Saturday, 9 May 2026

योगी कैबिनेट में कल बड़ा धमाका!

योगी कैबिनेट में कल बड़ा धमाका!

जातीय-सामाजिक संतुलन साधने की तैयारी, कई नए चेहरों को मिल सकता है मंत्री पद

सुरेश गांधी

वाराणसी l उत्तर प्रदेश की राजनीति में रविवार का दिन बेहद अहम माना जा रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सरकार के बहुप्रतीक्षित मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर राजधानी लखनऊ में देर रात तक मंथन चलता रहा। सूत्रों के अनुसार राजभवन में 10 मई को संभावित शपथ ग्रहण की तैयारियां तेज हो गई हैं और भाजपा संगठन ने लगभग अंतिम सूची पर सहमति बना ली है।

राजनीतिक गलियारों में जिन नामों की सबसे ज्यादा चर्चा है उनमें पूजा पाल, कृष्ण पासवान, रोमी साहनी, मनोज पांडेय, भूपेंद्र चौधरी और हंसराज विश्वकर्मा के नाम प्रमुख हैं। इसके अलावा कुछ और नए चेहरों को भी अंतिम समय में मौका मिलने की चर्चा है। सूत्रों की मानें तो भाजपा इस विस्तार के जरिए 2027 विधानसभा चुनाव का मजबूत राजनीतिक संदेश देने की तैयारी में है। पार्टी का फोकस पिछड़ा, दलित, ब्राह्मण और क्षेत्रीय संतुलन पर है। पूर्वांचल, बुंदेलखंड और पश्चिमी उत्तर प्रदेश को साधने की रणनीति के तहत सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखकर मंत्रियों का चयन किया जा रहा है।

बताया जा रहा है कि केवल नए चेहरों की एंट्री ही नहीं होगी, बल्कि कुछ मौजूदा मंत्रियों के विभागों में भी बड़ा फेरबदल संभव है। संगठन और सरकार के बीच बेहतर तालमेल बनाने तथा लोकसभा चुनाव के बाद बदले राजनीतिक हालात को देखते हुए यह विस्तार योगी सरकार के दूसरे कार्यकाल का सबसे अहम राजनीतिक कदम माना जा रहा है। राजधानी लखनऊ में देर रात तक राजनीतिक गतिविधियां तेज रहीं। भाजपा कार्यालय और सत्ता के गलियारों में संभावित मंत्रियों के समर्थकों की आवाजाही भी बढ़ गई है। अब सबकी निगाहें शनिवार को होने वाले संभावित शपथ ग्रहण समारोह पर टिकी हैं।

बंगाल में ‘योगी मॉडल’ की दस्तक, दंगाइयों की अब खैर नहीं : सरवर सिद्दीकी

बंगाल में ‘योगी मॉडल की दस्तक, दंगाइयों की अब खैर नहीं : सरवर सिद्दीकी 

भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य बोले : सुशासन, सुरक्षा और विकास के नए युग की शुरुआत

सुरेश गांधी

वाराणसी। पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार बनने और नए नेतृत्व के रूप में शुभेंदु अधिकारी के मुख्यमंत्री पद संभालने पर भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य सरवर सिद्दीकी ने प्रदेशवासियों को बधाई देते हुए इसे बंगाल के राजनीतिक इतिहास का निर्णायक मोड़ बताया है। उन्होंने कहा कि अब राज्य में कानून व्यवस्था को लेकर कोई समझौता नहीं होगा और उत्तर प्रदेश की योगी सरकार की तर्ज पर अपराधियों, माफियाओं और दंगाइयों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी।

सरवर सिद्दीकी ने कहा कि वर्षों से पश्चिम बंगाल हिंसा, राजनीतिक अराजकता, भ्रष्टाचार और तुष्टिकरण की राजनीति से पीड़ित रहा है। आम नागरिक भय और असुरक्षा के माहौल में जीवन जीने को मजबूर थे। लेकिन अब जनता ने परिवर्तन का स्पष्ट जनादेश देकर यह साबित कर दिया है कि बंगाल भी विकास, सुरक्षा और राष्ट्रवाद की राह पर आगे बढ़ना चाहता है।

