शिव की बारात और तांडव
में फर्क नहीं समझने वाले देश को समझा रहे लोकतंत्र!
राहुल को मोदी से नहीं, प्रियंका से भी सियासी चुनौती का डर! : संबित पात्रा

चुनाव
में हार मिले तो आत्ममंथन होना चाहिए, लेकिन कांग्रेस नेतृत्व अपनी विफलताओं का ठीकरा
कभी ईवीएम तो कभी चुनाव आयोग पर फोड़ता है। 56 विधानसभा चुनावों में पराजय के बाद भी
राहुल गांधी को अपनी राजनीति की खामियां नहीं दिखतीं, उन्हें हर जगह वोट चोरी नजर आती
है। यह तीखा हमला भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता एवं सांसद डॉ. संबित पात्रा ने सोमवार
को काशी में किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी को चुनाव आयोग पर आरोप लगाने के बजाय
अपनी पार्टी की लगातार कमजोर होती राजनीतिक जमीन का हिसाब देना चाहिए। प्रियंका गांधी
को भी निशाने पर लेते हुए पात्रा ने सवाल उठाया कि विपक्ष के मंचों पर राहुल गांधी
को बोलने का अवसर मिलता है, लेकिन प्रियंका गांधी को क्यों नहीं? क्या कांग्रेस में
भाई-बहन के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है? क्या राहुल गांधी को प्रियंका की
बढ़ती राजनीतिक भूमिका असहज करती है? उन्होंने कहा कि कांग्रेस को पहले अपने नेतृत्व
की उलझन सुलझानी चाहिए, फिर लोकतांत्रिक संस्थाओं पर सवाल उठाने चाहिए। एसआईआर को लेकर
13 करोड़ वोट चोरी के आरोपों को खारिज करते हुए उन्होंने कहा कि मतदाता सूची का शुद्धिकरण
संवैधानिक प्रक्रिया है। मृतकों, स्थानांतरित और डुप्लीकेट मतदाताओं के नामों की जांच
को वोट चोरी बताना जनता को गुमराह करना है। ममता बनर्जी पर निशाना साधते हुए उन्होंने
कहा कि घुसपैठियों को भारतीय मतदाता सूची में जगह नहीं मिलनी चाहिए। देश के संसाधनों
और लोकतांत्रिक अधिकारों पर पहला हक भारतीय नागरिकों का है
सुरेश गांधी
काशी की राजनीति
में आस्था है, लेकिन उसकी
जमीन पर सवाल भी
उतने ही तीखे उठते
हैं। भगवान शिव की नगरी
से भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता
एवं सांसद डॉ. संबित पात्रा
ने सोमवार को देश की
मौजूदा राजनीतिक बहस को इसी
अंदाज में संबोधित किया।
विषय था विशेष गहन
पुनरीक्षण यानी एसआईआर, लेकिन
बातचीत का दायरा मतदाता
सूची से निकलकर कांग्रेस
के नेतृत्व, राहुल गांधी की राजनीतिक शैली,
प्रियंका गांधी की भूमिका, ममता
बनर्जी की राजनीति और
घुसपैठ के सवाल तक
पहुंच गया। पात्रा ने
विपक्ष के आरोपों को
राजनीतिक हताशा करार देते हुए
कहा कि लोकतंत्र में
मतदाता सूची की शुद्धता
से समझौता नहीं किया जा
सकता। प्रस्तुत हैं सीनियर रिपोर्टर
सुरेश गांधी की उनसे विस्तृत
बातचीत के प्रमुख अंश
: -
सवाल
: आपने प्रेसवार्ता की शुरुआत शिवजी की बारात और उनके तांडव का उल्लेख करके की। राजनीति
के बीच अचानक शिवत्व और सनातन परंपरा की चर्चा क्यों?
