Wednesday, 29 July 2026

काशी में गुरु वंदना का महापर्व: मठ, मंदिर और आश्रमों में उमड़ी श्रद्धा

काशी में गुरु वंदना का महापर्व: मठ, मंदिर और आश्रमों में उमड़ी श्रद्धा 

वेदपाठ, चरण पूजन, भंडारे और सत्संग से दिनभर गूंजती रही धर्मनगरी

सुरेश गांधी

वाराणसी. गुरु पूर्णिमा पर बुधवार को काशी की आध्यात्मिक धड़कन अपने चरम पर रही। भोर की पहली आरती के साथ ही मठों, मंदिरों और आश्रमों के कपाट खुले और गुरु वंदना का महापर्व आरंभ हो गया। गंगा तट से लेकर शहर के प्राचीन अखाड़ों तक श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगी रहीं। वेदपाठ, चरण पूजन, भजन-कीर्तन, सत्संग और भंडारों ने पूरी काशी को आध्यात्मिक उत्सव में बदल दिया। सबसे अधिक श्रद्धालु श्री काशी विश्वनाथ धाम, कालभैरव मंदिर, संकटमोचन मंदिर, दुर्गाकुंड, तुलसी मानस मंदिर और अन्नपूर्णा मंदिर में पहुंचे। 

मंदिरों में विशेष श्रृंगार किया गया और गुरु-शिष्य परंपरा पर प्रवचन हुए। संकटमोचन परिसर में सुंदरकांड पाठ और सामूहिक हनुमान चालीसा का आयोजन देर शाम तक चलता रहा। काशी विश्वनाथ मंदिर में भव्य एवं विशेष आरती का आयोजन किया गया। इस अवसर पर बाबा विश्वनाथ का दिव्य श्रृंगार कर उन्हें राजसी पोशाक धारण कराई गई। मंदिर परिसर में देर रात तक दर्शन-पूजन का सिलसिला जारी रहा।

गढ़वाघाट स्थित संतमत पीठ पर गुरु स्वामी सरनानंद जी महाराज के दर्शन हेतु सुबह से ही श्रद्धालुओं का रेला उमड़ पड़ा। पूरा आश्रम क्षेत्र भक्ति, अनुशासन और अध्यात्म से सराबोर रहा। भक्तों ने उनके श्रीचरणों में वंदन कर पादुका पूजन किया। भजनों की मधुर ध्वनि और मंत्रोच्चार से आश्रम गूंज उठा। कबीरचौरा मठ में संत कबीर की वाणी का अखंड पाठ हुआ। सारनाथ स्थित बौद्ध विहारों में भी गुरु पूर्णिमा को धर्मचक्र प्रवर्तन दिवस के रूप में मनाया गया। सीर गोवर्धनपुर स्थित संत रविदास मंदिर में विशेष गुरु पूजन और कीर्तन हुआ। संत रविदास की 650वीं जयंती वर्ष के अवसर पर समरसता संकल्प के साथ श्रद्धालुओं ने सामाजिक सद्भाव का संदेश दिया। मंदिर परिसर में भव्य भंडारे का आयोजन किया गया, जिसमें हजारों लोगों ने प्रसाद ग्रहण किया।

जंगमबाड़ी मठ, निर्वाणी अखाड़ा, निरंजनी अखाड़ा, दशनाम संन्यासी आश्रम, रामानुज एवं वैष्णव मठों में शिष्यों ने अपने गुरुओं का पाद पूजन कर आशीर्वाद लिया। अस्सी, तुलसी और पंचगंगा घाट पर सुबह से ही साधु-संतों की मंडलियां जुटीं। गंगा स्नान के बाद श्रद्धालुओं ने अपने गुरुओं का तिलक कर चरण स्पर्श किया। शाम को दशाश्वमेध घाट की गंगा आरती में गुरु पूर्णिमा की विशेष आरती उतारी गई, जिसमें देशभर से आए श्रद्धालु शामिल हुए।

