Thursday, 23 July 2026

सवालों से डरती भीड़, कैमरों पर हमला और लोकतंत्र का घायल चेहरा

सवालों से डरती भीड़, कैमरों पर हमला और लोकतंत्र का घायल चेहरा 

असहमति लोकतंत्र की आत्मा है, लेकिन यदि विरोध की आवाज़ पत्रकारों की आवाज़ दबाने लगे, तो आंदोलन अपने नैतिक आधार से भटक जाता है

जंतर-मंतर की हालिया घटनाएँ इसी चिंताजनक सच की गवाही देती हैं

पत्रकार की आवाज़ दबेगी तो लोकतंत्र की प्रतिध्वनि भी कमजोर पड़ जाएगी; क्योंकि सवालों से भागने वाले समाज कभी मजबूत लोकतंत्र नहीं बना सकते

सुरेश गांधी

वाराणसी. जंतर-मंतर एक बार फिर देश की लोकतांत्रिक चेतना का केंद्र बना। हजारों युवाओं की भीड़, हाथों में तख्तियां, व्यवस्था के खिलाफ नाराजगी, परीक्षा प्रणाली पर सवाल और भविष्य को लेकर बेचैनीयह सब लोकतंत्र का स्वाभाविक और स्वीकार्य स्वरूप है। लेकिन जब इसी भीड़ के बीच कैमरा थामे पत्रकारों को घेरा जाने लगे, उनके साथ धक्का-मुक्की हो, महिला पत्रकारों के साथ अभद्रता की जाए, कैमरे तोड़ने की कोशिश हो, कपड़े फाड़ दिए जाएं और जान बचाने के लिए उन्हें पुलिस सुरक्षा में बाहर निकालना पड़े, तब यह केवल एक घटना नहीं रहती; यह लोकतंत्र के माथे पर लगा एक गहरा प्रश्नचिह्न बन जाती है।

लोकतंत्र चुनाव से बनता है, संविधान से संचालित होता है, सवालों से मजबूत होता है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जीवित रहता है। यदि इन्हीं चार स्तंभों में से किसी एक पर हमला होता है तो लोकतंत्र भीतर से कमजोर होने लगता है। पत्रकारिता उन्हीं स्तंभों में से एक है, जो सत्ता से भी प्रश्न पूछती है और समाज से भी। इसलिए पत्रकार पर हमला किसी व्यक्ति पर नहीं, बल्कि जनता के जानने के अधिकार पर हमला है। सरकार से शिकायत है तो खुलकर कीजिए। परीक्षा व्यवस्था पर सवाल हैं तो पूरे दमखम से उठाइए। पुलिस की कार्रवाई गलत लगती है तो उसका लोकतांत्रिक विरोध कीजिए। मुख्यधारा की मीडिया से असहमति है तो उसकी कठोर आलोचना कीजिए। लेकिन किसी पत्रकार को घेर लेना, उसका चश्मा तोड़ देना, कैमरा छीन लेना, उसके कपड़े फाड़ देना या उसकी गाड़ी पर हमला कर देनायह विरोध नहीं, यह लोकतंत्र की भाषा नहीं, बल्कि भीड़तंत्र की हिंसा है।

सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि क्या बोलने की आज़ादी केवल प्रदर्शनकारियों की है? क्या सवाल पूछने का अधिकार सिर्फ उसी के पास है जो नारे लगा रहा है? जिस पत्रकार के हाथ में माइक है, क्या उसकी गरिमा और सुरक्षा अब भीड़ की इच्छा पर निर्भर करेगी? यदि ऐसा है तो यह केवल पत्रकारिता का संकट नहीं, बल्कि लोकतंत्र के भविष्य का संकट है। इतिहास गवाह है कि हर बड़े जनआंदोलन की विश्वसनीयता उसकी नैतिक शक्ति से बनती है, हिंसा से नहीं। जब आंदोलन में असामाजिक तत्व प्रवेश कर जाते हैं तो सबसे पहले आंदोलन का चरित्र बदलता है। वे चाहते हैं कि कैमरा आए, लेकिन वही दिखाए जो उन्हें पसंद हो। सवाल पूछे जाएं, लेकिन वही जो उनके पक्ष में हों। यह मानसिकता लोकतंत्र नहीं, वैचारिक तानाशाही की पहचान है।

