Friday, 16 October 2026

बिहार के बाद यूपी की बारी? जातीय कड़ाही में तलेगी-भुनेगी बीजेपी

बिहार के बाद यूपी की बारी? जातीय कड़ाही में तलेगी-भुनेगी बीजेपी 

उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 के विधानसभा चुनाव की बिसात बिछने लगी है। भाजपा नेतृत्व की लोकप्रियता और संगठन के सहारे अपना सामाजिक आधार मजबूत रखने की कोशिश में है, तो सपा 2024 के लोकसभा चुनाव में मिले समर्थन को पीडीए के माध्यम से आगे बढ़ाना चाहती है। बसपा के सामने अपने परंपरागत दलित आधार को मजबूत करने की चुनौती है, जबकि कांग्रेस ब्राह्मणों, पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों के बीच अपनी राजनीतिक जगह बढ़ाने की कोशिश कर रही है। इस मुकाबले को समझने के लिए 2024 के चुनाव परिणाम, मत-प्रतिशत और जातिवार मतदान के सर्वे महत्वपूर्ण हैं। मगर लोकसभा चुनाव में बना सामाजिक समीकरण विधानसभा चुनाव में अपने आप दोहराया नहीं जाता। लोकसभा में राष्ट्रीय नेतृत्व और बड़े मुद्दे प्रभाव डालते हैं, जबकि विधानसभा में मुख्यमंत्री का चेहरा, विधायक का काम, स्थानीय जातीय समीकरण और उम्मीदवार की स्वीकार्यता ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकती है। 2024 के आंकड़े बताते हैं कि भाजपा को सवर्ण और कई गैर-यादव ओबीसी समूहों में समर्थन मिला, जबकि सपा-कांग्रेस गठबंधन को यादव, मुस्लिम और गैर-जाटव दलित मतदाताओं के बीच व्यापक समर्थन का अनुमान था। जाटव मतदाताओं का बड़ा हिस्सा बसपा के साथ दिखाई दिया। इन संकेतों से राजनीतिक दलों की रणनीतियां- समझी जा सकती हैं, लेकिन 2027 का परिणाम घोषित नहीं किया जा सकता। भाजपा के लिए नेतृत्व की लोकप्रियता के साथ स्थानीय संगठन और टिकट वितरण अहम होंगे। सपा के लिए पीडीए को स्थायी राजनीतिक साझेदारी में बदलना चुनौती होगी। बसपा के लिए परंपरागत दलित आधार को सक्रिय करना और व्यापक समर्थन हासिल करना महत्वपूर्ण रहेगा। छोटे क्षेत्रीय दलों और जातीय नेताओं की भूमिका सीट-दर-सीट बदल सकती है। ऐसे में बड़ा सवाल तो यही है कौन-सा दल किस सामाजिक समूह तक पहुंच बनाता है, उस समूह को कितना प्रतिनिधित्व देता है और अपने समर्थकों को मतदान के दिन बूथ तक लाने में कितना सफल होता है। मतलब साफ है  विधानसभा चुनाव का फैसला स्थानीय मुद्दों, नेतृत्व, उम्मीदवारों और गठबंधनों के मेल से ही सामने आएगा

सुरेश गांधी

उत्तर प्रदेश की सियासत में चुनावी भविष्यवाणी करना आसान नहीं। यहां लहरें बनती भी हैं और जातीय समीकरणों, प्रत्याशी चयन तथा स्थानीय नाराजगी के सामने बदल भी जाती हैं। बिहार के चुनावी नतीजों के बाद उत्तर प्रदेश को लेकर भी यही सवाल उठ रहा है—क्या यहां भी वैसा ही राजनीतिक उलटफेर संभव है, या योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा अपनी बढ़त कायम रखेगी? एक सर्वे रिपोर्ट में मुख्यमंत्री पद के लिए योगी की मजबूत बढ़त का दावा भाजपा के पक्ष में माहौल का संकेत देता है। लेकिन लोकप्रियता का सर्वे और विधानसभा चुनाव में सीटों का गणित दो अलग बातें हैं। उत्तर प्रदेश में अगली सत्ता का फैसला इस बात से होगा कि नेतृत्व की लोकप्रियता बूथ तक कितनी उतरती है, जातीय समूह किस ओर झुकते हैं और टिकट बंटवारे में किसकी सुनवाई होती है। मतलब साफ है यूपी में भाजपा के लिए योगी की लोकप्रियता राहत का संकेत हो सकती है, लेकिन उसे 2024 में सामने आए स्थानीय असंतोष और प्रत्याशी चयन के सबक नहीं भूलने चाहिए। सपा के लिए पीडीए संभावनाओं का बड़ा आधार है, लेकिन लोकसभा में बना समर्थन विधानसभा में स्वतः स्थानांतरित हो जाएगा, यह मानना जोखिम भरा होगा। दलित मतदाताओं के बीच मायावती की संभावित वापसी, गैर-यादव पिछड़ों का रुख, ब्राह्मणों की राजनीतिक पसंद, मुस्लिम मतों का सीटवार बंटवारा और जातीय नेताओं की वास्तविक पकड़—ये सभी मिलकर परिणाम को प्रभावित करेंगे।