जवाब
: डॉ. संबित पात्रा
: काशी महादेव की नगरी है। यहां कण-कण में शंकर का वास माना जाता है। मैं इस पवित्र
भूमि को प्रणाम करके अपनी बात शुरू करना चाहता था। दुर्भाग्य है कि भारत की राजनीति
में ऐसे लोग भी हैं जिन्हें शिवजी की बारात और उनके तांडव के बीच का अंतर समझ में नहीं
आता। शिवजी की बारात उल्लास, उत्सव, समरसता और अपने विराट स्वरूप में सबको साथ लेकर
चलने का प्रतीक है, जबकि तांडव भगवान शिव के विराट और प्रचंड स्वरूप का प्रतीक है।
दोनों की अपनी अलग महत्ता और संदर्भ हैं। इन्हें एक बताकर सनातन परंपरा को लेकर भ्रम
फैलाना उचित नहीं। राजनीति में भी विरोध और विनाशकारी अराजकता के बीच अंतर समझना जरूरी
है। काशी की धरती से इस विषय पर बात करना इसलिए भी प्रासंगिक है, क्योंकि यहां सनातन
की परंपरा केवल आस्था नहीं, जीवन का दर्शन है।
सवाल
: एसआईआर
को
लेकर
देश
में
राजनीतिक
टकराव
बढ़ता
जा
रहा
है।
विपक्ष
इसे
मताधिकार
पर
हमला
बता
रहा
है,
जबकि
भाजपा
इसे
शुद्धिकरण
की
प्रक्रिया
कह
रही
है।
आखिर
इस
विवाद
की
जड़
क्या
है?
जवाब
: डॉ. संबित पात्रा : विवाद की जड़ लोकतांत्रिक
व्यवस्था को समझने और
न समझने का अंतर है।
भारत एक लोकतांत्रिक देश
है। यहां चुनाव मतदाता
सूची के आधार पर
होते हैं। इसलिए यह
सुनिश्चित करना चुनाव आयोग
की जिम्मेदारी है कि सूची
में केवल पात्र मतदाताओं
के नाम हों। किसी
व्यक्ति की मृत्यु हो
चुकी है, वह स्थायी
रूप से दूसरी जगह
चला गया है, वर्षों
से अपने पते पर
उपलब्ध नहीं है अथवा
उसका नाम दो स्थानों
पर दर्ज है तो
ऐसे मामलों की जांच होना
जरूरी है। यही एसआईआर
का मूल उद्देश्य है।
इसे राजनीतिक चश्मे से देखना उचित
नहीं। मतदाता सूची कोई स्थायी
दस्तावेज नहीं, बल्कि समय-समय पर
अद्यतन होने वाली लोकतांत्रिक
व्यवस्था है। यदि इसमें
अपात्र नाम बने रहेंगे
तो वास्तविक मतदाता के अधिकार और
चुनाव की विश्वसनीयता दोनों
प्रभावित होंगे।
सवाल
: राहुल
गांधी
लगातार
13 करोड़
वोट
चोरी
का
आरोप
लगा
रहे
हैं।
क्या
भाजपा
के
पास
इस
आरोप
का
कोई
ठोस
जवाब
है?
जवाब
: सबसे पहले राहुल गांधी
को आंकड़ों का अर्थ समझना
चाहिए। मतदाता सूची के पुनरीक्षण
में चार प्रमुख श्रेणियों
पर काम होता है।
अंग्रेजी में इन्हें एब्सेंट,
शिफ्टेड, डेड और डुप्लीकेट
कहा जाता है। यानी
अनुपस्थित, स्थायी रूप से स्थानांतरित,
मृतक और दोहरी प्रविष्टि
वाले मतदाता। क्या मृत व्यक्ति
का नाम मतदाता सूची
में रहना चाहिए? क्या
एक व्यक्ति को दो जगह
वोट डालने का अधिकार मिलना
चाहिए? क्या किसी दूसरे
शहर में स्थायी रूप
से बस चुके व्यक्ति
का नाम पुरानी जगह
पर भी बना रहना
चाहिए? इन सवालों का
जवाब राहुल गांधी को देना चाहिए।
करीब तीन करोड़ मतदाता
अनुपस्थित श्रेणी में चिह्नित किए
गए हैं। इसके बाद
सत्यापन और नाम जोड़ने
की प्रक्रिया भी चलती है।
बड़ी संख्या में लोगों ने
फॉर्म-6 भरकर नाम जुड़वाने
का आवेदन किया है। स्थानांतरित
लोगों को भी नोटिस
देकर अपनी स्थिति स्पष्ट
करने का अवसर दिया
जा रहा है। इसके
अतिरिक्त डुप्लीकेट प्रविष्टियों की पहचान होती
है। इन सभी प्रक्रियाओं
को एक साथ जोड़कर
13 करोड़ वोट चोरी का
नाम दे देना आंकड़ों
के साथ खिलवाड़ है।
यह वोट चोरी नहीं,
मतदाता सूची की शुद्धता
सुनिश्चित करने का प्रयास
है।
सवाल
: लेकिन
किसी
पात्र
मतदाता
का
नाम
गलती
से
कट
जाए
तो
उसके
लोकतांत्रिक
अधिकार
का
क्या
होगा?
