सात समंदर पार गूंजा काशी का लोकस्वर
वाराणसी की
सरोज
वर्मा
के
नेतृत्व
में
10 सदस्यीय
भारतीय
दल
ने
पांच
दिनों
तक
सूरीनाम
में
बिखेरी
उत्तर
भारतीय
लोकसंस्कृति
की
खुशबू,
पहले
हेरिटेज
फेस्टिवल
में
भारत
की
भोजपुरी
परंपरा
बनी
आकर्षण
का
केंद्र
सुरेश गांधी
वाराणसी। सात समंदर पार...महाद्वीपों की दूरी लांघकर जब कजरी की तान उठी, सोहर के बोल गूंजे और विवाह गीतों की मिठास मंच पर उतरी तो वह महज संगीत नहीं था। वह स्मृतियों का लौटना था। अपनी मिट्टी, अपने गांव, अपने संस्कार और उन रिश्तों का लौटना था जिन्हें पीढ़ियां और समुद्र भी पूरी तरह मिटा नहीं पाए। दक्षिण अमेरिका के सूरीनाम में पहली बार आयोजित Suriname Heritage Festival में वाराणसी की लोकगायिका एवं आकाशवाणी-दूरदर्शन की ए-ग्रेड कलाकार सरोज वर्मा के नेतृत्व में पहुंचे 10 सदस्यीय भारतीय सांस्कृतिक दल ने भोजपुरी लोकसंगीत और लोकनृत्य के माध्यम से इसी जीवित सांस्कृतिक रिश्ते को स्वर दिया। भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR) के माध्यम से आमंत्रित दल ने 17 से 24 अगस्त तक सूरीनाम की सांस्कृतिक यात्रा की। पांच दिनों की प्रस्तुतियों में भोजपुरी की विविध लोकविधाओं ने स्थानीय दर्शकों से ऐसा संवाद बनाया, जिसमें भाषा की सीमाएं पीछे छूट गईं और भाव सीधे दिल तक पहुंचे।
जहां गीत सिर्फ गीत नहीं, घर की याद हैं
माता गौरी से शुरू हुआ लोकसुरों का सफर
19 अगस्त को माता गौरी
में भारतीय दल की प्रस्तुतियों
का आगाज हुआ। सरोज
वर्मा ने कजरी, सोहर,
विवाह गीत और भजन
प्रस्तुत किए। पांच संगीतकारों
और चार लोकनृत्य कलाकारों
ने संगीत और नृत्य के
माध्यम से भोजपुरी लोकजीवन
के विविध रंग मंच पर
उतारे। 20 अगस्त को Swami Vivekananda
Cultural Centre (SVCC) में
प्रस्तुति हुई। यहां भोजपुरी
लोकसंगीत और लोकनृत्य के
प्रति स्थानीय दर्शकों की उत्सुकता खास
तौर पर दिखाई दी।
21 अगस्त को Palmentuin (Palm Garden) में भारतीय लोकपरंपरा
ने सूरीनाम की बहुरंगी सांस्कृतिक
विरासत के बीच अपनी
जगह बनाई। वहीं 22 अगस्त को District Commissioner's
Office, Nickerie में प्रस्तुति के साथ कलाकारों
को स्थानीय समुदाय के सामाजिक-सांस्कृतिक
जीवन को करीब से
देखने का अवसर मिला।
जब गीतों के पीछे की कहानी भी सुनी गई
23 अगस्त का दिन इस
यात्रा का अलग ही
पड़ाव रहा। SVCC में विशेष सांस्कृतिक
कार्यशाला आयोजित हुई। यहां लोकगीतों
को सिर्फ गाया नहीं गया,
बल्कि उनके पीछे छिपे
अर्थ, परंपरा और सामाजिक संदर्भ
भी समझाए गए। सरोज वर्मा
ने संस्कार गीतों और भोजपुरी लोकगीतों
की सामाजिक भूमिका पर विस्तार से
जानकारी दी। प्रतिभागियों ने
गीतों के अर्थ और
उनके सांस्कृतिक संदर्भों को समझने में
सक्रिय रुचि दिखाई। यहां
लोकसंगीत मनोरंजन से आगे बढ़कर
संस्कृति की पाठशाला बन
गया।
कजरी में सावन, सोहर में जन्म, विवाह गीतों में रिश्ते
भारतीय दल के कार्यक्रमों
में शामिल लोकविधाएं भोजपुरी समाज के जीवन
का पूरा कैनवास अपने
