जब सत्ता ने प्रतिष्ठा नहीं, प्राथमिकता चुनी…!

संसदीय
लोकतंत्र
में
किसी
मंत्री
का
इस्तीफा
केवल
प्रशासनिक
निर्णय
नहीं
होता,
बल्कि
वह
सत्ता
की
राजनीतिक
सोच,
प्राथमिकताओं
और
भविष्य
की
रणनीति
का
भी
संकेत
देता
है।
केंद्रीय
शिक्षा
मंत्री
धर्मेंद्र
प्रधान
के
इस्तीफे
ने
भी
अनेक
सवाल
खड़े
कर
दिए
हैं।
क्या
यह
विपक्ष
के
दबाव
के
आगे
सरकार
का
झुकना
था,
या
फिर
भाजपा
ने
जानबूझकर
एक
ऐसा
फैसला
लिया,
जिससे
तत्काल
राजनीतिक
विवाद
शांत
हो
और
संसद
में
अटके
बड़े
विधायी
एजेंडे
को
आगे
बढ़ाने
का
रास्ता
साफ
हो
सके?
राजनीतिक
गलियारों
में
इस
फैसले
को
केवल
जवाबदेही
के
दायरे
में
नहीं
देखा
जा
रहा,
बल्कि
इसे
आने
वाले
महीनों
की
व्यापक
रणनीति
से
जोड़कर
समझने
की
कोशिश
हो
रही
है।
सरकार
जानती
है
कि
संसद
का
हर
दिन
बहुमूल्य
है
और
लगातार
गतिरोध
किसी
भी
महत्वाकांक्षी
एजेंडे
के
लिए
सबसे
बड़ी
बाधा
बन
सकता
है।
ऐसे
में
यदि
सत्ता
ने
एक
मंत्री
की
कुर्बानी
देकर
राजनीतिक
तापमान
कम
करने
का
प्रयास
किया
है,
तो
यह
निर्णय
केवल
वर्तमान
की
मजबूरी
नहीं,
बल्कि
भविष्य
की
तैयारी
भी
माना
जा
सकता
है।
अब
असली
सवाल
यह
नहीं
है
कि
धर्मेंद्र
प्रधान
क्यों
गए,
बल्कि
यह
है
कि
उनके
जाने
के
बाद
भाजपा
कौन-सी
नई
राजनीतिक
चाल
चलने
जा
रही
है.
ऐसे में बड़ा सवाल तो यही हैधर्मेंद्र प्रधान का
इस्तीफा
क्या
भाजपा
की
मजबूरी
था
या
सीमांकन
की
सबसे
बड़ी
रणनीतिक
चाल?

सुरेश गांधी
राजनीति शतरंज का वह खेल
है जिसमें हर चाल का
अर्थ तत्काल नहीं समझ आता।
कई बार जो निर्णय
हार जैसा दिखाई देता
है, वही आगे चलकर
सबसे बड़ी जीत की
नींव बनता है। केंद्रीय
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा भी
कुछ ऐसा ही संकेत
देता है। पहली नजर
में यह विपक्ष के
दबाव के आगे सरकार
का झुकना लगता है, लेकिन
यदि घटनाक्रम को जोड़कर देखा
जाए तो तस्वीर कहीं
अधिक व्यापक दिखाई देती है। पिछले
एक महीने से अधिक समय
तक छात्र आंदोलन सड़कों पर था। संसद
के भीतर विपक्ष पूरी
ताकत से सरकार को
घेर रहा था। मानसून
सत्र लगातार बाधित हो रहा था।
सरकार का पूरा विधायी
एजेंडा अधर में लटकता
दिखाई दे रहा था।
ऐसे समय में भाजपा
नेतृत्व के सामने सबसे
बड़ा प्रश्न यह था कि
क्या एक मंत्री को
बचाने के लिए पूरे
सत्र को दांव पर
लगा दिया जाए, या
फिर एक कठिन राजनीतिक
निर्णय लेकर आगे की
राह बनाई जाए? भाजपा
ने दूसरा रास्ता चुना। यही वह बिंदु
है जहां राजनीति केवल
सत्ता संचालन नहीं रहती, बल्कि
दीर्घकालिक रणनीति बन जाती है।
वैसे भी राजनीति में कई बार
पीछे हटना हार नहीं,
बल्कि आगे की बड़ी
जीत की तैयारी माना
जाता है। घुड़दौड़ में
भी लंबी रेस का
घोड़ा कभी-कभी संतुलन
बनाने के लिए दो
कदम पीछे चलता है।
यही बात इन दिनों
केंद्र की राजनीति पर
लागू होती दिखाई दे
रही है। केंद्रीय शिक्षा
मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को
केवल एक मंत्री के
पद छोड़ने की घटना मानना
शायद जल्दबाजी होगी। राजनीतिक गलियारों में इसे भाजपा
की व्यापक रणनीति के रूप में
देखा जा रहा है।
चर्चा है कि सरकार
मानसून सत्र के दौरान
सीमांकन (Delimitation)
से जुड़े महत्वपूर्ण विधायी कदम आगे बढ़ा
सकती है। यद्यपि सरकार
की आधिकारिक कार्यसूची में ऐसा कोई
