रोशनी में नहाए बाजार, दीपोत्सव का हुआ शंखनाद
दीपों के संग छलकी समृद्धि, लक्ष्मी के आगमन से दमकी काशी
बरतनों की
छनक
और
सिक्कों
की
खनक
से
गूंजे
बाजार,
सराफा
में
उमड़ी
भीड़
सोने की
कीमतों
की
तपिश
के
बीच
चांदी
की
खनक,
हल्के
आभूषणों
का
बढ़ा
आकर्षण
• लक्ष्मी-गणेश के
सिक्कों
से
लेकर
आभूषणों,
कार-बाइक
से
लेकर
इलेक्ट्रॉनिक्स
तक
खूब
हुई
खरीदारी
• शुभ मुहूर्त में
नई
संपत्ति
और
समृद्धि
का
स्वागत,
देर
रात
तक
बाजारों
में
बरसी
धनवर्षा,
घरों-मंदिरों
और
प्रतिष्ठानों
में
रोशनी
के
साथ
दीपोत्सव
का
शंखनाद
सुरेश गांधी
वाराणसी। दीपों की लौ में
आस्था झिलमिलाई तो बाजारों में
समृद्धि की चमक उतर
आई। कहीं सोने-चांदी
की खनक थी तो
कहीं पीतल और तांबे
के बर्तनों की छनक। किसी
ने लक्ष्मी-गणेश के सिक्के
खरीदे तो किसी ने
नए वाहन की चाबी
थामी। घरों की दहलीज
से लेकर प्रतिष्ठानों के
प्रवेश द्वार तक दीपों की
कतारें सजीं। शुक्रवार को धनतेरस पर
काशी ने कुछ इसी
अंदाज में दीपोत्सव का
स्वागत किया। सुबह से शुरू
हुई खरीदारी की रफ्तार देर
रात तक थमी नहीं।
महंगाई और धातुओं की
ऊंची कीमतों के बावजूद ग्राहकों
के उत्साह में कमी नहीं
दिखी।
बाजारों में उमड़ी भीड़
ने साफ कर दिया
कि शुभ अवसर पर
कुछ नया खरीदने की
भारतीय परंपरा आज भी उतनी
ही जीवंत है। कारोबारी अनुमानों
के मुताबिक, धनतेरस पर वाराणसी सहित
पूर्वांचल में करीब 4000 करोड़
रुपये का कारोबार हुआ।
सराफा कारोबार में पिछले वर्ष
के मुकाबले लगभग 30 प्रतिशत वृद्धि का दावा किया
गया। इस तरह धनतेरस
ने केवल दुकानदारों की
तिजोरियां ही नहीं भरीं,
बल्कि त्योहार की अर्थव्यवस्था को
भी नई चमक दी।
मतलब साफ है बाजार में
चमक सोने की थी,
लेकिन खरीदारी का उत्साह महंगाई
से कहीं अधिक दमदार
निकला। बाजारों में आस्था, आकांक्षा
और आर्थिक गतिविधियों का ऐसा संगम
दिखा, जिसने त्योहार की रौनक को
नई ऊंचाई दी। सुबह से शुरू हुई
खरीदारी देर रात तक
जारी रही। सोने-चांदी
की ऊंची कीमतें हों
या घरेलू बजट की चिंता,
शुभ दिन पर कुछ
नया घर लाने की
परंपरा के आगे सब
छोटे पड़ गए। इस
बार खरीदारी का अंदाज जरूर
बदला, लेकिन उत्साह नहीं।
सोने की तपिश में चांदी की चमक ने संभाला बाजार
धनतेरस पर सराफा बाजार
की तस्वीर इस बार कुछ
अलग रही। सोने की
बढ़ती कीमतों ने ग्राहकों को
खरीदारी का बजट नए
सिरे से तय करने
को मजबूर किया तो चांदी
ने उनके लिए नए
विकल्प खोल दिए। भारी
हार और बड़े सेट
की जगह हल्के वजन
के आकर्षक गहने पसंद किए
गए। चेन, लॉकेट, अंगूठी,
छोटी बालियां और रोजमर्रा में
पहने जा सकने वाले
आभूषणों की मांग रही।
वहीं चांदी के सिक्के, लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमाएं,
कटोरी, गिलास, चम्मच और पूजा के
बर्तनों की खूब बिक्री
हुई। चांदी की छोटी कलात्मक
आकृतियों ने भी ग्राहकों
