Wednesday, 24 June 2026

अब आसमान से दिखेगी शिव की नगरी रोपवे से श्रद्धा और पर्यटन दोनों को मिलेगा नया आयाम

अब आसमान से दिखेगी शिव की नगरी रोपवे से श्रद्धा और पर्यटन दोनों को मिलेगा नया आयाम 

₹10 में उड़ान, ₹50 में गोदौलिया... बनारस रोपवे के किराये ने चौंकाया, मिलेगा रोपवे का रोमांच

15 किलो सामान दो घंटे तक मुफ्त, एक गंडोला में 10 यात्रियों की सुविधा

अब जाम नहीं, गंडोला की सवारी... बनारस तैयार

आसमान के रास्ते काशी, जेब पर नहीं पड़ेगा बोझ

पर्यटकों के साथ स्थानीय लोगों को भी मिलेगी जाम से राहत, समय और ईंधन दोनों की होगी बचत

सुरेश गांधी

वाराणसी। आस्था की नगरी काशी अब केवल आध्यात्मिक पर्यटन का केंद्र ही नहीं, बल्कि आधुनिक शहरी परिवहन का भी नया अध्याय लिखने जा रही है। देश के पहले अर्बन पब्लिक ट्रांसपोर्ट रोपवे के लिए जारी किराया सूची ने आम लोगों की उम्मीदों को नई उड़ान दे दी है। सबसे बड़ी बात यह है कि रोपवे का किराया इतना किफायती रखा गया है कि विद्यार्थी, नौकरीपेशा, व्यापारी, पर्यटक और आम नागरिकसभी बिना किसी झिझक के इसका लाभ उठा सकेंगे।

जारी प्रस्तावित किराये के अनुसार कैंट रेलवे स्टेशन से गोदौलिया तक पूरे मार्ग की यात्रा के लिए मात्र 50 रुपये देने होंगे। वहीं, एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन तक का किराया सिर्फ 10 रुपये निर्धारित किया गया है। यानी यदि कोई यात्री भारत माता मंदिर स्टेशन से रथयात्रा स्टेशन तक जाना चाहता है तो उसे केवल 10 रुपये खर्च करने होंगे। सावन माह के दौरान श्रद्धालुओं और पर्यटकों को रोपवे सेवा शुरु हो जायेगी.

रोपवे संचालन से जुड़ी एक और बड़ी सुविधा यात्रियों को आकर्षित करेगी। प्रत्येक यात्री 15 किलोग्राम तक का सामान दो घंटे के लिए स्टेशन पर निःशुल्क सुरक्षित रख सकेगा। इससे बाहर से आने वाले पर्यटकों, तीर्थयात्रियों और रेल यात्रियों को काफी राहत मिलेगी।  ये सभी व्यवस्थाएं संकेत देती हैं कि यह रोपवे केवल पर्यटन का आकर्षण नहीं, बल्कि काशी की दैनिक जीवनशैली बदलने वाला सार्वजनिक परिवहन बनने जा रहा है। अब शहर को इंतजार है उस दिन का, जब बनारस सचमुच जाम से ऊपर उड़ान भरेगा।

एक गंडोला में 10 यात्रियों की सुविधा

रोपवे के प्रत्येक गंडोला (केबिन) में 10 यात्री एक साथ आरामदायक यात्रा कर सकेंगे। वातानुकूलित, सुरक्षित और आधुनिक तकनीक से लैस ये गंडोला शहर के व्यस्त इलाकों के ऊपर से गुजरेंगे, जिससे सड़क जाम का सामना किए बिना कुछ ही मिनटों में गंतव्य तक पहुंचा जा सकेगा।

डिजिटल सुविधा और आधुनिक प्रबंधन

यात्रियों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए ऑनलाइन बुकिंग, डिजिटल टिकटिंग, आधुनिक स्टेशन, सुरक्षा व्यवस्था और अन्य यात्री सुविधाओं को भी परियोजना में शामिल किया गया है। इसका उद्देश्य केवल यात्रा कराना नहीं, बल्कि विश्वस्तरीय सार्वजनिक परिवहन का अनुभव देना है।

जाम से राहत, पर्यटन को नई रफ्तार

कैंट रेलवे स्टेशन, भारत माता मंदिर, रथयात्रा और गोदौलिया जैसे शहर के सबसे व्यस्त मार्ग पर प्रतिदिन हजारों वाहन चलते हैं। रोपवे शुरू होने के बाद इस मार्ग पर सड़क यातायात का दबाव कम होगा। इससे स्थानीय नागरिकों के साथ-साथ प्रतिदिन आने वाले हजारों पर्यटकों और श्रद्धालुओं को भी बड़ी राहत मिलेगी।

