गुलदस्ता, गाजीपुर और गहरी सियासत
नेताओं ने मुस्कान बचाकर रखी, कार्यकर्ता दुश्मनी निभाते रहे...
2019 में जिस चुनावी रणभूमि
ने
गाजीपुर
को
दो
खेमों
में
बांट
दिया
था,
2027 की
दस्तक
से
पहले
उसी
लड़ाई
के
दो
चेहरे
एक
फ्रेम
में
दिखे;
तस्वीर
ने
खड़े
कर
दिए
कई
राजनीतिक
सवाल
सुरेश गांधी
वाराणसी. गाजीपुर की राजनीति में
इन दिनों एक तस्वीर चर्चा
का विषय बनी हुई
है। तस्वीर में पूर्व केंद्रीय
मंत्री, जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल रह
चुके भाजपा के वरिष्ठ नेता
मनोज सिन्हा और समाजवादी पार्टी
के सांसद अफजाल अंसारी एक-दूसरे को
सम्मान स्वरूप स्मृति-चिह्न भेंट करते दिखाई
दे रहे हैं। सामान्य
परिस्थितियों में इसे शिष्टाचार
भेंट कहा जाता, लेकिन
पूर्वांचल की राजनीति में
तस्वीरें केवल तस्वीरें नहीं
होतीं। वे संकेत भी
होती हैं, संदेश भी
और कई बार आने
वाले समय की आहट
भी।
यही वजह है
कि इस तस्वीर को
लेकर राजनीतिक गलियारों से लेकर चाय
की दुकानों तक चर्चा छिड़ी
हुई है। आखिर वह
कौन-सी बात है
जिसने वर्षों तक एक-दूसरे
के खिलाफ राजनीतिक मोर्चा संभालने वाले दो नेताओं
को एक ही फ्रेम
में ला खड़ा किया?
और इससे भी बड़ा
सवाल यह कि 2027 के
विधानसभा चुनावों की ओर बढ़
रहे उत्तर प्रदेश में इस तस्वीर
के क्या मायने निकाले
जाएं?
दरअसल, इस तस्वीर का
महत्व केवल वर्तमान में
नहीं, बल्कि उसके पीछे खड़े
राजनीतिक इतिहास में छिपा है।
साल 2019 का लोकसभा चुनाव
गाजीपुर में केवल एक
चुनाव नहीं था। वह
प्रतिष्ठा, प्रभाव और राजनीतिक वर्चस्व
की लड़ाई बन गया था।
एक ओर केंद्र सरकार
के प्रभावशाली मंत्री मनोज सिन्हा थे,
जिन्हें भाजपा विकास और सुशासन का
चेहरा बनाकर मैदान में उतार रही
थी। दूसरी ओर सपा-बसपा
गठबंधन के उम्मीदवार अफजाल
अंसारी थे, जिनके पीछे
पूर्वांचल की मजबूत सामाजिक
और राजनीतिक जमीन खड़ी थी।
उस चुनाव में
बयान भी तल्ख थे
और राजनीतिक संघर्ष भी। मनोज सिन्हा
ने मुकाबले को “आईआईटियन बनाम
बाहुबली” की लड़ाई बताया
था। दूसरी तरफ गठबंधन अपने
सामाजिक समीकरणों की ताकत पर
भरोसा जता रहा था।
चुनावी सभाओं में आरोप-प्रत्यारोप
की आग जल रही
थी, समर्थक आमने-सामने खड़े
थे और गाजीपुर दो
स्पष्ट राजनीतिक ध्रुवों में बंट चुका
था।
परिणाम आया तो अफजाल
अंसारी ने मनोज सिन्हा
को एक लाख से
अधिक मतों के अंतर
से पराजित कर दिया। उस
समय इसे पूर्वांचल की
सबसे बड़ी राजनीतिक जीत
और भाजपा के लिए सबसे
अप्रत्याशित झटकों में से एक
माना गया। लेकिन राजनीति
की विडंबना देखिए। जिस मनोज सिन्हा
को गाजीपुर की जनता ने
चुनाव में पराजित किया,
वही कुछ समय बाद
देश के सबसे संवेदनशील
केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर की कमान संभालने
पहुंचे। वहीं अफजाल अंसारी
चुनाव जीतने के बावजूद लगातार
कानूनी और राजनीतिक चुनौतियों
से जूझते रहे। यानी समय
ने दोनों नेताओं की राजनीतिक यात्राओं
को अलग-अलग दिशाओं
में मोड़ दिया, लेकिन
दोनों की प्रासंगिकता समाप्त
नहीं हुई।
आज जब दोनों
नेता एक तस्वीर में
मुस्कुराते दिखाई देते हैं तो
सबसे ज्यादा असहज शायद वे
कार्यकर्ता महसूस करते होंगे जिन्होंने
वर्षों तक अपने नेताओं
के लिए राजनीतिक लड़ाइयां
लड़ीं। किसी ने रिश्ते
बिगाड़े, किसी ने दोस्ती
छोड़ी, किसी ने गांव
और बिरादरी में राजनीतिक खेमेबंदी
झेली। लेकिन राजनीति का पुराना सच
यही है कि नेता
अक्सर संवाद के पुल बचाकर
रखते हैं, जबकि कार्यकर्ता
दुश्मनी की दीवारें खड़ी
कर लेते हैं। यहीं
से यह तस्वीर राजनीतिक
व्यंग्य का रूप ले
लेती है।
2027 का विधानसभा चुनाव
अभी दूर है, लेकिन
राजनीतिक दलों ने अपनी
बिसात बिछानी शुरू कर दी
है। पूर्वांचल की हर हलचल
को इसी नजर से
देखा जा रहा है।
ऐसे में मनोज सिन्हा
और अफजाल अंसारी की यह मुलाकात
स्वाभाविक रूप से चर्चा
पैदा करती है। हालांकि
इस तस्वीर को किसी नए
राजनीतिक समीकरण या गठजोड़ का
संकेत मानना जल्दबाजी होगी। इसके समर्थन में
कोई तथ्य मौजूद नहीं
हैं। फिर भी राजनीति
में प्रतीकों की अपनी भाषा
होती है और अनुभवी
नेता जानते हैं कि एक
तस्वीर हजार शब्दों से
अधिक प्रभाव छोड़ती है।
गाजीपुर की यह तस्वीर
भी शायद यही बता
रही है कि राजनीति
में विरोध स्थायी हो सकता है,
लेकिन संवाद समाप्त नहीं होता। चुनावी
मंचों पर तलवारें भले
खिंची रहें, व्यक्तिगत संबंधों के दरवाजे अक्सर
खुले रहते हैं। और
शायद यही भारतीय राजनीति
का सबसे बड़ा यथार्थ
भी है। कल तक
जो एक-दूसरे के
खिलाफ चुनाव लड़ रहे थे,
आज एक-दूसरे का
सम्मान कर रहे हैं।
कल जो समर्थक नारे
लगाकर एक-दूसरे को
चुनौती दे रहे थे,
वे आज इस तस्वीर
के अर्थ खोज रहे
हैं। और 2027 की आहट के
बीच यह तस्वीर एक
सवाल छोड़ जाती है—
क्या राजनीति में असली लड़ाई
नेताओं की होती है,
या केवल कार्यकर्ताओं की?
गाजीपुर की यह तस्वीर
अभी इसका जवाब नहीं
देती, लेकिन इतना जरूर बताती
है कि सियासत की
बिसात पर मोहरे बदलते
रहते हैं, चालें बदलती
रहती हैं, समीकरण बदलते
रहते हैं, मगर अनुभवी
खिलाड़ी हमेशा खेल में बने
रहते हैं। "गाजीपुर की राजनीति में
शायद यह पहली तस्वीर
नहीं है, लेकिन यह
उन हजारों कार्यकर्ताओं के लिए सबसे
असहज तस्वीर जरूर है, जिन्होंने
वर्षों तक अपने नेताओं
के लिए दुश्मनी निभाई
और अब उन्हीं नेताओं
को मुस्कुराते हुए देख रहे
हैं।"
क्या इसलिए बढ़ी तस्वीर की चर्चा?
