Friday, 8 May 2026

मदर्स डे : ममता, त्याग और तपस्या का अनंत आकाश है मां

मदर्स डे : ममता, त्याग और तपस्या का अनंत आकाश है मां 

इस दुनिया में यदि कोई रिश्ता पूरी तरह निस्वार्थ, निष्कलंक और अनंत है, तो वह सिर्फमांका रिश्ता है। मां केवल जन्म देने वाली स्त्री नहीं, बल्कि वह शक्ति है, जो अपनी संतान के लिए हर दर्द सहकर भी मुस्कुराती रहती है। बच्चे की पहली धड़कन से लेकर उसके जीवन के अंतिम संघर्ष तक मां हर कदम पर उसके साथ खड़ी रहती है। शायद इसीलिए कहा गया है कि ईश्वर हर जगह नहीं पहुंच सकता, इसलिए उसने मां बनाई। आज के आधुनिक और भागदौड़ भरे दौर में रिश्तों की गर्माहट धीरे-धीरे कम होती जा रही है, लेकिन मां का प्रेम आज भी उतना ही पवित्र और अटूट है। मां खुद भूखी रह सकती है, लेकिन अपने बच्चे को कभी भूखा नहीं सोने देती। वह अपनी इच्छाओं, सपनों और खुशियों का त्याग कर संतान के भविष्य को संवारती है। उसकी ममता में कोई स्वार्थ होता है और कोई शर्त। भारतीय संस्कृति में मां को भगवान से भी ऊंचा दर्जा दिया गया है। हमारे शास्त्रों मेंमातृ देवो भवःकहकर मां को देवतुल्य माना गया है। सच तो यह है कि मां केवल एक रिश्ता नहीं, बल्कि संवेदना, त्याग, करुणा और जीवन का दूसरा नाम है। मां का आंचल ही वह जगह है, जहां हर दर्द खत्म हो जाता है और हर इंसान को अपना सबसे सुरक्षित संसार मिलता है 

सुरेश गांधी

जिसका अंत नहीं, उसेमांकहते हैं.... जी हां, ममता, त्याग और तपस्या की वह अनंत छाया, जिसके बिना अधूरा है संसार. धरती पर यदि किसी रिश्ते को ईश्वर का सबसे सुंदर और जीवंत स्वरूप कहा जाए, तो वह निस्संदेहमांहै। मां केवल एक शब्द नहीं, बल्कि संपूर्ण सृष्टि की वह संवेदना है, जिसमें प्रेम, त्याग, वात्सल्य, करुणा, संघर्ष और समर्पण एक साथ समाहित होते हैं। इस संसार में बहुत से रिश्ते बनते और टूटते हैं, लेकिन मां का रिश्ता ऐसा है, जिसका कोई विकल्प है और ही कोई अंत। शायद इसी लिए कहा गया है, “ऊपर जिसका अंत नहीं, उसे आसमान कहते हैं, इस जहां में जिसका अंत नहीं, उसे मां कहते हैं।मां की ममता की व्याख्या शब्दों में संभव नहीं। उसे केवल महसूस किया जा सकता है। वह अपने बच्चे को केवल जन्म ही नहीं देती, बल्कि उसे संस्कार, साहस, संवेदना और जीवन जीने की कला भी देती है। एक मां अपने बच्चे के हर दुख को स्वयं पर ले लेती है और उसकी मुस्कान के लिए अपने सारे सुख त्याग देती है। संसार का हर रिश्ता किसी किसी स्वार्थ से जुड़ा हो सकता है, लेकिन मां का प्रेम निस्वार्थ होता है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में मां को भगवान से भी ऊंचा स्थान दिया गया है।