देश के लिए बनेगा मॉडल

वाराणसी देश का पहला शहर बनने जा रहा है, जहां सार्वजनिक शहरी परिवहन के रूप में रोपवे का नियमित संचालन होगा। यदि यह प्रयोग सफल रहता है तो देश के अन्य भीड़भाड़ वाले शहरों में भी इसी मॉडल को अपनाने का रास्ता खुलेगा।

रोपवे किराया एक नजर में

कैंट से गोदौलिया : ₹50

एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन तक : ₹10

️ 15 किलो तक सामान : 2 घंटे मुफ्त क्लॉक रूम सुविधा

एक गंडोला में : 10 यात्री

ऑनलाइन बुकिंग डिजिटल टिकटिंग

वातानुकूलित एवं आधुनिक केबिन

जाम से राहत, समय की बचत और प्रदूषण में कमी

Tuesday, 23 June 2026

देश के शहरों में खड़ी हैं मौत की इमारतें…!

देश के शहरों में खड़ी हैं मौत की इमारतें…! 

किसी भी शहर की पहचान उसकी ऊंची इमारतों से नहीं, बल्कि उनमें रहने और काम करने वाले लोगों की सुरक्षा से होती है। दुर्भाग्य से भारत के अधिकांश शहर आज ऐसे कंक्रीट के जंगलों में बदल चुके हैं, जहां विकास की चमक के पीछे सुरक्षा मानकों की अनदेखी का अंधेरा छिपा हुआ है। लखनऊ का भीषण अग्निकांड इसी कड़वी सच्चाई का भयावह उदाहरण है। यह केवल एक इमारत में लगी आग नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक व्यवस्था की विफलता है, जिसने वर्षों तक नियमों के उल्लंघन को सामान्य मान लिया। हर बड़े हादसे के बाद जांच, निलंबन और मुआवजे की औपचारिकताएं पूरी हो जाती हैं, लेकिन व्यवस्था की कार्यशैली जस की तस बनी रहती है। यदि इस त्रासदी को केवल लखनऊ तक सीमित समझने की भूल की गई, तो देश का कोई भी शहर अगली भयावह खबर बन सकता है। अब समय संवेदना व्यक्त करने का नहीं, बल्कि सुरक्षा को शासन और समाज दोनों की सर्वोच्च प्राथमिकता बनाने का है 

सुरेश गांधी

लखनऊ की घटना ने देश को झकझोर दिया, लेकिन सच यह है कि यह किसी एक शहर की त्रासदी नहीं है। दिल्ली की तंग गलियां हों, मुंबई की ऊंची इमारतें, कोलकाता के पुराने बाजार, सूरत की फैक्ट्रियां, हैदराबाद के व्यावसायिक परिसर, बेंगलुरु के स्टार्टअप हब, जयपुर, पटना, भोपाल, कानपुर, वाराणसी, इंदौर या गुवाहाटीभारत का शायद ही कोई बड़ा शहर हो जहां सुरक्षा नियमों से समझौता कर बनाई गई इमारतें मौत का इंतजार कर रही हों। फर्क सिर्फ इतना है कि कहीं आग अभी लगी नहीं है और कहीं अगला शॉर्ट सर्किट अभी होना बाकी है। देश में पिछले दो दशकों के बड़े अग्निकांडों का इतिहास बताता है कि हर त्रासदी के बाद जांच बैठती है, रिपोर्ट बनती है, दोषियों पर मुकदमे दर्ज होते हैं, कुछ अधिकारी निलंबित होते हैं और फिर कुछ महीनों बाद सब कुछ सामान्य हो जाता है। लेकिन व्यवस्था का चरित्र नहीं बदलता। यही कारण है कि हर नया हादसा पिछले हादसे की कार्बन कॉपी बनकर सामने आता है। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि भारत में तेजी से बढ़ते शहरीकरण के साथ सुरक्षा संस्कृति विकसित ही नहीं हो सकी। शहर ऊंचे हो गए, इमारतें आधुनिक हो गईं, लेकिन सोच अब भी पुरानी है। भवन निर्माण के समय सबसे पहले जिस चीज की बलि दी जाती है, वह है सुरक्षा। बिल्डर लागत बचाता है, संचालक जगह बचाता है, अधिकारी जिम्मेदारी बचाता है और अंततः नागरिक अपनी जान गंवाता है।

