फांसी का फंदा चूमकर अमर हो गया भदोही का बेटा बाबू झूरी सिंह…
गंगा के पूर्वी तट पर जब सावन की हवा खेतों को सहलाती है, तब भदोही की मिट्टी से एक अनकही आवाज उठती है। वह आवाज किसी मंदिर की घंटी नहीं, किसी शंख का नाद नहीं, बल्कि उन शहीदों की स्मृति है जिन्होंने इस धरती को स्वतंत्र सांस लेने का अधिकार दिया। परऊपुर गांव की पगडंडी पर चलते हुए आज भी लगता है मानो कोई घोड़े की टाप सुनाई दे रही हो—वह बाबू झूरी सिंह हैं, हाथ में तलवार, आंखों में ज्वाला और हृदय में मातृभूमि का अपार प्रेम लिए हुए। स्वतंत्रता की कहानी केवल दिल्ली, कानपुर और झांसी की नहीं है। भदोही की यह धरती भी उस महागाथा की साक्षी है, जहां किसानों ने हल छोड़कर तलवार उठाई थी और अंग्रेजी साम्राज्य को चुनौती दी थी। गंगा के पूर्वांचल तट पर बसे भदोही की मिट्टी में भी 1857 की ऐसी ज्वाला भड़की थी, जिसने अंग्रेजी सत्ता की नींव हिला दी थी। इस जनविद्रोह के केंद्र में थे अमर क्रांतिकारी बाबू झूरी सिंह—एक किसान पुत्र, जननायक और ऐसे योद्धा जिन्होंने नील की गुलामी के विरुद्ध जनता को संगठित किया। उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े थे वीर संग्राम सिंह, जिनकी मित्रता केवल व्यक्तिगत संबंध नहीं बल्कि स्वतंत्रता संग्राम की साझी प्रतिज्ञा थी। भदोही की धरती से उठी यह मशाल मिर्जापुर, चुनार, सोनभद्र, रोहतास और जगदीशपुर तक फैल गई। स्वतंत्रता दिवस पर यह फीचर उस भूले-बिसरे महानायक को श्रद्धांजलि है, जिसके बलिदान पर आज का स्वतंत्र भारत खड़ा है
सुरेश गांधी
परऊपुर
: जहां एक बालक ने
विद्रोह की पहली सांस
ली… जी हां, 21 अक्टूबर 1816 को मिर्जापुर मंडल
के तत्कालीन भदोही क्षेत्र के परऊपुर गांव
में जन्मे झूरी सिंह किसी
राजमहल में नहीं, एक
साधारण कृषक परिवार में
पले-बढ़े। संयुक्त परिवार, मिट्टी का आंगन, बैलों
की घंटियां और खेतों की
हरियाली—यही उनकी दुनिया
थी। पर उस हरियाली
पर अंग्रेजी नील की नीली
परछाईं छाई हुई थी।
किसान अपनी इच्छा से
खेती नहीं कर सकता
था; खेत उसका था,
पर फसल कंपनी की।
मजदूरी के नाम पर
मुट्ठी भर अनाज मिलता
और परिवार भूख से जूझता।
भूख जब घर की
चौखट पर बैठ जाती
है, तब विद्रोह जन्म
लेता है। भदोही के
किसानों की आंखों में
वही विद्रोह धीरे-धीरे अंगार
बन रहा था। लोककवि
ने उस पीड़ा को
शब्द दिए—
«नील की खेती
कराते
जो
प्रबल
अन्याय
था,
करते
रहे
कृषकनियां
ये
सर
कटते
गाय
का।»
इन पंक्तियों में
केवल कविता नहीं, किसानों के रक्त से
लिखी हुई एक पूरी
सभ्यता की कराह है।
उस समय के किसान
जीवन की करुण चीख
सुनाई देती है। 28 फरवरी
1857 को अमोली में एक गुप्त
सभा हुई। झूरी सिंह,
उदवंत सिंह, रामबख्श सिंह, रघुबीर सिंह, दिलीप सिंह, माताबदल सिंह, सर्वजीत सिंह और अनेक
ग्रामीण नेताओं ने अंग्रेजी शासन
को उखाड़ फेंकने की योजना बनाई।
निर्णय हुआ कि— - नील
की खेती का बहिष्कार
होगा, - सरकारी खजाने पर कब्जा किया
जाएगा, - अंग्रेज समर्थकों का प्रतिरोध किया
