जब सावन के बादलों से संवाद करते हैं "श्री काशी विश्वनाथ धाम" के शिखर
सावन का सोमवार काशी में केवल एक धार्मिक तिथि नहीं, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक चेतना का जीवंत उत्सव बन जाता है। गंगा के तट पर स्थित श्री काशी विश्वनाथ धाम इन दिनों ऐसे जागता है मानो स्वयं शिव ने इस नगर को अपनी श्वास से स्पंदित कर दिया हो। भोर की मंगला आरती से लेकर रात्रि की शयन आरती तक चारों पहर विश्वनाथ की उपस्थिति धाम को निरंतर आलोकित करती रहती है। पुराणों में वर्णित अविमुक्त काशी की महिमा सावन में और अधिक सजीव हो उठती है, जब गंगा का जल, मंत्रों का नाद और घंटों की ध्वनि मिलकर एक ऐसा वातावरण रचते हैं जिसमें श्रद्धा केवल देखी नहीं, अनुभव की जाती है। ज्योतिर्लिंग स्वरूप बाबा विश्वनाथ के प्रत्येक सोमवार का अलग श्रृंगार शिव के विविध आध्यात्मिक रूपों—शीतलता, करुणा, वैराग्य, प्रकाश और अनंतता—का प्रतीक माना जाता है। धाम की गलियों से गुजरती जलधाराएँ, रुद्राक्ष धारण किए श्रद्धालु और स्वर्णिम शिखरों पर ठहरती वर्षा की बूँदें मिलकर काशी को एक अद्भुत आध्यात्मिक लोक में बदल देती हैं। यह लेख उसी सावनमय काशी की यात्रा है, जहाँ विश्वनाथ केवल मंदिर में नहीं, समय, जल, प्रकाश और मनुष्य के मौन में भी निवास करते प्रतीत होते हैं
सुरेश गांधी
काशी की महिमा
केवल उसकी प्राचीनता में
नहीं, उसके अक्षय जागरण
में है। भारत के
अनेक तीर्थ ऋतु के साथ
बदलते हैं, पर काशी
ऋतु को अपने भीतर
बदल देती है। सावन
आते ही यह नगर
एक साधारण शहर नहीं रहता;
यह शिव की श्वास
का विस्तार बन जाता है।
गंगा के तट पर
स्थित श्री काशी विश्वनाथ
मंदिर में जब प्रातःकाल
पहली आरती होती है,
तब लगता है मानो
स्वयं भोर ने जल
और प्रकाश लेकर विश्वनाथ के
चरणों में उपस्थित होने
का संकल्प किया हो। पुराणों में
काशी को “अविमुक्त क्षेत्र”
कहा गया है—अर्थात
वह भूमि जिसे शिव
कभी छोड़ते नहीं। स्कंदपुराण के काशीखंड में
वर्णित है कि यह
नगरी स्वयं महादेव की प्रिय नगरी
है, जहाँ उनका अनुग्रह
निरंतर प्रवाहित रहता है। प्रसिद्ध
पंक्ति है—
“काश्यां हि काशते काशी, काशी सर्वप्रकाशिका।”
अर्थात काशी वह है
जो स्वयं प्रकाशित है और समस्त
जगत को प्रकाश देने
वाली है। यहाँ प्रकाश
केवल दीप का नहीं,
चेतना का प्रतीक है।
एक अन्य प्रसिद्ध भावार्थ
में कहा गया है—
“अविमुक्तं न मुञ्चन्ति शिवा यत्र निवासिनः।”
अर्थात जहाँ शिव का
निवास है, उस काशी
को वे कभी त्यागते
नहीं। यही कारण है
कि काशी की आध्यात्मिक
अनुभूति अन्य तीर्थों से
भिन्न मानी जाती है।
बारह ज्योतिर्लिंगों
में काशी विश्वनाथ का
स्थान अद्वितीय माना जाता है।
“विश्वनाथ” शब्द का अर्थ
है—समस्त विश्व के नाथ। यह
नाम केवल ईश्वर की
सार्वभौमिक सत्ता का परिचायक नहीं,
बल्कि उस करुणा का
भी प्रतीक है जो जाति,
भाषा, देश और काल
की सीमाओं से परे है।
शिवलिंग यहाँ अनंत प्रकाश
के स्तंभ का प्रतीक माना
जाता है—आरंभ और
अंत से परे, निराकार
में साकार का संकेत। शैव परंपरा
में प्रचलित प्रार्थना —
“नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय भस्माङ्गरागाय महेश्वराय।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै नकाराय नमः शिवाय॥”
सावन में विश्वनाथ