आज देश के अधिकांश शहरों में हजारों ऐसी इमारतें हैं जिन्हें आवासीय उपयोग के लिए स्वीकृति मिली थी, लेकिन उनमें कोचिंग सेंटर, हॉस्टल, अस्पताल, बैंक्वेट हॉल, गोदाम, कॉल सेंटर, कार्यालय, क्लीनिक और प्रशिक्षण संस्थान चल रहे हैं। भवन की क्षमता पचास लोगों की होती है, लेकिन रोजाना वहां दो सौ से तीन सौ लोग मौजूद रहते हैं। बिजली की अतिरिक्त लोडिंग, बंद खिड़कियां, संकरे रास्ते, ज्वलनशील सामग्री, अवैध निर्माण और इमरजेंसी एग्जिट का अभावयह लगभग हर शहर की सामान्य तस्वीर है। विडंबना यह है कि जब तक कोई हादसा नहीं होता, तब तक किसी विभाग को यह अवैधता दिखाई नहीं देती। लेकिन जैसे ही आग लगती है, उसी इमारत की फाइलों से वर्षों पुरानी अनियमितताएं निकलने लगती हैं। इसका सीधा अर्थ है कि व्यवस्था अनजान नहीं थी, बल्कि मौन थी। और कई बार यह मौन संयोग नहीं, बल्कि सुविधा का परिणाम होता है। फायर सेफ्टी को भारत में अब भी एक औपचारिकता माना जाता है। अग्निशमन यंत्र खरीद लेना ही सुरक्षा समझ लिया जाता है, जबकि वास्तविक सुरक्षा नियमित निरीक्षण, कर्मचारियों के प्रशिक्षण, मॉक ड्रिल, आपातकालीन निकासी योजना और भवन की संरचनात्मक तैयारी से आती है। दुर्भाग्य से इनमें से अधिकांश व्यवस्थाएं केवल कागजों पर मौजूद रहती हैं।

विशेष चिंता का विषय देश में तेजी से बढ़ते कोचिंग संस्थान, निजी प्रशिक्षण केंद्र, आईटी हब, साझा कार्यस्थल (को-वर्किंग स्पेस) और स्टार्टअप कार्यालय हैं। यहां प्रतिदिन हजारों युवा अपने सपनों के साथ पहुंचते हैं। लेकिन इन संस्थानों में से बड़ी संख्या ऐसी इमारतों में संचालित हो रही है, जो मूल रूप से इस उद्देश्य के लिए बनाई ही नहीं गई थीं। परिणाम यह है कि किसी भी आपात स्थिति में बाहर निकलना लगभग असंभव हो जाता है। आज आवश्यकता केवल दोषियों की गिरफ्तारी की नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भवन सुरक्षा सुधार अभियान की है। जिस प्रकार सड़क सुरक्षा, स्वच्छता और टीकाकरण को राष्ट्रीय मिशन बनाया गया, उसी प्रकार अग्नि सुरक्षा को भी जन आंदोलन बनाना होगा। हर राज्य में एक समयबद्ध अभियान चलाकर सभी व्यावसायिक, शैक्षणिक और सार्वजनिक भवनों का स्वतंत्र सुरक्षा ऑडिट कराया जाना चाहिए। जिन भवनों में गंभीर खामियां हों, उन्हें सुधार तक सील किया जाना चाहिए। निरीक्षण करने वाले अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय होनी चाहिए ताकि किसी दुर्घटना के बाद जिम्मेदारी केवल भवन मालिक तक सीमित रहे। अब समय गया है कि भवन निर्माण, नगर नियोजन, अग्निशमन विभाग और विकास प्राधिकरणों के बीच मौजूद प्रशासनिक खामियों को दूर किया जाए। डिजिटल अनुमति प्रणाली, ऑनलाइन निरीक्षण रिकॉर्ड, सार्वजनिक सुरक्षा रेटिंग और नागरिक शिकायत तंत्र को मजबूत किए बिना सुधार अधूरा रहेगा।

