विश्व पर्यावरण दिवस : प्रकृति धरती की पुकार सुनिए, अभी भी समय है...
कल्पना
कीजिए
कि
एक
सुबह
आप
जागें
और
पक्षियों
का
कलरव
सुनाई
न
दे,
नदियों
का
जल
पीने
योग्य
न
रहे,
पेड़ों
की
छांव
दुर्लभ
हो
जाए
और
सांस
लेने
के
लिए
भी
शुद्ध
हवा
खरीदनी
पड़े।
यह
किसी
विज्ञान
कथा
का
दृश्य
नहीं,
बल्कि
उस
भविष्य
की
झलक
है
जिसकी
ओर
दुनिया
तेजी
से
बढ़
रही
है।
विकास
और
उपभोग
की
अंधाधुंध
दौड़
में
मनुष्य
ने
प्रकृति
से
जितना
लिया,
उसके
मुकाबले
लौटाया
बहुत
कम।
परिणामस्वरूप
जलवायु
परिवर्तन,
बढ़ता
तापमान,
जल
संकट,
प्रदूषण
और
जैव
विविधता
का
क्षरण
आज
वैश्विक
चिंता
का
विषय
बन
चुके
हैं।
विश्व
पर्यावरण
दिवस
केवल
एक
औपचारिक
आयोजन
नहीं,
बल्कि
यह
याद
दिलाने
का
अवसर
है
कि
प्रकृति
के
बिना
न
अर्थव्यवस्था
बच
सकती
है,
न
सभ्यता
और
न
ही
मानव
जीवन।
सवाल
अब
पर्यावरण
बचाने
का
नहीं,
बल्कि
अपने
भविष्य
और
अस्तित्व
को
सुरक्षित
रखने
का
है।
यही
इस
समय
की
सबसे
बड़ी
आवश्यकता
और
जिम्मेदारी
है
सुरेश गांधी
यह चित्र का एक हिस्सा विकास की अंधी
दौड़ से घायल होती धरती को दिखाता है, जबकि दूसरा हिस्सा पर्यावरण संरक्षण, वृक्षारोपण
और सतत विकास की आशा जगाता है। प्रश्न यही है कि आने वाली पीढ़ियों के लिए हम कौन-सा
रास्ता चुनेंगे? मतलब साफ है धरती बोलती नहीं, संकेत देती है। कभी तपते हुए जून की दोपहर में, जब थर्मामीटर नए रिकॉर्ड बनाता है। कभी हिमालय की गोद से टूटते ग्लेशियरों के रूप में। कभी बाढ़ की उफनती धाराओं में और कभी सूखे खेतों की फटी हुई मिट्टी में। प्रकृति शब्दों में नहीं, घटनाओं में संवाद करती है। दुर्भाग्य यह है कि मनुष्य ने उसकी भाषा सुनना लगभग बंद कर दिया है। जी हां, विश्व पर्यावरण दिवस केवल कैलेंडर की एक तिथि नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर है। यह वह दिन है जब पूरी दुनिया अपने विकास मॉडल, जीवनशैली और प्राकृतिक संसाधनों के प्रति अपने व्यवहार का पुनर्मूल्यांकन करती है। इस वर्ष विश्व पर्यावरण दिवस 2026 का वैश्विक विषय जलवायु परिवर्तन और उसके विरुद्ध त्वरित कार्रवाई पर केंद्रित है।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ने दुनिया को संदेश दिया है कि पृथ्वी लगातार संकेत दे रही है और अब उन संकेतों को अनदेखा करने की गुंजाइश नहीं बची है। जब
भीषण गर्मी में नदियां सिकुड़ने
लगती हैं, खेतों की
मिट्टी दरक जाती है,
पहाड़ों पर भूस्खलन होता
है और महानगरों की
हवा जहरीली हो जाती है,
तब प्रकृति अपने संकट का
संकेत देती है। यह
केवल पर्यावरण का संकट नहीं,
बल्कि मानव सभ्यता के
अस्तित्व का प्रश्न है।
विडंबना यह है कि
जिस धरती ने हमें
जीवन दिया, उसी के संसाधनों
का सबसे अधिक दोहन
मनुष्य ने किया है।
हर वर्ष 5 जून को विश्व