उन्होंने दावा किया कि नई सरकार “जीरो टॉलरेंस नीति पर काम करेगी। दंगाइयों, भू-माफियाओं, अवैध वसूली करने वालों और संगठित अपराध से जुड़े लोगों की अब उलटी गिनती शुरू हो चुकी है। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार उत्तर प्रदेश में अपराधियों पर बुलडोजर कार्रवाई और सख्त कानून व्यवस्था ने जनता में भरोसा पैदा किया, उसी प्रकार बंगाल में भी कानून का राज स्थापित होगा।

सिद्दीकी ने कहा कि भाजपा की सरकार सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास की भावना के साथ कार्य करेगी। उन्होंने उम्मीद जताई कि पश्चिम बंगाल आने वाले समय में उद्योग, रोजगार, निवेश और सांस्कृतिक गौरव के क्षेत्र में नई पहचान बनाएगा। साथ ही उन्होंने कार्यकर्ताओं और जनता से शांति, सौहार्द और विकास की राजनीति को मजबूत करने की अपील भी की।

राष्ट्रीय लोक अदालत में रिकॉर्ड निस्तारण : 4.72 लाख वादों का समाधान, 20.49 करोड़ की वसूली

राष्ट्रीय लोक अदालत में रिकॉर्ड निस्तारण : 4.72 लाख वादों का समाधान, 20.49 करोड़ की वसूली 

जिला जज बोले : लोक अदालत समाज और परिवार को जोड़ने का सबसे प्रभावी माध्यम

आपसी समझौते से सुलझे पारिवारिक और राजस्व विवाद

न्यायालयों में लंबित मामलों का बोझ घटाने में मिली बड़ी सफलता

सुरेश गांधी

वाराणसी। न्याय को आसान, सुलभ और त्वरित बनाने की दिशा में शनिवार को आयोजित राष्ट्रीय लोक अदालत ने एक बार फिर बड़ी सफलता दर्ज की। दीवानी न्यायालय परिसर में आयोजित चालू वर्ष की द्वितीय राष्ट्रीय लोक अदालत में जनपद न्यायालय और प्रशासनिक विभागों को मिलाकर कुल 4,72,161 वादों का निस्तारण किया गया। इस दौरान 20 करोड़ 49 लाख 41 हजार 94 रुपये से अधिक की धनराशि की वसूली और समझौते पर सहमति बनी।

राष्ट्रीय लोक अदालत का शुभारंभ जनपद न्यायाधीश संजीव शुक्ला ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि लोक अदालत भारत की प्राचीन परंपरा का आधुनिक स्वरूप है। सदियों से समाज में पंचायत और आपसी संवाद के माध्यम से विवादों को सुलझाने की परंपरा रही है, जिसे 1987 के अधिनियम द्वारा विधिक मान्यता प्रदान की गई।

जिला जज ने कहा कि लोक अदालत ऐसा मंच बन चुका है, जहां बिना समय गंवाए गंभीर से गंभीर मामलों का समाधान संभव हो पा रहा है। उन्होंने पारिवारिक मामलों की बढ़ती संख्या पर चिंता जताते हुए कहा कि परिवार समाज की मूल इकाई है और न्यायालय का वास्तविक उद्देश्य परिवारों को जोड़ना है, तोड़ना नहीं। उन्होंने कहा कि आपसी सहमति और संवाद से विवादों का समाधान समाज में समरसता और सौहार्द को मजबूत करता है। लोक अदालतें न केवल लोगों को त्वरित न्याय उपलब्ध करा रही हैं, बल्कि न्यायालयों में लंबित मामलों का बोझ भी कम कर रही हैं।

जनपद न्यायालय में 33 हजार से अधिक मामलों का निस्तारण

राष्ट्रीय लोक अदालत के दौरान जनपद न्यायालय में कुल 33,807 वादों का निस्तारण किया गया। इन मामलों में लगभग 2 करोड़ 96 लाख 86 हजार 619 रुपये की धनराशि की वसूली की गई। वहीं प्रशासन एवं अन्य विभागों द्वारा 4,38,354 मामलों का निस्तारण किया गया, जिनमें 17 करोड़ 52 लाख 54 हजार 475 रुपये की वसूली हेतु समझौता हुआ। यदि दोनों आंकड़ों को मिलाया जाए तो कुल 4 लाख 72 हजार 161 मामलों का समाधान कर 20 करोड़ 49 लाख 41 हजार 94 रुपये से अधिक की धनराशि के निस्तारण पर सहमति बनी।

