Thursday, 26 February 2026

सवालों से घबराहट या सच से बेचैनी? प्रेस वार्ताओं में पत्रकारों पर बरसते अखिलेश यादव

सवालों से घबराहट या सच से बेचैनी? प्रेस वार्ताओं में पत्रकारों पर बरसते अखिलेश यादव 

लोकतंत्र में प्रेस वार्ता जवाब देने का मंच होती है, लेकिन जब वही मंच सवालों से बचने और सवाल पूछने वालों को कठघरे में खड़ा करने का माध्यम बन जाए, तो चिंता स्वाभाविक है। हाल के दिनों में जिस तरह प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान पत्रकारों की नीयत पर सवाल उठाए जा रहे हैं, उनकी पेशेवर ईमानदारी पर तंज कसे जा रहे हैं और यहां तक कि उनकी सामाजिक पहचान तक को चर्चा का विषय बनाया जा रहा है, उसने राजनीतिक संवाद की मर्यादा पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। सवाल यह नहीं कि मीडिया पर आलोचना क्यों हो रही है, सवाल यह है कि क्या हर असहज प्रश्न का जवाब पत्रकार कोबिकाऊबताकर दिया जाएगा? लोकतंत्र में असहमति स्वीकार करने की क्षमता ही नेतृत्व की परिपक्वता का पैमाना होती है। लेकिन जब राजनीतिक मंचों पर तथ्य कम और तंज अधिक दिखने लगें, तो यह धारणा बनती है कि बहस मुद्दों से भटक रही है। पत्रकार सत्ता से भी सवाल पूछता है और विपक्ष से भी, यही उसका दायित्व है। यदि सवालों को अपमान से दबाने की कोशिश होगी, तो यह केवल मीडिया का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संवाद के स्तर का भी क्षरण होगा 

सुरेश गांधी

लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहलाने वाली पत्रकारिता पर जब राजनीतिक मंचों से सवाल उठते हैं, तो यह सामान्य राजनीतिक प्रतिक्रिया मानी जा सकती है। लेकिन जब प्रेस वार्ताओं के दौरान पत्रकारों की नीयत, पेशेवर ईमानदारी और यहां तक कि उनकी जाति पर टिप्पणी होने लगे, तब यह मुद्दा केवल राजनीति का नहीं रह जाता, यह लोकतांत्रिक मर्यादा और संवाद संस्कृति से जुड़ जाता है। इन दिनों यूपी की राजनीति में यह बहस तेज है कि क्या विपक्ष की भूमिका निभाते हुए नेताओं को मीडिया पर व्यक्तिगत टिप्पणियों से बचना चाहिए या नहीं। विशेष रूप से समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव की हालिया प्रेस वार्ताओं को लेकर पत्रकार समुदाय में असहजता की चर्चा बढ़ी है। यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि मीडिया और राजनीति का रिश्ता टकराव का नहीं, बल्कि जवाबदेही का होना चाहिए।

मतलब साफ है जब राजनीति में बयानबाज़ी हावी हो जाती है और मीडिया पर सवाल खड़े किए जाते हैं, तब सबसे मजबूत जवाब भावनाओं से नहीं बल्कि आँकड़ों से मिलता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि आरोप-प्रत्यारोप से अलग हटकर तथ्यों की रोशनी में उस दौर का विश्लेषण किया जाए, जब अखिलेश यादव के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश की सत्ता समाजवादी पार्टी के हाथ में थी। राजनीतिक मंचों से मीडिया पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक अधिकार हो सकता है, लेकिन जब पत्रकारिता को जाति, विचारधारा याबिकाऊजैसे शब्दों से जोड़ दिया जाता है, तब यह बहस केवल राजनीति तक सीमित नहीं रहती, यह लोकतंत्र की विश्वसनीयता से जुड़ जाती है। ऐसे में जरूरी है कि उस दौर के अपराध, दंगे, पत्रकार सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था को आधिकारिक डेटा के आधार पर देखा जाए।

