‘टूल नहीं, ताकत बनिए’ : रविंद्र जायसवाल ने समाज से किया आत्मसम्मान और एकता का आह्वान
रुद्राक्ष कन्वेंशन
सेंटर
में
अखिल
भारतवर्षीय
हैहय
कलचुरी
महासभा
का
91वां
स्थापना
दिवस
एवं
परिचय
सम्मेलन
• बेटियों को आईएएस-पीसीएस
बनाने
पर
जोर
• बोले—
राजनीतिक
उपयोग
से
सावधान
रहे
समाज
सुरेश गांधी
वाराणसी। रुद्राक्ष इंटरनेशनल कॉरपोरेशन एंड कन्वेंशन सेंटर
शनिवार को सामाजिक चेतना,
आत्मसम्मान और शिक्षा के
संकल्प का साक्षी बना।
अखिल भारतवर्षीय हैहय कलचुरी महासभा
के तत्वावधान में आयोजित 91वें
स्थापना दिवस एवं परिचय
सम्मेलन में बड़ी संख्या
में स्वजातीय बंधु जुटे। कार्यक्रम
का शुभारंभ सूबे के स्टाम्प
शुल्क एवं पंजीयन राज्य
मंत्री रविंद्र जायसवाल ने भगवान श्री
राजराजेश्वर सहस्त्रबाहु जी के तैलचित्र
पर दीप प्रज्ज्वलित कर
किया।
मुख्य अतिथि रविंद्र जायसवाल ने अपने संबोधन
में समाज को आत्मसम्मान
और संगठन का मंत्र देते
हुए कहा कि किसी
भी समाज की सबसे
बड़ी शक्ति उसकी सामूहिक चेतना
होती है। उन्होंने स्पष्ट
शब्दों में कहा कि
समाज के लोगों को
किसी का “
टूल”
नहीं
बनना चाहिए। जो लोग दूसरों
के राजनीतिक
या निजी हितों
के लिए उपयोग होते
हैं,
अंततः उनका केवल शोषण
होता है। समाज को
अपने संसाधन,
श्रम,
समय और वोट
की ताकत पहचाननी होगी।
उन्होंने कहा कि वर्षों
तक अनेक लोग समाज
के सहयोग से आगे बढ़ते
हैं, लेकिन कठिन समय में
वही लोग साथ नहीं
दिखाई देते। इसलिए समाज को आत्मनिर्भर,
संगठित और जागरूक बनना
होगा। उन्होंने आग्रह किया कि स्वजातीय
समाज का कोई भी
व्यक्ति यदि किसी क्षेत्र
में आगे बढ़ने का
प्रयास कर रहा हो
तो उसे सामूहिक सहयोग
दिया जाए।
“पहचान अलग हो सकती है, मूल एक है”
मंत्री ने समाज के
विभिन्न उपनामों और शाखाओं का
उल्लेख करते हुए कहा
कि नाम भिन्न हो
सकते हैं, किंतु मूल
पहचान एक ही है।
जिस प्रकार अनेक नदियां मिलकर
गंगा का विराट स्वरूप
धारण करती हैं, उसी
प्रकार समाज की छोटी-छोटी धाराएं मिलकर
ही बड़ी सामाजिक शक्ति
बनती हैं। उन्होंने सामाजिक
एकता को समय की
सबसे बड़ी आवश्यकता बताया।
बेटियों को रसोई तक सीमित न करें
रविंद्र जायसवाल ने मातृशक्ति और
पितृशक्ति से विशेष अपील
करते हुए कहा कि
आज देश की बेटियां
हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त
कर रही हैं। ऐसे
में समाज की बेटियों
को केवल रसोई की
जिम्मेदारियों तक सीमित करना
उचित नहीं है। उन्होंने
कहा कि जब बेटी
पढ़ रही हो तो
उसे समय से पहले
किचन की जिम्मेदारियों में
न बांधें,
बल्कि उसे आईएएस,
पीसीएस,
डॉक्टर,
इंजीनियर और प्रशासनिक अधिकारी
बनने का अवसर दें।
उन्होंने कहा कि एक शिक्षित
बेटी केवल अपना जीवन
नहीं बदलती,
वह पूरे परिवार
की सोच बदल देती
है। परिवार शिक्षित होता है तो
समाज शिक्षित होता है और
समाज शिक्षित होता है तो
राष्ट्र प्रगति करता है।
व्यापार के साथ शिक्षा का संतुलन जरूरी
मंत्री ने व्यापारिक परिवारों
से भी कहा कि
बच्चों को कम उम्र
में केवल दुकान और
व्यवसाय तक सीमित न
करें। व्यापार सम्मानजनक है,
लेकिन शिक्षा
और बौद्धिक विकास के बिना समाज
नेतृत्वकारी भूमिका नहीं निभा सकता।
