Saturday, 8 August 2026

काकोरी के अमर शहीदों को काशी का नमन

काकोरी के अमर शहीदों को काशी का नमन

हर घर तिरंगा अभियान के अंतर्गत सर्किट हाउस में सजी ऐतिहासिक प्रदर्शनी, पुष्पांजलि के साथ गूंजा राष्ट्रगान

लोकगीत और बिरहा के स्वरों में जीवंत हुई क्रांति की गाथा, बच्चों ने जाना स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास

सुरेश गांधी

वाराणसी. काशी की सांस्कृतिक आत्मा ने शनिवार को एक बार फिर स्वतंत्रता संग्राम के अमर अध्याय को अपनी स्मृतियों में जीवंत कर लिया। 9 अगस्त 1925 के ऐतिहासिक काकोरी ट्रेन एक्शन की 101वीं वर्षगांठ की पूर्व संध्या पर सर्किट हाउस परिसर राष्ट्रभक्ति, श्रद्धा और इतिहास चेतना के विराट मंच में बदल गया। हर घर तिरंगा अभियान के अंतर्गत आयोजित भाव एवं दिव्य प्रदर्शनी तथा सांस्कृतिक कार्यक्रम में शहीदों के प्रति ऐसा भाव प्रवाहित हुआ मानो काकोरी की क्रांति आज भी भारत की आत्मा में धधक रही हो। 

प्रातः से ही सर्किट हाउस परिसर में लोगों का आना शुरू हो गया था। प्रवेश द्वार पर तिरंगों की कतारें और भीतर स्वतंत्रता संग्राम के अमर सेनानियों के चित्र मानो आगंतुकों का स्वागत कर रहे थे। कार्यक्रम का शुभारंभ शहीदों के चित्रों पर माल्यार्पण और पुष्पांजलि अर्पित कर किया गया। उपस्थित जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों, विद्यार्थियों और नागरिकों ने शहीद राजेंद्रनाथ लाहिड़ी, शहीद अशफ़ाकउल्लाह ख़ाँ, शहीद रामप्रसाद बिस्मिल और शहीद ठाकुर रोशन सिंह सहित अन्य क्रांतिकारियों के चित्रों के समक्ष श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए उनके अद्वितीय बलिदान को नमन किया।

प्रदर्शनी में बोल उठा इतिहास

सर्किट हाउस में लगाई गई काकोरी ट्रेन एक्शन पर आधारित प्रदर्शनी कार्यक्रम का सबसे बड़ा आकर्षण रही। यह केवल चित्रों और दस्तावेजों का संग्रह नहीं था, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम की जीवित पाठशाला बन गया था। प्रदर्शनी में प्रत्येक क्रांतिकारी के बारे में उनकी जन्म तिथि, जन्म स्थान, शिक्षा-दीक्षा, वैचारिक पृष्ठभूमि, संगठनात्मक भूमिका, स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान, गिरफ्तारी, मुकदमे की प्रक्रिया और दी गई सजाओं का विस्तृत विवरण अत्यंत आकर्षक ढंग से प्रस्तुत किया गया। ब्रिटिश शासन की दमनकारी नीति को दर्शाते हुए यह बताया गया कि काकोरी षड्यंत्र मामले में किस प्रकार कठोर दंड दिए गए। रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाकउल्लाह ख़ाँ, ठाकुर रोशन सिंह और राजेंद्रनाथ लाहिड़ी को फांसी की सजा दिए जाने का उल्लेख प्रदर्शनी का सबसे भावुक पक्ष रहा। इसके अतिरिक्त सचिंद्रनाथ सान्याल, गोविंद चरण कर, मुकुंद लाल, सचिंद्रनाथ बक्शी, जोगेश चंद्र चटर्जी और रामकृष्ण खत्री सहित अनेक क्रांतिकारियों के संघर्ष और सजाओं का भी विस्तार से वर्णन किया गया।

हस्ताक्षरों में दिखी क्रांति की धड़कन

प्रदर्शनी में कुछ क्रांतिकारियों के मूल हस्ताक्षरों की प्रतिकृतियां, ऐतिहासिक पत्र, मुकदमे से जुड़े दस्तावेज और दुर्लभ छायाचित्र भी प्रदर्शित किए गए। इन दस्तावेजों को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग ठहरते रहे। युवा पीढ़ी के लिए यह अनुभव इतिहास की पुस्तक से निकलकर सीधे आंखों के सामने खड़े हो जाने जैसा था। कई विद्यार्थियों ने नोट्स बनाए और अपने शिक्षकों से प्रश्न पूछे।