खास यह है कि उत्तर प्रदेश की सियासत में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के बीच सामने आई एक सर्वे रिपोर्ट मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मजबूत राजनीतिक स्वीकार्यता का संकेत दे रही है। मुख्यमंत्री पद की पसंद के सवाल पर योगी को 66.2 फीसदी लोगों का समर्थन मिला है, जबकि समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव 24.4 फीसदी पर ठहर गए। दोनों नेताओं के बीच 41.8 प्रतिशत अंक का अंतर विपक्ष के सामने खड़ी राजनीतिक चुनौती को रेखांकित करता है। सबसे बड़ा सवाल यह नहीं कि सर्वे में कौन आगे है, बल्कि यह है कि चुनाव के दिन कौन अपने समर्थकों को बूथ तक पहुंचा पाता है और किसका सामाजिक गठजोड़ स्थानीय उम्मीदवारों के स्तर पर भी कायम रहता है। उत्तर प्रदेश में 2027 की सत्ता का रास्ता किसी एक नारे, किसी एक जाति या किसी एक नेता से तय नहीं होगा। फैसला नेतृत्व की लोकप्रियता, सामाजिक समीकरण, टिकट वितरण, स्थानीय नाराजगी और मतदाता के रोजमर्रा के अनुभवों के मेल से निकलेगा। यही वजह है कि बिहार के बाद यूपी की बारी का सवाल अभी खुला है—और उसका उत्तर सर्वे से ज्यादा चुनावी मैदान देगा।

2024 का चुनाव : सीटों में सपा आगे, वोट प्रतिशत में भाजपा

उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों के परिणामों ने भाजपा और विपक्ष, दोनों को अपने सामाजिक समीकरणों पर दोबारा विचार करने के लिए मजबूर किया।

पार्टी      2024 में जीती सीटें            अनुमानित मत प्रतिशत

भाजपा   33                                           41.36%

सपा      37                                           33.60%

कांग्रेस    6                                              9.46%

राष्ट्रीय लोकदल    2                              1.02%

बसपा                     0                              9.39%

अपना दल (सोनेलाल)        1              0.92%

आजाद समाज पार्टी (कांशीराम)      1              0.69%

इन आंकड़ों में एक महत्वपूर्ण अंतर दिखाई देता है। भाजपा को सपा से अधिक मत मिले, लेकिन सपा ने चार सीटें अधिक जीतीं। इसका अर्थ है कि केवल प्रदेशव्यापी मत प्रतिशत से सीटों का परिणाम नहीं समझा जा सकता। उम्मीदवारों की क्षेत्रवार स्थिति, विपक्षी गठबंधन, वोटों का भौगोलिक वितरण और मुकाबले की प्रकृति भी निर्णायक होती है। भाजपा 2019 की 62 सीटों से घटकर 33 पर आ गई। सपा 37 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी और कांग्रेस ने छह सीटें जीतीं। बसपा कोई सीट नहीं जीत सकी, लेकिन उसका 9.39 प्रतिशत मत यह बताता है कि सीट न जीत पाने और मतदाता आधार पूरी तरह समाप्त हो जाने में अंतर है।

जातिवार मतदान का सर्वे क्या बताता है?

लोकनीति-सीएसडीएस के 2024 के चुनाव बाद सर्वे में अलग-अलग सामाजिक समूहों के मतदान व्यवहार के अनुमान सामने आए। ये चुनाव आयोग के आधिकारिक जातिवार आंकड़े नहीं, बल्कि सर्वेक्षण के निष्कर्ष हैं।

सामाजिक समूह इंडिया गठबंधन एनडीए बसपा

सवर्ण                      16%        79%        1%

यादव                      82%        15%        2%

कुर्मी-कोइरी         34%        61%        2%

अन्य ओबीसी        34%        59%        3%

जाटव                     25%        24%        44%

गैर-जाटव दलित  56%        29%        15%

मुस्लिम                  92%        2%          5%

ये आंकड़े तीन अहम बातें बताते हैं। पहली, यादव और मुस्लिम मतदाताओं में इंडिया गठबंधन को व्यापक समर्थन मिलने का अनुमान था। इससे सपा-कांग्रेस गठबंधन को कई सीटों पर लाभ मिला। दूसरी, कुर्मी-कोइरी और अन्य ओबीसी समूहों में एनडीए का समर्थन सर्वे में अधिक था। इससे स्पष्ट है कि गैर-यादव पिछड़े वर्गों का बड़ा हिस्सा 2024 में विपक्ष के साथ नहीं गया था। तीसरी, दलित मतदाता एकसमान राजनीतिक समूह नहीं हैं। सर्वे में जाटव मतदाताओं का बड़ा हिस्सा बसपा के साथ दिखाई दिया, जबकि गैर-जाटव दलितों में इंडिया गठबंधन का समर्थन अधिक था। यही अंतर 2027 के चुनाव में बसपा, सपा और भाजपा की रणनीतियों को प्रभावित कर सकता है।

कौन-सा सामाजिक समूह किस ओर झुक सकता है?

