Friday, 7 August 2026

‘एक देश-एक पत्रकार पहचान’ का मुद्दा भी मुख्यमंत्री तक पहुँचा

एक देश-एक पत्रकार पहचानका मुद्दा भी मुख्यमंत्री तक पहुँचा 

स्वास्थ्य सुरक्षा संबंधी मांगों पर सकारात्मक कार्रवाई का आश्वासन

लखनऊ। काशी के पत्रकारों की स्वास्थ्य सुरक्षा, आयुष्मान कार्ड, पेंशन, आवासीय सुविधा तथा पत्रकार सुरक्षा तंत्र जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों को लेकर बुधवार को पत्रकार सुरेश गांधी ने प्रदेश के स्टाम्प एवं न्यायालय शुल्क मंत्री रविंद्र जायसवाल के साथ मुख्यमंत्री से मुलाकात कर विस्तृत मांग पत्र सौंपा। इस अवसर पर पूर्व एमएलसी केदारनाथ सिंह तथा पूर्व विधायक सुरेंद्र प्रताप सिंह भी मौजूद रहे। 

मुख्यमंत्री को सौंपे गए ज्ञापन में वाराणसी के पत्रकारों को आयुष्मान भारत योजना का लाभ दिलाने, विशेष पत्रकार स्वास्थ्य सुरक्षा कार्ड योजना लागू करने, वरिष्ठ पत्रकारों के लिए सम्मानजनक पेंशन योजना प्रारंभ करने तथा पत्रकारों की सुरक्षा के लिए प्रभावी तंत्र विकसित करने की मांग प्रमुखता से उठाई गई। इसके अतिरिक्त पत्रकार आवास योजना को प्राथमिकता से लागू करने और पत्रकारिता की ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण का मुद्दा भी रखा गया।

मुलाकात के दौरान सुरेश गांधी ने देशभर के पत्रकारों के लिए समान पहचान व्यवस्था से जुड़ेएक देश-एक पत्रकार पहचानविषय पर भी विस्तार से चर्चा की। सूत्रों के अनुसार मुख्यमंत्री ने इस प्रस्ताव को राष्ट्रीय स्तर का विषय बताते हुए कहा कि इस पर केंद्र स्तर पर विचार किया जाना अपेक्षित है। 

बातचीत के दौरान स्वास्थ्य सुरक्षा और पत्रकार कल्याण से जुड़े मुद्दों को प्राथमिकता से आगे बढ़ाने पर सहमति बनी।

स्टाम्प मंत्री रविंद्र जायसवाल ने पत्रकारों की समस्याओं को गंभीर बताते हुए कहा कि पत्रकार समाज लोकतंत्र की महत्वपूर्ण शक्ति है और उसकी सुरक्षा सम्मान सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

मुख्यमंत्री ने पत्रकारों की स्वास्थ्य सुरक्षा संबंधी मांगों पर सकारात्मक कार्रवाई तथा यथासंभव शीघ्र समाधान का आश्वासन दिया। 

पत्रकार सुरेश गांधी ने कहा कि बड़ी संख्या में पत्रकार स्वास्थ्य एवं सामाजिक सुरक्षा से वंचित हैं। 

उन्होंने इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती से जुड़ा विषय बताते हुए पत्रकारों के लिए स्थायी सुरक्षा कवच की आवश्यकता पर बल दिया। 

काशी के पत्रकार समाज ने मुख्यमंत्री के आश्वासन को महत्वपूर्ण पहल बताते हुए उम्मीद जताई है कि स्वास्थ्य सुरक्षा, पेंशन और अन्य कल्याणकारी सुविधाओं से संबंधित मांगों पर जल्द ठोस निर्णय लिया जाएगा।

पहलकाशी के पत्रकारों के लिए बड़ी

एक सप्ताह में आयुष्मान कार्ड देने का आश्वासन

लोकभवन में सूचना निदेशक से मिले पत्रकार प्रतिनिधि; “एक देशएक पत्रकार पहचान पत्रको बताया सही कदम, मुख्यमंत्री से हुई मुलाकात का भी हुआ जिक्र

