पंडित’ पर हंगामा या शब्दों की गलत समझ?
यूपी एसआई भर्ती परीक्षा के एक प्रश्न ने छेड़ी बहस : भाषा का वास्तविक अर्थ बनाम सामाजिक धारणाएं. क्या सचमुच गलत था सवाल या समझ की कमी ने खड़ा किया विवाद. सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि प्रतियोगी परीक्षाओं में विकल्प ऐसे शब्दों से बनाए जाते हैं जो सही उत्तर से अर्थ की दृष्टि से मेल नहीं खाते, ताकि परीक्षार्थी सही शब्द पहचान सके। प्रश्न था “अवसर के अनुसार बदल जाने वाले के लिए एक शब्द”। इसका सही उत्तर स्पष्ट रूप से “अवसरवादी” है। इसलिए बाकी विकल्प ऐसे शब्द होते हैं जो उस अर्थ से बिल्कुल अलग हों। यहाँ “पंडित” शब्द का मूल अर्थ विद्वान, ज्ञानी है, जो “अवसरवादी” के अर्थ से बिल्कुल अलग है। इसलिए इसे एक सामान्य गलत विकल्प (डिस्ट्रैक्टर) के रूप में रखा जा सकता है। जहाँ तक दलित, ठाकुर, बनिया जैसे शब्दों का सवाल है, ये जाति/समुदाय सूचक शब्द हैं, जबकि “पंडित” शब्द का प्रयोग हिंदी में विद्वान या विशेषज्ञ के अर्थ में भी होता है। प्रतियोगी परीक्षाओं में आम तौर पर ऐसे जाति-सूचक शब्दों को विकल्प के रूप में रखने से बचा जाता है ताकि अनावश्यक सामाजिक विवाद न हो। मतलब साफ हैं सही उत्तर अवसरवादी है। “पंडित” का अर्थ विद्वान होने के कारण इसे एक सामान्य गलत विकल्प के रूप में रखा जा सकता है। जाति/समुदाय सूचक शब्दों को विकल्प में देना आम तौर पर परीक्षा की भाषा में उचित नहीं माना जाता। इसलिए किसी भी प्रश्न को देखने से पहले उसके भाषाई संदर्भ और परीक्षा की पद्धति दोनों को समझना जरूरी होता है…
सुरेश गांधी
कभी-कभी एक
छोटा-सा शब्द भी
बड़ा विवाद खड़ा कर देता
है। उत्तर प्रदेश पुलिस सब-इंस्पेक्टर भर्ती
परीक्षा के हिंदी खंड
में पूछे गए एक
प्रश्न को लेकर इन
दिनों कुछ ऐसा ही
दृश्य देखने को मिल रहा
है। प्रश्न था, “अवसर के
अनुसार बदल जाने वाले
के लिए एक शब्द
बताइए।” इसके विकल्पों में
पंडित, अवसरवादी, निष्कपट और सदाचारी दिए
गए थे। सामान्य हिंदी
ज्ञान रखने वाला कोई
भी परीक्षार्थी तुरंत समझ सकता है
कि इस प्रश्न का
सही उत्तर “अवसरवादी” है। लेकिन विकल्पों
में “पंडित” शब्द को शामिल
किए जाने पर कुछ
समूहों ने आपत्ति जताई
और देखते ही देखते यह
एक भाषाई प्रश्न से बढ़कर सामाजिक
बहस का विषय बन
गया। यह स्थिति हमें
एक महत्वपूर्ण प्रश्न के सामने खड़ा
करती है, क्या सचमुच
प्रश्न में कोई गंभीर
त्रुटि थी, या फिर
यह विवाद भाषा की गलत
समझ और भावनात्मक प्रतिक्रिया
का परिणाम है?
प्रतियोगी परीक्षाओं की पद्धति को समझना जरूरी
‘पंडित’ शब्द का असली अर्थ क्या है?
