Sunday, 1 November 2026

सिपाही को गोली मारने वाले गिरोह का असलहा नेटवर्क बेनकाब, फैक्ट्री में मिला हथियारों का जखीरा

सिपाही को गोली मारने वाले गिरोह का असलहा नेटवर्क बेनकाब, फैक्ट्री में मिला हथियारों का जखीरा 

सामने घाट के किराये के मकान में चल रही थी अवैध असलहा फैक्ट्री, तीन पिस्टल, 143 कारतूस और 19 अर्द्धनिर्मित असलहे बरामद; मुख्य आरोपी के पिता समेत दो गिरफ्तार

सुरेश गांधी 

वाराणसी। लंका थाने के आरक्षी अमित शुक्ला को गोली मारने वाले गिरोह का अवैध असलहा निर्माण और तस्करी का नेटवर्क पुलिस ने बेनकाब किया है। सामने घाट की शिवाजी नगर कॉलोनी स्थित एक किराये के मकान में कथित रूप से अवैध असलहे बनाने और उनकी सप्लाई का धंधा चल रहा था। पुलिस ने छापेमारी कर तीन तैयार देसी पिस्टल, 175 कारतूस, 24 खोखे, 19 अर्द्धनिर्मित असलहे और हथियार बनाने में इस्तेमाल होने वाली मशीनें व औजार बरामद किए हैं। कार्रवाई में मुख्य आरोपी अंजनी नंदन झा के पिता विमल कांत झा और उसके करीबी दोस्त अमन कुमार मिश्रा को गिरफ्तार किया गया है। अंजनी नंदन पहले ही पुलिस मुठभेड़ में गिरफ्तार हो चुका है।

पुलिस के मुताबिक, आरक्षी अमित शुक्ला पर फायरिंग की घटना के बाद से ही लंका पुलिस गिरोह के अन्य सदस्यों, उनके ठिकानों और असलहा सप्लाई नेटवर्क की पड़ताल में जुटी थी। मुखबिरों के साथ सीसीटीवी फुटेज, साइबर और सर्विलांस की मदद से संदिग्धों की गतिविधियों पर नजर रखी जा रही थी। इसी दौरान मुख्य आरोपी अंजनी नंदन झा की कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर) खंगालने पर एक संदिग्ध मोबाइल नंबर सामने आया। जांच में यह नंबर देवरिया निवासी अमन कुमार मिश्रा का निकला, जो फिलहाल डाफी में रह रहा था। पूछताछ में अमन ने अंजनी नंदन से करीबी दोस्ती स्वीकार करते हुए बताया कि वह उसके लिए अवैध असलहों और कारतूसों की सप्लाई तथा पैसों के लेन-देन में मदद करता था। उसने पुलिस को यह भी बताया कि सामने घाट की शिवाजी नगर कॉलोनी स्थित किराये के मकान में अवैध असलहे और कारतूस रखे जाते हैं। इसी सूचना पर पुलिस टीम ने 31 अक्टूबर को मकान पर छापा मारा।

मकान की तलाशी में खुला असलहा निर्माण का राज

पुलिस के मुताबिक, मकान की तलाशी के दौरान तीन .32 बोर की देसी पिस्टल, अलग-अलग बोर के 143 जिंदा कारतूस, 24 खोखे, 19 अर्द्धनिर्मित असलहे और बैरल तथा छह मैगजीन बरामद हुईं। इसके अलावा असलहे तैयार करने में इस्तेमाल होने वाली ग्राइंडर, पिलर ड्रिल, वेल्डिंग मशीन, पॉलिशर समेत कई मशीनें और बड़ी संख्या में औजार मिले। लोहे के 309 छोटे-बड़े टुकड़े, 104 नए व दो इस्तेमाल किए गए वेल्डिंग रॉड और अन्य सामग्री भी बरामद हुई है। मकान में मौजूद विमल कांत झा को पुलिस ने हिरासत में लेकर पूछताछ की। पुलिस का दावा है कि उसने बताया कि उसका बेटा अंजनी नंदन गलत संगत और नशे का आदी है। उसके दोस्तों का मकान पर आना-जाना था। वहां अवैध असलहे और कारतूस बनाने की सामग्री जुटाई जाती थी। विमल के मुताबिक, मोटी कमाई के लालच में वह भी इस गतिविधि में सहयोग करने लगा था। पुलिस ने अमन और विमल को आयुध अधिनियम के तहत गिरफ्तार कर लिया।

