Friday, 27 February 2026

जलवायु परिवर्तन की मार अब महिलाओं के स्वास्थ्य पर, वाराणसी में होगा राष्ट्रीय मंथन

जलवायु परिवर्तन की मार अब महिलाओं के स्वास्थ्य पर, वाराणसी में होगा राष्ट्रीय मंथन 

मेडवेज हेल्थ फाउंडेशन काशी-शील्ड कॉन्क्लेव 2026’ 28 फरवरी को, विशेषज्ञ बताएंगे रोकथाम आधारित स्वास्थ्य के उपाय

सुरेश गांधी

वाराणसी। महिलाओं के स्वास्थ्य पर बढ़ते पर्यावरणीय बदलाव और जलवायु संकट के प्रभाव को लेकर वाराणसी में राष्ट्रीय स्तर का संवाद आयोजित किया जा रहा है। मेडवेज हेल्थ फाउंडेशन द्वारा 28 फरवरी को सुबह 930 बजे से होटल ताज गंगेज मेंशी-शील्ड कॉन्क्लेव 2026’ का आयोजन किया जाएगा। इस संबंध में आयोजित प्रेस वार्ता में कार्यक्रम की रूपरेखा, उद्देश्य और विषय-वस्तु की विस्तृत जानकारी दी गई।

आयोजकों ने बताया कि यह कॉन्क्लेव महिलाओं के स्वास्थ्य और पर्यावरणीय चुनौतियों के संबंध पर केंद्रित एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मंच होगा। कार्यक्रम का मुख्य विषयपर्यावरणीय चुनौतियों के बीच महिलाओं के स्वास्थ्य का भविष्यरखा गया है, जिसमें स्वास्थ्य, सार्वजनिक नीति, सामाजिक विकास और उद्योग जगत से जुड़े विशेषज्ञ अपने विचार साझा करेंगे।  

प्रेस वार्ता में बताया गया कि वायु प्रदूषण, दूषित जल, बदलती जीवनशैली और पोषण असंतुलन का सीधा असर महिलाओं के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। आयरन की कमी (एनीमिया), सर्वाइकल कैंसर, ब्रेस्ट कैंसर तथा हार्मोनल असंतुलन जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। ऐसे में इलाज के साथ-साथ रोकथाम (प्रिवेंटिव हेल्थ) पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।

कार्यक्रम में पद्मश्री सम्मानित लोकगायिका मालिनी अवस्थी, तथा पद्मश्री सम्मानित कथक नृत्यांगना युगल नालिनी कामालिनी सहित कई राष्ट्रीय स्तर की हस्तियां शामिल होंगी। इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य मानकों के संदर्भ में वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजेशन से जुड़े शोध अनुभवों तथा अकादमिक दृष्टिकोण से सेंट्रल युनिवर्सिटी आफ झारखंड के विशेषज्ञों की भागीदारी रहेगी। सामाजिक-आर्थिक आयामों पर स्वास्थ्य जागरूकता मॉडल के संदर्भ में उत्कर्ष स्माल फाइनेंस बैंक तथा कॉर्पोरेट सहभागिता के अंतर्गत एलजी इलेक्ट्रनिक से जुड़े प्रतिनिधि भी अपने विचार रखेंगे।

आयोजकों ने बताया कि कॉन्क्लेव में तीन तकनीकी सत्र आयोजित होंगे, महिलाओं का समग्र स्वास्थ्य और पोषण, पर्यावरण और रोगों का संबंध, सामाजिक-आर्थिक प्रभाव और समाधान. प्रेस वार्ता में वक्ताओं ने कहा कि यदि परिवार की महिला स्वस्थ होती है तो पूरा परिवार और समाज सशक्त बनता है। इसलिए महिलाओं के स्वास्थ्य को केवल चिकित्सा तक सीमित रखकर पर्यावरण, पोषण और सामाजिक जागरूकता से जोड़ना आवश्यक है।

मेडवेज हेल्थ फाउंडेशन ने मीडिया, चिकित्सकों और सामाजिक संगठनों से इस महत्वपूर्ण पहल में सहभागिता का आह्वान किया, ताकि महिलाओं के स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता को जमीनी स्तर तक पहुंचाया जा सके और रोकथाम आधारित स्वास्थ्य मॉडल को मजबूत बनाया जा सके।