का ध्यान खींचा। हाथी, कछुआ, मछली और अन्य
शुभ प्रतीकों वाली आकृतियां कम
बजट में खरीदारी का
आकर्षक विकल्प बनीं। इस तरह सोने
की कीमतों ने खरीदारी की
मात्रा और स्वरूप को
प्रभावित जरूर किया, लेकिन
सराफा बाजार की रौनक बरकरार
रही।
40 ग्राम का लुक, 15-18 ग्राम में तलाश रहे खूबसूरती
आभूषणों के बाजार में
सबसे दिलचस्प बदलाव डिजाइन और वजन के
बीच संतुलन का है। कारोबारी
बताते हैं कि जो
ब्राइडल नेकलेस सेट पहले करीब
40 ग्राम सोने में तैयार
होता था, वैसा ही
भव्य लुक अब 15 से
18 ग्राम में देने की
कोशिश हो रही है।
18 कैरेट के गहने, हल्के
डिजाइन और डायमंड जड़ित
मंगलसूत्र भी पसंद किए
जा रहे हैं। ग्राहक
अब सिर्फ सोने का वजन
नहीं, डिजाइन, उपयोगिता और बजट तीनों
को ध्यान में रखकर खरीदारी
कर रहे हैं। यह
बदलता बाजार बताता है कि महंगाई
ने उपभोक्ता की पसंद को
खत्म नहीं किया, बल्कि
उसे अधिक समझदार बनाया
है।
चांदी के सिक्के से आगे बढ़ी खरीदारी की परंपरा
धनतेरस पर चांदी खरीदने
का अर्थ अब केवल
सिक्का खरीदकर तिजोरी में रखना नहीं
रह गया है। चांदी
के दीपक, पूजा की थाली,
कटोरी, गिलास और लक्ष्मी-गणेश
की प्रतिमाओं के प्रति आकर्षण
बढ़ा है। उपहार के
रूप में भी चांदी
के उपयोगी सामान पसंद किए जा
रहे हैं। पारंपरिक आस्था
के साथ बदलती जीवनशैली
ने सराफा बाजार को नए उत्पादों
का बड़ा संसार दे
दिया है। कम बजट
वाले ग्राहकों से लेकर बड़े
खरीदारों तक, हर वर्ग
के लिए बाजार में
विकल्प मौजूद रहे।
नई चाबी के साथ घर पहुंचे खुशियों के सपने
वाहन बाजार में
भी धनतेरस की रौनक देखते
ही बनी। दोपहिया और
चारपहिया वाहनों के शोरूम में
ग्राहकों की आवाजाही रही।
पहले से बुक कराए
गए वाहनों की डिलीवरी शुभ
मुहूर्त में लेने के
लिए परिवार पहुंचे। युवाओं में बाइक और
स्कूटर का आकर्षण रहा
तो परिवारों ने कार को
प्राथमिकता दी। इलेक्ट्रिक वाहनों
के प्रति भी दिलचस्पी दिखाई
दी। आसान फाइनेंस, एक्सचेंज
बोनस, आकर्षक डाउनपेमेंट और किस्तों की
सुविधा ने खरीदारी को
गति दी। वाहन खरीदना
अब केवल परिवहन की
जरूरत पूरी करना नहीं,
बल्कि परिवार के सपनों और
सामाजिक आकांक्षाओं से भी जुड़
गया है। धनतेरस पर
नई चाबी के साथ
घर लौटते परिवारों की खुशी बाजार
की सबसे जीवंत तस्वीर
बनी।
रसोई से ड्राइंगरूम तक बदली खरीदारी की पसंद
बर्तन बाजार में पीतल, तांबे
और स्टील की परंपरागत चमक
के साथ आधुनिक किचन
सेट और डिजाइनर डिनरवेयर
का आकर्षण रहा। ठठेरी बाजार,
लक्सा और अन्य प्रमुख
बाजारों में पूजा के
बर्तनों से लेकर कॉपर
बोतल, सर्विंग ट्रे और प्रीमियम
कुकवेयर तक की खरीदारी
हुई। दूसरी ओर इलेक्ट्रॉनिक्स प्रतिष्ठानों
में स्मार्ट टीवी, फ्रिज, वाशिंग मशीन, मोबाइल और घरेलू उपकरणों
की मांग रही। बड़ी
स्क्रीन वाले टीवी और
आधुनिक सुविधाओं वाले घरेलू उपकरणों