न्यायिक अधिकारियों और बैंकों की रही अहम भूमिका

कार्यक्रम में प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय अनिरुद्ध कुमार तिवारी, मोटर दावा अधिकरण के पीठासीन अधिकारी रामकेश, बनारस बार अध्यक्ष विनोद कुमार शुक्ला, सेन्ट्रल बार अध्यक्ष प्रेम प्रकाश गौतम, अपर जिला जज एवं राष्ट्रीय लोक अदालत के नोडल अधिकारी आलोक कुमार, मुख्य राजस्व अधिकारी अजीत कुमार, यूनियन बैंक के एलडीएम अविनाश अग्रवाल, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के पूर्णकालिक सचिव राजीव मुकुल पांडेय तथा यूनियन बैंक ऑफ इंडिया के जीएम बीएन सिंह सहित बड़ी संख्या में न्यायिक अधिकारी, अधिवक्ता और बैंक कर्मी उपस्थित रहे।

क्रांतिकारियों की धरती पर भगवा उदय, बंगाल में सत्ता नहीं विचार बदला है! शुरू हुआ ‘योगी मॉडल’ का नया अध्याय?

क्रांतिकारियों की धरती पर भगवा उदय, बंगाल में सत्ता नहीं विचार बदला है! शुरू हुआयोगी मॉडलका नया अध्याय

कोलकाता के ऐतिहासिक ब्रिगेड परेड ग्राउंड में जब भगवा वस्त्रों में शुभेंदु अधिकारी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, तब केवल सरकार नहीं बदली, बल्कि बंगाल की राजनीति का दशकों पुराना रंग भी बदलता दिखाई दिया।जय श्रीरामके नारों, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मौजूदगी और योगी आदित्यनाथ के हाथों शुभेंदु को पहनाए गए भगवा गमछे ने इस शपथ ग्रहण को एक साधारण राजनीतिक समारोह से कहीं बड़ा प्रतीक बना दिया। रवींद्रनाथ टैगोर की जयंती पर हुए इस सत्ता परिवर्तन को भाजपा समर्थकसनातन चेतना का उदयऔर डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सपनों की पूर्ति बता रहे हैं। कभी वामपंथ और तृणमूल की राजनीति का गढ़ रहे बंगाल में अबयोगी मॉडल”, बुलडोजर कार्रवाई, माफिया पर प्रहार और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की चर्चा तेज है। यह सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि उस बंगाल की नई वैचारिक कहानी है जिसने कभी वंदे मातरम्, स्वामी विवेकानंद और नेताजी सुभाष को जन्म दिया था। अब सवाल यही है क्या बंगाल सचमुच एक नए राजनीतिक युग में प्रवेश कर चुका है? क्या बंगाल में शुरू हुआयोगी मॉडलका नया अध्याय

सुरेश गांधी

पश्चिम बंगाल ने आखिरकार वह राजनीतिक दृश्य देख लिया जिसकी कल्पना दशकों तक केवल राजनीतिक विमर्शों में की जाती रही। कोलकाता के ऐतिहासिक ब्रिगेड परेड ग्राउंड में जब शुभेंदु अधिकारी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, तब केवल सत्ता परिवर्तन नहीं हुआ, बल्कि बंगाल की वैचारिक राजनीति में भी एक बड़ा बदलाव दर्ज हो गया। यह संयोग ही नहीं, प्रतीक भी था कि यह शपथ ग्रहण गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की जयंती के अवसर पर हुआ। वही रवींद्र, जिन्होंने बंगाल की आत्मा को साहित्य, संस्कृति और राष्ट्रचेतना से जोड़ा था। और उसी दिन उस बंगाल में पहली बार ऐसी सरकार बनी, जिसे भाजपा समर्थक खुलकरसनातन विचारों वाली सरकारकह रहे हैं। शुभेंदु अधिकारी का भगवा परिधान, मंच परजय श्रीरामके गूंजते नारे, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मौजूदगी की मौजूदगी, और योगी आदित्यनाथ द्वारा शुभेंदु को भगवा गमछा पहनाना और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सपनों की चर्चा इन सबने मिलकर बंगाल की राजनीति को एक नए प्रतीकवाद से भर दिया। यह केवल सरकार बदलने की कहानी नहीं है। यह उस बंगाल की कहानी है जिसने कभी भारत को वंदे मातरम् दिया, क्रांतिकारियों की लंबी परंपरा दी, लेकिन बाद के दशकों में राजनीतिक हिंसा, वैचारिक संघर्ष और तुष्टिकरण की राजनीति के आरोपों में उलझता चला गया। अब भाजपा इसेबंगाल के पुनर्जागरणके रूप में प्रस्तुत कर रही है। 

