Sunday, 15 March 2026

जब विजय की कामना में श्रीराम ने साधा शक्ति का व्रत

जब विजय की कामना में श्रीराम ने साधा शक्ति का व्रत 

भारतीय संस्कृति में नवरात्र केवल एक पर्व नहीं, बल्कि शक्ति, साधना और आत्मविश्वास का महान उत्सव है। देवी दुर्गा की उपासना के ये नौ दिन मानव को यह संदेश देते हैं कि जीवन के किसी भी संघर्ष में विजय तभी संभव है जब आस्था, तप और आत्मबल का संगम हो। पुराणों और रामायण की परंपरा में एक अद्भुत कथा मिलती है—जब स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने भी युद्ध से पहले शक्ति की आराधना कर विजय का आशीर्वाद मांगा था। कहा जाता है कि लंका विजय से पूर्व श्रीराम द्वारा किया गया यह नवरात्र व्रत ही इस महान पर्व की शुरुआत का आधार बना. नवरात्रि का संदेश स्पष्ट है, देवी बाहर नहीं, हमारे भीतर हैं। हर मनुष्य के भीतर असीम शक्ति, चेतना और संभावनाएं मौजूद हैं। आवश्यकता केवल उन्हें पहचानने और जागृत करने की है। जब व्यक्ति भक्ति, साधना और सकारात्मक विचारों के माध्यम से अपने भीतर की शक्ति को पहचानता है, तब उसका जीवन भी प्रकाश और ऊर्जा से भर उठता है। इसीलिए नवरात्रि केवल देवी की पूजा का पर्व नहीं, बल्कि आत्मशक्ति को पहचानने और जीवन को नई दिशा देने का महापर्व है  

सुरेश गांधी

भारतीय धार्मिक परंपराओं में नवरात्रि को शक्ति की साधना का सर्वोच्च पर्व माना जाता है। इन नौ दिनों में भक्त माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा कर जीवन में शक्ति, समृद्धि और विजय की कामना करते हैं। किंतु कम ही लोग जानते हैं कि इस महान व्रत की शुरुआत एक ऐसी घटना से जुड़ी है, जिसने धर्म, आस्था और भक्ति की परिभाषा को नया आयाम दिया। प्राचीन ग्रंथों और लोकपरंपराओं में वर्णित कथा के अनुसार लंका पर चढ़ाई से पूर्व भगवान श्रीराम ने देवी शक्ति की आराधना कर उनसे विजय का वरदान मांगा था। यह प्रसंग भारतीय धर्मपरंपरा में “आदिशक्ति की उपासना” का अद्भुत उदाहरण माना जाता है। जब श्रीराम अपनी पत्नी सीता की खोज करते हुए किष्किंधा पहुंचे और सुग्रीव से उनकी मित्रता हुई, तब आगे का मार्ग लंका की ओर जाता था। रावण जैसा शक्तिशाली और मायावी शत्रु सामने था। युद्ध से पहले विजय का मार्ग सुनिश्चित करने के लिए देवताओं के संकेत से ब्रह्मा जी ने श्रीराम को आदिशक्ति की आराधना करने की सलाह दी। 

कथा के अनुसार किष्किंधा के समीप स्थित ऋष्यमूक पर्वत पर श्रीराम ने देवी चंडी की उपासना का संकल्प लिया। ब्रह्मा जी ने उन्हें बताया कि प्रतिपदा से लेकर नवमी तिथि तक चंडी देवी का पाठ, पूजन और हवन करने से देवी प्रसन्न होंगी और विजय का आशीर्वाद देंगी। नवरात्रि केवल पूजा का पर्व नहीं, बल्कि जीवन को सकारात्मक दिशा देने का अवसर भी है। देवी दुर्गा के नौ रूप वास्तव में मानव जीवन के नौ गुणों, शक्ति, तपस्या, साहस, ज्ञान, करुणा, संतुलन, निर्भयता, पवित्रता और सिद्धिकृका प्रतीक हैं। जब मनुष्य इन गुणों को अपने जीवन में अपनाता है, तब उसका जीवन भी दिव्यता की ओर अग्रसर हो जाता है। आध्यात्मिक दृष्टि से नवरात्रि को कुंडलिनी शक्ति के जागरण का काल भी माना जाता है। योग दर्शन के अनुसार मानव शरीर में सात प्रमुख चक्र होते हैं, जो ऊर्जा केंद्रों की तरह कार्य करते हैं। जब साधक ध्यान, जप और उपवास के माध्यम से अपने मन और शरीर को शुद्ध करता है, तो यह ऊर्जा धीरे-धीरे जागृत होती है। नवरात्रि के नौ दिन इसी ऊर्जा के क्रमिक जागरण की प्रतीकात्मक यात्रा माने जाते हैं।

