Sunday, 15 March 2026

पंडित’ पर हंगामा या शब्दों की गलत समझ?

पंडितपर हंगामा या शब्दों की गलत समझ

यूपी एसआई भर्ती परीक्षा के एक प्रश्न ने छेड़ी बहस : भाषा का वास्तविक अर्थ बनाम सामाजिक धारणाएं. क्या सचमुच गलत था सवाल या समझ की कमी ने खड़ा किया विवाद. सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि प्रतियोगी परीक्षाओं में विकल्प ऐसे शब्दों से बनाए जाते हैं जो सही उत्तर से अर्थ की दृष्टि से मेल नहीं खाते, ताकि परीक्षार्थी सही शब्द पहचान सके। प्रश्न थाअवसर के अनुसार बदल जाने वाले के लिए एक शब्द इसका सही उत्तर स्पष्ट रूप सेअवसरवादीहै। इसलिए बाकी विकल्प ऐसे शब्द होते हैं जो उस अर्थ से बिल्कुल अलग हों। यहाँपंडितशब्द का मूल अर्थ विद्वान, ज्ञानी है, जोअवसरवादीके अर्थ से बिल्कुल अलग है। इसलिए इसे एक सामान्य गलत विकल्प (डिस्ट्रैक्टर) के रूप में रखा जा सकता है। जहाँ तक दलित, ठाकुर, बनिया जैसे शब्दों का सवाल है, ये जाति/समुदाय सूचक शब्द हैं, जबकिपंडितशब्द का प्रयोग हिंदी में विद्वान या विशेषज्ञ के अर्थ में भी होता है। प्रतियोगी परीक्षाओं में आम तौर पर ऐसे जाति-सूचक शब्दों को विकल्प के रूप में रखने से बचा जाता है ताकि अनावश्यक सामाजिक विवाद हो। मतलब साफ हैं सही उत्तर अवसरवादी है।पंडितका अर्थ विद्वान होने के कारण इसे एक सामान्य गलत विकल्प के रूप में रखा जा सकता है। जाति/समुदाय सूचक शब्दों को विकल्प में देना आम तौर पर परीक्षा की भाषा में उचित नहीं माना जाता। इसलिए किसी भी प्रश्न को देखने से पहले उसके भाषाई संदर्भ और परीक्षा की पद्धति दोनों को समझना जरूरी होता है… 

सुरेश गांधी

कभी-कभी एक छोटा-सा शब्द भी बड़ा विवाद खड़ा कर देता है। उत्तर प्रदेश पुलिस सब-इंस्पेक्टर भर्ती परीक्षा के हिंदी खंड में पूछे गए एक प्रश्न को लेकर इन दिनों कुछ ऐसा ही दृश्य देखने को मिल रहा है। प्रश्न था, “अवसर के अनुसार बदल जाने वाले के लिए एक शब्द बताइए।इसके विकल्पों में पंडित, अवसरवादी, निष्कपट और सदाचारी दिए गए थे। सामान्य हिंदी ज्ञान रखने वाला कोई भी परीक्षार्थी तुरंत समझ सकता है कि इस प्रश्न का सही उत्तरअवसरवादीहै। लेकिन विकल्पों मेंपंडितशब्द को शामिल किए जाने पर कुछ समूहों ने आपत्ति जताई और देखते ही देखते यह एक भाषाई प्रश्न से बढ़कर सामाजिक बहस का विषय बन गया। यह स्थिति हमें एक महत्वपूर्ण प्रश्न के सामने खड़ा करती है, क्या सचमुच प्रश्न में कोई गंभीर त्रुटि थी, या फिर यह विवाद भाषा की गलत समझ और भावनात्मक प्रतिक्रिया का परिणाम है

