सुप्रीम कोर्ट के फैसलों ने बदली विरासत की तस्वीर
शादीशुदा बेटियों को पैतृक संपत्ति में बराबरी का हक

भारतीय
समाज
में
बेटी
को
लेकर
दो
तस्वीरें
हमेशा
साथ-साथ
चलती
रही
हैं।
एक
ओर
उसे
देवी,
लक्ष्मी
और
कुल
की
मर्यादा
का
प्रतीक
बताया
जाता
है,
वहीं
दूसरी
ओर
पैतृक
संपत्ति
के
बंटवारे
की
बात
आते
ही
उसे
"पराया
धन"
मानकर
उसके
अधिकारों
पर
प्रश्नचिह्न
लगा
दिया
जाता
है।
सदियों
से
चली
आ
रही
यही
सामाजिक
विडंबना
आज
न्यायपालिका
और
समाज
के
बीच
एक
बड़े
विमर्श
का
विषय
बनी
हुई
है।
सुप्रीम
कोर्ट
के
हालिया
वर्षों
के
अनेक
ऐतिहासिक
फैसलों
ने
स्पष्ट
कर
दिया
है
कि
विवाह
किसी
बेटी
के
संवैधानिक
और
वैधानिक
अधिकारों
का
अंत
नहीं
है।
बेटी
जन्म
से
ही
परिवार
की
सदस्य
है
और
पैतृक
संपत्ति
में
उसका
अधिकार
भी
जन्मसिद्ध
है,
चाहे
वह
विवाहित
हो
या
अविवाहित।
दरअसल
यह
केवल
जमीन,
मकान
या
खेत-खलिहान
के
बंटवारे
का
प्रश्न
नहीं
है।
यह
महिलाओं
की
आर्थिक
स्वतंत्रता,
सामाजिक
सम्मान
और
लैंगिक
समानता
से
जुड़ा
विषय
है।
अदालतों
ने
कानून
की
व्याख्या
कर
अपना
दायित्व
निभा
दिया
है,
लेकिन
असली
चुनौती
अब
समाज
के
सामने
है।
सवाल
यह
है
कि
जब
संविधान,
संसद
और
सर्वोच्च
न्यायालय
बेटी
को
बराबरी
का
अधिकार
दे
चुके
हैं,
तब
क्या
भारतीय
परिवार
भी
अपनी
सोच
में
वही
बदलाव
लाने
को
तैयार
हैं?
यही
प्रश्न
आज
के
सामाजिक
विमर्श
का
सबसे
महत्वपूर्ण
केंद्र
बन
गया
है
सुरेश गांधी
भारत में बेटी
को देवी का स्वरूप
माना जाता है। नवरात्र
में कन्या पूजन होता है,
बेटी को लक्ष्मी कहा
जाता है,
लेकिन जब
बात पैतृक संपत्ति और विरासत की
आती है तो सदियों
तक उसे उसके अधिकारों
से वंचित रखा गया। विडंबना
यह रही कि जिस
बेटी को परिवार की
प्रतिष्ठा और संस्कारों का
आधार माना गया,
उसी
को परिवार की संपत्ति में
हिस्सेदारी देने के प्रश्न
पर समाज का एक
बड़ा वर्ग असहज दिखाई
देता रहा। विवाह होते
ही बेटी को “
पराया
धन”
मान लेने की
मानसिकता ने न केवल
उसके आर्थिक अधिकारों का हनन किया,
बल्कि उसे सामाजिक रूप
से भी कमजोर बनाया।
हालांकि पिछले दो दशकों में
भारत की न्यायपालिका ने
इस सोच को निर्णायक
चुनौती दी है। विशेषकर
सुप्रीम कोर्ट के अनेक ऐतिहासिक
निर्णयों ने यह स्पष्ट
कर दिया है कि
बेटी चाहे विवाहित हो
या अविवाहित,
उसे पैतृक संपत्ति
में वही अधिकार प्राप्त
हैं जो पुत्र को
प्राप्त हैं। कानून की
दृष्टि में अब पुत्र
और पुत्री के बीच कोई
भेद नहीं है। यह
केवल संपत्ति के बंटवारे का
मामला नहीं है। यह
भारतीय समाज में महिलाओं
की स्थिति,
उनकी आर्थिक स्वतंत्रता,
पारिवारिक सम्मान और लैंगिक समानता
का भी प्रश्न है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों ने
केवल कानूनी स्थिति स्पष्ट नहीं की,
बल्कि
भारतीय समाज को यह
संदेश भी दिया कि
संविधान की समानता घर
की चौखट पर आकर
समाप्त नहीं हो सकती।
भारतीय समाज में लंबे
समय तक यह धारणा
बनी रही कि विवाह
के बाद बेटी अपने
मायके से पूरी तरह
अलग हो जाती है।
विवाह के समय दिए
गए दहेज, उपहार अथवा अन्य वस्तुओं
को ही उसका हिस्सा
