Wednesday, 19 August 2026

बिहार फतह के रणनीतिकार, अब यूपी के खेवनहार तावड़े

बिहार फतह के रणनीतिकार, अब यूपी के खेवनहार तावड़े 

तावड़े की कहानी का सबसे दिलचस्प पक्ष यही है कि 2019 में जिस राजनीतिक अध्याय पर पूर्णविराम दिखाई दे रहा था, वहीं से उनकी राष्ट्रीय राजनीति की नई पारी शुरू हुई। हरियाणा से बिहार और अब उत्तर प्रदेशयह क्रम उनकी संगठनात्मक स्वीकार्यता का संकेत है। बिहार ने उन्हेंजीत का रणनीतिकारबनाया तो यूपी उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर अपनी चुनावी कार्यक्षमता की सबसे बड़ी परीक्षा का अवसर देगा। यही कारण है कि तावड़े की यूपी नियुक्ति को महज एक संगठनात्मक फेरबदल के रूप में देखना मुश्किल है। 2019 में टिकट कटा था, 2020 में संगठन ने बुलाया, 2021 में राष्ट्रीय महामंत्री बने, बिहार में जीत का भरोसा जीता और अब यूपी की पतवार हाथ में है। सियासत में कभी-कभी वापसी शोर से नहीं, धैर्य से लिखी जाती है। तावड़े की कहानी फिलहाल उसी सियासी धैर्य की कहानी है

सुरेश गांधी

भारतीय राजनीति में सत्ता का शिखर जितना दिखाई देता है, संगठन की सीढ़ियां उतनी ही अदृश्य होती हैं। कई बार चुनाव जीतने वाला चेहरा सामने होता है, लेकिन उस जीत की जमीन तैयार करने वाला संगठनकर्ता परदे के पीछे रह जाता है। विनोद तावड़े की सियासी कहानी इसी दूसरी कतार की ताकत का उदाहरण है। महाराष्ट्र की राजनीति में मंत्री, विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष और मुंबई भाजपा के सबसे कम उम्र के अध्यक्ष रहे तावड़े 2019 में अचानक चुनावी राजनीति के हाशिये पर पहुंच गए थे। जिस नेता को कुछ साल पहले तक महाराष्ट्र की सत्ता के प्रमुख चेहरों में गिना जाता था, उसका विधानसभा टिकट कट गया। लेकिन तावड़े ने इसे विद्रोह का कारण नहीं बनाया। उन्होंने संगठन का रास्ता चुना और इंतजार को अपनी रणनीति बना लिया। खुद तावड़े ने 2021 में कहा था कि 2019 में टिकट नहीं मिलने के बाद भी उन्होंने पार्टी छोड़ने का सवाल नहीं उठाया और धैर्य बनाए रखा।

यही धैर्य आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी बना। 2020 में भाजपा ने उन्हें राष्ट्रीय सचिव बनाया और हरियाणा का प्रभारी सौंपा। महज एक साल बाद नवंबर 2021 में वे राष्ट्रीय महामंत्री बन गए। इसके बाद बिहार जैसी चुनौतीपूर्ण राजनीतिक जमीन की जिम्मेदारी मिली। अब बिहार में चुनावी सफलता के बाद भाजपा ने उन्हें उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया है। 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए यह जिम्मेदारी सामान्य संगठनात्मक नियुक्ति नहीं, बल्कि पार्टी की सबसे बड़ी चुनावी परीक्षा की कमान है। उनके साथ जगदीश पटेल को सह-प्रभारी बनाया गया है।

एबीवीपी से शुरू हुआ संगठन का सफर

तावड़े की राजनीति सत्ता के गलियारों से नहीं, छात्र संगठन के आंदोलनों और संगठन निर्माण की जमीन से निकली। उन्होंने 1980 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से सक्रिय रूप से जुड़कर काम शुरू किया और आगे चलकर एबीवीपी में महाराष्ट्र के प्रदेश सचिव तथा राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) जैसी जिम्मेदारियां संभालीं। 1994 में वे सक्रिय भाजपा राजनीति में आए। यही वह दौर था जिसने तावड़े को चुनावी राजनीति से पहले संगठन की बारीकियां सिखाईंकार्यकर्ता तक पहुंचना, छोटे समूहों को जोड़ना, मुद्दे को आंदोलन में बदलना और संगठन को लगातार सक्रिय रखना। उनकी राजनीतिक शैली में आज भी एबीवीपी का वही प्रशिक्षण दिखाई देता है।