विधेयक सूचीबद्ध नहीं था, फिर
भी राजनीतिक हलकों में इस संभावना
पर चर्चा जारी है कि
सत्र समाप्त होने से पहले
इस दिशा में पहल
हो सकती है। सीमांकन
केवल निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्गठन का
विषय नहीं है, बल्कि
इसका सीधा प्रभाव भविष्य
की राजनीतिक संरचना और सत्ता संतुलन
पर पड़ सकता है।
यही कारण है कि
इसे भाजपा के दीर्घकालिक एजेंडे
का अहम हिस्सा माना
जाता रहा है।
पिछले प्रयासों में सरकार को
अपेक्षित समर्थन नहीं मिल पाया
था, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव
के बाद राजनीतिक समीकरण
बदले हैं। एनडीए का
संख्याबल मजबूत हुआ है और
विभिन्न दलों में हुई
राजनीतिक उठापटक ने सरकार का
आत्मविश्वास बढ़ाया है। ऐसे में
यदि सरकार फिर कोई बड़ा
संवैधानिक कदम उठाने की
तैयारी कर रही है
तो उसके लिए पहले
राजनीतिक माहौल को शांत करना
भी उतना ही आवश्यक
था।
इसी
संदर्भ में धर्मेंद्र प्रधान
के इस्तीफे को देखा जा
रहा है। विपक्ष जंतर-मंतर के आंदोलन
और शिक्षा से जुड़े मुद्दों
पर लगातार सरकार को घेर रहा
था। यदि यह टकराव
और बढ़ता तो संसद का
पूरा एजेंडा प्रभावित हो सकता था।
ऐसे में सरकार ने
तत्काल राजनीतिक दबाव कम करने
का रास्ता चुना। भाजपा का राजनीतिक इतिहास
बताता है कि वह
आवश्यकता पड़ने पर रणनीतिक रूप
से पीछे हटने से
परहेज नहीं करती। किसान
आंदोलन के दौरान तीन
कृषि कानूनों की वापसी इसका
बड़ा उदाहरण है। उस समय
भी सरकार ने तत्काल नुकसान
स्वीकार कर दीर्घकालिक राजनीतिक
लक्ष्य को प्राथमिकता दी
थी।
हालाँकि, यह भी उतना
ही सच है कि
किसी मंत्री का इस्तीफा सरकार
की नैतिक और राजनीतिक जिम्मेदारी
का संदेश भी देता है।
इससे विपक्ष को यह कहने
का अवसर मिलता है
कि उसका दबाव असरदार
रहा। इसलिए भाजपा नेतृत्व के सामने चुनौती
केवल एक मंत्री को
हटाने की नहीं, बल्कि
अपने राजनीतिक संदेश और नेतृत्व की
छवि को भी संतुलित
रखने की थी। अब
सबकी निगाहें मानसून सत्र पर हैं।
यदि सरकार सीमांकन या किसी अन्य
बड़े संवैधानिक एजेंडे को आगे बढ़ाती
है, तो धर्मेंद्र प्रधान
का इस्तीफा केवल एक प्रशासनिक
निर्णय नहीं बल्कि व्यापक
राजनीतिक रणनीति का हिस्सा माना
जाएगा। यदि ऐसा नहीं
होता, तो इसे विपक्ष
के दबाव में उठाया
गया कदम समझा जाएगा।
राजनीति में अंतिम निष्कर्ष
हमेशा समय तय करता
है। फिलहाल इतना स्पष्ट है
कि भाजपा ने तत्काल टकराव
की जगह दीर्घकालिक रणनीति
को प्राथमिकता दी है। यह
फैसला भविष्य में उसकी सबसे
बड़ी राजनीतिक बाजी साबित होगा
या नहीं, इसका उत्तर आने
वाले महीनों की घटनाएँ देंगी।
सूत्रों की मानें तो,
इस मॉनसून सत्र में परिसीमन
बिल सदन के पटल
पर पेश किया जा
सकता है. हालांकि सरकार
द्वारा सूचीबद्ध पांच बिलों में
यह बिल शामिल नहीं
था, लेकिन खबरों की मानें तो
13 अगस्त से पहले सरकार
इस बिल को पेश
कर सकती है. यह
बिल बहुत अहम है,
इसे पहले भी मोदी
सरकार ने पेश करने
की कोशिश की थी. अप्रैल
में महिला आरक्षण बिल से जोड़ते
हुए इसे पास कराने
के लिए एक विशेष
सत्र आहूत किया गया
था. लेकिन सरकार दो तिहाई बहुमत
नहीं जुटा पाई थी
और ये बिल गिर
गया था. सूत्रों के अनुसार, Delimitation विधेयक मानसून सत्र में पेश
किया जा सकता है.