मातृ देवो भवः: भारतीय संस्कृति का मूल मंत्र

भारतीय परंपरा मेंमांको केवल परिवार की धुरी नहीं माना गया, बल्कि उसे सृष्टि की आधारशिला कहा गया है। हमारे वेद, पुराण और उपनिषद मातृत्व की महिमा से भरे पड़े हैं। उपनिषदों का महान वाक्य, “मातृ देवो भवःस्पष्ट करता है कि मां देवताओं के समान पूजनीय है। सनातन धर्म में मां को शक्ति का रूप माना गया है। मां दुर्गा, मां लक्ष्मी और मां सरस्वती के रूप में नारी को सृष्टि की संचालक शक्ति स्वीकार किया गया है। श्रीमद्भागवत और अन्य धर्मग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि मां की सेवा और उसका आशीर्वाद मनुष्य के जीवन के बड़े से बड़े संकट को दूर कर देता है। कहा भी गया है, “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसीअर्थात जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर हैं। वास्तव में, मां की गोद ही बच्चे का पहला संसार होती है। वह उसकी पहली गुरु, पहली मित्र और पहला आश्रय होती है। बच्चे का पहला शब्दमांहोता है और यही शब्द उसके जीवन का सबसे बड़ा सम्बल बन जाता है।

मां : त्याग की जीवित प्रतिमा

एक मां अपने बच्चे के लिए कितने त्याग करती है, इसका अनुमान लगाना भी कठिन है। वह स्वयं भूखी रह सकती है, लेकिन अपने बच्चे को भूखा नहीं सोने देती। वह अपने सपनों को त्याग देती है ताकि उसकी संतान अपने सपने पूरे कर सके। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में जहां रिश्तों में औपचारिकता बढ़ती जा रही है, वहां मां का प्रेम अब भी उतना ही निर्मल और सच्चा है। दुनिया बदलती रही, समय बदलता रहा, लेकिन मां का हृदय कभी नहीं बदला। किसी कवि ने कितनी सुंदर पंक्तियां लिखी हैं, “हर रिश्ते में मिलावट देखी, कच्चे रंगों की सजावट देखी, लेकिन सालों साल कभी देखा है, मां के चेहरे पर थकावट देखी, ममता में कभी मिलावट देखी।मां की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह अपने बच्चे की हर गलती को क्षमा कर देती है। बच्चा चाहे कितना भी बड़ा क्यों हो जाए, मां के लिए वह हमेशा छोटा ही रहता है। यही वात्सल्य मां को दुनिया का सबसे महान स्वरूप बनाता है।

मातृत्व को नमन का अवसर

दुनिया भर में हर वर्ष मई के दूसरे रविवार को मदर्स डे मनाया जाता है। यह दिन केवल उत्सव नहीं, बल्कि मां के त्याग, प्रेम और समर्पण के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का अवसर है। भारत सहित अमेरिका, कनाडा, न्यूजीलैंड और कई देशों में यह दिवस बड़े सम्मान के साथ मनाया जाता है। हालांकि भारतीय संस्कृति में मां का सम्मान केवल एक दिन तक सीमित नहीं रहा, फिर भी आधुनिक जीवन की व्यस्तताओं के बीच यह दिन लोगों को अपनी मां के प्रति प्रेम व्यक्त करने का अवसर देता है। आज के दौर में बहुत से बच्चे अपने काम और जिम्मेदारियों के कारण मां से दूर रहते हैं। ऐसे में मदर्स डे उन्हें अपनी मां को याद करने, उनसे मिलने और उनके प्रति आभार प्रकट करने की प्रेरणा देता है।

कैसे हुई मदर्स डे की शुरुआत

मदर्स डे की शुरुआत का इतिहास भी बेहद भावुक और प्रेरणादायक है। इसकी शुरुआत अमेरिका में हुई। 19वीं शताब्दी में अमेरिकी गृहयुद्ध के दौरान हजारों परिवार बिखर गए थे। उसी समय एना मारिया जार्विस की मां एन जार्विस ने युद्ध से प्रभावित परिवारों को जोड़ने और माताओं के सम्मान के लिए सामाजिक अभियान चलाया। एन जार्विस नेमदर्स डे वर्क क्लबकी स्थापना की, जिसका उद्देश्य स्वास्थ्य और स्वच्छता को बढ़ावा देना था। बाद में उनकी बेटी एना जार्विस ने अपनी मां के सपने को आगे बढ़ाया। 10 मई 1908 को उन्होंने पहली बार आधिकारिक रूप से मदर्स डे समारोह आयोजित किया। धीरे-धीरे यह दिवस पूरी दुनिया में लोकप्रिय हो गया और मातृत्व के सम्मान का वैश्विक प्रतीक बन गया।

