धनतेरस : धन्वंतरि
से
कुबेर
तक
: जहां
समृद्धि,
आरोग्य,
अर्थ
और
आयु
का
एक
साथ
होता
है
अभिनंदन
सोने की चमक से कहीं बड़ी है स्वस्थ जीवन की पूंजी...
भारतीय
संस्कृति
में
कुछ
पर्व
ऐसे
हैं,
जिनकी
चमक
केवल
दीपों,
आभूषणों
और
बाजारों
तक
सीमित
नहीं
रहती,
बल्कि
वे
जीवन
को
देखने
का
नजरिया
भी
बदलते
हैं।
धनतेरस
ऐसा
ही
एक
पर्व
है।
कार्तिक
कृष्ण
पक्ष
की
त्रयोदशी
को
मनाया
जाने
वाला
यह
उत्सव
सामान्य
अर्थों
में
धन
की
प्राप्ति
और
खरीदारी
का
शुभ
अवसर
माना
जाता
है,
लेकिन
इसकी
सांस्कृतिक
और
आध्यात्मिक
गहराई
इससे
कहीं
अधिक
व्यापक
है।
यह
पर्व
याद
दिलाता
है
कि
धन
केवल
तिजोरी
में
रखी
संपत्ति
का
नाम
नहीं,
स्वस्थ
शरीर,
संतुष्ट
मन,
परिश्रम
से
अर्जित
सम्मान
और
परिवार
की
खुशहाली
भी
जीवन
की
अनमोल
पूंजी
हैं।
धनतेरस
आते
ही
बाजारों
का
रंग
बदलने
लगता
है।
सोने-चांदी
की
दुकानों
पर
चमक
बढ़
जाती
है।
बर्तन
बाजार
में
पीतल,
तांबे,
कांसे
और
स्टील
के
नए
बर्तनों
की
कतारें
सजती
हैं।
इलेक्ट्रॉनिक
बाजार
में
नए
उपकरणों
की
मांग
बढ़ती
है
तो
वाहन
शोरूम
में
भी
ग्राहकों
की
आवाजाही
तेज
हो
जाती
है।
दुकानों
की
रोशनी,
ग्राहकों
की
चहल-पहल
और
खरीदारी
की
उमंग
से
लगता
है
मानो
पूरा
शहर
समृद्धि
का
स्वागत
करने
सड़कों
पर
उतर
आया
हो।
लेकिन
इस
उत्सव
का
वास्तविक
अर्थ
केवल
कुछ
नया
खरीद
लेने
में
नहीं,
बल्कि
जीवन
में
कुछ
अच्छा
और
स्थायी
जोड़ने
में
छिपा
है।
मतलब साफ है समुद्र मंथन से
निकले
अमृत
कलश
की
स्मृति
में
मनाया
जाने
वाला
पर्व
बाजार
की
रौनक
से
आगे
बढ़कर
जीवन
में
संतुलन,
सद्भाव,
स्वास्थ्य, संपन्नता, संयम,
सदाचार
का
संतुलन
साधने
और
खुशहाली
का
संदेश
देता
है
सुरेश गांधी
भारत में पर्व केवल तिथियों का उत्सव नहीं होते, वे सभ्यता की स्मृतियां, जीवन के संस्कार और दर्शन की जीवंत अभिव्यक्तियां हैं। हर पर्व के भीतर कोई न कोई ऐसा संदेश छिपा होता है, जो तत्कालीन समाज से संवाद करते हुए आने वाली पीढ़ियों को भी जीवन की दिशा दिखाता है। दीपावली महोत्सव का पहला सोपान धनतेरस भी ऐसा ही एक पर्व है। बाहर से देखने पर यह सोने-चांदी, बर्तनों, आभूषणों और नई वस्तुओं की खरीदारी का अवसर दिखाई देता है, लेकिन इसकी सांस्कृतिक चेतना में उतरें तो यह केवल धन अर्जित करने का नहीं, बल्कि धन को सार्थक बनाने का संस्कार है। यह आरोग्य, अर्थ, आयु, आस्था और आत्मानुशासन का ऐसा उत्सव है, जहां अमृत कलश की स्मृति से लेकर लक्ष्मी-कुबेर की आराधना तक जीवन की समग्र समृद्धि का विधान दिखाई देता है। कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को मनाया जाने वाला धनतेरस धनत्रयोदशी और धन्वंतरि जयंती के नाम से भी जाना जाता है। इस वर्ष 6 नवंबर, शुक्रवार