Tuesday, 17 February 2026

मोदी-मैक्रों साझेदारी से मजबूत होगा भारत

मोदी-मैक्रों साझेदारी से मजबूत होगा भारत 

वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती कूटनीतिक ताकत के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक कार्यक्रम को लेकर देश में राजनीतिक बहस छेड़ दी गई है। सवाल उठाया जा रहा है कि क्या पड़ोसी देश के शपथ समारोह में उनकी अनुपस्थिति कूटनीतिक चूक है या फिर यह एक सुनियोजित रणनीतिक प्राथमिकता का हिस्सा। दरअसल, जब विश्व शक्ति संतुलन तेजी से बदल रहा हो, तब किसी भी राष्ट्र की विदेश नीति केवल औपचारिक उपस्थिति से नहीं बल्कि दीर्घकालिक सुरक्षा, सामरिक साझेदारी और वैश्विक प्रभाव के समीकरणों से तय होती है। ऐसे में यह बहस केवल एक दौरे की नहीं, बल्कि भारत की उभरती वैश्विक भूमिका और उसकी रणनीतिक सोच को समझने की भी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की प्रस्तावित मुलाकात वैश्विक शक्ति संतुलन में भारत की निर्णायक भूमिका तय करने वाली मानी जा रही है। जब डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीतियों से वैश्विक अर्थव्यवस्था अस्थिर है, तब भारत और फ्रांस की रणनीतिक साझेदारी स्थिरता का मजबूत विकल्प बनकर उभर रही है। राफेल विमानों के उन्नयन, स्कॉर्पीन पनडुब्बियों के निर्माण, हैमर मिसाइलों के संयुक्त उत्पादन और हेलीकॉप्टर निर्माण जैसे रक्षा सौदे भारत की सैन्य शक्ति और आत्मनिर्भरता को नई ऊंचाई देंगे। साथ ही कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल तकनीक में सहयोग भविष्य की वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारत की स्थिति मजबूत करेगा। यह मुलाकात केवल द्विपक्षीय संबंध नहीं, बल्कि चीन के बढ़ते प्रभाव के सामने रणनीतिक संतुलन स्थापित करने की दिशा में बड़ा कदम है। मतलब साफ है यह साझेदारी राष्ट्रहित, सुरक्षा और वैश्विक नेतृत्व की ओर भारत की मजबूत बढ़त साबित होगी

सुरेश गांधी

भारत की विदेश नीति को लेकर एक बार फिर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक कार्यक्रमों को लेकर यह सवाल उठाया जा रहा है कि उन्हें बांग्लादेश के शपथ ग्रहण समारोह में जाना चाहिए था। यह बहस सतही तौर पर राजनीतिक लग सकती है, लेकिन यदि इसे राष्ट्रीय और वैश्विक रणनीतिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह विवाद वास्तविकता से अधिक राजनीतिक प्रतीत होता है। दरअसल, इसी दौरान फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों का भारत दौरा तय था। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में यह केवल औपचारिक मुलाकात नहीं बल्कि सामरिक साझेदारी का महत्वपूर्ण अवसर माना जाता है। फ्रांस भारत का भरोसेमंद रक्षा सहयोगी रहा है और अंतरिक्ष तकनीक, परमाणु ऊर्जा, समुद्री सुरक्षा तथा इंडो-पैसिफिक रणनीति में दोनों देशों की साझेदारी भारत की वैश्विक स्थिति को मजबूत करती रही है। ऐसे में फ्रांस के साथ उच्च स्तरीय वार्ता को प्राथमिकता देना केवल कूटनीतिक औपचारिकता नहीं बल्कि दीर्घकालिक राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा निर्णय माना जाना चाहिए।