गुरु पूर्णिमा की इस संध्या पर काशी ने एक बार फिर अपनी सनातन पहचान को जीवंत किया। मंदिरों की घंटियां, वेदों की ऋचाएं, संतों के उपदेश और गंगा की लहरों के बीच धर्मनगरी ने यह संदेश दिया कि गुरु केवल परंपरा नहीं, बल्कि समाज को प्रकाश देने वाली शाश्वत चेतना हैं। “गुरु वह भगवंत प्रसाद हैं, जिन्हें प्राप्त कर जीवन धन्य हो जाता है। गुरु ही जागरण के द्वार खोलते हैं और आचरण को धर्ममय बनाते हैं। ईश्वर तक पहुंचने का पथ गुरु ही दिखाता है। उन्होंने युवाओं से संयम, सेवा और साधना को जीवन का आधार बनाने का आह्वान किया।

मणिकर्णिका घाट स्थित सतुआ बाबा आश्रम में सतुआ बाबा रणछोड़ दास और षष्ठपीठाधीश्वर यमुनाचार्य महाराज की चरण पादुकाओं का विशेष पूजन हुआ। महामंडलेश्वर संतोष दास ने कहा  गुरु जीवन जीने की दिशा देते हैं। शांति, भाईचारा और परिवार में सुख-समृद्धि का मार्ग सनातन धर्म ही सिखाता है। बाबा कीनाराम स्थली क्रींकुंड शिवाला में प्रातः आरती, श्रमदान और अघोरेश्वर की समाधियों का पूजन हुआ, जबकि पड़ाव स्थित अवधूत भगवान राम आश्रम में पीठाधीश्वर गुरु पद संभव राम का विशेष पूजन-अर्चन संपन्न हुआ।

लोककल्याण की कामना संग योगी ने टेका बाबा विश्वनाथ के दर पर माथा

लोककल्याण की कामना संग योगी ने टेका बाबा विश्वनाथ के दर पर माथा 

काल भैरव मंदिर में विधि-विधान से पूजन, श्रद्धालुओं की सुविधा-सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने के निर्देश

सुरेश गांधी

वाराणसी. गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर गोरक्षपीठाधीश्वर एवं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बुधवार को श्री काशी विश्वनाथ धाम और काशी के कोतवाल बाबा काल भैरव मंदिर में दर्शन-पूजन कर प्रदेश और देशवासियों के सुख, समृद्धि तथा लोककल्याण की कामना की। श्रावण मास की पूर्व संध्या पर मुख्यमंत्री का यह काशी प्रवास आध्यात्मिक आस्था और जनकल्याण के संदेश के रूप में देखा गया।

मुख्यमंत्री सबसे पहले बाबा काल भैरव मंदिर पहुंचे, जहां उन्होंने विधि-विधान से पूजा-अर्चना और आरती कर आशीर्वाद प्राप्त किया। मंदिर परिसर में उपस्थित श्रद्धालुओं ने उनका स्वागत किया और मुख्यमंत्री ने हाथ जोड़कर सभी का अभिवादन स्वीकार किया। 

इसके बाद योगी आदित्यनाथ श्री काशी विश्वनाथ धाम पहुंचे। गर्भगृह में उन्होंने षोडशोपचार विधि से बाबा विश्वनाथ का पूजन किया और प्रदेश तथा राष्ट्र की सुख-शांति, समृद्धि एवं लोकमंगल की प्रार्थना की। उनके दर्शन के दौरान धाम परिसर हर-हर महादेव के जयघोष से गूंज उठा और पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया।

दर्शन-पूजन के बाद मुख्यमंत्री ने मंदिर परिसर में मौजूद अधिकारियों के साथ श्रावण मास की व्यवस्थाओं की समीक्षा की। उन्होंने स्पष्ट निर्देश दिए कि सावन में आने वाले लाखों श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो। सुगम दर्शन, सुरक्षा, स्वच्छता, पेयजल, चिकित्सा सहायता और भीड़ प्रबंधन की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित करने को कहा गया, ताकि श्रद्धालुओं को सहज एवं व्यवस्थित दर्शन का लाभ मिल सके।