आयोजकों ने कहा कि आज स्वास्थ्य क्षेत्र में बड़े अस्पताल और आधुनिक तकनीक तेजी से बढ़ रही है, लेकिन बीमारियों की रोकथाम पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जा रहा है। महिलाओं में आयरन की कमी, सर्वाइकल कैंसर, ब्रेस्ट कैंसर, हार्मोनल असंतुलन और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं, जिन्हें शुरुआती स्तर पर नियंत्रित करना समय की मांग है।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया गया कि यदि परिवार की महिला स्वस्थ रहती है तो पूरा परिवार और समाज मजबूत होता है। इसी सोच के साथ कॉन्क्लेव में स्वास्थ्य, पर्यावरण और सामाजिक संरचना के आपसी संबंध को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया जाएगा।

अबीर-गुलाल से दैदीप्यमान हुई काशी, रंगभरी एकादशी पर ‘हर-हर महादेव’ से गुंजा श्रीकाशी विश्वनाथ धाम

अबीर-गुलाल से दैदीप्यमान हुई काशी, रंगभरी एकादशी परहर-हर महादेवसे गुंजा श्रीकाशी विश्वनाथ धाम

रजत पालकी में बाबा-गौरा के दर्शन को उमड़ा आस्था का सैलाब, हल्दी-गुलाल अर्पित कर शुरू हुआ छह दिवसीय रंगोत्सव

घाटों से गलियों तक भक्ति, परंपरा और उत्साह का अद्भुत संगम, देश-विदेश से आए श्रद्धालु हुए भावविभोर

सुरेश गांधी

 वाराणसी। आस्था, परंपरा और उल्लास की त्रिवेणी में डूबी काशी ने रंगभरी एकादशी पर एक बार फिर अपने आध्यात्मिक वैभव का अद्भुत स्वरूप प्रस्तुत किया। देवाधिदेव महादेव की नगरी काशी में जब भक्तों ने अपने आराध्य काशी विश्वनाथ मंदिर में बाबा विश्वनाथ और माता गौरा को हल्दी-गुलाल अर्पित किया, तो मानो भक्ति स्वयं रंग बनकर वातावरण में घुल गई। हर-हर महादेव के गगनभेदी उद्घोष, डमरू की अनुगूंज और शंखध्वनि के बीच काशी का कण-कण रंगोत्सव में सराबोर हो उठा। द्वापर के लीला पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण की जन्मभूमि वृंदावन की तरह काशी में भी रंगों का आध्यात्मिक उत्सव जीवंत हो उठा। मान्यता है कि रंगभरी एकादशी के दिन स्वयं बाबा विश्वनाथ अपने भक्तों को होली खेलने की अनुमति देते हैं और उसी क्षण से काशी में होली की औपचारिक शुरुआत होती है।

भक्ति और रंगों का अद्भुत समागम

गोधूलि बेला में मंदिर चौक से फूलों से सुसज्जित रजत पालकी में विराजमान बाबा विश्वनाथ और माता गौरा की चल प्रतिमाओं की भव्य शोभायात्रा निकली। 

परंपरागत वेशभूषा में सजे श्रद्धालुओं ने पालकी को कंधों पर उठाया तो पूरा धाम भक्ति से झूम उठा। उड़ते अबीर-गुलाल और पुष्पवर्षा के बीच श्रद्धालु अपने आराध्य के दर्शन कर भावविभोर होते रहे। 

डमरू के गगनभेदी नाद और शंख की मंगल ध्वनि ने वातावरण को शिवमय बना दिया। भक्तों ने बाबा को गुलाल अर्पित कर नेग के रूप में होली खेलने की अनुमति ली। इसी के साथ काशी में छह दिवसीय रंगोत्सव का आरंभ हो गया।

परंपरा के साथ उत्सव का आध्यात्मिक विस्तार

प्रातःकाल से ही मंदिर परिसर में शास्त्रोक्त विधि से पूजन-अर्चन प्रारंभ हो गया। बाबा और गौरा को चंदन, भस्म, पुष्प, मेवा-मिष्ठान और अबीर-गुलाल अर्पित किए गए। 

