‘योगी मॉडल’ और भारतीय परंपरा का नया विमर्श
भारतीय सभ्यता में धर्म और शासन का संबंध सदियों पुराना है। यहां सत्ता और साधना को हमेशा परस्पर विरोधी नहीं माना गया, बल्कि संतुलन की दृष्टि से देखा गया। प्राचीन ग्रंथों में “राजऋषि” की अवधारणा इसी संतुलन का प्रतीक हैकृजहां राजा आध्यात्मिक चेतना से संचालित होता है और ऋषि समाज के मार्गदर्शक होते हैं। आज जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जैसे संन्यासी पृष्ठभूमि के नेता लोकतांत्रिक शासन का नेतृत्व करते हैं, तो यह विमर्श फिर से प्रासंगिक हो जाता है कि क्या संत और सत्ता का संगम भारतीय परंपरा का विस्तार है या आधुनिक राजनीति का नया प्रयोग? हाल के दिनों में ज्योतिष पीठ से जुड़े शंकराचार्य माने जाने वाले स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती द्वारा दिए गए बयान, “संत तनख्वाह नहीं ले सकता” ने इस बहस को और तेज कर दिया है। ऐसे में आवश्यक है कि इस विषय को भावनाओं से नहीं, बल्कि इतिहास और परंपरा के संदर्भ में समझा जाए...
सुरेश गांधी
भारतीय ग्रंथों में “राजऋषि” शब्द
का उल्लेख कई स्थानों पर
मिलता है। इसका अर्थ
है, ऐसा शासक जो
आध्यात्मिक दृष्टि से परिपक्व हो
और शासन को लोककल्याण
का माध्यम माने। उदाहरण के रूप में
: मिथिला के राजा जनक,
जिन्हें ज्ञान और वैराग्य के
लिए जाना जाता है,
महाभारत काल में विदुर,
जिन्होंने नीति और धर्म
का संतुलन प्रस्तुत किया. यह परंपरा बताती
है कि भारतीय चिंतन
में शासन और आध्यात्मिकता
को अलग-अलग खांचों
में नहीं बांटा गया।
सनातन परंपरा में संन्यास का
अर्थ केवल जंगलों में
तपस्या करना नहीं रहा।
अनेक संन्यासियों ने समाज और
राष्ट्र के लिए सक्रिय
भूमिका निभाई। उदाहरण
के लिए : स्वामी विवेकानंद ने आध्यात्मिकता को
राष्ट्रीय जागरण से जोड़ा, स्वामी
दयानंद सरस्वती ने सामाजिक सुधार
आंदोलन चलाया. इन उदाहरणों से
स्पष्ट है कि संत
परंपरा समय के अनुसार
सामाजिक भूमिका भी ग्रहण करती
रही है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था और संत नेतृत्व
भारत आज एक
लोकतांत्रिक गणराज्य है, जहां शासन
जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों
के माध्यम से चलता है।
इस व्यवस्था में कोई भी
नागरिक, चाहे वह साधु
हो, शिक्षक हो या किसान,
चुनाव लड़ सकता है।
योगी आदित्यनाथ का राजनीतिक जीवन
भी इसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया
का परिणाम है। वे गोरक्षपीठ
की परंपरा से आते हैं,
जहां धार्मिक नेतृत्व और सामाजिक सेवा
का लंबा इतिहास रहा
है। गोरखनाथ परंपरा में मठ केवल
आध्यात्मिक केंद्र नहीं, बल्कि सामाजिक गतिविधियों का केंद्र भी
रहा है, शिक्षा, स्वास्थ्य
और जनसेवा से जुड़ा। धर्मशास्त्रीय
दृष्टि से संन्यास का
अर्थ व्यक्तिगत संपत्ति का त्याग है।
लेकिन आधुनिक लोकतांत्रिक पद का वेतन
व्यक्तिगत पेशे का वेतन
नहीं, बल्कि संवैधानिक मानदेय होता है। यहां
दो महत्वपूर्ण अंतर हैं : निजी
आय व संवैधानिक पद
का मानदेय. भारतीय संविधान के अनुसार मुख्यमंत्री
का वेतन पद से
जुड़ा है, व्यक्ति से
नहीं। इसलिए इसे आध्यात्मिक नियमों
के संदर्भ में सीधे जोड़ना
सरल निष्कर्ष हो सकता है,
लेकिन पूर्णतः सटीक नहीं।
धार्मिक मंचों से राजनीतिक टिप्पणी : परंपरा या परिवर्तन?
