Thursday, 7 May 2026

महिलाओं की आवाज बनी जनसुनवाई, संवेदनशील प्रशासन का दिखा चेहरा

महिलाओं की आवाज बनी जनसुनवाई, संवेदनशील प्रशासन का दिखा चेहरा 

कारागार से चौपाल तक महिला सशक्तिकरण का संदेश, आयोग की सदस्या गीता विश्वकर्मा ने अधिकारियों को दिए सख्त निर्देश

कुल 35 प्रकरण में से पांच मामलों का मौके पर ही समाधान

महिला बंदियों के लिए कौशल विकास और पुनर्वास संबंधी प्रशिक्षण कार्यक्रम नियमित रूप से संचालित किए जाएं, ताकि जेल से बाहर आने के बाद वे आत्मनिर्भर जीवन की ओर बढ़ सकें : गीता विश्वकर्मा

 सुरेश गांधी

वाराणसी। समाज में महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान और आत्मनिर्भरता केवल सरकारी नारों तक सीमित रहे, बल्कि उसका लाभ अंतिम पंक्ति में खड़ी महिला तक पहुंचे, इसी उद्देश्य के साथ उत्तर प्रदेश राज्य महिला आयोग की सदस्या गीता विश्वकर्मा ने गुरुवार को वाराणसी में जनसुनवाई और निरीक्षण कार्यक्रम के माध्यम से प्रशासनिक संवेदनशीलता का एक मजबूत संदेश दिया। जिला कारागार चौकाघाट से लेकर सर्किट हाउस सभागार तक दिनभर चले कार्यक्रमों में महिलाओं से जुड़े मामलों की सुनवाई, पुनर्वास, कौशल विकास और सुरक्षा जैसे मुद्दे प्रमुखता से उठे। इस दौरान आयोग की सदस्या ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि महिलाओं से संबंधित मामलों में लापरवाही किसी भी स्तर पर स्वीकार नहीं की जाएगी और हर शिकायत का प्राथमिकता के आधार पर निस्तारण सुनिश्चित किया जाए।

महिला बंदियों के बीच पहुंची संवेदना

कार्यक्रम की शुरुआत जिला कारागार चौकाघाट के निरीक्षण से हुई। यहां महिला बैरक में निरुद्ध महिलाओं और उनके साथ रह रहे बच्चों से संवाद कर उनका कुशलक्षेम जाना गया। जेल के वातावरण में भी मानवीय संवेदना का स्पर्श दिखाई दिया, जब महिला बंदियों और बच्चों को मिष्ठान, फल और खिलौनों का वितरण किया गया। निरीक्षण के दौरान गीता विश्वकर्मा ने जेल प्रशासन को निर्देश दिया कि महिला बंदियों के लिए कौशल विकास और पुनर्वास संबंधी प्रशिक्षण कार्यक्रम नियमित रूप से संचालित किए जाएं, ताकि जेल से बाहर आने के बाद वे आत्मनिर्भर जीवन की ओर बढ़ सकें। उन्होंने कहा कि आर्थिक आत्मनिर्भरता ही महिलाओं को सामाजिक शोषण और असुरक्षा से बचाने का सबसे प्रभावी माध्यम है। उन्होंने बंदियों को यह भी प्रेरित किया कि यदि वे किसी प्रकार की आय अर्जित कर रही हैं तो उसे स्वयं सुरक्षित रखें और आत्मविश्वास के साथ अपने भविष्य को संवारें। यह संदेश केवल जेल परिसर तक सीमित नहीं था, बल्कि समाज में महिलाओं की बदलती भूमिका और आत्मनिर्भर भारत की परिकल्पना को भी प्रतिबिंबित करता दिखा।