भारतीय राजनीति में मीडिया पर आरोप नई बात नहीं है। लगभग हर दल विपक्ष में रहते हुए मीडिया पर सवाल उठाता है और सत्ता में आने पर उसी मीडिया से संवाद भी करता है। लेकिन जब पूरे मीडिया वर्ग कोजातिवादीयाबिकाऊकहा जाता है, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या इससे लोकतांत्रिक संवाद मजबूत होता है या कमजोर। पत्रकारिता में कमियाँ हो सकती हैं, लेकिन पत्रकारों को सामूहिक रूप से अपमानित करना लोकतांत्रिक विमर्श को सीमित करता है।

अपराध बनाम धारणा : राजनीति की असली लड़ाई

राजनीति केवल आँकड़ों की नहीं बल्कि धारणा की भी होती है। 2012 से 2017 के बीच : अपराध के आँकड़े चर्चा में रहे, दंगों ने राजनीतिक माहौल बदला, पत्रकार सुरक्षा मुद्दा बना, बाहुबलियों के आरोप लगातार उठे. इन सबने मिलकर एक ऐसी राजनीतिक धारणा बनाई, जिसने आगे के चुनावी परिणामों को भी प्रभावित किया। बड़ा सवालः क्या आँकड़े राजनीति बदल देते हैं? एनसीआरबी डेटा यह बताता है कि अपराध का पैटर्न जटिल होता है। लेकिन राजनीति में धारणा अक्सर आँकड़ों से ज्यादा असर डालती है। जब जनता को लगता है कि : अपराध बढ़ रहा है, प्रशासन कमजोर है, राजनीतिक बयान ज्यादा हैं और कार्रवाई कम, तो चुनावी परिणाम भी उसी दिशा में जाते हैं। मीडिया पर सवाल उठाना आसान है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल हमेशा यही रहेगा : क्या जनता सुरक्षित महसूस कर रही थी? यही प्रश्न किसी भी सरकार की असली परीक्षा होता है।

3. पत्रकार सुरक्षा से जुड़े मामले

पत्रकारों पर हमलों के कुछ चर्चित मामलों का उल्लेख उस समय मीडिया में हुआ : 2015 में पत्रकार जगेंद्र सिंह की मौत का मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया। परिवार ने स्थानीय पुलिस पर आरोप लगाए थे; बाद में जांच हुई, लेकिन इस मामले को लेकर राजनीतिक विवाद जारी रहा। अलग-अलग जिलों में पत्रकारों पर हमले के कई मामले दर्ज हुए, परंतु इन सभी को सीधे राज्य सरकार से जोड़ना यासंगठित नीतिकहना प्रमाणित नहीं है। आँकड़ों का स्रोत : पत्रकारों पर हमलों का अलग से समेकित राज्यवार आधिकारिक डेटा नियमित रूप से उपलब्ध नहीं होता; अधिकतर घटनाएँ थ्प्त् स्तर या मीडिया रिपोर्टों में दर्ज रहती हैं।

भ्रष्टाचार से जुड़े राजनीतिक आरोप

एक्सप्रेसवे, खनन और कुछ सरकारी परियोजनाओं को लेकर विपक्ष ने आरोप लगाए। अधिकांश मामलों में जांच या राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप स्तर की स्थिति रही; अंतिम न्यायिक दोष सिद्धि बहुत सीमित मामलों में ही हुई।

लोकतंत्र में प्रेस वार्ता का उद्देश्य

प्रेस वार्ता का मूल उद्देश्य होता है, सरकार या विपक्ष अपनी बात रखे, पत्रकार सवाल पूछें, जनता तक तथ्य पहुंचे, लेकिन जब सवाल पूछने वाले पत्रकारों को ही कटघरे में खड़ा किया जाने लगे, तो संवाद की दिशा बदल जाती है। पत्रकारिता का धर्म है सवाल पूछना। यह सवाल सत्ता से भी होंगे और विपक्ष से भी। लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि कोई भी सार्वजनिक पद पर बैठा व्यक्ति आलोचना से ऊपर नहीं होता।

सवालों से असहजता या रणनीतिक प्रतिक्रिया?

