Monday, 2 November 2026

जहां महादेव के भिक्षापात्र में अन्न परोस मां अन्नपूर्णा ने दिया वचन—काशी में कोई भूखा नहीं सोएगा

जहां महादेव के भिक्षापात्र में अन्न परोस मां अन्नपूर्णा ने दिया वचन—काशी में कोई भूखा नहीं सोएगा 

काशी में धनतेरस केवल धन की आराधना नहीं, बल्कि उस अद्भुत परंपरा का उत्सव है, जहां स्वयं देवाधिदेव महादेव याचक बनकर मां अन्नपूर्णा से अन्न की भिक्षा मांगते हैं। इस बार छह से दस नवंबर तक श्रद्धालु मां के स्वर्णमयी स्वरूप के दर्शन कर सकेंगे। खास बात यह कि मां के खजाने में पहली बार 21 किलो चांदी से तैयार विशेष सिक्के शामिल होंगे। महंत गोस्वामी शंकरपुरी महाराज के अनुसार, पांच दिनों में 10 लाख सिक्के और 10 बोरी से अधिक धान का लावा प्रसाद स्वरूप वितरित किया जाएगा। पिछले वर्ष करीब साढ़े छह लाख सिक्के बांटे गए थे। काशी में मां का यह स्वर्णमयी दरबार साल में केवल कुछ दिनों के लिए खुलता है। छह नवंबर को ब्रह्ममुहूर्त में पूजन के बाद कपाट खुलेंगे और दस नवंबर को शयन आरती के बाद अगले वर्ष तक बंद हो जाएंगे। चांदी के सिक्कों पर मां स्वर्ण अन्नपूर्णा की आकृति और उनका मंत्र अंकित है। मान्यता है कि खजाने से मिले सिक्के और लावा तिजोरी तथा अन्न भंडार में रखने से घर में धन-धान्य की कमी नहीं होती। मां के अन्नकूट शृंगार के लिए 108 प्रकार के व्यंजनों का 501 कुंतल भोग तैयार होगा। प्रसाद का एक हिस्सा तिरुपति बालाजी को भी निवेदित किया जाएगा। मां अन्नपूर्णा की यह परंपरा अन्न को ब्रह्म मानने और भूखे को भोजन कराने का संदेश देती है। काशी का यही अद्वैत है—जहां शिव मोक्ष के दाता हैं, वहीं मां अन्नपूर्णा जीवन की पोषणदात्री है। महादेव का मां के सम्मुख भिक्षुक बनना इस बात का प्रतीक है कि संसार में कोई भी शक्ति अन्न के महत्व से परे नहीं है। धनतेरस पर जब मां अन्नपूर्णा का स्वर्णमयी स्वरूप श्रद्धालुओं के सामने प्रकट होता है, तब काशी की यह सनातन चेतना और भी मुखर हो उठती है। भक्त मां के दरबार से धान, लावा और सिक्कों का प्रसाद लेकर लौटते हैं, लेकिन अपने साथ केवल समृद्धि की कामना नहीं, बल्कि अन्न के सम्मान और दान की प्रेरणा भी लेकर जाते हैं। काशी की गलियों में गूंजता मां अन्नपूर्णा का जयघोष और विश्वनाथ धाम में विराजमान बाबा भोलेनाथ का आशीर्वाद मानो एक ही संदेश देते हैं—जहां अन्न का सम्मान है, वहां जीवन है; जहां करुणा है, वहां मां की कृपा है और जहां शिव हैं, वहां कल्याण का मार्ग प्रशस्त है