भारतीय समाज में धार्मिक
व्यक्तित्वों का प्रभाव व्यापक
होता है। इसलिए जब
धार्मिक मंच से राजनीतिक
टिप्पणी आती है, तो
उसका प्रभाव भी बड़ा होता
है। लेकिन इतिहास बताता है कि संतों
ने समय-समय पर
सामाजिक और राजनीतिक विषयों
पर मत व्यक्त किए
हैं। प्रश्न यह नहीं कि
संत बोलें या न बोलें,
प्रश्न यह है कि
क्या उनके तर्क ऐतिहासिक
और तथ्यात्मक आधार पर टिकते
हैं।
काशी और सांस्कृतिक पुनर्विकास का संदर्भ
यह बहस केवल
संत और राजनीति तक
सीमित नहीं है। इसका
संबंध वाराणसी में हुए सांस्कृतिक
पुनर्विकास से भी जुड़ा
है। विशेष रूप से काशी
विश्वनाथ मंदिर क्षेत्र के विस्तार ने
देशभर में चर्चा पैदा
की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल
पर विकसित इस परियोजना का
उद्देश्य था : तीर्थ सुविधाओं
का विस्तार, प्राचीन मंदिरों का संरक्षण, घाट
से मंदिर तक सीधा संपर्क.
हालांकि कुछ समूहों ने
पारंपरिक संरचना में बदलाव को
लेकर चिंता भी जताई। यही
से वैचारिक मतभेद उभरने लगे।
योगी मॉडल : आध्यात्मिक पृष्ठभूमि और प्रशासनिक प्रयोग
योगी आदित्यनाथ का
मॉडल भारतीय राजनीति में एक विशिष्ट
उदाहरण माना जाता है
: संन्यासी जीवनशैली, प्रशासनिक नेतृत्व, धार्मिक पहचान और राजनीतिक जिम्मेदारी.
यह मॉडल नया अवश्य
है, लेकिन भारतीय परंपरा से पूरी तरह
अलग नहीं। राजऋषि अवधारणा की आधुनिक व्याख्या
के रूप में इसे
देखा जा सकता है।
वैचारिक टकराव या परंपरा का विस्तार?
आज की बहस
को तीन स्तरों पर
समझा जा सकता है
: आध्यात्मिक आदर्श बनाम प्रशासनिक व्यवहार,
परंपरा बनाम आधुनिक लोकतंत्र,
धार्मिक भूमिका बनाम राजनीतिक जिम्मेदारी.
इन तीनों के बीच संतुलन
बनाना ही आधुनिक भारतीय
समाज की चुनौती है।
संत, सत्ता और समाज का बदलता समीकरण
भारतीय परंपरा स्थिर नहीं, गतिशील रही है। समय
के साथ उसकी व्याख्या
भी बदलती रही है। राजऋषि
से लोकतांत्रिक संत तक की
यह यात्रा बताती है कि धर्म
और शासन का संबंध
विरोध का नहीं, संतुलन
का रहा है। आज
आवश्यकता इस बात की
है कि वैचारिक मतभेद
संवाद में बदलें, क्योंकि
भारतीय सभ्यता की सबसे बड़ी
शक्ति यही रही है।
शताब्दी में हुए प्रमुख स्थापत्य परिवर्तनों का दौर
1. 1920 से 1940 : शिक्षा और सांस्कृतिक आधार
का स्थापत्य विस्तार. आधुनिक काशी के स्थापत्य
विकास की शुरुआत शिक्षा
से मानी जाती है।
1916 में स्थापित बनारस हिंदू विश्वविद्यालय ने शहर के
भौगोलिक और सांस्कृतिक विस्तार
को नई दिशा दी।
इस विश्वविद्यालय की स्थापना भारतरत्न
मदन मोहन मालवीय के
प्रयासों से हुई और
इसका परिसर भारतीय एवं औपनिवेशिक वास्तुकला
के मिश्रण का उदाहरण बना।
स्थापत्य विशेषताएंः- विशाल कैंपस योजना, मंदिर शैली की अकादमिक
इमारते, चौड़ी सड़कें और
नियोजित संरचना. यह काशी के
पारंपरिक गलियों वाले ढांचे से
अलग एक आधुनिक शहरी
अवधारणा थी।
2. 1940 से 1960 : घाटों का संरक्षण और
धार्मिक संरचनाओं का पुनर्संरक्षण. स्वतंत्रता
से पहले और बाद
के वर्षों में गंगा तट
के घाटों के संरक्षण पर
विशेष ध्यान दिया गया। विशेष
रूप से दशाश्वमेध घाट
क्षेत्र में मरम्मत और
संरचनात्मक सुदृढ़ीकरण हुआ। इन दशकों
में मुख्य उद्देश्य था : घाटों का
क्षरण रोकना, धार्मिक अनुष्ठानों के लिए स्थायी
संरचना, सीढ़ियों का पुनर्निर्माण. हालांकि
यह परिवर्तन सीमित स्तर पर थे
और शहर का पारंपरिक
स्वरूप काफी हद तक
यथावत रहा।
3. 1960 से 1990 : अनियोजित शहरी विस्तार और
संरचनात्मक दबाव. इस अवधि में
काशी तेजी से जनसंख्या
वृद्धि का सामना कर
रही थी। परिणामस्वरूप : पुराने
भवनों पर अतिरिक्त निर्माण,
संकरी गलियों में बहुमंजिला ढांचे,
मंदिरों और ऐतिहासिक संरचनाओं
का आवासीय भवनों के बीच दब
जाना. शहरी नियोजन अपेक्षाकृत
कमजोर रहा, जिससे कई
प्राचीन संरचनाएं दृश्य रूप से ओझल
हो गईं। यही वह
समय था जब भविष्य
में बड़े पैमाने पर
पुनर्विकास की आवश्यकता महसूस
की जाने लगी।
4. 1990 से 2014 : तीर्थ पर्यटन का दबाव और
आधारभूत ढांचे की चुनौती. 1990 के
बाद धार्मिक पर्यटन में तेज वृद्धि
हुई। काशी विश्वनाथ मंदिर
में दर्शनार्थियों की संख्या लगातार
बढ़ती गई, लेकिन : प्रवेश
मार्ग संकरे रहे, भीड़ प्रबंधन
सीमित रहा, सुरक्षा ढांचा
अपर्याप्त था. इसी दौरान
पहली बार व्यापक स्तर
पर मंदिर क्षेत्र के पुनर्विकास की
अवधारणा सामने आई, लेकिन भूमि
अधिग्रहण और संरचनात्मक जटिलताओं
के कारण योजनाएं आगे
नहीं बढ़ सकीं।
5. 2014 के बाद
: सांस्कृतिक पुनर्विकास का नया चरण.