जनसुनवाई में उमड़ी महिलाओं की पीड़ा

कारागार निरीक्षण के बाद सर्किट हाउस सभागार में आयोजित महिला जनसुनवाई में बड़ी संख्या में महिलाएं अपनी समस्याएं लेकर पहुंचीं। कुल 35 प्रकरण प्राप्त हुए, जिनमें से पांच मामलों का मौके पर ही समाधान कर दिया गया। बाकी मामलों को संबंधित विभागों को तत्काल कार्रवाई के निर्देश के साथ अग्रसारित किया गया। प्राप्त शिकायतों में भूमि विवाद, महिला उत्पीड़न, नौकरी दिलाने के नाम पर ठगी, मकानों पर अवैध कब्जा और उपचार संबंधी समस्याएं प्रमुख रहीं। जनसुनवाई के दौरान कई महिलाओं ने अपनी व्यक्तिगत पीड़ा साझा की। किसी की जमीन पर अवैध कब्जा था, तो कोई घरेलू हिंसा और प्रताड़ना से परेशान थी। कुछ महिलाएं रोजगार के नाम पर ठगी का शिकार हुई थीं। इन शिकायतों ने यह भी उजागर किया कि महिलाओं के सामने सामाजिक और आर्थिक दोनों प्रकार की चुनौतियां अब भी गंभीर रूप से मौजूद हैं।

सिर्फ सुनवाई नहीं, समाधान पर जोर

राज्य महिला आयोग की सदस्या ने अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए कि महिला संबंधित प्रकरणों में केवल औपचारिक कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि पीड़ितों को वास्तविक न्याय दिलाना प्रशासन की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि सरकारी योजनाएं तभी सार्थक मानी जाएंगी, जब उनका लाभ वास्तव में जरूरतमंद महिलाओं तक पहुंचे। इसके लिए गांव-गांव और मोहल्लों तक जागरूकता अभियान चलाने की आवश्यकता है। बैठक में उपस्थित विभिन्न विभागों के अधिकारियों से उन्होंने विभागीय योजनाओं की प्रगति और उनके प्रभाव की जानकारी भी ली। विशेष रूप से महिला कल्याण, समाज कल्याण, श्रम, पंचायत, स्वास्थ्य और दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभागों को समन्वय बनाकर कार्य करने पर जोर दिया गया।

कौशल विकास और आत्मनिर्भरता पर विशेष फोकस

कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश कौशल विकास मिशन और राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के अधिकारियों को निर्देशित किया गया कि महिलाओं के लिए संचालित प्रशिक्षण योजनाओं का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाए। घोषणा की गई कि 8 मई को कौशल विकास योजनाओं के प्रचार-प्रसार हेतु जागरूकता चौपाल आयोजित की जाएगी। इसका उद्देश्य महिलाओं को रोजगारपरक प्रशिक्षण और स्वरोजगार के अवसरों से जोड़ना है। दरअसल, वर्तमान समय में महिला सशक्तिकरण केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं है। आर्थिक स्वतंत्रता और कौशल विकास इसके सबसे मजबूत स्तंभ बन चुके हैं। सरकार और आयोग की कोशिश भी अब इसी दिशा में केंद्रित दिखाई दे रही है कि महिलाएं सहायता पाने वाली नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर नागरिक बनें।

साइबर अपराध से बचाव का भी दिया संदेश

कार्यक्रम के अंत में पुलिस विभाग द्वारा साइबर अपराध से बचाव संबंधी पुस्तिकाओं का वितरण किया गया। डिजिटल युग में महिलाओं के खिलाफ बढ़ते ऑनलाइन अपराधों को देखते हुए यह पहल महत्वपूर्ण मानी जा रही है। महिलाओं को सोशल मीडिया, ऑनलाइन बैंकिंग और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सतर्क रहने के उपाय बताए गए। इससे यह संदेश भी गया कि महिलाओं की सुरक्षा अब केवल भौतिक दुनिया तक सीमित नहीं, बल्कि साइबर स्पेस में भी उतनी ही आवश्यक है।

प्रशासनिक मौजूदगी ने बढ़ाया भरोसा

बैठक में प्रशासन और विभिन्न विभागों के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे। इनमें एसीएम प्रथम शिवानी सिंह, अपर पुलिस उपायुक्त महिला अपराध नम्रता श्रीवास्तव, जिला कार्यक्रम अधिकारी डी.के. सिंह, सहायक जिला विद्यालय निरीक्षक राजन सिंह, संरक्षण अधिकारी निरूपमा सिंह समेत विभिन्न विभागों के प्रतिनिधि शामिल रहे। अधिकारियों की मौजूदगी और आयोग की सक्रियता ने यह संदेश दिया कि महिलाओं की समस्याओं को लेकर शासन और प्रशासन अब अधिक संवेदनशील और जवाबदेह बनने की कोशिश कर रहा है।

