Thursday, 18 June 2026

योग : भारत की अमर जीवन-दृष्टि

योग : भारत की अमर जीवन-दृष्टि 

योग केवल शरीर का व्यायाम नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता का वह शाश्वत दर्शन है जो मनुष्य को स्वयं, समाज और सृष्टि से जोड़ता है. "योग" संस्कृत की 'युज्' धातु से बना है, जिसका अर्थ हैजोड़ना। लेकिन यह जोड़ केवल शरीर और श्वास का नहीं, बल्कि मन और विवेक का, आत्मा और परमात्मा का, व्यक्ति और समाज का तथा प्रकृति और सृष्टि का है। सभ्यताओं का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होता कि उन्होंने कितने नगर बसाए, कितने साम्राज्य खड़े किए या कितने युद्ध जीते। किसी भी सभ्यता की वास्तविक पहचान इस बात से होती है कि उसने मानवता को जीने की कौन-सी दृष्टि दी। मिस्र ने पिरामिड दिए, यूनान ने दर्शन दिया, रोम ने शासन व्यवस्था दी, आधुनिक पश्चिम ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी का विस्तार किया; किंतु भारत ने विश्व को जो सबसे अमूल्य उपहार दिया, वह हैयोग। योग केवल एक पद्धति नहीं, बल्कि भारतीय चिंतन की वह कालजयी धारा है, जो हजारों वर्षों से मानव जीवन को संतुलन, संयम और समरसता का संदेश देती आई है। यह संयोग नहीं कि आज जब पूरी दुनिया तनाव, अवसाद, अकेलेपन, उपभोक्तावाद और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में मानवीय संवेदनाओं के संकट से जूझ रही है, तब उसकी दृष्टि फिर भारत की ओर उठी है। कारण स्पष्ट हैदुनिया को तकनीक मिल गई, पर शांति नहीं; साधन मिल गए, पर संतोष नहीं; गति मिल गई, पर दिशा नहीं। योग इसी दिशा का नाम है 

सुरेश गांधी

संस्कृत की 'युज्' धातु से बना "योग" शब्द अपने भीतर भारतीय दर्शन की संपूर्ण यात्रा समेटे हुए है। इसका सामान्य अर्थ हैजोड़ना। किंतु यह जोड़ बाहरी नहीं, भीतरी है। यह मनुष्य को उसके मूल स्वरूप से जोड़ने की साधना है। भारतीय मनीषियों ने बहुत पहले समझ लिया था कि मनुष्य का सबसे बड़ा संघर्ष बाहर नहीं, भीतर है। युद्ध सीमाओं पर कम, मन के भीतर अधिक लड़े जाते हैं। इसलिए उन्होंने अस्त्रों से पहले आत्मा को साधने का मार्ग खोजा। यही योग है। उपनिषदों ने कहा कि आत्मा नित्य, शुद्ध और अविनाशी है, किंतु मनुष्य अपनी इच्छाओं, मोह, अहंकार और विषय-वासनाओं में उलझकर अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाता है। योग उसी विस्मृत सत्य का पुनर्स्मरण है। योग का इतिहास किसी एक व्यक्ति से प्रारंभ नहीं होता। इसके बीज वैदिक साहित्य में दिखाई देते हैं।

ऋषियों ने ध्यान, तप, प्राण और आत्मचिंतन के माध्यम से उस चेतना का अनुभव किया, जिसे बाद में योग का स्वरूप मिला। महर्षि पतंजलि ने इस बिखरे हुए ज्ञान को व्यवस्थित कर योगसूत्र की रचना की। केवल 195 सूत्रों में उन्होंने मानव मन का जितना गहरा विश्लेषण किया, वह आज भी मनोविज्ञान के लिए आश्चर्य का विषय है। उनका पहला और सबसे प्रसिद्ध सूत्र है— "योगश्चित्तवृत्ति निरोधः।" अर्थात् चित्त की चंचल वृत्तियों का निरोध ही योग है। यही योग का वास्तविक स्वरूप है। आश्चर्य की बात यह है कि आज जिसे योग समझ लिया गया हैविभिन्न आसन और शारीरिक मुद्राएँपतंजलि ने उन्हें योग का अंतिम उद्देश्य कभी नहीं माना। उनके लिए आसन तो योग की यात्रा का केवल एक सोपान था।