महाराष्ट्र में संगठनकर्ता से सत्ता के केंद्र तक

भाजपा में आने के बाद तावड़े महाराष्ट्र संगठन में तेजी से उभरे। 1995 से 1999 तक महाराष्ट्र भाजपा के महासचिव रहे। 1999 में मुंबई भाजपा के अध्यक्ष बने और इस पद पर पहुंचने वाले सबसे कम उम्र के नेताओं में रहे। 2002 में विधान परिषद पहुंचे और 2011 से 2014 तक महाराष्ट्र विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष रहे। 2014 में बोरीवली से विधानसभा पहुंचे और देवेंद्र फडणवीस सरकार में स्कूली शिक्षा, उच्च एवं तकनीकी शिक्षा, चिकित्सा शिक्षा, खेल एवं युवा कल्याण, संस्कृति समेत कई महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभाली। अर्थात तावड़े के पास केवल संगठन का अनुभव नहीं रहा, बल्कि सरकार चलाने और कई विभागों को एक साथ संभालने का प्रशासनिक अनुभव भी रहा। यही मिश्रण आगे चलकर उन्हें राष्ट्रीय स्तर का चुनावी प्रबंधक बनाने में उपयोगी साबित हुआ।

2019 : जब सियासी जमीन खिसकती दिखी

2019 तावड़े के राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा मोड़ था। विधानसभा चुनाव में बोरीवली से उनका टिकट काट दिया गया। इससे पहले वे फडणवीस सरकार में मंत्री रह चुके थे और प्रदेश भाजपा के बड़े नेताओं में शुमार थे। टिकट कटने के बाद उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर सवाल उठे। राजनीतिक हलकों में इसे उनके लिए बड़ा झटका माना गया। लेकिन यहीं से तावड़े की कहानी बाकी नेताओं से अलग होती है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से नाराजगी का रास्ता नहीं चुना। पार्टी छोड़ी, संगठन के खिलाफ मोर्चा खोला। उन्होंने खुद को कार्यकर्ता की भूमिका में रखा। यहीखामोशीआगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी।

वनवासनहीं, राष्ट्रीय राजनीति की तैयारी

2019 के बाद तावड़े के लिए महाराष्ट्र की राजनीति का दरवाजा भले संकरा हुआ, लेकिन दिल्ली का दरवाजा खुल गया। 2020 में उन्हें राष्ट्रीय सचिव और हरियाणा का प्रभारी बनाया गया। हरियाणा और अन्य संगठनात्मक जिम्मेदारियों में उनके प्रदर्शन के बाद 2021 में राष्ट्रीय महामंत्री की जिम्मेदारी मिली। यह वह क्षण था जब महाराष्ट्र का नेता राष्ट्रीय संगठन का रणनीतिकार बनने लगा। भारतीय राजनीति में इसे तावड़े काकमबैकइसलिए कहा जा सकता है क्योंकि जिस समय उनका राज्य की चुनावी राजनीति से पत्ता कटता दिखाई दे रहा था, उसी समय वे धीरे-धीरे दिल्ली के सत्ता-संगठन तंत्र में अपनी जगह बना रहे थे।