यहां किसी जाति को किसी पार्टी का स्थायी मतदाता मानना उचित नहीं होगा। नीचे दिए गए बिंदु 2024 के आंकड़ों, राजनीतिक दलों की रणनीतियों और सार्वजनिक रिपोर्टों पर आधारित संभावनाएं हैं—न कि 2027 के परिणाम की भविष्यवाणी। 

सामाजिक समूह  2024 का संकेत और प्रमुख राजनीतिक संदर्भ               2027 में किन बातों पर नजर रहेगी

यादव…                  2024 के सर्वे में इंडिया गठबंधन को 82% समर्थन का अनुमान   सपा का पारंपरिक आधार, स्थानीय नेतृत्व और उम्मीदवार

मुस्लिम…                               सर्वे में इंडिया गठबंधन को 92% समर्थन का अनुमान   सीट पर विपक्षी उम्मीदवार की स्वीकार्यता, गठबंधन और मुकाबले की स्थिति

कुर्मी-कोइरी…      सर्वे में एनडीए को 61% समर्थन का अनुमान  अपना दल (एस), भाजपा-सपा की सामाजिक पहुंच, स्थानीय नेतृत्व और टिकट

अन्य ओबीसी…    सर्वे में एनडीए को 59% समर्थन का अनुमान  मौर्य-कुशवाहा, निषाद, राजभर, लोध और अन्य समूहों की अलग-अलग मांगें

जाटव… सर्वे में बसपा को 44% समर्थन का अनुमान     मायावती का संगठन, बसपा की चुनावी रणनीति और उम्मीदवार

गैर-जाटव दलित…               सर्वे में इंडिया गठबंधन को 56% समर्थन का अनुमान   स्थानीय उम्मीदवार, सामाजिक प्रतिनिधित्व और भाजपा-सपा-बसपा की पहुंच

सवर्ण…  सर्वे में एनडीए को 79% समर्थन का अनुमान  भाजपा के प्रति समर्थन, स्थानीय नाराजगी और विपक्ष की प्रतिनिधित्व नीति

इन आंकड़ों से यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि कोई जाति 2027 में निश्चित रूप से उसी पार्टी को वोट देगी। सर्वे 2024 के लोकसभा चुनाव का है; विधानसभा चुनाव में मतदाता का व्यवहार बदल सकता है। साथ ही, प्रत्येक सामाजिक समूह के भीतर क्षेत्र, उपजाति, आर्थिक स्थिति और स्थानीय नेतृत्व के आधार पर मतभेद हो सकते हैं।

पीडीए के सामने चुनौती

अखिलेश यादव के पीडीए—पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक—का राजनीतिक संदेश 2024 में चर्चा के केंद्र में रहा। सपा ने यादव-मुस्लिम आधार से आगे बढ़कर अन्य पिछड़े और दलित समूहों को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की। 2024 में सपा के 37 सांसद चुने गए और पार्टी ने अपेक्षाकृत व्यापक सामाजिक प्रतिनिधित्व का संदेश दिया। लेकिन विधानसभा चुनाव में इस समर्थन को बनाए रखना अलग चुनौती है। लोकसभा में मतदाता संविधान, राष्ट्रीय नेतृत्व और देशव्यापी मुद्दों से प्रभावित हो सकता है। विधानसभा में स्थानीय विधायक, मुख्यमंत्री, सरकारी योजनाओं का लाभ, कानून-व्यवस्था, जातीय नेतृत्व और टिकट वितरण ज्यादा असर डाल सकते हैं। पीडीए की परीक्षा इस बात से होगी कि क्या गैर-यादव पिछड़े और दलित मतदाताओं को पार्टी में वास्तविक प्रतिनिधित्व का भरोसा मिलता है। यदि उन्हें लगता है कि गठजोड़ में उनकी हिस्सेदारी सीमित है, तो उनका मतदान व्यवहार बदल सकता है। दूसरी ओर, यदि सपा स्थानीय स्तर पर मजबूत उम्मीदवारों और सामाजिक प्रतिनिधित्व के साथ संगठन खड़ा करती है, तो उसका पीडीए आधार व्यापक बना रह सकता है। इसलिए पीडीए की सफलता या असफलता को पहले से तय मानना गलत होगा। 2024 ने इसकी संभावनाएं दिखाई थीं; 2027 में इसका परीक्षण अलग परिस्थितियों में होगा।