मां: संघर्ष और शक्ति का दूसरा नाम

मां केवल प्रेम की प्रतिमा ही नहीं, बल्कि संघर्ष और शक्ति का दूसरा नाम भी है। वह बच्चे की रक्षा के लिए किसी भी चुनौती से टकरा सकती है। इतिहास और समाज ऐसे अनगिनत उदाहरणों से भरे पड़े हैं, जहां माताओं ने विपरीत परिस्थितियों में भी अपने बच्चों का भविष्य संवार दिया। समाज में अनेक ऐसी महिलाएं हैं जिन्होंने अकेले अपने बच्चों का पालन-पोषण किया, उन्हें शिक्षित बनाया और जीवन में सफल बनाया। मां स्वयं टूट सकती है, लेकिन अपने बच्चे को कभी टूटने नहीं देती। बच्चा गिरता है तो मां उसे उठना सिखाती है। वह उसके जीवन में आत्मविश्वास भरती है। यही कारण है कि हर सफल व्यक्ति के पीछे मां का संघर्ष और त्याग छिपा होता है।

मां: संवेदना का अथाह सागर

मांशब्द अपने आप में भावनाओं का महासागर है। मां बच्चे के चेहरे को देखकर उसके मन की हर बात समझ जाती है। बच्चे को चोट लगे तो दर्द मां को होता है। संतान संकट में हो तो मां रातभर सो नहीं पाती। जब भी जीवन में कोई पीड़ा आती है, अनायास ही मुंह से पहला शब्द निकलता है, “मां यही वह आत्मीयता है, जो किसी और रिश्ते में नहीं मिलती। मां का आंचल बच्चे के लिए दुनिया का सबसे सुरक्षित स्थान होता है। उसकी गोद में सिर रखते ही हर चिंता समाप्त हो जाती है।

नारी ही सृष्टि की जननी है

यदि नारी होती तो सृष्टि की कल्पना भी संभव नहीं होती। नारी ही जननी है, वही सृजन की आधारशिला है। संसार का प्रत्येक जीव अपनी मां से ही अस्तित्व प्राप्त करता है। मां केवल मनुष्य की ही नहीं होती, बल्कि प्रकृति के हर जीव में मातृत्व विद्यमान है। कहीं चिड़िया अपने बच्चों को दाना खिलाती दिखाई देती है, तो कहीं गाय अपने बछड़े को स्नेह से चाटती है। यह मातृत्व का वही सार्वभौमिक भाव है, जिसने इस दुनिया को जीवित रखा हुआ है।

मां का ऋण कभी नहीं उतर सकता

मां के त्याग और प्रेम का मूल्य कभी चुकाया नहीं जा सकता। वह अपनी संतान के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर देती है। शायद इसीलिए कहा गया है, “पुत्र कुपुत्र हो सकता है, लेकिन माता कुमाता नहीं हो सकती।मां जीवनभर अपनी संतान के सुख के लिए प्रार्थना करती रहती है। वह अपने बच्चों के दुख को स्वयं झेल लेती है और उनकी खुशियों में ही अपनी खुशी खोजती है।