को यह पर्व मनाया जाएगा। भारतीय परंपरा में इस दिन भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और भगवान कुबेर की आराधना का विशेष महत्व है। एक ओर धन्वंतरि निरोगी जीवन के प्रतीक हैं, दूसरी ओर लक्ष्मी समृद्धि और सौभाग्य की अधिष्ठात्री हैं तो कुबेर धन के संरक्षण और सुव्यवस्थित उपयोग के प्रतीक माने जाते हैं। तीनों की संयुक्त आराधना अपने आप में एक संपूर्ण आर्थिक और आध्यात्मिक दर्शन है। मानो भारतीय संस्कृति कह रही हो कि धन कमाने से पहले स्वस्थ रहना, धन अर्जित करने के बाद उसका सदुपयोग करना और समृद्धि के साथ सदाचार बनाए रखना ही जीवन की वास्तविक उपलब्धि है।
समुद्र मंथन से निकला अमृत, मानवता को मिला आरोग्य का संदेश
पौराणिक आख्यानों के अनुसार देवताओं
और असुरों के बीच हुए
समुद्र मंथन से चौदह
रत्न प्रकट हुए। इन्हीं में
एक थे भगवान धन्वंतरि,
जो हाथों में अमृत कलश
धारण किए समुद्र से
प्रकट हुए। उन्हें भगवान
विष्णु का अंशावतार, आयुर्वेद
का प्रवर्तक और देवताओं का
वैद्य माना जाता है।
उनके हाथों में सुशोभित अमृत
कलश केवल अमरत्व की
कामना का प्रतीक नहीं,
बल्कि रोग, शोक और
पीड़ा से मुक्ति की
मानवीय आकांक्षा का भी प्रतीक
है। धन्वंतरि की कथा का
सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है
कि भारतीय संस्कृति ने दीपावली जैसे
वैभव और उत्सव के
महापर्व का आरंभ धन
के देवता से नहीं, बल्कि
आरोग्य के देवता के
स्मरण से किया। इसके
पीछे गहरा जीवन-दर्शन
है। मनुष्य के पास अपार
संपत्ति हो, लेकिन शरीर
रोगग्रस्त हो तो उस
संपत्ति का सुख अधूरा
रह जाता है। निरोगी
शरीर, प्रसन्न मन और संतुलित
जीवन ही वह आधार
हैं, जिन पर वास्तविक
समृद्धि की इमारत खड़ी
होती है। आयुर्वेद की
परंपरा भी स्वास्थ्य को
केवल रोग के अभाव
के रूप में नहीं
देखती, बल्कि शरीर, इंद्रियों, मन और आत्मा
के संतुलन को स्वस्थ जीवन
का आधार मानती है।
चरक संहिता में स्वास्थ्य और
जीवन की समग्रता का
यही भाव मिलता है।
आज जब जीवनशैली संबंधी
बीमारियां, मानसिक तनाव, अनियमित खानपान और प्रदूषण मानव
स्वास्थ्य के सामने नई
चुनौतियां खड़ी कर रहे
हैं, तब धन्वंतरि की
आराधना हमें अपने जीवन
की प्राथमिकताएं पुनर्निर्धारित करने का अवसर
देती है।
काशी का धन्वंतरि कूप : जहां आस्था में बसती है आरोग्य की कामना
धर्म और अध्यात्म
की प्राचीन नगरी काशी में
धनतेरस का संबंध केवल
बाजार और पूजन तक
सीमित नहीं है। यहां
भगवान धन्वंतरि की स्मृति और
आरोग्य की कामना से
जुड़ी लोकपरंपराएं भी जीवित हैं।
महामृत्युंजय महादेव मंदिर परिसर स्थित धन्वंतरि कूप इसका महत्वपूर्ण
उदाहरण है। इस कूप
को लेकर स्थानीय लोकविश्वास
