आस्था, राजनीति और ‘पॉलिटिक्स’ का विवाद : काशी के विकास पर सवाल या विचारों का संघर्ष?
भारत की आध्यात्मिक राजधानी वाराणसी एक बार फिर धार्मिक और राजनीतिक विमर्श के केंद्र में है। कथित शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानन्द के हालिया बयानों ने “राजनीति बनाम पॉलिटिक्स”, “संत और सरकारी वेतन” तथा काशी में मंदिर-घाटों के पुनर्विकास को लेकर नई बहस छेड़ दी है। उनके बयान को परोक्ष रूप से योगी आदित्यनाथ और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चल रहे काशी विश्वनाथ कॉरिडोर से जोड़कर देखा जा रहा है। जहां एक ओर उनके समर्थक इसे “परंपरा की रक्षा” का स्वर बता रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कई विद्वान इसे तथ्यहीन और राजनीतिक संकेतों से प्रेरित बयान मान रहे हैं। ऐसे में बड़ा सवाल तो यही है क्या शास्त्रों की व्याख्या आधुनिक शहरी विकास के विरोध का आधार बन सकती है? क्या लोकतंत्र में संत का सामाजिक-राजनीतिक भूमिका निभाना असंगत है? काशी, जो हजारों वर्षों से परिवर्तन और परंपरा के संतुलन का प्रतीक रही है, आज फिर उसी ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है, जहां विकास, धर्म और विमर्श तीनों एक साथ उपस्थित हैं. भारतीय परंपरा में धर्म और शासन का संबंध जटिल लेकिन संतुलित रहा है। राजऋषि से लेकर आधुनिक लोकतांत्रिक नेतृत्व तक, यह संबंध समय के साथ बदलता रहा है। आज आवश्यकता है : ऐतिहासिक संदर्भ समझने की, धर्मशास्त्रीय आदर्श और संवैधानिक व्यवस्था में अंतर पहचानने की, वैचारिक मतभेद को संवाद में बदलने की. संत परंपरा का मूल उद्देश्य समाज को दिशा देना रहा है, और लोकतंत्र का उद्देश्य समाज को प्रतिनिधित्व देना। जब दोनों संतुलित होते हैं, तभी भारतीय सांस्कृतिक परंपरा मजबूत होती है
सुरेश गांधी
भारत की सांस्कृतिक
राजधानी वाराणसी सदियों से आध्यात्मिक विमर्शों
का केंद्र रही है। यहां
धर्म, दर्शन और समाज पर
बहसें नई नहीं हैं,
लेकिन हाल के दिनों
में एक कथित शंकराचार्य
अविमुक्तेश्वरानन्द के बयान ने
धार्मिक और राजनीतिक विमर्श
को फिर से चर्चा
के केंद्र में ला दिया
है। उन्होंने कहा कि “भारत
में राजनीति नहीं, पॉलिटिक्स हो रही है”,
“राजा नहीं है तो
राजनीति का अर्थ नहीं”,
“संत तनख्वाह नहीं ले सकता”,
और “आधुनिकता के नाम पर
काशी के मंदिर-घाट
तोड़े जा रहे हैं,
जो भविष्य में फिर स्थापित
होंगे।” उनके इन कथनों
को कई लोगों ने
परोक्ष रूप से योगी
आदित्यनाथ और नरेंद्र मोदी
की ओर संकेत माना।
खासकर काशी विश्वनाथ मंदिर
और काशी विश्वनाथ कॉरिडोर
के व्यापक पुनर्विकास के संदर्भ में
यह विवाद और तेज हुआ।
ऐसे में सवाल है,
क्या उनके तर्क शास्त्रीय
और तथ्यात्मक आधार पर सही
हैं? क्या “राजनीति” और “पॉलिटिक्स” का
यह विभाजन वैध है? क्या
संत का सरकारी पद
या वेतन लेना अनुचित
है? और क्या काशी
में वास्तव में “विध्वंस” हुआ
है या “पुनरुद्धार”?
