Friday, 17 July 2026

मोबाइल उठा... और बन गए पत्रकार?

मोबाइल उठा... और बन गए पत्रकार? 

दिल्ली हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी ने मीडिया जगत के सामने खड़ा किया बड़ा सवाल

प्रेस की आजादी पर नहीं, उसके नाम पर हो रहे दुरुपयोग पर अदालत की चिंता

• कहा लोकतंत्र को निर्भीक पत्रकार तो चाहिए, लेकिन जवाबदेह भी

सुरेश गांधी

          एक समय था जब पत्रकार बनने से पहले वर्षों की तपस्या, तथ्य जुटाने की संस्कृति और समाज के प्रति उत्तरदायित्व की कसौटी से गुजरना पड़ता था। आज तकनीक ने सूचना को लोकतांत्रिक बना दिया है, लेकिन इसी लोकतंत्रीकरण ने पत्रकारिता की परिभाषा पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। मोबाइल कैमरा, एक माइक्रोफोन और सोशल मीडिया मंच ने हर व्यक्ति को प्रसारक बना दिया है। ऐसे दौर में दिल्ली हाईकोर्ट की टिप्पणी केवल एक अदालत की टिप्पणी नहीं, बल्कि उस बहस का केंद्र बन गई है, जो वर्षों से दबे स्वर में चल रही थीक्या पत्रकारिता केवल एक मंच का नाम है, या फिर वह जवाबदेही, विश्वसनीयता और नैतिकता का दूसरा नाम भी है? अदालत ने प्रेस की स्वतंत्रता को लोकतंत्र की आत्मा बताया, लेकिन साथ ही स्पष्ट किया कि इस स्वतंत्रता का उपयोग किसी को डराने, बदनाम करने, ब्लैकमेल करने या अपुष्ट सूचनाओं के प्रसार के लिए नहीं हो सकता। यह टिप्पणी किसी एक व्यक्ति या एक मंच पर नहीं, बल्कि उस बदलते मीडिया परिदृश्य पर है, जहां सूचना की गति कई बार सत्य से भी तेज दौड़ने लगी है। पत्रकारिता का संकट आज तकनीक नहीं, भरोसे का है। लोकतंत्र में नागरिक सबसे पहले समाचार पर विश्वास करता है, फिर अपनी राय बनाता है। यदि समाचार ही संदेह के घेरे में आ जाए, तो लोकतंत्र की बहस भी कमजोर पड़ जाती है। इसलिए अदालत का संदेश केवल सरकार के लिए नहीं, बल्कि पूरे मीडिया जगत के लिए आत्ममंथन का अवसर है। 

लेकिन इस बहस का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जवाबदेही के नाम पर ऐसा कोई ढांचा नहीं बनना चाहिए, जो स्वतंत्र पत्रकारिता की आवाज को कमजोर कर दे। इतिहास गवाह है कि सत्ता से असहज सवाल पूछने वाली पत्रकारिता ही लोकतंत्र को जीवंत रखती है। इसलिए नियमन का उद्देश्य नियंत्रण नहीं, बल्कि विश्वसनीयता का संरक्षण होना चाहिए। असल चुनौती पत्रकार और यूट्यूबर के बीच दीवार खड़ी करना नहीं है। चुनौती यह है कि जो भी स्वयं को पत्रकार कहे, वह सत्य, तथ्य, निष्पक्षता और जनहित की उसी कसौटी पर खरा उतरे, जिस कसौटी ने भारतीय पत्रकारिता को चौथे स्तंभ का सम्मान दिलाया।

दिल्ली हाईकोर्ट की टिप्पणी शायद किसी नए कानून से पहले एक नई चेतावनी हैकलम की ताकत उसकी आवाज में नहीं, उसकी विश्वसनीयता में होती है। जिस दिन पत्रकारिता से भरोसा चला जाएगा, उस दिन सबसे बड़ा नुकसान किसी मीडिया संस्थान का नहीं, बल्कि लोकतंत्र का होगा। हाईकोर्ट की हालिया टिप्पणी केवल एक न्यायिक अवलोकन नहीं, बल्कि बदलते मीडिया परिदृश्य के सामने खड़ा एक बड़ा प्रश्न हैआख़िर पत्रकार कौन है, और उसकी जवाबदेही किसके प्रति है?