महिला सशक्तिकरण का बदलता स्वरूप

वाराणसी में आयोजित यह जनसुनवाई केवल शिकायतों का मंच नहीं थी, बल्कि यह उस बदलती सामाजिक सोच का प्रतीक भी बनी, जहां महिलाओं को दया नहीं, अधिकार और अवसर देने की बात हो रही है। कारागार में बंद महिला से लेकर गांव की पीड़ित महिला तक, हर किसी को यह भरोसा दिलाने का प्रयास किया गया कि शासन उनके साथ खड़ा है। आज आवश्यकता केवल योजनाएं बनाने की नहीं, बल्कि उन्हें जमीन पर प्रभावी ढंग से लागू करने की है। यदि प्रशासनिक इच्छाशक्ति और सामाजिक जागरूकता इसी तरह साथ चलती रही, तो महिला सशक्तिकरण केवल सरकारी दस्तावेजों का विषय नहीं रहेगा, बल्कि समाज की वास्तविक तस्वीर बन सके.

गोली, गैंग और राजनीति! आखिर किसे चुप कराना चाहता है बंगाल का सियासी खेल?

गोली, गैंग और राजनीति! आखिर किसे चुप कराना चाहता है बंगाल का सियासी खेल

पश्चिम बंगाल एक बार फिर लोकतंत्र नहीं, बल्कि डर, गोलियों और राजनीतिक खून-खराबे की प्रयोगशाला बनता दिखाई दे रहा है। चुनाव खत्म हो चुके हैं, सत्ता तय हो चुकी है, लेकिन सड़कों पर अब भी बारूद की गंध तैर रही है। भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी के बेहद करीबी सहयोगी और निजी सहायक चंद्रनाथ रथ की निर्मम हत्या ने पूरे बंगाल की राजनीति को झकझोर दिया है। सवाल सिर्फ एक व्यक्ति की हत्या का नहीं, बल्कि उस राजनीतिक मानसिकता का है जहां विरोधियों को हराने के लिए अब बहस नहीं, बल्कि बंदूकें इस्तेमाल होती दिखाई दे रही हैं। भाजपा इसे सुनियोजित राजनीतिक हत्या बता रही है, जबकि तृणमूल कांग्रेस आरोपों को सियासी ड्रामा कह रही है। लेकिन सच यह भी है कि बंगाल लंबे समय से चुनावी हिंसा, बमबाजी और राजनीतिक प्रतिशोध की खबरों से दहलता रहा है। ऐसे में यह हत्या महज अपराध नहीं, बल्कि लोकतंत्र की छाती पर पड़ा वह ताजा घाव है जिसने फिर सवाल खड़ा कर दिया है, क्या बंगाल में सत्ता की लड़ाई अब संवैधानिक दायरे से निकलकर खूनी संघर्ष में बदल चुकी है? लोकतंत्र के उत्सव के बाद खून की सियासत क्यों

सुरेश गांधी

पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर खून, हिंसा और सियासी टकराव की आग में झुलसती दिखाई दे रही है। चुनावी नतीजों की धूल अभी पूरी तरह बैठी भी नहीं थी कि भाजपा के वरिष्ठ नेता और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी के करीबी सहयोगी और निजी सहायक चंद्रनाथ रथ की गोली मारकर हत्या ने पूरे राज्य को हिला दिया। यह सिर्फ एक हत्या नहीं, बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति पर बड़ा सवाल है जिसके लिए बंगाल लंबे समय से बदनाम रहा है। सवाल यह है कि क्या बंगाल में लोकतंत्र अब मतपत्र से नहीं बल्कि बंदूक और बम से तय होने लगा है? क्या चुनावी हार और राजनीतिक असुरक्षा ने हिंसा को फिर हवा दे दी है? या फिर इसके पीछे कोई और गहरी साजिश है? घटना ने बंगाल की राजनीति को फिर उसी पुराने मोड़ पर ला खड़ा किया है जहां राजनीतिक मतभेद अक्सर खून-खराबे में बदल जाते हैं।