2014 के बाद काशी के
स्थापत्य विकास को राष्ट्रीय स्तर
की परियोजना के रूप में
गति मिली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय
क्षेत्र होने के कारण
शहर में तीर्थ और
सांस्कृतिक अवसंरचना पर विशेष ध्यान
दिया गया। काशी विश्वनाथ
धाम परियोजना. इस परियोजना के
तहत : मंदिर परिसर का विस्तार, गंगा
घाट से सीधा कॉरिडोर,
तीर्थ सुविधा केंद्र, सांस्कृतिक दीर्घाएं. महत्वपूर्ण तथ्य : लगभग 5 लाख वर्ग फीट
क्षेत्र का विकास, 300 से
अधिक भवनों का अधिग्रहण, 40 से
अधिक प्राचीन मंदिर संरचनाओं की पुनर्खोज, कई
मंदिर जो पुराने मकानों
के भीतर छिप गए
थे, उन्हें संरक्षित कर पुनर्स्थापित किया
गया।
6. घाटों का
आधुनिक
पुनरोद्धार
: गंगा तट पर कई
घाटों का सौंदर्यीकरण किया
गया : प्रकाश व्यवस्था, पत्थर संरचना का सुदृढ़ीकरण, पर्यटक
सुविधाओं का विस्तार. इससे
धार्मिक पर्यटन के साथ सांस्कृतिक
पर्यटन को भी बढ़ावा
मिला।
7. शहरी यातायात
और
कॉरिडोर
विकास
: पिछले दशक में काशी
में कई सड़क परियोजनाएं
शुरू हुईं : रिंग रोड, फ्लाईओवर,
मल्टी-लेवल पार्किंग, इन
परियोजनाओं का उद्देश्य था
: पुरानी काशी पर यातायात
दबाव कम करना. तीर्थ
मार्गों को सुगम बनाना.
स्थापत्य परिवर्तन : सकारात्मक प्रभाव
तीर्थ सुविधाओं में सुधार : पर्यटन
वृद्धि, सांस्कृतिक पहचान का पुनर्प्रचार, संरचनात्मक
सुरक्षा.
उठे विवाद और चिंताएं
हर बड़े पुनर्विकास
की तरह काशी में
भी कुछ प्रश्न उठे
: पारंपरिक गलियों का स्वरूप बदलना,
पुराने मकानों का अधिग्रहण, सांस्कृतिक
स्मृति पर प्रभाव. विशेषज्ञों
का मानना है कि यह
बहस विश्व के हर ऐतिहासिक
शहर में देखने को
मिलती है।
काशी की स्थापत्य यात्रा : विनाश नहीं, पुनर्निर्माण की परंपरा
काशी का इतिहास
बताता है कि यहां
स्थापत्य परिवर्तन कोई नई प्रक्रिया
नहीं है। प्राचीन काल
में मंदिर बने, मध्यकाल में
कई संरचनाएं बदलीं, आधुनिक काल में पुनर्निर्माण
हुआ. यह शहर स्थिर
नहीं, बल्कि निरंतर विकसित होता रहा है।
परंपरा और आधुनिकता का संतुलन ही काशी की पहचान
पिछले 100 वर्षों का स्थापत्य विश्लेषण
स्पष्ट करता है कि
काशी का स्वरूप समय
के साथ बदलता रहा
है, लेकिन इसकी आध्यात्मिक आत्मा
स्थिर रही। आज चुनौती
यह नहीं कि परिवर्तन
हो या न हो,
बल्कि यह है कि
: परिवर्तन दस्तावेज आधारित हो, विरासत संरक्षित
रहे, सांस्कृतिक पहचान मजबूत बने. काशी का
इतिहास बताता है कि यहां
विकास और परंपरा विरोधी
नहीं, पूरक रहे हैं।
और शायद यही कारण
है कि काशी केवल
एक शहर नहीं, बल्कि
एक सतत सभ्यता का
जीवंत रूप है।



