Tuesday, 6 October 2026

डिजाइन में नवाचार की चमक, ग्लोबल ओवरसीज को ‘नवसृष्टि-2026’ सम्मान

डिजाइन में नवाचार की चमक, ग्लोबल ओवरसीज को ‘नवसृष्टि-2026’ सम्मान

50वें इंडिया कारपेट एक्सपो में Innovative Design Pattern श्रेणी में मिला अवॉर्ड, हस्तनिर्मित Knotted Carpet को मिली पहचान

सुरेश गांधी

भदोही। भारतीय कालीन की पारंपरिक बुनाई में आधुनिक डिजाइन और नवाचार का रंग भरने के लिए ग्लोबल ओवरसीज को ‘नवसृष्टि-2026 एक्सीलेंस अवॉर्ड’ से सम्मानित किया गया। 50वें इंडिया कारपेट एक्सपो (ICE) 2026 के दौरान इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ कारपेट टेक्नोलॉजी (IICT), भदोही की ओर से आयोजित डिजाइन अवॉर्ड समारोह में कंपनी को ‘Innovative Design Pattern’ श्रेणी में यह सम्मान मिला।

ग्लोबल ओवरसीज को यह पुरस्कार उसके Knotted Carpet उत्पाद के लिए प्रदान किया गया। पुरस्कार प्रमाणपत्र पर कारपेट एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (CEPC) के चेयरमैन मुकेश कुमार गोम्बर और IICT के निदेशक प्रो. डॉ. आर. के. वार्ष्णेय के हस्ताक्षर हैं। कंपनी की ओर से बृजेश गुप्ता, संतोष गुप्ता और शाश्वत गुप्ता ने सम्मान ग्रहण किया। कंपनी के पार्टनर संजय गुप्ता तथा वरिष्ठ सदस्य एवं परिवार के मार्गदर्शक प्रहलाद दास गुप्ता भी इस उपलब्धि से जुड़े रहे। अपरिहार्य कारणों से वे समारोह में उपस्थित नहीं हो सके।

ग्लोबल ओवरसीज पारंपरिक भारतीय कालीन शिल्प को समकालीन डिजाइन, तकनीकी नवाचार और वैश्विक बाजार की बदलती पसंद के साथ जोड़कर नए उत्पाद विकसित कर रहा है। ऐसे में ‘नवसृष्टि-2026’ सम्मान केवल एक पुरस्कार नहीं, बल्कि हस्तनिर्मित कालीन की बदलती डिजाइन-दुनिया में भदोही की रचनात्मक क्षमता की पहचान भी माना जा रहा है।

दुनिया की पसंद बना भदोही, 212 खरीदारों ने परखी कालीनों की कारीगरी

दुनिया की पसंद बना भदोही, 212 खरीदारों ने परखी कालीनों की कारीगरी 

गोल्डन जुबली एक्सपो में तीसरे दिन तक 231 बाइंग रिप्रेजेंटेटिव्स की दस्तक, अमेरिका से यूरोप तक भारतीय हस्तनिर्मित कालीनों की बढ़ी पूछ

सुरेश गांधी

भदोही। कालीन सिर्फ धागों, रंगों और गांठों से नहीं बनता। उसके पीछे पीढ़ियों का हुनर, महीनों की मेहनत और बदलते बाजार को समझने वाली नजर होती है। भदोही में चल रहा गोल्डन जुबली 50वां इंडिया कार्पेट एक्सपो इसी बदलती कहानी का साक्षी बन रहा है। तीसरे दिन तक दुनिया के अलग-अलग देशों से आए 212 से अधिक विदेशी खरीदारों और 231 बाइंग रिप्रेजेंटेटिव्स ने भारतीय कालीनों के नए संग्रहों को परखा। किसी ने डिजाइन में भविष्य की झलक देखी तो किसी ने रंगों में अपने बाजार की पसंद तलाश की।

स्टॉलों पर चलती बातचीत और कारोबारी पूछताछ ने यह संकेत दिया कि भदोही के करघों की आवाज अब सिर्फ देश तक सीमित नहीं रही। अमेरिका, ब्रिटेन, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और यूरोप के विभिन्न देशों से आए खरीदारों की दिलचस्पी ने एक्सपो में कारोबार की उम्मीदों को नई रोशनी दी है। अंतरराष्ट्रीय बाजार की मांग के अनुरूप तैयार किए गए नए डिजाइन, आकार, रंग, गुणवत्ता और समकालीन पैटर्न खरीदारों को आकर्षित कर रहे हैं। परंपरा के साथ आधुनिकता का यह मेल भारतीय हस्तनिर्मित कालीन उद्योग के लिए नई पहचान गढ़ता दिखाई दे रहा है।