पर्यावरण दिवस मनाया जाता
है। यह केवल एक
औपचारिक आयोजन या पौधारोपण कार्यक्रम
भर नहीं है, बल्कि
यह दिन मानवता को
अपने कर्तव्यों की याद दिलाने
का अवसर है। आज
दुनिया जिस जलवायु संकट,
जैव विविधता के क्षरण, जल
संकट और प्रदूषण की
समस्या से जूझ रही
है, वह दशकों से
प्रकृति के साथ किए
गए असंतुलित व्यवहार का परिणाम है।
वैसे भी धरती कभी शिकायत नहीं
करती। वह चुपचाप सब
सहती रहती है। जंगलों
की कटाई, नदियों का प्रदूषण, पहाड़ों
का क्षरण और हवा में
घुलता जहर—इन सबके
बावजूद वह जीवन देने
का अपना धर्म निभाती
रहती है। लेकिन जब
उसका संतुलन बिगड़ता है, तब वह
चेतावनी भी देती है।
कभी भीषण गर्मी के
रूप में, कभी विनाशकारी
बाढ़ के रूप में,
कभी सूखे और कभी
चक्रवातों के रूप में।
आज पूरी दुनिया ऐसे
ही संकेतों के बीच विश्व
पर्यावरण दिवस मना रही
है। कुछ दशक पहले तक
पर्यावरण संरक्षण को एक सामाजिक
या वैकल्पिक विषय माना जाता
था। इसे विकास के
समानांतर चलने वाला मुद्दा
समझा जाता था। लेकिन
अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं।
जलवायु परिवर्तन आज मानव सभ्यता
के सामने सबसे बड़ा संकट
बनकर खड़ा है। वैज्ञानिक
वर्षों से चेतावनी दे
रहे हैं कि यदि
पृथ्वी का तापमान इसी
गति से बढ़ता रहा
तो आने वाले समय
में जीवन की मूलभूत
आवश्यकताएं भी संकट में
पड़ सकती हैं। दुर्भाग्य
यह है कि हम
इस संकट को तब
समझ रहे हैं, जब
उसके प्रभाव हमारे दरवाजे तक पहुंच चुके
हैं।
भारत सहित दुनिया
के अनेक देशों में
इस वर्ष भीषण गर्मी
ने सारे रिकॉर्ड तोड़
दिए। शहरों की सड़कें तपने
लगीं, खेतों की नमी समाप्त
होने लगी और जलाशयों
का स्तर तेजी से
घटने लगा। दूसरी ओर,
कहीं अत्यधिक वर्षा और बाढ़ ने
तबाही मचाई। यह केवल मौसम
का बदलाव नहीं है, बल्कि
प्रकृति के उस असंतुलन
का परिणाम है जिसे मनुष्य
ने स्वयं पैदा किया है।
विकास की अंधी दौड़
में हमने प्रकृति को
संसाधन तो माना, लेकिन
संबंध नहीं माना। हमने
जंगलों को केवल लकड़ी
का स्रोत समझा, नदियों को केवल पानी
का भंडार और पहाड़ों को
केवल खनिजों की खान। परिणामस्वरूप
प्रकृति का वह संतुलन
लगातार कमजोर होता गया, जिसने
हजारों वर्षों से जीवन को
सुरक्षित रखा था। आज सबसे
बड़ी चिंता जल संकट को
लेकर है। भारत की
बड़ी आबादी भूजल पर निर्भर
है, लेकिन भूजल का स्तर
लगातार नीचे जा रहा
है। अनेक शहरों और
गांवों में पानी की
उपलब्धता चुनौती बन चुकी है।
आने वाले वर्षों में
यदि जल संरक्षण को
प्राथमिकता नहीं दी गई
तो पानी केवल प्राकृतिक
संसाधन नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक संघर्ष
का कारण भी बन
सकता है। वायु प्रदूषण
भी एक गंभीर चुनौती
है।
महानगरों से लेकर छोटे
शहरों तक हवा की
