जब किला भीतर से ढहने लगे
: दीदी के दुर्ग में दरार या पतन की आहट?
राजनीति
में
हार
केवल
सत्ता
नहीं
छीनती,
वह
भ्रम
भी
तोड़
देती
है।
पश्चिम
बंगाल
में
तृणमूल
कांग्रेस
के
साथ
आज
कुछ
ऐसा
ही
होता
दिखाई
दे
रहा
है।
कभी
जिस
पार्टी
की
पहचान
लोहे
जैसे
संगठन,
आक्रामक
कार्यकर्ताओं
और
ममता
बनर्जी
की
निर्विवाद
पकड़
से
होती
थी,
आज
वही
पार्टी
पंचायत
से
संसद
तक
असंतोष,
विद्रोह
और
पलायन
की
खबरों
से
घिरी
हुई
है।
वर्षों
तक
बंगाल
की
राजनीति
को
अपनी
मुट्ठी
में
रखने
वाली
"दीदी"
के
सामने
अब
विपक्ष
से
बड़ी
चुनौती
अपने
ही
घर
के
भीतर
खड़ी
नजर
आ
रही
है।
सवाल
केवल
चुनावी
हार
का
नहीं
है।
सवाल
उस
राजनीतिक
संस्कृति
का
है,
जिसमें
धीरे-धीरे
संगठन
से
ज्यादा
व्यक्तित्व,
संवाद
से
ज्यादा
आदेश
और
सामूहिक
नेतृत्व
से
ज्यादा
केंद्रीकृत
नियंत्रण
प्रभावी
होता
चला
गया।
जब
सत्ता
साथ
होती
है
तो
ऐसी
व्यवस्थाएं
अजेय
लगती
हैं,
लेकिन
जनादेश
बदलते
ही
उनकी
कमजोरियां
उजागर
होने
लगती
हैं।
आज
तृणमूल
कांग्रेस
के
भीतर
उठ
रही
बगावत
की
आवाजें
इसी
गहरे
असंतोष
का
संकेत
मानी
जा
रही
हैं।
बंगाल
की
राजनीति
के
इस
मोड़
पर
सबसे
बड़ा
प्रश्न
यह
नहीं
है
कि
ममता
बनर्जी
चुनाव
क्यों
हार
गईं।
असली
सवाल
यह
है
कि
क्या
यह
केवल
राजनीतिक
पराजय
है,
या
फिर
उस
शैली
की
पराजय
भी,
जिसने
वर्षों
तक
संगठन
को
एक
चेहरे
और
एक
परिवार
के
इर्द-गिर्द
सीमित
कर
दिया
था?
दुसरा
बड़ा
सवाल
पंचायत से संसद तक बगावत, नेताओं का पलायन, कार्यकर्ताओं की नाराजगी और जनता का बदलता मिजाज—क्या बंगाल में ममता युग का सूर्यास्त शुरू हो चुका है?
सुरेश गांधी
भारतीय राजनीति में कुछ नेताओं
की कहानी केवल चुनाव जीतने-हारने की कहानी नहीं
होती, बल्कि वे एक युग
का प्रतिनिधित्व करती हैं। पश्चिम
बंगाल में ममता बनर्जी
का नाम ऐसा ही
है। वह नेता जिसने
कभी कांग्रेस छोड़कर अकेले संघर्ष का रास्ता चुना,
जिसने सड़कों पर लाठियां खाईं,
जिसने वामपंथ के 34 वर्षों के अजेय किले
को ध्वस्त कर इतिहास रचा
और जिसने स्वयं को बंगाल की
"दीदी" के रूप में
स्थापित किया। लेकिन राजनीति का इतिहास यह
भी बताता है कि सत्ता
के शिखर पर पहुंचने
से कठिन काम वहां
टिके रहना होता है।
और उससे भी कठिन
होता है जनता के
मन में अपनी जगह
बनाए रखना। आज पश्चिम बंगाल
की राजनीति में जो घटनाक्रम
सामने आ रहे हैं,
वे केवल एक चुनावी
हार की कहानी नहीं
हैं। वे उस राजनीतिक
मॉडल के संकट की
कहानी हैं जो वर्षों
तक एक व्यक्ति, एक
परिवार और एक केंद्रीकृत
सत्ता संरचना के इर्द-गिर्द
घूमता रहा। आज तृणमूल कांग्रेस के सामने सबसे
बड़ा सवाल विपक्ष नहीं,
बल्कि उसका अपना अस्तित्व
बन गया है। पंचायत
से लेकर संसद तक
बगावत के स्वर सुनाई
दे रहे हैं। पुराने
साथी किनारा कर रहे हैं।
कार्यकर्ता असंतोष जता रहे हैं।
स्थानीय नेता जनता के
सामने सफाई दे रहे
हैं। और जिन सांसदों
को कभी ममता बनर्जी
की राजनीतिक ताकत माना जाता
था, उनके बारे में
भी विद्रोह की खबरें सामने
आ रही हैं। सवाल
यह है कि आखिर
ऐसा क्या हुआ कि
कभी बंगाल की राजनीति पर
एकछत्र राज करने वाली
पार्टी आज अपने सबसे
बड़े संकट से गुजरती
दिखाई दे रही है?