यह भी उतना ही आवश्यक है कि समाज स्वयं भी जागरूक हो। माता-पिता अपने बच्चों को जिस कोचिंग या संस्थान में भेजते हैं, वहां की सुरक्षा व्यवस्था देखने का अधिकार और जिम्मेदारी दोनों रखते हैं। कर्मचारियों को भी यह समझना होगा कि आपातकालीन निकास, अग्निशमन उपकरण और सुरक्षा अभ्यास केवल औपचारिक शब्द नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु के बीच की दूरी हैं। सभ्यता का विकास केवल ऊंची इमारतों से नहीं मापा जाता, बल्कि इस बात से मापा जाता है कि उन इमारतों के भीतर रहने और काम करने वाले लोग कितने सुरक्षित हैं। यदि भारत 'विकसित राष्ट्र' बनने का सपना देख रहा है, तो उसे 'सुरक्षित राष्ट्र' बनने की दिशा में भी उतनी ही गंभीरता से कदम बढ़ाने होंगे। लखनऊ की राख से उठता धुआं केवल उत्तर प्रदेश के आसमान में नहीं फैला है। वह पूरे भारत की अंतरात्मा से एक प्रश्न पूछ रहा हैक्या अगली आग भी किसी जांच आयोग का इंतजार करेगी, या इस बार व्यवस्था सचमुच बदलेगी? यदि इस प्रश्न का उत्तर आज नहीं दिया गया, तो आने वाले समय में किसी दूसरे शहर की कोई दूसरी इमारत फिर यही कहानी दोहराएगी, और हम एक बार फिर शोक, संवेदना और मुआवजे के पुराने चक्र में लौट आएंगे।क्या पूर्वांचल ने सबक लिया या अगली दुर्घटना का इंतजार है?

काशी की गलियां पूछ रही हैंक्या हम सुरक्षित हैं? कहीं देर हो जाए...!

लखनऊ के अलीगंज में हुई भीषण अग्निकांड की घटना केवल एक इमारत में लगी आग नहीं थी। उसने पूरे उत्तर प्रदेश की उस व्यवस्था को बेनकाब कर दिया, जो वर्षों से नियमों, मानकों और चेतावनियों को कागजों तक सीमित रखे हुए है। धुएं के गुबार में केवल 15 जिंदगियां नहीं बुझीं, बल्कि यह सवाल भी उठ खड़ा हुआ कि क्या प्रदेश के दूसरे शहर वास्तव में सुरक्षित हैं? यदि इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए राजधानी से निकलकर पूर्वांचल की ओर बढ़ें तो तस्वीर और भी बेचैन कर देने वाली दिखाई देती है। काशी की प्राचीन गलियां, भदोही के कालीन गोदाम, मिर्जापुर की औद्योगिक इकाइयां, जौनपुर के व्यावसायिक प्रतिष्ठान, गाजीपुर के बाजार, चंदौली के होटल, आजमगढ़ के कोचिंग सेंटर और गोरखपुर के बहुमंजिला कॉम्प्लेक्सहर शहर विकास की नई कहानी लिख रहा है, लेकिन इस विकास के पीछे सुरक्षा का अध्याय कितना मजबूत है, यह बड़ा प्रश्न है। सुबह होते ही वाराणसी की सड़कें विद्यार्थियों, श्रद्धालुओं और पर्यटकों से भर जाती हैं। लंका, सिगरा, महमूरगंज, भेलूपुर, चेतगंज, गोदौलिया, चौक और कैंट क्षेत्र में हजारों छात्र कोचिंग संस्थानों की ओर निकल पड़ते हैं। अनेक संस्थान बहुमंजिला भवनों में संचालित हैं। कहीं एक ही सीढ़ी है, कहीं आपातकालीन निकास नहीं, कहीं बेसमेंट तक विद्यार्थियों से भरे रहते हैं। यदि किसी मंजिल पर आग लग जाए तो बाहर निकलने के लिए अफरा-तफरी ही सबसे बड़ा रास्ता बन जाती है। शहर के निजी अस्पतालों की स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं है। अनेक अस्पताल घनी आबादी के बीच संचालित हैं। ऑक्सीजन, बिजली आधारित जीवनरक्षक उपकरण और सीमित निकास वाले भवन किसी भी आपात स्थिति में चुनौती बन सकते हैं। होटल और गेस्ट हाउस भी तेजी से बढ़े हैं। खासकर घाटों और पुराने शहर के आसपास बने अनेक छोटे होटल वर्षों पुराने भवनों में संचालित हैं। पर्यटक शायद ही कभी यह सोचते हों कि जिस कमरे में वे ठहरे हैं, वहां किसी दुर्घटना की स्थिति में सुरक्षित बाहर निकलने का रास्ता कितना आसान है। काशी की पहचान उसकी गलियां हैं। लेकिन यही गलियां किसी बड़े अग्निकांड की स्थिति में सबसे बड़ी बाधा बन सकती हैं। चौक, गोदौलिया, विश्वनाथ गली, दशाश्वमेध, सोनारपुरा और मदनपुरा जैसे इलाकों में दमकल वाहन का पहुंचना आसान नहीं है। मतलब साफ है शहर का बड़ा हिस्सा ऐसी इमारतों से भरा पड़ा है, जहां प्रतिदिन हजारों लोग आते-जाते हैं, लेकिन सुरक्षा व्यवस्था भगवान भरोसे है। सबसे अधिक चिंता उन व्यावसायिक भवनों को लेकर है जहां एक ही इमारत में कोचिंग सेंटर, लाइब्रेरी, हॉस्टल, पीजी, कैफे और कार्यालय एक साथ संचालित हो रहे हैं। कई स्थानों पर एक ही संकरी सीढ़ी आवागमन का एकमात्र रास्ता है। कहीं आपातकालीन निकास नहीं है तो कहीं अग्निशमन यंत्र वर्षों से केवल दीवार की शोभा बढ़ा रहे हैं। कई स्थानों पर फायर ब्रिगेड को मुख्य सड़क पर वाहन रोककर सैकड़ों मीटर पाइप बिछाकर अंदर जाना पड़ सकता है। आग यदि ऊपरी मंजिलों तक फैल जाए तो राहत और बचाव अभियान और कठिन हो जाएगा। गंगा घाटों की तस्वीर भी अलग नहीं है। दशाश्वमेध, अस्सी, राजेंद्र प्रसाद, मणिकर्णिका और अन्य घाटों पर प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु और पर्यटक पहुंचते हैं। घाटों के ऊपर बने अनेक होटल, धर्मशालाएं, गेस्ट हाउस और रेस्टोरेंट पुराने भवनों में संचालित हो रहे हैं। कई भवनों का विस्तार वर्षों में बिना समुचित सुरक्षा व्यवस्था के हुआ है। ऐसे भवनों में आग लगने पर लोगों को सुरक्षित बाहर निकालना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं होगा।