दर्शन के उपरांत मुख्यमंत्री ने मंदिर परिसर में मौजूद बच्चों को चॉकलेट वितरित की और स्नेहपूर्वक दुलार किया। उनके इस आत्मीय व्यवहार से बच्चे और उनके परिजन उत्साहित दिखाई दिए। पूजन-अर्चन के दौरान केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल, राज्यसभा सांसद तरुण चुग तथा प्रदेश के समाज कल्याण राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) असीम अरुण सहित कई जनप्रतिनिधि एवं अधिकारी उपस्थित रहे.

रविदास घाट पर दीपों से जगमगाई काशी, समरसता दीप अभियान का शुभारंभ

रविदास घाट पर दीपों से जगमगाई काशी, समरसता दीप अभियान का शुभारंभ 

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने संत रविदास प्रतिमा पर माल्यार्पण कर किया दीपोत्सव का उद्घाटन

सुरेश गांधी

वाराणसी। संत शिरोमणि गुरु रविदास महाराज के 650वें प्रकाश पर्व वर्ष के अवसर पर मंगलवार की शाम काशी आध्यात्मिक आभा और सामाजिक समरसता के संदेश से आलोकित हो उठी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने श्री काशी विश्वनाथ मंदिर और कालभैरव मंदिर में दर्शन-पूजन कर प्रदेश की सुख-समृद्धि की कामना की। इसके बाद उन्होंने नगवां स्थित रविदास पार्क पहुंचकर संत रविदास की प्रतिमा पर माल्यार्पण एवं पुष्पांजलि अर्पित की।

मुख्यमंत्री ने संत रविदास के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए उनके समता, श्रमसम्मान और मानवता के संदेश को आज के समाज के लिए अत्यंत प्रासंगिक बताया। उन्होंने कहा कि संत रविदास की वाणी समाज को भेदभाव से ऊपर उठकर मानवता के पथ पर चलने की प्रेरणा देती है। इसके पश्चात मुख्यमंत्री रविदास घाट पहुंचे, जहां उन्होंने दीप प्रज्ज्वलित कर 'गुरु रविदास महाराज समरसता दीप अभियान' का शुभारंभ किया। मुख्यमंत्री के दीप प्रज्ज्वलन के साथ ही गंगा तट पर हजारों दीप एक साथ जल उठे और पूरा रविदास घाट स्वर्णिम प्रकाश से जगमगा उठा। गंगा की लहरों पर झिलमिलाते दीपों का दृश्य श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत आकर्षण का केंद्र रहा।

समरसता दीप अभियान के अंतर्गत घाट पर उपस्थित संत-महात्माओं, सामाजिक संगठनों, युवाओं और महिलाओं ने दीप जलाकर सामाजिक सद्भाव और समानता का संकल्प लिया। कार्यक्रम स्थल पर संत रविदास के पदों का गायन, भजन और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां भी हुईं, जिससे वातावरण पूरी तरह भक्तिमय बना रहा। मुख्यमंत्री ने कहा कि संत रविदास ने जिस ऐसे समाज की कल्पना की थी जहां सबको सम्मान, अवसर और अन्न मिले, उसी आदर्श को आत्मसात कर समरस भारत के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ना होगा। उन्होंने युवाओं से संतों की शिक्षाओं को जन-जन तक पहुंचाने का आह्वान किया।

