Thursday, 18 June 2026

योग : सेहत का सांस्कृतिक सूत्र, जो बन गया है जीवनशैली

योग : सेहत का सांस्कृतिक सूत्र, जो बन गया है जीवनशैली 

योगशब्द सुनते ही मानसपटल पर साधु-संन्यासियों की छवि उभर आती है, जो हिमालय की कंदराओं में तपस्या करते हैं। लेकिन 21वीं सदी में योग की परिभाषा का विस्तार हुआ है। अब यह केवल एक आध्यात्मिक अभ्यास नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक, सार्वभौमिक और आधुनिक जीवन-शैली बन चुका है। इसने आज के तनावग्रस्त, असंतुलित और भाग-दौड़ से भरे जीवन को नई दिशा दी है। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा वर्ष 2014 में जब भारत के प्रस्ताव पर 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया गया, तब से लेकर अब तक योग की स्वीकार्यता और प्रभाव विश्व के कोने-कोने तक पहुंचा है। अमेरिका से लेकर ऑस्ट्रेलिया, जापान से लेकर जर्मनी तक, हर महाद्वीप में योग शिविरों, योग संस्थानों और जागरूकता अभियानों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा योग कोवन अर्थ, वन हेल्थके रूप में वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करना इस बात का प्रमाण है कि भारत अब सिर्फ संस्कृति का निर्यातक नहीं, बल्कि स्वस्थ भविष्य की विचारधारा भी प्रस्तुत कर रहा है। आसन की स्थिरता से मन की चंचलता तक, योग अब केवल साधना नहीं, एक सशक्त जीवन शैली है. आज जब पूरी दुनिया अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मना रही है, तो यह केवल भारत की सांस्कृतिक विरासत का उत्सव नहीं, बल्कि उस सार्वकालिक दर्शन का उत्सव है, जो मनुष्य को अपने भीतर झांकने की प्रेरणा देता है। योग का उद्देश्य केवल शरीर को लचीला बनाना या कुछ क्रियाओं का अभ्यास करना नहीं है, बल्कि जीवन की गति को संतुलन देने और चित्त की वृत्तियों को शान्त करने का माध्यम बनना है. 

सुरेश गांधी

"मनुष्य का सबसे बड़ा युद्ध किसी दूसरे से नहीं, अपने ही चंचल मन से होता है। जो इस युद्ध में विजयी हो जाए, वही सच्चा योगी है।" योग का वास्तविक स्वरूप तब समझ में आता है, जब हम उसे केवल शरीर के अभ्यास के रूप में नहीं, बल्कि जीवन के अनुशासन के रूप में देखते हैं। आज विश्व में करोड़ों लोग योग कर रहे हैं, लेकिन योग को जानने और योग को जीने में उतना ही अंतर है, जितना किसी नदी का चित्र देखने और उसके जल में उतरने में। महर्षि पतंजलि ने योग को केवल आसनों का संग्रह नहीं बनाया। उन्होंने मनुष्य के संपूर्ण व्यक्तित्व के विकास की ऐसी वैज्ञानिक पद्धति दी, जो आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी दो हजार वर्ष पहले थी। उन्होंने योग को आठ सोपानों में विभाजित कियायम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। इन आठ चरणों की यात्रा बताती है कि योग की शुरुआत शरीर से नहीं, बल्कि चरित्र से होती है और उसका अंतिम लक्ष्य शरीर नहीं, चेतना है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रहये केवल नैतिक उपदेश नहीं हैं; ये मनुष्य के भीतर चल रहे संघर्षों पर विजय पाने के उपाय हैं। जिस समाज में असत्य, हिंसा, लालच और संग्रह की प्रवृत्ति बढ़ती है, वहाँ तनाव भी बढ़ता है। योग इन विकृतियों के स्थान पर संयम, संतोष और समरसता का संस्कार देता है।