कोचिंग और लाइब्रेरी कल्चर नई चिंता

शहर में तेजी से बढ़े कोचिंग और लाइब्रेरी कल्चर ने भी नई चिंता पैदा कर दी है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले हजारों छात्र सुबह से देर रात तक इन संस्थानों में रहते हैं। कई लाइब्रेरी बेसमेंट या ऊपरी मंजिलों में संचालित हैं। कहीं पर्याप्त वेंटिलेशन नहीं, कहीं केवल एक सीढ़ी और कहीं अग्निशमन उपकरणों की नियमित जांच तक नहीं होती। निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम की स्थिति भी चिंता का विषय है। कई छोटे अस्पताल घनी आबादी के बीच संचालित हैं, जहां पार्किंग की जगह भी नहीं है। मरीजों, ऑक्सीजन सिलेंडरों और बिजली पर निर्भर उपकरणों के बीच यदि आग लग जाए तो राहत कार्य और अधिक कठिन हो सकता है।

भदोही में भी कई गोदाम मानकों के अनुरूप नहीं 

वाराणसी से लगभग 45 किमी दूर भदोही का कालीन उद्योग देश की पहचान है। यहां हजारों छोटे-बड़े गोदामों में ऊन, धागा, कपड़ा, पैकिंग सामग्री और अन्य ज्वलनशील वस्तुएं रखी जाती हैं। कई गोदाम औद्योगिक मानकों के अनुरूप हैं, लेकिन अनेक छोटे स्टोरेज और कार्यस्थलों में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। यदि किसी ऐसे गोदाम में आग लगती है तो नुकसान केवल आर्थिक नहीं होगा, बल्कि सैकड़ों परिवारों की आजीविका भी प्रभावित होगी। यही तस्वीर मिर्जापुर, जौनपुर, गाजीपुर, चंदौली, आजमगढ़, बलिया और गोरखपुर के कई व्यावसायिक क्षेत्रों में भी दिखाई देती है। कहीं होटल हैं, कहीं मैरिज लॉन, कहीं निजी अस्पताल, कहीं कोचिंग सेंटर और कहीं बड़े गोदाम। सवाल किसी एक शहर का नहीं, बल्कि पूरे पूर्वांचल के शहरी ढांचे का है।