रविदास घाट पर आयोजित दीपोत्सव को लेकर प्रशासन ने व्यापक व्यवस्था की थी। घाट परिसर को आकर्षक प्रकाश सज्जा से सजाया गया था तथा सुरक्षा, यातायात और श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए विशेष प्रबंध किए गए थे। बड़ी संख्या में श्रद्धालु, संत समाज और स्थानीय नागरिक कार्यक्रम में शामिल हुए। काशी में आयोजित यह दीपोत्सव केवल धार्मिक आयोजन नहीं रहा, बल्कि संत रविदास के समरस समाज के संदेश को जनमानस तक पहुंचाने का सशक्त सांस्कृतिक अभियान बनकर उभरा। गंगा तट पर जलते दीपों ने मानो यह संदेश दिया कि संत परंपरा की ज्योति आज भी समाज को एकता, समानता और सद्भाव की दिशा दिखा रही है। 

योगी का समरसता सूत्र और उत्तर भारत का नया सियासी समीकरण

संतों की वाणी, सत्ता की रणनीति और उत्तर भारत का बदलता बहुजन समीकरण 

काशी ने अनेक राजवंशों का उत्थान-पतन देखा है, पर इस बार गंगा किनारे गूंजे मंत्रों के बीच राजनीति की एक नई ध्वनि भी सुनाई दी। संत रविदास के 650वें प्रकाश पर्व पर सीर गोवर्धनपुर में सजा मंच केवल श्रद्धा, भक्ति और परंपरा का उत्सव नहीं था; वह उत्तर भारत की बदलती सामाजिक संरचना का सार्वजनिक पाठ भी था। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने संबोधन में संत रविदास, महर्षि वाल्मीकि, निषादराज और माता शबरी जैसे प्रतीकों को जिस क्रम और आग्रह के साथ सामने रखा, उसने यह संकेत दिया कि भाजपा अब सांस्कृतिक स्मृतियों के माध्यम से नए सामाजिक गठबंधन गढ़ने की कोशिश कर रही है। काशी से पंजाब तक संत परंपरा की कड़ी जोड़ना, रविदासिया समाज का विशेष उल्लेख करना और समरसता अभियान को 2027 तक ले जाने की घोषणा राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। 

यह वही समय है जब उत्तर प्रदेश और पंजाब दोनों राज्यों में चुनावी तैयारियां निर्णायक चरण में प्रवेश करेंगी। इसलिए यह आयोजन धार्मिक आस्था से कहीं अधिक व्यापक अर्थ ग्रहण करता है। इसमें दलित सम्मान, ओबीसी प्रतिनिधित्व, सांस्कृतिक पहचान, कल्याणकारी राजनीति और चुनावी गणितसभी एक साथ उपस्थित दिखाई देते हैं। प्रश्न अब केवल यह नहीं है कि संत रविदास का सम्मान कैसे हो; प्रश्न यह भी है कि क्या सांस्कृतिक प्रतीकों के सहारे सामाजिक न्याय की नई राजनीति गढ़ी जा सकती है और क्या काशी से उठा यह संदेश पूरे उत्तर भारत की राजनीति का नया सूत्र बन पाएगा

सुरेश गांधी 

गंगा के तट पर बसी काशी ने सदियों से संतों की वाणी सुनी है, पर इतिहास में कुछ क्षण ऐसे भी आते हैं जब वही वाणी राजनीति की दिशा बदलती दिखाई देती है। संत शिरोमणि गुरु रविदास के 650वें प्रकाश पर्व पर सीर गोवर्धनपुर में सजा मंच केवल श्रद्धा का मंच नहीं था; वह उत्तर भारत की बदलती सामाजिक राजनीति का दर्पण भी था। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के भाषण में भक्ति थी, पर उससे अधिक महत्वपूर्ण थे वे प्रतीक जिनके माध्यम से उन्होंने भविष्य की राजनीति की रेखाएं खींचीं। रविदास, वाल्मीकि, निषादराज और शबरी का एक साथ स्मरण आकस्मिक नहीं था; यह उत्तर भारत के अलग-अलग सामाजिक द्वारों पर एक साथ दस्तक थी। काशी से जालंधर तक संत परंपरा की कड़ी जोड़ना, पंजाब के रविदासिया समाज का विशेष उल्लेख करना और समरसता अभियान को राष्ट्रीय स्वरूप देना इस बात का संकेत है कि भाजपा अब केवल पारंपरिक हिंदुत्व की राजनीति तक सीमित नहीं रहना चाहती। वह संत-समाज आधारित सामाजिक विस्तार की नई रणनीति गढ़ रही है। इसका सबसे स्पष्ट संकेत भदोही को पुनःसंत रविदास नगरकी स्थायी पहचान देने की घोषणा में दिखाई दिया। यह महज प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि बहुजन राजनीति के एक पुराने प्रतीकात्मक संघर्ष की नई व्याख्या है।