कथित शंकराचार्य का
मुख्य तर्क यह है
कि “राजनीति” शब्द का अर्थ
राजा की नीति से
है, इसलिए जब राजतंत्र समाप्त
हो गया तो राजनीति
भी समाप्त हो गई और
अब विदेशी “पॉलिटिक्स” चल रही है।
क्या यह व्याख्या सही
है? संस्कृत में “राजनीति” शब्द
का अर्थ केवल राजा
की व्यक्तिगत नीति नहीं बल्कि
राज्य संचालन की नीति है।
अर्थशास्त्र में कौटिल्य ने
राजनीति को राज्य संचालन
का विज्ञान बताया। प्राचीन भारतीय ग्रंथों में “राजा” शब्द
का अर्थ सत्ता का
प्रतिनिधि था, न कि
केवल वंशानुगत शासक। आधुनिक लोकतंत्र में “राजा” की
जगह जनता सर्वोच्च है।
इसलिए लोकतंत्र में राजनीति समाप्त
नहीं होती बल्कि उसका
स्वरूप बदलता है। दूसरी ओर
“पॉलिटिक्स” शब्द ग्रीक शब्द
पोलिस से आया है,
जिसका अर्थ नगर-राज्य
है। इसलिए “राजनीति” और “पॉलिटिक्स” मूलतः
समानार्थी अवधारणाएँ हैं। यह कहना
कि “राजा नहीं तो
राजनीति नहीं”, शास्त्रीय और आधुनिक दोनों
दृष्टि से अधूरा तर्क
है। कथित शंकराचार्य का
दूसरा तर्क था कि
“संत तनख्वाह नहीं ले सकता”,
और जो सरकारी वेतन
लेता है वह संत
नहीं। यह तर्क सीधे
तौर पर योगी आदित्यनाथ
की ओर संकेत माना
गया, जो एक संन्यासी
परंपरा से आते हैं
और साथ ही लोकतांत्रिक
पद पर भी हैं।
भारतीय इतिहास में धर्म और
शासन का संवाद हमेशा
रहा है : आदि शंकराचार्य
स्वयं विभिन्न राजाओं के संरक्षण में
धर्मसंस्थाओं का संगठन करते
रहे। मध्यकाल में मठों और
अखाड़ों को राजाओं से
अनुदान मिलता था। अनेक संत
समाज सुधार और शासन व्यवस्था
दोनों से जुड़े रहे।
संन्यास का अर्थ व्यक्तिगत
वैराग्य है, राजकीय दायित्व
से दूरी आवश्यक शर्त
नहीं। भारत में कोई
व्यक्ति यदि लोकतांत्रिक प्रक्रिया
से मुख्यमंत्री बनता है तो
उसे वेतन मिलता है,
यह व्यक्तिगत नहीं बल्कि संवैधानिक
पद का मानदेय है।
इसलिए प्रश्न यह नहीं होना
चाहिए कि “संत वेतन
ले सकता है या
नहीं”, बल्कि यह कि क्या
वह पद की मर्यादा
निभा रहा है? सबसे
बड़ा विवाद काशी विश्वनाथ मंदिर
क्षेत्र के पुनर्विकास को
लेकर है। कथित शंकराचार्य
ने कहा कि “मंदिर-विग्रह और घाट तोड़े
जा रहे हैं।” वास्तविक
तथ्य यह है कि
श्रीकाशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर निर्माण
के दौरान : सैकड़ों प्राचीन मंदिरों की पहचान की
गई, कई मंदिर जो
मकानों के भीतर छिप
गए थे, उन्हें पुनर्स्थापित
किया गया, पुरातत्व विशेषज्ञों
की निगरानी में संरचनात्मक संरक्षण
किया गया. सरकारी आंकड़ों
के अनुसार लगभग 40 से अधिक प्राचीन
मंदिर संरक्षित रूप में सामने
आए। यह प्रक्रिया “डिमॉलिशन”