आज आवश्यकता केवल योग दिवस मनाने की नहीं, बल्कि योगमय जीवन जीने की है। यदि योग वर्ष में केवल एक दिन चटाई तक सीमित रह गया, तो उसका उद्देश्य अधूरा रह जाएगा। योग तब सार्थक होगा जब विद्यालयों में बच्चों को अंक के साथ आत्मसंयम भी सिखाया जाएगा; जब परिवार दिन की शुरुआत मोबाइल की स्क्रीन से नहीं, बल्कि कुछ क्षणों के मौन और प्राणायाम से करेंगे; जब कार्यालयों में प्रतिस्पर्धा के साथ मानसिक संतुलन को भी महत्व मिलेगा; जब महिलाएँ, युवा और बुज़ुर्ग सभी योग को जीवन का स्वाभाविक हिस्सा बनाएँगे। भारत ने विश्व को अनेक अमूल्य धरोहरें दी हैं, किंतु योग उन सबमें सबसे अधिक जीवंत है। यह किसी एक धर्म का है, किसी संप्रदाय का, किसी भूभाग का। यह संपूर्ण मानवता का साझा ज्ञान है। आज जब संसार भौतिक उपलब्धियों के शिखर पर खड़ा होकर भी भीतर से बेचैन है, तब भारत फिर उसी आत्मविश्वास के साथ कह सकता है— "आइए, हम आपको केवल स्वस्थ शरीर नहीं, शांत मन भी देना चाहते हैं।" यही योग का संदेश है। यही भारत का संदेश है। और शायद यही इक्कीसवीं सदी की सबसे बड़ी आवश्यकता भी। क्योंकि अंततः मनुष्य की सबसे लंबी यात्रा पृथ्वी से अंतरिक्ष तक नहीं, बल्कि स्वयं से स्वयं तक की होती हैऔर उस यात्रा का सबसे विश्वसनीय पथ हैयोग।

"महिला योगी, परिवार निरोगी"—एक नारा नहीं, भारतीय परिवार का दर्शन

इस वर्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने योग दिवस को "महिला योगी, परिवार निरोगी" की अवधारणा से जोड़कर एक अत्यंत महत्वपूर्ण सामाजिक संदेश दिया। पहली दृष्टि में यह एक साधारण नारा प्रतीत हो सकता है, किंतु भारतीय समाजशास्त्र के संदर्भ में यह अत्यंत गहन विचार है। भारतीय परिवार व्यवस्था में नारी केवल एक सदस्य नहीं होती; वह परिवार की जीवनशक्ति होती है। उसके स्वास्थ्य का सीधा संबंध बच्चों के संस्कार, परिवार के वातावरण और समाज की स्थिरता से जुड़ा होता है। यदि घर की माँ, बहन या बेटी मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ है, तो पूरा परिवार सकारात्मक ऊर्जा से भर जाता है। योग इसलिए केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक स्वास्थ्य का भी आधार है। आज तनाव, हार्मोनल असंतुलन, जीवनशैली से जुड़ी बीमारियाँ और मानसिक दबाव सबसे अधिक महिलाओं को प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे समय में योग उनके लिए केवल व्यायाम नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, मानसिक संतुलन और आत्मबल का स्रोत बन सकता है।

काशीजहाँ योग केवल अभ्यास नहीं, आराधना है

यदि भारत योग की जन्मभूमि है, तो काशी उसकी जीवंत प्रयोगशाला है। यह वही नगरी है जहाँ गंगा की धारा केवल जल नहीं, चेतना का प्रवाह मानी जाती है। जहाँ हर प्रातःकाल उगते सूर्य के साथ हजारों लोग गंगा तट पर प्राणायाम करते दिखाई देते हैं। जहाँ शिव केवल देवता नहीं, आदि योगी के रूप में पूजित हैं।

योग की सबसे बड़ी शक्तियह मनुष्य को जोड़ता है

आज दुनिया अनेक आधारों पर बंटी हुई हैधर्म, जाति, भाषा, रंग, राष्ट्र और विचारधाराओं के आधार पर। लेकिन योग इनमें से किसी विभाजन को स्वीकार नहीं करता। योग का पहला संदेश हैजुड़ो। यही कारण है कि जब किसी मैदान में हजारों लोग एक साथ प्राणायाम करते हैं, तब वहाँ कोई बड़ा होता है, छोटा; कोई अमीर, गरीब; किसी की जाति दिखाई देती है, किसी का धर्म। सबके भीतर केवल एक ही लय चलती हैश्वास की। शायद इसी कारण भारत ने योग के माध्यम से दुनिया को वह दे दिया, जो अनेक राजनीतिक सम्मेलन और अंतरराष्ट्रीय समझौते भी नहीं दे सकेमानवता की साझा अनुभूति।