प्रतियोगी परीक्षाओं की पद्धति को समझना जरूरी

सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रश्नों की संरचना कैसे होती है। अधिकांश वस्तुनिष्ठ परीक्षाओं में एक प्रश्न के साथ चार विकल्प दिए जाते हैं। इनमें से केवल एक सही उत्तर होता है, जबकि बाकी विकल्पों को डिस्ट्रैक्टर कहा जाता है। इन गलत विकल्पों का उद्देश्य परीक्षार्थी की समझ को परखना होता है। यदि सभी विकल्प लगभग एक जैसे या सही प्रतीत हों, तो परीक्षार्थी के ज्ञान की वास्तविक परीक्षा नहीं हो पाती। इसलिए प्रश्नपत्र तैयार करते समय ऐसे शब्द भी विकल्पों में रखे जाते हैं जो स्पष्ट रूप से उस अर्थ से मेल नहीं खाते। इस संदर्भ में देखा जाए तोअवसर के अनुसार बदल जाने वालाव्यक्ति हिंदी मेंअवसरवादीकहलाता है। बाकी विकल्प :- पंडित, निष्कपट और सदाचारी, उस अर्थ से मेल नहीं खाते। इसलिए परीक्षा की तकनीकी दृष्टि से यह प्रश्न पूरी तरह सही और सामान्य माना जा सकता है।

पंडितशब्द का असली अर्थ क्या है?

विवाद का सबसे बड़ा कारणपंडितशब्द को लेकर बनी धारणा है। भारतीय भाषाई परंपरा मेंपंडितशब्द का मूल अर्थ विद्वान, ज्ञानी या किसी विषय का विशेषज्ञ होता है। संस्कृत, हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य में इस शब्द का प्रयोग लंबे समय से ज्ञान और विवेक के प्रतीक के रूप में होता रहा है। यही कारण है कि कई महान विद्वानों के नाम के साथपंडितउपाधि जुड़ी हुई मिलती है। भारतीय शास्त्रों में भीपंडितशब्द का प्रयोग नैतिकता और विवेक के संदर्भ में हुआ है। एक प्रसिद्ध श्लोक इस बात को स्पष्ट करता है,

मातृवत् परदारेषु, परद्रव्येषु लोष्टवत्।

आत्मवत् सर्वभूतेषु, यः पश्यति पण्डितः।।

इसका अर्थ है कि जो व्यक्ति पराई स्त्री को माँ के समान, दूसरे के धन को मिट्टी के समान तुच्छ और सभी प्राणियों को अपने समान समझता है, वही सच्चा पंडित कहलाता है। यह परिभाषा बताती है कि भारतीय चिंतन मेंपंडितकेवल पढ़े-लिखे व्यक्ति के लिए नहीं बल्कि उच्च चरित्र, संयम और नैतिक दृष्टि वाले व्यक्ति के लिए प्रयोग किया गया है।

ब्राह्मण और पंडितः दो अलग अवधारणाएँ

विवाद का एक कारण यह भी है कि कई लोगपंडितशब्द को सीधे ब्राह्मण जाति से जोड़कर देखते हैं। जबकि भाषाई और सांस्कृतिक दृष्टि से दोनों शब्दों के अर्थ अलग हैं। ब्राह्मण पारंपरिक वर्ण व्यवस्था से जुड़ा एक सामाजिक वर्ग हो सकता है, जबकि पंडित मूलतः विद्वता और ज्ञान का परिचायक है। इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जहाँ किसी व्यक्ति को उसके ज्ञान और विद्वता के कारणपंडितकहा गया, चाहे वह किसी भी सामाजिक पृष्ठभूमि से क्यों हो। इस दृष्टि से देखा जाए तोपंडितशब्द को केवल जाति से जोड़ देना उसकी व्यापक सांस्कृतिक और भाषाई परंपरा को सीमित कर देता है।

फिर विवाद क्यों हुआ?