जवाब
: बिल्कुल, किसी पात्र मतदाता
का नाम नहीं कटना
चाहिए। मैं स्पष्ट कहना
चाहता हूं कि यदि
कहीं त्रुटि होती है तो
उसे सुधारने का रास्ता मौजूद
है। यही लोकतांत्रिक प्रक्रिया
की खूबसूरती है। नाम छूटने
पर आवेदन किया जा सकता
है, आपत्ति दर्ज कराई जा
सकती है और निर्धारित
प्रक्रिया से नाम जुड़वाया
जा सकता है। हम
किसी वास्तविक भारतीय नागरिक को उसके मताधिकार
से वंचित करने के पक्ष
में नहीं हैं। लेकिन
इसी तर्क के आधार
पर मृतकों, डुप्लीकेट और अपात्र प्रविष्टियों
को बनाए रखने की
मांग भी नहीं की
जा सकती। अधिकार के साथ व्यवस्था
की शुद्धता भी जरूरी है।
सवाल
: विपक्ष
का
कहना
है
कि
भाजपा
सरकार
आने
के
बाद
पहली
बार
इस
तरह
का
विशेष
पुनरीक्षण
कराया
जा
रहा
है।
क्या
यह
राजनीतिक
आरोप
सही
है?
जवाब
: बिल्कुल गलत। देश में
एसआईआर की परंपरा नई
नहीं है। अब तक
12 बार ऐसी प्रक्रिया हो
चुकी है। इनमें दस
बार कांग्रेस शासनकाल में और दो
बार भाजपा शासनकाल में हुई। इसका
सीधा अर्थ है कि
यह चुनाव आयोग की नियमित
लोकतांत्रिक जिम्मेदारी का हिस्सा है।
कांग्रेस के शासनकाल में
जब ऐसी प्रक्रिया होती
थी तब उसे लोकतंत्र
का शुद्धिकरण कहा जाता था
और आज वही प्रक्रिया
हो रही है तो
उसे वोट चोरी बताया
जा रहा है। आखिर
यह दोहरा मापदंड क्यों? क्या चुनाव आयोग
के अधिकार केवल तब तक
सही हैं, जब तक
परिणाम कांग्रेस की राजनीतिक अपेक्षाओं
के अनुरूप हों?
सवाल
: कांग्रेस
का
आरोप
है
कि
एसआईआर
के
बहाने
खास
वर्ग
के
मतदाताओं
को
निशाना
बनाया
जा
रहा
है।
क्या
यह
चिंता
निराधार
है?
जवाब
: देखिए, मतदाता होने का आधार
किसी की जाति, धर्म,
भाषा या राजनीतिक पसंद
नहीं, बल्कि कानून के अनुसार पात्रता
है। भारत का संविधान
और चुनावी कानून नागरिकों को मताधिकार देते
हैं। किसी भी पात्र
नागरिक का नाम केवल
उसकी पहचान या विचारधारा के
आधार पर नहीं हटाया
जा सकता। लेकिन किसी अपात्र व्यक्ति
को केवल राजनीतिक लाभ
के लिए मतदाता सूची
में बनाए रखने की
मांग भी स्वीकार नहीं
हो सकती। हम बार-बार
कह रहे हैं कि
एसआईआर में किसी वास्तविक
भारतीय नागरिक को परेशान करने
की बात नहीं है।
जो पात्र हैं, उनका नाम
रहे; जो पात्र नहीं
हैं, उनकी प्रविष्टि की
जांच हो। लोकतंत्र की
बुनियाद यही है।
सवाल
: आपने
बंगाल
की
20 विधानसभा
सीटों
का
उदाहरण
दिया।
इस
उदाहरण
से
आप
क्या
साबित
करना
चाहते
हैं?
