नमो घाट का खूनी सच : काशी में सुरक्षा या ‘बाउंसर राज’ का आतंक?
नमो
घाट
पर
केवल
एक
युवक
की
जान
नहीं
गई,
वहां
काशी
की
उस
आत्मा
पर
भी
चोट
लगी
है,
जो
सदियों
से
कहती
आई
है
— यहां
आने
वाला
हर
व्यक्ति
अतिथि
है,
भय
का
पात्र
नहीं।
फर्जी सुरक्षा कर्मी, लापरवाही,
निजी
एजेंसियों
की
कार्यप्रणाली
और
प्रशासनिक
जवाबदेही
पर
खड़े
हुए
बड़े
सवाल.
काशी में सवाल सिर्फ
एक
मौत
का
नहीं,
उस
भरोसे
का
है
जिसके
सहारे
लाखों
लोग
यहां
आते
हैं…
सुरेश गांधी
काशी केवल मंदिरों,
घाटों और आरती की
नगरी नहीं है, बल्कि
वह विश्वास का केंद्र भी
है जहां देश-दुनिया
से आने वाला हर
श्रद्धालु अपने भीतर एक
आध्यात्मिक शांति लेकर लौटने की
उम्मीद करता है। लेकिन
जब इसी काशी में
गंगा स्नान करने आया एक
गरीब परिवार का बेटा वापस
घर नहीं, बल्कि शव बनकर लौटे,
तो यह केवल एक
आपराधिक घटना नहीं रहती;
यह शहर की व्यवस्था,
संवेदनशीलता और प्रशासनिक जवाबदेही
पर गंभीर प्रश्न बन जाती है।
नमो घाट पर
हुई घटना ने केवल
एक परिवार को नहीं तोड़ा
है, बल्कि उस भरोसे को
भी चोट पहुंचाई है
जो श्रद्धालु और पर्यटक काशी
के प्रति लेकर आते हैं।
सोनभद्र के खलियारी गांव
का 19 वर्षीय राजेश उर्फ चिंटू अपने
दोस्तों के साथ घूमने
और गंगा स्नान करने
आया था। कोई बड़ी
मांग नहीं थी, कोई
संघर्ष नहीं था, कोई
आपराधिक पृष्ठभूमि नहीं थी। रात
में पहुंचे कुछ युवकों को
घाट तक जाने से
रोका गया। विवाद हुआ।
आरोप है कि इसके
बाद निजी सुरक्षा कर्मियों
ने कानून को अपने हाथ
में लेते हुए कथित
तौर पर ऐसा हिंसक
रूप धारण किया कि
कुछ ही मिनटों में
एक युवक की जान
चली गई।
सबसे भयावह पहलू
केवल हत्या का आरोप नहीं
है, बल्कि वह तस्वीर है
जो इसके पीछे दिखाई
दे रही है। आरोप
है कि युवक जमीन
पर गिरने और अचेत होने
के बाद भी कथित
तौर पर पिटाई जारी
रही। उसके दोस्त मिन्नतें
करते रहे, हाथ जोड़ते
रहे, लेकिन कथित तौर पर
लाठी और डंडे नहीं
रुके। यदि जांच में
ये आरोप सही सिद्ध
होते हैं, तो यह
केवल कानून का उल्लंघन नहीं
बल्कि संवेदनाओं की मृत्यु भी
है।
इस घटना ने
एक और खतरनाक सच्चाई
को सामने ला दिया है।
पुलिस के अनुसार, सुरक्षा
एजेंसी द्वारा जिन लोगों को
नमो घाट की सुरक्षा
में लगाया गया था, उनके
सत्यापन और नियुक्ति संबंधी
रिकॉर्ड तक उपलब्ध नहीं
थे। सवाल उठता है
कि जिस स्थान पर
हजारों लोग रोज आते
हों, वहां सुरक्षा की
जिम्मेदारी ऐसे लोगों के
हाथों में कैसे दी
जा सकती है जिनका
पूरा रिकॉर्ड तक स्पष्ट नहीं
है?