कालीन से आगे बढ़कर बाजार की तैयारी

इस बार एक्सपो की खासियत सिर्फ कालीनों की चमक नहीं, बल्कि उद्योग के भीतर हो रहा बदलाव भी है। डिजाइन अब केवल सुंदर दिखने के लिए नहीं, बल्कि दुनिया के अलग-अलग बाजारों की पसंद और जरूरत को ध्यान में रखकर तैयार हो रहे हैं। टिकाऊ उत्पाद, नए पैटर्न, समकालीन रंग संयोजन और गुणवत्ता पर जोर इस बदलाव के प्रमुख संकेत हैं। इसी बदलती जरूरत को संस्थागत ताकत देने के लिए कारपेट एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (CEPC) और Walmart Vriddhi के बीच समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किया गया। ज्ञान-साझाकरण सत्र में Walmart Vriddhi के एसोसिएट डायरेक्टर आदित्य वर्मा ने उद्यमियों और एमएसएमई के लिए उपलब्ध अवसरों और कार्यक्रमों की जानकारी दी। समझौते का उद्देश्य क्षमता निर्माण, कारोबार के विकास, ज्ञानवर्धन और बाजार तक पहुंच के अवसर बढ़ाना है। यानी भदोही के करघे अब केवल कालीन नहीं बुन रहे, बल्कि वैश्विक बाजार के लिए अपने कारोबार की नई भाषा भी सीख रहे हैं।

पुराने हाथों का सम्मान, नई पीढ़ी की ओर नजर

गोल्डन जुबली का एक भावुक पड़ाव उन लोगों का सम्मान रहा, जिन्होंने वर्षों तक CEPC और भारतीय हस्तनिर्मित कालीन उद्योग को मजबूत करने में भूमिका निभाई। पूर्व अध्यक्षों, उपाध्यक्षों और प्रशासन समिति के पूर्व सदस्यों को सम्मानित किया गया। सम्मानित सदस्यों ने अपने अनुभव साझा करते हुए इंडिया कार्पेट एक्सपो के सफर को याद किया। यह सम्मान दरअसल उस पीढ़ी को सलाम था, जिसने इस मंच की नींव मजबूत की और आज जिसकी बदौलत दुनिया के खरीदार भदोही तक पहुंच रहे हैं।

‘नवसृष्टि’ में हुनर का नया चेहरा

एक्सपो में परंपरा के साथ नवाचार को भी सम्मान मिला। हस्तशिल्प बोर्ड और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ कार्पेट टेक्नोलॉजी (IICT) के सहयोग से आयोजित ‘नवसृष्टि 2026’ में डिजाइन, नवाचार और स्थिरता के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्यों को सम्मानित किया गया। Joho Floor Coverings को Innovative Design, Kabir Exports को Sustainability और OAC Rugs Carpets को ‘Best Carpet of the Year’ पुरस्कार मिला। IICT को भी क्षेत्र में योगदान के लिए सम्मानित किया गया। यह पुरस्कार इस बात का संकेत है कि कालीन उद्योग अपनी विरासत को बचाते हुए भविष्य के बाजार के लिए खुद को बदल रहा है।

युवा और महिलाओं के लिए नई राह

CEPC अध्यक्ष कैप्टन मुकेश कुमार गोम्बर ने कहा कि परिषद नवाचार, उत्पाद विकास, डिजाइन उत्कृष्टता और स्थिरता को बढ़ावा देने के साथ युवा एवं महिला उद्यमियों को सशक्त बनाने पर विशेष जोर दे रही है। वैश्विक बाजार में भारत की स्थिति मजबूत करने के लिए बदलते रुझानों को अपनाना और गुणवत्ता सुधारना जरूरी है। CEPC उपाध्यक्ष असलम महबूब ने तीसरे दिन तक मिले अंतरराष्ट्रीय प्रतिसाद पर संतोष जताते हुए उम्मीद जताई कि अंतिम दिन भी खरीदारों की भागीदारी से कारोबार के नए अवसर बनेंगे। गोल्डन जुबली का यह एक्सपो इसलिए भी खास है कि यहां कालीनों की प्रदर्शनी भर नहीं लग रही। यहां भदोही अपने अतीत की विरासत को भविष्य के बाजार से जोड़ने की कोशिश कर रहा है। धागे वही हैं, हाथ वही हैं, मगर सपने अब पहले से कहीं बड़े हैं।

शहर बदलते रहे, मगर रिश्ते वहीं रहे—इंदौर में मिला अपनेपन का तीर्थ

शहर बदलते रहे, मगर रिश्ते वहीं रहे—इंदौर में मिला अपनेपन का तीर्थ 

सीमा जी से बरसों बाद मुलाकात ने सफर को दिया भावनाओं का नया पड़ाव, पिता की स्मृतियों से नम हुई आंखें और बेटी की तरह मिली विदाई ने दूरी के पार रिश्तों की गर्माहट का अहसास कराया