और पौराणिक मान्यताएं प्रचलित हैं। श्रद्धालु इसे
आरोग्य और आध्यात्मिक आस्था
से जोड़कर देखते हैं। धनतेरस पर
यहां जल अर्पित करने
और भगवान धन्वंतरि का स्मरण करने
की परंपरा श्रद्धा का विषय है।
मान्यता चाहे जैसी हो,
इस परंपरा के भीतर छिपी
मूल भावना जीवन की रक्षा
और निरोगी रहने की प्रार्थना
है। काशी की विशेषता
यही है कि यहां
धर्म केवल ग्रंथों में
नहीं रहता, वह गलियों, मंदिरों,
कुओं, घाटों और लोकाचार में
सांस लेता है। धन्वंतरि
कूप इसी सांस्कृतिक निरंतरता
की एक स्मृति है।
यहां की आस्था हमें
याद दिलाती है कि स्वास्थ्य
के प्रति जागरूकता भी धार्मिक जीवन
का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकती है।
लक्ष्मी और कुबेर : धन का अर्जन ही नहीं, संरक्षण भी जरूरी
धनतेरस की संध्या को
माता लक्ष्मी और भगवान कुबेर
की पूजा का विधान
है। भारतीय धार्मिक परंपरा में लक्ष्मी को
धन, वैभव, ऐश्वर्य, सौभाग्य और संपन्नता की
अधिष्ठात्री माना गया है।
वहीं कुबेर को धन का
रक्षक और देवताओं का
कोषाध्यक्ष कहा गया है।
इन दोनों की संयुक्त आराधना
के पीछे एक सुंदर
संदेश छिपा है। लक्ष्मी
धन के आगमन और
प्रवाह की प्रतीक हैं,
जबकि कुबेर उसके संरक्षण और
व्यवस्था के। जीवन में
धन आना जितना महत्वपूर्ण
है, उसका सही प्रबंधन
भी उतना ही आवश्यक
है। अनियंत्रित खर्च, दिखावे की प्रवृत्ति और
अनैतिक तरीके से अर्जित संपत्ति
अंततः अशांति का कारण बन
सकती है। श्रीसूक्त में
लक्ष्मी के स्वरूप का
वर्णन केवल स्वर्ण और
आभूषणों तक सीमित नहीं
है। वहां लक्ष्मी अन्न,
समृद्धि, कीर्ति, सौभाग्य और जीवन को
पुष्ट करने वाली ऊर्जा
के रूप में प्रतिष्ठित
हैं। इसलिए लक्ष्मी पूजन का वास्तविक
आशय केवल तिजोरी भरना
नहीं, बल्कि घर में अन्न,
सम्मान, संतोष और सद्भाव की
निरंतरता बनाए रखना भी
है। कुबेर की आराधना यह
भी सिखाती है कि धन
का संचय विवेक से
हो और उसका उपयोग
धर्म तथा लोककल्याण की
भावना के साथ किया
जाए।
खरीदारी की परंपरा : धातुओं की चमक से आगे बढ़ता बाजार
धनतेरस आते ही बाजारों
का स्वरूप बदलने लगता है। स्वर्णकारों
की दुकानों पर सोने-चांदी
के आभूषण सजते हैं। बर्तन
बाजार में पीतल, तांबे,
कांसे और स्टील की
चमक दिखाई देती है। इलेक्ट्रॉनिक्स
बाजार में नए उपकरणों
की मांग बढ़ती है
तो वाहन शोरूम भी
ग्राहकों से गुलजार होने
लगते हैं। पारंपरिक रूप
से इस दिन सोना,
चांदी और अन्य धातुओं
की वस्तुएं खरीदना शुभ माना जाता
है। बर्तन खरीदने की परंपरा को
समुद्र मंथन से निकले
अमृत कलश की स्मृति
से जोड़ा जाता है। कलश
भारतीय संस्कृति में पूर्णता, मंगल
और जीवन के पोषण
का प्रतीक है। समय के
साथ खरीदारी की वस्तुएं बदली
हैं। पहले घरों में
पीतल के लोटे, तांबे