भारतीय राजनीति में यह नया नहीं है कि नेता मीडिया पर पक्षपात का आरोप लगाते रहे हैं। लगभग हर दल ने अपने-अपने समय में मीडिया के एक हिस्से पर सवाल उठाए हैं। लेकिन हाल के दिनों में जिस तरह प्रेस वार्ताओं में पत्रकारों की नीयत पर टिप्पणी, उनके सवालों की मंशा पर संदेह और उनकी सामाजिक पहचान तक को मुद्दा बनाया गया, उसने बहस को नया मोड़ दिया है। यह प्रवृत्ति कई कारणों से चिंता का विषय है : इससे पत्रकार और नेता के बीच संवाद कमजोर होता है। जनता तक मुद्दों की बजाय आरोप पहुंचते हैं। लोकतांत्रिक विमर्श का स्तर गिरता है।

पत्रकारिता पर अविश्वास का राजनीतिक ट्रेंड

पिछले एक दशक में राजनीति में एक नया ट्रेंड देखने को मिला है, जब सवाल कठिन हों, तो मीडिया पर सवाल उठाओ। यह केवल एक दल तक सीमित नहीं है। सत्ता और विपक्ष दोनों ही समय-समय पर ऐसा करते रहे हैं। लेकिन जब यह लगातार होने लगे, तब यह पत्रकारिता की विश्वसनीयता से अधिक लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर असर डालता है। पत्रकारिता पूर्णतः निष्पक्ष है, यह दावा करना भी अतिशयोक्ति होगा। लेकिन पत्रकारिता पूरी तरह बिक चुकी है, यह कहना भी उतना ही अतिरंजित है। सच इन दोनों के बीच कहीं है।

पेशेवर असहमति बनाम व्यक्तिगत टिप्पणी

किसी पत्रकार के सवाल से असहमति होना स्वाभाविक है। लेकिन सवाल पूछने वाले की नीयत या जाति पर टिप्पणी करना लोकतांत्रिक संवाद के मानकों से मेल नहीं खाता। प्रेस वार्ता में बैठा पत्रकार किसी दल का प्रतिनिधि नहीं होता, वह जनता का प्रतिनिधि होता है। उसका सवाल असुविधाजनक हो सकता है, लेकिन असुविधा लोकतंत्र का हिस्सा है।

राजनीतिक स्मृति और सार्वजनिक छवि

राजनीति में सार्वजनिक स्मृति बहुत महत्वपूर्ण होती है। जब कोई नेता लंबे समय तक सत्ता में रहा हो, तो उसके अपने कार्यकाल से जुड़े सवाल भी उठते हैं। अखिलेश यादव 2012 से 2017 तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। उस दौरान विकास कार्यों के साथ-साथ कानून-व्यवस्था को लेकर राजनीतिक बहस भी हुई। आज जब वे विपक्ष में हैं, तो स्वाभाविक है कि उनसे भी उसी तरह सवाल पूछे जाएंगे जैसे किसी भी सक्रिय नेता से पूछे जाते हैं। लोकतंत्र में यही संतुलन व्यवस्था को मजबूत बनाता है।

बयानबाज़ी का असर : पत्रकारों का मनोबल

पत्रकार किसी राजनीतिक दल का कार्यकर्ता नहीं होता। वह मैदान में काम करने वाला पेशेवर होता है, कभी धूप में, कभी तनावपूर्ण परिस्थितियों में, कभी जोखिम उठाकर। जब सार्वजनिक मंच से पत्रकारों की सामूहिक छवि पर टिप्पणी होती है, तो इसका असर केवल मीडिया संस्थानों पर नहीं बल्कि उन हजारों फील्ड रिपोर्टरों पर पड़ता है जो सीमित संसाधनों में काम करते हैं। यह मुद्दा इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि पत्रकारिता केवल नौकरी नहीं, बल्कि जिम्मेदारी भी है।

लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका

मीडिया की भूमिका तीन स्तरों पर होती है : सूचना देना, सवाल पूछना, जवाबदेही सुनिश्चित करना. यदि मीडिया सवाल नहीं पूछेगा तो लोकतंत्र कमजोर होगा। यदि नेता सवालों से नाराज होंगे तो संवाद कमजोर होगा। इसलिए दोनों के बीच संतुलन जरूरी है।

