बिहार में सत्ता से टकराने की कीमत मौत?
बिहार की राजनीति में कई घटनाएं आईं और चली गईं, लेकिन भरत तिवारी प्रकरण ने जिस तरह पुलिस, सत्ता और न्याय व्यवस्था को एक साथ कठघरे में खड़ा कर दिया है, वह सामान्य नहीं है। एक ओर पुलिस का दावा है कि उसने एक अपराधी के खिलाफ कानून सम्मत कार्रवाई की, दूसरी ओर वायरल वीडियो, ग्रामीणों के आरोप और घटनाक्रम के बाद पुलिस अधिकारियों का निलंबन इस आधिकारिक कहानी पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। यही कारण है कि यह मामला अब केवल एक कथित मुठभेड़ का नहीं, बल्कि राज्य और नागरिक के बीच भरोसे का संकट बनता जा रहा है। लोकतंत्र में पुलिस को कानून लागू करने का अधिकार है, लेकिन कानून से ऊपर उठने का नहीं। यदि जनता के मन में यह विश्वास बनने लगे कि विरोध करने की कीमत जान देकर चुकानी पड़ सकती है, तो यह किसी भी सरकार के लिए सबसे बड़ा खतरे का संकेत है। इस पूरे घटनाक्रम ने बिहार की राजनीति में नया सियासी भूचाल खड़ा कर दिया है। अब न्यायिक जांच केवल भरत तिवारी की मौत का सच सामने लाने का माध्यम नहीं, बल्कि यह तय करने की कसौटी भी है कि बिहार में कानून का राज मजबूत हुआ है या सत्ता का भय
सुरेश गांधी
बिहार का भरत तिवारी
प्रकरण अब केवल एक
कथित मुठभेड़ का मामला नहीं
रह गया है। यह
उस बुनियादी प्रश्न का प्रतीक बन
चुका है, जो हर
लोकतंत्र में समय-समय
पर उठता है — क्या
राज्य की शक्ति कानून
के अधीन है, या
कभी-कभी कानून से
ऊपर भी खड़ी हो
जाती है? भरत तिवारी
की मौत के बाद
सामने आए वायरल वीडियो,
ग्रामीणों के दावे, पुलिस
का आधिकारिक पक्ष, पुलिसकर्मियों का निलंबन, न्यायिक
जांच की घोषणा और
इस पूरे घटनाक्रम पर
उठे राजनीतिक तूफान ने बिहार की
राजनीति को झकझोर दिया
है। यह मामला अब
केवल एक व्यक्ति का
नहीं, बल्कि शासन, पुलिस और जनता के
रिश्ते की परीक्षा बन
गया है। यदि पुलिस का पक्ष सही
है, तो उसे अपने
दावे को ठोस साक्ष्यों
से सिद्ध करना चाहिए। यदि
ग्रामीणों के आरोप सही
हैं कि विवाद की
शुरुआत गांव में पुलिस
कार्रवाई का विरोध करने
और कथित रूप से
एक पुलिस अधिकारी का कॉलर पकड़ने
से हुई, फिर बाद
में प्रतिशोध की भावना से
कार्रवाई की गई, तो
यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अत्यंत
गंभीर विषय है। इन
आरोपों की पुष्टि या
खंडन जांच का विषय
है, लेकिन इन्हें केवल इसलिए खारिज
नहीं किया जा सकता
कि आरोप पुलिस पर
हैं।
सबसे बड़ा प्रश्न
यह भी है कि
यदि भरत तिवारी एक
कुख्यात अपराधी था, तो उसके
आपराधिक इतिहास, उसके विरुद्ध लंबित
मामलों और उसके अपराधों
का विस्तृत रिकॉर्ड तत्काल सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया?
