Monday, 6 April 2026

तुलसी चरण धूलि से महका संकट मोचन, राम-रस और राग में डूबा काशी का हृदय

तुलसी चरण धूलि से महका संकट मोचन, राम-रस और राग में डूबा काशी का हृदय

तुलसी-निराला के पदों से आरंभ, संतूर-कथक और जुगलबंदी ने रची सुरों की अनुपम साधना

भाव-विभोर हुए दर्शक, हर पहर उतरी भक्ति की चतुर्दिक चेतना, भक्ति की बही अविरल धारा

चित्रकूटनृत्य-नाटिका में जीवंत हुए राम प्रसंग, 108 नीलकमलों ने बांधा भाव का शिखर

संतूर, कथक और चित्रकला ने रचा भक्ति-साधना का बहुरंगी उत्सव

रात भर जागता रहा हनुमत दरबार, भाव-विभोर रही काशी

सुरेश गांधी 

वाराणसी. संकट मोचन मंदिर परिसर में सोमवार की संध्या एक ऐतिहासिक सांस्कृतिक क्षण की साक्षी बनी, जब पहली बार गोस्वामी तुलसीदास और सूर्यकांत त्रिपाठीनिरालाके पदों पर नृत्य और अभिनय का अद्भुत संगम हनुमत दरबार में साकार हुआ। मंदिर परिसर में श्रीराम वंदना उतरी, तो मानो काशी का कण-कण राममय हो उठा। हनुमत दरबार में सजी यह संध्या भक्ति, संगीत और नृत्य की त्रिवेणी बनकर प्रवाहित होती रही। 103वें संकट मोचन संगीत समारोह की यह शुरुआत केवल आयोजन नहीं, बल्कि काशी की जीवंत परंपरा, रामभक्ति और शास्त्रीय साधना का अद्वितीय समागम बन गई।

प्रथम प्रस्तुतिचित्रकूटनृत्य-नाटिका के रूप में मंचित हुई, जिसमें बनारस की रामलीला परंपरा और शास्त्रीय संगीत की गूंज स्पष्ट सुनाई दी। रंगकर्मी व्योमेश शुक्ल के निर्देशन में मात्र 45 मिनट में अयोध्या से मिथिला, सीता स्वयंवर, वनगमन, सीता हरण, जटायु संग्राम और रावण युद्ध जैसे चार प्रमुख अध्यायों को कलाकारों ने रामकथा के विविध प्रसंगों को जिस भाव-संवेदना के साथ मंचित किया, उसने दर्शकों को भावलोक में विचरण करने को विवश कर दिया। 

निराला की अमर रचनाराम की शक्ति पूजापर आधारित वह दृश्य, जब भगवान राम मां दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए 108 नीलकमल अर्पित करते हैं, पूरे वातावरण को भाव-विभोर कर गया। अंतिम कमल के अदृश्य होने पर जब राम अपने नेत्र को ही अर्पित करने को उद्यत होते हैं, उसी क्षण देवी दुर्गा का प्रकट होकर उन्हें रोकना, यह प्रसंग दर्शकों के हृदय को छू गया। हनुमत दरबारजय श्रीरामऔरजय हनुमानके उद्घोष से गूंज उठा।

सात कलाकारों ने 11 पात्रों को साकार करते हुए मंच पर जीवंतता का ऐसा संसार रचा कि दर्शक कथा का हिस्सा बन गए। राम की भूमिका में स्वाति, सीता और दुर्गा के रूप में नंदिनी, जटायु-हनुमान-लक्ष्मण के रूप में तापस, रावण के रूप में विशाल तथा मारीच जैसे पात्रों में आकाश और शाश्वत ने प्रभावशाली अभिनय किया। उस्ताद बिस्मिल्लाह खां युवा पुरस्कार से सम्मानित स्वाति की प्रस्तुति विशेष रूप से सराही गई। जेपी शर्मा और आशीष मिश्र के संगीत संयोजन तथा स्वर्गीय डॉ. शकुंतला शुक्ल की परिकल्पना ने इस नाट्य प्रस्तुति को संवेदनात्मक ऊंचाई प्रदान की। लगभग 15 दिनों के कठोर अभ्यास का परिणाम मंच पर हर भाव, हर मुद्रा में स्पष्ट झलकता रहा। तुलसीकृत गणेश वंदना से प्रारंभ यह प्रस्तुति जयंत नेत्र भंग से लेकर वनगमन, सीता-राम मिलन और रावण वध तक के प्रसंगों से गुजरती हुई अपने चरम पर पहुंची।