✔
2017 में मुख्यमंत्री पद की दौड़
में मनोज सिन्हा का
नाम सबसे आगे माना
गया था।
✔
अंतिम क्षणों में योगी आदित्यनाथ
बने मुख्यमंत्री।
✔
योगी सरकार ने मुख्तार अंसारी
नेटवर्क पर सबसे आक्रामक
कार्रवाई की।
✔
अफजाल अंसारी, मुख्तार अंसारी के राजनीतिक उत्तराधिकारी
चेहरों में गिने जाते
हैं।
✔
ऐसे में मनोज सिन्हा
और अफजाल की एक फ्रेम
वाली तस्वीर को लेकर 2027 की
राजनीति तक चर्चाएं पहुंच
गई हैं। हालांकि तस्वीर को किसी राजनीतिक
संदेश से जोड़ने का
कोई ठोस प्रमाण नहीं
है, लेकिन सियासत में तस्वीरें अक्सर
सवाल ज्यादा छोड़ जाती हैं,
जवाब कम।
कहीं बेटे को सेट करने की तैयारी तो नहीं
सूत्रों की मानें तो यह मुलाकात केवल
शिष्टाचार तक सीमित नहीं मानी जा रही। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि गाजीपुर सदर
सीट और 2027 के चुनावी समीकरणों को लेकर पर्दे के पीछे नई संभावनाएं टटोली जा रही हैं।
माना जा रहा है कि भाजपा को पूर्वांचल में नई सामाजिक-राजनीतिक जमीन की तलाश है, जबकि
अफजाल अंसारी अपने खिलाफ चल रही कानूनी और प्रशासनिक चुनौतियों के बीच राजनीतिक विकल्प
खुले रखना चाहते हैं।
चर्चा यह भी है कि गाजीपुर की राजनीति
में भविष्य में मनोज सिन्हा परिवार की सक्रिय भूमिका बढ़ सकती है। ऐसे में वर्षों की
अदावत के बाद सामने आई यह मुस्कुराती तस्वीर महज एक फोटो नहीं, बल्कि कई राजनीतिक अटकलों
को जन्म देने वाली घटना बन गई है। हालांकि इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है, लेकिन
पूर्वांचल की राजनीति में इस मुलाकात के दूरगामी निहितार्थ तलाशे जा रहे हैं।
किसी नए समीकरण की आहट तो नहीं
यदि राजनीतिक गलियारों में चल रही चर्चाओं
में जरा भी सच्चाई है तो सवाल केवल एक मुलाकात का नहीं, बल्कि उसके राजनीतिक संदेश
का है। आखिर वह कौन-सी मजबूरी या रणनीति है, जिसने वर्षों से आमने-सामने खड़े राजनीतिक
ध्रुवों को बातचीत की स्थिति में ला दिया? यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि
भाजपा का शीर्ष नेतृत्व, विशेषकर नरेन्द्र मोदी और अमित शाह, सार्वजनिक मंचों से लगातार
यह दावा करता रहा है कि योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश से माफिया राज
का खात्मा हुआ है। ऐसे में यदि कभी उन चेहरों के साथ राजनीतिक संवाद या नजदीकी की तस्वीरें
सामने आती हैं जिन्हें लंबे समय तक उसी राजनीति के विरोधी प्रतीक के रूप में प्रस्तुत
किया गया, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। राजनीति में संदेश अक्सर शब्दों से नहीं, तस्वीरों
से दिए जाते हैं। इसलिए यह चर्चा भी चल रही है कि कहीं यह पूर्वांचल की राजनीति में
किसी नए समीकरण की आहट तो नहीं, या फिर योगी आदित्यनाथ की स्थापित "माफिया विरोधी"
राजनीतिक लाइन से अलग कोई समानांतर संकेत तो नहीं दिया जा रहा। हालांकि अभी तक ऐसा
कोई तथ्य सार्वजनिक नहीं है जो इन अटकलों की पुष्टि करता हो, लेकिन इतना तय है कि इस
मुलाकात ने राजनीतिक पर्यवेक्षकों को नए सिरे से सोचने का अवसर अवश्य दिया है।
एक तस्वीर, कई सियासी मायने
2017 में उत्तर प्रदेश
में भाजपा की ऐतिहासिक जीत
के बाद मुख्यमंत्री पद
की दौड़ में मनोज
सिन्हा का नाम सबसे
प्रमुख दावेदारों में माना जा
रहा था। अंतिम क्षणों
में राजनीतिक फैसला बदला और योगी
आदित्यनाथ ने प्रदेश की
कमान संभाली। इसके बाद योगी
सरकार ने पूर्वांचल में
माफिया नेटवर्क पर सबसे बड़ा
अभियान चलाया, जिसमें मुख्तार अंसारी और उससे जुड़े
राजनीतिक-सामाजिक तंत्र पर लगातार कार्रवाई
होती रही। योगी और
मुख्तार अंसारी की राजनीतिक अदावत
उत्तर प्रदेश की राजनीति का
चर्चित अध्याय रही है। ऐसे
में मनोज सिन्हा और
अफजाल अंसारी की मौजूदा तस्वीर
को लेकर राजनीतिक गलियारों
में कई तरह के
अर्थ निकाले जा रहे हैं।
हालांकि इसके पीछे किसी
राजनीतिक संदेश या 2027 के चुनावी समीकरण
का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण
नहीं है, लेकिन पूर्वांचल
की राजनीति में प्रतीकों और
तस्वीरों की अपनी अलग
भाषा होती है। यही
कारण है कि एक
साधारण शिष्टाचार भेंट भी चर्चा
का विषय बन गई
है।