मान लिया जाता था।
कई परिवारों में बेटियों को
यह कहकर संपत्ति से
वंचित कर दिया जाता
था कि उन्हें विवाह
के समय पर्याप्त सामान
दिया जा चुका है।
इस सोच का परिणाम
यह हुआ कि देश
की करोड़ों महिलाओं के पास अपनी
कोई स्वतंत्र संपत्ति नहीं रही। वे
आर्थिक रूप से पिता,
पति या पुत्र पर
निर्भर बनी रहीं। ग्रामीण
भारत में तो आज
भी अनेक बेटियां अपने
अधिकारों की जानकारी न
होने या सामाजिक दबाव
के कारण हिस्सा मांगने
से बचती हैं। वास्तव
में संपत्ति का अधिकार केवल
जमीन या मकान का
अधिकार नहीं है। यह
सम्मान, सुरक्षा और आत्मनिर्भरता का
भी आधार है। जिस
व्यक्ति के पास संपत्ति
होती है, उसकी सामाजिक
स्थिति और निर्णय लेने
की क्षमता स्वतः बढ़ जाती है।
इसलिए बेटियों को संपत्ति का
अधिकार देना केवल कानूनी
सुधार नहीं, बल्कि सामाजिक क्रांति है। स्वतंत्रता के बाद 1956 में
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम लागू किया गया।
यह कानून उस समय एक
बड़ा सुधार माना गया, लेकिन
इसमें भी पुत्र और
पुत्री के अधिकार पूरी
तरह समान नहीं थे।
पैतृक संपत्ति में पुत्र को
जन्म से सहभाजक (कॉपार्सनर)
माना जाता था। उसे
संपत्ति में जन्मजात अधिकार
प्राप्त था। दूसरी ओर
पुत्री को यह अधिकार
नहीं था। उसे केवल
कुछ सीमित परिस्थितियों में उत्तराधिकारी माना
जाता था। समय के
साथ यह महसूस किया
गया कि यह व्यवस्था
संविधान की समानता की
भावना के अनुरूप नहीं
है। इसी कारण 2005 में
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में महत्वपूर्ण संशोधन
किया गया।
2005 का संशोधन : एक ऐतिहासिक बदलाव
संसद ने 2005 में
कानून में संशोधन करते
हुए बेटियों को भी पुत्रों
के समान सहभाजक का
दर्जा प्रदान कर दिया। इस
संशोधन के बाद : पुत्री
जन्म से ही पैतृक
संपत्ति की सहभाजक बन
गई। उसे पुत्र के
समान अधिकार और दायित्व प्राप्त
हुए। वह संपत्ति के
विभाजन की मांग कर
सकती है। वह अपने
हिस्से को बेच सकती
है, दान कर सकती
है अथवा वसीयत कर
सकती है। विवाह के
बाद भी उसके अधिकार
समाप्त नहीं होते। हालांकि
संशोधन के बाद भी
देशभर में अनेक न्यायालयों
में यह विवाद चलता
रहा कि क्या यह
अधिकार केवल उन बेटियों
को मिलेगा जिनके पिता 2005 में जीवित थे
या उन बेटियों को
भी मिलेगा जिनके पिता पहले ही
निधन हो चुके थे।
यही विवाद आगे चलकर सुप्रीम
कोर्ट तक पहुंचा।
विनीता शर्मा मामला : जिसने बदल दी तस्वीर
साल 2020 में सुप्रीम कोर्ट
ने विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा
मामले में ऐतिहासिक निर्णय
सुनाया। तीन न्यायाधीशों की
पीठ ने कहा कि
बेटी का अधिकार जन्म
से उत्पन्न होता है। यह
अधिकार पिता के जीवित
रहने या न रहने
पर निर्भर नहीं करता। अदालत
ने स्पष्ट कहा : “बेटी को पैतृक
संपत्ति में अधिकार जन्म
से प्राप्त है। यह अधिकार
उसके विवाह से समाप्त नहीं
होता। यह निर्णय इसलिए
महत्वपूर्ण था क्योंकि इससे
देशभर में चल रहे
हजारों विवादों का समाधान हुआ।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी
कहा कि बेटी का अधिकार पुत्र
के समान है। पिता