राजनीतिक संवाद का बदलता स्वर

भारतीय राजनीति में भाषा का स्तर पिछले कुछ वर्षों में लगातार चर्चा का विषय रहा है। सोशल मीडिया के दौर में बयान तेजी से फैलते हैं और उनकी व्याख्या भी उतनी ही तेजी से होती है। ऐसे में नेताओं की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। क्योंकि उनके शब्द केवल मंच तक सीमित नहीं रहते, वे सार्वजनिक धारणा बनाते हैं।

आरोप बनाम आत्ममंथन

राजनीति में आरोप लगाना आसान होता है। लेकिन आत्ममंथन कठिन। यदि मीडिया पर सवाल हैं तो संवाद होना चाहिए। यदि कवरेज पर असहमति है तो तथ्य रखने चाहिए। लेकिन यदि पूरी पत्रकार बिरादरी को एक ही फ्रेम में रख दिया जाए, तो इससे समस्या का समाधान नहीं होता।

लोकतांत्रिक संस्थाओं का सम्मान क्यों जरूरी?

लोकतंत्र केवल चुनाव से नहीं चलता। यह संस्थाओं से चलता है : न्यायपालिका, चुनाव आयोग, मीडिया, प्रशासन. इन संस्थाओं पर भरोसा लोकतंत्र की रीढ़ है। यदि लगातार अविश्वास का माहौल बनाया जाए, तो इसका असर व्यवस्था पर पड़ता है।

पत्रकारिता की चुनौतियाँ भी कम नहीं

यह भी सच है कि पत्रकारिता पूरी तरह आदर्श स्थिति में नहीं है। टीआरपी का दबाव, डिजिटल प्रतिस्पर्धा, संसाधनों की कमी. इन सबने मीडिया को प्रभावित किया है। लेकिन इन चुनौतियों के बावजूद हजारों पत्रकार निष्पक्षता से काम कर रहे हैं। इसलिए पूरे पेशे को एक ही नजर से देखना उचित नहीं।

संवाद बनाम टकराव : कौन सा रास्ता बेहतर?

राजनीति में दो रास्ते होते हैं : पहला : टकराव, दूसरा : संवाद, टकराव सुर्खियां देता है। संवाद भरोसा देता है। लोकतंत्र को सुर्खियों से ज्यादा भरोसे की जरूरत होती है।

राजनीतिक परिपक्वता का सवाल

अखिलेश यादव युवा नेतृत्व के रूप में राजनीति में आए और उन्होंने प्रशासनिक अनुभव भी हासिल किया। ऐसे में उनसे अपेक्षा भी अधिक है कि वे राजनीतिक संवाद को संतुलित रखें। सवालों का जवाब तथ्यों से दिया जा सकता है, लेकिन सवाल पूछने वाले को निशाना बनाना बहस को भटका देता है।

मीडिया और राजनीति : परस्पर निर्भर संबंध

मीडिया और राजनीति एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। मीडिया राजनीति को जनता तक पहुंचाता है, राजनीति मीडिया को मुद्दे देती है. इसलिए दोनों के बीच सम्मान का रिश्ता जरूरी है।

बदलते राजनीतिक नैरेटिव में प्रेस की भूमिका

आज राजनीति में नैरेटिव सबसे बड़ी ताकत है। लेकिन नैरेटिव केवल बयान से नहीं बनता, यह तथ्य, संवाद और भरोसे से बनता है। यदि मीडिया पर लगातार सवाल उठेंगे, तो जनता भी भ्रमित होगी।

मर्यादा ही लोकतंत्र की शक्ति

लोकतंत्र में आलोचना आवश्यक है, लेकिन मर्यादा उससे भी अधिक आवश्यक है। नेताओं को पत्रकारों के सवालों से असहमति हो सकती है, लेकिन व्यक्तिगत टिप्पणियाँ लोकतांत्रिक परंपरा को कमजोर करती हैं। पत्रकारों को भी निष्पक्षता बनाए रखनी चाहिए और नेताओं को भी संवाद का स्तर बनाए रखना चाहिए।