जवाब
: विपक्ष का आरोप है
कि मतदाताओं के नाम काटकर
भाजपा चुनाव जीतने की तैयारी कर
रही है। मैंने बंगाल
की उन 20 विधानसभा सीटों का उदाहरण दिया,
जहां सर्वाधिक नाम कटने की
बात सामने आई। इन सीटों
में अधिकांश पर तृणमूल कांग्रेस
की जीत हुई। यदि
नाम काटने का उद्देश्य भाजपा
को जिताना होता तो परिणाम
इसके उलट होने चाहिए
थे। फिर वहां भाजपा
क्यों नहीं जीती? इसका
अर्थ है कि मतदाता
सूची का पुनरीक्षण और
चुनाव परिणाम दो अलग-अलग
प्रक्रियाएं हैं। हर चुनाव
का परिणाम जनता के मत
से तय होता है,
किसी राजनीतिक दल की इच्छा
से नहीं। ममता बनर्जी और
उनकी पार्टी को भी यह
समझना चाहिए।
सवाल
: पश्चिम
बंगाल
में
ममता
बनर्जी
एसआईआर
का
सबसे
मुखर
विरोध
कर
रही
हैं।
क्या
भाजपा
इसे
केवल
चुनावी
राजनीति
मानती
है?
जवाब
: ममता बनर्जी को यह स्पष्ट
करना चाहिए कि उन्हें एसआईआर
से परेशानी आखिर किस बात
की है। यदि मतदाता
सूची में कोई गड़बड़ी
नहीं है तो सत्यापन
से डर कैसा? भारत
के संसाधनों पर पहला अधिकार
भारत के नागरिकों का
है। यह बात केवल
भाजपा नहीं कहती, देश
की लोकतांत्रिक और संवैधानिक व्यवस्था
भी नागरिकता और पात्रता को
महत्व देती है। घुसपैठिया
किसी भी परिस्थिति में
भारतीय नागरिक का स्थान नहीं
ले सकता। वह भारतीय मतदाता
नहीं बन सकता। किसी
भी राजनीतिक दल को घुसपैठियों
के नाम मतदाता सूची
में बनाए रखने की
पैरवी नहीं करनी चाहिए।
ममता बनर्जी को भी बताना
होगा कि उनकी राजनीति
का आधार पात्र मतदाता
हैं या ऐसी प्रविष्टियां
जिन्हें कानून के तहत जांचा
जाना चाहिए।
सवाल
: क्या
भाजपा
एसआईआर
को
घुसपैठ
के
मुद्दे
से
जोड़कर
राजनीतिक
लाभ
लेने
की
कोशिश
कर
रही
है?
जवाब
: नहीं, यह राष्ट्रीय सुरक्षा
और लोकतांत्रिक अधिकारों का विषय है।
घुसपैठ केवल सीमा सुरक्षा
का प्रश्न नहीं है। इसका
प्रभाव स्थानीय जनसंख्या, संसाधनों, रोजगार और चुनावी व्यवस्था
तक पड़ सकता है।
कोई भी व्यक्ति केवल
किसी क्षेत्र में लंबे समय
तक रहने के आधार
पर भारतीय नागरिक नहीं बन जाता।
नागरिकता के अपने कानूनी
प्रावधान हैं। चुनाव में
वोट देने का अधिकार
भी उसी के अनुरूप
निर्धारित होता है। हम
किसी निर्दोष या पात्र व्यक्ति
के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन
घुसपैठ को राजनीतिक संरक्षण
देने का भी विरोध
करते हैं। देश के
संसाधनों और मताधिकार पर
पहला हक भारतीय नागरिक
का है।
सवाल
: आपने
राहुल
गांधी
के
साथ
प्रियंका
गांधी
को
भी
निशाने
पर
लिया।
भाई-बहन
के
बीच
राजनीतिक
दरार
की
बात
उठाने
के
पीछे
क्या
आधार
है?