शिक्षा, साहित्य और राष्ट्रभक्ति का अद्भुत संगम

प्रदर्शनी का एक विशेष खंड क्रांतिकारियों की शिक्षा-दीक्षा और व्यक्तित्व विकास को समर्पित था। इसमें बताया गया कि अनेक क्रांतिकारी उच्च शिक्षित, साहित्य प्रेमी और गहन वैचारिक चेतना से संपन्न युवा थे। उन्होंने व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं, परिवार और भविष्य की चिंता छोड़कर राष्ट्र को सर्वोपरि माना। यह खंड विशेष रूप से युवाओं के लिए प्रेरणा का केंद्र बना रहा।

लोकगीतों में गूंज उठा बलिदान का स्वर

सभागार में आयोजित सांस्कृतिक संध्या ने वातावरण को और अधिक भावपूर्ण बना दिया। लोकगीत एवं बिरहा गायकों ने शहीदों की वीरता, त्याग और बलिदान पर आधारित प्रस्तुतियां दीं। उनके स्वरों में काकोरी के वीरों की क्रांति की पुकार जीवंत हो उठी। एक क्षण ऐसा भी आया जब पूरा सभागार मौन होकर गीतों के माध्यम से शहीदों की स्मृति में डूब गया। तालियों की गड़गड़ाहट के बीच दर्शकों ने खड़े होकर कलाकारों का सम्मान किया।

बच्चों की आंखों में चमका इतिहास

कार्यक्रम में बड़ी संख्या में स्कूली छात्र-छात्राएं शामिल हुए। बच्चों ने प्रदर्शनी का अवलोकन कर शहीदों के जीवन, संघर्ष और बलिदान के बारे में जानकारी प्राप्त की। आयोजकों ने कहा कि इस प्रकार के आयोजन नई पीढ़ी में देशभक्ति, त्याग, अनुशासन और राष्ट्रीय चेतना के संस्कार विकसित करने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कई विद्यार्थियों ने कहा कि उन्होंने पहली बार काकोरी आंदोलन के बारे में इतनी विस्तार से जाना।

जनप्रतिनिधियों ने किया शहीदों का वंदन

कार्यक्रम में जिला पंचायत अध्यक्ष श्रीमती पूनम मौर्य, विधान परिषद सदस्य (एमएलसी) धर्मेंद्र सिंह, भाजपा जिला अध्यक्ष राम सकल पटेल, भाजपा महानगर अध्यक्ष प्रदीप अग्रहरी, मुख्य विकास अधिकारी प्रखर कुमार सिंह सहित अनेक जनप्रतिनिधि, पदाधिकारी, प्रशासनिक अधिकारी, शिक्षक, समाजसेवी और गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। सभी ने शहीदों को श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए कहा कि काकोरी के वीरों का बलिदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की अमूल्य धरोहर है और उनका जीवन आज भी युवाओं को राष्ट्रसेवा की प्रेरणा देता है।

काकोरी: अंग्रेजी सत्ता को दी गई खुली चुनौती

वक्ताओं ने कहा कि 9 अगस्त 1925 को क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश सरकार के खजाने को ले जा रही ट्रेन को काकोरी स्टेशन के निकट रोककर अंग्रेजी शासन को खुली चुनौती दी थी। यह घटना केवल सरकारी धन की जब्ती नहीं थी, बल्कि औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध संगठित क्रांतिकारी चेतना का उद्घोष थी। काकोरी कांड ने पूरे देश में स्वतंत्रता आंदोलन को नई ऊर्जा दी और युवाओं में बलिदान तथा संघर्ष की भावना का संचार किया।

दो मिनट का मौन और एक राष्ट्रीय संकल्प

कार्यक्रम के समापन पर उपस्थित लोगों ने दो मिनट का मौन रखकर शहीदों को श्रद्धांजलि दी। इसके बाद राष्ट्रगान के साथ समारोह संपन्न हुआ। उपस्थित नागरिकों ने संकल्प लिया कि शहीदों के आदर्शों, त्याग और राष्ट्रभक्ति की भावना को जन-जन तक पहुंचाया जाएगा और स्वतंत्रता संग्राम की गौरवशाली विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रखा जाएगा। सर्किट हाउस से लौटते समय अनेक लोगों की आंखों में श्रद्धा थी, मन में गर्व था और होठों पर एक ही भावनाकाकोरी के वीर अमर रहें, भारत माता की जय।

महाकाल : जहाँ शिव केवल देवता नहीं, काल के भी स्वामी हैं… !