हालांकि सरकार की ओर से
सूचीबद्ध पांच विधेयकों में
इसका नाम नहीं था,
लेकिन रिपोर्टों के मुताबिक 13 अगस्त
तक चलने वाले इस
सत्र में इसे लाया
जा सकता है. यह
विधेयक बेहद महत्वपूर्ण माना
जा रहा है. अप्रैल
में मोदी सरकार ने
इसे महिला आरक्षण विधेयक के साथ जोड़कर
विशेष सत्र में पारित
कराने की कोशिश की
थी, लेकिन दो-तिहाई बहुमत
नहीं जुटा पाने के
कारण यह प्रयास विफल
हो गया. यह पहली
बार था जब मोदी
सरकार द्वारा लाया गया कोई
संवैधानिक संशोधन विधेयक पारित नहीं हो सका.
लेकिन अप्रैल के बाद सियासी
परिस्थितियां काफी बदल चुकी
हैं.
हाल के दल-बदल, दलों के
भीतर कलह, विपक्ष की
कमजोर एकजुटता और राजनीतिक पुनर्संरेखण
ने सरकार को उम्मीद दी
कि अब वह सीमांकन
विधेयक पारित कराने की फिर कोशिश
कर सकती है. 2024 के
लोकसभा चुनाव के बाद एनडीए
के पास 293 सांसद थे, जिनमें भाजपा
के 240 सांसद शामिल थे. बाद में
यह संख्या बढ़कर 318 हो गई. इसमें
मुख्य योगदान तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसदों के
एनडीए के साथ आने
और शिवसेना (यूबीटी) के छह सांसदों
के शिंदे गुट में शामिल
होने का रहा. राज्यसभा
में जून 2024 के मध्य तक
एनडीए के पास 101 सदस्य
थे. अब यह संख्या
बढ़कर 152 हो चुकी है.
यह बढ़ोतरी किसी चमत्कार का
परिणाम नहीं थी, बल्कि
सीमांकन के बड़े लक्ष्य
को ध्यान में रखते हुए
बेहद सोच-समझकर और
लगातार की गई राजनीतिक
रणनीति का नतीजा थी.
इस राजनीतिक इंजीनियरिंग के साथ-साथ
शरद पवार और एमके
स्टालिन जै.से नेताओं
को भी साथ लाना
जरूरी था, जो किसी
आसान काम से कम
नहीं था.
क्यों महत्वपूर्ण है संसद का चलना?