के पात्र, कांसे की थालियां और
पूजा के बर्तन खरीदे
जाते थे। अब सोने-चांदी के सिक्कों के
साथ वाहन, मोबाइल, फ्रिज, टीवी और घरेलू
उपयोग के आधुनिक उपकरण
भी इस परंपरा का
हिस्सा बन चुके हैं।
इस परिवर्तन को केवल बाजारवाद
कहकर खारिज नहीं किया जा
सकता। यह भारतीय समाज
की बदलती आर्थिक क्षमता और उपभोग की
नई जरूरतों का भी प्रतिबिंब
है। हालांकि पर्व की मूल
भावना यह नहीं कि
हर व्यक्ति महंगी वस्तु खरीदे। सामर्थ्य के अनुसार छोटा-सा दीपक, धातु
का पात्र अथवा घर की
जरूरत की वस्तु खरीदना
भी उतना ही शुभ
माना जा सकता है।
आरोग्य और विज्ञान : परंपरा को विवेक से समझने का समय
धनतेरस पर धातुओं की
खरीदारी को लेकर अनेक
धार्मिक और पारंपरिक मान्यताएं
हैं। तांबे, पीतल और कांसे
के बर्तनों का भारतीय घरेलू
जीवन में ऐतिहासिक महत्व
रहा है। इनका उपयोग
खानपान और पूजा-पद्धति
दोनों में होता आया
है। हालांकि किसी विशेष धातु
का बर्तन खरीदने मात्र से रोग प्रतिरोधक
क्षमता बढ़ने अथवा रोग दूर
होने का दावा वैज्ञानिक
रूप से उचित नहीं
होगा। वास्तविक स्वास्थ्य का आधार स्वच्छता,
संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद और समय
पर चिकित्सा है। धनतेरस का
आरोग्य संदेश तभी सार्थक होगा,
जब हम परंपरा के
साथ स्वास्थ्य संबंधी वैज्ञानिक समझ को भी
अपनाएं। इस दिन औषधियों,
आयुर्वेदिक ग्रंथों और चिकित्सा उपकरणों
का पूजन करने की
परंपरा भी कई स्थानों
पर दिखाई देती है। चिकित्सकों
और स्वास्थ्यकर्मियों के प्रति सम्मान
व्यक्त करना तथा किसी
जरूरतमंद रोगी की सहायता
करना धन्वंतरि की आराधना को
सामाजिक अर्थ प्रदान कर
सकता है।
यमदीप : मृत्यु की स्मृति में जीवन की मंगलकामना
धनतेरस की संध्या का
एक अत्यंत महत्वपूर्ण अनुष्ठान यमदीपदान है। धार्मिक मान्यता
के अनुसार घर के बाहर
दक्षिण दिशा में दीप
जलाकर यमराज से परिवार की
दीर्घायु और अकाल मृत्यु
से रक्षा की प्रार्थना की
जाती है। इस परंपरा
के पीछे प्रचलित कथा
राजा हेम के पुत्र
से जुड़ी है। मान्यता है
कि ज्योतिषीय भविष्यवाणी के अनुसार विवाह
के चौथे दिन राजकुमार
की मृत्यु निश्चित थी। उसकी पत्नी
ने उस रात घर
के द्वार पर सोने-चांदी
के आभूषणों और दीपों का
ढेर लगा दिया तथा
पति को जागृत रखने
के लिए गीत और
कथाएं सुनाती रही। दीपों के
प्रकाश और आभूषणों की
चमक से यमराज राजकुमार
तक नहीं पहुंच सके।
इस प्रकार उसकी रक्षा हुई।
लोकमान्यता में इसी प्रसंग
से यमदीपदान की परंपरा जुड़ी
मानी जाती है। इस कथा
का प्रतीकात्मक अर्थ और भी
व्यापक है। जीवन अनिश्चित
है, इसलिए प्रत्येक क्षण को मूल्यवान
समझना चाहिए। यमदीप केवल मृत्यु से
रक्षा की प्रार्थना नहीं,
बल्कि अपनों के प्रति प्रेम,