जहां तक बांग्लादेश का प्रश्न है, भारत और बांग्लादेश के संबंध पिछले दशक में अभूतपूर्व रूप से मजबूत हुए हैं। सीमा समझौते, व्यापार विस्तार, ऊर्जा सहयोग और आतंकवाद विरोधी समन्वय जैसे कई क्षेत्रों में दोनों देशों ने उल्लेखनीय प्रगति की है। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना के कार्यकाल में भारत-बांग्लादेश संबंधों ने स्थिरता और विश्वास की नई मिसाल कायम की है। इसलिए यह तर्क देना कि प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति से रिश्तों में असहजता उत्पन्न होगी, कूटनीतिक वास्तविकताओं से मेल नहीं खाता। अंतरराष्ट्रीय प्रोटोकॉल के अनुसार किसी भी देश के शपथ ग्रहण समारोह में प्रधानमंत्री का स्वयं उपस्थित होना अनिवार्य नहीं होता। कई बार वरिष्ठ प्रतिनिधिमंडल भेजना भी समान सम्मान का संकेत माना जाता है। इसी परंपरा के तहत भारत ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला को प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व सौंपा। यह निर्णय भारत की संस्थागत व्यवस्था और कूटनीतिक गरिमा के अनुरूप है। घरेलू राजनीतिक विवादों के आधार पर संवैधानिक पदों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाना अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश की छवि को प्रभावित कर सकता है।

कुछ राजनीतिक विश्लेषकों द्वारा यह सुझाव भी दिया गया कि विपक्ष के नेता राहुल गांधी को प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व सौंपा जाना चाहिए था। यह विचार लोकतांत्रिक सहयोग के दृष्टिकोण से आकर्षक लग सकता है, लेकिन भारतीय संसदीय व्यवस्था में विदेश नीति का संचालन सरकार का विशेषाधिकार होता है। विपक्ष की भूमिका सुझाव और आलोचना तक सीमित होती है, कि आधिकारिक प्रतिनिधित्व का नेतृत्व करना। यदि विदेश नीति को राजनीतिक प्रयोग का माध्यम बना दिया जाए, तो यह शासन प्रणाली की स्थिरता पर प्रश्न खड़े कर सकता है। भारत की कूटनीति को केवल पड़ोसी देशों तक सीमित करके देखना भी उचित नहीं है। वैश्विक शक्ति संतुलन तेजी से बदल रहा है और भारत को एक साथ कई मोर्चों पर रणनीतिक संतुलन बनाए रखना पड़ता है। पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान जैसी चुनौतियाँ पहले से मौजूद हैं, वहीं हिंद-प्रशांत क्षेत्र में नई सामरिक प्रतिस्पर्धा उभर रही है। ऐसे में वैश्विक साझेदारियों को मजबूत करना भारत की आवश्यकता भी है और रणनीतिक मजबूती का संकेत भी।

विदेश नीति का मूल उद्देश्य भावनात्मक संतुलन नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक हित और वैश्विक प्रभाव को मजबूत करना होता है। किसी भी कूटनीतिक निर्णय का मूल्यांकन तात्कालिक राजनीतिक लाभ या नुकसान के आधार पर नहीं बल्कि दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों के संदर्भ में किया जाना चाहिए। आज भारत वैश्विक मंच पर एक उभरती हुई शक्ति के रूप में स्थापित हो रहा है। यह स्थिति केवल सैन्य या आर्थिक ताकत से नहीं बल्कि संतुलित और दूरदर्शी कूटनीति से संभव हुई है। प्रधानमंत्री के विदेश दौरों और रणनीतिक प्राथमिकताओं को राजनीतिक चश्मे से देखने की प्रवृत्ति देश की कूटनीतिक परिपक्वता को कमजोर कर सकती है। भारत जैसे विशाल और प्रभावशाली राष्ट्र के लिए यह आवश्यक है कि विदेश नीति को राजनीतिक विवाद का विषय बनाने के बजाय राष्ट्रीय सहमति और रणनीतिक सोच के साथ देखा जाए। कूटनीति में संतुलन ही शक्ति है और यही संतुलन भारत को वैश्विक नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ा रहा है।