ममता ही सृष्टि का सबसे बड़ा सत्य

आज जब समाज में संवेदनाएं कमजोर पड़ती जा रही हैं, तब मां का प्रेम हमें मानवता का वास्तविक अर्थ सिखाता है। मां केवल एक रिश्ता नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। वह त्याग है, तपस्या है, शक्ति है, करुणा है और प्रेम का अनंत सागर है। सच तो यह है कि यदि मां होती, तो संसार भी होता। मां इस सृष्टि की वह शक्ति है, जिसने दुनिया को जन्म दिया, उसे संवारा और उसे प्रेम करना सिखाया। इसलिए मां के लिए जितना कहा जाए, वह कम है। क्योंकिमां के बिना जिंदगी वीरान होती है, तन्हा सफर में हर राह सुनसान होती है। जिंदगी में मां का होना जरूरी है, मां की दुआओं से ही हर मुश्किल आसान होती है।और अंत में बस इतना ही, जिस दिन इंसान मां के त्याग को समझ लेगा, उसी दिन उसे ईश्वर का वास्तविक स्वरूप दिखाई दे जाएगा।

जब जिंदगी बिखर गई... तब एक मां ने खुद को फिर से गढ़ लिया 

जब निधि मिश्रा पहली बार काशी आईं, तब उनके हाथों में सामान कम और जिम्मेदारियां ज्यादा थीं। आंखों में डर था, मन में असंख्य सवाल थे और दिल में एक ऐसा खालीपन, जिसे कोई भर नहीं सकता था। कुछ ही महीने पहले पति विनोद मिश्रा दुनिया छोड़ चुके थे। कैंसर ने उनका साथ छीन लिया था और पीछे छोड़ गया थाकृतीन छोटे बच्चों का भविष्य, अधूरी जिम्मेदारियां और एक स्त्री का टूटता हुआ संसार। जिस महिला ने कभी अकेले जीवन की कल्पना तक नहीं की थी, अब उसे मां भी बनना था, पिता भी और पूरे घर की हिम्मत भी। इलाज चला, उम्मीदें बची रहीं, दुआएं होती रहीं... लेकिन 22 फरवरी 2018 के बाद जिंदगी जैसे अचानक थम गई। उस समय बड़ी बेटी संस्कृति मिश्रा अभी पढ़ाई कर रही थीं, छोटी बेटी सुकृति मिश्रा बचपन और जिम्मेदारियों के बीच खड़ी थी, जबकि सबसे छोटा बेटा संस्कार मिश्रा दुनिया को समझने की उम्र में भी नहीं था। काशी उनके लिए शुरुआत में एक अनजान शहर था। घाटों की भीड़, मंदिरों की घंटियां और बनारस की संकरी गलियां, सब कुछ नया था। लेकिन धीरे-धीरे बाबा विश्वनाथ की नगरी ने उन्हें संभाल लिया। यहां उन्हें सिर्फ रोजगार नहीं मिला, बल्कि टूटे हुए मन को सहारा मिला। उन्होंने नौकरी की, स्कूल में पढ़ाया, घर संभाला और बच्चों के सपनों को बचाए रखा। संघर्ष इतना शांत था कि दुनिया को सिर्फ उनकी मुस्कान दिखाई दी, भीतर की थकान नहीं। आज वही मां गर्व से अपने बच्चों को आगे बढ़ते देख रही है। बड़ी बेटी संस्कृति मिश्रा एमबीए कर रही हैं। छोटी बेटी सुकृति मिश्रा बी-फार्मा की पढ़ाई कर रही हैं और बेटा संस्कार मिश्रा इस वर्ष 12वीं में है। कभी मां की उंगलियां पकड़कर चलने वाले बच्चे अब उनकी ताकत बन चुके हैं। निधि कहती हैं, “जिंदगी किसी के जाने से खत्म नहीं होती... लेकिन उसके बाद जीना फिर से सीखना पड़ता है।इन सात-आठ वर्षों ने उन्हें बदल दिया।