आत्मवत्
सर्वभूतेषु,
यः
पश्यति
स
पण्डितः।।”
इसका अर्थ है
कि जो व्यक्ति पराई
स्त्री को माँ के
समान, दूसरे के धन को
मिट्टी के समान तुच्छ
और सभी प्राणियों को
अपने समान समझता है,
वही सच्चा पंडित कहलाता है। यह परिभाषा
बताती है कि भारतीय
चिंतन में “पंडित” केवल
पढ़े-लिखे व्यक्ति के
लिए नहीं बल्कि उच्च
चरित्र, संयम और नैतिक
दृष्टि वाले व्यक्ति के
लिए प्रयोग किया गया है।
ब्राह्मण और पंडितः दो अलग अवधारणाएँ
फिर विवाद क्यों हुआ?
लोकतंत्र में सवाल उठाना भी अधिकार
यह भी उतना ही सच है कि लोकतांत्रिक समाज में किसी भी विषय पर सवाल उठाना नागरिकों का अधिकार है। यदि किसी समूह को किसी शब्द या संदर्भ से आपत्ति महसूस होती है तो वह अपनी बात रख सकता है। लेकिन यह भी उतना ही आवश्यक है कि किसी भी मुद्दे पर प्रतिक्रिया देने से पहले भाषा, संदर्भ और तथ्य को समझा जाए। कई बार भावनात्मक प्रतिक्रिया तथ्यों से आगे निकल जाती है और अनावश्यक विवाद की स्थिति बन जाती है।
भाषा और समाज के बीच संतुलन
यह पूरा विवाद
हमें एक महत्वपूर्ण सीख
भी देता है। भाषा
केवल शब्दों का संग्रह नहीं
होती; वह समाज, संस्कृति
और इतिहास से गहराई से
जुड़ी होती है। इसलिए
परीक्षा संस्थाओं और प्रश्नपत्र तैयार
करने वाली समितियों को
यह ध्यान रखना चाहिए कि
शब्दों का चयन करते
समय भाषाई शुद्धता के साथ-साथ
सामाजिक संवेदनशीलता भी बनी रहे।
वहीं दूसरी ओर समाज को
भी यह समझना होगा
कि किसी शब्द का
अर्थ केवल उसकी वर्तमान
धारणा से नहीं बल्कि
उसके ऐतिहासिक और भाषाई संदर्भ
से भी निर्धारित होता
है।
विवाद से सीखने की जरूरत
यूपी एसआई परीक्षा के इस प्रश्न को लेकर पैदा हुआ विवाद शायद कुछ दिनों में शांत हो जाएगा। लेकिन यह घटना हमें यह सोचने का अवसर जरूर देती है कि हम भाषा को किस तरह समझते हैं और उससे कैसे प्रतिक्रिया देते हैं। क्या हम शब्दों को उनके वास्तविक अर्थ और परंपरा के साथ समझते हैं, या उन्हें केवल अपनी सामाजिक धारणाओं के चश्मे से देखते हैं? संभवतः इस प्रश्न का उत्तर ही इस पूरे विवाद का वास्तविक समाधान भी है। अंततः यह कहा जा सकता है कि “अवसर के अनुसार बदल जाने वाला” व्यक्ति हिंदी में “अवसरवादी” ही कहलाता है और परीक्षा की दृष्टि से यही सही उत्तर है। “पंडित” शब्द का मूल अर्थ विद्वान और विवेकशील व्यक्ति है। यदि इसे केवल जाति के संदर्भ में सीमित करके देखा जाए तो यह भाषा की व्यापक परंपरा को संकुचित कर देता है। इसलिए इस पूरे प्रकरण को एक विवाद के रूप में देखने के बजाय इसे भाषा की समझ और सामाजिक दृष्टि के बीच संतुलन बनाने के अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए। क्योंकि अंततः शब्दों का उद्देश्य समाज को जोड़ना होता है, न कि उसे अनावश्यक विवादों में उलझाना।








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