बताया जा रहा है कि शुभेंदु अधिकारी के पीए चंद्रनाथ तंजी देर रात कार से लौट रहे थे। इसी दौरान बाइक सवार हमलावरों ने उनकी गाड़ी को घेर लिया और बेहद नजदीक से ताबड़तोड़ गोलियां बरसा दीं। हमला इतना सुनियोजित था कि हमलावर वारदात को अंजाम देकर आसानी से फरार हो गए। प्रारंभिक जांच में सामने आया कि हमलावर काफी देर से उनका पीछा कर रहे थे। फर्जी नंबर प्लेट, पेशेवर अंदाज और सीधी फायरिंग यह संकेत दे रही है कि हत्या अचानक नहीं बल्कि पूरी तैयारी के साथ की गई। राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है कि आखिर ऐसा कौन था जो शुभेंदु अधिकारी के सबसे भरोसेमंद सहयोगी को रास्ते से हटाना चाहता था? चंद्रनाथ रथ सिर्फ एक निजी सहायक नहीं थे। वे शुभेंदु अधिकारी के बेहद करीबी रणनीतिक सहयोगी माने जाते थे। पूर्व वायुसेना कर्मी होने के कारण उनमें अनुशासन और सुरक्षा समझ दोनों थी। भाजपा संगठन में उनकी गहरी पकड़ थी और वे कई महत्वपूर्ण राजनीतिक गतिविधियों का समन्वय संभालते थे। यही वजह है कि भाजपा इस हत्या को साधारण आपराधिक घटना मानने को तैयार नहीं है। पार्टी का कहना है कि यह सीधे-सीधेराजनीतिक टारगेट किलिंगहै।

घटना के बाद शुभेंदु अधिकारी बेहद आक्रामक दिखाई दिए। उन्होंने साफ कहा कि यह हत्या कई दिनों की रेकी के बाद की गई और इसके पीछे राजनीतिक ताकतों का हाथ है। भाजपा नेताओं ने सीधे तौर पर तृणमूल कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि बंगाल में विपक्ष के लोगों को चुन-चुनकर निशाना बनाया जा रहा है। भाजपा का आरोप है कि चुनावी नतीजों के बाद राज्य में फिरपोस्ट पोल वायलेंसशुरू हो गया है। पार्टी नेताओं का कहना है कि बंगाल में राजनीतिक विरोध अब लोकतांत्रिक तरीके से नहीं बल्कि हिंसा के जरिए दबाया जा रहा है। हत्या के कुछ घंटों बाद भाजपा कार्यकर्ताओं पर कथित बमबाजी और हमलों की खबरों ने इन आरोपों को और हवा दे दी। दूसरी ओर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस ने घटना की निंदा करते हुए खुद को आरोपों से अलग बताया है। टीएमसी नेताओं का कहना है कि भाजपा बिना जांच पूरी हुए राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश कर रही है। पार्टी ने यहां तक कहा कि मामले की सीबीआई जांच होनी चाहिए ताकि सच्चाई सामने सके। लेकिन बड़ा सवाल तो यही है, यदि राज्य की कानून व्यवस्था मजबूत है तो फिर विपक्षी नेताओं और कार्यकर्ताओं पर लगातार हमले क्यों हो रहे हैं? यही वह प्रश्न है जो ममता सरकार को कठघरे में खड़ा कर रहा है।

क्या बंगाल में हिंसा राजनीतिक संस्कृति बन चुकी है?

बंगाल में राजनीतिक हिंसा कोई नई बात नहीं है। वामपंथी दौर से लेकर तृणमूल शासन तक, सत्ता परिवर्तन के साथ हिंसा की घटनाएं हमेशा चर्चा में रही हैं। 2021 के विधानसभा चुनाव के बाद भी राज्य में व्यापक हिंसा हुई थी। भाजपा ने आरोप लगाया था कि उसके कार्यकर्ताओं की हत्या, घरों में आगजनी और महिलाओं के साथ अत्याचार हुए। मामला अदालत तक पहुंचा और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी गंभीर टिप्पणियां की थीं। अब एक बार फिर वही तस्वीर लौटती दिखाई दे रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बंगाल की राजनीति में वैचारिक संघर्ष अबअस्तित्व की लड़ाईमें बदल गया है। यहां चुनाव सिर्फ सत्ता का संघर्ष नहीं बल्कि राजनीतिक वर्चस्व की जंग बन चुका है।

हार का डर या सत्ता बचाने की बेचैनी?

