Saturday, 5 September 2026

गंगा-वरुणा के उफान में काशी, राहत को उतरे योगी

गंगा-वरुणा के उफान में काशी, राहत को उतरे योगी

हवाई सर्वेक्षण के बाद पीड़ितों के बीच पहुंचे योगी, बोलेसंकट में काशी अकेली नहीं, हर कदम पर सरकार आपके साथ, हर पीड़ित परिवार तक पहुंचेगी मदद, बेघर को मिलेगा आवास

सलारपुर के राहत शिविर में मुख्यमंत्री ने सुनी बाढ़ की पीड़ा, बच्चों से पढ़ाई पूछी, बुजुर्गों को दिया भरोसा

16 वार्डों के 567 परिवार प्रभावित, 1131 किसानों की फसल क्षतिग्रस्त; 48 नावें राहत कार्य में जुटीं

सुरेश गांधी

वाराणसी। बाढ़ का पानी भले ही काशी के निचले इलाकों में जिंदगी की रफ्तार रोकने पर आमादा हो, लेकिन शनिवार को सलारपुर के विद्याविहार इंटर कॉलेज में बने राहत शिविर में सरकार का भरोसा लोगों के बीच दिखाई दिया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पहले आसमान से बाढ़ का मंजर देखा और फिर जमीन पर उतरकर उन चेहरों के बीच पहुंचे, जिनके लिए इन दिनों घर की चौखट से ज्यादा राहत शिविर ही सहारा बना हुआ है। बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों से सीधे संवाद कर उन्होंने उनकी तकलीफें सुनीं और कहाआपदा की इस घड़ी में सरकार आपके साथ मजबूती से खड़ी है। 

मुख्यमंत्री ने बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का हवाई सर्वेक्षण कर स्थिति का जायजा लिया। इसके बाद सलारपुर पहुंचे और राहत शिविर में उपलब्ध व्यवस्थाओं को बारीकी से देखा। उन्होंने पीड़ित परिवारों को राहत सामग्री वितरित की। शिविर में बच्चों को दुलारते हुए उनकी पढ़ाई के बारे में पूछा तो माहौल में कुछ पल के लिए बाढ़ की चिंता के बीच अपनापन उतर आया। मुख्यमंत्री ने महिलाओं और बुजुर्गों से भी भोजन, स्वास्थ्य और दूसरी सुविधाओं की जानकारी ली।

वैसे भी बाढ़ के पानी में घिरे परिवारों के लिए सरकारी घोषणाएं तभी मायने रखती हैं, जब वे राहत की थैली, दवा, नाव और मुआवजे के रूप में घर की चौखट तक पहुंचें। सलारपुर के शिविर से मुख्यमंत्री ने यही भरोसा देने की कोशिश की कि आपदा सिर्फ पानी की मार नहीं, बल्कि प्रशासन की परीक्षा भी हैऔर इस परीक्षा में पीड़ित को अकेला नहीं छोड़ा जाएगा।

वरुणा के बैकफ्लो ने बढ़ाई मुश्किल

मुख्यमंत्री ने कहा कि वरुणा नदी में बैकफ्लो के कारण निचले इलाकों में जलजमाव की समस्या पैदा होती है। उन्होंने कहा कि पहले बारिश के मौसम में प्रदेश के 40 से 45 जिले प्रभावित होते थे, लेकिन पिछले साढ़े नौ वर्षों में आपदा प्रबंधन और सरकारी प्रयासों से अब स्थिति काफी नियंत्रित हुई है और करीब 14 जिले ही किसी किसी रूप में प्रभावित हैं। काशी के विकास का जिक्र करते हुए योगी ने कहा कि आज काशी नई काशी के रूप में नया कलेवर संजो रही है। काशी विश्वनाथ धाम, घाटों के विकास, रेलवे बस स्टेशन, एयरपोर्ट, सड़क चौड़ीकरण और रिंग रोड जैसी परियोजनाओं ने शहर को नई पहचान दी है।