महाकाल : जहाँ शिव केवल देवता नहीं, काल के भी स्वामी हैं…! 

          शिप्रा नदी के तट पर स्थित महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक चेतना का वह केंद्र है जहाँ समय, मृत्यु और ब्रह्मांड की अवधारणा एक साथ जीवंत हो उठती है। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में विशिष्ट स्थान रखने वाला महाकाल देश का एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग माना जाता है। मान्यता है कि यहाँ शिव काल के भी स्वामी हैं, इसलिए उन्हेंमहाकालकहा जाता है, जो मृत्यु को भी मौन कर देता है. विश्वप्रसिद्ध भस्म आरती इस मंदिर की सबसे रहस्यमय परंपरा है। सूर्योदय से पूर्व होने वाला यह अनुष्ठान जीवन और मृत्यु के शाश्वत चक्र का प्रतीक माना जाता है। विशेष रूप से तैयार की जाने वाली भस्म श्रद्धालुओं को यह स्मरण कराती है कि देह नश्वर है, किंतु आत्मा शाश्वत। प्राचीन भारतीय ज्योतिष और समय-गणना में उज्जैन को विशेष महत्व प्राप्त रहा है। स्थानीय परंपरा इसे काल-विज्ञान की पावन भूमि मानती है। यही कारण है कि महाकाल केवल आराध्य देव नहीं, बल्कि समय की दार्शनिक व्याख्या के केंद्र भी माने जाते हैं। सावन, महाशिवरात्रि और सिंहस्थ के अवसर पर लाखों श्रद्धालु यहाँ पहुँचते हैं। गर्भगृह की गंभीरता, भस्म आरती की अलौकिक अनुभूति और महाकाल लोक की भव्यता मिलकर ऐसा वातावरण रचती है, जहाँ श्रद्धालु केवल दर्शन नहीं करते, बल्कि समय से परे एक आध्यात्मिक अनुभव को जीते हैं 

सुरेश गांधी

भारत की आध्यात्मिक चेतना में कुछ स्थल ऐसे हैं जो केवल तीर्थ नहीं, बल्कि समय, इतिहास और आत्मबोध के जीवंत केंद्र हैं। मध्यप्रदेश के उज्जैन में शिप्रा नदी के तट पर स्थित महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग ऐसा ही एक अद्वितीय धाम है। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में तीसरे स्थान पर प्रतिष्ठित महाकालेश्वर को केवल शिव का मंदिर कहना उसके विराट स्वरूप को सीमित कर देना होगा। यहाँ शिवमहाकालहैंकाल के भी काल, मृत्यु के भी स्वामी और ब्रह्मांडीय समय के नायक। सावन के महीने में जब भोर की पहली किरण शिप्रा के जल पर उतरती है और मंदिर परिसर में शंख, नगाड़े और घंटों की ध्वनि गूँजती है, तब लगता है मानो उज्जैन में समय ठहर गया हो। यही वह क्षण है जब महाकाल की नगरी अपने सबसे गूढ़ रहस्य का उद्घाटन करती हैमनुष्य समय को नहीं बाँध सकता, पर महाकाल समय को दिशा देते हैं। 

उज्जैन : भारत की प्राचीन कालरेखा का केंद्र

बहुत कम लोग जानते हैं कि प्राचीन भारतीय ज्योतिष और खगोलशास्त्र में उज्जैन का स्थान असाधारण था। भारतीय समय-गणना और पंचांग परंपरा में इसे प्रमुख मेरिडियन माना गया। वराहमिहिर जैसे महान ज्योतिर्विदों की गणनाओं में उज्जैन केंद्रीय बिंदु था। यह केवल एक धार्मिक नगर नहीं, बल्कि भारतीय काल-विज्ञान की राजधानी रहा है। स्थानीय परंपरा में कहा जाता है किसमय की गणना उज्जैन से प्रारंभ होती है।इसी भाव को महाकाल नाम में मूर्त रूप मिलता है। जहाँ दुनिया घड़ी देखती है, वहाँ उज्जैन महाकाल को देखता है।

दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग : मृत्यु पर दृष्टि रखने वाले शिव

महाकालेश्वर की सबसे विलक्षण विशेषता यह है कि यह द्वादश ज्योतिर्लिंगों में एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग माना जाता है। हिंदू परंपरा में दक्षिण दिशा यम और पितरों की दिशा है। सामान्यतः देवमूर्तियाँ पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख होती हैं, किंतु महाकाल दक्षिण की ओर दृष्टि रखते हैं। इसका आध्यात्मिक अर्थ हैजो मृत्यु को सामने से देख सके, वही भय से मुक्त हो सकता है। इसी कारण महाकाल की आराधना को अकाल मृत्यु से रक्षा और मृत्यु-भय से मुक्ति का साधन माना गया है। उज्जैन में विशेष रूप सेअकाल मृत्यु निवारण पूजाकी परंपरा इसी विश्वास से जुड़ी है।

महाकाल बनने की पौराणिक कथा

शिवपुराण के अनुसार प्राचीन अवंतिकापुरीआज का उज्जैनएक समय दूषण नामक राक्षस के आतंक से काँप रही थी। ब्रह्मा से वरदान प्राप्त उस असुर ने धर्म और निर्दोष प्रजा पर अत्याचार शुरू कर दिया। नगर में निवास करने वाला एक शिवभक्त ब्राह्मण निरंतर भगवान शिव की आराधना करता रहा और प्रजा की रक्षा की प्रार्थना करता रहा। कहते है जब अत्याचार असह्य हो गया, तब शिव एक प्रचंड ज्योति और हुंकार के रूप में प्रकट हुए। उन्होंने दूषण का संहार किया। क्योंकि लोग दूषण कोकालकहकर पुकारते थे, इसलिए उसके वध के बाद शिवमहाकालकहलाएकाल का भी अंत करने वाले। यह केवल धार्मिक आख्यान नहीं, बल्कि एक गहरा सांस्कृतिक संदेश हैअधर्म चाहे कितना ही शक्तिशाली क्यों हो, समय अंततः न्याय के पक्ष में खड़ा होता है।

भस्म आरती : जीवन और मृत्यु के बीच की प्रार्थना

महाकालेश्वर मंदिर की विश्वप्रसिद्ध भस्म आरती को देखने के लिए देश-विदेश से श्रद्धालु आते हैं। यह आरती प्रतिदिन प्रातःकाल सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटे पूर्व संपन्न होती है। मंदिर के पुजारियों के अनुसार आरती में प्रयुक्त भस्म विशेष रूप से तैयार की जाती है और यह सामान्य राख नहीं होती। पुजारी आशीष बताते हैं कि लगभग ढाई किलोग्राम भस्म का उपयोग किया जाता है। वे इसे जीवन के आरंभ और अंत का प्रतीक मानते हैंजन्म के समय शिशु का औसत भार और मृत्यु के बाद बचने वाली राख का संकेत। शिव भस्म धारण कर संसार को स्मरण कराते हैं कि देह नश्वर है; अंततः सब कुछ पंचतत्व में विलीन हो जाता है। भस्म आरती का वातावरण अद्भुत होता हैदीपों की मंद लौ, धूप की सुगंध, नगाड़ों की गूँज और भस्म से अलंकृत महाकाल। यह केवल अनुष्ठान नहीं, मनुष्य को उसकी क्षणभंगुरता का प्रत्यक्ष दर्शन कराता है।

भस्म आरती और स्त्री-दर्शन की परंपरा

महाकाल मंदिर से जुड़ी एक चर्चित परंपरा यह भी है कि भस्म आरती के कुछ चरणों में महिलाओं के दर्शन पर परंपरागत प्रतिबंध रहा है। इस विषय में समय-समय पर सामाजिक और धार्मिक विमर्श होते रहे हैं। मंदिर प्रशासन स्पष्ट करता है कि यह व्यवस्था विशिष्ट अनुष्ठानिक परंपरा से जुड़ी है, कि स्त्री की आध्यात्मिक पात्रता से। आज भी इस विषय पर अनेक मत हैं, किंतु यह महाकाल परंपरा की विशिष्टताओं में गिनी जाती है।

