बाहर ‘न्यू काशी’, भीतर ‘नरक’!
काशी की पहचान दुनिया के सबसे प्राचीन जीवंत शहरों में होती है। देश-दुनिया से लोग यहां आध्यात्मिक अनुभव लेने आते हैं, लेकिन शहर की अपनी आबादी आज बुनियादी नागरिक सुविधाओं के लिए जूझ रही है। कहीं सड़क पर घुटनों तक पानी है तो कहीं सीवर उफन रहा है। कहीं सड़क खुदी पड़ी है तो कहीं गड्ढे हादसों को न्योता दे रहे हैं। कूड़े के ढेर रोज उठते हैं, मगर खत्म नहीं होते। पीने के पानी के लिए कई इलाकों में लोग कई-कई दिन इंतजार करते हैं। हालिया तस्वीर इस संकट को और गंभीर बनाती है। करीब 50 हजार करोड़ से बदलती तस्वीर के बीच गलियों में बजबजाता बनारस—कहीं घुटनों तक पानी, कहीं उफनता सीवर, कहीं कूड़े का पहाड़ है. नमो घाट से विश्वनाथ धाम तक विकास की चमक, रिंग रोड से हाईवे तक फर्राटा… लेकिन नगर निगम की गलियों में सड़ांध, जलभराव और गड्ढों से जिंदगी बेहाल. बड़ा सवाल : काशी बदल गई… लेकिन काशी के भीतर रहने वाला बनारसी कब बदले हुए शहर को महसूस करेगा? नगर निगम का बजट 2500 करोड़ पार, फिर भी बनारस बेहाल! जनता पूछ रही—आखिर पैसा जा कहां रहा है?
सुरेश गांधी
काशी बदल रही
है—यह दावा अब
केवल भाषणों का हिस्सा नहीं,
शहर की बाहरी तस्वीर
में साफ दिखाई देता
है। नमो घाट की
रोशनी, अस्सी घाट का विस्तार,
बाबा विश्वनाथ धाम की भव्यता,
रिंग रोड की रफ्तार
और बनारस को आसपास के
शहरों से जोड़ती चौड़ी
सड़कों पर दौड़ते वाहन
इस बदलाव की कहानी कहते
हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सांसद
बनने के बाद काशी
में विकास परियोजनाओं की लंबी फेहरिस्त
खड़ी हुई है। सरकारी
आंकड़ों के अनुसार मार्च
2025 तक काशी विकास के
तहत 580 परियोजनाओं पर करीब 48,459 करोड़
रुपये का निवेश हुआ।
लेकिन इसी काशी का
एक दूसरा चेहरा भी है। वह
चेहरा जो नमो घाट
की रोशनी से दूर है।
वह चेहरा जो हाईवे की
चिकनी सड़क से उतरते
ही सामने आता है। वह
चेहरा जो वीआईपी रास्तों
से निकलकर मोहल्लों की गलियों में
कदम रखते ही नाक
पर हाथ रखने को
मजबूर करता है। यहां
सड़क नहीं, गड्ढे हैं। यहां नाली
नहीं, नाले हैं। यहां
सीवर नहीं, सड़कों पर बहती गंदगी
है। और बारिश होते
ही कई गलियां सड़क
नहीं, तालाब में बदल जाती
हैं। हाल की बारिश
ने इस विरोधाभास को
फिर बेनकाब कर दिया।
शहर के करीब
35 इलाकों में जलभराव हुआ
और गोदौलिया, नई सड़क, जैतपुरा,
कज्जाकपुरा, गिरजाघर समेत कई जगह
घुटनों तक पानी जमा
रहा। मलदहिया, शिवपुरवा, पिपलानी, बजरडीहा, अंबा और कश्मीरीगंज
जैसे इलाकों में जलभराव और
सीवर ओवरफ्लो की समस्या सामने
आई है। और कहानी
यहीं खत्म नहीं होती।