जवाब
: मैंने जो सवाल उठाया
है, वह सार्वजनिक राजनीतिक
गतिविधियों से जुड़ा है।
हाल के दिनों में
कांग्रेस और विपक्षी गठबंधन
के दो कार्यक्रम हुए।
एक प्रतीकात्मक मॉक पार्लियामेंट और
दूसरा रामलीला मैदान की रैली। इन
कार्यक्रमों में कई नेताओं
को बोलने का अवसर मिला।
राहुल गांधी ने अपनी बात
रखी, दूसरे नेताओं ने भी संबोधित
किया, लेकिन प्रियंका गांधी वाड्रा को बोलने का
अवसर नहीं मिला। यह
स्वाभाविक रूप से सवाल
पैदा करता है। प्रियंका
गांधी कांग्रेस की महासचिव हैं,
सांसद हैं और पार्टी
के प्रमुख चेहरों में शामिल हैं।
फिर उन्हें मंच पर अपनी
बात रखने का अवसर
क्यों नहीं दिया गया?
क्या कांग्रेस में राहुल गांधी
का अलग खेमा और
प्रियंका गांधी का अलग खेमा
बन रहा है? क्या
राहुल गांधी को यह आशंका
है कि प्रियंका को
अधिक प्रमुखता मिली तो उनका
अपना राजनीतिक स्थान प्रभावित हो सकता है?
क्या भाई-बहन के
बीच नेतृत्व को लेकर कोई
प्रतिस्पर्धा है? ये सवाल
कांग्रेस के भीतर उठने
चाहिए। मैं किसी पारिवारिक
संबंध पर टिप्पणी नहीं
कर रहा, बल्कि सार्वजनिक
राजनीतिक व्यवहार पर सवाल कर
रहा हूं।
सवाल
: क्या
आपको
लगता
है
कि
प्रियंका
गांधी
राहुल
गांधी
से
अधिक
प्रभावी
विपक्षी
चेहरा
बन
सकती
हैं?
जवाब
: यह कांग्रेस का आंतरिक विषय
है। किसे नेता बनाना
है, किसे कितनी जिम्मेदारी
देनी है, यह कांग्रेस
के लोग तय करें।
लेकिन एक बात समझ
में नहीं आती कि
यदि प्रियंका गांधी में क्षमता है
तो उन्हें आगे आने से
रोका क्यों जा रहा है?
और यदि कांग्रेस उन्हें
नेतृत्व में महत्वपूर्ण स्थान
देना चाहती है तो सार्वजनिक
मंचों पर उनकी भूमिका
स्पष्ट क्यों नहीं दिखती? देश
यह सब देख रहा
है। लोकतंत्र में नेतृत्व अवसर
देने से विकसित होता
है, अवसर रोकने से
नहीं। राहुल गांधी को अपनी बहन
की राजनीतिक भूमिका को लेकर असहज
नहीं होना चाहिए। कांग्रेस
को परिवार के भीतर की
राजनीति से बाहर निकलकर
देश के मुद्दों पर
ध्यान देना चाहिए।
सवाल
: राहुल
गांधी
ने
2024 के
लोकसभा
चुनाव
को
ही
अवैध
बता
दिया।
क्या
यह
लोकतांत्रिक
व्यवस्था
पर
सीधा
हमला
नहीं
है?