अदालत ने प्रेस की स्वतंत्रता को लोकतंत्र का अनिवार्य स्तंभ बताते हुए यह भी कहा कि यह स्वतंत्रता गैर-जिम्मेदार पत्रकारिता, भय पैदा करने या अविश्वसनीय सामग्री फैलाने की ढाल नहीं बन सकती। साथ ही, अदालत ने यह भी चिंता जताई कि आज मोबाइल और माइक्रोफोन के सहारे कोई भी स्वयं को पत्रकार घोषित कर देता है और सरकार से जवाबदेही सुनिश्चित करने वाले नियामक ढांचे पर विचार करने की बात कही।

कलम की आज़ादी और जवाबदेही का नया मोड़

लोकतंत्र में प्रेस को चौथा स्तंभ इसलिए नहीं कहा गया कि उसके हाथ में कैमरा है या उसके पास प्रसारण का माध्यम है। उसे यह सम्मान इसलिए मिला क्योंकि उसके पास सत्य के प्रति प्रतिबद्धता, समाज के प्रति उत्तरदायित्व और सत्ता से सवाल पूछने का नैतिक साहस था। पत्रकारिता कभी केवल पेशा नहीं रही; यह जनविश्वास की वह धरोहर रही है जिसके भरोसे लोकतंत्र अपने नागरिकों से संवाद करता है। डिजिटल युग ने इस व्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया है। सूचना अब समाचार कक्षों की दीवारों तक सीमित नहीं रही। एक मोबाइल फोन, इंटरनेट और सोशल मीडिया मंच ने हर व्यक्ति को अपनी बात कहने का अवसर दिया है। यह परिवर्तन लोकतंत्र के लिए स्वागतयोग्य भी है, क्योंकि इससे अभिव्यक्ति का दायरा बढ़ा है। किंतु इसी बदलाव ने एक नई चुनौती भी खड़ी कर दी हैपत्रकारिता और केवल सामग्री प्रसारित करने के बीच की रेखा धुंधली पड़ने लगी है। हाईकोर्ट की टिप्पणी इसी बदलते परिदृश्य की ओर संकेत करती है। अदालत ने किसी की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रश्न नहीं उठाया, बल्कि यह पूछा कि यदि पत्रकारिता समाज को प्रभावित करने की शक्ति रखती है, तो उसकी जवाबदेही किसके प्रति होगी? यह प्रश्न जितना न्यायालय का है, उससे कहीं अधिक मीडिया जगत का आत्ममंथन भी है।

पत्रकारिता का पहला धर्म तथ्यों की पुष्टि है, न कि सनसनी

पत्रकारिता का पहला उद्देश्य जनहित है, न कि व्यक्तिगत प्रसिद्धि। लेकिन डिजिटल प्रतिस्पर्धा के इस दौर में सबसे पहले खबर देने की होड़ कई बार सबसे सही खबर देने की जिम्मेदारी पर भारी पड़ जाती है। अपुष्ट सूचनाएं, आधे-अधूरे वीडियो, उत्तेजक शीर्षक और व्यक्तिगत आरोप कभी-कभी समाज में भ्रम, अविश्वास और तनाव का कारण बन जाते हैं। ऐसे में अदालत की यह चिंता असंगत नहीं कही जा सकती। परंतु इस बहस का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जवाबदेही के नाम पर ऐसा कोई ढांचा नहीं बनना चाहिए जो प्रेस की स्वतंत्रता को सीमित कर दे। भारत का लोकतंत्र इसलिए मजबूत है क्योंकि यहां पत्रकार सत्ता से असहज प्रश्न पूछ सकता है। यदि नियमन नियंत्रण में बदल गया, तो सबसे पहले खोजी पत्रकारिता प्रभावित होगी। इसलिए किसी भी व्यवस्था का उद्देश्य पत्रकारिता को डराना नहीं, बल्कि उसकी विश्वसनीयता को मजबूत करना होना चाहिए।