डिजिटल युग में योग की बढ़ती आवश्यकता

आज का मनुष्य सुबह आँख खोलते ही मोबाइल देखता है और रात को उसी के साथ सोता है। सूचना का प्रवाह इतना तेज हो गया है कि मन को विश्राम का अवसर ही नहीं मिलता। कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने काम आसान किए हैं, लेकिन मनुष्य की मानसिक व्यस्तता भी बढ़ा दी है। ऐसे समय में योग केवल स्वास्थ्य कार्यक्रम नहीं, बल्कि मानसिक स्वतंत्रता का अभियान बन सकता है। योग हमें सिखाता है कि हर दिन कुछ क्षण ऐसे हों, जब हम किसी स्क्रीन से नहीं, स्वयं से जुड़े हों। क्योंकि जो व्यक्ति स्वयं से कट जाता है, वह संसार से जुड़कर भी अधूरा रहता है।

परिवारों में लौटे योग का संस्कार

आज भारतीय परिवारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल आर्थिक नहीं, भावनात्मक भी है। एक ही घर में रहने वाले लोग भी संवाद के बजाय स्क्रीन पर अधिक समय बिताते हैं। यदि प्रत्येक परिवार दिन की शुरुआत केवल दस मिनट सामूहिक योग और प्राणायाम से करे, तो यह केवल स्वास्थ्य नहीं सुधारेगा, बल्कि रिश्तों में भी नई ऊर्जा भर देगा। योग का सबसे बड़ा प्रभाव शरीर पर नहीं, व्यवहार पर दिखाई देता है। संयमित मन ही संयमित परिवार बनाता है और संयमित परिवार ही स्वस्थ समाज की आधारशिला होते हैं।

प्राणायाम : केवल श्वास नहीं, जीवन की लय

योग की सबसे महत्वपूर्ण साधनाओं में प्राणायाम का विशेष स्थान है। सामान्यतः लोग इसे केवल श्वास लेने और छोड़ने की प्रक्रिया समझते हैं, जबकि भारतीय दर्शन में प्राण का अर्थ जीवन-ऊर्जा है। श्वास उसका केवल दृश्य रूप है। प्राणायाम का उद्देश्य फेफड़ों का व्यायाम भर नहीं, बल्कि शरीर, मन और चेतना के बीच संतुलन स्थापित करना है। पूरक, कुंभक और रेचकये तीनों केवल श्वास की तकनीक नहीं, बल्कि धैर्य, संतुलन और अनुशासन के अभ्यास हैं। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी यह स्वीकार कर चुका है कि नियंत्रित श्वास तनाव को कम करती है, हृदय गति को संतुलित करती है, रक्तचाप नियंत्रित रखने में सहायक होती है और मानसिक एकाग्रता बढ़ाती है। किंतु भारतीय ऋषियों ने यह अनुभव हजारों वर्ष पहले ही कर लिया था कि श्वास पर अधिकार, मन पर अधिकार का पहला चरण है।

योग में गुरु का महत्व

आज इंटरनेट पर हजारों वीडियो देखकर लोग योग सीखने का प्रयास करते हैं। यह सुविधा स्वागतयोग्य है, लेकिन योग केवल देखकर सीख लेने की विधा नहीं है। स्वामी विवेकानंद ने स्पष्ट कहा था कि योग केवल पुस्तक पढ़कर नहीं सीखा जा सकता; उसके लिए अनुभवी मार्गदर्शक की आवश्यकता होती है। विशेष रूप से प्राणायाम और जटिल आसनों का अभ्यास प्रशिक्षित योगाचार्य के निर्देशन में ही किया जाना चाहिए। योग प्रतियोगिता नहीं है। शरीर की क्षमता से अधिक आसन करना, शीघ्र परिणाम पाने की जल्दबाज़ी या प्रदर्शन की मानसिकता लाभ से अधिक हानि पहुँचा सकती है। विशेष रूप से हृदय, फेफड़ों, रीढ़ अथवा गंभीर रोगों से पीड़ित लोगों को चिकित्सकीय और प्रशिक्षित योग-विशेषज्ञ की सलाह लेकर ही अभ्यास करना चाहिए।

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