सलाखों के साये में खड़ा एक दूसरा संसार, जहां नियमों के पीछे छिप जाता है खेल
कैद सिर्फ शरीर की, व्यवस्था की नहीं, सुधार की जगह सौदे का केंद्र?
जेल... यह शब्द सुनते ही आंखों के सामने ऊंची दीवारें, लोहे की मजबूत सलाखें, बंद दरवाजे और सख्त सुरक्षा व्यवस्था की तस्वीर उभरती है। आम आदमी की कल्पना में जेल एक ऐसी जगह होती है जहां कानून का शासन सबसे अधिक कठोर रूप में दिखाई देता है। जहां हर कदम नियमों से तय होता है और जहां किसी भी तरह की मनमानी की कोई जगह नहीं होती। लेकिन देश के अलग-अलग हिस्सों से समय-समय पर सामने आने वाली घटनाएं और आरोप एक अलग तस्वीर भी खींचते हैं। एक ऐसी तस्वीर, जहां सलाखों के पीछे एक समानांतर तंत्र के अस्तित्व की चर्चा होती है। आरोप यह भी लगते रहे हैं कि कहीं बेहतर बैरक के लिए पैसे का खेल है, कहीं मुलाकात की व्यवस्था पर सवाल उठते हैं, तो कहीं प्रतिबंधित वस्तुओं के जेल तक पहुंचने पर सुरक्षा व्यवस्था कटघरे में खड़ी दिखाई देती है। सवाल केवल इतना नहीं कि जेलों के भीतर क्या हो रहा है? असली सवाल यह है कि जिस स्थान का उद्देश्य अपराध को रोकना और अपराधी को सुधारना है, यदि उसी स्थान के भीतर प्रभाव, पैसा और पहुंच व्यवस्था पर हावी होने लगें, तो सुधार की अवधारणा कितनी सुरक्षित रह जाती है? यह केवल जेलों की कहानी नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था के सामने खड़ा एक गंभीर राष्ट्रीय प्रश्न भी है। दुसरा सबसे बड़ा सवाल सलाखों के पीछे किसका राज? क्या देश की जेलों में पनप रहा है अवैध वसूली का अंधेरा कारोबार? मतलब साफ है बैरकों से तबादलों तक फैले सवाल, जेलों के भीतर ही नहीं बल्कि व्यवस्था के भीतर भी झांकने का समय...
सुरेश गांधी
फिरहाल, भारत में जेलों
को हमेशा से कानून की
सबसे कठोर और अनुशासित
संस्था के रूप में
देखा गया है। आम
नागरिक की कल्पना में
जेल वह जगह है
जहां नियमों से बड़ा कुछ
नहीं होता, जहां अपराध की
दुनिया समाप्त होती है और
सुधार की प्रक्रिया शुरू
होती है। लेकिन देश
के विभिन्न हिस्सों से समय-समय
पर सामने आने वाली घटनाएं,
आरोप और प्रशासनिक चर्चाएं
एक अलग तस्वीर भी
पेश करती हैं। यह
तस्वीर केवल जेल की
बैरकों के भीतर की
नहीं है, बल्कि उस
व्यवस्था की भी है
जो इन बैरकों को
संचालित करती है। सवाल
यह है कि यदि
सुधारगृह के भीतर समानांतर
व्यवस्था जन्म लेने लगे,
तो फिर कानून की
वास्तविक शक्ति कहां रह जाती
है? अक्सर चर्चाएं जेलों के भीतर मोबाइल
फोन, प्रतिबंधित सामग्री, विशेष सुविधाओं, कथित अवैध वसूली
और वीआईपी संस्कृति तक सीमित रहती
हैं। लेकिन इन घटनाओं के
पीछे एक और महत्वपूर्ण
पहलू है जिस पर
अपेक्षाकृत कम चर्चा होती
है, वह है जेल
प्रशासन की संरचना, तैनाती,
तबादला व्यवस्था और संस्थागत पारदर्शिता।
जेल के भीतर की दुनिया: जहां नियम और आरोप साथ-साथ चलते हैं
प्रतिबंधित वस्तुएं आखिर पहुंचती कैसे हैं?
