Monday, 27 April 2026

परदेस की भीड़ में खोती पहचान, अब माटी पुकार रही...

परदेस की भीड़ में खोती पहचान, अब माटी पुकार रही... 

पूर्वांचल की धरती आज एक गहरे संकट से गुजर रही है, जहां रोजगार की तलाश में गांवों से महानगरों की ओर हो रहा पलायन अब सामाजिक और सांस्कृतिक विघटन का रूप ले चुका है। बनारस से लेकर आजमगढ़ और गोरखपुर तक, लाखों लोग बेहतर जीवन की उम्मीद में मुंबई, दिल्ली, हैदराबाद की ओर जाते हैं, लेकिन वहां अपमान, असुरक्षा और संघर्ष उनका इंतजार करते हैं। ऐसे समय में मुंगरा बादशाहपुर काप्रवासी सम्मेलनएक नई उम्मीद बनकर उभर रहा है, जो प्रवासियों को उनकी जड़ों से जोड़कर विकास और सम्मान की नई राह दिखाने का संकल्प लिए हैण् मतलब साफ है पूर्वांचल केपलायन-चक्रपर निर्णायक मंथन की इस घड़ी में मुंगरा बादशाहपुर का प्रवासी सम्मेलन सिर्फ बदलाव का सूत्रधार होगा, बल्कि एक नए आयाम की अग्रसर होगा 

सुरेश गांधी

पूर्वांचल की धरती, जहां कभी श्रम, संस्कार और सभ्यता की सुवास देश-दुनिया तक फैलती थी, आज एक गहरे अंतर्द्वंद्व से गुजर रही है। यह संकट केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक अस्तित्व का प्रश्न बन चुका है। गांवों की पगडंडियों से लेकर शहरों की चकाचैंध तक फैला यहपलायन-चक्रअब नियति जैसा प्रतीत होने लगा है, जिसने बनारस, भदोही, जौनपुर, आजमगढ़, गाजीपुर, मिर्जापुर, सोनभद्र, चंदौली, गोरखपुर, मऊ, बलिया, प्रतापगढ़, सुल्तानपुर, प्रयागराज, कौशांबी, चित्रकूट से लेकर अयोध्या तक के जनजीवन को गहरे तक प्रभावित किया है।

पूर्वांचल का आम जन, खासकर गरीब और मध्यम वर्ग, आज भी दो जून की रोटी की तलाश में मुंबई, हैदराबाद, दिल्ली जैसे महानगरों की ओर पलायन को विवश है। यह केवल रोजगार की खोज नहीं, बल्कि परिस्थितियों के सामने आत्मसमर्पण है। गांवों के खेत, खलिहान और पुश्तैनी घर धीरे-धीरे खाली होते जा रहे हैं, जबकि महानगरों की झुग्गियों और संकरे फ्लैटों में पूर्वांचल की अस्मिता सिमटती जा रही है। रेलवे स्टेशनों पर उमड़ती भीड़, ठसाठस भरी ट्रेनों के जनरल डिब्बे, यह दृश्य केवल यात्रियों का नहीं, बल्कि टूटते सपनों और बिखरती उम्मीदों का प्रतीक है। आवागमन के दौरान होने वाली दुर्व्यवस्था, अपमान और असुविधा उस पीड़ा को और गहरा कर देती है, जिसे शब्दों में व्यक्त करना कठिन है।

विडंबना यह है कि जिन महानगरों के निर्माण में पूर्वांचल के श्रमिकों का पसीना बहा है, वहीं उन्हें अक्सरबाहरीकहकर उपेक्षा और तिरस्कार का सामना करना पड़ता है। संख्या बल में प्रभावशाली होने के बावजूद, सामाजिक विखंडन, जाति, उपजाति और छोटे-छोटे समूहों में बंटा समाज, उन्हें एकजुट शक्ति बनने से रोकता है। परिणामस्वरूप, वे केवलसस्ता श्रमऔरवोट बैंकबनकर रह जाते हैं। ऐसे निराशाजनक परिदृश्य के बीच 6 मई को मुंगरा बादशाहपुर की धरती पर आयोजितप्रवासी सम्मेलनएक नई उम्मीद लेकर सामने रहा है। यह केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि पूर्वांचल की चेतना को जगाने का प्रयास है, एक ऐसा मंच, जहां प्रवासी अपने अनुभव, संसाधन और सामर्थ्य को अपनी जड़ों से जोड़ने का संकल्प लेंगे।