मुठभेड़ में पकड़ा गया था गिरोह का सरगना

इस प्रकरण में पुलिस पहले ही मुख्य आरोपी अंजनी नंदन झा को मुठभेड़ में गिरफ्तार कर चुकी है। उसके साथ राज विश्वकर्मा और बिहार के गोपालगंज निवासी राजू तिवारी भी पुलिस की गिरफ्त में आ चुके हैं। पुलिस ने अंजनी नंदन को गिरोह का सरगना बताया है। अब उसके पिता और करीबी सहयोगी की गिरफ्तारी के बाद पुलिस इस नेटवर्क के अन्य संपर्कों और हथियारों की सप्लाई से जुड़े लोगों की जानकारी जुटा रही है।

पुलिस टीम को एक लाख का इनाम

पुलिस उपायुक्त काशी जोन के निर्देशन में हुई इस कार्रवाई में लंका पुलिस और सर्विलांस सेल की टीम शामिल रही। पुलिस आयुक्त ने गिरफ्तारी और बरामदगी करने वाली टीम का उत्साहवर्धन करते हुए एक लाख रुपये नकद पुरस्कार देने की घोषणा की है। पुलिस अब बरामद हथियारों की जांच के साथ यह पता लगाने में जुटी है कि गिरोह ने अब तक कितने असलहे तैयार किए और किन-किन लोगों तक उनकी सप्लाई की।

असलहा फैक्ट्री से क्या-क्या मिला?

बरामदगी                                            संख्या

तैयार देसी पिस्टल (.32 बोर)             3

कुल जिंदा कारतूस                              143

खोखा कारतूस                                     24

अर्द्धनिर्मित असलहे/बैरल                  19

मैगजीन                                                  6

अर्द्धनिर्मित तमंचे की मुट्ठ                   15

अर्द्धनिर्मित मैगजीन                             5

लोहे के छोटे-बड़े टुकड़े                      309

ग्राइंडर व पॉलिशर मशीन                  1

पिलर ड्रिल मशीन                                1

वेल्डिंग मशीन                                       2

कार्रवाई की खास बातें

स्थान : शिवाजी नगर कॉलोनी, सामने घाट।

गिरफ्तारी : अमन मिश्रा और विमल कांत झा।

मुख्य आरोपी : अंजनी नंदन झा, पहले ही गिरफ्तार।

गिरोह के अन्य गिरफ्तार सदस्य : राज विश्वकर्मा और राजू तिवारी।

पुलिस टीम को पुरस्कार : एक लाख रुपये।

वंदे भारत-बुलेट ट्रेन से बदलेगा पूर्वांचल का आर्थिक भूगोल

वंदे भारत-बुलेट ट्रेन से बदलेगा पूर्वांचल का आर्थिक भूगोल 

काशी अब सिर्फ आस्था की राजधानी नहीं, बल्कि आधुनिक भारत की रफ्तार का नया पड़ाव बनने की ओर अग्रसर है। कभी दिल्ली पहुंचने में पूरा दिन खपाने वाले पूर्वांचल के लोगों के सामने अब सफर की नई इबारत लिखी जा रही है। वंदे भारत स्लीपर ने रात की यात्रा को आरामदायक बनाने का रास्ता खोला है तो प्रस्तावित बुलेट ट्रेन ने दिल्ली और काशी के बीच महज साढ़े तीन घंटे की दूरी का सपना दिखाया है। यह बदलाव केवल रेल की गति का नहीं, बल्कि काशी की बदलती आर्थिक हैसियत का संकेत है। 31 अक्टूबर को रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की घोषणाओं ने इस तस्वीर को और व्यापक बनाया। गंगा पर प्रस्तावित नमो ब्रिज, काशी स्टेशन का आधुनिक पुनर्विकास और नई मेमू सेवाएं बताती हैं कि विकास की योजना हाईस्पीड कॉरिडोर से लेकर आम यात्रियों की रोजमर्रा की जरूरतों तक फैली है। इसका सबसे बड़ा असर पर्यटन, व्यापार, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ सकता है। दिल्ली-काशी की दूरी घटेगी तो निवेश और कारोबार के अवसर भी बढ़ेंगे। अयोध्या, प्रयागराज और लखनऊ से बेहतर संपर्क पूर्वांचल को नए आर्थिक गलियारे से जोड़ सकता है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यह विकास का बड़ा राजनीतिक संदेश भी है। मगर असली परीक्षा घोषणाओं की नहीं, उनके क्रियान्वयन की होगी। काशी को अब रफ्तार के साथ रोजगार, स्थानीय कारोबार और नागरिक सुविधाओं का लाभ भी चाहिए। सवाल अब यह नहीं कि काशी कितनी तेज दौड़ेगी, सवाल यह है कि इस रफ्तार से आम काशिवासी की जिंदगी कितनी बदलेगी 