रणनीतिक साझेदारी की नई बिसात : राष्ट्रहित के मोर्चे पर निर्णायक चाल

वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था के अनिश्चित दौर में भारत और फ्रांस के रिश्ते केवल कूटनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि रणनीतिक मजबूती की नई पटकथा लिख रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की प्रस्तावित मुलाकात ऐसे समय में हो रही है जब दुनिया आर्थिक अस्थिरता, रक्षा संतुलन और तकनीकी प्रतिस्पर्धा के नए मोड़ पर खड़ी है। इस शिखर वार्ता में राष्ट्रहित सर्वोपरि रहेगा और दोनों देश भविष्य की वैश्विक शक्ति संरचना में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने की दिशा में निर्णायक कदम बढ़ाने की तैयारी में हैं।

वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता के बीच रणनीतिक संवाद

दुनिया की अर्थव्यवस्था इस समय व्यापारिक टकरावों और संरक्षणवादी नीतियों के दबाव से गुजर रही है। खासकर डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीतियों ने वैश्विक व्यापार संतुलन को झकझोर दिया है। ऐसे हालात में भारत और फ्रांस के बीच सहयोग केवल द्विपक्षीय संबंध नहीं बल्कि वैश्विक आर्थिक स्थिरता के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। दोनों नेता व्यापार, उद्योग और डिजिटल अर्थव्यवस्था को नए आयाम देने पर जोर देंगे, जिससे वैश्विक मंच पर भारत की भूमिका और मजबूत हो सके।

रक्षा सहयोग : आत्मनिर्भर भारत की निर्णायक छलांग

भारत-फ्रांस संबंधों की सबसे मजबूत नींव रक्षा क्षेत्र में दिखाई देती है। भारत की सैन्य क्षमता को मजबूत करने में फ्रांस लंबे समय से विश्वसनीय सहयोगी रहा है।

राफेल और अत्याधुनिक सैन्य शक्ति

2016 में भारत द्वारा 36 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद भारतीय वायुसेना की ताकत को नई ऊंचाई दे चुकी है। अब चर्चा इस बात पर केंद्रित है कि भारत अतिरिक्त विमानों की खरीद करेगा या मौजूदा विमानों के लिए उन्नत हथियार और तकनीकी अपग्रेड हासिल करेगा।

पनडुब्बी निर्माण में रणनीतिक बढ़त

प्रोजेक्ट-75 के तहत भारत में स्कॉर्पीन पनडुब्बियों का निर्माण देश की समुद्री सुरक्षा को नई मजबूती दे रहा है। मुंबई के मझगांव डॉक में फ्रांसीसी तकनीक और भारतीय विशेषज्ञता का संगम आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन का सशक्त उदाहरण बन चुका है। आने वाले समय में प्रोजेक्ट-75 इंडिया के तहत सहयोग विस्तार पर भी चर्चा संभावित है।

हैमर मिसाइल: सटीक युद्ध क्षमता

फ्रांस की रक्षा कंपनी MBDA द्वारा निर्मित हैमर मिसाइल भारत की एयर-टू-ग्राउंड हमले की क्षमता को बेहद सटीक बना सकती है। इसका भारत में संयुक्त निर्माण रक्षा स्वदेशीकरण की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।

हेलीकॉप्टर निर्माण : मेक इन इंडिया का नया अध्याय

फ्रांस की प्रमुख कंपनी अरबस हेजीकाप्टर और टाटा समूह के संयुक्त प्रयास से भारत की पहली हेलीकॉप्टर फाइनल असेंबली लाइन स्थापित की जा रही है। कर्नाटक के वेमागल में बनने वाली यह इकाई एयरबस H-125 हेलीकॉप्टर का निर्माण करेगी। यह परियोजना केवल रक्षा जरूरतों को पूरा नहीं करेगी, बल्कि रोजगार, तकनीकी विकास और औद्योगिक आत्मनिर्भरता को भी मजबूत करेगी।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता : भविष्य की शक्ति संतुलन

