Wednesday, 14 October 2026

न बाती, न तेल... धरती की कोख से निकलती नौ ज्वालाओं में मां के दर्शन!

न बाती, न तेल... धरती की कोख से निकलती नौ ज्वालाओं में मां के दर्शन!

कल्पना कीजिए, एक ऐसा मंदिर जहां न दीपक है, न बाती और न ही घी-तेल का सहारा, फिर भी धरती की कोख से निकलती ज्वालाएं सदियों से प्रज्वलित हैं। हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित मां ज्वालामुखी का दरबार इसी अनोखे दृश्य के लिए विख्यात है। यहां गर्भगृह में नौ ज्वालाओं को मां भगवती के नौ स्वरूपों का प्रतीक मानकर पूजा जाता है। श्रद्धालुओं के लिए ये केवल अग्निशिखाएं नहीं, बल्कि साक्षात आदिशक्ति के दर्शन हैं। आस्था के आगे अकबर ने भी झुकाया सिर! मंदिर से जुड़ी लोककथा के अनुसार, मुगल बादशाह अकबर ने ज्वालाओं को बुझाने के लिए पानी की धारा तक मोड़ने का प्रयास किया, लेकिन सफलता नहीं मिली। बाद में उसने स्वर्ण छत्र चढ़ाया। मान्यता है कि अहंकार के कारण देवी ने उसका छत्र स्वीकार नहीं किया और वह विचित्र धातु में बदल गया। यह छत्र आज भी मंदिर की दास्तां का हिस्सा माना जाता है। गोरख डिब्बी का रहस्य भी कम नहीं। यहां पानी खौलता हुआ दिखाई देता है, लेकिन छूने पर शीतल महसूस होता है। लोकविश्वास इसे गुरु गोरखनाथ और मां ज्वाला की प्रतीक्षा से जोड़ता है। माता सती की जिह्वा गिरने की धार्मिक मान्यता के कारण यह स्थल शक्तिपीठ के रूप में पूजित है। नवरात्र में यहां श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ता है। प्राकृतिक ज्वालाओं के पीछे भूगर्भीय कारणों की पड़ताल अपनी जगह है, लेकिन भक्तों के लिए यह धाम आज भी अटूट विश्वास की अखंड ज्योति है  

सुरेश गांधी

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में कालीधार पहाड़ियों के बीच स्थित मां ज्वालामुखी का दरबार आस्था, रहस्य और लोकविश्वास का ऐसा संसार रचता है, जहां प्रकृति की एक अनोखी अभिव्यक्ति सदियों से श्रद्धालुओं को विस्मित करती आ रही है। मंदिर के गर्भगृह में धरती से निकलती नौ ज्वालाएं निरंतर प्रज्वलित दिखाई देती हैं। इनके सामने न दीपक की बाती है, न घी-तेल का सहारा और न ही इन्हें जलाए रखने के लिए किसी बाहरी लौ की आवश्यकता। यही वह दृश्य है, जो पहली बार आने वाले श्रद्धालु को ठिठककर देखने और बार-बार लौटने के लिए प्रेरित करता है। यहां ज्वाला ही देवी का स्वरूप है। न कोई पारंपरिक प्रतिमा, न संगमरमर की भव्य मूर्ति और न ही देवी के दर्शन के लिए किसी आकार की अनिवार्यता। अग्निशिखाओं में ही भक्त मां भगवती की उपस्थिति का अनुभव करते हैं। उनके लिए ये ज्वालाएं केवल प्राकृतिक अग्नि नहीं, बल्कि आदिशक्ति की जीवंत अनुभूति हैं। सदियों से चली आ रही पूजा-पद्धति, पौराणिक आख्यानों और लोकमान्यताओं ने इस स्थल को भारतीय आस्था के प्रमुख केंद्रों में प्रतिष्ठित किया है। ज्वालामुखी मंदिर की विशेषता केवल गर्भगृह में प्रज्वलित ज्वालाओं तक सीमित नहीं है। परिसर के आसपास प्रचलित गोरख डिब्बी की मान्यता, मुगल बादशाह अकबर से जुड़ी दास्तां, गोरखनाथ की प्रतीक्षा करती देवी की लोककथा और नवरात्र में उमड़ने वाली श्रद्धा की लहर इस धाम को विशिष्ट पहचान देती है। यहां आस्था केवल पूजा में नहीं, बल्कि उन अनुभवों में भी व्यक्त होती है, जिन्हें श्रद्धालु अपने भीतर लेकर लौटते हैं।