सच को दबाने की हर कोशिश अंततः सच की ताकत ही बढ़ाती है। पत्रकार पर हमला कैमरे को कुछ देर के लिए रोक सकता है, लेकिन सच्चाई की रोशनी को कभी बंद नहीं कर सकता। देश के लाखों छात्र अपने भविष्य के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उनकी पीड़ा वास्तविक है, उनके सवाल भी जायज़ हैं। लेकिन इन्हीं सवालों की आड़ लेकर यदि कुछ लोग हिंसा का रास्ता चुनते हैं, तो वे सबसे पहले उन्हीं छात्रों के संघर्ष को कमजोर करते हैं। आंदोलन का नैतिक बल उसकी शालीनता, अनुशासन और लोकतांत्रिक आचरण में होता है, न कि लाठी, पत्थर और धमकी में। पत्रकार किसी सरकार का प्रवक्ता नहीं होता और न ही किसी आंदोलन का विरोधी। उसका एकमात्र धर्म हैसच को समाज के सामने रखना। यदि पत्रकार सवाल पूछना छोड़ देगा तो सत्ता निरंकुश हो जाएगी और यदि भीड़ सवाल पूछने वालों पर हमला करेगी तो लोकतंत्र भीड़तंत्र में बदल जाएगा। आज आवश्यकता केवल पत्रकारों की सुरक्षा की नहीं, बल्कि उस लोकतांत्रिक संस्कृति की रक्षा की है जिसमें असहमति का सम्मान हो, संवाद का स्थान हो और सवाल पूछने वाले हाथों से माइक छीनने के बजाय उन्हें जवाब दिया जाए। क्योंकि जिस दिन कैमरे खामोश हो जाएंगे, उस दिन लोकतंत्र भी मौन हो जाएगा।

सिर्फ हंगामा नहीं, समाधान भी चाहिए

परीक्षा व्यवस्था में खामियां हैं तो उन पर सवाल उठाना पूरी तरह लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन जंतर-मंतर पर जिस तरह पत्रकारों पर हमले किए जा रहे हैं, कैमरे तोड़े जा रहे हैं, कपड़े फाड़े जा रहे हैं और महिला पत्रकारों के साथ अभद्र व्यवहार हो रहा है, वह किसी भी परिस्थिति में स्वीकार्य नहीं हो सकता। इससे आंदोलन की नैतिक शक्ति कमजोर होती है और असली मुद्दा पीछे छूट जाता है। यदि व्यवस्था में दोष हैं तो केवल विरोध ही नहीं, उसका ठोस समाधान भी सामने आना चाहिए। विशेषज्ञों द्वारा परीक्षा प्रणाली पर अध्ययन किए गए हैं और कई महत्वपूर्ण सिफारिशें भी दी गई हैं। अब आवश्यकता इस बात की है कि परीक्षा प्रक्रिया को पूरी तरह लीक-प्रूफ, पारदर्शी और जवाबदेह बनाने के लिए स्थायी सुधार लागू किए जाएं। सवाल केवल यह नहीं कि पेपर लीक क्यों होते हैं, बल्कि यह भी है कि भविष्य में उन्हें हमेशा के लिए कैसे रोका जाए। परीक्षा प्रणाली की पूरी "पाइपलाइन"—प्रश्नपत्र तैयार करने से लेकर मुद्रण, परिवहन, सुरक्षा और मूल्यांकन तककहां-कहां सुधार की जरूरत है, इस पर गंभीर मंथन होना चाहिए। सिर्फ आंदोलन, नारेबाजी और तोड़फोड़ से समाधान नहीं निकलेगा। इसके लिए संसद में व्यापक बहस, नीति निर्माण और ठोस कानूनों की आवश्यकता है। लोकतंत्र में बदलाव का सबसे प्रभावी रास्ता हिंसा नहीं, बल्कि संवाद, नीति और सुधार है।