भाजपा की रणनीति: गैर-यादव ओबीसी और दलित समूहों तक पहुंच

भाजपा के लिए 2027 की रणनीति में गैर-यादव पिछड़े वर्गों और दलित समूहों के बीच अपना आधार बनाए रखना महत्वपूर्ण है। 2024 के सर्वे में कुर्मी-कोइरी और अन्य ओबीसी समूहों में एनडीए का समर्थन इंडिया गठबंधन से अधिक बताया गया था। भाजपा और उसके सहयोगी दल इसी सामाजिक आधार को संगठित रखने पर जोर दे सकते हैं। अपना दल (सोनेलाल) का कुर्मी समुदाय में प्रभाव, निषाद पार्टी के संजय निषाद की भूमिका और सुभासपा के ओम प्रकाश राजभर का अपने सामाजिक आधार में प्रभाव इस रणनीति के संदर्भ में चर्चा में रहते हैं। हालांकि किसी सहयोगी नेता की जातीय पहचान को उसके पूरे समुदाय के वोट पर नियंत्रण का प्रमाण नहीं माना जा सकता। 2026 की राजनीतिक रिपोर्टों में भाजपा की ओर से गैर-यादव ओबीसी और दलित समूहों तक पहुंच बढ़ाने, संगठन मजबूत करने तथा सामाजिक प्रतिनिधित्व को संतुलित करने की कोशिशों का उल्लेख है। इस रणनीति की परीक्षा टिकट वितरण और स्थानीय कार्यकर्ताओं की भूमिका से भी होगी। यदि किसी समुदाय को राजनीतिक प्रतिनिधित्व का भरोसा मिलता है, तो उसका असर संगठनात्मक समर्थन पर पड़ सकता है। यदि सहयोगी दलों के बीच सीटों या नेतृत्व को लेकर असंतोष बढ़ता है, तो वही समीकरण कमजोर भी हो सकता है।

जातीय नेताओं की पकड़

उत्तर प्रदेश में जातीय नेताओं का प्रभाव महत्वपूर्ण है, लेकिन यह मान लेना कि कोई नेता अपनी पूरी बिरादरी का वोट एक दिशा में ले जाएगा, वास्तविकता को सरल बना देना होगा। अखिलेश यादव: सपा के पारंपरिक यादव आधार के साथ गैर-यादव पिछड़ों और दलितों तक पीडीए के जरिए पहुंच बनाने की कोशिश। मायावती: बसपा के परंपरागत जाटव आधार और दलित राजनीति में स्वतंत्र प्रतिनिधित्व के सवाल पर उनकी भूमिका। अनुप्रिया पटेल: अपना दल (एस) के माध्यम से कुर्मी राजनीति और भाजपा के साथ गठबंधन का संदर्भ। संजय निषाद: निषाद समुदाय के आरक्षण, प्रतिनिधित्व और राजनीतिक हिस्सेदारी से जुड़े सवाल। ओम प्रकाश राजभर: राजभर समुदाय की राजनीतिक आकांक्षाओं और गठबंधन की राजनीति में भूमिका। पंकज चौधरी: भाजपा के प्रदेश नेतृत्व में कुर्मी प्रतिनिधित्व और गैर-यादव पिछड़े वर्गों तक पहुंच के संदर्भ में उनकी भूमिका। कांग्रेस का नेतृत्व: ब्राह्मण, दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदायों के बीच संगठनात्मक आधार बढ़ाने की कोशिश। इन नेताओं की वास्तविक पकड़ का आकलन केवल रैलियों या बयानों से नहीं किया जा सकता। उनके प्रभाव का परीक्षण स्थानीय संगठन, चुनावी उम्मीदवारों की स्वीकार्यता, बूथ प्रबंधन, सामाजिक मांगों पर काम और मतदाताओं को मतदान तक लाने की क्षमता से होगा। 2026 की रिपोर्टों में भाजपा और सपा, दोनों की ओर से निषाद तथा अन्य गैर-यादव ओबीसी समूहों तक पहुंच बनाने की कोशिशों का उल्लेख है।

ब्राह्मण मतदाताओं तक पहुंच: अखिलेश की कोशिश और भाजपा की चुनौती

सपा ने 2027 से पहले ब्राह्मण मतदाताओं तक पहुंच बनाने के लिए पार्टी से जुड़े ब्राह्मण नेताओं की बैठक और संगठनात्मक प्रतिनिधित्व पर चर्चा की है। यह उसकी पारंपरिक मुस्लिम-यादव पहचान से आगे बढ़ने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन किसी समुदाय के कुछ नेताओं का सपा से जुड़ना उस समुदाय के व्यापक मतदान व्यवहार में बदलाव का प्रमाण नहीं है। ब्राह्मण मतदाताओं के बीच भाजपा की मजबूत स्थिति 2024 के सर्वे में दिखाई दी थी। सपा के लिए चुनौती यह होगी कि वह प्रतिनिधित्व और स्थानीय नेतृत्व के जरिए भरोसा बढ़ाए, जबकि भाजपा के लिए चुनौती अपने समर्थक आधार में संभावित नाराजगी को दूर रखना होगी।