धाम की आराधना का
भाव इसी शुद्ध, नित्य
और सर्वव्यापक शिवत्व की ओर मन
को ले जाता है।
सावन
के सोमवार पर धाम का
दृश्य किसी उत्सव से
अधिक एक सामूहिक मौन
जैसा होता है। हजारों
लोग उपस्थित रहते हैं, फिर
भी एक ऐसी आंतरिक
शांति बनी रहती है
जिसे शब्दों में बाँधना कठिन
है। कतारें आगे बढ़ती हैं,
दीपक जलते हैं, घंटियाँ
बजती हैं, पर भीतर
कहीं एक निस्तब्धता लगातार
बहती रहती है। शायद
यही काशी की वास्तविक
ध्वनि है—भीड़ के
बीच जन्म लेता मौन।
धाम के प्रांगण
में खड़े होकर यदि
कुछ देर केवल आकाश
को देखा जाए, तो
स्वर्णिम शिखर बादलों से
संवाद करते प्रतीत होते
हैं। वर्षा की हल्की फुहार
जब उन पर गिरती
है, तब लगता है
मानो आकाश स्वयं जल
अर्पित कर रहा हो।
गंगा की दिशा से
आती ठंडी हवा मंदिर
की दीवारों को छूती है
और वे दीवारें किसी
प्राचीन वाद्य की तरह धीमे-धीमे गूँज उठती
हैं। काशी की गलियों का
अपना एक आध्यात्मिक व्याकरण
है। यहाँ मोड़ अचानक
खुलते हैं, रास्ते अचानक
संकरे हो जाते हैं,
और फिर अचानक सामने
मंदिर का आकाश खुल
जाता है। यह नगर
मानो मनुष्य को सिखाता है
कि जीवन भी सीधी
रेखा नहीं, अनुभवों की घुमावदार यात्रा
है। सावन में यह
यात्रा और अधिक भीगी,
और अधिक आत्मीय हो
उठती है। धाम की
सीढ़ियों पर बैठा कोई
वृद्ध श्रद्धालु, जल लिए खड़ा
कोई किशोर, अपने परिवार के
साथ आई कोई महिला—इन सबके चेहरों
पर अलग-अलग कथाएँ
लिखी होती हैं। किसी
की आँखों में कृतज्ञता, किसी
में पीड़ा, किसी में आशा,
किसी में स्मरण। शिव
शायद इसी विविधता के
देवता हैं—जो मनुष्य
को बदलने से पहले उसे
स्वीकार करते हैं।
आधुनिक समय में जब
हर चीज़ तेजी से
घटित होने लगी है,
तब श्री काशी विश्वनाथ
धाम रुकने की संस्कृति सिखाता
है। यहाँ लोग प्रतीक्षा
करते हैं, धीरे चलते
हैं, दर्शन के बाद कुछ
क्षण आँखें बंद करके खड़े
रहते हैं। यह ठहराव
केवल धार्मिक क्रिया नहीं, मानसिक उपचार है। काशी बताती
है कि शांति कोई
उपलब्धि नहीं; वह भीतर लौटने
की प्रक्रिया है। सावन की रातों में
धाम का रूप और
भी अद्भुत हो उठता है।
दीपों की लौ पत्थरों
पर पड़कर उन्हें जीवित बना देती है।
हवा में भीगा चंदन
घुल जाता है। गंगा
की ओर से आती
नमी और आरती की
ध्वनि मिलकर ऐसा वातावरण बनाती
है जिसमें मन स्वयं धीमा
पड़ने लगता है। उस
समय काशी को देखा
नहीं जाता, महसूस किया जाता है।
और तब समझ में
आता है कि इस
नगर की महिमा उसके
स्थापत्य में नहीं, उसकी
जागृत चेतना में है। काशी
केवल तीर्थ नहीं; वह मनुष्य और
उसके भीतर बसे मौन
के बीच का सेतु
है। यहाँ आकर अनेक
लोग अपनी कामनाएँ व्यक्त
करते हैं, पर लौटते
समय वे अक्सर एक
अनकही शांति साथ ले जाते
हैं।
सावन : जब जल स्वयं मंत्र बन जाता है
श्रावण मास को शिव
का प्रिय मास माना गया
है। वर्षा का जल, गंगा
का प्रवाह और धरती की
हरियाली मिलकर इस महीने को
तपश्चर्या और शीतलता का
अद्भुत संगम बना देते
हैं। काशी में सावन
का अर्थ केवल व्रत
या पूजा नहीं; यह
जल और ज्योति का
उत्सव है। भोर में
श्रद्धालु गंगाजल लेकर विश्वनाथ धाम
की ओर बढ़ते हैं।
वह जल केवल अर्पण
नहीं होता; वह मनुष्य के
भीतर की दाह, अहंकार
और क्लांति को धो देने
की प्रतीकात्मक प्रक्रिया है। इसी भाव
से शिव-मंत्र गूँजता
है — “ॐ नमः शिवाय”.