इस सम्मेलन से प्रस्तावितप्रवासी फाउंडेशनएक गैर-राजनीतिक, निष्पक्ष और दूरदर्शी पहल के रूप में उभर सकता है, जो केवल विमर्श तक सीमित रहकर ठोस परिवर्तन का माध्यम बने। यह समय केवल समस्या गिनाने का नहीं, बल्कि समाधान की दिशा में ठोस कदम बढ़ाने का है, स्थानीय विकास का मॉडल, प्रवासियों की पूंजी, कौशल और अनुभव को गांवों में निवेश कर छोटे उद्योग, रोजगार और आधारभूत सुविधाओं का विकास। संगठन की शक्ति, महानगरों में प्रवासियों के अधिकारों की रक्षा के लिए मजबूत नेटवर्क और सामूहिक आवाज। सांस्कृतिक पुनर्संयोजन, अपनी भाषा, परंपरा और पहचान को बचाए रखते हुए आधुनिक विकास की ओर बढ़ना।

यह समझना होगा कि महानगर केवल आजीविका दे सकते हैं, पहचान नहीं। पहचान की जड़ें गांवों में ही होती हैं, वहीं हमारी संस्कृति, हमारी अस्मिता और हमारी आत्मा बसती है। यदि आज भी हम संगठित नहीं हुए, तो आने वाली पीढ़ियां अपनी पहचान के लिए भटकेंगी। मुंगरा बादशाहपुर का यह सम्मेलन एक चेतावनी भी है और अवसर भी, अपने अतीत को बचाने और भविष्य को संवारने का। जागिए, जुड़िए और बदलिए। पूर्वांचल की माटी पुकार रही है, अब वक्त गया है कि हम केवल परदेस की रोशनी बढ़ाएं, बल्कि अपने घर की लौ भी प्रज्वलित करें। इस विरोट सम्मेलन के संयोजक अरुण उपाध्याय का कहना है कि पूर्वांचल का पलायन केवल आर्थिक मजबूरी नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक संरचना के लिए गंभीर चुनौती बन चुका है।

मुंगरा बादशाहपुर का यहप्रवासी सम्मेलनउसी पीड़ा को दिशा देने का प्रयास है। हमारा उद्देश्य है कि जो लोग वर्षों से महानगरों में संघर्ष कर रहे हैं, उनकी ऊर्जा, अनुभव और संसाधनों को अपनी मातृभूमि के विकास से जोड़ा जाए।प्रवासी फाउंडेशनके माध्यम से हम एक ऐसा सशक्त, गैर-राजनीतिक मंच तैयार करना चाहते हैं, जो प्रवासियों के अधिकारों की रक्षा के साथ-साथ गांवों में रोजगार और अवसरों का सृजन करे। अब समय गया है कि हम केवल पलायन की कहानी लिखें, बल्किवापसी और विकासका नया अध्याय शुरू करें।

अभेद्य सुरक्षा घेरे में काशी, नारी शक्ति के महासंगम में गूंजेगी पीएम मोदी की हुंकार

अभेद्य सुरक्षा घेरे में काशी, नारी शक्ति के महासंगम में गूंजेगी पीएम मोदी की हुंकार 

बरेका में 5000 महिला सुरक्षाकर्मी तैनात: 50 हजार महिलाओं का विराट सम्मेलन: 6332 करोड़ की परियोजनाओं की सौगात

सुरेश गांधी

वाराणसी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दो दिवसीय दौरे से पहले काशी पूरी तरह सुरक्षा के अभेद्य घेरे में तब्दील हो चुकी है। शहर के हर प्रमुख मार्ग, चौराहे और कार्यक्रम स्थल पर कड़ी निगरानी और सख्त बंदोबस्त किए गए हैं। प्रशासन और पुलिस ने इस दौरे को लेकर ऐसा सुरक्षा खाका तैयार किया है, जो अब तक के सबसे मजबूत इंतजामों में गिना जा रहा है। 

बरेका स्थित मुख्य कार्यक्रम स्थल को विशेष रूप से हाई-सिक्योरिटी जोन घोषित किया गया है। यहां 5000 से अधिक सुरक्षाकर्मी तैनात किए गए हैं, जिनमें बड़ी संख्या में महिला पुलिसकर्मी शामिल हैं। 