जाएगा, - स्वतंत्र प्रशासन स्थापित किया जाएगा। यह
केवल बैठक नहीं थी;
पूर्वांचल की किसान क्रांति
का घोषणापत्र था।
अमोली की रात : जब क्रांति ने आंखें खोलीं
फरवरी 1857 की एक रात
अमोली गांव में दीपक
धीमे-धीमे जल रहे
थे। बाहर सन्नाटा था,
भीतर इतिहास करवट ले रहा
था। झूरी सिंह, संग्राम
सिंह, उदवंत सिंह, रामबख्श सिंह, रघुबीर सिंह और अनेक
ग्रामीण नेता एकत्र हुए।
निर्णय हुआ कि अब
अन्याय सहना पाप होगा।
नील की खेती का
बहिष्कार किया जाएगा। सरकारी
खजाना जनता का होगा।
अंग्रेजी शासन को उखाड़
फेंका जाएगा। उस रात किसी
ने शपथ ली होगी,
किसी ने मिट्टी माथे
से लगाई होगी, किसी
ने अपने बच्चों की
ओर अंतिम बार देखा होगा।
वही रात भदोही की
जनक्रांति का उदय बन
गई।
तीन जून : जब खेतों में आग लगी और आसमान कांप उठा
3 जून 1857 की सुबह भदोही
ने अपने इतिहास का
सबसे उग्र सूर्योदय देखा।
किसानों ने नील की
फसल जला दी। धुएं
की काली लपटें आसमान
में उठीं तो लगा
मानो धरती स्वयं गुलामी
की बेड़ियां तोड़ रही हो।
जीटी रोड रुक गई।
अंग्रेजी माल लूट लिया
गया। चौकियां खाली होने लगीं।
मिर्जापुर की ओर भागते
अंग्रेज सैनिकों ने पहली बार
समझा कि किसान जब
जागता है तो साम्राज्य
की नींव हिल जाती
है। जनता ने झूरी
सिंह को अपना नेता
स्वीकार किया। यह किसी राजा
का राज्याभिषेक नहीं था; यह
पीड़ित जनता का अपने
उद्धारक पर विश्वास था।
यूरोपीय इतिहासकारों
ने भी स्वीकार किया
कि भदोही का विद्रोह अचानक
नहीं, बल्कि व्यापक जनसमर्थन से संचालित आंदोलन
था। अंग्रेज सैनिक मिर्जापुर की पहाड़ियों की
ओर भागने लगे। कुछ ही
दिनों में ग्रामीण क्षेत्रों
में अंग्रेजी प्रशासन लगभग निष्प्रभावी हो
गया।
गोपीगंज का पीपल : जिसने शहीदों को झूलते देखा
अंग्रेजों ने तलवार से
नहीं, छल से वार
किया। 16 जून 1857 को संधि वार्ता
के बहाने उदवंत सिंह और उनके
साथियों को बुलाया गया
और गिरफ्तार कर लिया गया।
गोपीगंज के शाही मार्ग
पर पीपल के वृक्ष
से उन्हें फांसी पर लटका दिया
गया। शव कई दिनों
तक झूलते रहे। अंग्रेज चाहते
थे कि जनता डर
जाए। पर भदोही रोया
जरूर, झुका नहीं। कहा
जाता है कि उस
दिन गांव की स्त्रियां
चुपचाप मिट्टी सिर पर डालकर
बैठी रहीं और पुरुषों
ने दांत भींच लिए।
उसी क्षण प्रतिशोध की
अग्नि और प्रचंड हो
उठी।
रत्ना सिंह : जिसने आंसुओं की जगह तलवार चुनी
उदवंत सिंह की पत्नी
कुंवरी रत्ना सिंह ने विलाप
नहीं किया। उन्होंने तलवार उठाई और अंग्रेज
अधिकारी मूर के वध
का संकल्प लिया। पूर्वांचल की उस वीरांगना
ने सिद्ध कर दिया कि
स्वतंत्रता केवल पुरुषों की
लड़ाई नहीं थी; मातृभूमि
की रक्षा में स्त्रियों ने
भी प्राणों की बाजी लगा
दी थी।
झूरी और संग्राम : मित्रता जो राष्ट्रधर्म बन गई
भदोही की लोकस्मृति में
झूरी सिंह और संग्राम
सिंह का नाम अलग-अलग नहीं लिया
जाता। दोनों गांव-गांव घूमते,
चौपालों में बैठते, किसानों
को जगाते और युवाओं में
स्वाभिमान की आग भरते