सुरेश गांधी 

काशी की पहचान सदियों से आस्था, अध्यात्म और संस्कृति की रही है। गंगा के घाटों से लेकर गलियों तक इसकी अपनी एक दुनिया है। लेकिन बदलते भारत में काशी की पहचान अब केवल मोक्ष और महादेव की नगरी तक सीमित नहीं रहना चाहती। वह आधुनिक परिवहन, तकनीक, पर्यटन, व्यापार और आर्थिक गतिविधियों के नए केंद्र के रूप में भी अपनी जगह तलाश रही है। 31 अक्टूबर को वंदे भारत स्लीपर के शुभारंभ के साथ रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जिस विकास की तस्वीर प्रस्तुत की, वह इसी बदलती काशी का संकेत है। यह तस्वीर एक ट्रेन से शुरू होकर बुलेट ट्रेन, नमो ब्रिज और अत्याधुनिक रेलवे स्टेशन तक पहुंचती है। दरअसल, इस आयोजन को केवल रेल सुविधा की एक और सौगात मानना उसके व्यापक अर्थ को छोटा करना होगा। इसके भीतर वर्तमान की जरूरत, भविष्य की तैयारी और विकास की राजनीति तीनों एक साथ दिखाई देती हैं। रात में काशी से चलकर सुबह दिल्ली पहुंचने वाली वंदे भारत स्लीपर जहां मध्यवर्गीय यात्रियों के समय और सुविधा का सवाल हल करने की कोशिश है, वहीं दिल्ली से वाराणसी तक प्रस्तावित बुलेट ट्रेन लगभग साढ़े तीन घंटे में दूरी समेटने का सपना दिखाती है। दोनों के बीच अंतर केवल गति का नहीं, बल्कि विकास की दो अलग-अलग समयसीमाओं का भी है।

सुविधा से आगे, समय की अर्थव्यवस्था का सवाल

रेल यात्रा का अर्थ केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचना नहीं होता। समय, श्रम, कारोबार और अवसरों का बेहतर इस्तेमाल भी इससे जुड़ा होता है। वाराणसी से दिल्ली के बीच वंदे भारत स्लीपर की शुरुआत इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण है। रात 8:50 बजे काशी से प्रस्थान और अगली सुबह दिल्ली पहुंचने की व्यवस्था यात्रियों को एक अतिरिक्त कार्यदिवस जैसा लाभ दे सकती है। व्यापारी, नौकरीपेशा लोग, विद्यार्थी, मरीज और तीर्थयात्री इसके संभावित लाभार्थी हैं। खासकर उन लोगों के लिए यह सुविधा उपयोगी होगी, जिन्हें बार-बार दिल्ली और पूर्वांचल के बीच यात्रा करनी पड़ती है। अब तक लंबी दूरी की रात की यात्रा में आराम और समय के बीच समझौता करना पड़ता था। स्लीपर वंदे भारत इस अनुभव को बदलने का प्रयास है। लेकिन इसका एक बड़ा आर्थिक पहलू भी है। काशी का कारोबार अब स्थानीय बाजारों तक सीमित नहीं है। बनारसी साड़ी, हस्तशिल्प, लकड़ी के खिलौने, कालीन, पर्यटन और धार्मिक सेवाओं का बाजार राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संपर्क पर निर्भर करता है। बेहतर रेल संपर्क इन क्षेत्रों के लिए संभावनाओं के नए दरवाजे खोल सकता है। यहां एक बात समझना जरूरी है कि तेज ट्रेन अपने आप आर्थिक समृद्धि नहीं लाती। उससे पैदा होने वाले अवसरों को स्थानीय कारोबार, उद्योग और रोजगार से जोड़ना पड़ता है। काशी को अब इसी दिशा में सोचना होगा।