पश्चिम बंगाल भारतीय राजनीति का वह राज्य रहा है जहां लंबे समय तक वामपंथी विचारधारा का दबदबा रहा। फिर तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी नेमां, माटी और मानुषके नारे के साथ सत्ता संभाली। लेकिन भाजपा का दावा है कि पिछले कुछ वर्षों में बंगाल की जनता राजनीतिक हिंसा, भ्रष्टाचार, कट्टर तुष्टिकरण और प्रशासनिक अराजकता से थक चुकी थी। इसी पृष्ठभूमि में शुभेंदु अधिकारी का उदय हुआ। कभी ममता बनर्जी के सबसे विश्वस्त सहयोगियों में गिने जाने वाले शुभेंदु भाजपा में आए और फिर वही नेता बंगाल में भाजपा के सबसे बड़े चेहरे बन गए। भवानीपुर जैसी प्रतिष्ठित सीट पर ममता बनर्जी को हराना केवल चुनावी जीत नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक राजनीतिक संदेश बन गया। अब जब उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, तो भाजपा समर्थकों ने इसेडॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सपनों की पूर्तिबताया। डॉ. मुखर्जी ने ही भारतीय जनसंघ की स्थापना की थी, जो आगे चलकर भाजपा बनी। बंगाल में भाजपा की सरकार बनना इसलिए भी ऐतिहासिक माना जा रहा है क्योंकि यह वही धरती है जहां से राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक चेतना की कई धाराएं निकली थीं।

योगी मॉडल की चर्चा क्यों तेज हुई?

शपथ ग्रहण समारोह में सबसे चर्चित दृश्य वह रहा जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपना भगवा गमछा उतारकर शुभेंदु अधिकारी को पहनाया। राजनीति में प्रतीकों का बहुत महत्व होता है। इस एक दृश्य ने बंगाल की नई सरकार को लेकर नई चर्चाओं को जन्म दे दिया। क्या बंगाल अबयोगी मॉडलपर चलेगा? यह सवाल इसलिए भी उठ रहा है क्योंकि भाजपा के कई समर्थक लंबे समय से बंगाल में सख्त प्रशासन, माफिया और राजनीतिक हिंसा पर कठोर कार्रवाई तथा अवैध गतिविधियों के खिलाफ बड़े अभियान की मांग करते रहे हैं। उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की पहचानबुलडोजर मॉडलऔर अपराधियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई के कारण बनी। अब बंगाल में भी भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच यह उम्मीद दिखाई दे रही है कि नई सरकार अवैध कब्जों, तस्करी नेटवर्क, राजनीतिक हिंसा और संगठित अपराध के खिलाफ सख्त अभियान चलाएगी। हालांकि राजनीतिक विश्लेषक यह भी मानते हैं कि बंगाल की सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना उत्तर प्रदेश से अलग है। यहां की राजनीति लंबे समय से बौद्धिक विमर्श, साहित्यिक चेतना और क्षेत्रीय अस्मिता से प्रभावित रही है। इसलिए शुभेंदु अधिकारी के सामने चुनौती केवल कानून-व्यवस्था सुधारने की नहीं, बल्कि बंगाल की सांस्कृतिक पहचान के साथ तालमेल बैठाने की भी होगी।