जिम्मेदारी और जीवन के
सम्मान का प्रतीक है।
काशी में दीपदान की
परंपरा का अपना अलग
आकर्षण है। गंगा के
घाटों पर दीपों की
पंक्तियां, मंदिरों की घंटियां और
आरती की ध्वनि मिलकर
ऐसा दृश्य रचती हैं, जिसमें
आस्था और प्रकृति का
अद्भुत संवाद दिखाई देता है।
धनतेरस और अर्थव्यवस्था : एक दीप से हजारों घरों का चूल्हा
धनतेरस का एक महत्वपूर्ण
पक्ष इसकी आर्थिक गतिविधियां
भी हैं। त्योहारों पर
होने वाली खरीदारी केवल
दुकानदार की बिक्री नहीं
बढ़ाती, बल्कि इससे जुड़े अनेक
छोटे-बड़े कारोबारों को
भी गति मिलती है।
स्वर्णकार, कुम्हार, बर्तन निर्माता, मूर्तिकार, हस्तशिल्पी, फूल विक्रेता, पैकेजिंग
कर्मी, परिवहनकर्मी और फुटकर व्यापारी
तक इस उत्सव की
आर्थिक श्रृंखला से जुड़े होते
हैं। एक परिवार की
खरीदारी दूसरे परिवार के रोजगार का
आधार बनती है। इसलिए
धनतेरस पर स्थानीय उत्पादों
और पारंपरिक कारीगरों को प्राथमिकता देना
केवल खरीदारी का विकल्प नहीं,
बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने
का माध्यम भी है। मिट्टी
के दीपक खरीदने से
कुम्हार के घर में
रोशनी पहुंचती है। हस्तनिर्मित धातु
के पात्र खरीदने से पारंपरिक हुनर
को संरक्षण मिलता है। आज जब
आत्मनिर्भरता और स्थानीय उत्पादन
की चर्चा हो रही है,
तब धनतेरस जैसे पर्व स्थानीय
बाजार और स्वदेशी कारीगरी
को प्रोत्साहन देने का स्वाभाविक
अवसर बन सकते हैं।
काशी : जब गलियां बन जाती हैं दीपों की दास्तां
काशी में धनतेरस
का दृश्य केवल खरीदारी की
चहल-पहल नहीं, बल्कि
एक जीवंत सांस्कृतिक उत्सव होता है। चौक,
ठठेरी बाजार, विश्वेश्वरगंज, गोदौलिया, लहुराबीर और विश्वनाथ गली
जैसे क्षेत्रों में सजती दुकानें
शहर की पारंपरिक व्यापारिक
पहचान को जीवंत कर
देती हैं। कहीं चांदी
के सिक्कों की चमक है
तो कहीं पीतल और
तांबे के पात्रों की
कतारें। मिट्टी के दीपों से
सजे बाजारों में कुम्हारों की
मेहनत दिखाई देती है। घरों
के द्वार पर रंगोली, बंदनवार
और दीपों की सजावट उत्सव
की आहट देती है।
काशी में पर्वों की
विशेषता यह है कि
यहां धार्मिक आस्था और सामाजिक जीवन
एक-दूसरे से अलग नहीं
हैं। मंदिरों की घंटियां, शंखध्वनि,
गंगा के घाटों की
आध्यात्मिकता और बाजारों की
रौनक मिलकर ऐसा वातावरण बनाते
हैं, जिसमें परंपरा केवल स्मृति नहीं
रहती, बल्कि वर्तमान का हिस्सा बन
जाती है। दीपावली के
पहले ही धनतेरस की
शाम शहर को एक
अलग आभा प्रदान करती
है। गंगा की लहरों
पर झिलमिलाते दीप और मंदिरों
से उठती आरती की
ध्वनि मानो एक ही
संदेश देती है—प्रकाश
बाहर भी चाहिए और
भीतर भी।
चार पुरुषार्थों में अर्थ का संतुलन
भारतीय दर्शन में धर्म, अर्थ,
काम और मोक्ष को