धरती की नाभि में स्थित गर्भगृह 

महाकालेश्वर का ज्योतिर्लिंग मंदिर के निचले तल पर स्थापित है। श्रद्धालुओं को सीढ़ियाँ उतरकर गर्भगृह तक पहुँचना पड़ता है। भारतीय मंदिर वास्तु में यह विरल व्यवस्था है। प्रतीकात्मक रूप से इसे अहंकार से नीचे उतरकर आत्मबोध तक पहुँचने की यात्रा माना जाता है।

मंदिर की त्रिस्तरीय संरचना भी अत्यंत रोचक है

सबसे निचले तल पर महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग

मध्य तल पर ओंकारेश्वर शिवलिंग

सबसे ऊपरी तल पर नागचंद्रेश्वर शिवलिंग

नागचंद्रेश्वर मंदिर वर्ष में केवल नाग पंचमी के दिन खुलता है। इस एक दिन के दर्शन के लिए हजारों श्रद्धालु उमड़ते हैं। यह विरल परंपरा महाकाल मंदिर की रहस्यमय आभा को और गहरा करती है।

महाकाल और तंत्र परंपरा

उज्जैन प्राचीन काल से शैव, तांत्रिक और साधना परंपराओं का प्रमुख केंद्र रहा है। महाकाल, कालभैरव, हरसिद्धि और गढ़कालिका मंदिर मिलकर एक विशिष्ट आध्यात्मिक मंडल बनाते हैं। अनेक साधक मानते हैं कि उज्जैन की रात्रि-साधना की ऊर्जा विशेष होती है। इसलिए इसे केवल तीर्थ नहीं, बल्कि साधना-भूमि कहा जाता है।

कालभैरव और मदिरा अर्पण की परंपरा

उज्जैन के कालभैरव मंदिर की परंपरा भी विश्वभर में चर्चा का विषय है। मुख्य पुजारी ओमप्रकाश चतुर्वेदी बताते हैं कि कालभैरव को मदिरा अर्पित करना नकारात्मक प्रवृत्तियों का समर्पण है। इसका प्रतीकात्मक अर्थ हैमनुष्य अपने भीतर के क्रोध, मोह, लोभ और विकारों को भगवान के चरणों में छोड़ दे ताकि जीवन में सकारात्मकता का संचार हो सके। यह परंपरा शैव साधना की उस धारा को दर्शाती है जो जीवन की जटिलताओं से भागने के बजाय उन्हें रूपांतरित करने का संदेश देती है।

महाकाल वन और 84 महादेव

उज्जैन के आसपास फैले 84 शिवालयों कोमहाकाल वनकी परंपरा से जोड़ा जाता है। प्राचीन साधक इसे एक आध्यात्मिक परिक्रमा मानते थे। प्रत्येक शिवपीठ साधना की अलग ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता है। आज भी अनेक श्रद्धालु 84 महादेव परिक्रमा को विशेष पुण्यदायी मानते हैं।

सिंहस्थ : जब ग्रह और धर्म एक साथ उत्सव मनाते हैं

उज्जैन भारत के चार कुंभ स्थलों में से एक है। जब बृहस्पति सिंह राशि में प्रवेश करता है, तब यहाँ सिंहस्थ कुंभ आयोजित होता है। यह केवल धार्मिक मेला नहीं, बल्कि भारतीय खगोल परंपरा से जुड़ा ब्रह्मांडीय उत्सव है। लाखों संत, अखाड़े और श्रद्धालु शिप्रा तट पर एकत्र होकर समय, आस्था और ब्रह्मांड के अद्भुत संगम के साक्षी बनते हैं।

महाशिवरात्रि और सावन की शाही सवारी

सावन के प्रत्येक सोमवार महाकाल की शाही सवारी निकलती है। रजत रथ पर विराजमान महाकाल नगर भ्रमण करते हैं। राजसी छत्र, ध्वज, शंखध्वनि और भक्ति के जयघोष से पूरा उज्जैन शिवमय हो उठता है। महाशिवरात्रि के अवसर पर तो यह दृश्य और भी विराट हो जाता हैरातभर जागरण, रुद्राभिषेक और अखंड श्रद्धा का महासागर।

