Monday, 6 April 2026

घुंघरुओं की हर थिरकन में साधना, हर चक्कर में शिव का स्मरण : विधा लाल

घुंघरुओं की हर थिरकन में साधना, हर चक्कर में शिव का स्मरण : विधा लाल 

संकट मोचन संगीत समारोह के पावन मंच पर जब जयपुर घराने की प्रख्यात कथक नृत्यांगना विधा लाल ने अपनी पहली प्रस्तुति दी, तो घुंघरुओं की गूंज केवल संगीत नहीं रही, बल्कि भक्ति और साधना का जीवंत स्वरूप बन गई। गिनीज बुक में एक मिनट में 103 चक्कर लगाने का विश्व रिकॉर्ड दर्ज कराने वाली इस कलाकार ने केवल अपनी तकनीकी दक्षता का प्रदर्शन किया, बल्कि भाव और आध्यात्मिकता का ऐसा समागम रचा कि हनुमत दरबार भाव-विभोर हो उठा। उनकी इस शानदार प्रस्तुति के बाद सीनियर रिपोर्टर सुरेश गांधी से विशेष बातचीत में विधा लाल ने साधना, गुरु-भक्ति, परंपरा और मंच का अनुभव साझा किया. उन्होंने स्पष्ट कहा कि कथक जैसी शास्त्रीय विधा को ऑनलाइन माध्यमों से पूरी तरह नहीं सीखा जा सकता। गुरु के सान्निध्य में ही इस कला की वास्तविक बारीकियां आत्मसात होती हैं। छह वर्ष की आयु से शुरू हुई उनकी साधना आज 56 देशों तक पहुंच चुकी है, लेकिन उनके लिए नृत्य अब भी आत्मिक अनुभूति और ईश्वर से संवाद का माध्यम है। कला, अनुशासन और गुरु-भक्ति के इस समन्वय ने विधा लाल को केवल एक कलाकार नहीं, बल्कि परंपरा की जीवंत वाहक बना दिया है

सुरेश गांधी

घुंघरुओं की मृदुल ध्वनि जब साधना का रूप ले लेती है, तब वह केवल नृत्य नहीं रहती, वह तपस्या बन जाती है। संकट मोचन संगीत समारोह के पावन मंच पर जब मशहूर कथक नृत्यांगना विधा लाल ने अपनी पहली हाजिरी दी, तो यह केवल एक प्रस्तुति नहीं, बल्कि वर्षों की साधना, गुरु-भक्ति और भारतीय संस्कृति के जीवंत प्रवाह का साक्षात् अनुभव था। उनके पगों की थिरकन में जहां लय का अनुशासन था, वहीं भावों में आध्यात्मिक ऊंचाई। इसी आध्यात्मिक वातावरण में जयपुर घराने की सुप्रसिद्ध इस कथक नृत्यांगना ने सीनियर रिपोर्टर सुरेश गांधी से विशेष बातचीत में कथक, गुरु-शिष्य परंपरा, आधुनिकता और अपने जीवन के विविध आयामों पर चर्चा की शुरु की तो गुरु-परंपरा, आधुनिकता और आत्मानुभूति के अनेक आयाम खुलते चले गए। वह स्पष्ट शब्दों में कहती हैं, आज के समय में इंटरनेट और यूट्यूब के माध्यम से बहुत कुछ सीखा जा सकता है, लेकिन कथक जैसी शास्त्रीय कला की बारीकियां वहां से नहीं मिलतीं। गुरु के चरण छुए बिना, उनके सान्निध्य में बैठे बिना, इस कला का वास्तविक ज्ञान अधूरा ही रहता है। उनका मानना है कि तकनीक केवल बाहरी रूप दिखा सकती है, लेकिनरस’, ‘भावऔरआंतरिक संवादकेवल गुरु ही सिखा सकते हैं। उनका कती है, गुरु आपको केवल स्टेप्स नहीं सिखाते, वे आपको उस भाव तक ले जाते हैं, जहां नृत्य आत्मा से जुड़ता है, प्रस्तुत है उनसे बातचीत के कुछ प्रमुख अंश :- 

सुरेश गांधी : संकट मोचन के इस आध्यात्मिक मंच पर प्रस्तुति का अनुभव आपके लिए कितना विशेष रहा?  

विधा लाल : यह मंच मेरे लिए केवल प्रस्तुति का स्थल नहीं, बल्कि साधना का मंदिर है। यहां नृत्य करना ऐसा है मानो मैं अपने भीतर के भावों को सीधे ईश्वर के समक्ष अर्पित कर रही हूं। जब मैंनेशंभू शिव शंभूसे आरंभ किया, तो लगा जैसे हर थिरकन, हर चक्कर किसी अदृश्य शक्ति से जुड़ रहा है। यह अनुभव शब्दों में नहीं, केवल अनुभूति में ही व्यक्त होता है।

प्रश्न : आज के डिजिटल युग में ऑनलाइन माध्यमों से कथक सीखने का चलन बढ़ा है, आप इसे कैसे देखती हैं?