26 तरह की राहत सामग्री, किसानों के लिए भी मुआवजा

राहत शिविरों में उपलब्ध व्यवस्थाओं का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रभावित परिवारों को दूध, फल, अनाज, बाल्टी, मग, बिस्किट, नमक, तौलिया, तेल समेत 26 प्रकार की राहत सामग्री उपलब्ध कराई जा रही है। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिया कि जिन किसानों की फसल बाढ़ में डूबी है, उन्हें नियमानुसार मुआवजा उपलब्ध कराया जाए। मुख्यमंत्री ने कहा कि मकान गिरने, आकाशीय बिजली और सर्पदंश जैसी घटनाओं को भी आपदा की श्रेणी में शामिल किया गया है। पात्र परिवारों को 24 घंटे के भीतर चार लाख रुपये की सहायता उपलब्ध कराने की व्यवस्था है। जिन लोगों के मकान पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए हैं और वे बेघर हुए हैं, उन्हें प्रधानमंत्री अथवा मुख्यमंत्री आवास योजना के तहत आवास दिलाने के निर्देश दिए गए हैं।

पानी उतरेगा तो बीमारी रोकने की चुनौती

मुख्यमंत्री ने राहत के साथ अगले चरण की चुनौती को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि पानी उतरने के बाद प्रभावित इलाकों में उचित छिड़काव कराया जाएगा, ताकि संक्रमण और बीमारियां फैलें। चिकित्सा सुविधा के लिए आयुष्मान कार्ड उपलब्ध कराने की भी व्यवस्था की गई है। उन्होंने बताया कि 16 वार्डों में 567 परिवार प्रभावित हैं और 48 नावें राहत एवं बचाव कार्य में लगाई गई हैं। 1131 किसानों की फसल क्षतिग्रस्त हुई है। मुख्यमंत्री ने प्रशासन को राहत कार्यों में किसी तरह की शिथिलता नहीं बरतने के निर्देश दिए।

प्रतिमा पर माल्यार्पण, शिविर में बच्चों को दुलार

सलारपुर पहुंचने पर मुख्यमंत्री ने स्वतंत्रता सेनानी जग्गू राम मौर्य की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया। इसके बाद राहत शिविर का स्थलीय निरीक्षण किया। शिविर में बच्चों के बीच पहुंचे तो उनसे पढ़ाई की जानकारी ली और स्नेहपूर्वक बातचीत की। कार्यक्रम में श्रम एवं सेवायोजन मंत्री अनिल राजभर ने मुख्यमंत्री का अभिनंदन करते हुए कहा कि प्राकृतिक आपदा के समय सरकार जनता के दरवाजे पर खड़ी रहती है। जलशक्ति मंत्री स्वतंत्र देव सिंह, स्टाम्प एवं न्यायालय शुल्क राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) रविन्द्र जायसवाल, आयुष राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. दयाशंकर मिश्रदयालु’, एमएसएमई राज्य मंत्री हंसराज विश्वकर्मा, जिला पंचायत अध्यक्ष पूनम मौर्य, महापौर अशोक तिवारी, पूर्व मंत्री एवं विधायक डॉ. नीलकंठ तिवारी, विधायक सौरभ श्रीवास्तव, डॉ. अवधेश सिंह, त्रिभुवन राम, भाजपा जिलाध्यक्ष रामशकल पटेल समेत मंडलायुक्त एस. राजलिंगम, पुलिस कमिश्नर मोहित अग्रवाल, जिलाधिकारी सत्येंद्र कुमार, नगर आयुक्त हिमांशु नागपाल और सीडीओ प्रखर कुमार सहित संबंधित विभागों के अधिकारी मौजूद रहे।

Friday, 4 September 2026

हरतालिका तीज : जब पार्वती के संकल्प से शिव को झुकना पड़ा

हरतालिका तीज : जब पार्वती के संकल्प से शिव को झुकना पड़ा 

14 सितंबर की सुबह जब तीज का सूरज उगेगा, घर-घर पूजा की थालियां सजेंगीं, मेहंदी की खुशबू उठेगी, मंदिरों में घंटियां बजेंगी और शिव-पार्वती के नाम का स्मरण होगा। तब यह पर्व एक बार फिर कहेगासच्चा प्रेम अधिकार नहीं मांगता, विश्वास मांगता है। सच्चा संबंध बंधन नहीं बनता, सहारा बनता है। और सच्चा संकल्प परिस्थितियों से नहीं डरता। हरतालिका तीज इसी अटूट विश्वास की पूजा है। यह सुहाग का उत्सव है, लेकिन उससे भी बढ़कर संकल्प का पर्व है। यह श्रृंगार की चमक है, लेकिन उससे भी गहरी आत्मशक्ति की रोशनी है। यह शिव-पार्वती के विवाह की कथा है, लेकिन उसके भीतर जीवनसाथी के प्रति सम्मान और साथ निभाने की सनातन सीख छिपी है। और शायद इसीलिए हजारों वर्षों बाद भी हरतालिका तीज की कथा पुरानी नहीं हुईक्योंकि प्रेम बदल सकता है, समय बदल सकता है, जीवन की परिस्थितियां बदल सकती हैं; लेकिन विश्वास, समर्पण और साथ की जरूरत कभी नहीं बदलती 