थे। संग्राम सिंह उनके केवल
मित्र नहीं थे; वे
उनके संघर्ष का दूसरा स्वर
थे। जहां झूरी सिंह
जाते, वहां संग्राम सिंह
की हुंकार पहुंचती। जहां संग्राम सिंह
जनता को संगठित करते,
वहां झूरी सिंह क्रांति
का नेतृत्व संभालते। लोकगीतों में आज भी
कहा जाता है कि
“एक की तलवार थी,
दूसरे की पुकार।”
पाली गोदाम कांड : जब अंग्रेजी सत्ता का सिर झुक गया
4 जुलाई 1857 की संध्या। पाली
का नील गोदाम। लगभग
तीन सौ किसान तलवार,
भाला, लाठी और गड़ासे
लेकर आगे बढ़े। उनके
अग्रभाग में थे झूरी
सिंह। अंग्रेज अधिकारी विलियम रिवर्ड मूर और उसके
साथी घिर गए। क्षण
भर में तलवारें चमकीं
और अंग्रेजी अभिमान धराशायी हो गया। यह
केवल हत्या नहीं थी; यह
उस व्यवस्था के विरुद्ध उद्घोष
था जिसने किसानों की पीढ़ियां कुचल
दी थीं। झूरी सिंह
के युवा भतीजे मुसई
सिंह कटे हुए सिर
लेकर गांव-गांव घूमे
ताकि जनता देख सके
कि अंग्रेज अजेय नहीं हैं।
उस समय उनकी आयु
मात्र सोलह वर्ष थी।
इतिहास के पन्ने उस
दृश्य को पढ़ते हुए
आज भी कांप उठते
हैं।
जलता हुआ भदोही
पाली कांड के
बाद अंग्रेजी प्रतिशोध आग बनकर बरसा।
परऊपुर, सदईपुर और आसपास के
गांव जला दिए गए।
घर राख हो गए।
महिलाएं बच्चों को लेकर खेतों
और जंगलों में छिपने लगीं।
झूरी सिंह पर एक
हजार रुपये का इनाम घोषित
हुआ। उनके साथियों पर
पांच सौ रुपये। पर
जनता ने उन्हें धोखा
नहीं दिया। किसी ने अन्न
दिया, किसी ने आश्रय,
किसी ने संदेश पहुंचाया।
एक जननायक को जनता ही
बचाती है।
जनता का राजा
इतिहासकार लिखते हैं कि झूरी
सिंह को व्यापक जनसमर्थन
प्राप्त था। अमोली की
वीरांगना रत्ना सिंह ने धन
जुटाया। सुरियावां के व्यापारियों ने
सहायता दी। करसिंग और
कृपालपुर के किसानों ने
शरण दी। यह आंदोलन
सैनिक विद्रोह नहीं, जनविद्रोह था। खेत, खलिहान,
चौपाल और बाजार—सब
एक साथ उठ खड़े
हुए थे।
कुँवर सिंह से मिलन : दो धाराओं का संगम
24 अगस्त 1857 को झूरी सिंह
की भेंट जगदीशपुर के
महान योद्धा बाबू कुँवर सिंह
से हुई। वह मिलन
केवल दो व्यक्तियों का
नहीं था; वह पूर्वांचल
और बिहार की क्रांतिकारी धाराओं
का संगम था। इसके
बाद झूरी सिंह और
संग्राम सिंह ने मिलकर
चुनार, मिर्जापुर, सोनभद्र और रोहतास तक
विद्रोह की लौ फैला
दी। थाने लूटे गए,
तहसीलों में आग लगी,
डाक व्यवस्था बाधित हुई और अंग्रेजी
प्रशासन भय से कांप
उठा।
गीतों में जीवित क्रांति
जब दोनों सेनानी
भूमिगत जीवन जी रहे
थे, तब गांवों की
महिलाएं बिरहा और आल्हा गाकर
उनका संदेश फैलाती थीं। चौपालें क्रांति
की पाठशाला बन गई थीं।
लोकगीतों में झूरी सिंह
को “किसानन के राजा” और
संग्राम सिंह को “रणभेरी
का स्वर” कहा जाता था।
इतिहास जहां मौन हो
जाता है, वहां लोकगीत
सच बोलते हैं।
विश्वासघात : इतिहास का सबसे कड़वा अध्याय
अंततः अंग्रेजों ने विश्वासघात का
मार्ग चुना। नेपाल से लौटते समय
झूरी सिंह अपने ससुराल
पक्ष के यहां रुके।
लालच में सूचना अंग्रेजों
तक पहुंचा दी गई। उन्हें