भक्ति विमर्श के दो उज्ज्वल नक्षत्रों को नई दृष्टि देने वाले सुभाष राय होंगे प्रो. शुकदेव सिंह स्मृति सम्मान से सम्मानित

भक्ति विमर्श के दो उज्ज्वल नक्षत्रों को नई दृष्टि देने वाले सुभाष राय होंगे प्रो. शुकदेव सिंह स्मृति सम्मान से सम्मानित 

'दिगम्बर विद्रोहिणी अक्क महादेवी' और 'आत्मसंभवा आंडाल' के लिए मिला चयन

काशीनाथ सिंह, अशोक वाजपेयी और आशीष त्रिपाठी की निर्णायक समिति का सर्वसम्मत फैसला

• 24 जुलाई को वाराणसी में होगा सम्मान समारोह

सुरेश गांधी

वाराणसी। भारतीय संत साहित्य, भक्ति परंपरा और स्त्री विमर्श के गंभीर अध्येता तथा वरिष्ठ कवि-संपादक सुभाष राय को वर्ष 2026 का प्रतिष्ठित 'प्रो. शुकदेव सिंह स्मृति सम्मान' प्रदान किया जाएगा। कबीर विवेक परिवार की ओर से दिए जाने वाले इस सम्मान के लिए उनका चयन हिंदी जगत की तीन प्रतिष्ठित विभूतियोंकथाकार प्रो. काशीनाथ सिंह, कवि-आलोचक अशोक वाजपेयी तथा कवि-आलोचक प्रो. आशीष त्रिपाठीकी निर्णायक समिति ने सर्वसम्मति से किया है। सम्मान की घोषणा कबीर विवेक परिवार की प्रमुख डॉ. भगवंती सिंह ने की।

यह सम्मान सुभाष राय को भारतीय भक्ति साहित्य की दो विलक्षण संत कवयित्रियोंअक्क महादेवी और आंडालके जीवन, काव्य और वैचारिक प्रतिरोध पर आधारित उनकी चर्चित कृतियों 'दिगम्बर विद्रोहिणी अक्क महादेवी' तथा 'आत्मसंभवा आंडाल' के लिए प्रदान किया जा रहा है। रज़ा न्यास की अध्येतावृत्ति के अंतर्गत लिखी गई इन दोनों पुस्तकों का प्रकाशन सेतु प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा किया गया है और हिंदी जगत में इन्हें गंभीर अध्ययन तथा नई वैचारिक दृष्टि के लिए व्यापक सराहना मिली है।

निर्णायक मंडल ने अपनी संस्तुति में कहा है कि आंडाल और अक्क महादेवी भारतीय भक्ति आंदोलन में उस जनतांत्रिक चेतना की प्रतिनिधि हैं, जिसने धर्म, समाज और साहित्य को नए विचारों से समृद्ध किया। सुभाष राय ने अपनी इन पुस्तकों में केवल उनके आध्यात्मिक पक्ष का ही नहीं, बल्कि उनके भीतरी संघर्ष, स्त्री अस्मिता, सामाजिक प्रतिरोध और सांस्कृतिक चेतना का भी अत्यंत सूक्ष्म एवं प्रामाणिक विश्लेषण प्रस्तुत किया है। यही विशेषता इन कृतियों को समकालीन हिंदी आलोचना में विशिष्ट स्थान प्रदान करती है।

सम्मान के संयोजक एवं काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रोफेसर मनोज कुमार सिंह ने बताया कि संत साहित्य के अप्रतिम अध्येता प्रो. शुकदेव सिंह की स्मृति में स्थापित यह सम्मान प्रतिवर्ष उनकी जन्मतिथि 24 जुलाई को प्रदान किया जाता है। इस वर्ष भी वाराणसी में आयोजित गरिमामय समारोह में सुभाष राय को सम्मानित किया जाएगा।