निषाद और दूसरे छोटे ओबीसी समूह: सीटवार असर महत्वपूर्ण

निषाद, राजभर और अन्य छोटे-बड़े पिछड़े समुदायों की राजनीति में आरक्षण, सामाजिक सम्मान, सरकारी प्रतिनिधित्व और स्थानीय नेतृत्व अहम मुद्दे हो सकते हैं। निषाद समुदाय को लेकर 2026 की रिपोर्टों में भाजपा के सहयोगी निषाद पार्टी और विपक्षी दलों की ओर से अलग-अलग स्तर पर समर्थन जुटाने की कोशिशों का उल्लेख है। ऐसे समूहों का असर पूरे प्रदेश में एक जैसा नहीं होगा। नदी किनारे के क्षेत्रों, पूर्वांचल और उन विधानसभा क्षेत्रों में जहां समुदाय की संख्या और संगठनात्मक उपस्थिति अधिक है, वहां उनका राजनीतिक महत्व बढ़ सकता है। लेकिन समुदाय का समर्थन किसी एक दल के पक्ष में स्वतः स्थानांतरित होगा, यह मानना सही नहीं है। उम्मीदवार, गठबंधन और स्थानीय मांगें भी निर्णायक रहेंगी।

2024 में भाजपा की कमजोरी के पीछे केवल जाति नहीं थी

2024 के परिणामों को सिर्फ पीडीए की सफलता या जातीय ध्रुवीकरण से समझना अधूरा होगा। चुनाव के बाद की रिपोर्टों में स्थानीय सांसदों के प्रति असंतोष, प्रत्याशी चयन, रोजगार और भर्ती से जुड़े मुद्दों तथा भाजपा के संगठनात्मक तालमेल पर सवाल उठे। सपा-कांग्रेस गठबंधन की सीटों के बंटवारे और चुनावी संदेश में तालमेल को भी विपक्ष की सफलता से जोड़कर देखा गया। केंद्र और प्रदेश नेतृत्व के बीच टिकट चयन को लेकर मतभेदों की खबरों को भी इसी संदर्भ में देखा जा सकता है। लेकिन यह दावा करना कि किसी एक नेता या कथित मतभेद ने ही भाजपा को नुकसान पहुंचाया, उपलब्ध तथ्यों से आगे जाना होगा। परिणाम अनेक कारकों के मेल से बना था। 2027 में भाजपा के लिए स्थानीय नाराजगी और टिकट वितरण का प्रबंधन महत्वपूर्ण रहेगा। सपा के लिए भी यही कसौटी होगी—सामाजिक समीकरण मजबूत होने के बावजूद यदि उम्मीदवार स्थानीय स्तर पर स्वीकार्य नहीं है, तो गठबंधन का लाभ सीमित हो सकता है।

बिहार से तुलना: समानताएं हैं, लेकिन नतीजे का फार्मूला एक नहीं

बिहार और उत्तर प्रदेश, दोनों राज्यों में जातीय राजनीति महत्वपूर्ण है। फिर भी दोनों की सामाजिक संरचना, क्षेत्रीय दलों का प्रभाव, गठबंधन और नेतृत्व की परिस्थितियां अलग हैं। बिहार में किसी जातीय या चुनावी रणनीति की सफलता को यूपी में सीधे लागू नहीं किया जा सकता। उत्तर प्रदेश में 2027 का चुनाव तीन व्यापक सवालों के इर्द-गिर्द देखा जा सकता है: योगी नेतृत्व की लोकप्रियता का स्थानीय सीटों पर कितना असर होगा; सपा का पीडीए विधानसभा स्तर पर कितना टिकाऊ सामाजिक गठजोड़ बन पाएगा; और बसपा अपने दलित आधार को किस हद तक फिर सक्रिय कर पाएगी। इनके साथ कांग्रेस, राष्ट्रीय लोकदल, अपना दल (एस), निषाद पार्टी, सुभासपा और अन्य दलों की गठबंधन संबंधी भूमिका भी कई सीटों पर असर डाल सकती है।