भदोही जनपद का गठन 30 जून 1994 को हुआ था। बाद में मायावती सरकार ने इसका नाम संत रविदास नगर किया, फिर समाजवादी पार्टी सरकार ने पुनः भदोही नाम बहाल कर दिया। अब योगी आदित्यनाथ ने संत रविदास जयंती वर्ष के अवसर पर स्पष्ट संकेत दिया है कि जिले की पहचान संत रविदास नगर के रूप में ही बनी रहेगी। इस घोषणा ने यह संदेश दिया कि भाजपा दलित प्रतीकों पर वैचारिक और राजनीतिक दावेदारी मजबूत करना चाहती है। 

यह अलग बात है कि घोषणा के कुछ ही घंटों बाद भदोही में एक नया विमर्श भी तेज हो गया। कालीन निर्यातकों, उद्यमियों और व्यापारिक संगठनों के एक वर्ग ने मांग उठाई कि जिले का नामभदोहीही रहने दिया जाए। उनका तर्क है कि विश्व बाजार में भारतीय हस्तनिर्मित कालीनों की पहचान दशकों सेभदोही कार्पेटके नाम से स्थापित है। अमेरिका, यूरोप, पश्चिम एशिया और एशियाई बाजारों में निर्यात होने वाले कालीनों पर “Bhadohi” एक ब्रांड की तरह दर्ज है; ऐसे में नाम परिवर्तन से अंतरराष्ट्रीय पहचान और विपणन पर असर पड़ने की आशंका व्यक्त की जा रही है। कई उद्यमियों का कहना है कि यह केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि आर्थिक और ब्रांड वैल्यू से जुड़ा प्रश्न है।

वहीं संत रविदास के अनुयायियों और सामाजिक संगठनों का एक वर्ग चाहता है कि जिले का नामसंत रविदास नगर भदोहीरखा जाए, ताकि संत रविदास की गरिमा भी बनी रहे और ऐतिहासिक-व्यावसायिक पहचान भी सुरक्षित रहे। उनका कहना है कि संत रविदास की जन्मभूमि का सम्मान सर्वोपरि है, किंतुभदोहीशब्द हटने से कालीन उद्योग से जुड़ी वैश्विक पहचान को अनावश्यक संकट में डालना उचित नहीं होगा। इस तरह नाम परिवर्तन का प्रश्न अब केवल राजनीति तक सीमित नहीं रहा; वह आस्था, अस्मिता और अर्थव्यवस्थातीनों के संगम पर खड़ा दिखाई दे रहा है। फिरहाल, बड़ा प्रश्न यह है कि क्या नाम परिवर्तन सामाजिक परिवर्तन का पर्याय बन सकता है? संत रविदास का स्वप्न केवल सम्मानजनक संबोधन नहीं, बल्कि जाति-विहीन, श्रमसम्मानित और समान अवसर वाले समाज का था। यदि शिक्षा, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और सम्मान के अवसरों में वास्तविक बदलाव नहीं आता, तो प्रतीकों की चमक स्थायी परिवर्तन का विकल्प नहीं बन सकती।