यह मामला केवल
एक सुरक्षा एजेंसी की लापरवाही तक
सीमित नहीं है। यह
उस व्यवस्था की कहानी भी
है जहां ठेके पर
सुरक्षा दी जाती है,
लेकिन जवाबदेही अक्सर धुंधली हो जाती है।
स्मार्ट सिटी परियोजना के
अंतर्गत आधुनिक घाट बनाए गए,
सौंदर्यीकरण हुआ, सुविधाएं बढ़ीं,
लेकिन क्या सुरक्षा व्यवस्था
का ढांचा भी उतना ही
मजबूत हुआ? चिंता की
बात यह भी है
कि नमो घाट पहले
भी विवादों और अराजक घटनाओं
का केंद्र रहा है। नाविकों
के बीच मारपीट, प्रबंधन
से विवाद, महिलाओं से दुर्व्यवहार और
झड़पों के कई मामले
सामने आ चुके हैं।
यदि एक ही स्थान
पर बार-बार ऐसी
घटनाएं होती रही हैं,
तो यह केवल संयोग
नहीं कहा जा सकता।
यह संकेत है कि कहीं
न कहीं निगरानी और
नियंत्रण व्यवस्था में गंभीर कमियां
मौजूद हैं।
घटना के बाद
पांच लोगों की गिरफ्तारी हुई,
एजेंसी के लाइसेंस निरस्तीकरण
की प्रक्रिया शुरू हुई, स्मार्ट
सिटी ने स्पष्टीकरण मांगा
और मंत्री स्तर से सख्त
निर्देश जारी हुए। लेकिन
बड़ा प्रश्न यह है कि
क्या कार्रवाई हमेशा किसी की मौत
के बाद ही होगी?
क्या किसी व्यवस्था की
खामियां पहचानने के लिए हर
बार एक परिवार का
चिराग बुझना जरूरी है? राजेश उर्फ
चिंटू की कहानी किसी
बड़े परिवार या प्रभावशाली व्यक्ति
की कहानी नहीं है। वह
सब्जी बेचकर घर चलाने वाले
परिवार का बेटा था।
गांव से निकला था,
दोस्तों के साथ कुछ
घंटे बिताने आया था। लेकिन
उसकी यात्रा गंगा दर्शन पर
नहीं, मौत पर जाकर
खत्म हुई।
आज जरूरत केवल
दोषियों को सजा देने
की नहीं है। जरूरत
पूरे ढांचे को देखने की
है। सार्वजनिक स्थलों पर तैनात निजी
सुरक्षा कर्मियों के प्रशिक्षण, सत्यापन,
अधिकारों और जवाबदेही की
स्पष्ट नीति बननी चाहिए।
यह सुनिश्चित होना चाहिए कि
सुरक्षा के नाम पर
कोई व्यक्ति कानून का समानांतर ढांचा
न बन जाए। काशी
की पहचान भय से नहीं,
भरोसे से बनी है।
यहां आने वाले लोग
सुरक्षा की छाया चाहते
हैं, शक्ति प्रदर्शन का डर नहीं।
क्योंकि जिस दिन सुरक्षा
देने वाले ही भय
का कारण बन जाएं,
उस दिन केवल एक
व्यक्ति की मृत्यु नहीं
होती—उस दिन व्यवस्था
का नैतिक आधार भी घायल
हो जाता है।
सवाल जो काशी पूछ रही है
◆
क्या नमो घाट पर
सुरक्षा के नाम पर
अराजकता बढ़ रही थी?
◆
बिना सत्यापन वाले लोगों को
जिम्मेदारी कैसे मिली?
◆
क्या पहले हुई घटनाओं
को गंभीरता से लिया गया?
◆
क्या पुलिस की शुरुआती प्रतिक्रिया
और तेज हो सकती
थी?
◆
क्या निजी सुरक्षा एजेंसियों
के लिए कठोर नियम
तय करने का समय
आ गया है?