लोकप्रियता का सबसे मजबूत आधार कानून-व्यवस्था

योगी सरकार के पक्ष में सबसे बड़ा मुद्दा कानून-व्यवस्था बनकर उभरा है। सर्वे में 74 फीसदी लोगों ने इस मोर्चे पर सरकार के कामकाज के प्रति संतुष्टि जताई। वहीं, 33.4 फीसदी लोगों ने कानून-व्यवस्था को मतदान के फैसले को प्रभावित करने वाला सबसे अहम मुद्दा बताया। इसका राजनीतिक अर्थ स्पष्ट है। भाजपा ने कानून-व्यवस्था को केवल सरकारी उपलब्धि के रूप में नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक नेतृत्व की पहचान के रूप में स्थापित किया है। समर्थकों के बीच यह धारणा पार्टी को चुनावी लाभ दे सकती है। दूसरी ओर, विपक्ष के सामने चुनौती केवल सरकार की आलोचना करने की नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था पर अपना विश्वसनीय विकल्प पेश करने की भी है। सर्वे में बुनियादी ढांचे के कामकाज से 68.6 फीसदी और कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन से 66.3 फीसदी लोगों ने संतुष्टि जताई। ये आंकड़े बताते हैं कि सरकार के प्रति समर्थन का आधार केवल एक मुद्दे तक सीमित नहीं है।

योगी की लोकप्रियता भाजपा की ताकत , लेकिन दोनों एक ही बात नहीं

इस सर्वे का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि योगी आदित्यनाथ की व्यक्तिगत लोकप्रियता और भाजपा के चुनावी समर्थन के आंकड़े लगभग समान स्तर पर हैं। मुख्यमंत्री पद के लिए योगी को 66.2 फीसदी और भाजपा-एनडीए को संभावित मतदान में 66.6 फीसदी समर्थन मिला है। इससे संकेत मिलता है कि फिलहाल मुख्यमंत्री की राजनीतिक छवि और सत्तारूढ़ गठबंधन की स्वीकार्यता एक-दूसरे को मजबूती देती दिखाई दे रही हैं। हालांकि, केवल इन दो आंकड़ों के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि भाजपा का पूरा समर्थन योगी की व्यक्तिगत लोकप्रियता के कारण ही है। योगी की छवि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रभाव, संगठन की ताकत, सरकारी योजनाएं और स्थानीय राजनीतिक समीकरण अलग-अलग स्तर पर मतदाताओं को प्रभावित कर सकते हैं। चुनाव में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि मुख्यमंत्री के प्रति सकारात्मक राय वोट में कितनी प्रभावी ढंग से बदलती है।

अखिलेश के सामने सबसे बड़ी चुनौती

सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के लिए सर्वे का संदेश चुनौतीपूर्ण है। मुख्यमंत्री पद की पसंद में योगी से 41.8 प्रतिशत अंक पीछे रहना बताता है कि विपक्ष को अपनी राजनीतिक रणनीति पर नए सिरे से विचार करना पड़ सकता है। लेकिन अखिलेश के लिए तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक भी नहीं है। सर्वे में सपा-कांग्रेस गठबंधन को 26.4 फीसदी संभावित समर्थन मिला है। यह एक महत्वपूर्ण विपक्षी आधार है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। असली सवाल यह है कि क्या विपक्ष इस समर्थन को व्यापक जनादेश में बदलने की स्थिति बना पाएगा। इसके लिए रोजगार, महंगाई, किसानों की समस्याओं, सामाजिक प्रतिनिधित्व और युवाओं की आकांक्षाओं को प्रभावी ढंग से उठाना होगा। साथ ही, विपक्ष को यह भी बताना होगा कि सत्ता में आने पर इन समस्याओं का समाधान किस तरह करेगा। सिर्फ सरकार की कमियां गिनाने से चुनावी बढ़त हासिल करना कठिन हो सकता है। मतदाताओं के सामने विश्वसनीय नेतृत्व, स्पष्ट कार्यक्रम और मजबूत संगठन प्रस्तुत करना विपक्ष की बड़ी परीक्षा होगी।

रोजगार और महंगाई बन सकते हैं चुनावी कसौटी

योगी सरकार की लोकप्रियता के बीच रोजगार का सवाल सबसे महत्वपूर्ण चुनौती के रूप में उभरा है। सर्वे में रोजगार के मोर्चे पर 58.3 फीसदी लोगों ने सरकार के कामकाज पर संतुष्टि जताई। बेरोजगार उत्तरदाताओं के बीच यह आंकड़ा घटकर 50.7 फीसदी रह गया। मतदान को प्रभावित करने वाले मुद्दों में 21.4 फीसदी लोगों ने रोजगार और नौकरी सृजन को महत्वपूर्ण बताया। वहीं, 19.2 फीसदी ने महंगाई को प्रमुख मुद्दा माना। युवाओं में रोजगार का सवाल और अधिक महत्वपूर्ण दिखाई देता है। इन आंकड़ों का राजनीतिक संदेश यह है कि कानून-व्यवस्था पर मजबूत स्वीकार्यता अपने आप रोजगार के सवाल को समाप्त नहीं करती। सरकार के सामने चुनौती होगी कि विकास की उपलब्धियों के साथ नौकरी, भर्ती, कौशल और रोजगार के अवसरों पर भी भरोसा कायम रखे। विपक्ष के लिए भी यही अवसर है। यदि वह युवाओं और महंगाई से प्रभावित परिवारों की समस्याओं को विश्वसनीय समाधान के साथ उठाता है तो मौजूदा राजनीतिक अंतर को कम करने की कोशिश कर सकता है।