निधि जैसी मांएं सम्मान नहीं, प्रेरणा की प्रतीक

जो महिला कभी अकेले बाजार जाने से डरती थी, आज हर कठिन परिस्थिति का सामना मुस्कुराकर करती है। दर्द अब भी है, यादें अब भी हैं, लेकिन अब उन्होंने आंसुओं के साथ जीना सीख लिया है। काशी अब उनके लिए सिर्फ शहर नहीं, बल्कि पुनर्जन्म की भूमि है। जहां उन्होंने टूटकर भी खुद को संभाला। जहां उन्होंने सीखा कि मां कभी हारती नहीं। मदर्स डे पर निधि मिश्रा जैसी मांएं सिर्फ सम्मान की नहीं, प्रेरणा की प्रतीक हैं। क्योंकि वे बताती हैं कि मातृत्व सिर्फ ममता नहीं, बल्कि सबसे कठिन समय में खड़े रहने का साहस भी है। अंत में उनकी जिंदगी की पूरी कहानी मानो इन पंक्तियों में उतर आती है, “काशी ने मुझे गिरकर भी संभलना सिखा दिया, मां थी मैं...  इसलिए वक्त ने फिर जीना सिखा दिया।सबसे कठिन समय वह होता है, जब दुख के बीच इंसान खुद को अकेला महसूस करने लगे। पति की मृत्यु के बाद परिवार का अपेक्षित सहयोग भी नहीं मिला। रिश्तों की भीड़ में अपनापन कम पड़ गया। ऐसे समय में निधि को मानसिक सहारा उनकी मां से मिला, लेकिन नियति ने यहां भी उन्हें नहीं बख्शा। वर्ष 2022 में 8 अक्टूबर को उनकी मां का भी कैंसर से निधन हो गया। यह दूसरा बड़ा आघात था, जिसने भीतर तक तोड़ दिया। लेकिन शायद मां की सबसे बड़ी ताकत यही होती है कि वह अपने बच्चों के सामने टूटती नहीं।

बच्चों के लिए उम्मीद का दीपक जलाए

निधि मिश्रा ने आंसुओं को कमजोरी नहीं बनने दिया। आर्थिक जिम्मेदारियों का पहाड़ सामने था। घर चलाना था, बच्चों की पढ़ाई नहीं रुकने देनी थी और उन्हें यह एहसास भी नहीं होने देना था कि जिंदगी उनसे बहुत कुछ छीन चुकी है। इसी संघर्ष के बीच उन्हेंहिंदुस्तानमें नौकरी मिली। उनके पति गाजीपुर में हिंदुस्तान के ब्यूरो चीफ रहे थे। संस्थान के लोगों ने कठिन समय में उनका साथ दिया और निधि को काम का अवसर मिला। यह सिर्फ नौकरी नहीं थी, बल्कि टूटती जिंदगी को संभालने का एक सहारा था। इसके साथ ही उन्होंने स्कूल में पढ़ाना भी शुरू किया। दिनभर नौकरी, बच्चों की जिम्मेदारी, घर का काम और भविष्य की चिंता इन सबके बीच उन्होंने कभी अपने संघर्ष को अपनी पहचान नहीं बनने दिया। आज निधि मिश्रा उन हजारों महिलाओं की प्रतीक हैं, जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपने बच्चों के सपनों को मरने नहीं देतीं। उन्होंने साबित किया कि मां सिर्फ घर नहीं संभालती, बल्कि हालात से लड़कर पूरे परिवार की उम्मीद बन जाती है। मदर्स डे पर जब दुनिया अपनी मां को फूल और उपहार दे रही होगी, तब निधि जैसी माताओं को समाज को सम्मान और सलाम देना चाहिए। क्योंकि ऐसी मांएं हमें सिखाती हैं कि जिंदगी चाहे जितनी कठिन हो जाए, एक मां अपने बच्चों के लिए हर दर्द से लड़ सकती है। निधि मिश्रा की कहानी सिर्फ संघर्ष की कहानी नहीं, बल्कि उस अटूट मातृत्व की मिसाल है, जो हर परिस्थिति में अपने बच्चों के लिए उम्मीद का दीपक जलाए रखता है।

मदर्स डे : ममता, त्याग और तपस्या का अनंत आकाश है मां

मदर्स डे : ममता , त्याग और तपस्या का अनंत आकाश है मां  इस दुनिया में यदि कोई रिश्ता पूरी तरह निस्वार्थ , निष्कलंक और अनंत ...