नहीं बल्कि “डी-एन्क्रोचमेंट और
रिस्टोरेशन” थी।
वैसे भी काशी
में परिवर्तन नया नहीं है।
पिछले एक शताब्दी में
कई बड़े बदलाव हुए
:- 1. औपनिवेशिक काल : ब्रिटिश प्रशासन ने घाटों की
संरचनात्मक मरम्मत कराई। कई सड़कें बनाई
गईं। 2. स्वतंत्रता के बाद मंदिर
मार्गों का विस्तार हुआ।
धार्मिक पर्यटन का विकास शुरू
हुआ। 3. आधुनिक काल : गंगा घाटों का
संरक्षण, शहरी पुनर्विकास, कॉरिडोर
परियोजना. यह कहना कि
“अब पहली बार परिवर्तन
हुआ”, तथ्यात्मक रूप से गलत
है। कथित शंकराचार्य ने
कहा कि “पुराणों के
अनुसार सब अपने स्थान
पर पुनः स्थापित होगा।”
ध्यान देने योग्य बात
यह है कि पुराण
प्रतीकात्मक भाषा में लिखे
गए हैं। उन्हें शाब्दिक
रूप से आधुनिक निर्माण
विवादों पर लागू करना
कठिन है। धर्मग्रंथ आस्था
का मार्गदर्शन करते हैं, शहरी
नियोजन का नक्शा नहीं।
उनके बयान में “विदेशी
पॉलिटिक्स” और “सरकारी संत”
जैसे शब्दों का प्रयोग यह
संकेत देता है कि
यह केवल दार्शनिक चर्चा
नहीं बल्कि राजनीतिक टिप्पणी भी है। लोकतंत्र
में यह अधिकार सभी
को है, परंतु जब
धार्मिक पद का उपयोग
राजनीतिक संकेत देने के लिए
किया जाता है, तब
विवाद स्वाभाविक है।
शंकराचार्य पद अत्यंत प्रतिष्ठित
है। इस परंपरा की
शुरुआत आदि शंकराचार्य ने
की थी, जिनका उद्देश्य
था : वेदांत का प्रचार, धार्मिक
एकता, दार्शनिक संवाद. इस पद से
अपेक्षा की जाती है
कि भाषा संयमित हो,
तथ्य स्पष्ट हों, समाज में
विभाजन नहीं संवाद हो.
यदि कोई व्यक्ति बार-बार राजनीतिक संकेतों
के साथ बयान देता
है तो उसके कथनों
पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
भारत की परंपरा में
संत तीन भूमिकाओं में
रहे : आध्यात्मिक मार्गदर्शक, सामाजिक सुधारक, नैतिक सलाहकार. लेकिन संत सीधे राजनीतिक
संघर्ष का हिस्सा कम
ही बने। आज का
विवाद इसी संतुलन से
जुड़ा है। मतलब साफ
है राजनीति और पॉलिटिक्स का
अंतर भाषाई है, वैचारिक नहीं,
संत द्वारा वेतन पर टिप्पणी
शास्त्रीय रूप से निर्णायक
नहीं. काशी में व्यापक
पुनर्विकास हुआ है, केवल
विध्वंस नहीं. फिरहाल, काशी केवल एक
शहर नहीं, यह भारतीय सभ्यता
का प्रतीक है। यहां परिवर्तन
भी होगा और परंपरा
भी रहेगी। काशी विश्वनाथ कॉरिडोर
परियोजना ने जहां आधुनिक
सुविधाएं दीं, वहीं सांस्कृतिक
पहचान को संरक्षित करने
का प्रयास भी किया। कथित
शंकराचार्य का बयान एक
वैचारिक दृष्टिकोण हो सकता है,
लेकिन उसे अंतिम सत्य
नहीं माना जा सकता।
लोकतंत्र में प्रश्न उठाना
आवश्यक है, परंतु उतना
ही आवश्यक है कि तर्क
शास्त्र आधारित हों, तथ्य प्रमाणित
हों, भाषा संयमित हो.