मुंबई में आयोजित एआई इम्पैक्ट समिट में मैक्रों की भागीदारी इस बात का संकेत है कि दोनों देश भविष्य की तकनीकी प्रतिस्पर्धा में साझेदारी को प्राथमिकता दे रहे हैं। भारत और फ्रांस संयुक्त रूप से नई तकनीकों का विकास और उनके जिम्मेदार उपयोग को सुनिश्चित करने पर सहमत हैं। एआई सहयोग वैश्विक डिजिटल नेतृत्व की दौड़ में भारत को मजबूत स्थिति में ला सकता है।

इंडो-पैसिफिक रणनीति और चीन संतुलन

इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच फ्रांस भारत का मजबूत रणनीतिक सहयोगी बनकर उभरा है। दोनों देश क्षेत्र में संतुलन बनाए रखने और समुद्री सुरक्षा को मजबूत करने के लिए साझा रणनीति पर काम कर रहे हैं। यह साझेदारी केवल सैन्य सहयोग नहीं बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन की दिशा तय करने वाला गठबंधन भी बन सकती है।

आर्थिक और सांस्कृतिक सहयोग का विस्तार

भारत और फ्रांस के बीच करीब 18 अरब डॉलर का वार्षिक व्यापार और फ्रांस का 15 अरब डॉलर का निवेश इस रिश्ते की आर्थिक गहराई को दर्शाता है। संस्कृति, जलवायु परिवर्तन और डिजिटल अर्थव्यवस्था जैसे क्षेत्रों में सहयोग नई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है।

राष्ट्रहित की मजबूत दिशा

मोदी-मैक्रों वार्ता केवल कूटनीतिक बैठक नहीं बल्कि भारत की वैश्विक भूमिका को मजबूत करने की रणनीतिक पहल है। रक्षा स्वदेशीकरण, तकनीकी साझेदारी और आर्थिक सहयोग के माध्यम से भारत आत्मनिर्भरता और वैश्विक नेतृत्व की दिशा में निर्णायक कदम बढ़ा रहा है। दोनों नेताओं की मित्रता और विश्वास भारत-फ्रांस संबंधों को नई ऊंचाई देने की क्षमता रखता है। आने वाले समय में इस साझेदारी से केवल दोनों देशों बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन पर भी दूरगामी प्रभाव पड़ने की संभावना है. 

कूटनीति को कटघरे में खड़ा करना बंद कीजिए

भारत की विदेश नीति को लेकर कुछ वर्गों द्वारा जिस तरह भावनात्मक और राजनीतिक भ्रम फैलाने की कोशिश की जा रही है, वह केवल तथ्यहीन है बल्कि राष्ट्रीय हितों के साथ अन्याय भी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विदेश दौरे और कूटनीतिक प्राथमिकताओं को लेकर जो प्रश्न खड़े किए जा रहे हैं, वे अधिकतर राजनीतिक पूर्वाग्रह से प्रेरित प्रतीत होते हैं, कि राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक दृष्टिकोण से।

वैश्विक ताकतों से रिश्ते मजबूत करना कोई अपराध नहीं

जब इमैनुएल मैक्रों जैसे विश्व शक्ति के नेता भारत आते हैं, तो वह केवल औपचारिक मुलाकात नहीं होती, बल्कि यह भारत की वैश्विक स्थिति को मजबूत करने का अवसर होता है। फ्रांस केवल विकसित राष्ट्र ही नहीं, बल्कि रक्षा तकनीक, परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष अनुसंधान और इंडो-पैसिफिक सुरक्षा का भारत का सबसे भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार है। जो लोग यह सुझाव दे रहे हैं कि ऐसे महत्वपूर्ण दौरे को नजरअंदाज कर दिया जाता, वे दरअसल भारत की दीर्घकालिक सुरक्षा और सामरिक हितों की गंभीरता को समझने में असफल हैं। कूटनीति भावनाओं की प्रतियोगिता नहीं होती, बल्कि शक्ति संतुलन का विज्ञान होती है।