सरकार के सामने केवल
सामान्य विधेयक नहीं हैं। आने
वाले समय में जिन
विषयों पर राष्ट्रीय राजनीति
की दिशा तय होनी
है, उनमें सीमांकन (डिलिमिटेशन), महिला आरक्षण के क्रियान्वयन की
प्रक्रिया, जनगणना के बाद नई
संसदीय संरचना और कई संवैधानिक
विषय शामिल हैं। इन पर
चर्चा और आगे की
प्रक्रिया तभी संभव है
जब संसद सुचारु रूप
से चले। यदि पूरा
मानसून सत्र हंगामे की
भेंट चढ़ जाता, तो
सरकार का नुकसान केवल
राजनीतिक नहीं बल्कि विधायी
भी होता।
भाजपा की राजनीति का पुराना सूत्र
नरेंद्र मोदी और अमित
शाह की राजनीति का
एक स्थापित सिद्धांत रहा है—छोटी
लड़ाई हारकर बड़ी लड़ाई जीतना।
तीन कृषि कानूनों की
वापसी इसका सबसे बड़ा
उदाहरण है। उस समय
भी सरकार ने अपने निर्णय
पर पीछे हटते हुए
तत्काल राजनीतिक नुकसान स्वीकार किया, लेकिन उसके बाद संगठन
को फिर से खड़ा
किया और अगले चुनावों
में मजबूत वापसी की। धर्मेंद्र प्रधान
प्रकरण में भी लगभग
वैसी ही रणनीति दिखाई
देती है। भाजपा ने
यह संदेश दिया कि यदि
किसी एक चेहरे को
हटाने से सरकार का
व्यापक एजेंडा आगे बढ़ सकता
है, तो वह कठिन
निर्णय लेने से पीछे
नहीं हटेगी।
क्या विपक्ष सचमुच जीत गया?
विपक्ष निश्चित रूप से इसे
अपनी नैतिक और राजनीतिक जीत
बताएगा। वह कहेगा कि
लगातार आंदोलन और संसद के
भीतर संघर्ष ने सरकार को
झुकने पर मजबूर कर
दिया। लेकिन राजनीति केवल आज की
सुर्खियों से नहीं चलती।
यदि आने वाले महीनों
में सरकार अपने बड़े विधायी
और संवैधानिक एजेंडे को आगे बढ़ाने
में सफल रहती है,
तो इतिहास धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को
विपक्ष की जीत नहीं
बल्कि भाजपा की रणनीतिक कुर्बानी
के रूप में याद
करेगा।
बदलते राजनीतिक समीकरण
2024 के लोकसभा चुनाव
के बाद एनडीए बहुमत
के साथ सत्ता में
लौटा। उसके बाद विभिन्न
राज्यों में हुए राजनीतिक
बदलावों, सहयोगी दलों के साथ
बढ़ती मजबूती और विपक्ष के
भीतर बढ़ते अंतर्विरोधों ने सत्ता पक्ष
का आत्मविश्वास बढ़ाया है। यही कारण
है कि भाजपा अब
उन विषयों पर भी आगे
बढ़ने का मन बना
रही है जिन्हें वह
लंबे समय से अपने
वैचारिक और राजनीतिक एजेंडे
का हिस्सा मानती रही है। सीमांकन
उन्हीं में सबसे महत्वपूर्ण
माना जा रहा है।
प्रधान का जाना—संदेश क्या है?
यह निर्णय केवल
एक मंत्री का इस्तीफा नहीं
है। यह नौकरशाही के
लिए संदेश है कि जवाबदेही
तय होगी। यह संगठन के
लिए संदेश है कि कोई
भी व्यक्ति सरकार से बड़ा नहीं।
यह सहयोगी दलों के लिए
संदेश है कि भाजपा
राजनीतिक लचीलापन भी रखती है।
और विपक्ष के लिए संदेश
है कि सरकार परिस्थितियों
के अनुसार अपनी रणनीति बदलने
से नहीं हिचकती।
अब असली परीक्षा
यदि मानसून सत्र
के शेष दिनों में
सरकार संसद को सुचारु
रूप से चलाने, अपने
महत्वपूर्ण विधायी कार्यक्रम को आगे बढ़ाने
और राजनीतिक पहल वापस अपने
हाथ में लेने में
सफल रहती है, तो
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा भाजपा
की सबसे सफल राजनीतिक
चालों में गिना जाएगा।
लेकिन यदि संसद फिर
भी ठप रहती है,
बड़े विधेयक आगे नहीं बढ़ते
और विपक्ष का आक्रामक रुख
कायम रहता है, तो
यह निर्णय केवल क्षति-नियंत्रण
बनकर रह जाएगा। राजनीति
में अंतिम फैसला चुनाव नहीं, समय देता है।
फिलहाल इतना स्पष्ट है
कि भाजपा ने तत्काल प्रतिष्ठा
से अधिक दीर्घकालिक राजनीतिक
लक्ष्य को प्राथमिकता दी
है। लंबी रेस का
घोड़ा अक्सर दो कदम पीछे
इसलिए चलता है ताकि
अगली छलांग सबसे लंबी हो।
अब देखना यह है कि
यह रणनीतिक विराम भाजपा को इतिहास के
अगले मोड़ तक पहुंचाता
है या नहीं।