सुरेश गांधी

इंदौर. सतना, मैहर, उज्जैन, महाकाल और ओंकारेश्वर की यात्रा के बाद जब इंदौर पहुंचा तो लगा कि यात्रा का एक और महत्वपूर्ण पड़ाव सामने है। अब तक रास्ते में मंदिर मिले थे, आस्था मिली थी, इतिहास मिला था, संस्कृति मिली थी और मालवा की मिट्टी को करीब से देखने-समझने का अवसर मिला था। लेकिन इंदौर में जो मिला, वह इन सबसे अलग था—एक ऐसा रिश्ता, जिसे समय ने परिचय से परिवार में बदल दिया।

सीमा शर्मा जी से मिलना मेरे लिए महज किसी परिचित से मुलाकात नहीं थी। यह उन दिनों और उन रिश्तों की ओर लौटना था, जब पत्रकारिता में लिखे शब्दों को पहचान मिलती थी, जब किसी संपादक का एक छोटा-सा प्रोत्साहन भी लेखक के भीतर कई नए शब्दों को जन्म देता था। सीमा जी नई दुनिया की फीचर संपादक रही हैं। पत्रकारिता के उसी दौर में मेरे कई लेख उन्होंने प्रकाशित किए। मेरी लेखनी को जगह देना केवल संपादकीय निर्णय नहीं था, उसमें भरोसा और आत्मीयता भी थी। समय आगे बढ़ता गया, पद और जिम्मेदारियां बदलती गईं, लेकिन वह आत्मीय रिश्ता कहीं पीछे नहीं छूटा। आज सीमा जी नई दुनिया के स्कूल में शिक्षिका के रूप में बच्चों के भविष्य को गढ़ने का काम कर रही हैं, मगर पत्रकारिता से जुड़ी उनकी स्मृतियां और पुराने रिश्ते आज भी उतने ही जीवंत हैं।

मुलाकात हुई तो औपचारिकता का एक शब्द भी नहीं था

इंदौर में जब उनके घर पहुंचा तो ऐसा नहीं लगा कि किसी पुराने परिचित के यहां आया हूं। लगा जैसे अपने ही परिवार के किसी सदस्य के घर पहुंच गया हूं। चेहरे पर वही अपनापन, बातचीत में वही गर्माहट और स्वागत में वही आत्मीयता। उन्होंने जिस स्नेह से डिनर कराया, वह सिर्फ भोजन नहीं था। वह वर्षों से संजोए रिश्ते का स्वाद था। बातचीत के बीच बीते दिनों की यादें आती रहीं और लगता रहा कि समय चाहे कितना भी आगे निकल जाए, कुछ रिश्तों की घड़ी वहीं ठहरी रहती है जहां से उन्होंने आकार लिया था। लेकिन सबसे भावुक कर देने वाला क्षण तब आया, जब उनके घर में कदम रखते ही उनके पिता जी की कमी बहुत खली। घर वही था, अपनापन वही था, चेहरे वही थे, मगर एक बेहद अपना चेहरा वहां नहीं था। कभी-कभी किसी व्यक्ति की अनुपस्थिति उसकी मौजूदगी से कहीं ज्यादा महसूस होती है। घर की दीवारें, कुर्सियां, आंगन और बातचीत के बीच अचानक मन उस शख्स को तलाशने लगता है, जो अब इस दुनिया में नहीं है।

सबसे छीन लिया समय ने, मगर यादों से कौन छीन सकता है...

कोरोना काल ने हम सभी से बहुत कुछ छीना। सीमा जी के पिता जी भी हमसे चले गए। उस कठिन दौर की स्मृतियां आज भी मन में ताजा हैं। इंदौर में उनके घर पहुंचा तो लगा जैसे उनकी आवाज कहीं आसपास ही है। बस नजर उठाकर देखने भर की देर है। लेकिन वे नहीं थे। उनकी कमी ने इस मुलाकात को भीतर तक भावुक कर दिया। वे हमारे लिए केवल सीमा जी के पिता नहीं थे। उनका स्नेह इतना सहज था कि उन्होंने मुझे और मेरे परिवार को हमेशा अपने बच्चों की तरह माना। रिश्तों में औपचारिकता नहीं थी। कोई हिसाब नहीं था। कोई अपेक्षा नहीं थी। बस अपनापन था। शायद इसीलिए उनके न रहने का खालीपन भी उतना ही बड़ा है। कुछ लोग दुनिया से चले जाते हैं, लेकिन घर से नहीं जाते। वे तस्वीरों में, स्मृतियों में, बातचीत के बीच अचानक ठहर जाने वाली खामोशी में और आंखों के कोरों में हमेशा बने रहते हैं।