नौ ज्वालाएं, नौ रूप और एक अखंड आस्था

मंदिर के गर्भगृह में प्रज्वलित नौ ज्वालाएं इस धाम की सबसे विशिष्ट पहचान हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इन्हें मां भगवती के नौ स्वरूपों का प्रतीक माना जाता है। श्रद्धालु इन ज्वालाओं के दर्शन कर देवी के प्रति अपनी श्रद्धा अर्पित करते हैं और मनोकामना पूर्ति की प्रार्थना करते हैं। इन ज्वालाओं का प्राकृतिक रूप से प्रज्वलित रहना सदियों से जिज्ञासा का विषय रहा है। भक्त इसे देवी की महिमा और दिव्य उपस्थिति के रूप में देखते हैं। विज्ञान की दृष्टि से धरती के भीतर से निकलने वाली ज्वलनशील गैसों का प्रज्वलन ऐसी अग्नि का कारण हो सकता है। हालांकि, मंदिर की धार्मिक महत्ता श्रद्धालुओं के लिए इस प्राकृतिक घटना की वैज्ञानिक व्याख्या से अलग एक भावनात्मक और आध्यात्मिक अर्थ भी रखती है। यहां दर्शन का अनुभव केवल आंखों तक सीमित नहीं रहता। गर्भगृह में ज्वालाओं को निहारते हुए भक्तों के मन में सदियों पुरानी परंपराओं, देवी के प्रति समर्पण और अपनी व्यक्तिगत आस्थाओं के भाव एक साथ उमड़ते हैं। कोई मनोकामना लेकर आता है, कोई संकट से मुक्ति की प्रार्थना करता है, तो कोई केवल उस शक्ति के सामने सिर झुकाने पहुंचता है, जिसके प्रति उसका विश्वास पीढ़ियों से चला आ रहा है।

गोरख डिब्बी : खौलता दिखाई देता है पानी, फिर भी रहता है शीतल

ज्वालामुखी मंदिर परिसर की एक अन्य आकर्षक विशेषता गोरख डिब्बी है। इससे जुड़ी मान्यता श्रद्धालुओं को सहज ही अपनी ओर खींचती है। यहां एक कुंड का पानी देखने में खौलता हुआ प्रतीत होता है, लेकिन उसमें हाथ डालने पर पानी अपेक्षाकृत शीतल महसूस होता है। इस विरोधाभासी प्रतीति को देखकर श्रद्धालु आश्चर्य व्यक्त करते हैं और इसे देवी की महिमा से जोड़ते हैं। गोरख डिब्बी का संबंध नाथ संप्रदाय के प्रसिद्ध योगी गुरु गोरखनाथ से भी जोड़ा जाता है। लोककथा के अनुसार, गोरखनाथ ने एक बार मां से भोजन की इच्छा व्यक्त करते हुए पानी गर्म करने का आग्रह किया। देवी ने अग्नि प्रज्वलित कर दी और गोरखनाथ भिक्षा लेने चले गए। इसी बीच कलियुग का आगमन हो गया और गोरखनाथ वापस नहीं लौटे। मान्यता है कि मां ज्वाला आज भी उनकी प्रतीक्षा कर रही हैं। जब सतयुग लौटेगा, तब गोरखनाथ वापस आएंगे और तब तक देवी की ज्वाला इसी तरह प्रज्वलित रहेगी। यह कथा ऐतिहासिक विवरण से अधिक लोकआस्था और आध्यात्मिक परंपरा का हिस्सा है। इसकी लोकप्रियता बताती है कि भारतीय तीर्थ केवल स्थापत्य और अनुष्ठानों से नहीं बनते, बल्कि उन कथाओं से भी जीवंत रहते हैं, जिन्हें श्रद्धालु पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनते और सुनाते आए हैं।