लोकतांत्रिक शासन में पारदर्शिता
संदेह को कम करती
है, जबकि अस्पष्टता उसे
बढ़ाती है। इस मामले
का सबसे संवेदनशील पहलू
वायरल वीडियो हैं। यदि जांच
में यह प्रमाणित होता
है कि ग्रामीण गोली
न चलाने की अपील कर
रहे थे और घटनास्थल
पर परिस्थितियां पुलिस के आधिकारिक संस्करण
से भिन्न थीं, तो यह
केवल एक मुठभेड़ का
मामला नहीं रहेगा, बल्कि
कानून के शासन पर
गंभीर प्रश्नचिह्न होगा। दूसरी ओर यदि वीडियो
अधूरे, भ्रामक या संदर्भ से
बाहर पाए जाते हैं,
तो यह भी सामने
आना चाहिए। इसलिए अंतिम निष्कर्ष न्यायिक जांच पर ही
आधारित होना चाहिए। यह
घटना एक व्यापक बहस
भी छेड़ती है। भारत के
अनेक राज्यों में वर्षों से
ऐसे आरोप लगते रहे
हैं कि पुलिस के
साथ टकराव करने वाले व्यक्ति
पर बाद में गंभीर
मुकदमे दर्ज हो जाते
हैं, या वह कठोर
कार्रवाई का सामना करता
है। दूसरी ओर पुलिस का
तर्क रहता है कि
अपराधियों के विरुद्ध कठोर
कार्रवाई के बिना कानून-व्यवस्था बनाए रखना संभव
नहीं। इन दोनों के
बीच संतुलन ही लोकतंत्र की
असली कसौटी है।
इतिहास बताता है कि किसी
भी सरकार के लिए सबसे
बड़ा राजनीतिक संकट तब पैदा
होता है जब जनता
के मन में यह
धारणा बनने लगे कि
पुलिस निष्पक्ष कानून प्रवर्तन एजेंसी नहीं, बल्कि सत्ता का दंडात्मक औजार
बन रही है। ऐसी
धारणा सही हो या
गलत, यदि उसे समय
रहते पारदर्शी जांच और जवाबदेही
से दूर नहीं किया
गया, तो उसका असर
अदालतों से पहले जनता
की अदालत में दिखाई देता
है। मीडिया की भूमिका भी
इस मामले में अत्यंत महत्वपूर्ण
है। पत्रकारिता का दायित्व न
तो पुलिस का प्रवक्ता बनना
है और न ही
बिना जांच किसी को
दोषी घोषित करना। मीडिया का काम तथ्यों
को सामने लाना, विरोधाभासों पर प्रश्न उठाना
और जांच को जवाबदेह
बनाए रखना है। मीडिया
ट्रायल न्यायिक प्रक्रिया का विकल्प नहीं
हो सकता, लेकिन सत्ता से असहज प्रश्न
पूछना लोकतांत्रिक पत्रकारिता का मूल धर्म
है। भरत तिवारी दोषी
था या निर्दोष, इसका
निर्णय अदालत और जांच प्रक्रिया
करेगी। लेकिन एक बात निर्विवाद
है—लोकतंत्र में किसी भी
व्यक्ति की सबसे बड़ी
सुरक्षा यह विश्वास है
कि उसके साथ कानून
के अनुसार व्यवहार होगा, प्रतिशोध के अनुसार नहीं।
बिहार सरकार ने न्यायिक जांच
की घोषणा की है। अब
यह केवल प्रशासनिक औपचारिकता
नहीं रहनी चाहिए। जांच
ऐसी होनी चाहिए जो
न केवल निष्पक्ष हो,
बल्कि जनता को निष्पक्ष
दिखाई भी दे। क्योंकि
यदि जनता का विश्वास
पुलिस और न्याय व्यवस्था
से उठने लगे, तो
नुकसान केवल एक सरकार
का नहीं, पूरे लोकतांत्रिक ढांचे
का होता है। भरत
तिवारी प्रकरण का अंतिम फैसला
अदालत करेगी, लेकिन यह मामला अभी
से एक चेतावनी अवश्य
दे रहा है—राज्य
की सबसे बड़ी ताकत
बंदूक नहीं, बल्कि न्याय पर जनता का
भरोसा है। जिस दिन
यह भरोसा डगमगा जाता है, उसी
दिन सत्ता की सबसे मजबूत
दीवारों में भी दरारें
पड़नी शुरू हो जाती
हैं। लोकतंत्र में सरकारें विपक्ष
से नहीं, जनता के मन
में पैदा हुए अविश्वास
से हारती हैं; और उस
अविश्वास का सबसे बड़ा
कारण तब बनता है,
जब कानून का रक्षक ही
कानून के कटघरे में
खड़ा दिखाई देने लगे। मतलब
साफ है किसी सरकार की असली परीक्षा
अपराधियों से लड़ने में
नहीं, बल्कि यह साबित करने
में होती है कि
निर्दोष को कभी अपराधी
नहीं बनाया जाएगा और अपराधी को
भी कानून से बाहर जाकर
दंडित नहीं किया जाएगा।
"भरत तिवारी दोषी
था या निर्दोष, इसका
फैसला अदालत करेगी। लेकिन इस घटना ने
एक सवाल पूरे बिहार
के सामने छोड़ दिया है—क्या राज्य की
ताकत का आधार कानून
होगा या खाकी का
भय? क्योंकि जिस दिन जनता
न्यायालय से पहले पुलिस
से डरने लगे, उसी
दिन लोकतंत्र की सबसे खतरनाक
दरार पड़ चुकी है.