काशी का इतिहास बताता
है कि यह नगरी
विरोध नहीं, समन्वय से आगे बढ़ती
है। और शायद यही
काशी का सनातन संदेश
भी है।
फैक्ट-चेक कॉलम : दावों की पड़ताल
दावा
1ः
भारत
में
राजनीति
समाप्त
हो
गई
है
तथ्य : लोकतंत्र में “राजा” जनता
होती है। राजनीति का
अर्थ राज्य संचालन की नीति है,
जो आज भी लागू
है।
दावा
2 : संत
सरकारी
वेतन
नहीं
ले
सकता
तथ्य : भारतीय परंपरा में मठों और
संतों को राजकीय संरक्षण
मिलता रहा है। आधुनिक
लोकतंत्र में वेतन व्यक्तिगत
नहीं बल्कि पद का मानदेय
होता है।
दावा
3 : काशी
में
मंदिर
तोड़े
जा
रहे
हैं
तथ्य : पुनर्विकास के दौरान अनेक
प्राचीन मंदिरों को चिन्हित कर
संरक्षित रूप में पुनर्स्थापित
किया गया।
दावा
4 : पुराणों
में
वर्तमान
निर्माण
का
विरोध
बताया
गया
है
तथ्य : पुराण प्रतीकात्मक ग्रंथ हैं; उनमें आधुनिक
परियोजनाओं का प्रत्यक्ष संदर्भ
नहीं मिलता।
दावा
5 : विकास
परंपरा
के
विरुद्ध
है
तथ्य : काशी का इतिहास
बताता है कि यहां
हर युग में पुनर्निर्माण
और विस्तार होता रहा है।
धर्मशास्त्र क्या कहते हैं?
भारतीय सनातन परंपरा में संन्यास केवल
वस्त्र या पहचान का
विषय नहीं, बल्कि जीवन दर्शन का
मार्ग माना गया है।
संन्यासी का मूल लक्ष्य
होता है :- त्याग, साधना और आत्मबोध। लेकिन
इतिहास यह भी बताता
है कि संन्यास परंपरा
हमेशा समाज से पूर्ण
अलगाव में नहीं रही।
कई संतों ने समय-समय
पर सामाजिक और प्रशासनिक भूमिका
भी निभाई है। उत्तर प्रदेश
के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को
लेकर उठी बहस, क्या
संन्यासी को शासन में
होना चाहिए, दरअसल आधुनिक राजनीति और परंपरागत संन्यास
मॉडल के बीच तुलना
का विषय बन गई
है।
संन्यास की पारंपरिक अवधारणा
धर्मशास्त्रों के अनुसार जीवन
को चार आश्रमों में
विभाजित किया गया है
: ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास. संन्यास आश्रम का मूल उद्देश्य
था : व्यक्तिगत त्याग, भौतिक इच्छाओं से दूरी, आध्यात्मिक
साधना. विशेष रूप से अद्वैत
वेदांत परंपरा, जिसकी स्थापना आदि शंकराचार्य ने
की, उसमें संन्यास को ज्ञान मार्ग
का सर्वोच्च चरण माना गया।
क्या संन्यासी समाज से अलग रहता है?
धर्मशास्त्रों में संन्यास का
एक आदर्श स्वरूप अवश्य मिलता है, लेकिन इतिहास
में अनेक संन्यासियों ने
समाज के बीच रहकर
कार्य किया। उदाहरण : स्वामी विवेकानंद ने राष्ट्र चेतना
को जगाया, स्वामी दयानंद सरस्वती ने सामाजिक सुधार
आंदोलन चलाया, इन उदाहरणों से
स्पष्ट है कि संन्यास
का अर्थ समाज से
पलायन नहीं, बल्कि समाज के लिए
समर्पण भी हो सकता
है।
गोरखनाथ परंपरा और सामाजिक संन्यास
योगी आदित्यनाथ जिस
परंपरा से आते हैं,
वह गुरु गोरखनाथ की
नाथ परंपरा है। नाथ संप्रदाय
की विशेषताएं : योग और साधना,
लोकजीवन से जुड़ाव, सामाजिक
भूमिका, इस परंपरा में
मठ केवल आध्यात्मिक केंद्र
नहीं रहे, बल्कि सामाजिक
और सांस्कृतिक गतिविधियों के केंद्र भी
बने।
संवैधानिक पद और संन्यास
यहां सबसे महत्वपूर्ण
