भाई की कलाई से पहले विश्वेश्वर की कलाई पर बंधी राखी, फिर बहनो भाई की कलाई पर बांधा प्यार
काशी ने
की
अखंड
सुख-समृद्धि
की कामना, मंगला
आरती
में
बाबा
विश्वनाथ
को
अर्पित
हुई
विशेष
राखी
सुरेश गांधी
वाराणसी। भाई-बहन के
अटूट प्रेम, विश्वास और रक्षा के
संकल्प का पर्व रक्षाबंधन
शुक्रवार को काशी में
अपनी अनूठी आध्यात्मिक छटा के साथ
उतरा। भोर की पहली
किरण से पहले ही
बाबा विश्वनाथ की नगरी भक्ति
के रंग में रंग
उठी। श्री काशी विश्वनाथ
मंदिर में मंगला आरती
के दौरान भगवान श्री विश्वेश्वर को
विशेष रूप से तैयार
की गई आस्था की
पावन राखी अर्पित की
गई। वैदिक मंत्रोच्चार, हर-हर महादेव
के जयघोष और भक्तिभाव के
बीच बाबा की कलाई
पर बंधी राखी ने
रक्षाबंधन के पारंपरिक अर्थ
को एक व्यापक आध्यात्मिक
भाव दे दिया।
यहां राखी महज
प्रेम का धागा नहीं
रही, बल्कि लोकमंगल, सुख-शांति और
समूचे समाज की रक्षा
की कामना का प्रतीक बन
गई। श्रद्धालुओं की आस्था थी
कि जिस विश्वेश्वर की
शरण में काशी सदियों
से अपने सुख-दुख
सौंपती आई है, उन्हीं
के चरणों में रक्षा का
यह पवित्र संकल्प अर्पित कर मानव मात्र
के कल्याण की प्रार्थना की
जाए। मंगला आरती के दिव्य
वातावरण में जब बाबा
विश्वनाथ का अभिषेक, श्रृंगार
और पूजन हुआ तो
मंदिर परिसर की आध्यात्मिक ऊर्जा
देखते ही बनती थी।
घंटियों की गूंज, डमरुओं
की थाप और मंत्रों
के बीच रक्षासूत्र के
रूप में अर्पित राखी
ने मानो भक्त और
भगवान के रिश्ते को
भी एक नए भाव
से जोड़ दिया।
काशी की परंपरा
में भगवान शिव केवल आराध्य
नहीं, बल्कि काशी के लोकजीवन
के संरक्षक और विश्व के
कल्याणकर्ता विश्वेश्वर हैं। इसलिए रक्षाबंधन
के दिन बाबा को
राखी अर्पित करने की परंपरा
प्रेम और संरक्षण की
उस सनातन भावना को सामने लाती
है, जिसमें व्यक्तिगत मंगल से आगे
बढ़कर परिवार, समाज और समूची
सृष्टि के कल्याण की
कामना समाहित है। रक्षाबंधन पर
बहनों ने जहां भाइयों
की कलाई पर स्नेह
और विश्वास का धागा बांधा,
वहीं काशी ने अपने
आराध्य विश्वेश्वर की कलाई पर
राखी बांधकर मानो यही प्रार्थना
की—बाबा, अपनी कृपा का
यह रक्षा-सूत्र पूरी काशी और
देश-दुनिया के हर प्राणी
पर बनाए रखें।
भोर में मंदिर के गर्भगृह से उठी यह आस्था दिन चढ़ने के साथ काशी की गलियों और घर-आंगनों तक फैलती गई। एक ओर बहनों की थालियों में सजे रोली-अक्षत और राखियां थीं तो दूसरी ओर विश्वनाथ धाम में भगवान शिव के प्रति समर्पित राखी। इस तरह रक्षाबंधन ने काशी में रिश्तों की डोर को भक्ति की डोर से जोड़ दिया। काशी का संदेश स्पष्ट था—रक्षा केवल कलाई पर बंधे धागे का संकल्प नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास, जिम्मेदारी और लोकमंगल की वह भावना है, जो मनुष्य को मनुष्य से और भक्त को भगवान से जोड़ती है।

