूषा में सजे श्रद्धालुओं ने पालकी को कंधों पर उठाया तो पूरा धाम भक्ति से झूम उठा। उड़ते अबीर-गुलाल और पुष्पवर्षा के बीच श्रद्धालु अपने आराध्य के दर्शन कर भावविभोर होते रहे।
डमरू
के गगनभेदी नाद और शंख
की मंगल ध्वनि ने
वातावरण को शिवमय बना
दिया। भक्तों ने बाबा को
गुलाल अर्पित कर नेग के
रूप में होली खेलने
की अनुमति ली। इसी के
साथ काशी में छह
दिवसीय रंगोत्सव का आरंभ हो
गया।
परंपरा के साथ उत्सव का आध्यात्मिक विस्तार
इसके बाद रजत पालकी मंदिर चौक पहुंची, जहां भक्तों ने दर्शन कर एक-दूसरे को रंग लगाकर उत्सव की खुशियां साझा कीं।
मंदिर
प्रशासन की ओर से
बताया गया कि रंगभरी
एकादशी का यह उत्सव
काशी की प्राचीन परंपराओं
का जीवंत प्रतीक है, जिसमें लोक
और शास्त्र का सुंदर संगम
दिखाई देता है। देश-विदेश से आए श्रद्धालुओं
ने इस अलौकिक दृश्य
को अपनी स्मृतियों में
संजो लिया।
गलियों से घाटों तक होलियाना उमंग
शिवार्चनम मंच पर आयोजित सांस्कृतिक संध्या में भक्ति भजनों की प्रस्तुति ने वातावरण को और अधिक आध्यात्मिक बना दिया। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलित कर किया गया।
कलाकारों की प्रस्तुतियों पर
श्रद्धालु झूमते रहे और भक्ति-रस देर रात
तक प्रवाहित होता रहा। अब
काशी में आने वाले
पांच दिनों तक घाटों से
लेकर गलियों तक रंग, उमंग
और उत्साह की होलियाना बहार
छाई रहेगी।
लोक परंपरा में जीवंत काशी की पहचान
रंगभरी एकादशी केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि काशी की जीवंत लोक परंपरा का उत्सव है।
यहां होली केवल रंगों का पर्व नहीं, बल्कि शिव और शक्ति के मिलन, भक्त और भगवान के स्नेह तथा लोक और अध्यात्म के अद्भुत समन्वय का प्रतीक बनकर सामने आती है।
बाबा विश्वनाथ की
नगरी में उड़ते गुलाल
के साथ मानो यह
संदेश भी गूंजता रहा,
भक्ति ही वह रंग
है जो जीवन को
सबसे अधिक उज्ज्वल बनाता
है।
शिव-पार्वती के दांपत्य प्रेम का उत्सव




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