बुलेट ट्रेन : काशी के भूगोल से बड़ा उसका आर्थिक विस्तार

इस आयोजन का सबसे दूरगामी संदेश बुलेट ट्रेन के नॉर्थ कॉरिडोर की घोषणा में छिपा है। रेल मंत्री ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से इस कॉरिडोर को मंजूरी मिलने की जानकारी देते हुए दिल्ली, आगरा, कानपुर, लखनऊ, अयोध्या, वाराणसी, प्रयागराज, पटना, सिलीगुड़ी और गुवाहाटी तक संपर्क का खाका प्रस्तुत किया। प्रस्तावित योजना के अनुसार दिल्ली से वाराणसी की यात्रा लगभग साढ़े तीन घंटे में पूरी करने का लक्ष्य है। यदि यह परियोजना जमीन पर उतरती है तो काशी का राष्ट्रीय राजधानी से संबंध एक नए स्तर पर पहुंचेगा। इसका प्रभाव केवल यात्रियों की सुविधा तक सीमित नहीं रहेगा। दिल्ली और काशी के बीच समय की दूरी घटने का मतलब है कि निवेश, कारोबार, शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यटन की गतिविधियों को भी नई गति मिल सकती है। लखनऊ, अयोध्या और प्रयागराज जैसे शहरों के बीच तेज संपर्क उत्तर प्रदेश के आर्थिक भूगोल को बदल सकता है। काशी के लिए इसका एक विशेष महत्व है। अयोध्या और काशी पहले ही धार्मिक पर्यटन के दो बड़े केंद्र बन चुके हैं। प्रयागराज का कुंभ और संगम क्षेत्र अपनी अलग पहचान रखता है। यदि इन शहरों के बीच हाईस्पीड संपर्क विकसित होता है तो उत्तर प्रदेश में धार्मिक पर्यटन का एक व्यापक आर्थिक गलियारा तैयार हो सकता है। लेकिन सपना और साकार परियोजना के बीच लंबा रास्ता होता है। विस्तृत परियोजना रिपोर्ट, वित्तीय व्यवस्था, भूमि अधिग्रहण, पर्यावरणीय स्वीकृतियां और निर्माण की समयसीमा जैसी प्रक्रियाएं इसकी सफलता तय करेंगी। इसलिए इसे तत्काल उपलब्ध सुविधा के बजाय भविष्य की महत्वाकांक्षी योजना के रूप में देखना अधिक उचित होगा।

नमो ब्रिज : गंगा के दोनों किनारों को जोड़ने से आगे की सोच

काशी का विस्तार गंगा के दोनों किनारों पर है। शहर की बढ़ती आबादी, पर्यटन और यातायात के दबाव ने नए संपर्क मार्गों की आवश्यकता बढ़ाई है। ऐसे में प्रस्तावित नमो ब्रिज केवल एक पुल नहीं, बल्कि भविष्य की परिवहन जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया जा रहा बहुउद्देश्यीय ढांचा है। इसकी परिकल्पना में ऊपर छह लेन का सड़क मार्ग और नीचे चार रेलवे ट्रैक हैं। यानी सड़क और रेल यातायात के लिए एक ही संरचना में दो अलग व्यवस्थाएं विकसित करने की कोशिश है। इसका वास्तविक लाभ तब सामने आएगा जब यह परियोजना पूरी होकर परिचालन में आएगी। इससे गंगा के दोनों किनारों के बीच संपर्क बेहतर होने के साथ रेल संचालन की क्षमता भी बढ़ सकती है। बिहार और पूर्वांचल की ओर रेल संपर्क के विस्तार में भी इसकी भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। इस परियोजना का एक दूसरा पहलू भी है। काशी में धार्मिक और पर्यटन गतिविधियां जितनी तेजी से बढ़ी हैं, उतनी ही तेजी से यातायात प्रबंधन की चुनौती भी बढ़ी है। नए पुल और सड़कें तभी उपयोगी होंगी, जब उन्हें शहर की आंतरिक यातायात व्यवस्था, पार्किंग और सार्वजनिक परिवहन से जोड़ा जाएगा।