सुरेश गांधी

कभी-कभी कोई पर्व कैलेंडर की तारीख से कहीं बड़ा हो जाता है। वह पीढ़ियों की स्मृति, लोकजीवन की धड़कन और मनुष्य के भीतर बसे विश्वास का उत्सव बन जाता है। हरतालिका तीज ऐसा ही पर्व है। भाद्रपद शुक्ल तृतीया को मनाया जाने वाला यह व्रत भगवान शिव और माता पार्वती के उस मिलन की स्मृति है, जिसके पीछे प्रेम से अधिक संकल्प, प्रतीक्षा से अधिक तप और इच्छा से अधिक आत्मविश्वास की कथा है। यही कारण है कि सदियों से सुहागिन महिलाएं दांपत्य सुख, सौभाग्य और पति की दीर्घायु की कामना से तथा अविवाहित कन्याएं मनोनुकूल जीवनसाथी की कामना से इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करती रही हैं। इस बार हरतालिका तीज सोमवार, 14 सितंबर को पड़ेगी। सोमवार स्वयं शिव आराधना के लिए विशेष माना जाता है। इसके साथ शुक्ल तृतीया का संयोग इस पर्व के धार्मिक महत्व को और उभारता है। देश के पंचांगों में भी 14 सितंबर को हरतालिका तीज की तिथि एकमत रूप से दी गई है।

हरतालिका तीज के केंद्र में शिव और पार्वती हैं, लेकिन इसका संदेश हर दांपत्य और हर परिवार तक जाता है। विवाह केवल दो लोगों का सामाजिक बंधन नहीं; यह दो व्यक्तित्वों, दो परिवारों और दो जीवन-दृष्टियों के साथ आने की प्रक्रिया है। इसमें प्रेम जरूरी है, लेकिन प्रेम से अधिक जरूरी है सम्मान। साथ जरूरी है, लेकिन साथ से अधिक जरूरी है संवाद। और जीवन की कठिनाइयों में सबसे बड़ी शक्ति हैएक-दूसरे पर विश्वास। पार्वती का तप इसी विश्वास का प्रतीक है। तीज के दिन हाथों में रची मेहंदी केवल रंग नहीं होती। वह आने वाले सुखों की कामना है। चूड़ियों की खनक केवल श्रृंगार नहीं, उत्सव की ध्वनि है। सिंदूर केवल एक रेखा नहीं, दांपत्य की सामाजिक और भावनात्मक पहचान है। और शिव-पार्वती की प्रतिमा के सामने झुका सिर केवल पूजा नहींअपने रिश्तों को बेहतर बनाने का संकल्प भी है। इसीलिए हरतालिका तीज हर वर्ष आती है, लेकिन हर बार कोई नया अर्थ दे जाती है। हरतालिका तीज की सबसे बड़ी शक्ति उसके अनुष्ठान में नहीं, उसकी कथा में है। एक राजकुमारी ने अपनी इच्छा को पहचाना। उस इच्छा को संकल्प बनाया। संकल्प को तप में बदला। तप को साधना बनाया। और साधना के बाद शिव को पाया। यही इस पर्व की अमर गाथा है।

विशेष मुहूर्त

वाराणसी के स्थानीय पंचांग गणना के अनुसार 14 सितंबर को सूर्योदय लगभग 5:43 बजे होगा और उस समय शुक्ल तृतीया विद्यमान रहेगी। तृतीया लगभग सुबह 7:07-7:08 बजे तक रहेगी। इस आधार पर तीज के प्रातःकालीन पूजन का महत्वपूर्ण समय सूर्योदय के बाद तृतीया समाप्त होने तक का रहेगा। पंचांग गणना में चित्रा नक्षत्र लगभग दोपहर 1:54 बजे तक और उसके बाद स्वाती नक्षत्र रहेगा। ब्रह्म योग लगभग दोपहर 12:44 बजे तक रहेगा, फिर इन्द्र योग प्रारंभ होगा। करण में प्रातः तक गरज और उसके बाद वणिज का क्रम रहेगा। अलग-अलग नगरों में सूर्योदय और स्थानीय गणना बदलने के कारण पूजा के समय में कुछ मिनट का अंतर स्वाभाविक है। इसलिए व्रती महिलाएं अपने क्षेत्रीय पंचांग अथवा पारिवारिक पुरोहित की परंपरा को अंतिम मानें।