संघर्ष की राजनीति से सत्ता की राजनीति तक
ममता बनर्जी का
उदय भारतीय राजनीति की सबसे रोचक
कहानियों में गिना जाता
है। साधारण परिवार से निकलकर उन्होंने
कांग्रेस में पहचान बनाई।
लेकिन जब उन्हें लगा
कि कांग्रेस बंगाल में वामपंथ के
खिलाफ प्रभावी लड़ाई नहीं लड़ पा
रही है, तो उन्होंने
अलग रास्ता चुना। 1998 में तृणमूल कांग्रेस
का गठन हुआ। उस
समय बहुत कम लोगों
ने सोचा था कि
यह पार्टी कभी वामपंथ को
चुनौती दे पाएगी। लेकिन
ममता बनर्जी ने किसानों, महिलाओं,
गरीबों और वाम विरोधी
मतदाताओं को साथ लेकर
एक ऐसा जनाधार तैयार
किया जिसने 2011 में इतिहास बदल
दिया। सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलनों
ने उन्हें जननेता के रूप में
स्थापित किया। जनता को लगा
कि यह महिला सत्ता
के अहंकार के खिलाफ लड़
रही है। परिणामस्वरूप 34 वर्षों
से सत्ता में बैठा वाम
मोर्चा उखड़ गया और
ममता बनर्जी मुख्यमंत्री बनीं। उस दौर में
ममता संघर्ष, सादगी और जनभावनाओं की
प्रतीक थीं। उनकी सूती
साड़ी, हवाई चप्पल और
आक्रामक राजनीतिक शैली जनता को
आकर्षित करती थी। लेकिन
समय के साथ यही
आंदोलनकारी राजनीति सत्ता की राजनीति में
बदल गई।
सत्ता का सबसे बड़ा खतरा—अहंकार
लोकतंत्र में जनता नेताओं
को जिताती भी है और
समय आने पर सबक
भी सिखाती है। राजनीतिक इतिहास
गवाह है कि जब
भी किसी दल ने
यह मान लिया कि
जनता का समर्थन स्थायी
है, उसके पतन की
शुरुआत हो गई। तृणमूल
कांग्रेस पर भी समय
के साथ यही आरोप
लगने लगे। विपक्ष का
कहना था कि सत्ता
के लंबे दौर ने
पार्टी के भीतर जवाबदेही
कम कर दी। स्थानीय
स्तर पर नेताओं और
कार्यकर्ताओं में यह भावना
बढ़ी कि संगठन अब
जनता की अपेक्षा सत्ता
के संरक्षण में अधिक रुचि
रखता है। पार्टी की
बैठकों से लेकर प्रशासनिक
फैसलों तक, सब कुछ
कुछ चुनिंदा लोगों के हाथों में
केंद्रित होता चला गया।
जो नेता सवाल उठाते
थे, वे धीरे-धीरे
हाशिए पर पहुंचते गए।
राजनीति में असहमति को
दबाया जा सकता है,
समाप्त नहीं किया जा
सकता। जब तक सत्ता
रहती है, असंतोष भीतर
ही भीतर सुलगता रहता
है। लेकिन जैसे ही सत्ता
का कवच टूटता है,
वही असंतोष विद्रोह का रूप ले
लेता है। आज तृणमूल
कांग्रेस के भीतर जो
कुछ दिखाई दे रहा है,
उसे इसी परिप्रेक्ष्य में
देखा जा रहा है।
क्या पार्टी एक व्यक्ति तक सिमट गई थी?
किसी भी लोकतांत्रिक
दल की ताकत उसका
संगठन होता है। लेकिन
तृणमूल कांग्रेस में धीरे-धीरे
यह धारणा मजबूत होती गई कि
पार्टी का अर्थ केवल
ममता बनर्जी हैं। संगठनात्मक निर्णय,
टिकट वितरण, रणनीति निर्माण और नेतृत्व का
स्वरूप पूरी तरह शीर्ष
नेतृत्व के इर्द-गिर्द
केंद्रित होता गया। जब
तक चुनाव जीते जाते रहे,
यह मॉडल सफल दिखाई
दिया। लेकिन हार के बाद
सवाल उठने लगे कि
क्या पार्टी ने दूसरे स्तर
का नेतृत्व विकसित ही नहीं होने
दिया? कई वरिष्ठ नेताओं
का मानना रहा कि पार्टी
में संवाद का दायरा लगातार
सिमटता गया। पुराने नेताओं
की भूमिका कम होती गई
और संगठन की जगह व्यक्तिवाद
हावी होने लगा। यही कारण
है कि आज जब
संकट आया है तो
पार्टी के पास उसे
संभालने के लिए मजबूत
सामूहिक नेतृत्व दिखाई नहीं देता।
अभिषेक बनर्जी : उत्तराधिकारी या विवाद का केंद्र?