प्रतिनिधिमंडल भेजना कमजोरी नहीं, परिपक्व कूटनीति

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला को बांग्लादेश भेजने के निर्णय पर सवाल उठाना भी राजनीतिक अपरिपक्वता को दर्शाता है। दुनिया के अधिकांश लोकतांत्रिक देशों में यह सामान्य कूटनीतिक परंपरा है कि हर समारोह में राष्ट्राध्यक्ष या प्रधानमंत्री स्वयं शामिल नहीं होते। उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल भेजना सम्मान और औपचारिकता का ही हिस्सा होता है। किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की छवि पर घरेलू राजनीति के आधार पर सवाल उठाकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश की साख को कमजोर करने का प्रयास निंदनीय है।

विपक्ष को विदेश नीति सौंपने का सुझाव: राजनीतिक बचकानापन

यह तर्क देना कि प्रधानमंत्री विपक्ष के नेता राहुल गांधी को सरकारी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व सौंप देते, भारतीय संसदीय प्रणाली की मूल संरचना की अनदेखी है। विदेश नीति सरकार का अधिकार क्षेत्र होता है, कि राजनीतिक प्रयोगशाला। यदि विपक्ष को ही सरकारी प्रतिनिधित्व सौंपा जाने लगे, तो यह शासन व्यवस्था के सिद्धांतों को कमजोर करने जैसा होगा। राष्ट्रीय मुद्दों पर सहयोग आवश्यक है, लेकिन नेतृत्व और जिम्मेदारी निर्वाचित सरकार की ही होती है कृ यही लोकतांत्रिक परंपरा का आधार है।

पड़ोसी देशों के रिश्तों पर आधा सच फैलाना बंद होना चाहिए

कुछ राजनीतिक विचारधाराएँ लगातार यह प्रचारित करती रही हैं कि भारत अपने पड़ोस में अलग-थलग पड़ गया है। जबकि सच्चाई यह है कि दक्षिण एशिया में भारत आज भी सबसे बड़ा आर्थिक और रणनीतिक सहयोगी है। भारत ने आर्थिक संकट में श्रीलंका को संभाला, भूटान के विकास में प्रमुख भूमिका निभाई और क्षेत्रीय सुरक्षा में नेतृत्वकारी भूमिका निभा रहा है। पश्चिम में पाकिस्तान की शत्रुतापूर्ण नीति के बावजूद भारत ने अपनी रणनीतिक स्थिति को मजबूत रखा है। यह किसी कमजोरी नहीं बल्कि सशक्त कूटनीति का संकेत है।

राष्ट्रहित बनाम राजनीतिक नैरेटिव

विदेश नीति को राजनीतिक आलोचना का मंच बनाना आसान होता है, लेकिन राष्ट्रहित के दीर्घकालिक दृष्टिकोण को समझना कठिन होता है। भारत आज जिस वैश्विक शक्ति संतुलन की दिशा में आगे बढ़ रहा है, उसमें रणनीतिक साझेदारियों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री के दौरे और कूटनीतिक निर्णय केवल वर्तमान राजनीतिक समीकरणों को देखकर नहीं बल्कि आने वाले दशकों की वैश्विक चुनौतियों को ध्यान में रखकर तय किए जाते हैं।

कूटनीति पर राजनीति का चश्मा उतारना होगा

भारत की विदेश नीति आज आत्मविश्वास और रणनीतिक दूरदर्शिता पर आधारित है। फ्रांस जैसे वैश्विक साझेदार के साथ संबंध मजबूत करना और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देश के साथ संतुलन बनाए रखना, यही परिपक्व राष्ट्र की पहचान है। राजनीतिक लाभ के लिए कूटनीतिक निर्णयों को विवाद का विषय बनाना केवल तथ्यात्मक रूप से गलत है, बल्कि यह राष्ट्रहित के विरुद्ध भी है। भारत आज वैश्विक मंच पर मजबूती से खड़ा है और यही उसकी सबसे बड़ी कूटनीतिक सफलता है।

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