एक नजर में पंचांग

पर्व : हरतालिका तीज. तारीख : 14 सितंबर, सोमवार. तिथि : भाद्रपद शुक्ल तृतीया. तृतीया आरंभ : 13 सितंबर सुबह लगभग 7:08 बजे. तृतीया समाप्त : 14 सितंबर सुबह लगभग 7:07 बजे. नक्षत्र : चित्रा से स्वाती. योग : ब्रह्म से इन्द्र. करण : गरज से वणिज. सूर्योदय, वाराणसी : लगभग 5:43 बजे. राहुकाल : लगभग 7:16 से 8:48 बजे.

पार्वती की तपस्या, हरतालिका की जन्मकथा

हरतालिका की कथा भारतीय धार्मिक परंपरा में स्त्री-संकल्प की सबसे प्रभावशाली कथाओं में गिनी जाती है। पौराणिक आख्यान के अनुसार हिमालय की पुत्री पार्वती भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करना चाहती थीं। उनके पिता हिमवान के समक्ष जब उनके विवाह के लिए दूसरे प्रस्ताव की बात आई तो पार्वती का मन व्याकुल हो उठा। वह शिव को ही अपना आराध्य और भावी पति मान चुकी थीं। पार्वती की सखी उन्हें अपने साथ एकांत वन में ले गईं, ताकि उनका विवाह उनकी इच्छा के विरुद्ध हो। वन में पार्वती ने कठोर तपस्या की। उन्होंने मिट्टी अथवा बालू से शिवलिंग बनाया और शिव की आराधना में स्वयं को समर्पित कर दिया। उनकी साधना, निष्ठा और तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और पत्नी रूप में स्वीकार किया। इसीलिएहरतालिकानाम की व्याख्याहरअर्थात हरण या साथ ले जाना औरआलिकाअर्थात सखी के संदर्भ में की जाती है। कथा का भाव यह है कि सखी पार्वती को अपने साथ ले गईं ताकि वह अपनी इच्छा के अनुसार शिव की साधना कर सकें।

यह केवल पति की लंबी आयु का व्रत नहीं

हरतालिका तीज को अक्सर केवल पति की दीर्घायु के व्रत के रूप में देखा जाता है। यह इसकी व्यापक सांस्कृतिक व्याख्या का केवल एक हिस्सा है। पार्वती की कथा में सबसे महत्वपूर्ण बात उनका स्वतंत्र संकल्प है। उन्होंने अपने जीवनसाथी को लेकर अपनी इच्छा स्पष्ट की और उसे पाने के लिए कठिन साधना का मार्ग चुना। इस अर्थ में हरतालिका तीज भारतीय परंपरा में स्त्री की इच्छा, दृढ़ता और आत्मनिर्णय की एक प्राचीन कथा भी है। आज की महिला अपने जीवन के निर्णय स्वयं लेती है। वह परिवार और पेशे दोनों की जिम्मेदारी संभालती है। ऐसे समय में तीज की परंपरा उसके लिए केवल पति की लंबी उम्र की प्रार्थना नहीं, बल्कि अपने जीवन, संबंधों और परिवार में प्रेम, सम्मान और संतुलन की कामना भी बन गई है।

सोमवार और तृतीया : शिव आराधना का भावपूर्ण संगम

इस वर्ष तीज का सोमवार को पड़ना विशेष आकर्षण का केंद्र है। सोमवार को भगवान शिव का दिन माना जाता है। चंद्रमा से जुड़े इस वार का संबंध मन और भावनाओं से भी जोड़ा जाता है। शिव के मस्तक पर चंद्रमा विराजमान हैं, इसलिए शिवोपासना में सोमवार का विशेष स्थान रहा है। दूसरी ओर तृतीया देवी-उपासना और पार्वती से संबंधित इस पर्व की मूल तिथि है। इस प्रकार सोमवार का शिव-तत्व और तृतीया का पार्वती-तत्व एक ही दिन पर केंद्रित दिखाई देता है। धार्मिक दृष्टि से यही इस वर्ष के पर्व का सबसे सुंदर प्रतीकात्मक संयोग है।