आज योग का सबसे अधिक प्रचार शरीर को लचीला बनाने वाली क्रिया के रूप में होता है। सोशल मीडिया पर कठिन आसनों की तस्वीरें योग की पहचान बन गई हैं। किंतु भारतीय दर्शन कहता है कि यदि जीवन में सत्य नहीं, अहिंसा नहीं, संयम नहीं, करुणा नहीं, तो केवल आसन करने से कोई योगी नहीं बन जाता। यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। इनमें पहला स्थान शरीर का नहीं, चरित्र का है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रहये केवल नैतिक उपदेश नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य के आधार हैं। झूठ, लालच, हिंसा और असंयम मनुष्य के भीतर सबसे अधिक अशांति पैदा करते हैं। योग सबसे पहले इन्हीं पर विजय का मार्ग दिखाता है। इक्कीसवीं सदी को विज्ञान की सदी कहा जाता है। मनुष्य अंतरिक्ष में पहुँच गया, कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने नई संभावनाएँ खोल दीं, चिकित्सा विज्ञान ने अनेक असाध्य रोगों पर विजय प्राप्त कर ली। लेकिन इसी सदी ने एक और संकट पैदा किया मानसिक असंतुलन। आज तनाव, अनिद्रा, अवसाद, चिंता, अकेलापन और डिजिटल व्यसन नई महामारियाँ बन चुके हैं। लोग दिन भर हजारों सूचनाओं से घिरे रहते हैं, लेकिन स्वयं से संवाद करने का समय नहीं निकाल पाते। जब मनुष्य कुछ क्षण अपनी श्वास पर ध्यान देता है, तब वह पहली बार स्वयं से मिलना शुरू करता है। योग का यही मौन चमत्कार है।

इतिहास में अनेक राष्ट्र अपनी सेनाओं के कारण प्रसिद्ध हुए। किसी ने तलवार के बल पर दुनिया जीती, किसी ने व्यापार के बल पर। भारत ने किसी देश पर अधिकार किए बिना पूरी दुनिया के हृदय में स्थान बनाया। योग इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। आज विश्व के लगभग हर देश में लाखों लोग प्रतिदिन योग करते हैं। यह किसी राजनीतिक शक्ति का परिणाम नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की नैतिक शक्ति का प्रमाण है। भारत ने दुनिया को हथियार नहीं, स्वास्थ्य दिया; युद्ध नहीं, संतुलन दिया; प्रतिस्पर्धा नहीं, समरसता का मार्ग दिया। यही भारत की वास्तविक वैश्विक पहचान है। आज चिकित्सा विज्ञान भी स्वीकार करता है कि नियमित योग से रक्तचाप नियंत्रित रहता है, तनाव कम होता है, प्रतिरक्षा क्षमता बढ़ती है और जीवन की गुणवत्ता बेहतर होती है। किंतु भारतीय दृष्टि इससे आगे जाती है।

भारतीय दर्शन कहता है कि स्वस्थ शरीर महत्वपूर्ण है, लेकिन स्वस्थ मन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। यदि मन रोगी है तो शरीर की शक्ति भी अधिक समय तक साथ नहीं देती। इसीलिए योग शरीर का उपचार नहीं, चेतना का परिष्कार है। यह मनुष्य को सिखाता है कि बाहरी उपलब्धियाँ तभी सार्थक हैं, जब भीतर संतुलन हो। आज मनुष्य के पास सब कुछ हैस्मार्टफोन, इंटरनेट, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, तेज़ रफ्तार जीवन और अनगिनत सुविधाएँ। लेकिन यदि कुछ खो गया है तो वह हैआंतरिक शांति। योग उसी शांति की पुनर्खोज है। यह हमें सिखाता है कि जीवन की सबसे लंबी यात्रा पृथ्वी से चंद्रमा तक नहीं, बल्कि स्वयं से स्वयं तक की होती है। और यही कारण है कि योग किसी एक धर्म, जाति, देश या भाषा का विषय नहीं रहा। वह संपूर्ण मानवता की साझा धरोहर बन चुका है।

यदि महर्षि पतंजलि ने योग को चित्त की शुद्धि का मार्ग बताया, तो भारत की सामाजिक परंपरा ने उसे जीवन जीने का संस्कार बनाया। इसलिए भारत में योग कभी केवल ऋषियों की कुटियों तक सीमित नहीं रहा। वह खेतों में श्रम करते किसान की सहज लय में भी था, गृहस्थ के संयमित जीवन में भी, साधु की तपस्या में भी और माँ की प्रार्थना में भी। योग भारतीय जीवन का वह मौन संगीत है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी बिना किसी शोर के प्रवाहित होता रहा। आज जब पूरा विश्व योग को अपनाने की बात कर रहा है, तब भारत के लिए यह केवल गर्व का विषय नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक जिम्मेदारी का भी स्मरण है। योग का अर्थ केवल विश्व रिकॉर्ड बनाना नहीं, बल्कि विश्व को सही जीवन-दृष्टि देना है।

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