जीवन के चार पुरुषार्थ
माना गया है। इनमें
अर्थ का महत्वपूर्ण स्थान
है। जीवन की आवश्यकताओं
की पूर्ति, परिवार का पालन-पोषण
और सामाजिक दायित्वों के निर्वहन के
लिए धन जरूरी है।
लेकिन भारतीय चिंतन धन को धर्म
से अलग करके नहीं
देखता। धनतेरस इसी संतुलन का
स्मरण कराता है। धन कमाना
गलत नहीं, लेकिन उसका अर्जन न्यायपूर्ण
और उपयोग कल्याणकारी होना चाहिए। संपत्ति
का मूल्य उसके आकार से
नहीं, उसके सदुपयोग से
तय होता है। जिस
धन से परिवार का
भविष्य सुरक्षित हो, किसी जरूरतमंद
की सहायता हो, बच्चों को
शिक्षा मिले और समाज
में रोजगार पैदा हो, वही
धन सार्थक है। इसके विपरीत
केवल प्रदर्शन और प्रतिस्पर्धा के
लिए किया गया खर्च
समृद्धि का वास्तविक अर्थ
नहीं समझा सकता। आज
के उपभोक्तावादी दौर में यह
संदेश और प्रासंगिक हो
गया है। त्योहार के
नाम पर अनावश्यक कर्ज
लेना, अपनी आर्थिक क्षमता
से बाहर जाकर खरीदारी
करना या केवल सामाजिक
प्रतिष्ठा के लिए महंगी
वस्तुएं खरीदना पर्व की मूल
भावना नहीं है। सादगी
और सामर्थ्य का सम्मान भी
भारतीय परंपरा का हिस्सा है।
भीतर का दीप : धन से धन्य होने की यात्रा
धनतेरस का अंतिम संदेश
किसी वस्तु की खरीदारी या
पूजा के अनुष्ठान में
समाप्त नहीं होता। यह
मनुष्य को अपने भीतर
झांकने का अवसर देता
है। क्या हमारे घर
में धन है, लेकिन
संतोष नहीं? क्या हमारे पास
संपत्ति है, लेकिन स्वास्थ्य
नहीं? क्या हमारे पास
साधन हैं, लेकिन अपनों
के लिए समय नहीं?
क्या हमारे घर में दीप
जलते हैं, लेकिन किसी
जरूरतमंद के जीवन में
अंधकार बना हुआ है?
इन प्रश्नों के उत्तर में
ही धनतेरस का वास्तविक दर्शन
छिपा है। इस दिन
भगवान धन्वंतरि से आरोग्य, माता
लक्ष्मी से सद्बुद्धि और
समृद्धि तथा कुबेर से
धन के विवेकपूर्ण संरक्षण
की कामना की जानी चाहिए।
साथ ही यह संकल्प
भी होना चाहिए कि
कमाई ईमानदारी से होगी, खर्च
विवेक से होगा और
समृद्धि का कुछ हिस्सा
समाज के जरूरतमंद लोगों
तक भी पहुंचेगा। धनतेरस
का दीप तभी सार्थक
होगा, जब उसकी लौ
केवल घर की देहरी
तक सीमित न रहकर समाज
के अंधकार को भी दूर
करने का संकल्प बने।
सोने की चमक क्षणिक
हो सकती है, लेकिन
स्वस्थ जीवन, सद्भाव और सेवा की
रोशनी पीढ़ियों तक बनी रहती
है। काशी की आध्यात्मिक
परंपरा में इसे एक
वाक्य में समझा जा
सकता है—स्वयं प्रकाशित
हो और दूसरों के
जीवन में भी प्रकाश
का कारण बनो। यही
धनतेरस का मर्म है।
धन की आराधना से
धन्य जीवन की ओर
बढ़ने का यह पर्व
हमें सिखाता है कि सबसे
बड़ा खजाना निरोगी काया, सबसे बड़ा आभूषण
सदाचार और सबसे बड़ी
संपत्ति मन की शांति
है। जब इन तीनों
का वास हो, तभी
घर में लक्ष्मी का
वास्तविक आगमन होता है।
धनतेरस कब है?