चित्रा नक्षत्र : सौंदर्य और सृजन की छटा

14 सितंबर को दिन के आरंभिक और पूर्वाह्न भाग में चित्रा नक्षत्र रहेगा। भारतीय ज्योतिष परंपरा में चित्रा को सौंदर्य, शिल्प, रचना और आकर्षण से जोड़ा जाता है। हरतालिका तीज स्वयं सौंदर्य और श्रृंगार का पर्व है। मेहंदी, चूड़ियां, साड़ी, बिंदी और अलंकार इसके लोकजीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। इस दृष्टि से चित्रा नक्षत्र का होना पर्व की सांस्कृतिक छवि के साथ एक सुंदर प्रतीकात्मक साम्य बनाता है। दोपहर के बाद स्वाती नक्षत्र का प्रवेश होगा। स्वाती को स्वतंत्रता, गति और स्वावलंबन के प्रतीकों से जोड़ा जाता है। पार्वती के अपने संकल्प की कथा के संदर्भ में इसकी सांस्कृतिक व्याख्या और भी रोचक हो जाती है। यह ज्योतिषीय व्याख्या धार्मिक परंपरा का हिस्सा है; इसे किसी व्यक्ति के भविष्य की निश्चित भविष्यवाणी के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए।

ब्रह्म योग : साधना और सृजन का संकेत

पंचांग के अनुसार दिन के पूर्वार्ध में ब्रह्म योग रहेगा।ब्रह्मशब्द भारतीय दर्शन में सृष्टि, चेतना और परम सत्य की व्यापक अवधारणा से जुड़ा है। हरतालिका का मूल भी सृजनात्मक शक्तिशिव और शक्तिके मिलन में देखा जाता है। शिव को चेतना और पार्वती को शक्ति का प्रतीक मानें तो दोनों का मिलन जीवन की पूर्णता का प्रतीक बन जाता है। यही कारण है कि तीज की पूजा को केवल एक वैवाहिक अनुष्ठान मानकर शिव और शक्ति के संतुलन की आराधना के रूप में भी देखा जा सकता है।

मिट्टी के शिवलिंग में प्रकृति से जुड़ती आस्था

हरतालिका तीज की एक विशिष्ट परंपरा मिट्टी या बालू से शिवलिंग तथा शिव-पार्वती की प्रतिमा बनाकर पूजा करना है। इस परंपरा में एक गहरा सांस्कृतिक संदेश छिपा है। मिट्टी से आकार लेना और पूजा के बाद उसी तत्व में विलीन हो जाना जीवन की क्षणभंगुरता और प्रकृति के साथ मनुष्य के संबंध का स्मरण कराता है। यह पूजा हमें बताती है कि ईश्वर के लिए वैभव आवश्यक नहीं। एक मुट्ठी मिट्टी, कुछ फूल, बेलपत्र, दीप और मन का विश्वास भी आराधना को पूर्ण बना सकते हैं।

सोलह शृंगार : स्त्री-सौंदर्य से आगे की कहानी

तीज के दिन सोलह शृंगार की परंपरा पूरे देश में अलग-अलग रूपों में दिखाई देती है। हरे और लाल परिधानों से लेकर मेहंदी, चूड़ी, सिंदूर, बिंदी, पायल और आभूषण तकहर चीज का अपना सांस्कृतिक अर्थ है। हरा रंग वर्षा ऋतु की हरियाली, नवजीवन और प्रकृति की उर्वरता से जुड़ता है। मेहंदी उत्सव और सौभाग्य का लोकप्रतीक बनती है। सिंदूर दांपत्य का प्रतीक माना जाता है। लेकिन इन सबके पीछे एक और बात हैस्त्री का स्वयं को उत्सव के केंद्र में रखना। साल भर परिवार के लिए समर्पित रहने वाली महिला इस दिन स्वयं को सजाती है, सखियों के साथ समय बिताती है, गीत गाती है और अपनी भावनाओं को खुलकर व्यक्त करती है।