गुणवत्ता लगातार गिर रही है।
बच्चों, बुजुर्गों और रोगियों पर
इसका सबसे अधिक प्रभाव
पड़ रहा है। स्वच्छ
हवा, जो कभी प्रकृति
का सहज उपहार थी,
अब एक दुर्लभ सुविधा
बनती जा रही है।
यह स्थिति केवल पर्यावरण का
नहीं, सार्वजनिक स्वास्थ्य का भी बड़ा
संकट है। प्लास्टिक प्रदूषण ने समस्या को
और जटिल बना दिया
है। नदियों, झीलों, समुद्रों और खेतों तक
में प्लास्टिक का कचरा पहुंच
चुका है। वैज्ञानिकों ने
मानव शरीर में भी
माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी दर्ज
की है। यह संकेत
है कि प्रकृति को
पहुंचाया गया नुकसान अंततः
मनुष्य तक लौटकर आ
रहा है। हालांकि संकट
जितना बड़ा है, समाधान
भी उतना ही स्पष्ट
है। पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं
से संभव नहीं होगा।
इसके लिए समाज की
भागीदारी आवश्यक है। वृक्षारोपण, जल
संरक्षण, ऊर्जा बचत, कचरा प्रबंधन
और पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली को जन आंदोलन
का रूप देना होगा।
भारत की सांस्कृतिक परंपरा
इस दिशा में हमें
प्रेरणा देती है। यहां
नदियों को माता कहा
गया, वृक्षों को पूजनीय माना
गया और प्रकृति को
जीवन का अभिन्न अंग
समझा गया। आधुनिक विज्ञान
आज जिन सिद्धांतों की
बात कर रहा है,
भारतीय जीवन दर्शन सदियों
पहले उन्हें व्यवहार में उतार चुका
था। आवश्यकता केवल उस चेतना
को पुनर्जीवित करने की है।
पर्यावरण संरक्षण का अर्थ केवल
पेड़ लगाना नहीं है। इसका
अर्थ है विकास और
प्रकृति के बीच संतुलन
स्थापित करना। इसका अर्थ है
संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग
करना। इसका अर्थ है
आने वाली पीढ़ियों के
अधिकारों का सम्मान करना।
आखिरकार पृथ्वी हमें विरासत में
नहीं मिली है; हमने
इसे अपनी संतानों से
उधार लिया है। विश्व
पर्यावरण दिवस पर सबसे
महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि
हम भविष्य की पीढ़ियों को
कैसी दुनिया सौंपना चाहते हैं। क्या हम
उन्हें स्वच्छ हवा, निर्मल जल
और हरे-भरे जंगलों
वाली पृथ्वी देंगे, या फिर प्रदूषण,
जल संकट और जलवायु
आपदाओं से जूझती दुनिया?
उत्तर हमारे आज के निर्णयों
में छिपा है। यदि
हम प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का मार्ग चुनते
हैं तो अभी भी
बहुत कुछ बचाया जा
सकता है। लेकिन यदि
चेतावनियों को अनदेखा करते
रहे तो आने वाला
समय और कठिन होगा।
धरती आज भी हमें
जीवन दे रही है।
बदले में वह केवल
इतना चाहती है कि हम
उसके साथ न्याय करें।
विश्व पर्यावरण दिवस का वास्तविक
संदेश भी यही है—प्रकृति को बचाना किसी
अभियान का नारा नहीं,
बल्कि मानव सभ्यता के
अस्तित्व की अनिवार्य शर्त
है। क्योंकि जब धरती सुरक्षित
रहेगी, तभी मानवता का
भविष्य भी सुरक्षित रहेगा।