सुरेश गांधी

दुनिया में अनेक तीर्थ हैं, अनेक देवालय हैं और अनगिनत धार्मिक परंपराएं भी, लेकिन काशी का आध्यात्मिक वैभव अपने आप में विलक्षण है। यह वह नगरी है जहां देवाधिदेव महादेव स्वयं याचक बनकर मां अन्नपूर्णा के सम्मुख भिक्षा मांगते हैं। जहां मोक्ष के अधिपति भगवान शिव को भी जीवन के आधार अन्न की आवश्यकता होती है और जगतजननी मां पार्वती अन्नपूर्णेश्वरी के रूप में समूची सृष्टि का भरण-पोषण करती हैं। यही काशी का वह अद्भुत दर्शन है, जहां अन्न और अध्यात्म, जीवन और मोक्ष तथा वैराग्य और वैभव एक-दूसरे के पूरक बन जाते हैं। 'अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्' अर्थात अन्न ही ब्रह्म है। भारतीय दर्शन का यह शाश्वत उद्घोष काशी में मां अन्नपूर्णा की आराधना के रूप में साकार होता दिखाई देता है। यहां अन्न केवल उदर की क्षुधा शांत करने का साधन नहीं, बल्कि जीवन, चेतना और सृजन का आधार है। मां अन्नपूर्णा उसी अन्नतत्व की अधिष्ठात्री हैं। यही वजह है कि धनतेरस के अवसर पर जब उनके स्वर्णमयी स्वरूप के दर्शन होते हैं, तब काशी की आस्था में एक अलग ही उजास उतर आता है। मंदिर के कपाट खुलते हैं तो श्रद्धालुओं के लिए यह केवल देवी के दर्शन का अवसर नहीं, बल्कि अन्न, धन, दान और समृद्धि की उस सनातन परंपरा से जुड़ने का क्षण होता है, जिसकी जड़ें काशी की आध्यात्मिक चेतना में गहराई तक समाई हैं।

शिव भी समझाते हैं अन्न का महत्व

काशी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां शिव और शक्ति का संबंध केवल आराधना का विषय नहीं, बल्कि जीवन के गूढ़ दर्शन का प्रतीक है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, एक बार भगवान शिव ने संसार को यह समझाने के लिए कि भौतिक जगत और अन्न का कोई स्थायी महत्व नहीं है, उसे माया का स्वरूप बताया। इस पर मां पार्वती ने संसार से अन्न और पोषण की शक्ति समेट ली। देखते ही देखते सृष्टि में अन्न का संकट उत्पन्न हो गया। जीव-जंतु व्याकुल हो उठे। संसार में भूख और अभाव का विस्तार होने लगा। जब स्वयं महादेव को भी इस सत्य का बोध हुआ कि अन्न के बिना सृष्टि का संचालन संभव नहीं, तब उन्होंने मां पार्वती की शरण ली। मां ने काशी में अन्नपूर्णा के रूप में प्रकट होकर अन्न का वितरण किया। भगवान शिव स्वयं भिक्षापात्र लेकर उनके सम्मुख पहुंचे। मां ने उन्हें अन्न प्रदान किया। यह प्रसंग केवल एक पौराणिक कथा नहीं, बल्कि भारतीय जीवन दर्शन का अत्यंत गहरा संदेश है कि आध्यात्मिक उन्नति के लिए भी शरीर का स्वस्थ और तृप्त होना आवश्यक है। भूखे मनुष्य के लिए पहले अन्न है, फिर अध्यात्म। मंदिर में स्थापित शिव और अन्नपूर्णा के स्वरूप इस दिव्य प्रसंग की स्मृति को जीवंत करते हैं। एक ओर महादेव भिक्षुक के रूप में हैं तो दूसरी ओर मां अन्नपूर्णा अन्न की अधिष्ठात्री बनकर जगत का पोषण कर रही हैं। यह दृश्य बताता है कि शिव के बिना शक्ति अधूरी है और शक्ति के बिना सृष्टि का अस्तित्व संभव नहीं।

