Saturday, 14 March 2026

समय का अनोखा संयोग : 13 महीनों का होगा विक्रम संवत 2083

समय का अनोखा संयोग : 13 महीनों का होगा विक्रम संवत 2083 

कालचक्र का अद्भुत विधान : पुरुषोत्तम मास अधिक मास के कारण लंबा होगा यह हिंदू वर्ष

ब्रह्मा की सृष्टि से नए संवत्सर तक : 19 मार्च से शुरू होगा, नए संकल्प के साथ नया संवत्सर

दिखेंगा धर्म-आस्था और खगोलीय संतुलन का अद्भुत संगम

सुरेश गांधी

वाराणसी. भारतीय संस्कृति में समय की गणना केवल तिथियों और कैलेंडर के पन्नों तक सीमित नहीं है। यहां समय को प्रकृति, ग्रह-नक्षत्रों और ब्रह्मांडीय व्यवस्था से जोड़कर देखा जाता है। यही कारण है कि सनातन परंपरा में नववर्ष केवल एक नई तारीख नहीं, बल्कि एक नई ऊर्जा, नए संकल्प और शुभ कार्यों की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। 

वर्ष 2026 में यह आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व और भी विशेष हो जाएगा, क्योंकि इस बार हिंदू पंचांग के अनुसार नया वर्ष 19 मार्च से आरंभ होकर विक्रम संवत 2083 की शुरुआत करेगा और इस संवत्सर की सबसे बड़ी विशेषता यह होगी कि इसमें 12 नहीं बल्कि 13 महीने होंगे। यह अतिरिक्त महीना अधिक मास के कारण जुड़ रहा है, जिसे मलमास या पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। इस कारण यह वर्ष धार्मिक, खगोलीय और सांस्कृतिक दृष्टि से विशेष महत्व प्राप्त कर रहा है।

क्यों बनता है 13 महीनों का वर्ष 

हिंदू पंचांग की गणना चंद्रमा की गति पर आधारित होती है। चंद्रमा के अनुसार एक वर्ष लगभग 354 दिनों का होता है, जबकि सूर्य की गति के आधार पर सौर वर्ष लगभग 365 दिनों का माना जाता है। इस प्रकार दोनों के बीच लगभग 11 दिनों का अंतर रह जाता है। 

यदि यह अंतर लगातार बढ़ता रहे तो मौसम, ऋतु और पर्वों की तिथियां अपने प्राकृतिक क्रम से अलग हो जाएंगी। इस असंतुलन को संतुलित करने के लिए लगभग हर तीन वर्ष में एक अतिरिक्त महीना जोड़ दिया जाता है, जिसे अधिक मास कहा जाता है। 

वर्ष 2026 में यह अधिक मास 17 मई से 15 जून के बीच रहेगा। इसी कारण इस वर्ष ज्येष्ठ मास दो बार आएगा और पूरे संवत्सर में कुल 13 महीने हो जाएंगे। इस खगोलीय व्यवस्था से भारतीय कालगणना की वैज्ञानिकता भी स्पष्ट होती है, क्योंकि यह प्रकृति के साथ तालमेल बनाए रखने का प्रयास करती है। 

पुराणों में अधिक मास की कथा

अधिक मास के संबंध में पौराणिक मान्यता भी अत्यंत रोचक है। कथा के अनुसार जब यह अतिरिक्त महीना बना तो किसी भी देवता ने इसे अपना स्वामी बनने की इच्छा नहीं जताई। तब यह महीना अत्यंत दुखी होकर भगवान विष्णु के पास पहुंचा। भगवान विष्णु ने करुणा दिखाते हुए इसे स्वीकार किया और इसेपुरुषोत्तम मासका नाम दिया। यही कारण है कि इस महीने को भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है। इस अवधि में जप, तप, दान, पूजा-पाठ और सत्कर्म करने का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि इस मास में किया गया पुण्य कई गुना फल देता है।

19 मार्च से आरंभ होगा हिंदू नववर्ष

वर्ष 2026 में हिंदू नववर्ष 19 मार्च से आरंभ होगा। इसी दिन चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि पड़ेगी, जो सनातन परंपरा में नए वर्ष का प्रारंभ मानी जाती है। 

वैदिक पंचांग के अनुसार यह तिथि सुबह 6 बजकर 52 मिनट से प्रारंभ होकर अगले दिन तक रहेगी। धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी दिन ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना आरंभ की थी। इसलिए यह तिथि सृष्टि के प्रथम दिवस के रूप में भी पूजनीय मानी जाती है। यही दिन पूरे वर्ष के व्रत-त्योहारों और धार्मिक अनुष्ठानों के नए क्रम की शुरुआत भी करता है।

देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग नाम

भारत की विविध सांस्कृतिक परंपराओं में इस दिन को अलग-अलग नामों से मनाया जाता है, लेकिन भावना एक ही होती हैकृनए वर्ष का स्वागत। महाराष्ट्र में इसे गुड़ी पड़वा कहा जाता है. दक्षिण भारत में उगादी के रूप में मनाया जाता है. सिंधी समाज में यह पर्व चेटी चंद कहलाता है. उत्तर भारत में इसे सामान्यतः हिंदू नवसंवत्सर या नववर्ष के रूप में जाना जाता है. इन सभी उत्सवों में घर की सजावट, पूजा-अर्चना, नए संकल्प और उत्सव का वातावरण देखने को मिलता है।

रौद्र संवत्सर और ग्रहों का प्रभाव

ज्योतिषीय गणना के अनुसार वर्ष 2026 में शुरू होने वाला नया संवत्सररौद्र संवत्सरकहलाएगा। इस संवत्सर के राजा बृहस्पति होंगे]. मंत्री मंगल होंगे. वैदिक ज्योतिष में इन ग्रहों की स्थिति के आधार पर पूरे वर्ष के संभावित प्रभावों का आकलन किया जाता है।

बृहस्पति को ज्ञान, धर्म, नीति और समृद्धि का कारक माना जाता है, जबकि मंगल ऊर्जा, साहस और पराक्रम का प्रतीक है। इस दृष्टि से माना जा रहा है कि यह वर्ष धार्मिक जागरण, सामाजिक ऊर्जा और साहसिक निर्णयों का वर्ष हो सकता है। 

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