बनारस स्टेशन : आधुनिकता का प्रवेश द्वार

रेलवे स्टेशन किसी शहर का पहला परिचय होता है। देश-विदेश से आने वाले यात्रियों के लिए स्टेशन ही उस शहर की आधुनिकता और व्यवस्थागत क्षमता का पहला अनुभव बनता है। बनारस रेलवे स्टेशन के पुनर्विकास की योजना इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण है। फुटबॉल मैदान जितना विशाल यात्री प्रतीक्षालय और छह आधुनिक प्लेटफार्म विकसित करने की योजना केवल यात्री सुविधाओं का विस्तार नहीं है। यह काशी को भविष्य के बढ़ते यात्री दबाव के लिए तैयार करने की कोशिश है। विश्वनाथ धाम के विकास के बाद श्रद्धालुओं और पर्यटकों की आवाजाही में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। ऐसे में रेलवे स्टेशन की क्षमता बढ़ाना आवश्यक है। स्टेशन को आधुनिक बनाने के साथ यात्रियों को मंदिर, घाटों, होटल और शहर के दूसरे प्रमुख स्थानों तक पहुंचाने की व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी है। काशी को यह समझना होगा कि विश्वस्तरीय स्टेशन की पहचान केवल उसकी इमारत से नहीं, बल्कि वहां उतरने वाले यात्री के पूरे अनुभव से बनेगी।

बुलेट ट्रेन की चमक के बीच मेमू का महत्व न भूलें

विकास की चर्चा अक्सर बड़ी परियोजनाओं के इर्द-गिर्द घूमने लगती है। बुलेट ट्रेन, हाईस्पीड कॉरिडोर और आधुनिक स्टेशन सुर्खियां बनते हैं, लेकिन किसी क्षेत्र की असली परिवहन जरूरत रोजाना यात्रा करने वाले सामान्य नागरिकों से जुड़ी होती है। वाराणसी सिटी से राजातालाब और बनारस से प्रयागराज रामबाग के बीच नई मेमू सेवाओं का महत्व इसी कारण अलग है। विद्यार्थी, छोटे व्यापारी, कर्मचारी और ग्रामीण क्षेत्रों से शहर आने वाले लोग प्रतिदिन रेल पर निर्भर हैं। उनके लिए सस्ती, नियमित और समयबद्ध सेवा किसी बुलेट ट्रेन से कम महत्वपूर्ण नहीं है। काशी के आसपास तेजी से विकसित हो रहे अर्धशहरी क्षेत्रों को देखते हुए स्थानीय रेल सेवाओं का विस्तार एक बड़ी जरूरत है। यदि मेमू सेवाएं समय पर चलें, पर्याप्त फेरे हों और स्टेशनों पर बुनियादी सुविधाएं मिलें तो इससे हजारों लोगों के समय और पैसे दोनों की बचत होगी। विकास की सही परिभाषा यही है कि एक तरफ संपन्न यात्री को आधुनिकतम सुविधा मिले और दूसरी तरफ सामान्य नागरिक की जेब पर बोझ डाले बिना उसकी यात्रा भी आसान बने।

2027 का चुनाव और विकास की सियासत

इस पूरे घटनाक्रम को उत्तर प्रदेश की राजनीति से अलग करके भी नहीं देखा जा सकता। वर्ष 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे समय में काशी में केंद्र और प्रदेश सरकार के प्रतिनिधियों की मौजूदगी और रेलवे की बड़ी घोषणाएं विकास के राजनीतिक संदेश को भी मजबूत करती हैं। भाजपा के लिए यह बताने का अवसर है कि पूर्वांचल अब केवल पिछड़ेपन और पलायन की चर्चा तक सीमित नहीं है। यहां धार्मिक पर्यटन के साथ आधुनिक परिवहन, बुनियादी ढांचे और औद्योगिक विकास की नई संभावनाएं तैयार की जा रही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र होने के कारण काशी इन बदलावों का प्रतीक भी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में प्रदेश सरकार की विकास संबंधी प्राथमिकताओं को केंद्र की परियोजनाओं से जोड़ने का प्रयास भी इस आयोजन में दिखाई देता है। लेकिन लोकतंत्र में विकास का मूल्यांकन केवल घोषणाओं के आधार पर नहीं होता। मतदाता यह भी देखता है कि उसके जीवन में वास्तविक बदलाव कितना आया। क्या स्थानीय युवाओं को रोजगार मिला? क्या व्यापार बढ़ा? क्या छोटे शहरों और गांवों की कनेक्टिविटी सुधरी? क्या रेलवे स्टेशन तक पहुंचना आसान हुआ? क्या ट्रेनों की समयपालन व्यवस्था बेहतर हुई? इन सवालों के जवाब ही विकास की राजनीति की विश्वसनीयता तय करेंगे।