ध्वंस से पुनर्जन्म तक

महाकालेश्वर मंदिर का मूल स्वरूप अत्यंत प्राचीन माना जाता है, यद्यपि इसका निश्चित काल बताना कठिन है। मध्यकालीन आक्रमणों में मंदिर को क्षति पहुँची। बाद में मराठा काल में इसका पुनर्निर्माण हुआ। वर्तमान संरचना के निर्माण में सिंधिया शासनकाल से जुड़े अधिकारी रामचंद्र बाबा शेनवी की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। मंदिर की वास्तुकला में भूमिज, चालुक्य और मराठा स्थापत्य का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। विशाल शिखर, अलंकृत मंडप और गर्भगृह की गंभीरता मिलकर इसे अद्वितीय बनाते हैं।

उज्जैन और विक्रमादित्य की सांस्कृतिक स्मृति

लोकपरंपरा में उज्जैन सम्राट विक्रमादित्य की नगरी मानी जाती है। विक्रम संवत की प्रतिष्ठा और महाकाल की आराधना को सांस्कृतिक स्मृति में परस्पर जुड़ा हुआ माना गया है। इतिहास और लोकविश्वास भले अलग-अलग व्याख्याएँ प्रस्तुत करें, पर उज्जैन की आत्मा में विक्रम और महाकाल साथ-साथ बसे हुए हैं।

अकाल मृत्यु से मुक्ति का विश्वास

जनमानस में यह गहरा विश्वास है कि महाकाल के दर्शन से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है। यही कारण है कि जीवन के संकट, रोग, दुर्घटना या मानसिक भय से पीड़ित लोग विशेष श्रद्धा से यहाँ आते हैं। धार्मिक दृष्टि से यह विश्वास मनुष्य को आश्वासन देता है कि मृत्यु अंत नहीं, एक परिवर्तन है।

आधुनिक विकास और प्राचीन आस्था

हाल के वर्षों में महाकाल क्षेत्र का व्यापक विकास हुआ है। महाकाल लोक परियोजना ने मंदिर परिसर को भव्य स्वरूप दिया है। विशाल गलियारे, शिवपुराण आधारित मूर्तिशिल्प और तीर्थयात्रियों की सुविधाओं ने उज्जैन को वैश्विक धार्मिक पर्यटन के प्रमुख केंद्रों में ला खड़ा किया है। किंतु इस आधुनिक विस्तार के बीच भी गर्भगृह की प्राचीन अनुभूति अक्षुण्ण बनी हुई है।

महाकाल का दार्शनिक संदेश

महाकाल की सबसे बड़ी शिक्षा क्या है? शायद यही कि मनुष्य समय का स्वामी नहीं, यात्री है। भस्म आरती कहती हैसब नश्वर है। दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग कहता हैमृत्यु से डरो मत। भूमिगत गर्भगृह कहता हैअहंकार छोड़ो। सिंहस्थ कहता हैमनुष्य ब्रह्मांड से जुड़ा है। और महाकाल स्वयं कहते हैंजो सत्य है, वही शाश्वत है।

जहाँ समय भी नतमस्तक हो जाता है

उज्जैन का महाकाल मंदिर केवल एक तीर्थ नहीं, भारतीय सभ्यता का जीवित दार्शनिक ग्रंथ है। यहाँ इतिहास, पुराण, खगोल, तंत्र, वास्तु और भक्ति एक ही केंद्र पर आकर मिलते हैं। भोर की भस्म आरती में जब राख से अलंकृत महाकाल के दर्शन होते हैं, तब मनुष्य पहली बार गहराई से समझता है कि जीवन कितना क्षणिक और आत्मा कितनी विराट है। शायद इसी लिए करोड़ों भक्त उन्हें महाकाल कहते हैंक्योंकि जहाँ वे विराजते हैं, वहाँ समय भी चरणों में बैठ जाता है।

काकोरी के अमर शहीदों को काशी का नमन

काकोरी के अमर शहीदों को काशी का नमन हर घर तिरंगा अभियान के अंतर्गत सर्किट हाउस में सजी ऐतिहासिक प्रदर्शनी , पुष्पांजलि ...