गौरतलब है कि गाजीपुर में जन्मे प्रो. शुकदेव सिंह हिंदी जगत में संत साहित्य के सबसे प्रतिष्ठित विद्वानों में गिने जाते हैं। काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के प्रोफेसर रहे शुकदेव सिंह ने संत साहित्य पर अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकों का लेखन एवं संपादन किया। उनके शोध और आलोचनात्मक कार्य आज भी संत साहित्य के शोधार्थियों और अध्येताओं के लिए आधारग्रंथ का महत्व रखते हैं। भारतीय संत परंपरा के गहन अध्ययन को नई दिशा देने में उनका योगदान अविस्मरणीय माना जाता है।

सम्मान के लिए चयनित सुभाष राय का जन्म उत्तर प्रदेश के मऊ जनपद के बड़ागांव में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा गांव की पाठशाला में प्राप्त करने के बाद उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित साहित्य संस्थान के.एम.आई. से हिंदी भाषा एवं साहित्य में प्रथम श्रेणी से स्नातकोत्तर तथा विधि की शिक्षा पूरी की। इसके बाद उत्तर भारत के सुप्रसिद्ध संत कवि दादूदयाल के रचना संसार पर शोध कर उन्होंने अपनी अकादमिक पहचान स्थापित की। सुभाष राय का व्यक्तित्व साहित्य और पत्रकारितादोनों क्षेत्रों में समान रूप से सम्मानित है। उन्होंने दशकों तक हिंदी पत्रकारिता में अनेक प्रतिष्ठित दैनिक समाचार पत्रों में शीर्ष संपादकीय दायित्व निभाए और वर्तमान में जनसंदेश टाइम्स के प्रधान संपादक के रूप में कार्यरत हैं। उनकी लेखनी में साहित्यिक संवेदना, सामाजिक सरोकार और वैचारिक स्पष्टता का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।

उनकी प्रकाशित कृतियों में कविता संग्रह 'सलीब पर सच' और 'मूर्तियों के जंगल में', निबंध संग्रह 'जाग मछन्दर जाग' तथा संस्मरण एवं आलोचनात्मक लेखों का संग्रह 'अंधेरे के पार' शामिल हैं। वहीं 'दिगम्बर विद्रोहिणी अक्क महादेवी' और 'आत्मसंभवा आंडाल' ने उन्हें भारतीय भक्ति साहित्य के गंभीर अध्येता के रूप में नई प्रतिष्ठा दिलाई है। सुभाष राय को इससे पूर्व नई धारा रचना सम्मान, माटी रतन सम्मान, देवेन्द्र कुमार बंगाली स्मृति कविता सम्मान तथा स्पंदन कृति आलोचना सम्मान सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से अलंकृत किया जा चुका है। अब प्रो. शुकदेव सिंह स्मृति सम्मान उनके साहित्यिक अवदान की एक और महत्वपूर्ण स्वीकृति के रूप में देखा जा रहा है।

यह सम्मान केवल एक लेखक का अभिनंदन नहीं, बल्कि भारतीय संत परंपरा, भक्ति साहित्य और स्त्री चेतना पर गंभीर अनुसंधान की उस सतत परंपरा का भी सम्मान है, जिसने हिंदी साहित्य को नई वैचारिक ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। वाराणसी की सांस्कृतिक धरती पर 24 जुलाई को आयोजित होने वाला यह समारोह साहित्य और शोध जगत के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर माना जा रहा है।

रेल क्रांति की नई इबारत... पटरियों पर दौड़ रहा ‘नया भारत’

रेल क्रांति की नई इबारत... पटरियों पर दौड़ रहानया भारत’ 

वंदे भारत से अमृत भारत तक, रिकॉर्ड रेल लाइन बिछाने से लेकर लगभग पूर्ण विद्युतीकरण तक...