सबसे बड़ी चुनौती : रफ्तार के साथ रोजगार

काशी में रेलवे और सड़क की बड़ी परियोजनाओं का विस्तार हो रहा है। लेकिन इस विकास का लाभ स्थानीय अर्थव्यवस्था को कितना मिलेगा, यह सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है। बनारसी साड़ी उद्योग, हस्तशिल्प, पर्यटन, होटल कारोबार, परिवहन और छोटे व्यापारियों को इस विस्तार से जोड़ने की जरूरत है। यदि काशी में आने वाले यात्रियों की संख्या बढ़ती है तो उनके खर्च का बड़ा हिस्सा स्थानीय बाजार तक पहुंचना चाहिए। इसके लिए रेलवे, पर्यटन विभाग, नगर निगम और स्थानीय उद्योग संगठनों के बीच समन्वय आवश्यक है। स्टेशन से घाटों तक बेहतर सार्वजनिक परिवहन, व्यवस्थित पार्किंग, स्वच्छता, पर्यटक सहायता केंद्र और स्थानीय उत्पादों के विपणन की व्यवस्था की जानी चाहिए। इसी तरह निर्माणाधीन परियोजनाओं में स्थानीय श्रमिकों, तकनीकी युवाओं और छोटे उद्यमियों की भागीदारी बढ़ाने पर ध्यान देना होगा। तभी आधुनिक परिवहन का लाभ केवल यात्रा तक सीमित न रहकर रोजगार और आय में भी दिखाई देगा।

काशी की असली परीक्षा अब शुरू होती है

वंदे भारत स्लीपर ने काशी के वर्तमान को एक नई सुविधा दी है। बुलेट ट्रेन ने भविष्य की संभावनाओं का विस्तार किया है। नमो ब्रिज और काशी स्टेशन का पुनर्विकास शहर की आधारभूत संरचना को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। नई मेमू सेवाएं इस विकास को आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी से जोड़ती हैं। लेकिन इन सबके बीच एक बुनियादी सवाल कायम है। क्या काशी इस बढ़ती रफ्तार के साथ अपनी नागरिक सुविधाओं को भी उतनी ही तेजी से विकसित कर पाएगी? क्योंकि तेज ट्रेन से दिल्ली पहुंचना उपलब्धि है, लेकिन उस ट्रेन तक समय पर पहुंचना भी उतना ही जरूरी है। आधुनिक स्टेशन बनाना उपलब्धि है, लेकिन स्टेशन से शहर तक सुगम यातायात भी जरूरी है। बुलेट ट्रेन का सपना बड़ा है, लेकिन स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा करना उससे भी बड़ा लक्ष्य होना चाहिए। काशी ने सदियों से समय को अपनी गति से चलते देखा है। अब वह स्वयं समय की गति के साथ कदम मिलाने की तैयारी कर रही है। चुनौती यह है कि इस नई रफ्तार में शहर की आत्मा, सामान्य नागरिक की जरूरत और स्थानीय अर्थव्यवस्था पीछे न छूट जाए। क्योंकि विकास की मंजिल सिर्फ यह नहीं कि काशी से दिल्ली की दूरी साढ़े तीन घंटे में सिमट जाए। असली उपलब्धि तब होगी, जब काशी के आम आदमी की जिंदगी की मुश्किलें भी उतनी ही तेजी से सिमटने लगें।

सिपाही को गोली मारने वाले गिरोह का असलहा नेटवर्क बेनकाब, फैक्ट्री में मिला हथियारों का जखीरा

सिपाही को गोली मारने वाले गिरोह का असलहा नेटवर्क बेनकाब , फैक्ट्री में मिला हथियारों का जखीरा  सामने घाट के किराये के म...