उन्होंने सरस्वती और लक्ष्मी के
संतुलन को स्थायी समृद्धि
का आधार बताया।
सामाजिक कुरीतियों पर भी साधा निशाना
मंत्री ने दिखावे और
अनावश्यक सामाजिक खर्चों पर भी चिंता
व्यक्त की। उन्होंने कहा
कि समाज को ऐसी
परंपराओं पर पुनर्विचार करना
चाहिए जिनमें संवेदना से अधिक प्रदर्शन
दिखाई देता है। सामाजिक
मेल-मिलाप का उद्देश्य आत्मीयता
होना चाहिए, प्रतिस्पर्धी प्रदर्शन नहीं।
इन वक्ताओं ने भी रखे विचार
सम्मेलन को अखिल भारतवर्षीय
हैहय कलचुरी महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष
जय नारायण चौकसी, प्रदेश महिला आयोग की उपाध्यक्ष
चारू जायसवाल, प्रेम चौधरी, श्रीमती मालती राय, राम सेवक
राय, एस. एन. मालवीय
तथा जगन्नाथ प्रसाद सहित अन्य वक्ताओं
ने संबोधित किया। वक्ताओं ने समाज में
शिक्षा, संगठन, महिला सशक्तीकरण, युवा जागरूकता और
सामाजिक समरसता को मजबूत करने
पर बल दिया।
सामाजिक चेतना का संदेश
कार्यक्रम में समाज के
विभिन्न क्षेत्रों में योगदान देने
वाले लोगों का सम्मान भी
किया गया तथा परिचय
सम्मेलन के माध्यम से
सामाजिक संवाद और पारिवारिक संपर्क
को बढ़ाने का प्रयास किया
गया। पूरे आयोजन में
यह संदेश प्रमुखता से उभरा कि
समाज की वास्तविक उन्नति
शिक्षा, संगठन, आत्मसम्मान और पारस्परिक सहयोग
से ही संभव है।
रुद्राक्ष से उठी यह
आवाज केवल एक सामाजिक
सम्मेलन तक सीमित नहीं
रही, बल्कि उसने बदलते भारत
में समाज की नई
दिशा— एकता, शिक्षा और आत्मसम्मान— का
स्पष्ट संकेत भी दिया।
“पहचान होगी तभी भागीदारी बढ़ेगी” — जय नारायण चौकसी
अखिल भारतवर्षीय हैहय
कलचुरी महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष
जय नारायण चौकसी ने कहा कि
समाज को अपनी पहचान,
इतिहास और जनसंख्या के
प्रति जागरूक होना होगा। उन्होंने
बताया कि देश के
विभिन्न राज्यों— हैदराबाद, तमिलनाडु, दिल्ली, हरियाणा सहित लगभग 15 से
20 राज्यों से प्रतिनिधि इस
सम्मेलन में शामिल होने
के लिए वाराणसी पहुंचे
हैं। यह समाज की
व्यापक उपस्थिति और राष्ट्रीय एकता
का प्रतीक है। उन्होंने कहा
कि समाज के अनेक
लोग आज भी अपने
गौरवशाली इतिहास से अनभिज्ञ हैं।
समाज का इतिहास हजारों
वर्ष पुराना है और छत्तीसगढ़
के बिलासपुर क्षेत्र में स्थित प्राचीन
मंदिर तथा हैहय-कलचुरी
वंश की परंपरा आज
भी उसके वैभव की
साक्षी है। उन्होंने कहा
कि जब समाज अपने
इतिहास को जानता है
तभी उसमें आत्मगौरव जागता है। बता दें, रविंद्र जायसवाल
का यह संबोधन केवल
एक जातीय सभा का भाषण
भर नहीं था, बल्कि
उत्तर भारतीय समाज की उन
गहरी प्रवृत्तियों पर टिप्पणी भी
था जहां राजनीतिक उपयोग,
सामाजिक बिखराव और शिक्षा के
प्रति असंतुलित दृष्टि लंबे समय से
चर्चा का विषय रहे
हैं। विशेष रूप से बेटियों
की शिक्षा और आत्मनिर्भरता पर
दिया गया उनका जोर
बदलते भारत की उस
सामाजिक चेतना से मेल खाता
है जिसमें परिवार की प्रगति अब
बेटी की प्रगति से
अलग नहीं देखी जाती।
वाराणसी की धरती से उठी
यह आवाज अंततः एक
व्यापक संदेश देती है— समाज
तब तक सम्मानित नहीं
हो सकता जब तक
वह स्वयं अपनी शक्ति को
पहचानकर शिक्षा, संगठन और आत्मसम्मान के
मार्ग पर दृढ़ता से
आगे बढ़ने का निर्णय न
ले.