का 2005 में जीवित होना
आवश्यक नहीं। यदि संपत्ति का
वैध विभाजन पहले नहीं हुआ
है तो बेटी अपना
अधिकार मांग सकती है।
विवाह अधिकार समाप्त करने का आधार
नहीं हो सकता। यह
फैसला भारतीय महिलाओं के संपत्ति अधिकारों
के इतिहास में मील का
पत्थर माना जाता है।
पैतृक और स्व-अर्जित संपत्ति का अंतर
संपत्ति विवादों में सबसे अधिक
भ्रम इसी विषय को
लेकर होता है। पैतृक
संपत्ति वह संपत्ति जो चार पीढ़ियों
से चली आ रही
हो और जिसका विधिवत
विभाजन न हुआ हो।
उदाहरण के लिए : परदादा
→ दादा → पिता → पुत्र/पुत्री. यदि यह संपत्ति अविभाजित
है तो इसे पैतृक
संपत्ति माना जाएगा। इसमें
बेटी और बेटा दोनों
समान हिस्सेदार हैं। स्व-अर्जित
संपत्ति वह संपत्ति जिसे
किसी व्यक्ति ने अपनी आय,
व्यवसाय या अन्य माध्यमों
से स्वयं अर्जित किया हो। ऐसी
संपत्ति के मामले में
व्यक्ति को जीवनकाल में
वसीयत बनाने का अधिकार होता
है। यदि वसीयत नहीं
है और व्यक्ति की
मृत्यु हो जाती है,
तो पुत्री और पुत्र दोनों
समान उत्तराधिकारी होंगे।
शादीशुदा बेटी को अधिकार क्यों?
कई लोग आज
भी प्रश्न उठाते हैं कि विवाह
के बाद बेटी को
पति के घर में
अधिकार मिल जाते हैं,
फिर उसे मायके की
संपत्ति में हिस्सा क्यों
मिलना चाहिए? यह तर्क न
केवल कानूनी रूप से गलत
है बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी अनुचित
है। कारण स्पष्ट हैं
: बेटी भी अपने माता-पिता की संतान
है। उसका जन्म उसी
परिवार में हुआ है।
उसने भी उस परिवार
के विकास में योगदान दिया
है। संविधान समानता का अधिकार देता
है। विवाह नागरिक अधिकारों को समाप्त नहीं
कर सकता। यदि पुत्र विवाह
के बाद भी अपने
पिता की संपत्ति का
उत्तराधिकारी रहता है तो
पुत्री को इससे वंचित
रखने का कोई संवैधानिक
आधार नहीं है।
ग्रामीण भारत की वास्तविकता
कानून बदलने के बावजूद ग्रामीण
क्षेत्रों में स्थिति पूरी
तरह नहीं बदली है।
अनेक गांवों में आज भी
: बेटियों से हिस्सा छोड़ने
के लिए कहा जाता
है। सामाजिक दबाव बनाया जाता
है। भाई-बहन के
संबंध खराब होने का
भय दिखाया जाता है। दस्तावेजों
में नाम दर्ज नहीं
किए जाते। कई मामलों में
बेटियां केवल इसलिए अपना
अधिकार छोड़ देती हैं
क्योंकि उन्हें लगता है कि
संपत्ति मांगने से परिवार टूट
जाएगा। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है
कि अधिकार मांगना परिवार तोड़ना नहीं बल्कि न्याय
प्राप्त करना है।
आर्थिक स्वतंत्रता का आधार है संपत्ति
विश्व स्तर पर किए
गए अनेक अध्ययनों से
यह सिद्ध हुआ है कि
जिन महिलाओं के पास संपत्ति
होती है, वे अधिक
आत्मनिर्भर होती हैं। संपत्ति
से : आर्थिक सुरक्षा मिलती है। घरेलू हिंसा
का जोखिम घटता है। शिक्षा
और स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ता
है। महिलाओं की निर्णय लेने
की क्षमता मजबूत होती है। भारत
में महिलाओं के नाम पर
संपत्ति का प्रतिशत अभी
भी अपेक्षाकृत कम है। इसलिए
संपत्ति अधिकारों का प्रभाव केवल
व्यक्तिगत नहीं बल्कि राष्ट्रीय
विकास से भी जुड़ा
हुआ है।
क्या कृषि भूमि में भी बेटी का अधिकार है?