तीज के गीतों में बसता है मायका

हरतालिका तीज का सबसे कोमल पक्ष उसका लोक-संसार है। मां की याद, भाई की प्रतीक्षा, मायके से आया सिंधारा, सखियों की हंसी, सावन के झूले और शिव-पार्वती के गीतइन सबने तीज को पीढ़ियों से जीवित रखा है। लोकगीतों में कई बार स्त्री अपनी वह बात कह देती है, जिसे वह रोजमर्रा के जीवन में शब्द नहीं दे पाती। इसलिए तीज के गीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि लोक-साहित्य में स्त्री-अनुभव का दस्तावेज भी हैं।

सिंधारा : रिश्तों को फिर से सींचने की परंपरा

उत्तर भारत में तीज के अवसर पर मायके से बेटी के लिए सिंधारा भेजने की परंपरा है। कपड़े, श्रृंगार सामग्री, मेहंदी, मिठाई और उपहारों के साथ मायके का स्नेह बेटी तक पहुंचता है। विवाह के बाद बेटी चाहे कितनी भी दूर चली जाए, तीज उसे फिर उसी आंगन में ले आती है जहां उसने बचपन में सावन देखा था। इसलिए सिंधारा केवल उपहारों की पोटली नहींबेटी और मायके के बीच कभी टूटने वाले भावनात्मक रिश्ते की डोर है।

निर्जला व्रत : तपस्या का स्वरूप

परंपरागत रूप से हरतालिका तीज को निर्जला व्रत माना जाता है। अनेक महिलाएं अन्न और जल दोनों का त्याग कर पूरे दिन व्रत रखती हैं और रात्रि जागरण करती हैं। यह व्रत शारीरिक संयम के साथ मानसिक एकाग्रता और संकल्प का भी अभ्यास माना जाता है। हालांकि स्वास्थ्य की स्थिति हर व्यक्ति की अलग होती है। गर्भवती महिलाओं, वृद्धों, बीमार व्यक्तियों या चिकित्सकीय कारणों से निर्जला व्रत रख सकने वालों को अपनी सेहत को प्राथमिकता देनी चाहिए। आस्था का उद्देश्य शरीर को संकट में डालना नहीं, बल्कि श्रद्धा और संयम की भावना को जीवित रखना है।

रात्रि जागरण में शिव-पार्वती का स्मरण

तीज की रात कई परिवारों और सामुदायिक आयोजनों में जागरण की परंपरा है। शिव-पार्वती विवाह कथा, भजन, मंत्र और लोकगीतों के बीच रात गुजरती है। इस जागरण का अर्थ केवल रातभर जागते रहना नहीं, बल्कि भीतर की चेतना को जगाए रखना भी माना जा सकता है। जिस तरह पार्वती ने अपने संकल्प को रात-दिन की कठिनाइयों से ऊपर रखा, उसी तरह व्रती भी अपने मन को लक्ष्य और श्रद्धा से जोड़े रखने का प्रयास करती है।

पूजा में क्या-क्या अर्पित होगा

हरतालिका तीज के पूजन में क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार सामग्री में अंतर हो सकता है, लेकिन सामान्यतःशिव-पार्वती की प्रतिमा अथवा मिट्टी, बालू से निर्मित स्वरूप, बेलपत्र, पुष्प, अक्षत, रोली, चंदन, धूप, दीप, नैवेद्य, फल, वस्त्र और सुहाग सामग्री का प्रयोग किया जाता है। माता पार्वती को श्रृंगार सामग्री अर्पित करने की परंपरा विशेष रूप से प्रचलित है। पूजन के बाद हरतालिका व्रत कथा सुनना और शिव-पार्वती के नामों का स्मरण करना महत्वपूर्ण माना जाता है।

शिव-पार्वती के साथ गणेश की पूजा

कई परिवारों में हरतालिका पूजन में भगवान गणेश का भी स्मरण किया जाता है। गणेश को प्रथम पूज्य और विघ्नहर्ता माना जाता है। शिव-पार्वती के परिवार की सामूहिक पूजा भारतीय गृहस्थ जीवन की एक पूर्ण तस्वीर प्रस्तुत करती है। इसमें शिव तप और चेतना के, पार्वती शक्ति और करुणा के तथा गणेश बुद्धि और मंगलारंभ के प्रतीक माने जाते हैं।

मंत्रों में समर्पण

पूजन के दौरान श्रद्धानुसार शिव और पार्वती के नामों का जाप किया जा सकता है उमायै नमः। पार्वत्यै नमः। जगद्धात्र्यै नमः। महेश्वराय नमः। पशुपतये नमः। शम्भवे नमः। शिवाय नमः। मंत्र-जप का उद्देश्य मन को एकाग्र करना और आराध्य के प्रति भाव को गहरा करना है।

