महिलाओं का अधिकार है आरक्षण, विपक्ष का विरोध ‘राजनीतिक स्वार्थ’: सुरेश खन्ना
33% आरक्षण लागू होने
से
लोकसभा
में
272 तक
पहुंच
सकती
है
महिलाओं
की
संख्या
जनगणना-परिसीमन
के
बाद
ही
लागू
होगा
कानून,
संविधान
के
तहत
अनिवार्य
प्रक्रिया
विपक्ष पर
धर्म
आधारित
आरक्षण
का
मुद्दा
उठाकर
भ्रम
फैलाने
का
आरोप
यूपी में
कन्या
सुमंगला,
मिशन
शक्ति
और
स्वयं
सहायता
समूहों
से
बड़ा
बदलाव
सुरेश गांधी
वाराणसी। नारी शक्ति वंदन
विधेयक को लेकर राजनीतिक
बयानबाजी के बीच प्रदेश
के वित्त एवं संसदीय कार्य
मंत्री सुरेश खन्ना ने साफ कहा
कि महिलाओं को आरक्षण देना
कोई “उपकार” नहीं बल्कि उनका
संवैधानिक और स्वाभाविक अधिकार
है। उन्होंने कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, टीएमसी और डीएमके जैसे
विपक्षी दलों पर महिला
विरोधी मानसिकता अपनाने और राजनीतिक स्वार्थ
के लिए मुद्दे को
भटकाने का आरोप लगाया।
सर्किट हाउस सभागार से
आयोजित वीडियो कॉन्फ्रेंस में खन्ना ने
कहा कि देश की
आधी आबादी को निर्णय प्रक्रिया
में समान भागीदारी देना
लोकतंत्र को सशक्त बनाने
की दिशा में ऐतिहासिक
कदम है। उन्होंने चेताया
कि जो दल इस
विधेयक का विरोध कर
रहे हैं, उन्हें आने
वाले चुनावों में महिलाओं के
आक्रोश का सामना करना
पड़ेगा।
परिसीमन से किसी राज्य को नुकसान नहीं
केंद्रीय गृह मंत्री अमित
शाह के बयान का
हवाला देते हुए खन्ना
ने स्पष्ट किया कि परिसीमन
(डेलिमिटेशन) की प्रक्रिया से
किसी भी राज्य को
नुकसान नहीं होगा। यह
पूरी प्रक्रिया संतुलित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए
है। उन्होंने बताया कि भविष्य में
लोकसभा सीटों में वृद्धि की
संभावना है, जिससे महिलाओं
को मिलने वाला 33% आरक्षण और प्रभावी हो
सकेगा। उन्होंने यह भी कहा
कि जनसंख्या नियंत्रण में योगदान देने
वाले राज्यों के हितों की
रक्षा की जाएगी।
जनगणना और संविधान का प्रावधान
खन्ना ने विस्तार से
बताया कि संविधान के
प्रावधानों के अनुसार सीटों
का निर्धारण जनगणना के आधार पर
होता है। परिसीमन आयोग
को सीटों के पुनर्गठन का
अधिकार दिया गया है
और यह प्रक्रिया हर
जनगणना के बाद लागू
होती है। उन्होंने विपक्ष
के आरोपों को खारिज करते
हुए कहा कि यह
देरी नहीं बल्कि संवैधानिक
प्रक्रिया का पालन है।
2011 की जनगणना के आंकड़े उपलब्ध
हैं, लेकिन नए परिसीमन के
लिए अद्यतन प्रक्रिया जरूरी है।
धर्म आधारित आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं
उन्होंने समाजवादी पार्टी और अन्य दलों
पर हमला बोलते हुए
कहा कि ये दल
धर्म आधारित आरक्षण की बात उठाकर
लोगों को गुमराह कर
रहे हैं। संविधान में
इस प्रकार के आरक्षण का
कोई प्रावधान नहीं है। खन्ना
ने कहा, “जो दल संविधान
की दुहाई देते हैं, वही
उसके मूल सिद्धांतों के
खिलाफ खड़े नजर आते
हैं।
संसद में पहले क्यों नहीं पास हुआ बिल?