51 शक्तिपीठों में विशेष स्थान

मां ज्वालामुखी का मंदिर शक्तिपीठ परंपरा के प्रमुख तीर्थस्थलों में गिना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यहां माता सती की जिह्वा गिरी थी। इसी कारण ज्वाला को देवी की जिह्वा का प्रतीक मानकर पूजा जाता है। शक्तिपीठों की उत्पत्ति से जुड़ी कथा भगवान शिव, माता सती और भगवान विष्णु के आख्यान से संबंधित है। मान्यता है कि राजा दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया, लेकिन भगवान शिव और माता सती को आमंत्रित नहीं किया। पिता के यज्ञ में पहुंचीं सती को जब शिव का अपमान सहन नहीं हुआ, तो उन्होंने यज्ञाग्नि में अपने प्राण त्याग दिए। माता सती के वियोग में भगवान शिव उनके शरीर को लेकर विक्षुब्ध अवस्था में विचरण करने लगे। सृष्टि का संतुलन बनाए रखने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को विभिन्न भागों में विभक्त किया। जिन स्थानों पर उनके अंग गिरे, वे शक्तिपीठ के रूप में पूजित हुए। अलग-अलग धार्मिक परंपराओं में शक्तिपीठों की संख्या और उनसे जुड़ी मान्यताओं में अंतर मिलता है। ज्वालामुखी को उन्हीं पवित्र स्थलों में विशेष स्थान प्राप्त है। मंदिर में देवी की उपासना का केंद्र उनकी ज्योति है। यहां स्थापित नौ ज्वालाओं के अलग-अलग नाम और धार्मिक महत्त्व बताए जाते हैं। परंपरागत विवरणों में महाकाली, अन्नपूर्णा, चंडी, हिंगलाज, विंध्यवासिनी और अन्य देवी स्वरूपों का उल्लेख मिलता है। इन स्वरूपों के माध्यम से भक्त आदिशक्ति की व्यापकता और विविधता का अनुभव करते हैं।

अकबर के अहंकार से जुड़ी स्वर्ण छत्र की दास्तां

ज्वालामुखी मंदिर से जुड़ी सबसे चर्चित लोककथाओं में मुगल बादशाह अकबर और मां ज्वाला की कथा प्रमुख है। कहा जाता है कि अकबर के शासनकाल में ध्यानु नाम का एक भक्त अपने साथियों के साथ मां ज्वाला के दर्शन के लिए निकला था। रास्ते में मुगल सैनिकों ने उसे रोककर बादशाह के दरबार में पेश कर दिया। अकबर ने ध्यानु से पूछा कि वह कहां जा रहा है और उसकी देवी में ऐसी क्या शक्ति है, जिसकी चर्चा वह करता है। ध्यानु ने मां ज्वाला को समस्त संसार की रक्षक बताते हुए कहा कि उनकी कृपा से असंभव कार्य भी संभव हो सकते हैं। लोककथा के अनुसार, बादशाह ने उसकी आस्था की परीक्षा लेने के लिए उसके घोड़े का सिर कटवा दिया और कहा कि यदि देवी में शक्ति है, तो वह उसे फिर से जीवित कर दें। ध्यानु ने मां की आराधना की और देवी की कृपा से घोड़े का सिर जुड़ जाने की कथा प्रचलित हुई। इस घटना के बाद अकबर को देवी की महिमा का एहसास हुआ। एक अन्य प्रचलित आख्यान के अनुसार, अकबर ने मंदिर की ज्वालाओं को बुझाने के लिए पानी की धारा मोड़ने का प्रयास किया। इसके बावजूद ज्वालाएं प्रज्वलित बनी रहीं। बाद में उसने देवी के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए स्वर्ण छत्र चढ़ाया। लोकविश्वास कहता है कि अहंकार के कारण उसका चढ़ाया छत्र देवी ने स्वीकार नहीं किया और वह किसी अपरिचित धातु में बदल गया। मंदिर में इस छत्र से जुड़ी कथा आज भी सुनाई जाती है। इसे श्रद्धालु इस संदेश से जोड़ते हैं कि ईश्वर के सामने धन, सत्ता और सामर्थ्य से अधिक महत्त्व विनम्रता तथा सच्चे समर्पण का है। हालांकि, इन घटनाओं का विवरण मुख्यतः धार्मिक आख्यानों और लोकपरंपराओं में मिलता है, इसलिए इन्हें प्रमाणित ऐतिहासिक घटनाओं के बजाय प्रचलित मान्यताओं के रूप में देखना उचित है।