यह पंचाक्षरी मंत्र काशी की गलियों
में केवल उच्चारित नहीं
होता; वह साँसों के
साथ चलता है।
सावन के सोमवार और बाबा का अद्भुत श्रृंगार
काशी की एक
विशिष्ट परंपरा है कि सावन
के प्रत्येक सोमवार को बाबा का
अलग-अलग भावों में
श्रृंगार किया जाता है।
कहीं चंदन की शीतल
आभा, कहीं रजत अलंकरण,
कहीं पुष्पों की हरित छटा,
कहीं भस्म और रुद्राक्ष
की तपस्वी मुद्रा—हर श्रृंगार शिव
के किसी न किसी
आध्यात्मिक रूप का स्मरण
कराता है.
चंदन
श्रृंगार — तप्त मन
को शीतलता का संदेश।
पुष्प
श्रृंगार — सृष्टि की
नवीनता और करुणा का प्रतीक।
रुद्राक्ष
श्रृंगार — ध्यान, वैराग्य
और अंतर्मुखता का संकेत।
भस्म
भाव — अनित्यता का स्मरण;
सब कुछ अंततः शिव में विलीन है।
स्वर्ण
अथवा रजत आभूषण — दिव्य
ऐश्वर्य नहीं, चेतना की ज्योति का प्रतीक।
सावन की भीगी सुबह में जब श्रृंगारित
विश्वनाथ के दर्शन होते हैं, तब अनेक श्रद्धालुओं को लगता है कि वे मूर्ति नहीं, जीवंत
उपस्थिति के सम्मुख खड़े हैं।
गंगा और विश्वनाथ : काशी का द्वैतहीन संबंध
काशी में गंगा और विश्वनाथ को अलग-अलग
नहीं देखा जाता। प्राचीन परंपरा में गंगा को शिव-जटाओं से प्रवाहित करुणा का रूप माना
गया है। इसलिए काशी की यात्रा तब पूर्ण मानी जाती है जब गंगा-स्पर्श और विश्वनाथ-दर्शन
दोनों का अनुभव हो। प्रातःकाल दशाश्वमेध से उठती आरती की ध्वनि और धाम की घंटियों का
सम्मिलित नाद काशी की आत्मा का संगीत रचता है।
धाम का अनुभव : स्थापत्य से आगे
आज का श्री काशी विश्वनाथ धाम विस्तृत
और भव्य है, पर उसकी वास्तविक शक्ति पत्थरों में नहीं, उस सामूहिक आस्था में है जो
प्रतिदिन वहाँ उपस्थित होती है। लाखों लोग आते हैं, पर गर्भगृह के समीप पहुँचते-पहुँचते
शब्द कम और मौन अधिक हो जाता है। यही मौन शिव का सबसे प्राचीन उपदेश है। आदि शंकराचार्य
रचित प्रसिद्ध स्तुति की पंक्ति—
“वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम्।”
अर्थात वाराणसीपुरी के स्वामी विश्वनाथ
का भजन करो—यह केवल उपासना का आग्रह नहीं, आत्मचेतना की ओर लौटने का
निमंत्रण है।
सोमवार की वह भोर
आज सावन का सोमवार है। काशी की गलियों
में फिर जल से भरे कलश चलेंगे, रुद्राक्ष की मालाएँ झूलेंगी, घंटियाँ बजेंगी, और गंगा
की हवा धाम के प्रांगण में शीतलता बिखेरेगी। विश्वनाथ के स्वर्णिम शिखर बादलों के बीच
चमकेंगे और हजारों आँखें एक साथ उसी दिशा में उठेंगी जहाँ मनुष्य अपनी सीमाओं से बड़ा
कुछ अनुभव करना चाहता है।
काशी का सबसे बड़ा चमत्कार
काशी का चमत्कार यह नहीं कि यहाँ इच्छाएँ
पूरी होती हैं; काशी का चमत्कार यह है कि यहाँ मनुष्य अपनी इच्छाओं के शोर से कुछ क्षणों
के लिए मुक्त हो जाता है। सावन में श्री काशी विश्वनाथ मंदिर हमें स्मरण कराता है कि
जीवन की सबसे बड़ी शांति बाहर नहीं, भीतर जागती है। जब गंगा की नमी, मंत्रों की ध्वनि
और विश्वनाथ का शांत स्वरूप एक साथ मन में उतरते हैं, तब काशी केवल तीर्थ नहीं रहती—वह
आत्मा का घर बन जाती है। और शायद
इसी लिए सदियों से
कहा जाता है—काशी
को देखा नहीं जाता,
काशी भीतर घटित होती
है; और सावन के
सोमवार को विश्वनाथ उसी
भीतर घटने वाली ज्योति
का नाम हैं।
सोमवार की भोर
सोमवार की भोर अभी