मारुति नगर और नीलकंठपुरम
में दस दिन तक
घुटनों तक पानी जमा
रहने की तस्वीर ने
शहर की जलनिकासी व्यवस्था
पर गंभीर सवाल खड़े किए
हैं।
काशी के दो चेहरे
एक काशी वह
है जिसे दुनिया देख
रही है। नमो घाट
पर होने वाला आयोजन,
गंगा की लहरों पर
चमकती रोशनी, अस्सी की सुबह, विश्वनाथ
धाम का विराट परिसर,
सड़कों पर दौड़ती चमचमाती
गाड़ियां और शहर के
बाहर तक फैलता नया
इंफ्रास्ट्रक्चर। दूसरी काशी वह है
जिसे बनारस का नागरिक हर
रोज झेल रहा है।
घर से निकलते ही
गली में जमा पानी।
थोड़ा आगे बढ़े तो
उफनता सीवर। सड़क किनारे कूड़े
का ढेर। कहीं महीनों
से खुदी सड़क। कहीं
गड्ढा इतना गहरा कि
रात में वाहन चालक
की जरा सी चूक
जानलेवा हो सकती है।
एक तरफ नई काशी
का पोस्टर है, दूसरी तरफ
पुरानी व्यवस्था की सड़ांध। यही
विरोधाभास अब बनारस के
विकास मॉडल का सबसे
बड़ा सवाल बनता जा
रहा है।
सड़कें चमकीं, गलियां क्यों बुझीं?
बनारस के बाहरी हिस्सों
और प्रमुख मार्गों पर विकास की
रफ्तार दिखाई देती है। रिंग
रोड ने यातायात को
नया विकल्प दिया है। बनारस-जौनपुर मार्ग, बनारस-चंदौली दिशा और बाबतपुर-कपसेठी-भदोही जैसे मार्गों के
विकास से कनेक्टिविटी मजबूत
हुई है। केंद्र सरकार
लगातार नए बड़े कनेक्टिविटी
प्रोजेक्ट भी मंजूर कर
रही है। जुलाई 2026 में
वाराणसी रिंग रोड और
एनएच-19 को जोड़ने वाले
46.039 किमी के गंगा एलिवेटेड
कॉरिडोर के लिए ₹14,447.64 करोड़
की मंजूरी दी गई। इसी
समय वरुणा किनारे एनएच-31 और रिंग रोड
को जोड़ने वाले 43.218 किलोमीटर कॉरिडोर के लिए ₹10,998.32 करोड़
स्वीकृत हुए। यानी बड़े
बनारस की तस्वीर तेजी
से बदल रही है।
लेकिन शहर के भीतर
की छोटी-छोटी गलियां
उसी गति से क्यों
नहीं बदल रहीं? यह
सवाल इसलिए और बड़ा है
क्योंकि यहां बात किसी
हजारों करोड़ की परियोजना की
नहीं, बल्कि उन बुनियादी कामों
की है जो सामान्य
नागरिक की रोजमर्रा की
जिंदगी तय करते हैं।
वाराणसी नगर निगम के
पास संसाधनों की कमी का
तर्क भी पूरी तरह
सहज नहीं लगता। वित्तीय
वर्ष 2026-27 के लिए नगर
निगम और जलकल का
कुल बजट करीब 2575 करोड़
रुपये पास हुआ। इससे
पहले कार्यकारिणी स्तर पर 2537 करोड़
रुपये का बजट स्वीकृत
हुआ था। बजट में
सड़क, फुटपाथ और गलियों के
रखरखाव, सीवर लाइन व
पंपिंग स्टेशन, सफाई व्यवस्था और
कूड़ा निस्तारण के लिए अलग-अलग प्रावधान किए
गए हैं। सफाई व्यवस्था
का बजट बढ़ाकर 180 करोड़
रुपये किया गया है।
इसके बावजूद अगर बारिश के
बाद शहर के मोहल्लों
में वही पुराना जलभराव
लौट आता है तो
सवाल उठना स्वाभाविक है—
पैसा है तो काम
कहां है? काम है
तो असर कहां है?