जब प्रकृति की ऊर्जा बनती है जिज्ञासा का केंद्र

ज्वालामुखी मंदिर की अग्नि को लेकर जिज्ञासा स्वाभाविक है। धरती के भीतर से निकलने वाली ज्वलनशील गैसें कई स्थानों पर प्राकृतिक ज्वालाओं का कारण बनती हैं। भूगर्भीय संरचना, गैसों का उत्सर्जन और उनके प्रज्वलन की परिस्थितियां ऐसी घटनाओं को समझने में महत्त्वपूर्ण होती हैं। ज्वालामुखी धाम में भी प्राकृतिक ज्वालाओं का निरंतर प्रज्वलित रहना श्रद्धालुओं के लिए विशिष्ट अनुभव है। लोकमान्यता में इसे देवी की अखंड उपस्थिति का प्रतीक माना गया है। दूसरी ओर, इस प्राकृतिक घटना के भूवैज्ञानिक कारणों को समझने के लिए वैज्ञानिक अध्ययन और स्थल-विशिष्ट प्रमाण आवश्यक हैं। आस्था और विज्ञान को परस्पर विरोधी मानने के बजाय उनके अलग-अलग प्रश्नों को समझना अधिक उपयोगी है। विज्ञान यह जानने का प्रयास करता है कि ज्वाला कैसे प्रज्वलित रहती है, जबकि श्रद्धालु उसके सामने खड़े होकर अपनी आस्था, विश्वास और आध्यात्मिक अनुभूति को व्यक्त करते हैं। ज्वालामुखी मंदिर की विशेषता यही है कि प्राकृतिक घटना और धार्मिक परंपरा यहां एक ही स्थान पर दिखाई देती हैं।

मंदिर की पांच आरतियां : दिनचर्या में रची-बसी उपासना

मां ज्वालामुखी मंदिर में आरती और भोग की परंपरा दैनिक पूजा का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। प्रचलित विवरणों के अनुसार, यहां दिन में पांच बार आरती की जाती है। हर आरती का अपना समय, विधि और धार्मिक महत्त्व है। प्रातःकाल श्रृंगार आरती के समय देवी का शृंगार किया जाता है और भोग अर्पित होता है। इसके बाद मंगला आरती, मध्याह्न आरती, सायंकालीन आरती और रात्रि की शयन आरती की परंपरा निभाई जाती है। अलग-अलग आरतियों में चावल, दही, पूरी, चना, हलवा, मिठाई और अन्य प्रसाद अर्पित किए जाने का उल्लेख मिलता है। भोग की सामग्री और अनुष्ठानों का वास्तविक क्रम मंदिर की वर्तमान व्यवस्था के अनुसार बदल सकता है। शयन आरती के समय देवी के विश्राम की प्रतीकात्मक व्यवस्था की जाती है। फूलों और सुगंधित सामग्री से शय्या सजाई जाती है। यह परंपरा भक्त और आराध्य के संबंध को आत्मीय रूप देती है। यहां देवी केवल पूजित शक्ति नहीं, बल्कि परिवार की ऐसी आराध्या के रूप में भी अनुभव की जाती हैं, जिनकी सेवा, देखभाल और विश्राम की कल्पना भक्त अपने दैनिक जीवन के संस्कारों से जोड़कर करते हैं। मंदिर की पूजा-पद्धति से जुड़ी परंपराओं में विशेष पुजारी परिवारों की भूमिका भी उल्लेखनीय मानी जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, लंबे समय से चली आ रही सेवा-परंपराओं ने यहां की उपासना-पद्धति को निरंतरता प्रदान की है।

नवरात्र में उमड़ती है श्रद्धा की लहर

नवरात्र के अवसर पर ज्वालामुखी मंदिर में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ जाती है। वर्ष में आने वाले दोनों नवरात्र यहां विशेष धार्मिक उत्साह के साथ मनाए जाते हैं। इन दिनों देवी की पूजा-अर्चना, दुर्गा सप्तशती का पाठ, वैदिक मंत्रोच्चार और हवन जैसे अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं। देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालु मां के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। अनेक भक्त लाल ध्वज लेकर आते हैं और अपनी मनोकामनाएं देवी के चरणों में अर्पित करते हैं। मंदिर परिसर में भक्ति के गीत, जयकारे और पूजा की तैयारियां वातावरण को विशिष्ट धार्मिक रंग प्रदान करती हैं। नवरात्र केवल धार्मिक अनुष्ठानों का समय नहीं, बल्कि सामूहिक आस्था और सांस्कृतिक निरंतरता का भी अवसर है। परिवारों के साथ आने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह परंपरा नई पीढ़ी को अपने धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराने का माध्यम भी बनती है।