धनतेरस पर स्वर्णमयी स्वरूप के दर्शन का दुर्लभ अवसर  

काशी के अन्नपूर्णा मंदिर की सबसे विशिष्ट परंपराओं में मां के स्वर्णमयी विग्रह के दर्शन का विशेष महत्व है। सामान्य दिनों में मां के नियमित स्वरूप की पूजा-अर्चना होती है, लेकिन धनतेरस से अन्नकूट महोत्सव तक विशेष अवसर पर मां का स्वर्णमयी स्वरूप श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खुलता है। यह अवसर वर्षभर में केवल कुछ दिनों के लिए मिलता है। इसी कारण देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालु काशी पहुंचते हैं। स्वर्णमयी मां अन्नपूर्णा के दर्शन के लिए मंदिर परिसर और आसपास की गलियों में श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगती हैं। घंटों प्रतीक्षा के बाद जब भक्तों को मां का दिव्य स्वरूप देखने का अवसर मिलता है तो उनकी आंखों में श्रद्धा और मन में असीम संतोष झलकता है। मां के हाथों में अन्न से भरा पात्र और खप्पर का स्वरूप उनके अन्नदायिनी रूप की महत्ता को रेखांकित करता है। काशी में धनतेरस का यह आयोजन केवल धन और वैभव की कामना तक सीमित नहीं है। इसका मूल संदेश है कि जिस घर में अन्न है, वहां जीवन है और जिस समाज में भूखे को भोजन कराने की संवेदना है, वही वास्तव में समृद्ध है।

कुबेर का खजाना : मुट्ठीभर प्रसाद में समाई समृद्धि की कामना

मां अन्नपूर्णा के स्वर्णमयी दर्शन के साथ ही यहां कुबेर के खजाने की परंपरा भी श्रद्धालुओं के आकर्षण का प्रमुख केंद्र रहती है। धनतेरस के अवसर पर मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना के बाद श्रद्धालुओं को खजाने के प्रसाद के रूप में धान, लावा और सिक्के वितरित किए जाते हैं। इसे मां का आशीर्वाद और कुबेर की कृपा मानकर भक्त अपने घर ले जाते हैं। मान्यता है कि इस प्रसाद को लाल कपड़े में बांधकर घर की तिजोरी अथवा पूजा स्थल पर रखने से वर्षभर अन्न और धन की कमी नहीं होती। श्रद्धालुओं के लिए इन सिक्कों का मूल्य उनकी आर्थिक कीमत से कहीं अधिक है। यह मां के प्रति उनकी आस्था, विश्वास और पारिवारिक मंगलकामना का प्रतीक है। धनतेरस की रात मंदिर में आरती की गूंज, दीपों की जगमगाहट और मां के जयकारों के बीच खजाने के प्रसाद का वितरण काशी की धार्मिक परंपरा को विशिष्ट बना देता है। यह वह अवसर है जब भक्त अपनी सामर्थ्य के अनुसार अर्पण करते हैं और मां के दरबार से आशीर्वाद लेकर लौटते हैं। यहां धन का अर्थ केवल स्वर्ण और मुद्रा नहीं, बल्कि अन्न, संतोष, उदारता और परिवार की खुशहाली भी है।

अकाल से अन्नपूर्णा के वरदान तक की मान्यता

मां अन्नपूर्णा की महिमा से जुड़ी पौराणिक मान्यताओं में अकाल और अन्न संकट का प्रसंग विशेष रूप से उल्लेखनीय है। स्कंद पुराण की काशी महात्म्य परंपरा में अन्नपूर्णा की महिमा का वर्णन मिलता है। धार्मिक आख्यानों के अनुसार, जब संसार में अन्न का अभाव हुआ और जीव-जगत भूख से व्याकुल हो उठा, तब मां अन्नपूर्णा ने अन्नदान के माध्यम से सृष्टि के पोषण का दायित्व संभाला। काशी में प्रचलित मान्यता है कि मां ने महादेव को अन्न प्रदान करते हुए यह आश्वासन दिया कि उनकी नगरी में कोई भूखा नहीं रहेगा। इसी विश्वास ने काशी को अन्नक्षेत्र की विशिष्ट पहचान दी। आज भी काशी की गलियों, मठों, मंदिरों और आश्रमों में चलने वाले भंडारे, अन्नदान और सेवा के आयोजन इसी परंपरा की जीवंत अभिव्यक्ति माने जाते हैं। यहां अन्नदान को महादान कहा गया है। क्योंकि धन का दान किसी की आवश्यकता पूरी कर सकता है, लेकिन अन्नदान सीधे जीवन को बचाता है। मां अन्नपूर्णा की आराधना का वास्तविक अर्थ भी यही है कि किसी की थाली खाली न रहे और कोई व्यक्ति भूख के कारण विवश न हो।