और असर नहीं है
तो जवाबदेही किसकी है?
सीवर की सड़ांध में दब जाता है विकास का दावा
हड़हा सराय, दालमंडी और काशीपुरा में
सीवर ओवरफ्लो की समस्या को
लेकर नगर निगम को
हस्तक्षेप करना पड़ा। गणेशपुरी
कॉलोनी में सीवेज घरों
और सड़कों तक पहुंचने की
रिपोर्ट सामने आई। कश्मीरीगंज में
नाराज लोगों ने सड़क बंद
कर धरना दिया और
विधायक व जलकल के
महाप्रबंधक को मौके पर
बैठना पड़ा। यह घटनाएं किसी
राजनीतिक बयान से अधिक
ताकतवर हैं। क्योंकि यहां
आंकड़े नहीं बोल रहे—नागरिक बोल रहे हैं।
वह नागरिक जिसने घर के दरवाजे
पर सीवर का पानी
देखा है। वह महिला
जिसे गड्ढे में पलटे वाहन
के कारण चोट लगी।
वह बच्चा जो स्कूल जाने
के लिए जलभराव से
होकर गुजर रहा है।
वह दुकानदार जिसकी दुकान के सामने कई
दिनों तक पानी जमा
रहा। वह बुजुर्ग जो
कूड़े और गंदगी के
बीच से निकलने को
मजबूर है।
मोदी के बनारस में सवाल मोदी से नहीं, व्यवस्था से है
यहां एक बात
साफ होनी चाहिए। प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व
में काशी में बड़े
पैमाने पर विकास हुआ
है। आधिकारिक आंकड़ा स्वयं करीब 48,459 करोड़ रुपये के निवेश की
बात करता है। 2023 में
ही प्रधानमंत्री ने वाराणसी में
₹12,100 करोड़ से अधिक की
परियोजनाओं का लोकार्पण और
शिलान्यास किया था। इनमें
सड़क, रेल, पेयजल, पर्यटन,
शहरी विकास और स्वच्छता से
जुड़ी परियोजनाएं शामिल थीं। इसलिए सवाल
यह नहीं कि काशी
में विकास हुआ या नहीं।
सवाल यह है कि—
इतने बड़े विकास के
बीच शहर की बुनियादी
नागरिक व्यवस्था उसी अनुपात में
क्यों नहीं सुधरी? बड़े
प्रोजेक्ट बनाना जरूरी है। लेकिन बड़ी
परियोजनाओं की सफलता तभी
पूरी मानी जाएगी जब
उसके बीच रहने वाला
आम आदमी अपने मोहल्ले
की गली में भी
बदलाव महसूस करे।
विधायक बोले—निधि सीमित, निगम का बजट हजारों करोड़
यहीं भाजपा विधायक
सौरभ श्रीवास्तव की बात राजनीतिक
रूप से महत्वपूर्ण हो
जाती है। जनता का
गुस्सा जब विधायक तक
पहुंचता है तो विधायक
के सामने स्वाभाविक रूप से सवाल
खड़ा होता है कि
जिस समस्या के समाधान के
लिए उनके पास सीमित
विधायक निधि है, उसका
बड़ा हिस्सा उन विभागों के
पास है जिनके पास
शहर की मूलभूत नागरिक
सुविधाओं का जिम्मा है।
सौरभ श्रीवास्तव का कहना है
कि प्रधानमंत्री ने काशी के
विकास के लिए धन
की कमी नहीं होने
दी, लेकिन कई परियोजनाएं समय
पर जमीन पर नहीं
उतर सकीं। उनका सवाल नगर
निगम के बड़े बजट
और बारिश से पहले नालों-सीवर की सफाई
को लेकर है। राजनीति
में यह बयान भले
ही जिम्मेदारी के हस्तांतरण की
तरह देखा जाए, लेकिन
इसमें उठाया गया सवाल जनता
के सवाल से अलग
नहीं है। अगर नगर
निगम के पास हजारों
करोड़ का बजट है
तो बारिश आने से पहले
नालों की सफाई क्यों
नहीं हुई?