यह सवाल स्वाभाविक है कि यदि प्रश्न तकनीकी रूप से सही है औरपंडितशब्द का अर्थ विद्वान है, तो फिर विवाद क्यों हुआ। दरअसल आधुनिक समाज में कई शब्द ऐसे हैं जिनका मूल अर्थ कुछ और होता है, लेकिन समय के साथ उनकी सामाजिक धारणाएँ बदल जाती हैं।पंडितशब्द भी कुछ लोगों के लिए अब केवल एक जातिगत पहचान से जुड़ा हुआ प्रतीत होता है। ऐसे में जब यह शब्द किसी अलग संदर्भ में दिखाई देता है तो भावनात्मक प्रतिक्रिया उत्पन्न हो जाती है। दूसरी ओर कुछ राजनीतिक और सामाजिक समूह भी ऐसे मुद्दों को जल्दी से विवाद का रूप दे देते हैं, जिससे बहस और अधिक तीखी हो जाती है।

लोकतंत्र में सवाल उठाना भी अधिकार

यह भी उतना ही सच है कि लोकतांत्रिक समाज में किसी भी विषय पर सवाल उठाना नागरिकों का अधिकार है। यदि किसी समूह को किसी शब्द या संदर्भ से आपत्ति महसूस होती है तो वह अपनी बात रख सकता है। लेकिन यह भी उतना ही आवश्यक है कि किसी भी मुद्दे पर प्रतिक्रिया देने से पहले भाषा, संदर्भ और तथ्य को समझा जाए। कई बार भावनात्मक प्रतिक्रिया तथ्यों से आगे निकल जाती है और अनावश्यक विवाद की स्थिति बन जाती है। 

भाषा और समाज के बीच संतुलन

यह पूरा विवाद हमें एक महत्वपूर्ण सीख भी देता है। भाषा केवल शब्दों का संग्रह नहीं होती; वह समाज, संस्कृति और इतिहास से गहराई से जुड़ी होती है। इसलिए परीक्षा संस्थाओं और प्रश्नपत्र तैयार करने वाली समितियों को यह ध्यान रखना चाहिए कि शब्दों का चयन करते समय भाषाई शुद्धता के साथ-साथ सामाजिक संवेदनशीलता भी बनी रहे। वहीं दूसरी ओर समाज को भी यह समझना होगा कि किसी शब्द का अर्थ केवल उसकी वर्तमान धारणा से नहीं बल्कि उसके ऐतिहासिक और भाषाई संदर्भ से भी निर्धारित होता है।

विवाद से सीखने की जरूरत

यूपी एसआई परीक्षा के इस प्रश्न को लेकर पैदा हुआ विवाद शायद कुछ दिनों में शांत हो जाएगा। लेकिन यह घटना हमें यह सोचने का अवसर जरूर देती है कि हम भाषा को किस तरह समझते हैं और उससे कैसे प्रतिक्रिया देते हैं। क्या हम शब्दों को उनके वास्तविक अर्थ और परंपरा के साथ समझते हैं, या उन्हें केवल अपनी सामाजिक धारणाओं के चश्मे से देखते हैं? संभवतः इस प्रश्न का उत्तर ही इस पूरे विवाद का वास्तविक समाधान भी है। अंततः यह कहा जा सकता है किअवसर के अनुसार बदल जाने वालाव्यक्ति हिंदी मेंअवसरवादीही कहलाता है और परीक्षा की दृष्टि से यही सही उत्तर है।पंडितशब्द का मूल अर्थ विद्वान और विवेकशील व्यक्ति है। यदि इसे केवल जाति के संदर्भ में सीमित करके देखा जाए तो यह भाषा की व्यापक परंपरा को संकुचित कर देता है। इसलिए इस पूरे प्रकरण को एक विवाद के रूप में देखने के बजाय इसे भाषा की समझ और सामाजिक दृष्टि के बीच संतुलन बनाने के अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए। क्योंकि अंततः शब्दों का उद्देश्य समाज को जोड़ना होता है, कि उसे अनावश्यक विवादों में उलझाना।

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