पूरी तरह खुली भी
नहीं होती कि काशी
की हवा बदलने लगती
है। गंगा के ऊपर
झुके बादलों से टपकती नमी,
मंदिरों की दूर-दूर
से आती घंटियों की
ध्वनि, भीगी गलियों से
उठती मिट्टी और चंदन की
मिली-जुली गंध—सब
मिलकर ऐसा वातावरण रचते
हैं मानो पृथ्वी ने
अपने माथे पर जल
का शांत स्पर्श रख
लिया हो। उसी क्षण
लगता है कि सावन
कहीं बाहर से नहीं
आता; वह काशी के
भीतर से जागता है।
और जब सावन जागता
है, तब समय भी
नंगे पाँव चलने लगता
है। मतलब साफ है
श्री काशी विश्वनाथ धाम
को केवल मंदिर कहना
उसके अनुभव को छोटा कर
देना होगा। यह वह स्थल
है जहाँ पत्थर स्मृति
बन जाते हैं और
स्मृति प्रार्थना। यहाँ पहुँचते ही
मनुष्य अपने परिचय पीछे
छोड़ देता है। कोई
किसान, कोई शिक्षक, कोई
व्यापारी, कोई विद्यार्थी—सब
एक ही दिशा में
बढ़ते हैं, जैसे अलग-अलग नदियाँ एक
ही सागर की ओर
जाती हों। धाम की
सबसे अद्भुत बात यही है
कि वह किसी से
उसका नाम नहीं पूछता;
वह केवल उसके मन
की थकान पहचान लेता
है।
मंदिर परिसर
काशी विश्वनाथ मंदिर
परिसर रुकने की संस्कृति सिखाता
है। यहाँ लोग प्रतीक्षा
करते हैं, धीरे चलते
हैं, दर्शन के बाद कुछ
क्षण आँखें बंद करके खड़े
रहते हैं। यह ठहराव
केवल धार्मिक क्रिया नहीं, मानसिक उपचार है। काशी बताती
है कि शांति कोई
उपलब्धि नहीं; वह भीतर लौटने
की प्रक्रिया है। सावन की
रातों में धाम का
रूप और भी अद्भुत
हो उठता है। दीपों
की लौ पत्थरों पर
पड़कर उन्हें जीवित बना देती है।
हवा में भीगा चंदन
घुल जाता है। गंगा
की ओर से आती
नमी और आरती की
ध्वनि मिलकर ऐसा वातावरण बनाती
है जिसमें मन स्वयं धीमा
पड़ने लगता है। उस
समय काशी को देखा
नहीं जाता, महसूस किया जाता है।
और तब समझ में
आता है कि इस
नगर की महिमा उसके
स्थापत्य में नहीं, उसकी
जागृत चेतना में है। काशी
केवल तीर्थ नहीं; वह मनुष्य और
उसके भीतर बसे मौन
के बीच का सेतु
है। यहाँ आकर अनेक
लोग अपनी कामनाएँ व्यक्त
करते हैं, पर लौटते
समय वे अक्सर एक
अनकही शांति साथ ले जाते
हैं।
आरती
सावन के सोमवार
को श्री काशी विश्वनाथ
धाम में केवल पूजा
नहीं होती, बल्कि समय स्वयं आरती
बन जाता है। काशी
का दिन घड़ी की
सूइयों से नहीं, बाबा
विश्वनाथ के चार पहरों
से चलता है। भोर
की मंगला आरती विश्वनाथ को
जगाने का क्षण है,
जब गंगा की नमी
और वैदिक मंत्रों के बीच धाम
में पहली चेतना जागती
है। प्रातःकालीन भोग आरती में
बाबा को अन्न और
प्रेम का अर्पण किया
जाता है, मानो समूची
काशी अपनी रसोई का
प्रथम अंश विश्वनाथ को
समर्पित कर रही हो।
संध्या उतरते ही दीपों की
पंक्तियों और घंटों के
गगनभेदी नाद के साथ
संध्या आरती धाम को
प्रकाशमय कर देती है;
यह वह क्षण है
जब काशी की आत्मा
गंगा की लहरों तक
सुनाई देती है। रात्रि
की अंतिम बेला में शयन
आरती बाबा को विश्राम
का निमंत्रण देती है, पर
काशी की आस्था तब
भी जागती रहती है। सावन
में इन चारों आरतियों
का महत्व कई गुना बढ़
जाता है। प्रत्येक आरती
शिव के एक अलग
भाव—जागरण, पालन, प्रकाश और विश्राम—का
प्रतीक है। इसी कारण
लाखों श्रद्धालु मानते हैं कि काशी
में बाबा विश्वनाथ के
दर्शन तभी पूर्ण होते
हैं जब उनके चार
पहरों की आराधना का
अनुभव हृदय में उतर
जाए।