जेल अराजकता की एक और कड़ी: तैनाती और तबादला व्यवस्था
जेलों की स्थिति पर
चर्चा करते समय एक
ऐसा पक्ष सामने आता
है जिस पर सामान्यतः
कम ध्यान जाता है, अधिकारियों
और कर्मचारियों की तैनाती तथा
स्थानांतरण व्यवस्था। हाल के समय
में विभिन्न प्रशासनिक चर्चाओं और खबरों में
यह बात सामने आती
रही है कि कुछ
जेलों में तैनाती को
लेकर असामान्य रुचि दिखाई जाती
है, जबकि कुछ स्थानों
से दूरी बनाए रखने
की कोशिश होती है। यह
स्थिति कई प्रश्न पैदा
करती है, क्या सभी
तैनातियां केवल प्रशासनिक आवश्यकता
के आधार पर होती
हैं? क्या संवेदनशील पदों
पर चयन पूरी तरह
पारदर्शी है? क्या किसी
विशेष स्थान पर लंबे समय
तक बने रहने से
अनौपचारिक प्रभाव तंत्र विकसित हो सकता है?
यहां किसी व्यक्ति विशेष
पर आरोप स्थापित नहीं,
बल्कि व्यवस्था के भीतर ऐसी
चर्चाएं लगातार चलती रहें, तो
संस्थागत स्तर पर समीक्षा
आवश्यक हो जाती है।
क्योंकि यदि जेल के
भीतर किसी प्रकार की
समानांतर व्यवस्था विकसित होती है, तो
उसकी शुरुआत केवल बैरक से
नहीं होतीय कई बार उसकी
जड़ें प्रशासनिक संरचना तक जाती हैं।
जब तैनाती व्यवस्था प्रश्नों के घेरे में आती है
किसी भी विभाग
में बार-बार एक
ही स्थान पर लंबे समय
तक तैनाती या कथित प्रभाव
आधारित पोस्टिंग कई समस्याएं पैदा
कर सकती हैं, पहला:
स्थानीय प्रभाव तंत्र मजबूत होने लगता है।
दूसरा: जवाबदेही कमजोर पड़ सकती है।
तीसरा: संस्थागत निष्पक्षता पर प्रश्न उठ
सकते हैं। चैथा: प्रशासनिक
नियंत्रण सीमित हो सकता है।
यदि जेल प्रशासन में
ऐसी धारणा बनती है कि
कुछ पद महत्वपूर्ण हैं
और कुछ कम महत्वपूर्ण,
तो यह भी असंतुलन
का संकेत हो सकता है।
देश की जेलें और बढ़ती चुनौती
भारत की अधिकांश
जेलें अपनी निर्धारित क्षमता
से अधिक कैदियों का
बोझ झेल रही हैं।
जब किसी प्रणाली पर
दबाव बढ़ता है तो
कई स्तरों पर कठिनाइयां सामने
आती हैं कर्मचारियों की
कमी, मानसिक दबाव, सुरक्षा जोखिम, निगरानी की सीमाएं, संसाधनों
का असंतुलन. इन्हीं परिस्थितियों में अनौपचारिक तंत्र
विकसित होने की संभावना
भी बढ़ जाती है।
तकनीक समाधान है, लेकिन अंतिम उत्तर नहीं
सरकारों ने जेल सुधार
के लिए कई कदम
उठाए हैं, डिजिटल रिकॉर्ड,
सीसीटीवी नेटवर्क, वीडियो मुलाकात, बायोमेट्रिक निगरानी, ई-प्रिजन्स प्रणाली.
लेकिन तकनीक केवल साधन है।
यदि व्यवस्था की मूल संरचना
में पारदर्शिता कमजोर होगी, तो तकनीक भी
सीमित प्रभाव ही डाल पाएगी।
जेल सुधार का नया मॉडल क्या हो?