जय श्रीरामसेवंदे मातरम्तक बदलता बंगाल

कुछ वर्ष पहले तक बंगाल मेंजय श्रीरामका नारा राजनीतिक विवाद का विषय बन जाता था। लेकिन इस बार शपथ ग्रहण समारोह में यही नारा हजारों समर्थकों की आवाज बन गया। भाजपा इसे बंगाल में बदलते राजनीतिक मानस का संकेत मान रही है। दरअसल बंगाल की सांस्कृतिक चेतना हमेशा से धार्मिक और राष्ट्रवादी तत्वों से जुड़ी रही है। वंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय नेवंदे मातरम्लिखा, स्वामी विवेका नंद ने आध्यात्मिक राष्ट्रवाद का संदेश दिया, सुभाष चंद बोस ने सशस्त्र संघर्ष की राह चुनी और रवींद्रनाथ टैगोर ने राष्ट्रवाद को सांस्कृतिक चेतना से जोड़ा। भाजपा अब इन्हीं प्रतीकों को अपने राजनीतिक विमर्श से जोड़ने की कोशिश कर रही है। पार्टी यह संदेश देना चाहती है कि हिंदुत्व और बंगाली संस्कृति परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं।

ममता युग का अंत या नई शुरुआत?

पश्चिम बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी एक युग का नाम रही हैं। सड़क संघर्ष से लेकर मुख्यमंत्री बनने तक उनकी राजनीति ने बंगाल को गहराई से प्रभावित किया। लेकिन भाजपा ने लगातार उन पर राजनीतिक हिंसा, भ्रष्टाचार और अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के आरोप लगाए। भाजपा का दावा है कि बंगाल में उद्योगों का पलायन हुआ, निवेश घटा और राजनीतिक हिंसा बढ़ी। वहीं तृणमूल कांग्रेस हमेशा इन आरोपों को राजनीतिक प्रचार बताती रही। अब शुभेंदु सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वह भाजपा के वादों को जमीन पर उतार पाएगी? अगर नई सरकार कानून-व्यवस्था सुधारने, उद्योग निवेश बढ़ाने, रोजगार पैदा करने और प्रशासनिक पारदर्शिता लाने में सफल होती है, तो यह बंगाल की राजनीति में स्थायी बदलाव साबित हो सकता है। लेकिन अगर केवल वैचारिक संघर्ष और राजनीतिक टकराव बढ़े, तो जनता की उम्मीदें जल्द निराशा में बदल सकती हैं।

सामाजिक संतुलन का संदेश

नई सरकार के मंत्रिमंडल में दिलीप घोष, अग्निमित्रा पॉल, अशोक कीर्तनिया और खुदीराम टुडू जैसे नेताओं को शामिल करके भाजपा ने सामाजिक संतुलन का संदेश देने की कोशिश की है। ब्राह्मण, महिला, मातुआ और आदिवासी समाज को प्रतिनिधित्व देकर भाजपा ने स्पष्ट संकेत दिया है कि वह बंगाल में व्यापक सामाजिक गठबंधन तैयार करना चाहती है। विशेष रूप से मातुआ समुदाय भाजपा की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के मुद्दे पर भाजपा ने इस समुदाय को अपने साथ जोड़ने की कोशिश की थी। अब सरकार बनने के बाद यह देखना होगा कि भाजपा अपने वादों को किस हद तक पूरा कर पाती है।

बंगाल की अर्थव्यवस्था और नई उम्मीदें

राजनीतिक बदलाव के साथ आर्थिक उम्मीदें भी जुड़ी हुई हैं। बंगाल कभी भारत का सबसे बड़ा औद्योगिक केंद्र हुआ करता था। कोलकाता व्यापार, शिक्षा और संस्कृति का राष्ट्रीय केंद्र माना जाता था। लेकिन पिछले दशकों में उद्योगों के पलायन और निवेश की कमी ने राज्य की आर्थिक स्थिति को प्रभावित किया। भाजपा अबविकसित बंगालका नारा दे रही है। प्रधानमंत्री मोदी ने भी अपने संबोधन में बंगाल कोभारत की विकास यात्रा का अग्रणी राज्यबनाने की बात कही। नई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी :- उद्योग निवेश वापस लाना. रोजगार बढ़ाना. सीमावर्ती सुरक्षा मजबूत करना. राजनीतिक हिंसा रोकना. भ्रष्टाचार पर नियंत्रण. इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार. अगर शुभेंदु अधिकारी इन मोर्चों पर सफल होते हैं, तो बंगाल राष्ट्रीय राजनीति में भाजपा का सबसे बड़ा मॉडल बन सकता है।