योगी आदित्यनाथ ने संत रविदास की प्रसिद्ध पंक्तिऐसा चाहूं राज मैं, जहां मिले सबन को अन्नको प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना से जोड़ते हुए कहा कि करोड़ों लोगों को नि:शुल्क राशन उपलब्ध कराया जा रहा है। यहां संत परंपरा और कल्याणकारी राज्य की नीति को एक सूत्र में बांधने का प्रयास दिखाई देता है। भाजपा की राजनीति में यह प्रवृत्ति लगातार मजबूत हुई है कि संतों और लोकनायकों की वाणी को सरकारी योजनाओं की वैधता के साथ जोड़ा जाए। काशी का चयन भी अत्यंत अर्थपूर्ण है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र होने के कारण यह शहर भाजपा की सांस्कृतिक राजनीति का राष्ट्रीय मंच बन चुका है। समरसता संकल्प अभियान को फरवरी 2027 तक चलाने का निर्णय बताता है कि इसे एक दिन के समारोह की बजाय दीर्घकालिक सामाजिक संपर्क अभियान के रूप में देखा जा रहा है। कलश यात्रा, संत संपर्क, समरसता यात्रा और युवा संवाद जैसे कार्यक्रम बूथ स्तर तक सांस्कृतिक-सामाजिक नेटवर्क तैयार करने की कोशिश का संकेत देते हैं। 

संतों का मंच और चुनावी गणित 

इस पूरे आयोजन का राजनीतिक पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण था। सीर गोवर्धनपुर के मंच पर धार्मिक संतों के साथ बड़ी संख्या में ओबीसी और दलित नेतृत्व की उपस्थिति ने यह स्पष्ट कर दिया कि भाजपा सामाजिक प्रतिनिधित्व का नया दृश्य निर्मित करना चाहती है। मंच पर उत्तर प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड और दिल्ली से आए अनेक नेता मौजूद थे। उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य, राष्ट्रीय महामंत्री दुष्यंत गौतम, मंत्री असीम अरुण, हंसराज विश्वकर्मा, संजीव गौड़, क्षेत्रीय अध्यक्ष अशोक चौरसिया सहित कई प्रमुख चेहरे ओबीसी और दलित समाज से आते हैं। यह उपस्थिति केवल औपचारिक नहीं थी; यह सामाजिक विस्तार की दृश्य राजनीति थी। करीब सात महीने तक चलने वाले इस अभियान का समापन फरवरी 2027 में प्रस्तावित है। राजनीतिक दृष्टि से यह समय अत्यंत महत्वपूर्ण है। पंजाब विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज होंगी और उत्तर प्रदेश में भी आगामी विधानसभा चुनावों की पृष्ठभूमि बनने लगेगी। ऐसे समय में काशी से शुरू हुआ यह अभियान भाजपा को दलित और अति पिछड़े समुदायों के बीच नए संवाद का अवसर देता है। 

लगभग हर वक्ता ने संत रविदास के समता, सामाजिक न्याय और जाति-विहीन समाज के संदेश को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की योजनाओं और भाजपा सरकार की नीतियों से जोड़ने का प्रयास किया। पंजाब इस रणनीति का विशेष केंद्र है। डोआबा क्षेत्र में रविदासिया समाज का व्यापक सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव है और कई विधानसभा क्षेत्रों में उसकी भूमिका निर्णायक मानी जाती है। सीर गोवर्धनपुर स्थित संत रविदास जन्मस्थली का भावनात्मक संबंध पंजाब के लाखों अनुयायियों से जुड़ा है। काशी से मिट्टी भेजने और विशेष रेल सेवाओं जैसी घोषणाओं ने उत्तर प्रदेश और पंजाब के बीच साझा सांस्कृतिक-सामाजिक सेतु का संदेश दिया है। काशी का यह आयोजन अंततः भाजपा की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है जिसमें सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, कल्याणकारी राजनीति और बहुजन प्रतीकों को एक साझा राजनीतिक आख्यान में पिरोया जा रहा है। योगी आदित्यनाथ का भाषण इस नई राजनीति का घोषणापत्र जैसा था, जहां संत परंपरा केवल आस्था नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिनिधित्व और राजनीतिक विस्तार का माध्यम बनती दिखाई देती है। आने वाले चुनाव तय करेंगे कि काशी से निकला यह समरसता सूत्र उत्तर प्रदेश की सीमाओं से आगे बढ़कर पूरे उत्तर भारत के सामाजिक मानस में कितनी गहराई तक उतर पाता है।

समरसता से स्टार्टअप तक : क्या बदल रहा है उत्तर प्रदेश का विकास विमर्श?