उत्तर : तकनीक एक माध्यम हो सकती है, लेकिन वह गुरु का स्थान कभी नहीं ले सकती। कथक की बारीकियां, उसकी लय, उसकी आत्मा, उसका भाव, ये सब केवल गुरु के सान्निध्य में ही सीखे जा सकते हैं। गुरु के चरण स्पर्श किए बिना, उनके साक्षात् मार्गदर्शन के बिना यह कला अधूरी ही रहती है। इंटरनेट आपको रूप दिखा सकता है, लेकिन रस नहीं दे सकता।

प्रश्न : आपकी नृत्य-यात्रा की शुरुआत कैसे हुई?

उत्तर : मैंने छह वर्ष की आयु में नृत्य सीखना शुरू किया। मेरे परिवार में यह परंपरा नहीं थी, लेकिन मेरे भीतर एक स्वाभाविक आकर्षण था। मेरे पिता उमेश जोशी पत्रकार रहे हैं, पर ससुराल पक्ष शास्त्रीय कला से जुड़ा हुआ है। मैंने अपनी गुरु गीतांजलि लाल से निरंतर शिक्षा ली, विवाह से पहले भी और बाद में भी।

प्रश्न : गुरु-शिष्य परंपरा आपके लिए क्या मायने रखती है?

उत्तर : गुरु केवल तकनीक नहीं सिखाते, वे जीवन की दिशा देते हैं। मेरी साधना में मेरी गुरु सितारा देवी की परंपरा का गहरा प्रभाव है। उन्होंने हमें सिखाया कि नृत्य को केवल करना नहीं, उसे जीना है।

प्रश्न : आप 56 से अधिक देशों में प्रस्तुति दे चुकी हैं, विदेशों में भारतीय नृत्य के प्रति कैसा आकर्षण देखा?

उत्तर : विदेशों में भारतीय शास्त्रीय नृत्य के प्रति गहरा सम्मान है। लोग हमारे पास आकर कहते हैं कि उन्हें घुंघरू चाहिए, वे इस परंपरा को अपनाना चाहते हैं। हमारे नृत्य की भाव-भंगिमा, वेशभूषा और आध्यात्मिकता उन्हें बहुत आकर्षित करती है।

प्रश्न : गिनीज बुक में दर्ज आपके रिकॉर्ड को आप कैसे देखती हैं?

उत्तर : वह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, लेकिन मेरे लिए वह अंत नहीं है। 103 चक्कर एक प्रतीक हैं, असली साधना तो निरंतर रियाज में है। आज भी मैं घंटों अभ्यास करती हूं, क्योंकि कला में ठहराव नहीं होना चाहिए।

प्रश्न : जयपुर घराने की विशेषताओं को आप कैसे परिभाषित करेंगी?

उत्तर : जयपुर घराना शक्ति, लय और जटिलता का संगम है। इसमें चक्कर, परन, उठान और ठाट की अद्भुत संरचना होती है। यह परंपरा भानुजी महाराज से शुरू होकर पंडित दुर्गालाल और सुंदर प्रसाद जैसे गुरुओं से समृद्ध हुई है। यहां भाव की सात्विकता और ताल की गहराई दोनों का संतुलन है।

प्रश्न : क्या कथक में प्रयोग की गुंजाइश है?

उत्तर : निश्चित रूप से। मैं हमेशा नए प्रयोग करती हूं, लेकिन यह ध्यान रखती हूं कि मूल परंपरा अक्षुण्ण रहे। आधुनिकता और परंपरा का संतुलन ही कथक को जीवंत बनाए रखता है।

प्रश्न : नृत्य आपके लिए क्या है, कला, पेशा या कुछ और?

उत्तर : मेरे लिए नृत्य एक आध्यात्मिक अनुभव है। जब मैं नृत्य करती हूं, तो ऐसा लगता है जैसे मैं अपने भीतर के ईश्वर से संवाद कर रही हूं। यही अनुभूति मुझे निरंतर साधना के लिए प्रेरित करती है।

प्रश्न : परिवार और कला के बीच संतुलन कैसे बना पाती हैं?

उत्तर : मुझे अपने परिवार का पूरा सहयोग मिला है। यही कारण है कि मैं दोनों को संतुलित कर पाई हूं। मेरा बेटा भी इस परंपरा में रुचि ले रहा है, यह मेरे लिए सबसे बड़ी खुशी है।

प्रश्न : रियलिटी शो और नई पीढ़ी को लेकर आपका क्या दृष्टिकोण है?

उत्तर : रियलिटी शो मंच देते हैं, लेकिन कला की गहराई वहां नहीं मिलती। युवा पीढ़ी को धैर्य और साधना के साथ आगे बढ़ना चाहिए। कथक में भविष्य उज्ज्वल है, बस उसे सही दिशा देने की जरूरत है।

प्रश्न : काशी और हनुमत दरबार से आपका जुड़ाव कैसा रहा?

