Friday, 2 October 2026

होटलों में पर्यटकों से अवैध वसूली की चर्चा, मनमाने किराये से बढ़ी परेशानी

होटलों में पर्यटकों से अवैध वसूली की चर्चा, मनमाने किराये से बढ़ी परेशानी

रात में 1200 रुपये में कमरा, सुबह चेकआउट पर दो हजार अतिरिक्त की मांग का आरोप; होटल कारोबार की पारदर्शिता पर उठे सवाल

सुरेश गांधी

इंदौर। पर्यटन और व्यापार के लिए देशभर में पहचान रखने वाले इंदौर में कुछ होटलों की कार्यप्रणाली को लेकर पर्यटकों के बीच मनमानी वसूली की चर्चाएं सामने आ रही हैं। आरोप है कि कुछ होटल संचालक कमरा उपलब्ध कराने के समय तय किराये के अलावा ऐसी शर्तें स्पष्ट नहीं करते, जिनका हवाला देकर बाद में पर्यटकों से अतिरिक्त रकम की मांग की जाती है। ऐसा ही एक मामला सामने आने के बाद होटल कारोबार की पारदर्शिता और पर्यटकों की सुरक्षा को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

जानकारी के मुताबिक, एक पर्यटक रात करीब 11 बजे होटल पहुंचा। बातचीत के बाद उसे 1200 रुपये में कमरा उपलब्ध कराया गया। अगले दिन सुबह 10 बजे, निर्धारित चेकआउट समय से एक घंटा पहले ही पर्यटक कमरा खाली करने पहुंच गया। लेकिन आरोप है कि होटल प्रबंधन ने पहले से दिए गए 1200 रुपये के अतिरिक्त दो हजार रुपये की मांग कर दी। वजह बताई गई कि पहली रात के लिए हाफ डे का किराया लिया गया था, जबकि अब दूसरे दिन का पूरा किराया देना होगा। इस पर पर्यटक ने सवाल उठाया कि जब कमरा 1200 रुपये में तय हुआ था तो अतिरिक्त शुल्क की जानकारी पहले क्यों नहीं दी गई? उसका तर्क था कि होटल में ठहरने के दौरान किराये और चेकआउट की शर्तें पहले से स्पष्ट होनी चाहिए। इस मुद्दे पर काफी देर तक बहस हुई। बताया जाता है कि अंततः होटल प्रबंधन अतिरिक्त रकम की मांग से पीछे हट गया।

मजबूरी का फायदा उठाने के आरोप

इस घटना के बाद होटल व्यवसाय से जुड़े लोगों और स्थानीय टैक्सी चालकों के बीच भी कुछ होटलों की कार्यशैली को लेकर चर्चाएं होने की बात सामने आई है। एक टैक्सी चालक का दावा है कि शहर के कुछ होटल संचालक कथित तौर पर संदिग्ध गतिविधियों में शामिल युवकों को भी ठहरने की सुविधा देते हैं। आरोप यह भी है कि कुछ जगहों पर नियमित या मासिक भुगतान के आधार पर कमरे उपलब्ध कराए जाते हैं और उनकी आड़ में अश्लील गतिविधियां संचालित होने की चर्चाएं हैं। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।

नियमों की आड़ में मनमानी या पारदर्शिता की कमी?

होटल व्यवसाय में चेकइन और चेकआउट का समय, कमरे का किराया और देर से कमरा खाली करने पर लगने वाला शुल्क अलग-अलग हो सकता है। लेकिन बुकिंग के समय इन शर्तों की स्पष्ट जानकारी देना होटल प्रबंधन की जिम्मेदारी है। यदि किसी पर्यटक से तय किराये के बाद बिना पूर्व जानकारी के अतिरिक्त रकम मांगी जाती है तो यह उपभोक्ता के अधिकारों और कारोबारी पारदर्शिता से जुड़ा गंभीर सवाल बन जाता है। इंदौर आने वाले पर्यटक अक्सर यात्रा की थकान और समय की कमी के बीच होटल में कमरा लेते हैं। ऐसे में किराये को लेकर विवाद या अतिरिक्त रकम की मांग उनकी परेशानी बढ़ा सकती है। होटल कारोबार से जुड़े इस तरह के आरोपों की निष्पक्ष जांच और शिकायतों पर प्रभावी कार्रवाई की जरूरत महसूस की जा रही है। सवाल यह है कि आखिर होटल में ठहरने से पहले पर्यटकों को सभी शर्तों की स्पष्ट जानकारी क्यों नहीं मिलती? यदि अतिरिक्त शुल्क की जानकारी पहले ही दे दी जाए तो विवाद की गुंजाइश कम हो सकती है। वहीं, संदिग्ध गतिविधियों से जुड़े आरोपों की जांच भी संबंधित विभागों के लिए जरूरी है, ताकि पर्यटन की आड़ में किसी भी तरह की अनियमितता को बढ़ावा न मिले।

उज्जैन का ‘ऑटो कोड’ मॉडल, यूपी में भी हो लागू

उज्जैन का ‘ऑटो कोड’ मॉडल, यूपी में भी हो लागू 

चार अंकों की पहचान बताएगी चालक की पूरी कुंडली, सामान छूटे तो तलाश आसान—यात्री सुरक्षा के साथ जवाबदेही भी तय