तृणमूल कांग्रेस के संकट की
चर्चा अभिषेक बनर्जी के बिना अधूरी
है। पार्टी के भीतर और
बाहर दोनों जगह यह धारणा
लंबे समय से मौजूद
रही कि अभिषेक बनर्जी
को भविष्य का नेतृत्वकर्ता माना
जा रहा है। धीरे-धीरे संगठन में
उनकी भूमिका बढ़ती गई। समर्थकों का
तर्क है कि उन्होंने
पार्टी को आधुनिक स्वरूप
देने का प्रयास किया
और नई पीढ़ी को
नेतृत्व में स्थान दिया।
लेकिन आलोचकों का आरोप है
कि इसी प्रक्रिया में
पुराने नेताओं को किनारे लगाया
गया। कई बागी नेताओं
ने सार्वजनिक रूप से यह
आरोप लगाया कि पार्टी में
निर्णय लेने की प्रक्रिया
सीमित हो गई थी
और असहमति रखने वालों के
लिए जगह नहीं बची
थी। यहीं से परिवारवाद
की बहस भी शुरू
हुई। भारतीय राजनीति में परिवारवाद नया
विषय नहीं है। लेकिन
जब किसी दल में
संगठनात्मक लोकतंत्र कमजोर पड़ता है और शक्ति
कुछ लोगों के हाथों में
केंद्रित हो जाती है,
तब परिवारवाद का आरोप और
अधिक प्रभावी हो जाता है।
आज तृणमूल कांग्रेस इसी आरोप से
जूझ रही है।
कट-मनी, भ्रष्टाचार और जनता का गुस्सा
तृणमूल सरकार के कार्यकाल में
सबसे ज्यादा चर्चा जिस मुद्दे की
हुई, वह था कथित
"कट-मनी"। विपक्ष लगातार
आरोप लगाता रहा कि सरकारी
योजनाओं का लाभ दिलाने
के नाम पर स्थानीय
स्तर पर अवैध वसूली
का तंत्र विकसित हो गया है।
हालांकि पार्टी ने इन आरोपों
को राजनीतिक हमला बताया, लेकिन
यह मुद्दा जनता के बीच
लगातार चर्चा में रहा। यदि
आज कुछ स्थानीय नेताओं
को जनता के सामने
जाकर सफाई देनी पड़
रही है, यदि कुछ
लोग कथित रूप से
धन लौटाने की बात कर
रहे हैं, तो यह
केवल राजनीतिक घटना नहीं है।
यह उस भरोसे के
संकट का संकेत है
जो जनता और संगठन
के बीच पैदा हुआ।
जनता भ्रष्टाचार के आरोपों को
लंबे समय तक सहन
कर सकती है, लेकिन
जब उसे लगता है
कि व्यवस्था उसके खिलाफ खड़ी
हो गई है, तब
उसका धैर्य टूट जाता है।
पंचायत से शुरू हुई बगावत
तृणमूल कांग्रेस की वास्तविक ताकत
हमेशा उसका ग्रामीण नेटवर्क
रहा। बंगाल के गांवों में
पंचायतों के माध्यम से
पार्टी ने वर्षों तक
अपनी पकड़ मजबूत बनाए
रखी। लेकिन आज सबसे बड़ी
चुनौती वहीं से सामने
आती दिख रही है।
पंचायत प्रतिनिधियों, जिला परिषद सदस्यों
और स्थानीय नेताओं के असंतोष ने
पार्टी नेतृत्व की चिंता बढ़ा
दी है। जमीनी कार्यकर्ताओं
का आरोप है कि
चुनावी हार के बाद
संगठन ने उन्हें अकेला
छोड़ दिया। जनता का गुस्सा
उन्हें झेलना पड़ रहा है,
जबकि फैसले ऊपर से लिए
गए थे। यदि किसी
राजनीतिक दल की नींव
में दरार पड़ जाए
तो ऊपरी ढांचा ज्यादा
समय तक टिक नहीं
सकता।
नगर निकायों में भी संकट
सिर्फ ग्रामीण क्षेत्रों में ही नहीं,
शहरी निकायों में भी तृणमूल
कांग्रेस को चुनौतियों का
सामना करना पड़ रहा
है। नगर निगमों और
नगर पालिकाओं में बढ़ती असहमति
यह संकेत देती है कि
संकट केवल चुनावी नहीं
बल्कि संरचनात्मक है। स्थानीय नेताओं
का एक वर्ग मानता
है कि संगठन ने
जनता के वास्तविक मुद्दों
की अपेक्षा राजनीतिक प्रबंधन पर अधिक ध्यान
दिया। परिणामस्वरूप जनता और संगठन
के बीच दूरी बढ़ती
गई।
विधायक और सांसद क्यों बेचैन हैं?