जवाब
: यही तो मेरा सबसे
बड़ा सवाल है। राहुल
गांधी जिस चुनाव को
अवैध बता रहे हैं,
उसी चुनाव में वह स्वयं
लोकसभा पहुंचे और नेता प्रतिपक्ष
बने। कांग्रेस के अनेक सांसद
उसी चुनाव से चुनकर आए।
विपक्षी गठबंधन के दूसरे दलों
के सांसद भी उसी प्रक्रिया
से संसद पहुंचे। यदि
चुनाव ही अवैध था
तो फिर उससे प्राप्त
जनादेश की वैधता पर
भी सवाल उठता है।
राहुल गांधी को यह स्पष्ट
करना चाहिए कि वह अपने
निर्वाचन को किस नजर
से देखते हैं। यदि किसी
चुनाव में गंभीर अनियमितता
हुई है तो न्यायालय
का दरवाजा खुला है। चुनाव
परिणाम को चुनौती देने
के लिए कानूनी रास्ते
हैं। केवल किसी राजनीतिक
मंच से चुनाव को
अवैध घोषित कर देने से
उसकी संवैधानिक स्थिति नहीं बदल जाती।
लोकतंत्र में आरोपों से
अधिक महत्व प्रमाण और न्यायिक प्रक्रिया
का होता है।
सवाल
: चुनाव
आयोग
की
निष्पक्षता
पर
भी
सवाल
उठ
रहे
हैं।
विपक्ष
का
कहना
है
कि
आयोग
सरकार
के
प्रभाव
में
काम
कर
रहा
है।
जवाब
: चुनाव आयोग एक संवैधानिक
संस्था है। उसके अधिकार
और जिम्मेदारियां कानून से निर्धारित हैं।
किसी राजनीतिक दल को उसके
किसी निर्णय से असहमति हो
सकती है। लेकिन असहमति
का अर्थ यह नहीं
कि पूरी संस्था को
कठघरे में खड़ा कर
दिया जाए। एसआईआर को
लेकर आयोग ने अपना
पक्ष सुप्रीम कोर्ट में भी रखा
है। मैंने प्रेसवार्ता में आयोग के
हलफनामे का उल्लेख किया।
जहां तक प्रक्रिया का
प्रश्न है, चुनाव आयोग
अपने अधिकार क्षेत्र में काम कर
रहा है। यदि किसी
को कोई आपत्ति है
तो उसे कानूनी आधार
पर उठाना चाहिए।
सवाल
: आपने
पूर्व
मुख्य
चुनाव
आयुक्तों
की
राजनीतिक
नियुक्तियों
का
भी
उल्लेख
किया।
क्या
यह
कांग्रेस
की
दोहरी
नीति
को
उजागर
करने
की
कोशिश
थी?
जवाब
: बिल्कुल। जब कांग्रेस सत्ता
में थी तब चुनाव
आयोग में काम कर
चुके कई अधिकारियों को
बाद में अलग-अलग
संवैधानिक और राजनीतिक जिम्मेदारियां
दी गईं। किसी को
राज्यपाल बनाया गया, किसी को
राज्यसभा भेजा गया और
किसी को मंत्री पद
मिला। तब कांग्रेस को
चुनाव आयोग की निष्पक्षता
पर सवाल नहीं सूझा।
आज जब चुनाव आयोग
कानून के मुताबिक मतदाता
सूची के पुनरीक्षण की
प्रक्रिया कर रहा है
तो उस पर आरोप
लगाए जा रहे हैं।
मेरा सवाल यही है
कि संस्थाओं के प्रति सम्मान
सत्ता में रहते हुए
ही क्यों दिखाई देता है? विपक्ष
में आते ही संवैधानिक
संस्थाओं पर अविश्वास क्यों?
सवाल
: चुनाव
आयुक्तों
के
बीच
कथित
मतभेद
और
अलग-अलग
राय
सामने
आने
की
बात
भी
कही
जा
रही
है।
इसे
आप
किस
तरह
देखते
हैं?
जवाब
: लोकतंत्र में विमर्श और
मतभिन्नता कोई असामान्य बात
नहीं है। तीन लोग
किसी विषय पर चर्चा
करते हैं, अलग-अलग
पहलुओं को देखते हैं
और फिर निर्णय तक
पहुंचते हैं। यह लोकतांत्रिक
प्रक्रिया है। तानाशाही में
सवाल नहीं होते, सब
एक ही बात कहते
हैं। लेकिन लोकतंत्र में सवाल उठते
हैं, चर्चा होती है और
फिर सामूहिक निर्णय लिया जाता है।
चुनाव आयोग ने सुप्रीम
कोर्ट में दाखिल अपने
हलफनामे में एसआईआर को
सर्वसम्मति से संचालित प्रक्रिया
बताया है। ऐसे में
अधूरी सूचनाओं के आधार पर
विवाद खड़ा करना उचित
नहीं।
सवाल
: आपने
कहा
कि
जून
2025 से
अब
तक
18 से
28 वर्ष
आयु
वर्ग
के
2.37 करोड़
युवाओं
के
नाम
जोड़े
गए
हैं।
क्या
यह
एसआईआर
के
पक्ष
में
सबसे
मजबूत
तर्क
है?