अश्विनी वैष्णव के कार्यकाल में भारतीय रेल ने रफ्तार, सुरक्षा और तकनीकतीनों मोर्चों पर बनाई नई पहचान

अब लक्ष्य बुलेट ट्रेन, 800 वंदे भारत और विश्वस्तरीय नेटवर्क

सुरेश गांधी

वाराणसी. भारतीय रेल आज केवल यात्रियों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने का माध्यम नहीं रह गई है, बल्कि देश की आर्थिक धड़कन और विकास की सबसे बड़ी जीवनरेखा बन चुकी है। पिछले कुछ वर्षों में रेलवे जिस गति से बदली है, उसने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। यही वजह है कि आज भारत दुनिया के सबसे तेजी से आधुनिक होते रेल नेटवर्क वाले देशों में गिना जा रहा है। रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव के कार्यकाल में रेलवे ने केवल नई ट्रेनों की संख्या ही नहीं बढ़ाई, बल्कि सुरक्षा, तकनीक, यात्री सुविधाओं और बुनियादी ढांचे में भी बड़े बदलाव दर्ज किए हैं। रेलवे अब उस सोच से आगे बढ़ चुका है, जहां केवल नई ट्रेनें चलाना उपलब्धि मानी जाती थी। अब फोकस हैतेज, सुरक्षित, आधुनिक और पर्यावरण-अनुकूल रेल व्यवस्था।

नई ट्रेनों की सबसे तेज रफ्तार

2021 में रेल मंत्रालय संभालने के बाद अश्विनी वैष्णव के नेतृत्व में रेलवे ने वंदे भारत, अमृत भारत, नमो भारत और आधुनिक मेमू सेवाओं का विस्तार किया। 2025 के अंत तक 164 वंदे भारत ट्रेनें संचालित हो चुकी थीं और 2026 में वंदे भारत स्लीपर सेवा भी शुरू हो गई। सरकार का लक्ष्य 2030 तक 800 वंदे भारत और 2047 तक 4,500 नई पीढ़ी की ट्रेनें तैयार करने का है। इसके साथ ही अमृत भारत एक्सप्रेस, नई एक्सप्रेस ट्रेनों और क्षेत्रीय रेल सेवाओं का भी लगातार विस्तार किया जा रहा है।

सिर्फ ट्रेनें नहीं, पूरी रेलवे बदल रही है

रेलवे की सबसे बड़ी उपलब्धियों में रिकॉर्ड स्तर पर नई रेल लाइनें बिछाना, डबलिंग, तीसरी-चौथी लाइन, इलेक्ट्रिफिकेशन और स्टेशन पुनर्विकास शामिल हैं। पिछले एक दशक में देश में 35 हजार किमी से अधिक नई रेल लाइनें जोड़ी गई हैं तथा लगभग पूरे ब्रॉडगेज नेटवर्क का विद्युतीकरण पूरा होने की ओर है। इससे डीजल पर निर्भरता घटी है और संचालन अधिक तेज किफायती हुआ है।  

सुरक्षा में ऐतिहासिक बदलाव

रेलवे अब दुर्घटनाओं को कम करने के लिए कवच जैसी स्वदेशी ट्रेन सुरक्षा प्रणाली का तेजी से विस्तार कर रहा है। आधुनिक सिग्नलिंग, स्वचालित सुरक्षा तंत्र, एलएचबी कोच और नई तकनीकों ने रेलवे की सुरक्षा को नई ऊंचाई दी है। वंदे भारत ट्रेनों में अत्याधुनिक सुरक्षा और यात्री सुविधाएं मानक बन चुकी हैं।  