सुरेश गांधी

उज्जैन। महाकाल की नगरी में देशभर से आने वाले श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए ऑटो-ई-रिक्शा की पहचान को लेकर अपनाई जा रही व्यवस्था दूसरे शहरों के लिए भी मिसाल बन सकती है। यहां ऑटो और ई-रिक्शा को यूनिक नंबर/कोड से चिह्नित करने की व्यवस्था की गई है। यातायात पुलिस के रिकॉर्ड में वाहन के साथ चालक के लाइसेंस और अन्य विवरण दर्ज किए जा रहे हैं। बिना यूनिक कोड के संचालित वाहनों पर कार्रवाई भी की जा रही है।

सवारी उतरी और सामान छूटा तो कोड बनेगा सहारा

यात्री अक्सर ऑटो से उतरते समय मोबाइल, बैग, पर्स अथवा जरूरी सामान भूल जाते हैं। कई बार वाहन का नंबर याद नहीं रहता, जिससे उसे तलाशना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में ऑटो पर प्रदर्शित चार अंकों का विशिष्ट कोड याद रह जाए तो पुलिस के लिए संबंधित वाहन और चालक तक पहुंचना आसान हो सकता है। यही व्यवस्था दुर्घटना, विवाद या किसी आपराधिक घटना की स्थिति में भी उपयोगी हो सकती है। उज्जैन में इस दिशा में पुलिस रिकॉर्ड को डिजिटल रूप से अपडेट करने की व्यवस्था की जा रही है। रिपोर्टों के अनुसार चालक के लाइसेंस और अन्य विवरण को यूनिक नंबर से जोड़ने का उद्देश्य वाहन की पहचान और यातायात प्रबंधन को आसान बनाना है।

यात्री के लिए सिर्फ नंबर, पुलिस के पास पूरी जानकारी

इस व्यवस्था की खासियत यह हो सकती है कि सार्वजनिक रूप से केवल चार अंकों का कोड दिखाई दे, जबकि पुलिस के डिजिटल रिकॉर्ड में उसी कोड से चालक का नाम, पता, मोबाइल नंबर, वाहन नंबर, लाइसेंस और सत्यापन संबंधी विवरण जुड़ा रहे। इससे यात्री को चालक की निजी जानकारी सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करने की जरूरत भी नहीं होगी और शिकायत की स्थिति में पुलिस के पास पहचान का तत्काल आधार रहेगा।उज्जैन में रेलवे क्षेत्र में यात्रियों के लिए एक अलग सत्यापन पहल में क्यूआर कोड के जरिए चालक का नाम, पता, मोबाइल नंबर, वाहन पंजीयन, लाइसेंस और पुलिस सत्यापन जैसी जानकारी उपलब्ध कराने की व्यवस्था भी शुरू की गई है।

यूपी में क्यों जरूरी है ऐसी व्यवस्था?

उत्तर प्रदेश के काशी, अयोध्या, मथुरा-वृंदावन, प्रयागराज, विंध्याचल और अन्य धार्मिक-पर्यटन केंद्रों में रोजाना बड़ी संख्या में बाहर से यात्री पहुंचते हैं। अनजान शहर में यात्री ऑटो चालक की पहचान से अनभिज्ञ रहता है। ऐसे में ऑटो की एक नजर आने वाली विशिष्ट पहचान यात्री और पुलिस—दोनों के लिए सुरक्षा कवच बन सकती है।यूपी पुलिस भी कई स्थानों पर ऑटो-ई-रिक्शा पर चालक का नाम, मोबाइल नंबर और पता अंकित करने तथा रूट नंबर स्पष्ट करने के निर्देश दे चुकी है।

चार अंक का कोड बने ‘सुरक्षा नंबर’

यूपी में परिवहन विभाग और पुलिस मिलकर प्रत्येक ऑटो-ई-रिक्शा का सत्यापन कर उसे चार अंकों का यूनिक कोड दे सकते हैं। कोड वाहन के आगे, पीछे और अंदर स्पष्ट रूप से लिखा जाए। इसके साथ क्यूआर कोड की सुविधा भी जोड़ी जा सकती है। यात्री के लिए याद रखना आसान, पुलिस के लिए पहचानना आसान और चालक के लिए जवाबदेही तय।

एक कोड से तीन फायदे

सुरक्षा: यात्री को वाहन की पहचान का भरोसा।

सामान की वापसी: ऑटो में छूटा सामान मिलने पर वाहन की तलाश आसान।

अपराध नियंत्रण: शिकायत या घटना होने पर चालक तक पहुंचने में पुलिस को मदद।

काशी से उठे यूपी के लिए सुझाव

उज्जैन की व्यवस्था को देखकर यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब धार्मिक नगरी में यात्रियों की सुरक्षा के लिए ऑटो को विशिष्ट पहचान से जोड़ा जा सकता है, तो काशी समेत यूपी के प्रमुख धार्मिक और पर्यटन शहरों में ऐसा प्रयोग क्यों न हो? ‘ऑटो कोड’ महज चार अंक नहीं—यात्री की सुरक्षा, चालक की पहचान और पुलिस की जवाबदेही को जोड़ने वाली एक छोटी लेकिन प्रभावी कड़ी बन सकता है।

होटलों में पर्यटकों से अवैध वसूली की चर्चा, मनमाने किराये से बढ़ी परेशानी

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