सवालों से नहीं, संवाद से मजबूत होगा लोकतंत्र

आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीतिक बयानबाज़ी से ऊपर उठकर लोकतांत्रिक संस्थाओं का सम्मान किया जाए। पत्रकार लोकतंत्र के विरोधी नहीं होते, वे लोकतंत्र के प्रहरी होते हैं। यदि राजनीति और मीडिया के बीच संवाद मजबूत होगा तो लोकतंत्र भी मजबूत होगा। और यदि संवाद की जगह आरोप ले लेंगे, तो सबसे ज्यादा नुकसान जनता का होगा।

अखिलेश यादव बनाम योगी आदित्यनाथ

उत्तर प्रदेश की राजनीति में कानून-व्यवस्था हमेशा सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा रहा है। 2012 से 2017 तक समाजवादी पार्टी की सरकार में अखिलेश यादव मुख्यमंत्री रहे, जबकि 2017 से अब तक भारतीय जनता पार्टी की सरकार में योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री हैं। दोनों कार्यकालों की तुलना केवल राजनीतिक बयानबाज़ी से नहीं, बल्कि आधिकारिक आँकड़ों और प्रशासनिक बदलावों से समझी जा सकती है। इस विश्लेषण का आधार मुख्यत : नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्टें और सार्वजनिक प्रशासनिक निर्णय हैं।

1. शासन शैली : दो अलग मॉडल

अखिलेश मॉडल (2012 - 2017) : विकास और इंफ्रास्ट्रक्चर पर जोर, शहरी परियोजनाओं (एक्सप्रेसवे, मेट्रो) को प्राथमिकता, विपक्ष का आरोप : कानून-व्यवस्था पर अपेक्षाकृत कमजोर पकड़.

योगी मॉडल (2017 से वर्तमान) : कानून-व्यवस्था को राजनीतिक केंद्र में रखा. अपराधियों पर सख्त कार्रवाई (एनकाउंटर नीति चर्चा में). प्रशासनिक केंद्रीकरण और पुलिस मॉनिटरिंग बढ़ी.

2. एनसीआरबी डेटा : अपराध का तुलनात्मक संकेत

बता दें, उत्तर प्रदेश की बड़ी आबादी के कारण कुल अपराध संख्या अधिक रहना सामान्य प्रवृत्ति है; इसलिए ट्रेंड अधिक महत्वपूर्ण है।

अखिलेश सरकार (2012 - 2016) : कुल अपराध मामलों में लगातार उच्च स्थान, महिला अपराध और अपहरण मामलों में वृद्धि, सांप्रदायिक घटनाएँ, राजनीतिक बहस का विषय बनीं.

योगी सरकार (2017 से 2022) : कुछ श्रेणियों में गिरावट का दावा, संगठित अपराध पर विशेष अभियान, महिला सुरक्षा हेल्पलाइन, एंटी-रोमियो स्क्वाड जैसी पहल.

3. दंगों की तुलना

अखिलेश कार्यकाल : सबसे चर्चित घटना : मुज़फ्फरनगर दंगा (2013) 60$ मौतें, बड़े पैमाने पर विस्थापन, राष्ट्रीय राजनीतिक मुद्दा बना.

योगी कार्यकाल : बड़े सांप्रदायिक दंगों की संख्या में कमी का दावा, स्थानीय स्तर पर तनाव की घटनाएँ जारी रहीं, लेकिन बड़े दंगों की पुनरावृत्ति कम हुई.

4. माफिया और संगठित अपराध पर कार्रवाई

अखिलेश काल : विपक्ष द्वारा आरोप : कुछ बाहुबलियों का राजनीतिक प्रभाव, चर्चित नाम : अतीक अहमद, मुख्तार अंसारी, विजय मिश्रा.

योगी काल : संपत्ति जब्ती अभियान, गैंगस्टर एक्ट के तहत कार्रवाई, एनकाउंटर नीति राष्ट्रीय बहस का विषय बनी.  

5. पत्रकार सुरक्षा : धारणा बनाम डेटा

दोनों कार्यकालों में पत्रकारों पर हमले की घटनाएँ सामने आईं, लेकिन : अखिलेश काल में कुछ मामलों ने राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक विवाद पैदा किया। योगी काल में भी अलग-अलग जिलों से हमले के मामले सामने आए, पर सरकार ने त्वरित कार्रवाई का दावा किया। यह स्पष्ट है कि पत्रकार सुरक्षा अभी भी एक चुनौती है।

6. महिला सुरक्षा

अखिलेश सरकार : महिला अपराध मामलों में वृद्धि पर विपक्ष ने सवाल उठाए, हेल्पलाइन जैसी पहल शुरू हुईं.