जवाब
: यह निश्चित रूप से एक
महत्वपूर्ण तथ्य है। एसआईआर
का उद्देश्य केवल नाम हटाना
नहीं, बल्कि पात्र मतदाताओं को जोड़ना भी
है। देश का युवा
18 वर्ष की आयु पूरी
करता है तो उसे
मतदाता बनने का अधिकार
मिलता है। हमने बताया
कि जून 2025 से अब तक
18 से 28 वर्ष के करीब
2.37 करोड़ युवाओं के नाम जोड़े
गए हैं। प्रतिदिन हजारों
युवा मतदाता सूची का हिस्सा
बन रहे हैं। यदि
किसी का उद्देश्य केवल
वोट काटना होता तो नए
मतदाताओं को जोड़ने की
प्रक्रिया पर इतना जोर
क्यों दिया जाता? एसआईआर
का वास्तविक उद्देश्य सूची को अद्यतन
और विश्वसनीय बनाना है।
सवाल
: भाजपा
कांग्रेस
और
सपा
के
बूथ
लेवल
एजेंटों
पर
सवाल
उठा
रही
है।
क्या
यह
जिम्मेदारी
केवल
विपक्ष
की
है
कि
वह
सूची
की
जांच
करे?
जवाब
: बिल्कुल नहीं। यह सभी राजनीतिक
दलों की साझा जिम्मेदारी
है। चुनाव आयोग ने पंजीकृत
राजनीतिक दलों को बूथ
लेवल एजेंट नियुक्त करने का अधिकार
दिया है। भाजपा अपने
एजेंट नियुक्त करती है, कांग्रेस
और समाजवादी पार्टी भी कर सकती
हैं। देशभर में लाखों बूथ
लेवल एजेंट इस प्रक्रिया का
हिस्सा हैं। बीएलओ जब
घर-घर जाकर सत्यापन
करता है तो राजनीतिक
दलों के प्रतिनिधि भी
सूची की जांच कर
सकते हैं। यदि कोई
पात्र मतदाता छूट रहा है
तो उसे तत्काल सामने
लाएं। मैं कांग्रेस और
समाजवादी पार्टी के बूथ एजेंटों
से पूछना चाहता हूं कि वे
अपने बूथ पर कितने
सक्रिय हैं? केवल प्रेसवार्ता
और राजनीतिक भाषणों से मतदाता का
नाम नहीं जुड़ता। उसके
लिए बूथ पर काम
करना पड़ता है।
सवाल
: राहुल गांधी का आरोप है
कि भाजपा चुनाव आयोग की मदद
से लगातार चुनाव जीत रही है।
आपने 56 विधानसभा चुनावों का आंकड़ा दिया।
इसका आशय क्या है?
जवाब
: मैंने कहा कि 2014 से
2025 के बीच कांग्रेस को
56 विधानसभा चुनावों में हार का
सामना करना पड़ा। राहुल
गांधी इस आंकड़े को
अपने राजनीतिक प्रदर्शन की समीक्षा के
बजाय चुनाव आयोग से जोड़ने
का प्रयास कर रहे हैं।
मैं पूछता हूं कि जब
ज्ञानेश कुमार मुख्य चुनाव आयुक्त नहीं थे, तब
भी कांग्रेस चुनाव हार रही थी।
2014, 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव
में भी कांग्रेस को
जनता के सामने जाना
पड़ा। चुनाव जीतने के लिए संगठन,
नेतृत्व, जनता का विश्वास
और जमीनी काम चाहिए। हार
के लिए हर बार
किसी संवैधानिक संस्था को जिम्मेदार ठहराना
राजनीतिक जिम्मेदारी से बचना है।
सवाल
: फिर
कांग्रेस
के
लगातार
कमजोर
होते
जनाधार
की
वजह
आप
क्या
मानते
हैं?