इसके बाद रजत पालकी मंदिर चौक पहुंची, जहां भक्तों ने दर्शन कर एक-दूसरे को रंग लगाकर उत्सव की खुशियां साझा कीं। 

मंदिर प्रशासन की ओर से बताया गया कि रंगभरी एकादशी का यह उत्सव काशी की प्राचीन परंपराओं का जीवंत प्रतीक है, जिसमें लोक और शास्त्र का सुंदर संगम दिखाई देता है। देश-विदेश से आए श्रद्धालुओं ने इस अलौकिक दृश्य को अपनी स्मृतियों में संजो लिया।

गलियों से घाटों तक होलियाना उमंग

शाम होते-होते पूरा काशी विश्वनाथ धाम रंगों, संगीत और भक्ति की सरिता में बहता दिखाई दिया। 

शिवार्चनम मंच पर आयोजित सांस्कृतिक संध्या में भक्ति भजनों की प्रस्तुति ने वातावरण को और अधिक आध्यात्मिक बना दिया। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलित कर किया गया। 

कलाकारों की प्रस्तुतियों पर श्रद्धालु झूमते रहे और भक्ति-रस देर रात तक प्रवाहित होता रहा। अब काशी में आने वाले पांच दिनों तक घाटों से लेकर गलियों तक रंग, उमंग और उत्साह की होलियाना बहार छाई रहेगी।

लोक परंपरा में जीवंत काशी की पहचान 

रंगभरी एकादशी केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि काशी की जीवंत लोक परंपरा का उत्सव है।

यहां होली केवल रंगों का पर्व नहीं, बल्कि शिव और शक्ति के मिलन, भक्त और भगवान के स्नेह तथा लोक और अध्यात्म के अद्भुत समन्वय का प्रतीक बनकर सामने आती है। 

बाबा विश्वनाथ की नगरी में उड़ते गुलाल के साथ मानो यह संदेश भी गूंजता रहा, भक्ति ही वह रंग है जो जीवन को सबसे अधिक उज्ज्वल बनाता है। 

शिव-पार्वती के दांपत्य प्रेम का उत्सव

रंगभरी एकादशी का उल्लेख कई धार्मिक ग्रंथों और पुराणों में मिलता है। धार्मिक मान्यतानुसार, रंगभरी एकादशी का मूल भाव भगवान भगवान शिव और उनकी अर्धांगिनी माता पार्वती के दांपत्य प्रसंग से जुड़ा हुआ है। लोक मान्यताओं के अनुसार महाशिवरात्रि के दिन विवाह के पश्चात रंगभरी एकादशी को माता पार्वती का गौना होता है और इसी दिन शिव उन्हें पहली बार काशी लेकर आते हैं। यह प्रसंग केवल धार्मिक कथा नहीं बल्कि भारतीय पारिवारिक परंपराओं का सांस्कृतिक प्रतिबिंब भी है। बेटी के गौना की भावनाएं, मायके से विदाई का स्नेह और वैवाहिक जीवन का मंगल आरंभ, इन सबका प्रतीक यह उत्सव बन जाता है। काशी में इस दिन बाबा विश्वनाथ को दूल्हे के रूप में सजाया जाता है। माता गौरा को नववधू के रूप में श्रृंगारित कर पालकी यात्रा निकाली जाती है। श्रद्धालु इस दिव्य युगल का स्वागत गुलाल और फूलों से करते हैं। यही वह अवसर होता है जब काशी में भगवान शिव भक्तों के साथ रंग और गुलाल से होली खेलते हैं। धार्मिक दृष्टि से यह पर्व दांपत्य जीवन की मधुरता, प्रेम और सामाजिक समरसता का प्रतीक माना जाता है। यह पर्व भगवान विष्णु की उपासना से भी जुड़ा हुआ है क्योंकि इसे आमलकी एकादशी भी कहा जाता है। इस दिन आंवले के वृक्ष की पूजा का विशेष विधान है। धार्मिक ग्रंथों में आंवले को देवताओं का निवास स्थान बताया गया है।

जलवायु परिवर्तन की मार अब महिलाओं के स्वास्थ्य पर, वाराणसी में होगा राष्ट्रीय मंथन

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