खास बात यह है कि पूरे कार्यक्रम स्थल की सुरक्षा का जिम्मा महिला सुरक्षाकर्मियों को सौंपा गया है। चार आईपीएस अधिकारियों की निगरानी में यह सुरक्षा व्यवस्था संचालित होगी, जबकि एसीपी और एडिशनल रैंक के कई अधिकारी मौके पर तैनात रहेंगे।

सुरक्षा के लिहाज से कार्यक्रम स्थल के आसपास किसी भी अनधिकृत व्यक्ति की एंट्री पूरी तरह प्रतिबंधित कर दी गई है। सभी वाहनों को कार्यक्रम स्थल से करीब 500 मीटर पहले ही रोक दिया जाएगा। 

पुलिस आयुक्त मोहित अग्रवाल के निर्देशन में शहरभर में सघन चेकिंग, बैरिकेडिंग और रूट डायवर्जन पहले ही लागू कर दिया गया है। हर गतिविधि पर पैनी नजर रखने के लिए खुफिया और स्थानीय पुलिस की टीमें लगातार सक्रिय हैं।

प्रधानमंत्री मोदी 28 अप्रैल को दोपहर करीब 1.30 बजे बाबतपुर एयरपोर्ट पहुंचेंगे। वहां से उनके बरेका पहुंचने के लिए सड़क और हेलिकॉप्टर दोनों विकल्प तैयार रखे गए हैं। 

शाम 5 बजे वे बरेका में आयोजित भव्य महिला सम्मेलन को संबोधित करेंगे। 

इस सम्मेलन में काशी की आठों विधानसभा क्षेत्रों से करीब 50 हजार महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित की गई है। 

आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, आशा, एएनएम, सफाईकर्मी और विभिन्न वर्गों की महिलाएं इस कार्यक्रम में शामिल होंगी।

कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री महिलाओं के बीच गोल्फ कार्ट से पहुंचेंगे, जो इस आयोजन को और खास बनाएगा। 

शाम 7 बजे वे काशी के बुद्धिजीवियों और महिला प्रतिनिधियों से संवाद करेंगे। 

रात्रि विश्राम के बाद अगले दिन 29 अप्रैल की सुबह 8.30 बजे वे श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में दर्शन-पूजन करेंगे। इस दौरान शहर के विभिन्न मार्गों पर काशीवासी उनका जोरदार स्वागत करेंगे।

विकास के मोर्चे पर भी यह दौरा बेहद अहम साबित होने वाला है। बरेका में आयोजित कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री 6332 करोड़ रुपये की 163 परियोजनाओं की सौगात देंगे। 

इनमें 5277 करोड़ रुपये की 113 परियोजनाओं का शिलान्यास और 1055 करोड़ रुपये की 50 परियोजनाओं का लोकार्पण शामिल है।

प्रमुख परियोजनाओं में गंगा पर 2464 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाला रेल-रोड ब्रिज, 1582 करोड़ रुपये की सीवर और जलापूर्ति योजनाएं, कबीरचौरा अस्पताल का विस्तार, 198 बेड के नए अस्पताल का निर्माण, कमिश्नरी परिसर में इंटीग्रेटेड कॉम्प्लेक्स, भगवानपुर में 55 एमएलडी एसटीपी प्लांट, नई सड़कों और पुलों का निर्माण शामिल हैं। इसके अलावा स्वास्थ्य और आधारभूत संरचना से जुड़े कई अन्य प्रोजेक्ट भी काशी के विकास को नई रफ्तार देंगे।29 अप्रैल को प्रधानमंत्री बाबतपुर से हरदोई के लिए रवाना होंगे, जहां वे गंगा एक्सप्रेसवे के लोकार्पण कार्यक्रम में हिस्सा लेंगे। करीब 20 घंटे के इस प्रवास में काशी एक बार फिर राष्ट्रीय फलक पर विकास, सुरक्षा और जनभागीदारी का सशक्त उदाहरण पेश करेगी।  

परदेस की भीड़ में खोती पहचान, अब माटी पुकार रही...

परदेस की भीड़ में खोती पहचान , अब माटी पुकार रही ...  पूर्वांचल की धरती आज एक गहरे संकट से गुजर रही है , जहां रोजगार की...