108 नील कमलों की अनोखी साधना

ब्रह्मा जी ने यह भी कहा कि पूजा की पूर्णता के लिए देवी को 108 नील कमल अर्पित करना अनिवार्य होगा। नील कमल अत्यंत दुर्लभ माने जाते हैं और उन्हें प्राप्त करना आसान नहीं था। श्रीराम ने अपनी वानर सेना की सहायता से बड़ी कठिनाई से 108 नील कमल एकत्र किए। पूजा की तैयारी पूरी हो गई और प्रतिपदा से नवमी तक श्रीराम ने अत्यंत कठोर व्रत रखते हुए चंडी पाठ और देवी की उपासना की। कहा जाता है कि इन नौ दिनों तक उन्होंने अन्न और जल का भी त्याग कर दिया और पूर्ण एकाग्रता से देवी की आराधना की। यह तपस्या केवल विजय की कामना नहीं थी, बल्कि धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश का संकल्प भी थी।

रावण की मायावी चाल

जब रावण को यह ज्ञात हुआ कि श्रीराम देवी चंडी की पूजा कर रहे हैं और देवी से विजय का आशीर्वाद प्राप्त करने वाले हैं, तो उसने अपनी मायावी शक्ति से पूजा में विघ्न डालने का प्रयास किया। उसने 108 नील कमलों में से एक कमल अदृश्य कर दिया। नवमी के दिन जब पूजा पूर्ण होने को आई और श्रीराम देवी को कमल अर्पित करने लगे, तो उन्होंने देखा कि कमलों की संख्या एक कम है। पूजा की पूर्णता के लिए 108 कमलों का अर्पण अनिवार्य था। यह देखकर श्रीराम कुछ क्षणों के लिए चिंतित हुए, क्योंकि पूजा अधूरी रह जाने का अर्थ था देवी की कृपा से वंचित रह जाना।

जब कमल की जगह अर्पित करने चले अपना नयन

श्रीराम को “कमलनयन” कहा जाता है, अर्थात जिनकी आंखें कमल के समान सुंदर हैं। उसी क्षण उन्हें स्मरण हुआ कि लोग उन्हें कमलनयन कहते हैं, इसलिए यदि एक कमल कम है तो वे अपना एक नेत्र ही देवी को अर्पित कर देंगे। यह भक्ति और समर्पण की चरम सीमा थी। उन्होंने अपना तीर उठाया और देवी को अर्पित करने के लिए अपनी आंख निकालने का संकल्प लिया। जैसे ही वे अपने नयन को अर्पित करने वाले थे, उसी क्षण देवी चंडी प्रकट हो गईं।

देवी की कृपा और विजय का आशीर्वाद

माता चंडी श्रीराम की इस अद्वितीय भक्ति और त्याग से अत्यंत प्रसन्न हुईं। उन्होंने प्रकट होकर श्रीराम को रोक लिया और कहा कि ऐसी अद्भुत श्रद्धा और समर्पण से वे अत्यंत प्रसन्न हैं। देवी ने श्रीराम को आशीर्वाद दिया कि वे रावण पर अवश्य विजय प्राप्त करेंगे और धर्म की स्थापना करेंगे.

चैत्र नवरात्र और शक्ति साधना

नवसंवत्सर के साथ ही चैत्र नवरात्र का आरंभ भी होता है। यह नौ दिनों का पर्व आदिशक्ति मां दुर्गा की उपासना के लिए समर्पित होता है। इन नौ दिनों में देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है। भक्त व्रत, साधना और ध्यान के माध्यम से शक्ति की आराधना करते हैं। नवरात्र का यह पर्व हमें यह भी सिखाता है कि जीवन में शक्ति और संतुलन दोनों आवश्यक हैं। यह क्रम केवल पूजा की परंपरा नहीं, बल्कि मानव चेतना के विकास की प्रतीकात्मक यात्रा माना जाता है।

पहला दिन : मां शैलपुत्री : स्थिरता और शक्ति का प्रतीक

नवरात्रि का पहला दिन मां शैलपुत्री को समर्पित होता है।शैलका अर्थ है पर्वत औरपुत्रीका अर्थ है बेटी। अर्थात पर्वतराज हिमालय की पुत्री। पौराणिक कथा के अनुसार पिछले जन्म में देवी सती थीं। जब उनके पिता दक्ष ने भगवान शिव का अपमान किया, तो सती ने यज्ञ अग्नि में देह त्याग दी। अगले जन्म में वे हिमालय के घर पार्वती के रूप में जन्मीं, यही रूप शैलपुत्री कहलाता है। मां शैलपुत्री को साहस, स्थिरता और आरंभ की शक्ति का प्रतीक माना जाता है। वे वृषभ पर सवार रहती हैं और उनके हाथों में त्रिशूल और कमल होता है।