विकास की चमक में गलियों की सड़ांध क्यों?
काशी का पर्यटन
बढ़ रहा है। आधिकारिक
तौर पर शहर में
हर साल करोड़ों पर्यटकों
और श्रद्धालुओं के आने का
उल्लेख है। नए कनेक्टिविटी
प्रोजेक्ट इसी बढ़ती आवाजाही
को ध्यान में रखकर तैयार
हो रहे हैं। लेकिन
पर्यटक जब मुख्य सड़क
से उतरकर वास्तविक बनारस में पहुंचेगा तो
उसे क्या दिखाई देगा?
कहीं गंगा किनारे की
भव्यता। कहीं विश्वनाथ धाम
की दिव्यता। कहीं नमो घाट
की आधुनिकता। और फिर— गली
में जमा काला पानी।
सीवर की उठती दुर्गंध।
कूड़े का ढेर। टूटी
सड़क। बिजली के तारों के
नीचे उभरते गड्ढे। यही वह तस्वीर
है जो किसी भी
शहर की असली नागरिक
गुणवत्ता बताती है।
बजट बढ़ा, सवाल भी बढ़े
तीन साल में
नगर निगम का बजट
करीब 841 करोड़ से बढ़कर 2537 करोड़
रुपये तक पहुंचने की
बात सामने आई है। सफाई
के लिए बजट 180 करोड़
किया गया है। सीवर
लाइन, पंपिंग स्टेशन और एसटीपी की
मरम्मत के लिए 30 करोड़
का प्रावधान है। फिर भी
अगर शहर के भीतर
जलभराव और सीवर की
समस्या लगातार सामने आ रही है
तो सिर्फ बजट बढ़ना पर्याप्त
नहीं। बजट का आकार
नहीं, जमीन पर उसका
असर शहर की असली
रेटिंग है। और यहीं
नगर निगम कठघरे में
खड़ा दिखाई देता है।
क्या काशी को दो अलग शहरों में बांट दिया गया है?
एक काशी—जो
पर्यटक को दिखाई जाती
है। दूसरी काशी—जिसमें नागरिक
रहता है। एक काशी—जहां सड़कें चौड़ी
और चमचमाती हैं। दूसरी काशी—जहां मोहल्ले की
गली में बारिश का
पानी उतरने में दिन लगते
हैं। एक काशी—जहां
करोड़ों की परियोजनाएं भविष्य
का सपना दिखाती हैं।
दूसरी काशी—जहां आज
की समस्या का समाधान कल
पर टाल दिया जाता
है। यह अंतर जितना
बढ़ेगा, जनता का आक्रोश
भी उतना ही गहरा
होगा।
अब सवाल सिर्फ नगर निगम का नहीं, राजनीतिक जवाबदेही का भी
जनता विधायक को
इसलिए पकड़ती है क्योंकि विधायक
उसके सामने उपलब्ध राजनीतिक चेहरा है। वह यह
नहीं देखती कि सड़क नगर
निगम की है, सीवर
जलकल का है या
नाला किसी दूसरे विभाग
के अधीन है। उसके
लिए जनप्रतिनिधि का अर्थ है—समस्या का समाधान। इसलिए
सौरभ श्रीवास्तव के सामने हुआ
विरोध केवल एक विधायक
के खिलाफ नाराजगी नहीं पढ़ा जाना
चाहिए। यह उस व्यवस्था
के खिलाफ नागरिक अधीरता का संकेत है
जिसमें शिकायतें दर्ज होती हैं,
निरीक्षण होते हैं, पंप
लगते हैं, मशीनें उतरती
हैं और बारिश खत्म
होते ही समस्या अगले
मौसम तक फिर सो
जाती है।
