पहली निशा में बनी सुर, ताल और नृत्य की त्रिवेणी, जागी भक्ति की अलौकिक ज्योति
विधा लाल की थिरकन और मालिनी अवस्थी के सुरों से झंकृत हनुमत दरबार
‘चित्रकूट’ नृत्य-नाटिका
से
आरंभ,
संतूर
से
कथक
और
ठुमरी
तक
भक्ति-संगीत
की
अविरल
धारा,
पूरी
रात
गूंजता
रहा
जय
श्रीराम-जय
हनुमान
सुरेश गांधी
वाराणसी। चैत्र पूर्णिमा की पावन रात्रि में संकट मोचन मंदिर का मुक्ताकाशी मंच एक बार फिर भक्ति, संगीत और नृत्य की अद्भुत त्रिवेणी में डूबा नजर आया। संकट मोचन संगीत समारोह की पहली निशा में कलाकारों की साधना और श्रोताओं की आस्था ने ऐसा वातावरण रचा, जहां हर स्वर भगवान हनुमान के चरणों में अर्पित होता प्रतीत हुआ। कार्यक्रम का शुभारंभ रूपवाणी संस्था की ‘चित्रकूट’ नृत्य-नाटिका से हुआ। व्योमेश शुक्ल के निर्देशन में रामकथा के विविध प्रसंगों को जिस सजीवता से मंचित किया गया, उसने दर्शकों को भाव-विभोर कर दिया। कलाकारों का सधा हुआ तालमेल, प्रभावी अभिनय और संगीत की गूंज ने पूरी प्रस्तुति को नयनाभिराम बना दिया।
इसके बाद संतूर
वादन में पंडित राहुल
शर्मा ने राग गोरख
कल्याण की गहराई को
सुरों में पिरोया। आलाप,
जोड़ और झाला के
क्रम में उन्होंने रूपक
और तीनताल की लयकारी से
श्रोताओं को साधना के
उस लोक में पहुंचाया,
जहां संगीत केवल श्रवण नहीं,
अनुभव बन जाता है।
तबले पर पंडित रामकुमार
मिश्र की संगत ने
इस प्रस्तुति को और सशक्त
बनाया।
विधा लाल की कथक साधना ने जगाई आध्यात्मिक चेतना
जयपुर घराने की प्रसिद्ध कथक
नृत्यांगना विधा लाल जब
मंच पर उतरीं, तो
घुंघरुओं की छम-छम
ने वातावरण को साधना की
लय से भर दिया।
शिव स्तुति ‘शंभू शिव शंभू’
से आरंभ हुई उनकी
प्रस्तुति में परंपरागत त्रिताल
की बंदिशों, तेज चक्करों और
प्रभावशाली फुटवर्क ने दर्शकों को
मंत्रमुग्ध कर दिया। उनके
पगों की थिरकन कभी
तबले की थाप के
साथ एकाकार होती दिखी, तो
कभी उस पर प्रभावी
हो उठी। हनुमान स्तोत्र
पर आधारित उनके भावाभिनय में
भक्ति और शक्ति का
अद्भुत संगम दिखाई दिया।
एक-एक मुद्रा में
गुरु परंपरा की छाप स्पष्ट
झलकती रही। उनकी प्रस्तुति
ने यह सिद्ध कर
दिया कि कथक केवल
नृत्य नहीं, बल्कि आत्मा की साधना है।
इसके बाद बांसुरी और
वायलिन की जुगलबंदी में
एस. आकाश और यद्नेश
रायकर ने राग हंसध्वनि
की मधुरता से श्रोताओं को
सराबोर कर दिया। तबले
पर ईशान घोष और
घटम पर गिरधर उडप्पा
की संगत ने प्रस्तुति
को और भी जीवंत
बना दिया।
मालिनी अवस्थी के सुरों में बही बनारस की मिट्टी की महक
रात्रि के अगले चरण
में मंच संभाला बनारस
की सुप्रसिद्ध लोकगायिका मालिनी अवस्थी ने। उनकी आवाज
में जैसे ही ठुमरी
की पहली बंदिश गूंजी,
पूरा परिसर सुरों की मधुरता में
डूब गया। दादरा और
चैती की श्रृंखला ने
श्रोताओं को बनारस की
लोक-संस्कृति से जोड़ दिया।
उनके गायन की सबसे
बड़ी विशेषता रही भावों की
विविधता, कभी विरह की
पीड़ा, तो कभी श्रृंगार
की कोमलता। हर रचना में
एक अलग रस का
संचार हुआ। पंडित शुभ
महाराज, संवादिनी पर धर्मनाथ मिश्र
और सारंगी पर विनायक सहाय
की संगत ने प्रस्तुति
को ऊंचाई प्रदान की। मालिनी अवस्थी
के सुरों में बनारस की
मिट्टी की खुशबू और
लोकजीवन की आत्मा झलकती
रही, जिसने श्रोताओं को देर तक
बांधे रखा। इसके उपरांत
दिल्ली से आए राहुल
मिश्रा ने तबले पर
एकल वादन प्रस्तुत कर
लयकारी की उत्कृष्टता दिखाई।
वहीं पंडित हरविंदर शर्मा ने सितार पर
राग अहीर भैरव की
प्रस्तुति से रात्रि को
आध्यात्मिक गहराई प्रदान की।
समापन की ओर बढ़ते
हुए कोलकाता की शिखा भट्टाचार्य
ने कथक की भावपूर्ण
प्रस्तुति दी, जिसमें राम
भजन और अष्टमंगल ताल
की जटिलता ने दर्शकों को
एक बार फिर मंत्रमुग्ध
कर दिया। इस प्रकार, संकट
मोचन संगीत समारोह की पहली निशा
ने यह स्पष्ट कर
दिया कि काशी में
कला केवल प्रदर्शन नहीं,
बल्कि भक्ति का माध्यम है,
जहां विधा लाल के
घुंघरू और मालिनी अवस्थी
के सुर मिलकर ऐसी
साधना रचते हैं, जो
सीधे हृदय तक पहुंचती
है। इस समारोह ने
यह संकेत दे दिया कि
आने वाली रातें भी
इसी तरह भक्ति, कला
और साधना के अद्भुत संगम
की साक्षी बनेंगी, जहां हर स्वर,
हर ताल और हर
भाव सीधे हनुमान जी
के चरणों में अर्पित होता
है।



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