स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आपातकाल तक  

भारतीय पत्रकारिता ने स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आपातकाल और अनेक राष्ट्रीय संकटों तक अपने दायित्व का परिचय दिया है। उसी परंपरा को डिजिटल युग में भी आगे बढ़ाना होगा। तकनीक बदल सकती है, माध्यम बदल सकते हैं, लेकिन पत्रकारिता का चरित्र नहीं बदलना चाहिए। हाईकोर्ट की टिप्पणी को यदि प्रतिबंध की चेतावनी के बजाय आत्ममंथन का अवसर माना जाए, तो यह भारतीय मीडिया के लिए एक सकारात्मक मोड़ साबित हो सकती है। लोकतंत्र को न केवल निर्भीक पत्रकार चाहिए, बल्कि विश्वसनीय पत्रकार भी चाहिए। क्योंकि अंततः कलम की सबसे बड़ी ताकत उसकी स्वतंत्रता नहीं, बल्कि उसकी विश्वसनीयता होती है।


छोटे शहरों में निवेश का नया सूर्योदय, काशी से उठा वित्तीय जागरूकता का बिगुल

छोटे शहरों तक निवेश संस्कृति पहुंचाने का संकल्प, वाराणसी में जुटे देशभर के म्यूचुअल फंड विशेषज्ञ 

वित्तीय जागरूकता, निवेशकों के विश्वास और बेहतर समन्वय पर हुआ मंथन, सौ से अधिक वरिष्ठ अधिकारी एक मंच पर आए

सुरेश गांधी

वाराणसी. पूर्वांचल सहित उत्तर प्रदेश के छोटे शहरों में वित्तीय जागरूकता और निवेश संस्कृति को नई गति देने के उद्देश्य से आयोजित एक विशेष सम्मेलन में देश की विभिन्न म्यूचुअल फंड कंपनियों के सौ से अधिक वरिष्ठ अधिकारी एक मंच पर जुटे। कार्यक्रम में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि अब निवेश को महानगरों तक सीमित रखने के बजाय छोटे शहरों और कस्बों तक पहुंचाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। इसके लिए व्यवस्थित निवेश योजना (एसआईपी), डिजिटल निवेश व्यवस्था और निवेशकों के बीच विश्वास को मजबूत बनाना होगा। वाराणसी में आयोजित इस सम्मेलन का आयोजन ठुकराल कैपिटल मार्केट तथा टीसीएम फाइनेंशियल सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड द्वारा किया गया। कार्यक्रम में विभिन्न निवेश प्रबंधन कंपनियों के क्लस्टर प्रमुख, शाखा प्रमुख, संबंध प्रबंधक, संचालन अधिकारी और अन्य वरिष्ठ प्रतिनिधियों ने भाग लिया। 

वित्तीय साक्षरता को सामाजिक परिवर्तन का आधार बताया

कार्यक्रम की अध्यक्षता पूर्व अपर आयुक्त रामाश्रय ने की। उन्होंने कहा कि आर्थिक रूप से सशक्त समाज के निर्माण में वित्तीय साक्षरता की महत्वपूर्ण भूमिका है। यदि लोगों को सही समय पर सही निवेश की जानकारी मिले तो वे भविष्य को अधिक सुरक्षित बना सकते हैं। उन्होंने ग्रामीण और छोटे शहरों तक निवेश संबंधी जानकारी पहुंचाने की आवश्यकता पर बल दिया।

चार दशक की यात्रा साझा करते हुए भावुक हुए अशोक ठुकराल

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए ठुकराल कैपिटल मार्केट के संस्थापक अशोक कुमार ठुकराल ने वर्ष 1987 से अब तक की अपनी निवेश यात्रा का अनुभव साझा किया। उन्होंने कहा कि जब उन्होंने कार्य शुरू किया था, उस समय म्यूचुअल फंड और व्यवस्थित निवेश योजना के बारे में आम लोगों को बहुत कम जानकारी थी। अधिकांश लोग केवल सोना, भूमि और पारंपरिक बचत के साधनों को ही सुरक्षित निवेश मानते थे। उन्होंने कहा कि लगातार जागरूकता अभियान, पारदर्शिता और निवेशकों से विश्वास का संबंध स्थापित करने के प्रयासों का परिणाम है कि आज पूर्वांचल सहित छोटे शहरों में भी म्यूचुअल फंड और एसआईपी तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। यह बदलाव भारत की बदलती आर्थिक सोच का प्रमाण है।

'बिक्री नहीं, विश्वास सबसे बड़ी पूंजी'