बसपा के सामने भी अस्तित्व और विस्तार की चुनौती

मुख्यमंत्री पद की पसंद में बसपा प्रमुख मायावती को पांच फीसदी समर्थन मिला, जबकि पार्टी को संभावित मतदान में 5.4 फीसदी समर्थन मिलने का अनुमान है। इन आंकड़ों से संकेत मिलता है कि प्रदेश की राजनीति में बसपा के सामने अपना प्रभाव बढ़ाने की चुनौती बनी हुई है। हालांकि, राज्यव्यापी सर्वे के आधार पर किसी पार्टी की विधानसभा सीटों की संख्या का सटीक अनुमान नहीं लगाया जा सकता। उत्तर प्रदेश में जातीय समीकरण, स्थानीय उम्मीदवार, क्षेत्रीय संगठन और मतों का भौगोलिक वितरण चुनावी परिणाम को प्रभावित करते हैं। कम राज्यव्यापी समर्थन वाली पार्टी भी कुछ क्षेत्रों में निर्णायक भूमिका निभा सकती है। इसलिए बसपा की भूमिका को केवल उसके संभावित मत प्रतिशत से तय करना उचित नहीं होगा।

एमवाई से पीडीए तक, समीकरण की असली परीक्षा

बिहार की राजनीति में एमवाई यानी मुस्लिम-यादव समीकरण लंबे समय से चर्चा में रहा है। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की राजनीति भी यादव और मुस्लिम मतदाताओं के पारंपरिक समर्थन से जुड़ी रही है। हालांकि, अखिलेश यादव ने अपने पीडीए के दायरे को पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समुदायों तक विस्तार देने की रणनीति पेश की है। यहीं से दोनों राज्यों की राजनीति की तुलना महत्वपूर्ण हो जाती है। किसी जातीय या सामाजिक समीकरण का राजनीतिक दावा तभी प्रभावी होता है, जब संबंधित समुदायों का समर्थन व्यापक स्तर पर वोट में तब्दील हो। केवल सामाजिक समूहों को अपने साथ मान लेने से चुनावी समर्थन सुनिश्चित नहीं हो जाता। पिछड़े वर्गों के भीतर भी अलग-अलग जातियों की अपनी राजनीतिक प्राथमिकताएं हैं। गैर-यादव पिछड़ी जातियों का समर्थन हासिल करने के लिए भाजपा और सपा, दोनों को अपने संगठन, उम्मीदवारों और स्थानीय समीकरणों के आधार पर प्रयास करना होगा। इसी तरह दलित मतदाताओं के बीच भी अलग-अलग समुदायों और क्षेत्रों में राजनीतिक पसंद एक जैसी होना जरूरी नहीं है। इसलिए पीडीए की वास्तविक ताकत का आकलन उसके दावे से नहीं, बल्कि विभिन्न सामाजिक समूहों में मिलने वाले समर्थन और उसके भौगोलिक वितरण से होगा।

मुस्लिम मतों का बंटवारा: हर सीट की कहानी अलग

उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में मुस्लिम मतदाताओं की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। लेकिन यह मान लेना सही नहीं होगा कि पूरा मुस्लिम मतदाता वर्ग हर चुनाव में एक ही पार्टी के पक्ष में मतदान करता है। कुछ सीटों पर सपा के प्रत्याशी की स्थानीय स्वीकार्यता, भाजपा को रोकने की रणनीति और विपक्षी दलों के बीच प्रतिस्पर्धा मुस्लिम मतों को एक दिशा में केंद्रित कर सकती है। दूसरी ओर, जहां किसी अन्य दल का प्रत्याशी मजबूत हो या स्थानीय परिस्थितियां अलग हों, वहां समर्थन का वितरण बदल सकता है। असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम और मायावती की बसपा की मौजूदगी भी कुछ सीटों पर चुनावी गणित को प्रभावित कर सकती है। लेकिन इसका प्रभाव प्रत्याशी, क्षेत्र और स्थानीय मुकाबले पर निर्भर करेगा। केवल किसी दल के चुनाव लड़ने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उसके उम्मीदवार को मिलने वाले मत किसी एक दूसरे दल के खाते से ही आएंगे। यदि मुस्लिम मतों का बंटवारा कुछ सीटों पर होता है, तो उसका प्रभाव वहां के मुकाबले पर पड़ सकता है। वहीं, अन्य सीटों पर सपा के पक्ष में अपेक्षाकृत एकजुट समर्थन भी देखने को मिल सकता है। यही कारण है कि राज्यव्यापी औसत से हर विधानसभा क्षेत्र का परिणाम समझना संभव नहीं है।