गिरफ्तार कर मिर्जापुर जेल
भेजा गया। मुकदमा केवल
औपचारिकता था। निर्णय पहले
से तय था। विंध्याचल
के ओझला नाले के
पास उन्हें फांसी दी गई। कहा
जाता है कि अंतिम
क्षण में भी उन्होंने
सिर नहीं झुकाया। उन्होंने
फंदे को चूमा और
मातृभूमि को प्रणाम किया।
उस दिन भदोही ने
अपना बेटा खो दिया,
पर भारत ने एक
अमर शहीद पा लिया।
संग्राम सिंह का अंतिम प्रण
झूरी सिंह की
शहादत के बाद संग्राम
सिंह ने संघर्ष नहीं
छोड़ा। वे गांव-गांव
घूमते रहे, जनता को
संगठित करते रहे और
अपने मित्र की स्मृति को
क्रांति की ज्योति बनाकर
जीवित रखते रहे। भदोही
की लोकस्मृति में आज भी
दोनों का नाम एक
साथ लिया जाता है।
यह मित्रता रक्त से लिखी
हुई थी।
आज भी पूछता है गोपीगंज का पीपल
स्वतंत्र भारत में तिरंगा
लहराता है, पर गोपीगंज
का वह पीपल आज
भी पूछता है—क्या हमने
उन शहीदों को याद रखा?
परऊपुर की मिट्टी आज
भी प्रतीक्षा करती है कि
कोई आकर उसके अमर
पुत्र का नाम पुकारे।
पाली का गोदाम आज
भी हवा से कहता
है कि वहां कभी
किसानों ने साम्राज्य को
चुनौती दी थी।
स्वतंत्रता दिवस पर हमारी प्रतिज्ञा
जब हम 15 अगस्त
की सुबह ध्वजारोहण करेंगे,
तब हमें उन गुमनाम
चेहरों को भी याद
करना होगा जिनकी शहादत
पाठ्यपुस्तकों में कम है,
पर राष्ट्र की आत्मा में
गहरी अंकित है। झूरी सिंह
ने हमें सिखाया कि
किसान भी इतिहास बदल
सकता है। संग्राम सिंह
ने सिखाया कि मित्रता जब
राष्ट्रधर्म बन जाती है
तो वह मृत्यु से
भी बड़ी हो जाती
है। आज भदोही की
धरती अपने दोनों महान
सपूतों को नमन करती
है। हवा में मानो
फिर वही स्वर तैरता
है— “यह मिट्टी गुलाम
नहीं रहेगी।” और सचमुच, उस
स्वर की गूंज में
हर भारतीय की आंखें नम
हो उठती हैं।
परिवारजन द्वारा बताए गए महत्वपूर्ण तथ्य
डॉ. रामेश्वर सिंह, प्रपौत्र अमर शहीद बाबू झूरी सिंह, के अनुसार— स्मारक का शिलान्यास 1981 में तत्कालीन मुख्यमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने किया था। स्मारक स्थल ज्ञानपुर मुख्यालय से लगभग 7 किमी लखनऊ मार्ग पर स्थित है और इसके आसपास लगभग 3.5 एकड़ का अमृत सरोवर, 2 एकड़ का क्रीड़ा स्थल, शिव मंदिर, हनुमान मंदिर, शनि मंदिर, गणेश मंदिर, सामुदायिक भवन, कीर्तन भवन तथा स्वामी अखंडानंद आश्रम स्थित हैं; इन्हें विकसित कर महत्वपूर्ण पर्यटन केंद्र बनाया जा सकता है। 10 जून 1857 को भदोही के अंग्रेज अधिकारी और सैनिक क्षेत्र छोड़कर मिर्जापुर की पहाड़ियों की ओर भाग गए थे। क्रांतिकारियों ने कुछ समय के लिए भदोही को स्वतंत्र घोषित किया और अभोली निवासी उदवंत सिंह को राजा घोषित किया गया था। गोपीगंज के शाही मार्ग स्थित इमली के पेड़ पर उदवंत सिंह, भोला सिंह, रामबख्श सिंह सहित कgई क्रांतिकारियों को फांसी दी गई और उनके शव भय फैलाने के लिए पेड़ पर लटकाए गए थे। 4 जुलाई 1857 को पाली स्थित नील गोदाम पर झूरी सिंह ने लगभग दो सौ साथियों के साथ हमला किया और अंग्रेज अधिकारी विलियम रिचर्ड मूर का वध किया।