स्टेशन भी बन रहे एयरपोर्ट जैसे

देशभर में 1,300 से अधिक रेलवे स्टेशनों के पुनर्विकास पर काम चल रहा है। इनमें से सैकड़ों स्टेशनों पर कार्य पूरा हो चुका है या अंतिम चरण में है। आधुनिक प्रतीक्षालय, फूड कोर्ट, डिजिटल सूचना प्रणाली, एस्केलेटर, लिफ्ट और मल्टीमॉडल कनेक्टिविटी पर विशेष जोर है।

माल ढुलाई में भी बड़ी छलांग

रेलवे अब केवल यात्री सेवा तक सीमित नहीं है। डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर, आधुनिक मालगाड़ियां, लॉजिस्टिक पार्क और कंटेनर परिवहन से उद्योगों को नई ताकत मिली है। इससे सड़क परिवहन का दबाव घट रहा है और निर्यात क्षमता भी मजबूत हो रही है।

आगे का रोडमैप

रेल मंत्रालय की अगली प्राथमिकताओं में शामिल हैं— 2030 तक 800 वंदे भारत ट्रेनें। 260 वंदे भारत स्लीपर रेक का निर्माण। बुलेट ट्रेन परियोजना को चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाना। हर प्रमुख शहर को आधुनिक सेमी हाईस्पीड रेल नेटवर्क से जोड़ना। रेलवे में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल टिकटिंग और स्मार्ट मेंटेनेंस का विस्तार।

क्या चीन से आगे निकल रहा है भारत?

भारतीय रेल का नेटवर्क अभी भी लंबाई के मामले में दुनिया के सबसे बड़े नेटवर्कों में शामिल है और आधुनिकीकरण की गति उल्लेखनीय है। हालांकि चीन आज भी हाई-स्पीड रेल नेटवर्क की लंबाई में दुनिया में पहले स्थान पर है। भारत की उपलब्धि यह है कि उसने स्वदेशी तकनीक, बड़े पैमाने पर विद्युतीकरण, स्टेशन पुनर्विकास और नई पीढ़ी की ट्रेनों के विस्तार में हाल के वर्षों में अभूतपूर्व गति दिखाई है। भारतीय रेल दुनिया के सबसे तेज़ी से आधुनिक हो रहे रेल नेटवर्कों में शामिल हो चुकी है।

रेलवे की बड़ी उपलब्धियां

164 वंदे भारत ट्रेनें 2025 के अंत तक संचालन में।  

वंदे भारत स्लीपर सेवा शुरू, 260 रेक निर्माण की योजना।  

35,000 किमी से अधिक नई रेल लाइनें एक दशक में।

लगभग 100% ब्रॉडगेज विद्युतीकरण की दिशा में भारत।

1,300+ स्टेशन अमृत भारत स्टेशन योजना के तहत विकसित हो रहे हैं।

2030 तक 800 वंदे भारत ट्रेनों का लक्ष्य।  

दुनिया की सबसे आधुनिक, सुरक्षित और भरोसेमंद रेल व्यवस्था बने  

"रेलवे में जो बदलाव आज दिख रहा है, वह आने वाले विकसित भारत की मजबूत नींव है। भारतीय रेल केवल परिवहन का साधन नहीं, विकसित भारत की विकास-रेखा है। हमारा संकल्प है कि भारतीय रेल दुनिया की सबसे आधुनिक, सुरक्षित और भरोसेमंद रेल व्यवस्था बने। हमारा लक्ष्य हैहर यात्री को सुरक्षित, तेज और विश्वस्तरीय यात्रा का अनुभव देना। वंदे भारत, अमृत भारत, कवच और स्टेशन आधुनिकीकरण इसी परिवर्तन के प्रतीक हैं।"

 अश्विनी वैष्णव, रेल मंत्री

सवालों से डरती भीड़, कैमरों पर हमला और लोकतंत्र का घायल चेहरा

सवालों से डरती भीड़, कैमरों पर हमला और लोकतंत्र का घायल चेहरा  असहमति लोकतंत्र की आत्मा है, लेकिन यदि विरोध की आवाज़ पत्रकारों की आवाज़ दब...