पांडवों से जुड़ी मान्यता और मंदिर का इतिहास

ज्वालामुखी मंदिर के संबंध में एक लोकमान्यता यह भी है कि पांडवों ने इस पवित्र स्थल की खोज की थी। मंदिर के निर्माण और विकास को लेकर प्रचलित विवरणों में राजा भूमि चंद का नाम आता है। बाद के काल में महाराजा रणजीत सिंह और राजा संसार चंद द्वारा मंदिर के निर्माण तथा विकास में योगदान का उल्लेख भी मिलता है। हालांकि, मंदिर की स्थापना, पुनर्निर्माण और अलग-अलग शासकों के योगदान से संबंधित विवरणों की ऐतिहासिक पुष्टि के लिए अभिलेखीय स्रोतों का अध्ययन आवश्यक है। मंदिर का वर्तमान स्वरूप लंबे समय में विकसित धार्मिक परंपराओं और स्थापत्य परिवर्तनों का परिणाम माना जा सकता है। मंदिर के शिखर पर स्वर्णमंडित आवरण और इसकी विशिष्ट स्थापत्य शैली श्रद्धालुओं का ध्यान आकर्षित करती है। प्रवेश द्वार से गर्भगृह की ओर बढ़ते हुए भक्त उस स्थान तक पहुंचते हैं, जहां देवी की ज्योति के दर्शन इस तीर्थयात्रा का केंद्रीय अनुभव बन जाते हैं।

आसपास के तीर्थ : नागिनी माता से रघुनाथ मंदिर तक

ज्वालामुखी मंदिर की यात्रा के दौरान आसपास स्थित अन्य धार्मिक स्थलों के दर्शन भी किए जा सकते हैं। मंदिर के निकट नागिनी माता का मंदिर श्रद्धालुओं के बीच प्रसिद्ध है। यहां विशेष अवसरों पर मेले का आयोजन होने की परंपरा बताई जाती है। क्षेत्र में भगवान राम, लक्ष्मण और माता सीता को समर्पित रघुनाथ मंदिर का भी उल्लेख मिलता है। इन स्थलों से जुड़ी मान्यताएं कांगड़ा क्षेत्र की धार्मिक विविधता और लोकपरंपराओं को सामने लाती हैं। इस प्रकार ज्वालामुखी की यात्रा केवल एक मंदिर के दर्शन तक सीमित नहीं रहती। यह आसपास के तीर्थों, पहाड़ी परिवेश, स्थानीय संस्कृति और पीढ़ियों से चली आ रही धार्मिक कथाओं को जानने का अवसर भी बन जाती है।

आस्था का अर्थ : केवल चमत्कार देखना नहीं

मां ज्वालामुखी के दरबार में आने वाला श्रद्धालु अपने साथ अनेक प्रश्न लेकर पहुंचता है। नौ ज्वालाएं कैसे जलती हैं? गोरख डिब्बी का पानी खौलता हुआ क्यों दिखाई देता है? अकबर और ध्यानु की कथा का संदेश क्या है? इन प्रश्नों के उत्तर हर व्यक्ति अपनी समझ, अध्ययन और आस्था के अनुसार खोजता है। लेकिन इन सभी के बीच एक भाव समान रहता है—देवी के सामने अपनी सीमाओं को स्वीकार करने और मन को स्थिर करने का भाव। किसी के लिए यह संकट से मुक्ति की प्रार्थना है, किसी के लिए परिवार की सुख-समृद्धि की कामना, तो किसी के लिए जीवन की अनिश्चितताओं के बीच मानसिक संबल की तलाश। ज्वालामुखी मंदिर की अखंड ज्योति इसी अर्थ में एक प्रतीक बन जाती है। वह भक्त को निरंतरता, धैर्य और विश्वास का स्मरण कराती है। सदियों से प्रचलित लोककथाएं, धार्मिक अनुष्ठान और प्राकृतिक ज्वालाएं मिलकर इस धाम की सांस्कृतिक पहचान गढ़ती हैं। हिमाचल की पहाड़ियों के बीच मां ज्वाला का यह दरबार बताता है कि भारतीय तीर्थों की महत्ता केवल उनके प्राचीन होने में नहीं, बल्कि उन भावनाओं में भी है, जो उन्हें पीढ़ियों तक जीवित रखती हैं। यहां जलती ज्वालाएं श्रद्धालुओं के लिए देवी का स्वरूप हैं; उनके सामने झुकता सिर समर्पण का प्रतीक है और मंदिर से लौटता भक्त अपने भीतर आस्था की एक ऐसी लौ लेकर जाता है, जिसे किसी बाहरी बाती या तेल की आवश्यकता नहीं होती.

न बाती, न तेल... धरती की कोख से निकलती नौ ज्वालाओं में मां के दर्शन!

न बाती , न तेल ... धरती की कोख से निकलती नौ ज्वालाओं में मां के दर्शन ! कल्पना कीजिए , एक ऐसा मंदिर जहां न दीपक है , न ...