जवाब
: कांग्रेस को अपनी राजनीतिक
विफलताओं का आत्ममंथन करना
चाहिए। तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, बिहार, त्रिपुरा और ओडिशा जैसे
राज्यों में लंबे समय
से कांग्रेस सत्ता से बाहर रही
है। क्या इन सभी
राज्यों में एसआईआर के
कारण कांग्रेस कमजोर हुई? क्या वहां
भी चुनाव आयोग ने कांग्रेस
को हराया? नहीं। जनता का विश्वास
खोने के अपने कारण
होते हैं। संगठन कमजोर
होता है, नेतृत्व जनता
से दूर होता है
और कार्यकर्ताओं की आवाज नहीं
सुनी जाती तो चुनावी
परिणाम प्रभावित होते हैं। कांग्रेस
को इन सवालों का
जवाब अपने भीतर तलाशना
चाहिए।
सवाल
: विपक्षी
गठबंधन
एकजुट
होकर
एसआईआर
का
विरोध
कर
रहा
है।
क्या
इससे
भाजपा
को
राजनीतिक
चुनौती
महसूस
होती
है?
जवाब
: लोकतंत्र में विपक्ष मजबूत
होना चाहिए। हमें किसी स्वस्थ
विपक्ष से परेशानी नहीं
है। लेकिन सवाल यह है
कि यह गठबंधन किन
सिद्धांतों पर बना है?
जिन दलों के नेता
एक मंच पर खड़े
होकर एक-दूसरे के
साथ होने का दावा
करते हैं, वही अलग-अलग राज्यों में
एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव
लड़ते हैं। उत्तर प्रदेश
में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के
बीच सीटों को लेकर क्या
स्थिति होगी? बंगाल में तृणमूल कांग्रेस
और कांग्रेस का संबंध कैसा
रहेगा? केरल में कांग्रेस
और वामपंथी दल किसके साथ
खड़े होंगे? यह गठबंधन विचारधारा
से अधिक राजनीतिक सुविधा
का गठजोड़ दिखाई देता है। मंच
पर एकता दिखाना आसान
है, लेकिन चुनाव के समय सीट
और नेतृत्व का सवाल आते
ही असली तस्वीर सामने
आएगी।
सवाल
: काशी
से
इस
पूरे
राजनीतिक
विवाद
पर
आप
देश
को
क्या
संदेश
देना
चाहते
हैं?
जवाब
: काशी केवल एक धार्मिक
नगरी नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक
चेतना का केंद्र है।
यहां भगवान शिव की बारात
और उनके तांडव के
बीच का अंतर भी
समझना चाहिए। दोनों को एक मानकर
भ्रम फैलाना उचित नहीं। इसी
तरह लोकतंत्र में विरोध और
अराजकता के बीच अंतर
है। सवाल उठाना लोकतांत्रिक
अधिकार है, लेकिन तथ्यों
को तोड़ना-मरोड़ना और संस्थाओं के
प्रति अविश्वास फैलाना उचित नहीं। मैं
काशी की धरती से
यही कहना चाहता हूं
कि मतदाता सूची का शुद्धिकरण
किसी दल के पक्ष
या विपक्ष का विषय नहीं
होना चाहिए। यह देश के
लोकतंत्र की विश्वसनीयता का
प्रश्न है। किसी पात्र
भारतीय का वोट नहीं
कटना चाहिए और किसी अपात्र
व्यक्ति को वोट देने
का अधिकार नहीं मिलना चाहिए।
भारत के मतदाता का
सम्मान तभी सुरक्षित रहेगा
जब मतदाता सूची निष्पक्ष, पारदर्शी
और त्रुटिरहित होगी। लोकतंत्र में मत की
कीमत है, किसी राजनीतिक
दल की सुविधा की
नहीं। यही एसआईआर का
उद्देश्य है और इसी
दिशा में देश को
आगे बढ़ना चाहिए।