अन्न, लक्ष्मी और भूमि : समृद्धि के तीन आधार

काशी का अन्नपूर्णा मंदिर धार्मिक दृष्टि से एक और विशेषता समेटे हुए है। यहां मां अन्नपूर्णेश्वरी के साथ मां लक्ष्मी और मां भूमि देवी की उपस्थिति का भी विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यता में इन तीनों शक्तियों को जीवन की समृद्धि के तीन आधारों के रूप में देखा जाता है। मां अन्नपूर्णा अन्न और पोषण की प्रतीक हैं। मां लक्ष्मी धन, वैभव और ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री हैं, जबकि मां भूमि देवी धैर्य, आधार और स्थायित्व का बोध कराती हैं। इन तीनों शक्तियों का संयुक्त भाव यह संदेश देता है कि केवल धनवान होना समृद्धि नहीं है। वास्तविक संपन्नता तब है, जब जीवन में अन्न की उपलब्धता हो, धन का सदुपयोग हो और परिवार तथा समाज के लिए स्थायी सुख-समृद्धि का आधार भी मौजूद हो। इस दृष्टि से अन्नपूर्णा मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय जीवन पद्धति के उस दर्शन का प्रतीक है, जहां भौतिक संपन्नता और आध्यात्मिक संतोष को एक-दूसरे से अलग नहीं माना गया है।

धनतेरस से अन्नकूट तक आस्था का उत्सव  

दीपावली से पहले आने वाला धनतेरस काशी में विशेष धार्मिक उल्लास लेकर आता है। सामान्य तौर पर धनतेरस को धन्वंतरि और लक्ष्मी पूजन, नए बर्तन तथा धातुओं की खरीदारी से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन काशी में इस पर्व का एक अलग आध्यात्मिक आयाम भी है। यहां मां अन्नपूर्णा के स्वर्णमयी दर्शन और कुबेर के खजाने की परंपरा इस दिन को विशिष्ट बनाती है। धनतेरस से लेकर अन्नकूट तक मंदिर में श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रहती है। मंदिर की घंटियों की ध्वनि, वैदिक मंत्रोच्चार, आरती और मां के जयकारे पूरे क्षेत्र को भक्तिमय बना देते हैं। अन्नकूट महोत्सव में विविध प्रकार के व्यंजनों और अन्न का भोग अर्पित करने की परंपरा भी इसी भाव को विस्तार देती है। यह आयोजन इस बात का प्रतीक है कि प्रकृति से प्राप्त अन्न के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना और उसे सामूहिक रूप से बांटना भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रहा है। अन्नकूट का भाव केवल छप्पन भोग या विविध पकवानों तक सीमित नहीं है। यह उस अन्न के प्रति सम्मान का पर्व है, जो किसान के श्रम, धरती की उर्वरता, जल की उपलब्धता और प्रकृति की अनुकंपा से हमारी थाली तक पहुंचता है।