सम्मेलन के दौरान कई वक्ताओं ने कहा कि निवेश उद्योग केवल उत्पाद बेचने का माध्यम नहीं है, बल्कि विश्वास का व्यवसाय है। यदि निवेशक का भरोसा कायम रहता है तो उद्योग का विकास स्वतः होता है। इसके लिए पारदर्शी व्यवस्था, समय पर सेवा और बेहतर संवाद आवश्यक है।

संचालन व्यवस्था को बताया उद्योग की रीढ़

कार्यक्रम में कई वरिष्ठ अधिकारियों ने कहा कि किसी भी निवेश प्रबंधन कंपनी की सफलता केवल विपणन करने वाली टीम पर निर्भर नहीं करती, बल्कि संचालन व्यवस्था उसकी सबसे मजबूत आधारशिला होती है। निवेशकों से किए गए प्रत्येक वादे को समय पर पूरा करने की जिम्मेदारी संचालन विभाग निभाता है। इसलिए दोनों के बीच बेहतर समन्वय उद्योग की सफलता के लिए अनिवार्य है।

एक मंच पर दिखी स्वस्थ प्रतिस्पर्धा और आत्मीयता

सम्मेलन की सबसे उल्लेखनीय बात यह रही कि सामान्य परिस्थितियों में एक-दूसरे की प्रतिस्पर्धी मानी जाने वाली निवेश प्रबंधन कंपनियों के अधिकारी पूरे आत्मीय वातावरण में एक-दूसरे के अनुभव साझा करते दिखाई दिए। कई अधिकारियों ने कहा कि वर्षों से एक ही शहर में कार्य करने के बावजूद पहली बार सभी को एक साथ बैठकर परिचय और संवाद का अवसर मिला है। अधिकारियों ने इसे उद्योग के लिए नई शुरुआत बताते हुए कहा कि इस प्रकार के आयोजन आपसी सहयोग, समन्वय और बेहतर कार्य संस्कृति को बढ़ावा देंगे।

उत्कृष्ट कार्य करने वालों का सम्मान

कार्यक्रम के दौरान वर्ष 2025-26 में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले विभिन्न अधिकारियों और क्लस्टर प्रमुखों को सम्मानित भी किया गया। वक्ताओं ने कहा कि बेहतर कार्य करने वालों को सम्मानित करने से पूरे उद्योग को सकारात्मक प्रेरणा मिलती है।

छोटे शहर बनेंगे निवेश का नया केंद्र

सम्मेलन में यह भी माना गया कि आने वाले वर्षों में उत्तर प्रदेश के दूसरे और तीसरे श्रेणी के शहर देश के निवेश मानचित्र पर महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त करेंगे। डिजिटल तकनीक, वित्तीय जागरूकता और व्यवस्थित निवेश योजना के विस्तार से लाखों नए निवेशक इस क्षेत्र से जुड़ेंगे। कार्यक्रम के अंत में सभी प्रतिभागियों ने वित्तीय समावेशन को गति देने, निवेशकों का विश्वास और मजबूत करने तथा छोटे शहरों तक आधुनिक निवेश सेवाएं पहुंचाने का सामूहिक संकल्प लिया।

प्रमुख बिंदु

छोटे शहरों में निवेश संस्कृति के विस्तार पर विशेष जोर।

सौ से अधिक वरिष्ठ अधिकारी एक मंच पर जुटे।

वित्तीय साक्षरता और निवेशकों के विश्वास को सर्वोच्च प्राथमिकता।

संचालन और विपणन टीम के बेहतर समन्वय पर बल।

उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले अधिकारियों का सम्मान।

पूर्वांचल को निवेश के उभरते केंद्र के रूप में विकसित करने का संकल्प।

काशी के प्राचीन जल स्रोतों को नई जिंदगी, ₹58 करोड़ से होगा तालाबों-कुंडों का कायाकल्प

काशी के प्राचीन जल स्रोतों को नई जिंदगी, ₹58 करोड़ से होगा तालाबों-कुंडों का कायाकल्प 