उन्होंने यह भी सवाल
उठाया कि जब 2010 में
कांग्रेस की सरकार थी,
तब यह विधेयक प्रभावी
रूप से लोकसभा में
पारित क्यों नहीं कराया गया।
उन्होंने कहा कि उस
समय दिखावे की राजनीति हुई,
जबकि मौजूदा सरकार ने इसे पारित
कर ऐतिहासिक कदम उठाया है।
महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी का गणित
खन्ना ने बताया कि
वर्तमान में लोकसभा में
महिलाओं की संख्या लगभग
74 है, लेकिन यदि यह विधेयक
पहले लागू होता, तो
यह संख्या 272 तक पहुंच सकती
थी। उन्होंने कहा कि इससे
नीतिगत निर्णयों में महिलाओं की
भागीदारी कई गुना बढ़ेगी।
ऐतिहासिक संदर्भ और महिला अधिकार
उन्होंने शाहबानो प्रकरण का जिक्र करते
हुए कहा कि अतीत
में भी महिलाओं के
अधिकारों के मुद्दे पर
राजनीतिक हस्तक्षेप हुआ है। उन्होंने
आरोप लगाया कि कांग्रेस ने
वोट बैंक की राजनीति
के चलते महिलाओं के
अधिकारों को कमजोर किया।
केंद्र सरकार की पहल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व
में चलाई गई योजनाओं
का उल्लेख करते हुए उन्होंने
कहा— “बेटी बचाओ, बेटी
पढ़ाओ” से समाज में
सकारात्मक सोच आई. महिलाओं को
बैंकिंग, गैस कनेक्शन, आवास
जैसी योजनाओं से जोड़ा गया.
महिला सशक्तिकरण
को सरकार की प्राथमिकता बनाया
गया
यूपी सरकार के प्रयास
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की
सरकार की योजनाओं का
जिक्र करते हुए खन्ना
ने कहा— मुख्यमंत्री कन्या
सुमंगला योजना के तहत जन्म
से शिक्षा तक आर्थिक सहायता.
अब तक 27 लाख से अधिक
लाभार्थी. स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से
लाखों महिलाओं को रोजगार. लखपति
महिला योजना” से आर्थिक आत्मनिर्भरता.
2682 से अधिक उचित मूल्य
की दुकानों का संचालन महिलाओं
के हाथों में.
महिला सुरक्षा और सामाजिक बदलाव
उन्होंने कहा कि “मिशन
शक्ति” अभियान के जरिए महिलाओं
की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित
किया गया है। महिला
अपराधों पर सख्त कार्रवाई
की जा रही है।
मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना के तहत 2017 से
अब तक 5.5 लाख से अधिक
विवाह संपन्न कराए गए हैं,
जिससे आर्थिक रूप से कमजोर
परिवारों को राहत मिली
है।
राजनीतिक संदेश और चेतावनी
खन्ना ने कहा कि
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले
ही स्पष्ट कर दिया है
कि देश की महिलाएं
“मतदाता” भर नहीं, बल्कि
“निर्णायक शक्ति” हैं, जो चुनावी
परिणामों को सीधे प्रभावित
कर सकती हैं। उन्होंने
कहा कि महिला सशक्तिकरण
का विरोध करना सामाजिक और
लोकतांत्रिक प्रगति को रोकने जैसा
है और इसके लिए
जिम्मेदार दलों को हर
चुनाव में जवाब देना
पड़ेगा। नारी शक्ति वंदन
विधेयक अब केवल एक
कानून नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति की दिशा बदलने
वाला निर्णायक मोड़ बनता दिख
रहा है। सत्ता पक्ष
इसे महिला सशक्तिकरण की ऐतिहासिक पहल
बता रहा है, जबकि
विपक्ष की आपत्तियों ने
इस बहस को और
तीखा बना दिया है।
अब नजरें इस पर टिकी
हैं कि जब यह
कानून पूरी तरह लागू
होगा, तो भारतीय लोकतंत्र
में महिलाओं की भागीदारी किस
स्तर तक नई तस्वीर
पेश करेगी—और उससे भी
बड़ा सवाल, क्या राजनीतिक दल
इस बदलाव को स्वीकार करने
के लिए तैयार हैं?