काशी की रसोई में आज भी जीवित है मां का वचन 

काशी को अन्नक्षेत्र कहने के पीछे केवल धार्मिक मान्यता ही नहीं, बल्कि यहां की सामाजिक और सांस्कृतिक परंपरा भी है। मंदिरों के भंडारे, संतों की सेवा, जरूरतमंदों को भोजन कराने की परंपरा और विभिन्न संस्थाओं की अन्नसेवा इस नगरी की पहचान हैं। यहां आने वाला श्रद्धालु केवल दर्शन नहीं करता, बल्कि किसी न किसी रूप में सेवा और दान की परंपरा से भी जुड़ता है। मां अन्नपूर्णा की आराधना का संदेश आज के समय में और भी प्रासंगिक हो जाता है, जब एक ओर भोजन की बर्बादी चिंता का विषय है तो दूसरी ओर समाज का एक वर्ग अब भी पौष्टिक भोजन से वंचित है। ऐसे में मां का अन्नदायिनी स्वरूप हमें याद दिलाता है कि भोजन का सम्मान और जरूरतमंद को भोजन उपलब्ध कराना भी धर्म का महत्वपूर्ण अंग है। काशी में प्रचलित यह विश्वास कि मां के रहते उनकी नगरी में कोई भूखा नहीं रहेगा, वास्तव में समाज के सामूहिक दायित्व की ओर भी संकेत करता है। मां का आशीर्वाद तभी सार्थक है, जब उनकी संतानें एक-दूसरे की भूख और पीड़ा को समझें।

शिव और अन्नपूर्णा : जीवन और मोक्ष का अद्वैत

काशी के आध्यात्मिक चिंतन में बाबा विश्वनाथ और मां अन्नपूर्णा का संबंध अत्यंत गहरा है। बाबा विश्वनाथ जहां मोक्ष और कल्याण के अधिपति माने जाते हैं, वहीं मां अन्नपूर्णा जीवन के पोषण और भरण-पोषण की अधिष्ठात्री हैं। एक ओर शिव वैराग्य का संदेश देते हैं तो दूसरी ओर शक्ति संसार को गतिशील बनाए रखने के लिए अन्न और ऊर्जा प्रदान करती हैं। यही काशी का अद्वैत है। यहां जीवन और मृत्यु विरोधी नहीं, बल्कि एक ही शाश्वत यात्रा के दो पड़ाव हैं। यहां अन्न और अध्यात्म अलग-अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। महादेव का मां के सम्मुख भिक्षुक बनना इस बात का प्रतीक है कि संसार में कोई भी शक्ति अन्न के महत्व से परे नहीं है। धनतेरस पर जब मां अन्नपूर्णा का स्वर्णमयी स्वरूप श्रद्धालुओं के सामने प्रकट होता है, तब काशी की यह सनातन चेतना और भी मुखर हो उठती है। भक्त मां के दरबार से धान, लावा और सिक्कों का प्रसाद लेकर लौटते हैं, लेकिन अपने साथ केवल समृद्धि की कामना नहीं, बल्कि अन्न के सम्मान और दान की प्रेरणा भी लेकर जाते हैं। काशी की गलियों में गूंजता मां अन्नपूर्णा का जयघोष और विश्वनाथ धाम में विराजमान बाबा भोलेनाथ का आशीर्वाद मानो एक ही संदेश देते हैं—जहां अन्न का सम्मान है, वहां जीवन है; जहां करुणा है, वहां मां की कृपा है और जहां शिव हैं, वहां कल्याण का मार्ग प्रशस्त है। काशी में धनतेरस की रात केवल दीपों का उत्सव नहीं, बल्कि अन्न, दान और करुणा के उस अमृत प्रवाह का पर्व है, जिसमें स्वयं महादेव याचक बनते हैं और जगतजननी अन्नपूर्णा बनकर समूची सृष्टि को तृप्त करती हैं।

जहां महादेव के भिक्षापात्र में अन्न परोस मां अन्नपूर्णा ने दिया वचन—काशी में कोई भूखा नहीं सोएगा

जहां महादेव के भिक्षापात्र में अन्न परोस मां अन्नपूर्णा ने दिया वचन — काशी में कोई भूखा नहीं सोएगा  काशी में धनतेरस केवल धन की आराधन...