बुलडोजर राजनीति बनाम संवैधानिक संतुलन

भाजपा समर्थकों के बीचबुलडोजर मॉडलको लेकर उत्साह जरूर है, लेकिन संवैधानिक विशेषज्ञ लगातार यह भी कहते रहे हैं कि किसी भी कार्रवाई को कानून के दायरे में रहकर ही करना होगा। उत्तर प्रदेश में बुलडोजर कार्रवाई भाजपा समर्थकों के लिएसख्त शासनका प्रतीक बनी, जबकि विपक्ष ने इसेराजनीतिक प्रतिशोधबताया। बंगाल में अगर ऐसी कोई नीति अपनाई जाती है, तो निश्चित रूप से राजनीतिक और कानूनी बहस तेज होगी। इसलिए शुभेंदु अधिकारी के सामने चुनौती केवल शक्ति प्रदर्शन की नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संतुलन बनाए रखने की भी होगी।

रवींद्रनाथ टैगोर की धरती पर नई वैचारिक बहस

रवींद्रनाथ टैगोर ने राष्ट्रवाद को मानवता और संस्कृति से जोड़कर देखा था। बंगाल हमेशा विचारों की भूमि रहा है। यहां राजनीतिक बहसें केवल चुनाव तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि साहित्य, संस्कृति और बौद्धिक विमर्श से भी जुड़ती हैं। अब जब भाजपा यहां सत्ता में आई है, तो यह बहस और तेज होगी कि क्या हिंदुत्व और बंगाली अस्मिता साथ-साथ चल सकते हैं? भाजपा का दावा है कि उसका हिंदुत्व सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर आधारित है। वहीं विपक्ष इसे बंगाल की उदार सांस्कृतिक परंपरा के लिए चुनौती बता रहा है। आने वाले वर्षों में यही वैचारिक संघर्ष बंगाल की राजनीति का सबसे बड़ा केंद्र बन सकता है।

क्या बंगाल में स्थायी हो पाएगी भाजपा?

भारत की राजनीति में बंगाल हमेशा कठिन राज्य माना गया है। यहां की जनता भावनात्मक मुद्दों के साथ-साथ सांस्कृतिक और बौद्धिक विमर्श को भी महत्व देती है। भाजपा के लिए सत्ता में आना बड़ी उपलब्धि है, लेकिन सत्ता को स्थायी बनाना उससे भी बड़ी चुनौती होगी। अगर भाजपा केवल वैचारिक नारों तक सीमित रही, तो बंगाल की जनता जल्दी निराश हो सकती है। लेकिन अगर सरकार विकास, रोजगार, कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक सुधार पर ठोस काम करती है, तो बंगाल की राजनीति में स्थायी बदलाव संभव है।

एक नई राजनीतिक सुबह या केवल प्रतीकों की राजनीति?

ब्रिगेड परेड ग्राउंड में भगवा वस्त्रों में शपथ लेते शुभेंदु अधिकारी, मंच पर मौजूद प्रधानमंत्री मोदी, योगी आदित्यनाथ का भगवा गमछा, “जय श्रीरामके नारे और रवींद्रनाथ टैगोर की जयंतीइन सबने मिलकर बंगाल की राजनीति में एक नई तस्वीर जरूर बना दी है. यह तस्वीर भाजपा समर्थकों के लिएसनातन चेतना के उदयकी है। वहीं विरोधियों के लिए यहआक्रामक वैचारिक राजनीतिका नया अध्याय है। लेकिन अंततः किसी भी सरकार की असली पहचान उसके प्रतीकों से नहीं, बल्कि उसके काम से तय होती है। बंगाल की जनता अब यह देखेगी कि क्या नई सरकार केवल राजनीतिक विमर्श बदलेगी या वास्तव में राज्य की दिशा और दशा भी बदल पाएगी। क्रांतिकारियों की धरती बंगाल एक बार फिर इतिहास के मोड़ पर खड़ी है। अब नजर इस बात पर है कि यह परिवर्तन केवल सत्ता परिवर्तन साबित होगा या सचमुच एक नए युग की शुरुआत।

योगी कैबिनेट में कल बड़ा धमाका!

योगी कैबिनेट में कल बड़ा धमाका ! जातीय - सामाजिक संतुलन साधने की तैयारी , कई नए चेहरों को मिल सकता है मंत्री पद सुरेश ...