राजनीति में नेता हमेशा
जनता की नब्ज पढ़ने
का प्रयास करते हैं। जब
उन्हें लगता है कि
जनता का मूड बदल
रहा है, तब वे
अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर नए
विकल्प तलाशने लगते हैं। आज
तृणमूल कांग्रेस के भीतर जो
बेचैनी दिखाई दे रही है,
उसके पीछे यही मनोविज्ञान
भी काम कर रहा
है। कई विधायक और
सांसद यह महसूस कर
रहे हैं कि यदि
वे समय रहते अपनी
राजनीतिक स्थिति नहीं बदलते तो
भविष्य में नुकसान उठाना
पड़ सकता है। यही
कारण है कि पार्टी
के भीतर असंतोष की
खबरें लगातार सामने आ रही हैं।
ममता की सबसे बड़ी भूल क्या रही?
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार ममता
बनर्जी की सबसे बड़ी
ताकत उनका जनता से
सीधा संवाद था। लेकिन समय
के साथ उनके और
जनता के बीच संगठनात्मक
परतें बढ़ती चली गईं। वह
नेता जो कभी कार्यकर्ताओं
के बीच बैठती थीं,
धीरे-धीरे सत्ता संरचना
के शीर्ष पर पहुंच गईं।
शायद यहीं सबसे बड़ी
दूरी पैदा हुई। जब
नेता केवल समर्थकों की
बात सुनने लगते हैं और
आलोचना को विरोध समझने
लगते हैं, तब वास्तविकता
उनसे दूर होने लगती
है।
क्या यह ममता युग का अंत है?
इतिहास गवाह है कि
राजनीति में अंतिम अध्याय
लिखना हमेशा जोखिम भरा होता है।
ममता बनर्जी को कम आंकना
आसान नहीं है। उन्होंने
अपने राजनीतिक जीवन में कई
बार असंभव दिखने वाली परिस्थितियों को
पलटा है। उनके पास
अनुभव है, जनाधार है
और संघर्ष की विरासत भी
है। लेकिन यह भी सच
है कि आज की
चुनौती पहले से कहीं
अधिक जटिल है। क्योंकि
इस बार लड़ाई विपक्ष
से नहीं, बल्कि अपनी ही बनाई
राजनीतिक संरचना की कमजोरियों से
है।
जनता का फैसला सबसे बड़ा होता है
तृणमूल कांग्रेस का मौजूदा संकट
केवल एक पार्टी की
कहानी नहीं है। यह
भारतीय राजनीति के लिए भी
एक बड़ा सबक है।
यह बताता है कि लोकतंत्र
में कोई भी नेता
कितना ही लोकप्रिय क्यों
न हो, यदि संगठन
में संवाद खत्म हो जाए,
सत्ता कुछ लोगों के
हाथों में सिमट जाए,
परिवारवाद योग्यता पर हावी हो
जाए और जनता की
आवाज कमजोर पड़ जाए, तो
पतन की शुरुआत हो
जाती है। आज बंगाल
की राजनीति एक निर्णायक मोड़
पर खड़ी है। सवाल
केवल यह नहीं कि
ममता बनर्जी सत्ता में लौट पाएंगी
या नहीं। बड़ा सवाल यह
है कि क्या तृणमूल
कांग्रेस आत्ममंथन करेगी, अपनी गलतियों को
स्वीकार करेगी और स्वयं को
पुनर्गठित करेगी? क्योंकि लोकतंत्र में जनता देर
से बोलती है, लेकिन जब
बोलती है तो सबसे
बड़े किलों की नींव भी
हिल जाती है। कभी
"मां, माटी और मानुष"
के नारे पर खड़ी
हुई तृणमूल कांग्रेस आज एक ऐसे
मोड़ पर है, जहां
उसे तय करना है
कि वह आत्मसुधार का
रास्ता चुनेगी या फिर इतिहास
की उन राजनीतिक कहानियों
में शामिल हो जाएगी, जो
सत्ता के शिखर से
सीधे पतन की खाई
में उतर गईं।