काशी को सिर्फ कॉरिडोर नहीं, गलियों का कायाकल्प चाहिए
काशी विश्वनाथ धाम
बन गया—अच्छी बात
है। नमो घाट चमक
उठा—अच्छी बात है। रिंग
रोड ने शहर को
राहत दी—अच्छी बात
है। हाईवे चौड़े हुए—जरूरी है।
नए एलिवेटेड कॉरिडोर बनेंगे—भविष्य के लिए उपयोगी
हैं। लेकिन इसके साथ— गली
भी चलने लायक हो।
नाली भी बहने लायक
हो। सीवर भी ढकने
लायक हो। सड़क भी
गड्ढामुक्त हो। कूड़ा समय
पर उठे। नल में
नियमित पानी आए। जर्जर
मकान पर कार्रवाई हो।
तभी विकास की तस्वीर पूरी
होगी। क्योंकि काशी की असली
परीक्षा नमो घाट की
रोशनी में नहीं, उस
गली के अंधेरे में
होती है जहां कोई
बुजुर्ग रात में घर
लौटता है।
सबसे बड़ा सवाल
आज बनारस के
सामने सवाल यह नहीं
है कि शहर में
विकास हुआ या नहीं।
हुआ है—और बहुत
हुआ है। सवाल यह
है कि उस विकास
की रोशनी शहर की आखिरी
गली तक कब पहुंचेगी?
प्रधानमंत्री के स्तर पर
करीब 50 हजार करोड़ के
निवेश वाली विकास यात्रा
काशी को नई पहचान
दे रही है। लेकिन
नगर निगम की गलियों
में यदि आज भी
सड़ांध, जलभराव, कूड़े और गड्ढों का
राज है तो विकास
की इस कहानी में
एक पन्ना अधूरा है। वह पन्ना
है—नागरिक सुविधा। और जब तक
यह पन्ना पूरा नहीं होगा,
तब तक बनारस की
चमचमाती बाहरी सड़कें और बजबजाती भीतरी
गलियां एक-दूसरे से
यही सवाल करती रहेंगी—
“काशी बदल गई… लेकिन
काशी के भीतर रहने
वाला बनारसी कब बदले हुए
शहर को महसूस करेगा?”
48,459 करोड़ बनाम 2,575 करोड़
अब सवाल जवाबदेही का है
अगर नगर निगम
कहता है कि काम
हो रहा है तो
जनता पूछ सकती है—कब तक? अगर
विभाग कहता है कि
बजट है तो सवाल
होगा—खर्च कितना हुआ
और जमीन पर क्या
बदला? अगर विधायक कहते
हैं कि उनकी निधि
सीमित है तो सवाल
होगा—फिर नगर निगम
और दूसरे विभागों से काम कराने
के लिए राजनीतिक दबाव
कितना बनाया गया? और अगर
नगर निगम के पास
हजारों करोड़ का बजट है
तो सबसे बड़ा सवाल
वही रहेगा— “बनारस में पैसा कम
है या जवाबदेही? क्योंकि
जनता अब केवल आश्वासन
नहीं चाहती। उसे ऐसी सड़क
चाहिए जिस पर बारिश
में नाव न चलानी
पड़े, ऐसा सीवर चाहिए
जो बारिश में सड़क पर
न उफने, ऐसा नाला चाहिए
जो बरसात से पहले साफ
हो और ऐसा शहर
चाहिए जहां जर्जर इमारत
देखकर लोग यह न
सोचें कि कहीं अगली
खबर हादसे की तो नहीं
होगी। काशी की जनता
अब हिसाब मांग रही है—बजट का भी,
काम का भी और
जवाबदेही का भी। नगर
निगम की नाकामी का
खामियाजा क्या विधायकों को
भुगतना पड़ रहा?