व्रत के दिन संयम ही सबसे बड़ा नियम

हरतालिका तीज के अवसर पर सात्त्विकता, शुद्धता और शांत मन को विशेष महत्व दिया जाता है। क्रोध, कटु वाणी, विवाद और अनावश्यक तनाव से बचना व्रत की भावना के अनुरूप है। लोकपरंपराओं में कई खाद्य पदार्थों और व्यवहारों को लेकर अलग-अलग निषेध मिलते हैं। इन्हें क्षेत्रीय और पारिवारिक मान्यताओं के रूप में समझना चाहिए। किसी लोकविश्वास को वैज्ञानिक तथ्य अथवा निश्चित शास्त्रीय परिणाम के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं। व्रत की असली कसौटी मन की निर्मलता है।

हरतालिका और आधुनिक स्त्री

समय बदल गया है, लेकिन तीज की प्रासंगिकता समाप्त नहीं हुई। आज की महिला नौकरी करती है, कारोबार संभालती है, परिवार चलाती है, बच्चों की शिक्षा से लेकर बुजुर्गों की जिम्मेदारी तक उठाती है। ऐसे में उसके लिए तीज का एक अर्थ यह भी है कि वह अपने व्यस्त जीवन में एक दिन अपनी आस्था, अपने संबंधों और अपनी भावनाओं के नाम कर सके। व्रत का स्वरूप चाहे बदले, लेकिन प्रेम, सम्मान, विश्वास और साथ निभाने की आकांक्षा आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यही कारण है कि नई पीढ़ी भी मेहंदी, सोशल मीडिया और आधुनिक आयोजनों के माध्यम से तीज से जुड़ रही है, जबकि पूजा और कथा की मूल परंपरा बनी हुई है।

अर्धनारीश्वर : तीज का सबसे गहरा दर्शन

हरतालिका तीज को समझने का सबसे सुंदर रास्ता अर्धनारीश्वर की अवधारणा से होकर गुजरता है। शिव और शक्ति दो अलग अस्तित्व नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक माने गए हैं। शिव में शक्ति हो तो वह निष्क्रिय चेतना हैं और शक्ति को शिव का आधार मिले तो उसकी ऊर्जा दिशाहीन हो सकती है। इसीलिए भारतीय दर्शन ने दोनों को विरोधी नहीं, पूरक माना। हरतालिका तीज का विवाह-संदेश भी इसी संतुलन पर आधारित हैरिश्ता अधिकार से नहीं, परस्पर सम्मान से मजबूत होता है।

काशी में तीज : जहां शिव हर सांस में हैं

काशी में शिव-पार्वती की आराधना का अपना ही महत्व है। गंगा के घाटों से लेकर मोहल्लों के शिवालयों तक, मंदिरों की घंटियों से लेकर घरों में जलते दीपों तक, तीज के दिन शिवनगरी की धार्मिक चेतना अलग रंग में दिखाई देती है। यहां शिव केवल मंदिर में स्थापित देवता नहीं, बल्कि शहर की सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा हैं। हरतालिका तीज पर जब महिलाएं पार्वती की कथा सुनती हैं तो वह कथा काशी के शिवत्व से सहज जुड़ जाती है।

गणेश चतुर्थी भी

इस वर्ष पंचांग का एक उल्लेखनीय संयोग यह भी है कि हरतालिका तीज और गणेश चतुर्थी दोनों 14 सितंबर को पड़ रहे हैं। विभिन्न पंचांगों में तिथियों और पूजा-विधियों की गणना स्थान एवं परंपरा के अनुसार अलग-अलग ढंग से प्रस्तुत हो सकती है, लेकिन पर्व कैलेंडर में दोनों का यही दिन दर्ज है। एक ही दिन शिव-पार्वती की आराधना और गणपति के जन्मोत्सव का धार्मिक वातावरण बनना पर्वों की श्रृंखला को और विशेष बना देता है।

गंगा-वरुणा के उफान में काशी, राहत को उतरे योगी

गंगा - वरुणा के उफान में काशी , राहत को उतरे योगी हवाई सर्वेक्षण के बाद पीड़ितों के बीच पहुंचे योगी , बोले — संकट में काश...