दूसरी प्रस्तुति में संतूर और तबले की जुगलबंदी ने श्रोताओं को सुरों की अलौकिक यात्रा पर ले जाया। मुंबई से आए पंडित शिवकुमार शर्मा के पुत्र राहुल शर्मा ने संतूर पर और पंडित छन्नूलाल मिश्र के पुत्र पंडित राम कुमार मिश्र ने तबले पर राग गोरख कल्याण का आलाप, जोड़ और झाला प्रस्तुत किया। इसके बाद पहाड़ी धुन में कश्मीरी रंग लिए वादन ने ऐसा आभास कराया मानो श्रोता हिमालय की वादियों में विचरण कर रहे हों। धीमी शुरुआत के बाद सुरों की गति तेज होती गई और अंत में संगीत की धारा मानो कल-कल करती पहाड़ी नदी बनकर बहने लगी। विशाल एलईडी स्क्रीन के समक्ष बैठे दर्शक कभी कलाकारों के अलौकिक श्रृंगार में खो जाते, तो कभी मानस के भावों में डूब जाते। जैसे-जैसे कथा आगे बढ़ती गई, वैसे-वैसे दर्शकों के मनोभाव भी विस्तार लेते गए। खुले परिसर में बैठे विद्यार्थी कलाकारों की मुद्राओं और नृत्यशैली को गहनता से आत्मसात करते नजर आए।

तीसरी प्रस्तुति में दिल्ली से आईं जयपुर घराने की प्रसिद्ध कथक नृत्यांगना विधा लाल ने अपने पग-घुंघरुओं की छमछम से हनुमत दरबार को गुंजायमान कर दिया। उनकी पदचाप, चक्कर और भावाभिनय में गुरु परंपरा की गूंज स्पष्ट सुनाई दी।शंभू शिव शंभू स्वयंभू...’ की शिव स्तुति पर आधारित उनकी प्रस्तुति में शास्त्रीयता और भाव का अद्भुत संतुलन देखने को मिला। उनकी हर गति एवं अद्भुत प्रस्तुति दर्शकों के लिए कौतूहल और आकर्षण का केंद्र बनी रही। गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्डधारी इस नृत्यांगना के पगों की थिरकन कभी तीन-तीन तबलों की थाप से सामंजस्य बिठाती दिखी, तो कभी उस पर प्रभावी हो उठी, और हनुमत दरबार को साधना स्थल में परिवर्तित कर दिया। विदुषी सितारा देवी की शिष्या विधा लाल ने तीनताल में पारंपरिक कथक की प्रस्तुति देते हुए अपने नृत्य को गुरु को समर्पित किया। तबले पर पंडित उदय शंकर मिश्र, संवादिनी पर मोहित साहनी, सितार पर सिद्धांत चक्रवर्ती और सारंगी पर अंकित मिश्र की संगत ने प्रस्तुति को और भी समृद्ध बनाया। मध्यरात्रि में संकट मोचन हनुमान की सायं आरती के पश्चात बांसुरी और वायलिन की जुगलबंदी ने वातावरण को पुनः सुरमय कर दिया। यश, आकाश की बांसुरी और याग्नेश के वायलिन ने राग यमन कल्याण में आलाप, जोड़ और झाला के साथ ऐसा समां बांधा कि श्रोता भाव-विभोर हो उठे। तबला और घटम की संगत ने इस संगीत यात्रा को और भी सजीव बना दिया।

इसी क्रम में साहित्य कला मंच पर पद्मश्री मालिनी अवस्थी की पुस्तकचंदन की डोरके चौथे संस्करण का लोकार्पण भी हुआ। इस अवसर पर उन्होंने भावुक होकर कहा कि संकट मोचन जैसे पवित्र मंच पर साहित्य की उपस्थिति उनके लिए अप्रत्याशित और अविस्मरणीय है। संगीत और नृत्य के साथ-साथ इस आयोजन में चित्रकला ने भी अपनी विशिष्ट उपस्थिति दर्ज कराई। मंदिर परिसर में सजी पेंटिंग प्रदर्शनी कला प्रेमियों के आकर्षण का केंद्र बनी रही। 

औसानगंज के युवा कलाकार ऋतिक जायसवाल कीचंदन का किवाड़पेंटिंग विशेष रूप से सराही गई, जिसे उन्होंने लगभग 200 घंटे की साधना से छह रंगों में साकार किया। लंका क्षेत्र की हर्षिता कीपवन पुत्रऔर पांडेयपुर की शैलजा गुप्ता कीलंका दहनजैसी कृतियों ने भी दर्शकों को ठहरकर देखने को विवश किया। बीआर फाउंडेशन की पूनम राय सहित अनेक युवा कलाकारों, अनुष्का मौर्य, स्नेहा राय, विनेक्षा राय, जीवा, संजीवनी, रिजवान खान, तरंजीत कौर, ममता मल्होत्रा और प्रियंका प्रियदर्शिनी, की रचनाओं ने इस आयोजन को बहुरंगी आयाम प्रदान किया।

इस प्रकार, संकट मोचन संगीत समारोह का प्रथम दिवस ही यह सिद्ध कर गया कि काशी में भक्ति केवल आस्था नहीं, बल्कि कला के हर रूप में जीवित एक अनंत परंपरा है, जहां तुलसी की वाणी, निराला की संवेदना, रामलीला की जीवंतता और शास्त्रीय संगीत की साधना एक साथ मिलकर आत्मा को स्पंदित कर देती है। या यूं कहे यह निशा काशी की आत्मा में रचा-बसा एक आध्यात्मिक उत्सव बन गई, जहां हर स्वर में भक्ति, हर नृत्य में साधना और हर क्षण में राम का साक्षात् अनुभव हुआ।

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