योगी सरकार : मिशन शक्ति अभियान, फास्ट ट्रैक कोर्ट पर जोर, पुलिस पेट्रोलिंग बढ़ाई गई.

7. धारणा की राजनीति : चुनाव का निर्णायक कारक

राजनीति में केवल अपराध के आँकड़े ही नहीं, बल्कि जनता की सुरक्षा की भावना भी महत्वपूर्ण होती है। 2017 के चुनाव में : कानून-व्यवस्था बड़ा मुद्दा बनी. राजनीतिक धारणा ने सत्ता परिवर्तन में भूमिका निभाई. 2022 में : कानून-व्यवस्था और कल्याण योजनाओं का संयुक्त प्रभाव देखा गया.

8. मीडिया और राजनीतिक टकराव

दोनों कार्यकालों में मीडिया से टकराव के क्षण आए, लेकिन हाल के वर्षों में मीडिया पर बयान अधिक राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बने हैं। लोकतंत्र में यह जरूरी है कि : मीडिया सवाल पूछे, नेता जवाब दें, संवाद बना रहे.

दो दौर, दो प्राथमिकताएँ

अखिलेश यादव और योगी आदित्यनाथ, दोनों ने अलग-अलग राजनीतिक मॉडल प्रस्तुत किए : अखिलेश यादव का फोकस इंफ्रास्ट्रक्चर और आधुनिक विकास पर रहा. योगी आदित्यनाथ का फोकस कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक नियंत्रण पर अधिक रहा. एनसीआरबी डेटा यह दिखाता है कि अपराध का स्वरूप जटिल है और केवल सरकार बदलने से पूरी तस्वीर नहीं बदलती, लेकिन प्रशासनिक प्राथमिकताएँ राजनीतिक धारणा को जरूर प्रभावित करती हैं। अंततः लोकतंत्र में जनता का सबसे बड़ा प्रश्न वही रहता है :विकास भी चाहिए और सुरक्षा भी।

एनसीआरबी रिपोर्टः अपराध के आँकड़ों का सच

एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार 2012 से 2016 के बीच उत्तर प्रदेश देश में दर्ज कुल अपराधों की संख्या में लगातार शीर्ष राज्यों में रहा। यह आबादी के कारण भी है, लेकिन कई श्रेणियों में अपराध वृद्धि ने राजनीतिक बहस को जन्म दिया।

वर्षवार संकेतक आँकड़े (सार रूप में)

2012 : लगभग 3.0 लाख से अधिक संज्ञेय अपराध दर्ज

2013 : अपराधों में उल्लेखनीय वृद्धि

2014 महिला अपराधों में तेज बढ़ोतरी

2015 हत्या और अपहरण के मामलों में उच्च संख्या

2016 : कुल अपराध मामलों में देश में शीर्ष स्थान

इन आँकड़ों को लेकर विपक्ष ने कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए, जबकि सरकार ने तर्क दिया कि अपराध दर्ज होने की संख्या बढ़ना बेहतर रिपोर्टिंग का संकेत भी हो सकता है।

विकास बनाम कानून व्यवस्था : दो अलग तस्वीरें

यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि इस अवधि में कुछ बड़े विकास कार्य भी हुए : लखनऊ मेट्रो परियोजना, आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे, लैपटॉप वितरण योजना. इन योजनाओं को लेकर सरकार को व्यापक सराहना भी मिली। यही कारण है कि यह कार्यकाल पूरी तरह नकारात्मक या पूरी तरह सकारात्मक, दोनों तरह से नहीं देखा जा सकता।

सवालों से घबराहट या सच से बेचैनी? प्रेस वार्ताओं में पत्रकारों पर बरसते अखिलेश यादव

सवालों से घबराहट या सच से बेचैनी ? प्रेस वार्ताओं में पत्रकारों पर बरसते अखिलेश यादव  लोकतंत्र में प्रेस वार्ता जवाब देन...