बिहार ने बदल दी राष्ट्रीय भूमिका

2022 में तावड़े को बिहार का प्रभारी बनाया गया। यह जिम्मेदारी आसान नहीं थी। भाजपा को ऐसे राज्य में संगठन को मजबूत करना था जहां गठबंधन राजनीति, जातीय समीकरण और सहयोगियों के साथ सीटों का संतुलन बेहद महत्वपूर्ण है। तावड़े की भूमिका संगठन को मजबूत करने, सहयोगियों के साथ तालमेल और चुनावी रणनीति को जमीन तक पहुंचाने में रही। 2024 के लोकसभा चुनाव में बिहार में एनडीए की बढ़त के बाद 2025 के विधानसभा चुनाव में तावड़े की भूमिका और महत्वपूर्ण हुई। चुनावी परिणामों के बाद भाजपा-एनडीए की बड़ी सफलता के रणनीतिकारों में उनका नाम प्रमुखता से लिया गया। बिहार में उनकी शैली का एक महत्वपूर्ण पक्ष गठबंधन प्रबंधन रहा। सीटों के बंटवारे से लेकर सहयोगी दलों के बीच संतुलन तक, भाजपा ने जिस तरह एनडीए को एकजुट रखा, उसमें संगठनात्मक प्रबंधन की भूमिका अहम रही। 2025 में भाजपा और जदयू के बीच 101-101 सीटों का सीट-शेयरिंग समझौता भी उनकी जिम्मेदारियों के बीच सामने आया।

तावड़े की कार्यशैली : सामने कम, जमीन पर ज्यादा

तावड़े को पारंपरिक अर्थों में बड़े जननेता के बजाय संगठन और चुनावी प्रबंधन का नेता माना जाता है। उनकी ताकत भाषणों की चमक से ज्यादा संगठन की परतों को समझने में है। बूथ से लेकर प्रदेश नेतृत्व तक संवाद, सामाजिक समीकरणों की पड़ताल और सहयोगियों के बीच तालमेल उनकी कार्यशैली के प्रमुख हिस्से रहे हैं। यही कारण है कि 2019 के बाद उन्हें लगातार ऐसी जिम्मेदारियां मिलीं, जहां परिणाम संगठनात्मक दक्षता पर निर्भर थे। उनकी राजनीतिक शैली में एक खास बात दिखाई देती हैटकराव से ज्यादा संतुलन, बयान से ज्यादा संगठन और चेहरे से ज्यादा चुनावी मशीनरी।

काशी से भी जुड़ा है चुनावी अनुभव

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी से भी तावड़े का संगठनात्मक और चुनावी जुड़ाव रहा है। 2023 में वे वाराणसी आए थे और पूर्वांचल की लोकसभा सीटों से जुड़ी भाजपा की क्लस्टर बैठक में शामिल हुए थे। उस दौरान संगठन को बूथ और सामाजिक स्तर पर मजबूत करने पर जोर दिया गया था। उपलब्ध रिकॉर्ड उन्हें वाराणसी का औपचारिक चुनाव प्रभारी नहीं बताता, इसलिए इसे काशी से चुनावी-संगठनात्मक जुड़ाव के रूप में देखना अधिक सटीक होगा। यूपी में उनकी नियुक्ति का महत्व इस लिहाज से भी है कि वे राज्य की राजनीतिक जमीन से पूरी तरह अनजान नहीं हैं। अब उन्हें उसी अनुभव को 403 विधानसभा सीटों के विशाल चुनावी भूगोल में उतारना होगा।

अब यूपी : तावड़े की सबसे बड़ी परीक्षा

बिहार में सफलता ने तावड़े की साख को नई ऊंचाई दी, लेकिन उत्तर प्रदेश का राजनीतिक रण उससे कहीं बड़ा है। यहां जातीय समीकरण अधिक बहुस्तरीय हैं, क्षेत्रीय राजनीति की अपनी अलग धार है और 2027 का विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए सत्ता की निरंतरता की परीक्षा होगा। तावड़े के सामने केवल चुनाव जीतने की चुनौती नहीं है। उन्हें संगठन को चुनावी मोड में लाना होगा, सरकार और संगठन के बीच तालमेल मजबूत करना होगा, बूथ स्तर की मशीनरी को सक्रिय रखना होगा और अलग-अलग सामाजिक समूहों के बीच भाजपा की पहुंच को और विस्तार देना होगा।  विशेष रूप से गैर-यादव ओबीसी, पारंपरिक भाजपा समर्थक सामाजिक वर्गों और उन समूहों पर पार्टी की नजर रहेगी जहां 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद राजनीतिक समीकरणों में बदलाव दिखाई दिया था। हालांकि किसी विशेष समुदाय को साधना उनकी आधिकारिक जिम्मेदारी के रूप में घोषित नहीं किया गया है, चुनावी विश्लेषण में सामाजिक समीकरणों को तावड़े की आगामी रणनीति का अहम हिस्सा माना जा रहा है।

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