दूसरा दिन : मां ब्रह्मचारिणी : तपस्या और संयम की देवी  

दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। यह देवी का तपस्विनी स्वरूप है। कथा के अनुसार पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए हजारों वर्षों तक कठोर तप किया था। इसी तपस्या के कारण उन्हें ब्रह्मचारिणी कहा गया। उनके हाथ में जपमाला और कमंडल होता है, जो साधना और संयम का प्रतीक है। इस दिन की पूजा से व्यक्ति को धैर्य, अनुशासन और आत्मबल की प्राप्ति होती है।

तीसरा दिन : मां चंद्रघंटा : साहस और युद्ध शक्ति की देवी

तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की आराधना की जाती है। उनके मस्तक पर अर्धचंद्र के आकार की घंटी होती है, इसलिए उन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। देवी का यह रूप अत्यंत वीर और उग्र माना जाता है। कहा जाता है कि जब दुष्ट शक्तियों ने पृथ्वी पर अत्याचार बढ़ाया, तब देवी ने इसी रूप में उनका संहार किया। उनके दस हाथों में विभिन्न अस्त्र-शस्त्र होते हैं और वे सिंह पर सवार रहती हैं। उनकी पूजा से भय, संकट और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा होती है।

चौथा दिन : मां कूष्मांडा : सृष्टि की रचयिता

नवरात्रि का चौथा दिन मां कूष्मांडा को समर्पित होता है। धार्मिक मान्यता है कि जब सृष्टि में चारों ओर अंधकार था, तब देवी ने अपनी दिव्य मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की थी। इसी कारण उन्हें सृष्टि की आदिशक्ति कहा जाता है। कहा जाता है कि वे सूर्य मंडल में निवास करती हैं और उनका तेज सूर्य के समान है। उनकी पूजा से ऊर्जा, स्वास्थ्य और सकारात्मक शक्ति प्राप्त होती है।

पांचवां दिन : मां स्कंदमाता : मातृत्व और करुणा की देवी

पांचवें दिन मां स्कंदमाता की पूजा होती है। वे भगवान कार्तिकेय (स्कंद) की माता हैं। देवी का यह स्वरूप मातृत्व, करुणा और संरक्षण का प्रतीक माना जाता है। वे सिंह पर सवार रहती हैं और अपनी गोद में बाल स्कंद को धारण करती हैं। उनकी पूजा से संतान सुख, परिवार में शांति और समृद्धि प्राप्त होने की मान्यता है।

छठा दिन : मां कात्यायनी : विजय और पराक्रम की देवी

नवरात्रि के छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा की जाती है। पौराणिक कथा के अनुसार महर्षि कात्यायन की तपस्या से प्रसन्न होकर देवी ने उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लिया। इसी कारण उनका नाम कात्यायनी पड़ा।देवी ने इसी रूप में महिषासुर नामक राक्षस का वध किया था।  इस दिन की पूजा से व्यक्ति में साहस, आत्मविश्वास और संघर्ष की शक्ति बढ़ती है।

सातवां दिन : मां कालरात्रि : भय का विनाश करने वाली शक्ति

सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा की जाती है। यह देवी का सबसे उग्र रूप माना जाता है। उनका वर्ण काला, केश बिखरे हुए और आंखों से अग्नि निकलती हुई बताई गई है। हालांकि उनका स्वरूप भयानक है, लेकिन वे भक्तों के लिए अत्यंत कल्याणकारी मानी जाती हैं। उनकी आराधना से भय, संकट और नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है।

आठवां दिन : मां महागौरी : शांति और सौभाग्य का प्रतीक

नवरात्रि का आठवां दिन मां महागौरी को समर्पित है। कथा के अनुसार कठोर तपस्या के कारण पार्वती का शरीर काला पड़ गया था, लेकिन भगवान शिव ने गंगाजल से उनका अभिषेक किया, जिससे उनका रंग अत्यंत गौर हो गया। इसी कारण उन्हें महागौरी कहा गया। उनकी पूजा से सुख, शांति, सौभाग्य और समृद्धि प्राप्त होती है।

नौवां दिन : मां सिद्धिदात्री : सिद्धि और ज्ञान की देवी

नवरात्रि का अंतिम दिन मां सिद्धिदात्री को समर्पित होता है। यह देवी सभी प्रकार की सिद्धियों और आध्यात्मिक शक्तियों को प्रदान करने वाली मानी जाती हैं। धार्मिक मान्यता है कि भगवान शिव ने भी उनकी आराधना करके अनेक दिव्य शक्तियां प्राप्त की थीं। उनकी पूजा से ज्ञान, सफलता और आध्यात्मिक उन्नति का आशीर्वाद मिलता है।

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