लखनऊ। काशी के पत्रकारों की स्वास्थ्य सुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा और पत्रकार कल्याण से जुड़े मुद्दों को लेकर गुरुवार को लखनऊ स्थित लोकभवन में उत्तर प्रदेश के सूचना निदेशक से महत्वपूर्ण मुलाकात हुई। 

इस दौरान पत्रकारों के लिए आयुष्मान कार्ड, चिकित्सा सहायता, कल्याण योजनाओं तथाएक देशएक पत्रकार पहचान पत्रजैसे राष्ट्रीय स्तर के प्रस्ताव पर विस्तार से चर्चा की गई। 

साथ ही में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से हुई मुलाकात और पत्रकार हितों को लेकर प्रस्तुत मांगों का भी उल्लेख किया गया.

सुरेश गांधी ने कहा कि ने काशी सहित प्रदेश के अनेक पत्रकार आज भी

स्वास्थ्य सुरक्षा के प्रभावी दायरे से बाहर हैं। 

फील्ड में लगातार सक्रिय रहने वाले पत्रकार दुर्घटना, बीमारी और आकस्मिक परिस्थितियों का जोखिम उठाते हैं, लेकिन उनके लिए समुचित स्वास्थ्य संरक्षण की व्यवस्था पर्याप्त नहीं है। 

इस पर सूचना निदेशक ने सकारात्मक रुख अपनाते हुए कहा कि काशी के पात्र पत्रकारों को एक सप्ताह के भीतर आयुष्मान कार्ड उपलब्ध कराने की दिशा में आवश्यक कार्रवाई प्रारंभ की जाएगी।

इस दौरान पत्रकार कल्याण कोष की प्रभावी क्रियान्विति, आकस्मिक चिकित्सा सहायता, वरिष्ठ पत्रकारों के लिए विशेष स्वास्थ्य सुविधा, पत्रकार परिवारों की सुरक्षा , पेंशन और सूचना विभाग के साथ बेहतर समन्वय जैसे विषय भी प्रमुखता से उठाए गए। प्रतिनिधिमंडल ने मांग की कि पत्रकारों के लिए एक स्थायी स्वास्थ्य सहायता तंत्र विकसित किया जाए, ताकि गंभीर बीमारी या दुर्घटना की स्थिति में तत्काल सहायता मिल सके।

भक्ति की आवाज में स्त्री का प्रतिरोध

भक्ति की आवाज में स्त्री का प्रतिरोध 

बीएचयू के एक कार्यक्रम में उठे विचारों ने स्त्री स्वतंत्रता, भक्ति साहित्य और सामाजिक न्याय पर नई चर्चा छेड़ी

सुरेश गांधी

वाराणसी. काशी हिंदू विश्वविद्यालय में आयोजित एक साहित्यिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम में वरिष्ठ साहित्यकार सुभाष राय ने जब कहा कि भक्ति कवयित्रियाँ साहस के साथ पितृसत्ता का प्रतिरोध रचती हैं, तो यह टिप्पणी केवल अतीत की चर्चा नहीं रही; उसने वर्तमान समाज के सामने भी कई प्रश्न खड़े कर दिए। कार्यक्रम को एक सप्ताह बीत चुका है, लेकिन उसमें उठे विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं।

राय ने दक्षिण भारत की संत कवयित्रियों अंडाल और अक्का महादेवी के उदाहरणों के माध्यम से बताया कि मध्यकालीन समाज में स्त्रियों और शूद्रों पर धार्मिक प्रतिबंध थे। जब संस्थागत धर्म ने उनके लिए रास्ते बंद किए, तब उन्होंने ईश्वर तक पहुंचने के लिए अपनी भाषा, अपने गीत और अपनी अनुभूति को माध्यम बनाया। यह भक्ति केवल आत्मिक साधना नहीं थी; यह सामाजिक अवरोधों के विरुद्ध सांस्कृतिक प्रतिरोध भी थी।