भीतर समेटे थीं। कजरी में
ऋतु और विरह का
भाव था, सोहर में
जन्म की खुशी, विवाह
गीतों में पारिवारिक उल्लास
और भजनों में आस्था का
स्वर। यानी इन गीतों
में केवल सुर नहीं
थे, बल्कि भारतीय लोकजीवन का वह दर्शन
था जो जन्म से
विवाह और ऋतु से
भक्ति तक जीवन के
हर पड़ाव को संगीत से
जोड़ता है।
बहुसांस्कृतिक मंच पर भोजपुरी की अलग पहचान
Suriname
Heritage Festival का पहला संस्करण अपने
आप में महत्वपूर्ण था।
सूरीनाम की पहचान को
गढ़ने वाले विभिन्न समुदायों
की सांस्कृतिक परंपराएं एक ही मंच
पर दिखाई दीं। हिंदुस्तानी, अफ्रीकी
एवं मैरून, जावानीज, चीनी और डच
समुदायों की विरासतों के
बीच भारतीय दल ने उत्तर
भारत की भोजपुरी लोकपरंपरा
का प्रतिनिधित्व किया। यहां भोजपुरी किसी
एक क्षेत्र की बोली भर
नहीं रही। उसने भारतीय
लोकसंस्कृति की एक ऐसी
तस्वीर पेश की जिसमें
मिट्टी की गंध, पारिवारिक
रिश्तों की ऊष्मा, ऋतुओं
की संवेदना और आस्था के
रंग एक साथ दिखाई
दिए।
दाल-पराठे से कमल के पत्तों तक...भोजन में भी मिली अपनी मिट्टी
यात्रा केवल मंच और
संगीत तक सीमित नहीं
रही। सूरीनाम स्थित भारतीय दूतावास की ओर से
भारतीय दल का आत्मीय
स्वागत किया गया। भारत
के राजदूत ने कलाकारों को
अपने निवास पर रात्रिभोज के
लिए आमंत्रित किया। Nickerie प्रवास के दौरान स्थानीय
मेजबान की ओर से
आयोजित दोपहर के भोजन में
दाल-पराठा, उड़द वड़ा, कढ़ी-चावल और बैंगन
का भर्ता जैसे व्यंजन परोसे
गए। पारंपरिक ढंग से कमल
के पत्तों पर परोसा गया
यह भोजन भी कलाकारों
के लिए सांस्कृतिक अनुभव
बन गया। कभी-कभी
किसी देश को उसके
मंच से कम, उसकी
थाली से ज्यादा समझा
जा सकता है। इस
यात्रा में भोजन भी
दो संस्कृतियों के बीच संवाद
का माध्यम बना।
इतिहास से आगे बढ़कर वर्तमान में जीवित रिश्ता
भारत और सूरीनाम
का सांस्कृतिक संबंध इतिहास की किताबों तक
सीमित नहीं है। उन्नीसवीं
शताब्दी में भारत से
सूरीनाम पहुंचे लोगों के साथ भाषा,
गीत-संगीत, धार्मिक परंपराएं और सामाजिक रीति-रिवाज भी वहां पहुंचे।
समय के साथ इन
परंपराओं ने स्थानीय परिस्थितियों
के साथ नया रूप
लिया, लेकिन जड़ों की स्मृति बनी
रही। वाराणसी से गए कलाकारों
ने इस संबंध को
सिर्फ इतिहास के पन्नों में
नहीं, बल्कि लोगों की आवाज, उनके
उत्साह और गीतों से
जुड़ती स्मृतियों में महसूस किया।
यही इस यात्रा की
सबसे बड़ी उपलब्धि भी
रही।
लोकसंस्कृति की कोई सरहद नहीं होती
सात समंदर की दूरी भोजपुरी के सुरों को रोक नहीं सकी। भाषा बदल सकती है, उच्चारण बदल सकता है, पीढ़ियां बदल सकती हैं, लेकिन लोकस्मृति अपने रास्ते तलाश लेती है। सूरीनाम में गूंजी काशी की यह लोकधुन उसी जीवित स्मृति की गवाही है। पहली बार आयोजित हेरिटेज फेस्टिवल में भारतीय भोजपुरी लोकपरंपरा की मौजूदगी ने यह संदेश दिया कि संस्कृति पासपोर्ट की मोहताज नहीं होती। जब काशी की कजरी सूरीनाम में गूंजती है तो वह सिर्फ गीत नहीं रहती—वह दो महाद्वीपों के बीच खिंची एक अदृश्य सांस्कृतिक डोर बन जाती है।