जानकारी के अनुसार, शाहपुर थाना में पदस्थापित दारोगा रामाशंकर बैठा के आवेदन पर मार्च
2025 में भरत भूषण तिवारी के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था। भरत पर सरकारी कार्य में
बाधा पहुंचाने, मारपीट करने, गाली-गलौज, जान से मारने की धमकी देने तथा पुलिस पदाधिकारी
के साथ दुर्व्यवहार का आरोप लगाया गया था। प्राथमिकी में कहा गया था कि भरत तिवारी
ने ड्यूटी पर तैनात पुलिस पदाधिकारी की वर्दी का कॉलर पकड़ लिया था और उनके साथ धक्का-मुक्की
की थी।प्राथमिकी के मुताबिक, 24 मार्च 2025 को शाहपुर थाना की पुलिस टीम बिलौटी गांव
में जमीन विवाद की शिकायत की जांच करने पहुंची थी। गांव की लीलावती देवी ने विवादित
भूमि को लेकर आवेदन दिया था, जिसके आधार पर पुलिस दोनों पक्षों से पूछताछ कर दस्तावेजों
की जांच कर रही थी।
इसी दौरान पुलिस द्वारा जमीन से संबंधित कागजात मांगे जाने पर भरत भूषण तिवारी कथित रूप से आक्रोशित हो गए। आरोप है कि उन्होंने मौके पर मौजूद दारोगा रामाशंकर बैठा का कॉलर पकड़ लिया और धक्का-मुक्की की।पुलिस के अनुसार, विवाद बढ़ने पर अन्य जवान बीच-बचाव के लिए आगे आए, लेकिन उनके साथ भी कथित रूप से धक्का-मुक्की और अभद्र व्यवहार किया गया। प्राथमिकी में दो सिपाहियों के घायल होने का भी उल्लेख किया गया था।घटना के बाद पुलिस ने तत्काल कार्रवाई करते हुए भरत भूषण तिवारी को गिरफ्तार कर लिया था और उन्हें सरकारी वाहन से शाहपुर थाना लाया गया था। इस मामले में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की विभिन्न धाराओं के अलावा एससी/एसटी एक्ट के तहत भी प्राथमिकी दर्ज की गई थी।17 जून को हुए पुलिस एनकाउंटर में भरत भूषण तिवारी की मौत के बाद यह पुराना मामला फिर सुर्खियों में आ गया है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो को इसी घटना से जोड़कर देखा जा रहा है। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी हो रही है कि पुलिस और भरत तिवारी के बीच संबंध लंबे समय से तनावपूर्ण थे और दोनों पक्षों के बीच कई बार विवाद की स्थिति बनी थी।
हालांकि, वायरल वीडियो की सत्यता की
स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। इसके बावजूद यह मामला अब एनकाउंटर की घटना के बाद
नई बहस का विषय बन गया है। पुलिस और प्रशासन की ओर से इस संबंध में आधिकारिक तौर पर
कोई नई टिप्पणी सामने नहीं आई है, लेकिन पुरानी प्राथमिकी और उससे जुड़े घटनाक्रम एक
बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गए हैं।