अक्का महादेवी के प्रसंग को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि उन्होंने पति और स्वतंत्रता के बीच स्वतंत्रता को चुना। इसी तरह अंडाल की कविताओं में प्रेम निष्क्रिय प्रतीक्षा नहीं, बल्कि अधिकारपूर्वक संवाद का रूप लेता है। यह स्वर उत्तर भारतीय भक्ति परंपरा से भिन्न दिखाई देता है और इसी कारण गंभीर अध्ययन की मांग करता है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे साहित्यकार अवधेश प्रधान ने कहा कि भक्ति साहित्य भारतीय सांस्कृतिक एकता का महत्वपूर्ण आधार है। अलवार और नायनार परंपराएं बताती हैं कि उत्तर और दक्षिण भारत परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि गहरे सांस्कृतिक संबंधों से जुड़े हुए हैं। अंडाल की कल्पना में वृंदावन और दक्षिण की धरती एक ही आध्यात्मिक भूगोल का हिस्सा बन जाते हैं।

चर्चा का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी रहा कि इतिहास में अनेक प्रतिभाशाली स्त्रियों की स्मृतियां दबा दी गईं। यह प्रश्न आज भी बना हुआ है कि साहित्यिक परंपराओं में स्त्री स्वर को कितनी जगह मिली है और उसकी व्याख्या किस दृष्टि से की गई है।

बीएचयू में हुई यह चर्चा दरअसल एक बड़े सांस्कृतिक विमर्श की ओर संकेत करती है। आज जब स्त्री अधिकार, समानता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर नए सिरे से बहस चल रही है, तब अंडाल और अक्का महादेवी जैसी कवयित्रियां केवल धार्मिक प्रतीक नहीं रह जातीं; वे साहस, आत्मसम्मान और स्वतंत्र चेतना की ऐतिहासिक आवाज बनकर सामने आती हैं।

काशी की इस बहस का महत्व इसलिए भी है कि उसने भक्ति साहित्य को केवल पूजा-पाठ के दायरे से बाहर निकालकर सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा के प्रश्नों से जोड़ दिया है। यही वह बिंदु है जहां साहित्य अतीत की स्मृति नहीं, वर्तमान का हस्तक्षेप बन जाता है।

सुभाष राय का जन्म जनवरी 1957 में उत्तर प्रदेश के मऊ जनपद के बड़ागांव में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा गांव में प्राप्त करने के बाद उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय के के.एम.आई. संस्थान से हिंदी साहित्य में प्रथम श्रेणी से स्नातकोत्तर तथा विधि की पढ़ाई पूरी की। संत कवि दादूदयाल के साहित्य पर उन्होंने पीएचडी की।

आपातकाल विरोधी आंदोलन में सक्रिय भागीदारी और जेल यात्रा के बाद वे पिछले चार दशकों से पत्रकारिता से जुड़े हैं। विभिन्न प्रतिष्ठित दैनिक समाचारपत्रों में शीर्ष पदों पर कार्य करने के पश्चात वर्तमान में लखनऊ से प्रकाशित जनसंदेश टाइम्स के प्रधान संपादक हैं।

उनकी प्रमुख कृतियों में सलीब पर सच, मूर्तियों के जंगल में, जाग मछन्दर जाग और अंधेरे के पार शामिल हैं। रजा न्यास की फेलोशिप पर दिगम्बर विद्रोहिणी अक्क महादेवी तथा आत्मसंभवा आंडाल प्रकाशित हुईं। उन्हें नई धारा रचना सम्मान, माटी रतन सम्मान, देवेंद्र कुमार बंगाली स्मृति कविता सम्मान, स्पंदन कृति आलोचना सम्मान और प्रो. शुकदेव स्मृति सम्मान सहित अनेक सम्मानों से अलंकृत किया जा चुका है। वर्तमान निवास गोमतीनगर, लखनऊ है।

‘एक देश-एक पत्रकार पहचान’ का मुद्दा भी मुख्यमंत्री तक पहुँचा

‘ एक देश - एक पत्रकार पहचान ’ का मुद्दा भी मुख्यमंत्री तक पहुँचा  स्वास्थ्य सुरक्षा संबंधी मांगों पर सकारात्मक कार्रवाई का ...