उत्तर : मैं 2014-15 में पहली बार काशी आई थी, तभी से इस शहर ने मुझे अपनी ओर खींच लिया। यहां प्रस्तुति देना मेरी पुरानी इच्छा थी, जो आज पूरी हुई। हनुमत दरबार में नृत्य करना मेरे लिए सौभाग्य और आशीर्वाद है। यह मंच मेरे लिए केवल प्रदर्शन का स्थान नहीं, बल्कि साधना का धाम है। यहां नृत्य करना किसी मंदिर में पूजा करने जैसा है। जबशंभू शिव शंभूपर मैंने शुरुआत की, तो लगा जैसे हर थिरकन सीधे भगवान तक पहुंच रही है।

प्रश्न : आपकी प्रस्तुति में शास्त्रीयता के साथ भाव की गहराई भी दिखी, इसका रहस्य?

उत्तर : कथक केवल तकनीक नहीं है, यह भाव और भक्ति का संगम है। मेरे लिए हर मुद्रा एक प्रार्थना है। अगर मन में श्रद्धा हो, तो वह दर्शकों तक स्वतः पहुंच जाती है।

प्रश्नः आप विदुषी सितारा देवी की शिष्या रही हैं, उनकी शिक्षा ने आपको कैसे गढ़ा?

उत्तर : गुरुजी ने हमें सिखाया कि मंच पर जाना मतलब आत्मा को खोल देना। उन्होंने हमेशा कहा, “नृत्य करो, लेकिन पहले उसे जियो।आज जो भी मैं हूं, उनकी ही देन है। इस मंच पर अपनी प्रस्तुति मैंने उन्हें समर्पित की।

प्रश्न : गिनीज बुक में नाम दर्ज होने के बाद जिम्मेदारी बढ़ी है?

उत्तर : बिल्कुल, यह सम्मान जितना बड़ा है, उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी भी है। अब हर प्रस्तुति में खुद को और बेहतर करना होता है। लेकिन मैं इसे दबाव नहीं, प्रेरणा मानती हूं।

प्रश्नः तीन-तीन तबलों की संगत में आपकी थिरकन का तालमेल अद्भुत था, इसकी तैयारी कैसे होती है?

उत्तर : इसके लिए रियाज ही एकमात्र रास्ता है। घंटों तक ताल और लय पर काम करना पड़ता है। जब अभ्यास गहरा हो जाता है, तो मंच पर ताल अपने आप साथ चलने लगती है।

प्रश्न : काशी और यहां के दर्शकों को आप कैसे देखती हैं?

उत्तर : काशी के दर्शक बेहद संवेदनशील और जानकार हैं। यहां लोग केवल देखते नहीं, महसूस करते हैं। यही कारण है कि यहां प्रस्तुति देना हर कलाकार का सपना होता है।

प्रश्नः युवा कलाकारों के लिए आपका संदेश?

उत्तर : शॉर्टकट से कला नहीं सीखी जा सकती। धैर्य, अनुशासन और गुरु के प्रति समर्पण ही सफलता का मार्ग है। जितना समय साधना को देंगे, उतना ही कला आपको वापस देगी।

फिरहाल, संकट मोचन की इस रात्रि में विधा लाल के शब्द और उनके घुंघरुओं की अनुगूंज एक ही संदेश देती है, कला केवल प्रदर्शन नहीं, साधना है; और साधना का पथ गुरु के चरणों से होकर ही गुजरता है। उनकी वाणी में विनम्रता है, अनुभूति में गहराई, और हर उत्तर में वह अनवरत यात्रा, जो कथक को केवल नृत्य नहीं, बल्कि आत्मा का उत्सव बना देती है। विधा लाल की बातों में जितनी विनम्रता, उतनी ही गहराई भी झलकती है। उनके घुंघरुओं की गूंज केवल मंच तक सीमित नहीं, बल्कि साधना और समर्पण की वह कहानी है जो हर कलाकार को प्रेरित करती है।

छह वर्ष की आयु से साधना की शुरुआत

विधा लाल का कथक से रिश्ता किसी विरासत में नहीं मिला, बल्कि यह उनकी स्वयं की अर्जित साधना है। उनके पिता उमेश जोशी एक पत्रकार रहे हैं, जबकि ससुराल पक्ष भारतीय शास्त्रीय संगीत और नृत्य से जुड़ा हुआ है। वह बताती हैं, “मैंने छह साल की उम्र से नृत्य सीखना शुरू किया। तब शायद यह केवल एक रुचि थी, लेकिन धीरे-धीरे यह मेरी पहचान बनती गई।उन्होंने अपनी गुरु गीतांजलि लाल से विवाह से पहले भी और विवाह के बाद भी निरंतर प्रशिक्षण लिया। यह निरंतरता ही उनके नृत्य की गहराई का आधार बनी।

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