के प्रति ग्राहकों का रुझान दिखा।
एक्सचेंज, कैशबैक और आसान ईएमआई
ने खरीदारी को और सुविधाजनक
बनाया। यह बदलाव बताता
है कि धनतेरस अब
केवल परंपरागत धातु और बर्तन
खरीदने का दिन नहीं,
बल्कि घर की जरूरतों
और जीवनशैली को नया रूप
देने का अवसर भी
बन गया है।
मिट्टी के दीयों से छोटे कारोबारियों के घर भी रोशन
बड़े शोरूमों की
चमक के बीच छोटे
दुकानदारों की उम्मीदें भी
जगमगाईं। मिट्टी के दीये, गोबर
से बने पारंपरिक दीप,
लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमाएं,
पूजा सामग्री, फूल-मालाएं, रंगोली
और सजावटी सामान की दुकानों पर
ग्राहकों की आवाजाही रही।
स्थानीय कारीगरों और कुम्हारों के
उत्पादों ने त्योहार की
परंपरा को जीवंत रखा।
घरों, मंदिरों और प्रतिष्ठानों में
दीपदान के साथ विद्युत
झालरों की सजावट भी
की गई। बाजारों के
प्रवेश द्वार से लेकर गलियों
तक रोशनी ने काशी के
उत्सवी मिजाज को और निखार
दिया।
रोशनी में नहाए बाजार, दीपोत्सव का हुआ शंखनाद
शहर के प्रमुख
मार्गों और बाजारों में
तिरंगी और सतरंगी रोशनी
ने अलग ही छटा
बिखेरी। दुकानों के प्रवेश द्वार
फूलों और झालरों से
सजाए गए थे। मंदिरों
और प्रतिष्ठानों में विशेष विद्युत
सजावट की गई। कहीं
रंगोली ने स्वागत किया
तो कहीं दीपों की
कतारों ने अंधेरे को
चुनौती दी। बाजारों की
जगमगाहट के बीच खरीदारी
करने निकले परिवारों और बच्चों के
चेहरों पर त्योहार की
खुशी साफ झलक रही
थी। काशी की गलियों
में दीपोत्सव का उल्लास देर
रात तक बना रहा।
खरीदारी की चमक में छिपी काशी की आर्थिक ताकत
धनतेरस की रौनक को केवल बिक्री के आंकड़ों से नहीं मापा जा सकता। सोना-चांदी खरीदने से लेकर वाहन, इलेक्ट्रॉनिक्स, बर्तन और मिट्टी के दीये लेने तक हर खरीदारी अर्थव्यवस्था की किसी न किसी कड़ी को गति देती है। कारीगर, दुकानदार, परिवहनकर्मी, पैकेजिंग से जुड़े कामगार और छोटे कारोबारी सभी इस उत्सव से अपनी कमाई की उम्मीद जोड़ते हैं। राष्ट्रीय स्तर पर भी इस बार त्योहारी कारोबार करीब पांच लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। पिछले वर्ष के लगभग चार लाख करोड़ रुपये के कारोबार से तुलना करें तो यह वृद्धि देश में उपभोक्ता मांग और बाजार की सक्रियता का संकेत देती है। धनतेरस का असली अर्थ धन का प्रदर्शन नहीं, बल्कि घर-परिवार में मंगल और समृद्धि का आमंत्रण है। काशी में किसी ने सोने का छोटा-सा लॉकेट खरीदा, किसी ने चांदी का सिक्का और किसी ने मिट्टी का एक दीया। किसी के लिए नई कार सपना पूरा होने का प्रतीक बनी तो किसी के लिए नया बर्तन घर की शुभ शुरुआत। इन तमाम खुशियों को जोड़ दें तो धनतेरस की सबसे बड़ी कमाई सामने आती है—विश्वास, परंपरा और उम्मीद। दीपों की लौ के साथ काशी ने समृद्धि का स्वागत किया और बाजारों की चमक ने दीपावली के उल्लास का मानो अग्रिम संदेश दे दिया।