काशी के समरसता अभियान के समानांतर उत्तर प्रदेश की राजनीति का एक दूसरा चेहरा भी तेजी से उभर रहा हैआर्थिक पुनर्निर्माण और प्रतिभा की वापसी का। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लगातार यह संदेश दे रहे हैं कि उत्तर प्रदेश केवल धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का प्रदेश नहीं, बल्कि निवेश, नवाचार और उद्यमिता का नया केंद्र बनना चाहता है। सरकार का दावा है कि राज्य में 21 हजार से अधिक स्टार्टअप सक्रिय हैं और अनेक यूनिकॉर्न तथा उच्च-विकास वाली कंपनियों का पारिस्थितिकी तंत्र तैयार हो चुका है। यदि यह परिवर्तन स्थायी रूप लेता है तो उत्तर प्रदेश रोजगार मांगने वाले राज्य से रोजगार पैदा करने वाले राज्य में बदल सकता है। इस नीति का एक महत्वपूर्ण पक्ष महिला उद्यमिता है। महिला नेतृत्व वाले स्टार्टअप को अतिरिक्त अनुदान, सहायता केंद्रों में आरक्षित सीटें और प्रशिक्षण सुविधाएं देकर सरकार आर्थिक भागीदारी का दायरा बढ़ाना चाहती है। पूर्वांचल और अन्य अपेक्षाकृत पिछड़े क्षेत्रों में स्टार्टअप प्रोत्साहन योजनाएं क्षेत्रीय असंतुलन कम करने की दिशा में भी देखी जा रही हैं। एक ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था का लक्ष्य अब केवल राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि निवेश आकर्षित करने की प्रतिस्पर्धा का औजार बन चुका है। वैश्विक प्रौद्योगिकी कंपनियों के साथ संवाद और निवेश प्रक्रियाओं के सरलीकरण के प्रयास इसी रणनीति का हिस्सा हैं। सरकार यह भी कह रही है कि वह राज्य से बाहर गई प्रतिभा को वापस बुलाना चाहती है। यहीं इस पूरी बहस का सबसे दिलचस्प मोड़ है। एक ओर संत परंपरा के प्रतीकों के माध्यम से सामाजिक समरसता का संदेश दिया जा रहा है, दूसरी ओर स्टार्टअप और निवेश के माध्यम से आर्थिक अवसरों का नया आख्यान रचा जा रहा है। यदि सामाजिक सम्मान और आर्थिक अवसर दोनों साथ चलते हैं तो यह मॉडल व्यापक राजनीतिक स्वीकार्यता प्राप्त कर सकता है। लेकिन यदि सांस्कृतिक प्रतीकवाद आर्थिक वास्तविकताओं पर भारी पड़ता है, तो समरसता का संदेश सीमित प्रभाव तक सिमट सकता है। उत्तर प्रदेश की राजनीति आज शायद इसी दोराहे पर खड़ी हैपहचान की राजनीति और अवसर की राजनीति के संगम पर। काशी का मंच इस नए प्रयोग का प्रतीक बन चुका है; अब देखना यह है कि यह प्रयोग चुनावी लाभ से आगे बढ़कर सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन की स्थायी दिशा बन पाता है या नहीं। 

काशी में गुरु वंदना का महापर्व: मठ, मंदिर और आश्रमों में उमड़ी श्रद्धा

काशी में गुरु वंदना का महापर्व: मठ, मंदिर और आश्रमों में उमड़ी श्रद्धा  वेदपाठ, चरण पूजन, भंडारे और सत्संग से दिनभर गूंजती रही धर्मनगरी ...