दिन शुक्रवार. तारीख
6 नवंबर विक्रम संवत 2083, सिद्धार्थी शक संवत 1948, पराभव
पक्ष कार्तिक कृष्ण पक्ष (पूर्णिमांत)
तिथि
प्रारंभ 6 नवंबर, सुबह 10:30 बजे तिथि समाप्त
7 नवंबर, सुबह 10:47 बजे सूर्योदय सुबह
6:08 बजे सूर्यास्त शाम 5:14 बजे
शुभ मुहूर्त
वाराणसी के लिए उपलब्ध
द्रिक पंचांग की गणना: धनतेरस
पूजन : शाम 5:44 से 7:42 बजे तक। अवधि
: लगभग 1 घंटा 57 मिनट। प्रदोष काल : शाम 5:14 बजे के बाद।
वृषभ काल : शाम 5:44 से 7:42 बजे तक। यमदीपदान
: सूर्यास्त के बाद प्रदोषकाल
में।
ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति
6 नवंबर 2026 की वाराणसी गणना
के अनुसार: खगोलीय स्थिति. वार शुक्रवार (शुक्रवार
का स्वामी शुक्र) चंद्र राशि कन्या सूर्य
राशि तुला चंद्र नक्षत्र
हस्त नक्षत्र परिवर्तन 7 नवंबर सुबह लगभग 4:43 बजे
चित्रा
योग
विष्कंभ योग परिवर्तन 7 नवंबर
सुबह लगभग 4:09 बजे प्रीति करण
तैतिल के बाद गर
संवत 2083 ग्रहों की निरयन स्थिति
(लाहिड़ी अयनांश आधारित गणना): सूर्य : तुला चंद्रमा : कन्या
मंगल : कर्क बुध : तुला
(वक्री) गुरु : सिंह शुक्र : कन्या
(वक्री) शनि : मीन (वक्री) राहु
: कुंभ केतु : सिंह ज्योतिषीय संदर्भ:
शुक्रवार का संबंध शुक्र
ग्रह से माना जाता
है। पारंपरिक ज्योतिष में शुक्र को
वैभव, सौंदर्य, सुख-सुविधा और
भौतिक संपन्नता का कारक माना
गया है। चंद्रमा का
कन्या राशि में होना
तथा हस्त नक्षत्र की
उपस्थिति भी पंचांग की
विशिष्ट खगोलीय स्थिति है। हालांकि किसी
विशेष राशि के लिए
धनलाभ अथवा राजयोग का
दावा करने से पहले
प्रमाणित ज्योतिषाचार्य की गणना और
व्याख्या आवश्यक होगी।
धनतेरस के पांच आध्यात्मिक संदेश
धन्वंतरि : स्वास्थ्य ही जीवन की
पहली पूंजी। लक्ष्मी : समृद्धि के साथ सद्बुद्धि।
कुबेर : धन का संरक्षण
और विवेकपूर्ण उपयोग। यमदीप : जीवन और परिवार
की सुरक्षा की कामना। दीपदान
: अंधकार से प्रकाश की
ओर यात्रा।
धनतेरस पर क्या खरीदना शुभ माना जाता है?
सोना और चांदी
: समृद्धि का प्रतीक। तांबा
और पीतल : पारंपरिक धातु पात्र। नए
बर्तन : गृहस्थ जीवन में मंगलारंभ।
झाड़ू : स्वच्छता और दरिद्रता दूर
करने का लोकविश्वास। धनिया
और कौड़ियां : लक्ष्मी पूजन से जुड़ी
लोकपरंपराएं। दीपक : प्रकाश और शुभता का
प्रतीक। उपयोगी घरेलू वस्तुएं : परिवार की जरूरतों की
पूर्ति।
ये पांच संकल्प भी लें
स्वास्थ्य की नियमित जांच
कराएंगे। अनावश्यक खर्च और कर्ज
से बचेंगे। स्थानीय कारीगरों और छोटे कारोबारियों
को प्रोत्साहन देंगे। जरूरतमंदों की चिकित्सा और
शिक्षा में सहयोग करेंगे।
धन का अर्जन ईमानदारी
और उपयोग लोककल्याण के लिए करेंगे।
धन्वंतरि मंत्र
ॐ नमो भगवते
महासुदर्शनाय वासुदेवाय धन्वंतरये।
अमृतकलशहस्ताय सर्वभयविनाशाय सर्वरोगनिवारणाय त्रैलोक्यनाथाय श्रीमहाविष्णवे नमः।
काशी के चार प्रमुख धार्मिक संदर्भ
महामृत्युंजय मंदिर : धन्वंतरि कूप और आरोग्य
से जुड़ी लोकआस्था।
श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर : शिव आराधना और
आध्यात्मिक चेतना।
दशाश्वमेध घाट : गंगा आरती और
दीपदान की परंपरा।
पंचगंगा घाट : काशी की प्राचीन धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत।