प्रश्न यह है, क्या
संन्यासी का सार्वजनिक पद
ग्रहण करना धर्मशास्त्र के
विरुद्ध है? धर्मशास्त्र सीधे
लोकतांत्रिक व्यवस्था पर टिप्पणी नहीं
करते, क्योंकि उस समय शासन
संरचना अलग थी। लेकिन
“लोककल्याण” को धर्म का
अंग माना गया है।
भारत का संविधान किसी
भी नागरिक को चुनाव लड़ने
का अधिकार देता है। इसलिए
यदि कोई संन्यासी जनमत
से निर्वाचित होता है, तो
वह संवैधानिक प्रक्रिया का हिस्सा होता
है।
वेतन विवाद का धर्मशास्त्रीय पक्ष
हाल में ज्योतिष
पीठ से जुड़े शंकराचार्य
माने जाने वाले स्वामी
अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती द्वारा यह कहा गया
कि “संत तनख्वाह नहीं
ले सकता”। धर्मशास्त्रों
में संन्यासी के लिए व्यक्तिगत
संपत्ति संचय से बचने
की बात कही गई
है, लेकिन आधुनिक संवैधानिक पद के मानदेय
का संदर्भ अलग है। मुख्यमंत्री
का वेतन : व्यक्तिगत व्यवसाय का वेतन नहीं,
संवैधानिक पद का मानदेय
है. यह अंतर अक्सर
सार्वजनिक बहस में स्पष्ट
नहीं किया जाता।
धर्मपीठों की राजनीति
भारत में धर्मपीठ
केवल धार्मिक संस्थान नहीं रहे, बल्कि
सामाजिक चेतना और सांस्कृतिक दिशा
के केंद्र भी रहे हैं।
समय के साथ इनकी
भूमिका भी बदली है।
चार प्रमुख शंकराचार्य पीठों की स्थापना आदि
शंकराचार्य ने की थी
: शृंगेरी, द्वारका, पुरी, ज्योतिर्मठ. इनका उद्देश्य था
: वेदांत का संरक्षण, शास्त्रार्थ
की परंपरा, सांस्कृतिक एकता, राजनीतिक भूमिका इनका मूल उद्देश्य
नहीं थी।
स्वतंत्रता आंदोलन और संतों की भूमिका
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कई
संतों ने सामाजिक चेतना
जगाई। धार्मिक मंचों का उपयोग राष्ट्र
जागरण के लिए हुआ।
हालांकि, प्रत्यक्ष राजनीतिक पद ग्रहण करने
के उदाहरण अपेक्षाकृत कम रहे।
आधुनिक दौर में धर्मपीठ और सार्वजनिक बयान
21वीं सदी में
मीडिया और संचार माध्यमों
के विस्तार के साथ धार्मिक
व्यक्तित्वों के वक्तव्य राष्ट्रीय
चर्चा का हिस्सा बनने
लगे। उदाहरण के रूप में
: शासन व्यवस्था पर टिप्पणी, सांस्कृतिक
परियोजनाओं पर मत, राजनीतिक
निर्णयों पर प्रतिक्रिया. यह
प्रवृत्ति नई अवश्य है,
लेकिन लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति के दायरे में
आती है।
काशी और वैचारिक विमर्श
धार्मिक विमर्श का एक प्रमुख
केंद्र बना है वाराणसी,
जहां काशी विश्वनाथ मंदिर
क्षेत्र के पुनर्विकास के
बाद परंपरा और आधुनिकता पर
चर्चा तेज हुई। प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी की पहल
पर बने इस कॉरिडोर
का उद्देश्य तीर्थ सुविधाओं का विस्तार और
सांस्कृतिक पुनर्संरचना बताया गया। हालांकि कुछ
धार्मिक समूहों ने पारंपरिक संरचना
में बदलाव को लेकर चिंता
भी जताई।
धर्मपीठ और राजनीतिक संकेतः क्यों बढ़ रही है बहस?
इसके तीन प्रमुख
कारण माने जाते हैं
: धार्मिक प्रभाव का व्यापक सामाजिक
असर, सांस्कृतिक परियोजनाओं का राजनीतिक महत्व,
मीडिया में बढ़ती दृश्यता.
इन कारणों से धार्मिक बयान
अब अधिक चर्चा में
आते हैं।