पीएफसी के सीएसआर से ऐतिहासिक पहल

• 25 तालाब, 30 कुंड और 100 सामुदायिक कुओं का होगा जीर्णोद्धार

रुद्राक्ष में हुआ एमओयू, भूजल संरक्षण और सांस्कृतिक विरासत को मिलेगा नया आधार

सुरेश गांधी

वाराणसी। धर्म, संस्कृति और सभ्यता की राजधानी काशी की प्राचीन जल विरासत को संरक्षित करने की दिशा में शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया। पावर फाइनेंस कॉर्पोरेशन लिमिटेड (पीएफसी) ने अपने कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) कार्यक्रम के तहत ₹58 करोड़ की लागत से वाराणसी के ऐतिहासिक तालाबों, कुंडों और सामुदायिक कुओं के संरक्षण, पुनरुद्धार एवं विकास के लिए वाराणसी स्मार्ट सिटी के साथ समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए। रुद्राक्ष अंतरराष्ट्रीय सहयोग एवं सम्मेलन केंद्र में आयोजित समारोह में जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों ने इसे काशी की सांस्कृतिक धरोहर तथा पर्यावरण संरक्षण के लिए मील का पत्थर बताया।

महापौर अशोक तिवारी ने कहा कि काशी की पहचान केवल मंदिरों से नहीं, बल्कि सदियों पुराने तालाबों, कुंडों और कुओं से भी जुड़ी है। इन जल स्रोतों का पुनर्जीवन शहर की सांस्कृतिक विरासत को नई ऊर्जा देगा और आने वाली पीढ़ियों के लिए धरोहर को सुरक्षित रखने का कार्य करेगा। उन्होंने इस पहल के लिए पीएफसी का आभार जताते हुए कहा कि इसका लाभ स्थानीय नागरिकों के साथ देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों को भी मिलेगा। पीएफसी की अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक परमिंदर चोपड़ा ने कहा कि संस्था ऊर्जा अवसंरचना के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रति भी समान रूप से प्रतिबद्ध है। उन्होंने विश्वास जताया कि आधुनिक तकनीक और तय समयसीमा के भीतर परियोजना पूरी होने से भूजल संरक्षण, जल गुणवत्ता और पर्यावरणीय संतुलन को मजबूती मिलेगी।

नगर आयुक्त एवं वाराणसी स्मार्ट सिटी के मुख्य कार्यपालक अधिकारी हिमांशु नागपाल ने बताया कि परियोजना के तहत जल निकायों का वैज्ञानिक तरीके से पुनरुद्धार किया जाएगा। तालाबों और कुंडों की सफाई, सौंदर्यीकरण तथा प्राकृतिक जल शोधन के लिए पर्यावरण अनुकूल तकनीकों का उपयोग होगा, जबकि सामुदायिक कुओं के पुनर्जीवन से स्थानीय क्षेत्रों में स्वच्छ जल उपलब्धता को बढ़ावा मिलेगा। परियोजना के तहत 25 ऐतिहासिक तालाबों, 30 कुंडों और 100 सामुदायिक कुओं का व्यापक जीर्णोद्धार किया जाएगा। इसमें सारनाथ क्षेत्र के तालाबों का पर्यावरणीय पुनर्विकास, कंदवा, संदाहा, रेवागीर, सारंगनाथ, पुलिस लाइन और पांडेयपुर सहित विभिन्न तालाबों की डिसिल्टिंग तथा रानीपोखरी, बैतरणी कुंड, कुरुक्षेत्र तालाब, सोना तालाब, बाबा जगन्नाथ दास सरोवर और पोंगलपुर सहित अनेक जल स्रोतों का संरक्षण एवं जल शोधन कार्य शामिल है।

समारोह के अंत में एमओयू की प्रतियों का आदान-प्रदान हुआ। इसके साथ ही काशी की पारंपरिक जल संस्कृति और आधुनिक सतत विकास को जोड़ने वाली इस महत्वाकांक्षी परियोजना की औपचारिक शुरुआत हो गई। मतलब साफ हैसदियों से काशी की जीवनरेखा रहे तालाब, कुंड और कुएं अब नए स्वरूप में नजर आएंगे। ₹58 करोड़ की सीएसआर परियोजना के तहत पीएफसी और वाराणसी स्मार्ट सिटी ने ऐतिहासिक जल धरोहरों के संरक्षण का संकल्प लिया है। यह पहल केवल सौंदर्यीकरण नहीं, बल्कि जल संरक्षण, पर्यावरण संतुलन और सांस्कृतिक विरासत को पुनर्जीवित करने की दिशा में बड़ा कदम मानी जा रही है।

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