पहले भी हो चुके है अग्निकांड के हादसे

देश पहले भी ऐसी त्रासदियों से सबक लेने की कोशिश कर चुका है। 2019 में सूरत के कोचिंग सेंटर में आग लगी तो दर्जनों छात्रों की मौत ने पूरे देश को झकझोर दिया। दिल्ली के अनाज मंडी अग्निकांड ने संकरी गलियों और अवैध निर्माण की भयावह तस्वीर दिखाई। कोलकाता के अस्पताल और होटल अग्निकांड ने यह साबित किया कि अग्नि सुरक्षा में छोटी-सी लापरवाही भी सामूहिक त्रासदी में बदल सकती है। हर घटना के बाद जांच बैठी, नियम बने, अभियान चले, लेकिन समय बीतते ही अधिकांश व्यवस्थाएं फिर पुराने ढर्रे पर लौट गईं। इस पूरी व्यवस्था में नागरिकों की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। भवन मालिक अधिक किराया कमाने के लिए क्षमता से अधिक लोगों को एक ही भवन में ठहराते हैं। कई संस्थान सुरक्षा पर खर्च को अतिरिक्त बोझ मानते हैं। दूसरी ओर लोग भी किसी होटल, हॉस्टल, अस्पताल या कोचिंग में प्रवेश करते समय यह देखने की जरूरत नहीं समझते कि आपातकालीन निकास कहां है और आग लगने पर बाहर निकलने का रास्ता क्या होगा। लखनऊ की आग अब बुझ चुकी है, लेकिन उसके धुएं ने पूरे प्रदेश को एक आईना दिखा दिया है। यह आईना बता रहा है कि यदि आज भी सुरक्षा मानकों को गंभीरता से नहीं लिया गया, यदि अवैध निर्माण, बंद निकास मार्ग, खराब अग्निशमन व्यवस्था और कागजी अनुपालन की संस्कृति नहीं बदली गई, तो अगली त्रासदी का शहर कोई भी हो सकता हैवाराणसी, भदोही, मिर्जापुर, गोरखपुर या पूर्वांचल का कोई और नगर।

कागजी एनओसी पर्याप्त नहीं

फायर विभाग समय-समय पर जागरूकता अभियान चलाता है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल कागजी एनओसी पर्याप्त नहीं है। वास्तविक सुरक्षा तभी संभव है जब उपकरण चालू हालत में हों, कर्मचारियों को प्रशिक्षण मिला हो, मॉक ड्रिल नियमित हो और आपातकालीन निकास हमेशा खुला रखा जाए। स्थानीय लोगों का भी कहना है कि शहर में अनेक भवन आवासीय नक्शे पर बने, लेकिन बाद में उन्हें व्यावसायिक उपयोग में बदल दिया गया। कहीं हॉस्टल खुल गए, कहीं कोचिंग, कहीं होटल और कहीं रेस्टोरेंट। इससे भवनों पर भार भी बढ़ा और जोखिम भी।

कार्रवाई केवल छोटे प्रतिष्ठानों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए

व्यापारिक संगठनों का कहना है कि कार्रवाई केवल छोटे प्रतिष्ठानों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यदि सुरक्षा मानकों की जांच हो रही है तो सभी संस्थानों पर समान रूप से लागू हो। वहीं नागरिकों का मानना है कि हादसे के बाद कुछ दिनों तक अभियान चलता है, फिर व्यवस्था पुराने ढर्रे पर लौट आती है। काशी हर दिन लाखों श्रद्धालुओं, पर्यटकों, विद्यार्थियों और मरीजों की मेजबानी करती है। ऐसे में आवश्यकता केवल अभियान चलाने की नहीं, बल्कि स्थायी व्यवस्था विकसित करने की है। क्योंकि हादसे के बाद राहत पहुंचाना कठिन होता है, लेकिन हादसे को रोकना कहीं अधिक आसान और प्रभावी।

अब आसमान से दिखेगी शिव की नगरी रोपवे से श्रद्धा और पर्यटन दोनों को मिलेगा नया आयाम

अब आसमान से दिखेगी शिव की नगरी रोपवे से श्रद्धा और पर्यटन दोनों को मिलेगा नया आयाम  ₹10 में उड़ान , ₹50 में गोदौलिया ......