मौत तक पहुंचाने वाली पूरी टाइमलाइन
8:00 बजे : राजेश उर्फ चिंटू अपने
दोस्तों के साथ सोनभद्र
से वाराणसी के लिए निकला।
3:00 बजे : सभी दोस्त नमो
घाट पहुंचे।
गेट नंबर-1 पर
विवाद : सुरक्षाकर्मियों ने घाट बंद
होने की बात कहकर
रोका, कथित तौर पर
गाली-गलौज और बहस
शुरू हुई।
कुछ मिनट बाद
: करीब 10-12 लोग कथित तौर
पर लाठी, डंडा, रॉड और बेल्ट
लेकर पहुंचे।
करीब 10 मिनट तक पिटाई
: राजेश
गंभीर रूप से घायल
होकर जमीन पर गिर
पड़ा।
पिकेट पुलिस को सूचना : दोस्त
भागकर पुलिस तक पहुंचे।
अस्पताल में मौत : मंडलीय
अस्पताल में चिकित्सकों ने
राजेश को मृत घोषित
किया।
‘सिर्फ दोस्त के साथ आया था, मौत साथ लौट गई’
राजेश उर्फ चिंटू का
वाराणसी आने का कोई
बड़ा कार्यक्रम नहीं था। जानकारी
के अनुसार, उसके एक दोस्त
की बहन और जीजा
ट्रेन से आने वाले
थे, उन्हें लेने के लिए
वाहन किराये पर लिया गया
था। बाकी दोस्त भी
साथ हो लिए। एक
सामान्य यात्रा अचानक मौत की कहानी
बन जाएगी, इसकी कल्पना किसी
ने नहीं की थी।
नमो घाट पर पहले भी उठते रहे सवाल
4 दिसंबर 2025 : नाव लगाने को
लेकर दो पक्षों में
मारपीट।
21 मार्च 2026 : जेटी विवाद में
घाट मैनेजर पर हमला, हाथ
टूटा।
27 मार्च 2026 : जबरन जेटी खोलने
को लेकर विवाद।
30 मार्च 2026 : महिला से कथित मारपीट
और अभद्रता का मामला।
अब मई 2026 : पर्यटक
की कथित पिटाई में
मौत।
सवाल : क्या लगातार घटनाओं
के बावजूद चेतावनी संकेतों को अनदेखा किया
गया?
सुरक्षा या शक्ति प्रदर्शन?
घाटों पर तैनात सुरक्षा
कर्मियों का उद्देश्य : भीड़
नियंत्रण व्यवस्था बनाए रखना. श्रद्धालुओं की सहायता
करना. सुरक्षा सुनिश्चित करना. लेकिन आरोपों ने यह प्रश्न
खड़ा कर दिया है
: क्या अनुशासन की जगह भय
का वातावरण बन रहा था?
क्या संवाद की जगह टकराव
बढ़ रहा था? क्या
सुरक्षा व्यवस्था की निगरानी पर्याप्त
थी?
एक परिवार का टूटता संसार
राजेश तीन भाइयों में
दूसरे नंबर पर था।
परिवार के अनुसार वह
घर की जिम्मेदारियों में
हाथ बंटाता था। गांव में
सूचना पहुंचते ही मातम छा
गया। घर में अब
एक ही सवाल गूंज
रहा है : जो बेटा
गंगा दर्शन करने गया था,
वह आखिर अर्थी बनकर
क्यों लौटा
नमो
घाट पर तीर्थयात्री के
साथ हुई यह घटना
अत्यंत दुःखद और निंदनीय है।
यह केवल एक व्यक्ति
की मृत्यु नहीं, बल्कि काशी की गरिमा
और श्रद्धालुओं की सुरक्षा व्यवस्था
पर गंभीर प्रश्न खड़ा करती है।
दोषियों के खिलाफ कठोर
कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। संबंधित
एजेंसी की उच्च स्तरीय
जांच कराकर आवश्यकता पड़ने पर उसे ब्लैकलिस्ट
किया जाएगा। मृतक परिवार को
तत्काल पांच लाख रुपये
की सहायता उपलब्ध कराने के भी निर्देश
दिए गए हैं। दोषियों
को किसी कीमत पर
बख्शा नहीं जाएगा, श्रद्धालुओं
की सुरक्षा से समझौता स्वीकार
नहीं। रविन्द्र जायसवाल,
स्टाम्प
एवं
न्यायालय
पंजीयन
शुल्क
राज्य
मंत्री
(स्वतंत्र
प्रभार)