दलित मतदाता

दलित राजनीति का सवाल भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। बसपा प्रमुख मायावती का राजनीतिक आधार उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में लंबे समय से महत्वपूर्ण रहा है। दूसरी ओर, सपा अपने पीडीए समीकरण के जरिए दलित मतदाताओं के बीच समर्थन बढ़ाने का प्रयास करती रही है। भाजपा भी विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच अपना आधार मजबूत करने की राजनीति करती है। ऐसे में दलित मतदाताओं को किसी एक पार्टी का निश्चित समर्थक मानना उचित नहीं होगा। अलग-अलग दलित समुदायों, क्षेत्रों और स्थानीय मुद्दों के आधार पर राजनीतिक पसंद बदल सकती है। यदि बसपा अपने पारंपरिक मतदाताओं के बीच समर्थन बनाए रखती है, तो कुछ सीटों पर मुकाबले का स्वरूप बदल सकता है। यदि सपा दलित मतदाताओं के बीच अपना समर्थन बढ़ाती है, तो उसे भी लाभ मिल सकता है। भाजपा के पक्ष में समर्थन का विस्तार भी स्थानीय परिस्थितियों और सामाजिक समीकरणों पर निर्भर करेगा। असली सवाल यह होगा कि कौन-सा दल किन क्षेत्रों में अपने सामाजिक समर्थन को वास्तविक मतदान में बदल पाता है।

2027 की जंग में सीटवार समीकरण होंगे अहम

उत्तर प्रदेश में किसी भी राजनीतिक दल की सफलता का आकलन केवल राज्यव्यापी जातीय समीकरण या मुख्यमंत्री पद की पसंद से नहीं किया जा सकता। प्रदेश के पश्चिमी हिस्से, अवध, पूर्वांचल, बुंदेलखंड और मध्य उत्तर प्रदेश में सामाजिक संरचना तथा स्थानीय राजनीतिक परिस्थितियां अलग-अलग हैं। कहीं प्रत्याशी की जाति और व्यक्तिगत पकड़ प्रभावी हो सकती है, तो कहीं गठबंधन, स्थानीय असंतोष या किसी तीसरे दल की मौजूदगी मुकाबले को बदल सकती है। कई सीटों पर मतों का छोटा-सा अंतर भी परिणाम तय कर सकता है। इसलिए बिहार के चुनावी अनुभव से तुलना उपयोगी जरूर है, लेकिन उत्तर प्रदेश पर उसका सीधा निष्कर्ष लागू करना जल्दबाजी होगी। फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि कौन-सा सामाजिक समीकरण कागज पर कितना बड़ा दिखाई देता है, बल्कि यह है कि वह चुनाव के दिन कितना एकजुट रहता है। 2027 में पीडीए की व्यापकता, मुस्लिम मतों का सीटवार वितरण, दलित मतदाताओं की पसंद और भाजपा के नेतृत्व व संगठन की स्वीकार्यता—इन सभी की वास्तविक परीक्षा मतदान के दौरान होगी।

जातीय समीकरण ही नहीं, सीटवार गणित भी अहम

उत्तर प्रदेश में जातीय समीकरण महत्वपूर्ण हैं, लेकिन हर विधानसभा क्षेत्र की सामाजिक संरचना और राजनीतिक परिस्थितियां अलग हैं। कहीं दलित मतदाताओं का रुझान निर्णायक हो सकता है, तो कहीं मुस्लिम मतों का वितरण, पिछड़ी जातियों की पसंद या किसी प्रत्याशी की स्थानीय पकड़ परिणाम को प्रभावित कर सकती है। इसीलिए पूरे प्रदेश के लिए एक ही राजनीतिक निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। जिस सीट पर मुस्लिम मतदाता किसी एक प्रत्याशी के पक्ष में एकजुट हों, वहां मुकाबले का स्वरूप अलग होगा। दूसरी सीट पर बसपा की मजबूत मौजूदगी या किसी अन्य दल का प्रत्याशी अलग परिणाम पैदा कर सकता है। 2027 में राजनीतिक दलों की सफलता इस बात पर भी निर्भर करेगी कि वे अपने समर्थक सामाजिक समूहों के मतों को कितनी प्रभावी ढंग से मतदान में बदल पाते हैं। उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय समीकरणों का महत्व बरकरार है, लेकिन किसी भी गठजोड़ की वास्तविक ताकत उसके दावे से नहीं, बल्कि मतदाताओं के व्यवहार से तय होगी। 2027 का चुनाव इसी अंतर को सामने ला सकता है।

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