सौरभ बोले- पीएम ने विकास के लिए खूब पैसा दिया, समय पर काम जमीन पर नहीं उतर पाया
बारिश, सीवर ओवरफ्लो और
जलभराव से परेशान बनारस
की जनता का गुस्सा
अब सीधे जनप्रतिनिधियों तक
पहुंचने लगा है। कैंट
विधायक सौरभ श्रीवास्तव के
क्षेत्र में हाल में
हुए विरोध ने भाजपा के
लिए असहज सवाल खड़ा
कर दिया है—जिस
काम की जिम्मेदारी नगर
निगम और संबंधित विभागों
की है, उसकी राजनीतिक
कीमत क्या विधायकों को
चुकानी पड़ रही है?
खास बातचीत में विधायक सौरभ
श्रीवास्तव ने इस सवाल
पर कई अहम बातें
कहीं। उनका कहना है
कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वाराणसी
के विकास के लिए पर्याप्त
धन उपलब्ध कराया, लेकिन समय रहते कई
परियोजनाओं को जमीन पर
नहीं उतारा जा सका। इसका
असर आज शहर की
सड़कों और गलियों में
दिखाई दे रहा है।
सौरभ ने कहा कि
विधायकों को विकास के
लिए मिलने वाली निधि सीमित
होती है, जबकि नगर
निगम का बजट करीब
2500 करोड़ रुपये बताया जाता है। ऐसे
में बारिश शुरू होने से
पहले सीवर और नालों
की प्रभावी सफाई क्यों नहीं
हो सकी, यह समझ
से परे है। उनका
कहना है कि यदि
नगर निगम और संबंधित
एजेंसियों ने समय रहते
अपनी जिम्मेदारी ठीक ढंग से
निभाई होती तो आज
जनता को जलभराव और
सीवर के पानी से
इस तरह जूझना नहीं
पड़ता।
विधायक के सामने फूटा गुस्सा
कश्मीरीगंज-गुरुधाम क्षेत्र में सीवर और
बारिश का पानी जमा
होने से परेशान लोगों
ने विधायक के सामने नाराजगी
जताई। रिपोर्टों के मुताबिक, स्थानीय
लोगों ने नारेबाजी भी
की। विधायक मौके पर पहुंचे
और अधिकारियों से बात कर
समस्या दूर करने के
निर्देश दिए। इसके बाद
सीवर लाइन की डिसिल्टिंग,
नई लाइन डालने और
पानी निकालने के लिए सक्शन
मशीन लगाने जैसी कार्रवाई शुरू
हुई। सौरभ का तर्क
है कि वाराणसी की
कई सीवर लाइनें दशकों
पुरानी हैं। उन्होंने यह
भी कहा कि प्रधानमंत्री
के अनुरोध पर शहर के
18 वार्डों में नई सीवर
और पेयजल लाइन के लिए
धन मिला है, जिसमें
कैंट विधानसभा क्षेत्र के 13 वार्ड शामिल हैं।
सवाल सिर्फ जलभराव का नहीं
बनारस में जलभराव इस समय सिर्फ मौसमी परेशानी नहीं रह गया है। लगातार बारिश और गंगा के बढ़ते जलस्तर ने संकट को और गंभीर किया है। हालिया दिनों में गंगा चेतावनी स्तर के ऊपर पहुंची और कई इलाके प्रभावित हुए। लेकिन सवाल यह है कि जहां जलभराव सीधे बारिश और गंगा के उफान से जुड़ा है, वहां की स्थिति समझ में आती है; उन इलाकों का क्या जहां बारिश के बाद सीवर का पानी सड़कों पर उतर आता है? यहीं से नगर निगम की तैयारी, नाला सफाई, सीवर नेटवर्क की क्षमता और परियोजनाओं के क्रियान्वयन पर सवाल उठते हैं। जनता विधायक को अपना प्रतिनिधि मानकर जवाब मांगती है, विधायक विभागों की ओर उंगली उठाते हैं और विभाग संसाधनों व पुरानी व्यवस्था का हवाला देते हैं। इस बीच बनारस की सड़क पर सवाल वही है—आखिर जवाबदेह कौन?