वाराणसी से इंदौर तक रिश्ते की डोर

सीमा जी और उनके परिवार का वाराणसी से भी गहरा रिश्ता रहा है। वह अपने माता-पिता और पति के साथ वाराणसी आ चुकी हैं। मेरे घर आईं। बाबा विश्वनाथ के दरबार में पहुंचीं, कालभैरव के दर्शन किए। परिवार के साथ बिताए वे पल आज भी स्मृतियों में वैसे ही सुरक्षित हैं। तब शायद किसी ने नहीं सोचा था कि पत्रकारिता से शुरू हुआ यह परिचय धीरे-धीरे इतना गहरा हो जाएगा कि दोनों परिवारों के बीच रिश्तों की एक ऐसी डोर बंध जाएगी, जिसे दूरी भी कमजोर नहीं कर पाएगी। वाराणसी में उनका आना और मेरे घर आना मेरे लिए हमेशा परिवार के किसी सदस्य के आने जैसा रहा। उनके माता-पिता का स्नेह भी ऐसा ही था। उन्होंने हम सभी को बच्चों की तरह माना। यही कारण है कि इंदौर में उनके घर जाना अपनेपन की उसी परंपरा को आगे बढ़ाने जैसा लगा।

बेटी की तरह विदा किया तो आंखें नम हो गईं

मुलाकात का सबसे भावुक क्षण विदाई का था। सीमा जी ने मेरी पत्नी को जिस आत्मीयता से बेटी की तरह विदा किया, वह दृश्य मन में ठहर गया। रिश्तों की असली पहचान शायद ऐसे ही क्षणों में होती है। जब विदाई के समय शब्द कम पड़ जाएं और आंखें वह सब कह दें, जिसे होंठ कह नहीं पाते। मेरी पत्नी को बेटी की तरह विदा करते हुए सीमा जी का स्नेह देखकर लगा कि वर्षों में बना यह रिश्ता अब किसी परिचय या दोस्ती का मोहताज नहीं है। यह परिवार का रिश्ता है—बिना किसी औपचारिक घोषणा के, बिना किसी नाम के।

डिनर के बाद भी खत्म नहीं हुआ अपनापन

विदाई के समय लगा कि अब मुलाकात खत्म हो गई। लेकिन सीमा जी का अपनापन यहीं नहीं रुका। उन्होंने ट्रेन के सफर के लिए भी स्वादिष्ट खाना साथ में रख दिया। ट्रेन में जब वह खाना खोला तो उसमें केवल भोजन नहीं था। उसमें इंदौर की आत्मीयता थी, एक बहन का स्नेह था, परिवार का अपनापन था और उस रिश्ते की मिठास थी, जो वर्षों की दूरी के बाद भी वैसा ही बना हुआ है। सफर में खाना तो खत्म हो गया, लेकिन उस स्नेह का स्वाद आज भी बाकी है।

यात्रा बहुत कुछ दिखाती है, लेकिन कुछ यात्राएं रिश्ते लौटा देती हैं

सतना से मैहर, फिर उज्जैन के महाकाल, हरसिद्धि और शिप्रा तट, ओंकारेश्वर की नर्मदा और फिर इंदौर की गलियों तक इस यात्रा ने बहुत कुछ दिखाया। मंदिरों की भव्यता देखी, आस्था का विराट रूप देखा, इतिहास के पन्नों को महसूस किया और मालवा की संस्कृति को करीब से जाना। लेकिन इंदौर में सीमा जी के घर की वह शाम इस यात्रा की सबसे निजी और सबसे भावुक स्मृति बन गई। क्योंकि मंदिरों में भगवान मिलते हैं और यात्राओं में कभी-कभी ऐसे रिश्ते मिल जाते हैं, जिनमें भगवान जैसा ही अपनापन होता है।

लौटते समय मन में एक ही बात थी—

रास्ते बदलते रहते हैं, शहर बदलते रहते हैं, लोग अपनी-अपनी जिम्मेदारियों में दूर होते जाते हैं, लेकिन सच्चे रिश्ते दूरी से नहीं टूटते। वे समय के साथ और गहरे होते जाते हैं। इंदौर से ट्रेन चली तो पीछे शहर छूट रहा था। मगर मन में सीमा जी का स्नेह, उनके माता-पिता की स्मृतियां, पत्नी को बेटी की तरह मिली विदाई और ट्रेन के लिए प्यार से दिया गया वह भोजन साथ चल रहा था। और शायद यही किसी यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है— शहर पीछे छूट जाएं, रास्ते खत्म हो जाएं, तस्वीरें पुरानी पड़ जाएं, लेकिन कुछ मुलाकातें ऐसी हों जो उम्र भर दिल में रोशनी करती रहें। इंदौर की इस यात्रा में सीमा जी से मुलाकात ऐसी ही एक रोशनी है।

डिजाइन में नवाचार की चमक, ग्लोबल ओवरसीज को ‘नवसृष्टि-2026’ सम्मान

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