यदि वास्तव में
बदलाव लाना है तो
कुछ महत्वपूर्ण कदम आवश्यक दिखाई
देते हैं 1. पारदर्शी तैनाती नीति: संवेदनशील पदों पर स्पष्ट
और निष्पक्ष नीति हो। 2. स्वतंत्र
निरीक्षण प्रणाली: जेलों की समीक्षा केवल
विभागीय स्तर तक सीमित
न रहे। 3. कर्मचारियों की संख्या बढ़े:
अत्यधिक कार्यभार कम किया जाए।
4. शिकायत तंत्र गोपनीय हो ताकि शिकायतकर्ता
सुरक्षित महसूस कर सके। 5. वीआईपी
संस्कृति समाप्त हो, जेल के
भीतर एक ही नियम
लागू हो। 6. पुनर्वास को प्राथमिकता मिले,
जेल केवल दंड केंद्र
न बनकर सुधार केंद्र
भी बने।
सलाखों से पहले सिस्टम की पड़ताल
जेल
की सलाखें अपराधियों को कैद कर
सकती हैं, लेकिन यदि
व्यवस्था के भीतर मौजूद
कमियां स्वतंत्र घूमती रहें, तो केवल कठोर
नियम समस्या का समाधान नहीं
बन सकते। देश के सामने
सबसे बड़ा प्रश्न यह
नहीं है कि किसी
जेल के भीतर क्या
चल रहा है। प्रश्न
यह है कि क्या
हम केवल बैरकों को
देख रहे हैं और
उस व्यवस्था को अनदेखा कर
रहे हैं जो उन
बैरकों को संचालित करती
है। क्योंकि जेल की अराजकता
कई बार बैरक में
जन्म नहीं लेतीकृउसकी पहली
ईंट कहीं और रखी
जाती है। और यदि
उस पहली ईंट की
पहचान समय रहते नहीं
हुई, तो सुधारगृहों की
दीवारें मजबूत होने के बावजूद
व्यवस्था भीतर से कमजोर
होती चली जाएंगी।
जेलों की वास्तविकता: क्षमता से अधिक कैदी
भारत की जेलों
के सामने सबसे बड़ी चुनौती
भीड़ है। देश की
अधिकांश जेलें अपनी निर्धारित क्षमता
से कहीं अधिक कैदियों
को संभाल रही हैं। जब
किसी व्यवस्था पर आवश्यकता से
अधिक दबाव पड़ता है,
तो उसमें अनियमितताओं की संभावना भी
बढ़ जाती है। कल्पना
कीजिए कि किसी जेल
की क्षमता 1000 कैदियों की है लेकिन
वहां 1800 से 2000 लोग रह रहे
हों। ऐसी स्थिति में
प्रशासनिक नियंत्रण कठिन हो जाता
है। कर्मचारियों पर अतिरिक्त बोझ
बढ़ता है, निगरानी कम
प्रभावी होती है और
इसी अव्यवस्था के बीच कई
अनौपचारिक तंत्र विकसित होने लगते हैं।
जेल विशेषज्ञों का मानना है
कि जब भीड़ बढ़ती
है, तब बैरक आवंटन
से लेकर भोजन वितरण
और मुलाकात व्यवस्था तक सब पर
दबाव बढ़ जाता है।
ऐसे माहौल में यदि कुछ
लोग नियमों को प्रभावित करने
लगें तो एक समानांतर
व्यवस्था जन्म लेने लगती
है।
प्रवेश से बैरक तक
पूर्व कैदियों, मानवाधिकार संगठनों और विभिन्न रिपोर्टों
में समय-समय पर
ऐसे आरोप सामने आते
रहे हैं कि कुछ
जेलों में प्रवेश के
बाद कैदियों को कई स्तरों
पर कठिनाइयों का सामना करना
पड़ता है। आरोप यह
भी लगाए जाते रहे
हैं कि अेक्षाकृत
बेहतर बैरक के लिए
अतिरिक्त रकम, अधिक मुलाकात
सुविधा,भीड़भाड़ वाली बैरक से
बचने के लिए लेन-देन, अतिरिक्त भोजन
या विशेष खान-पान, जेल
के भीतर छोटे-मोटे
कामों में राहत. हालांकि
यह कहना उचित नहीं
होगा कि हर जेल
या हर कर्मचारी ऐसे
मामलों में शामिल होता
है। देश भर में
हजारों जेलकर्मी अत्यंत कठिन परिस्थितियों में
ईमानदारी से कार्य करते
हैं। लेकिन समस्या यह है कि
यदि व्यवस्था में कहीं छोटे
स्तर पर भी भ्रष्टाचार
का रास्ता बनता है, तो
धीरे-धीरे वह संगठित
स्वरूप ले सकता है।
भारत तेजी से बदल
रहा है। डिजिटल इंडिया,
आधुनिक प्रशासन और पारदर्शी शासन
की बात हो रही
है। लेकिन यदि सुधारगृहों के
भीतर अंधेरे कोनों में अवैध तंत्र
पनपते रहे, तो न्याय
व्यवस्था की विश्वसनीयता प्रभावित
होगी। सलाखें अपराधियों को कैद कर
सकती हैं, लेकिन व्यवस्था
के भीतर मौजूद कमियों
को नहीं। देश को ऐसी
जेल व्यवस्था चाहिए जहां अपराधी अपराध
छोड़ने की प्रेरणा लेकर
बाहर निकले, न कि नए
नेटवर्क और नए अपराध
के तरीके सीखकर। क्योंकि यदि सुधारगृह स्वयं
सुधार की प्रतीक्षा करने
लगें, तो समाज के
सामने सबसे गंभीर चुनौती
खड़ी हो जाती है।