हाँ। पहले कई
राज्यों में कृषि भूमि
को लेकर अलग-अलग
व्यवस्थाएं थीं। लेकिन अब
अधिकांश मामलों में बेटी को
कृषि भूमि में भी
समान अधिकार प्राप्त हैं। इसका अर्थ
है कि : खेत, बाग,
कृषि भूमि, ग्रामीण संपत्ति पर भी पुत्री
का उतना ही अधिकार
है जितना पुत्र का।
क्या बेटी विभाजन की मांग कर सकती है?
निश्चित रूप से। यदि
पैतृक संपत्ति का विभाजन नहीं
हुआ है तो बेटी
: कानूनी नोटिस भेज सकती है।
राजस्व अभिलेखों में नाम दर्ज
करा सकती है। न्यायालय
में वाद दायर कर
सकती है। संपत्ति का
विभाजन मांग सकती है।
कब नहीं मिलेगा अधिकार?
कुछ परिस्थितियों में
अधिकार सीमित हो सकते हैं।
जैसे : यदि वैध वसीयत
मौजूद हो। यदि संपत्ति
का विधिवत विभाजन पहले हो चुका
हो। यदि कानून के
अनुसार अधिकार समाप्त हो चुके हों।
हालांकि प्रत्येक मामला अपने तथ्यों पर
निर्भर करता है।
सामाजिक परिवर्तन की दिशा
संपत्ति में बेटी की
हिस्सेदारी केवल कानूनी विषय
नहीं है। यह सामाजिक
चेतना का भी प्रश्न
है। जिस समाज में
बेटी को बराबरी का
अधिकार मिलता है : वहां महिलाओं
का सम्मान बढ़ता है। आर्थिक असमानता घटती है। परिवार
अधिक संतुलित बनते हैं। सामाजिक
न्याय मजबूत होता है।
क्या केवल कानून काफी है?
नहीं। कानून रास्ता दिखा सकता है,
लेकिन समाज को चलना
स्वयं पड़ता है। आज आवश्यकता
है बेटियों को उनके अधिकारों
की जानकारी दी जाए। राजस्व
विभाग प्रक्रिया सरल बनाए। कानूनी
सहायता उपलब्ध कराई जाए। परिवार
स्वेच्छा से बेटियों को
हिस्सा दें।
विरासत की नई परिभाषा
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों ने
यह स्पष्ट कर दिया है
कि भारत अब उस
दौर से आगे बढ़
चुका है जहां बेटी
को केवल भावनात्मक जिम्मेदारी
माना जाता था और
आर्थिक अधिकारों से दूर रखा
जाता था। आज बेटी
केवल परिवार की सदस्य नहीं,
बल्कि परिवार की बराबर की
उत्तराधिकारी है। उसकी हिस्सेदारी
दया या उपकार नहीं,
बल्कि उसका वैधानिक और
संवैधानिक अधिकार है। वास्तविक चुनौती
अब अदालतों के सामने नहीं,
बल्कि समाज के सामने
है। प्रश्न यह नहीं कि
कानून क्या कहता है;
प्रश्न यह है कि
क्या हम अपनी सोच
बदलने को तैयार हैं?
जिस दिन भारतीय परिवार
बिना विवाद, बिना मुकदमे और
बिना सामाजिक दबाव के अपनी
बेटियों को उनका वैधानिक
हिस्सा देने लगेंगे, उस
दिन यह माना जाएगा
कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का
उद्देश्य वास्तव में पूरा हुआ।
किसी भी सभ्य समाज
की पहचान इस बात से
होती है कि वह
अपने कमजोर या वंचित वर्गों
के साथ कैसा व्यवहार
करता है। भारत की
बेटियां किसी विशेष कृपा
की नहीं, केवल समान अवसर
और समान अधिकार की
अपेक्षा रखती हैं। और
जब संविधान, संसद तथा सर्वोच्च
न्यायालय तीनों यह कह चुके
हैं कि बेटी और
बेटा बराबर हैं, तब समाज
के पास इस सत्य
को स्वीकार करने के अलावा
कोई नैतिक विकल्प नहीं बचता। वास्तव में,
पैतृक संपत्ति में बेटी का
अधिकार केवल कानून की
जीत नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र, संविधान और सामाजिक न्याय
की भी जीत है।