इस पूरे घटनाक्रम के पीछे सबसे बड़ा राजनीतिक पहलू यही माना जा रहा है कि बंगाल में भाजपा लगातार अपनी जमीन मजबूत कर रही है। शुभेंदु अधिकारी ममता बनर्जी के सबसे बड़े राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी बनकर उभरे हैं। नंदीग्राम में ममता को हराने के बाद शुभेंदु सिर्फ विपक्ष के नेता नहीं रहे, बल्कि वे भाजपा केबंगाल मिशनका चेहरा बन गए। ऐसे में उनके करीबी सहयोगी की हत्या ने सियासी तापमान और बढ़ा दिया है। भाजपा इसे डर और राजनीतिक असुरक्षा का परिणाम बता रही है। पार्टी का कहना है कि जब लोकतांत्रिक मुकाबले में चुनौती बढ़ती है तो हिंसा का सहारा लिया जाता है। हालांकि टीएमसी इन आरोपों को पूरी तरह खारिज कर रही है। लेकिन क्या कहानी इतनी सीधी है? इस मामले का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। कई राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि बंगाल में हर बड़ी हिंसक घटना तुरंत राजनीतिक रंग ले लेती है। ऐसे में यह भी संभव है कि हत्या के पीछे कोई आपराधिक या व्यक्तिगत कारण हो, जिसे राजनीतिक रूप दिया जा रहा हो। जांच एजेंसियां फिलहाल हर एंगल से जांच कर रही हैं। पुलिस सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल लोकेशन और हमलावरों की गतिविधियों का विश्लेषण कर रही है। अभी तक किसी राजनीतिक संगठन का नाम आधिकारिक रूप से सामने नहीं आया है। यानी फिलहाल आरोप बहुत हैं, लेकिन अंतिम सच अभी जांच के दायरे में है।

लोकतंत्र का सबसे बड़ा संकट

इस घटना ने एक बार फिर देश के सामने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया हैकृ क्या भारत के कुछ हिस्सों में राजनीति अब लोकतांत्रिक विमर्श से आगे निकलकर हिंसक संघर्ष में बदलती जा रही है? जब राजनीतिक कार्यकर्ता और नेताओं के करीबी लोग खुलेआम मारे जाने लगें, जब चुनाव के बाद भी हिंसा जारी रहे, जब विरोधी विचारधारा दुश्मनी में बदल जाए, तब लोकतंत्र कमजोर होता है। बंगाल की जनता विकास, रोजगार और शांति चाहती है, लेकिन उसे बार-बार राजनीतिक संघर्ष की आग में झोंका जा रहा है।

सच्चाई सामने आनी ही चाहिए

चंद्रनाथ रथ की हत्या का सच चाहे जो हो, लेकिन यह घटना बेहद गंभीर है। यदि यह राजनीतिक हत्या है तो यह लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है। और यदि इसके पीछे कोई साजिश है, तो उसे भी बेनकाब होना चाहिए। राजनीतिक दलों के आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर अब जरूरत निष्पक्ष और तेज जांच की है। क्योंकि लोकतंत्र में विपक्ष दुश्मन नहीं होता, बल्कि सत्ता को संतुलित रखने वाली सबसे बड़ी ताकत होता है। बंगाल को अब राजनीति नहीं, शांति चाहिए। वरना चुनाव खत्म होंगे, लेकिन हिंसा कभी खत्म नहीं होगी।

महिलाओं की आवाज बनी जनसुनवाई, संवेदनशील प्रशासन का दिखा चेहरा

महिलाओं की आवाज बनी जनसुनवाई , संवेदनशील प्रशासन का दिखा चेहरा  कारागार से चौपाल तक महिला सशक्तिकरण का संदेश , आयोग की सद...