Friday, 16 January 2026

महाराष्ट्र में बीजेपी की सुनामी में ढह गया ठाकरे किला

महाराष्ट्र में बीजेपी की सुनामी में ढह गया ठाकरे किला

महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर बड़ा भूचाल आया है। राज्य के 29 नगर निगमों, जिनमें देश की सबसे अमीर और राजनीतिक रूप से सबसे प्रभावशाली बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) भी शामिल है, के चुनाव नतीजों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि शहरी महाराष्ट्र में सत्ता की धुरी तेजी से बदली है। मतलब साफ है महाराष्ट्र की राजनीति में एक निर्णायक अध्याय जुड़ गया है। बीएमसी के चुनाव परिणामों ने केवल मुंबई की सत्ता का रंग बदला है, बल्कि महाराष्ट्र की सियासत की दिशा भी तय कर दी है। ताज़ा रुझानों और परिणामों में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले महायुति गठबंधन ने स्पष्ट बढ़त हासिल कर ली है। 227 सदस्यीय बीएमसी में भाजपा, शिंदे गुट बहुमत के आंकड़े के पार या निर्णायक स्थिति में पहुंचता दिख रहा है, जबकि दशकों तक इस निगम पर राज करने वाली ठाकरे बंधुओं की राजनीति हाशिये पर जाती नजर रही है। खास यह है कि यह जीत केवल एक नगर निगम का चुनाव नहीं है, बल्कि यह उस राजनीतिक संघर्ष का परिणाम है, जिसमें संगठन, सत्ता और नेतृत्व की परीक्षा हुई। मुंबई जैसी महानगरीय राजनीति में भाजपा की यह सफलता आने वाले वर्षों तक असर दिखाने वाली मानी जा रही है

सुरेश गांधी

महाराष्ट्र के नगर निगम चुनावों ने यह साबित कर दिया है कि राजनीति में अब केवल विरासत या भावनात्मक अपील नहीं, बल्कि प्रदर्शन, स्थिरता और नेतृत्व की विश्वसनीयता निर्णायक बन चुकी है। फडणवीस, शिंदे की जोड़ी, मोदी - शाह का केंद्रीय समर्थन और मजबूत सांगठनिक ढांचा, इन तीनों के संगम ने महायुति को ऐतिहासिक बढ़त दिलाई है। अब यह जीत केवल सत्ता का आंकड़ा नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों की राजनीति की दिशा तय करने वाला जनादेश है। भला क्यों नहीं? बीएमसी केवल एक नगर निगम नहीं, बल्कि भारत की सबसे ताकतवर शहरी सत्ता संरचना है। इसका सालाना बजट कई भारतीय राज्यों से अधिक है। 

बीएमसी पर नियंत्रण का मतलब है, शहरी विकास की दिशा तय करना, बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर पकड़ और मुंबई जैसे महानगर की प्रशासनिक नब्ज पर हाथ। पिछले दो दशकों तक शिवसेना के लिए बीएमसी सत्ता का आधार रही। यही वह मंच था, जहां से पार्टी ने केवल मुंबई बल्कि पूरे महाराष्ट्र में अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत की। अब यदि महायुति यहां निर्णायक स्थिति में पहुंचती है, तो यह ठाकरे गुट की राजनीति के लिए सबसे बड़ा झटका होगा। 

बीएमसी हाथ से निकलने का अर्थ है, संगठन कमजोर होना, फंडिंग नेटवर्क पर असर और राजनीतिक मनोबल का टूटना। यही वजह है कि इन नतीजों को शिवसेना के पतन के निर्णायक मोड़ के रूप में देखा जा रहा है। महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनावों ने राष्ट्रीय राजनीति को भी एक स्पष्ट संदेश दिया है। यह मुकाबला केवल स्थानीय नहीं रहा, बल्कि इंडि गठबंधन और एनडीए के बीच विश्वास की परीक्षा बन गया। शहरी मतदाता ने स्पष्ट रूप से एनडीए के नेतृत्व, खासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली और विकास मॉडल पर भरोसा जताया है। डबल इंजन सरकार का नारा केवल विधानसभा या लोकसभा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि नगर निगम स्तर तक प्रभावी सिद्ध हुआ। इसके उलट, इंडि गठबंधन यहां बिखरा हुआ नजर आया। तो साझा नेतृत्व का चेहरा था, ही कोई समन्वित एजेंडा। कांग्रेस, एनसीपी और ठाकरे गुट एक-दूसरे के भरोसे खड़े दिखे, लेकिन मतदाता ने किसी को निर्णायक विकल्प नहीं माना। 

राजनीतिक संकेत साफ है, यदि इंडि गठबंधन शहरी भारत में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखना चाहता है, तो उसे नेतृत्व, नैरेटिव और संगठन तीनों मोर्चों पर नए सिरे से सोचना होगा। फिरहाल, इन नतीजों को 2029 के विधानसभा और लोकसभा चुनावों का ट्रेलर कहा जा सकता हैं। शहरी क्षेत्रों में मिली यह बढ़त भाजपा के लिए मनोवैज्ञानिक और रणनीतिक दोनों रूप से बेहद अहम है। देवेंद्र फडणवीस के लिए यह जीत भविष्य के नेतृत्व का रास्ता और साफ करती है, वहीं एकनाथ शिंदे की वैधता को भी जनता की मुहर मिलती दिख रही है। यह गठबंधन यदि अगले तीन वर्षों तक स्थिर रहा, तो 2029 में इसे चुनौती देना विपक्ष के लिए बेहद कठिन होगा। दूसरी ओर, ठाकरे गुट के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा होता दिख रहा है। यदि संगठनात्मक पुनर्गठन और राजनीतिक पुनर्परिभाषा नहीं हुई, तो शहरी महाराष्ट्र में उसकी भूमिका सीमित होती जाएगी। स्पष्ट है कि यह नगर निगम चुनाव केवल स्थानीय सत्ता की लड़ाई नहीं थे, बल्कि उन्होंने महाराष्ट्र ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति के भविष्य की पटकथा भी लिखनी शुरू कर दी है। क्योंकि बीएमसी का महत्व किसी भी राज्य सरकार से कम नहीं आंका जा 

सकता। करीब 60 हजार करोड़ रुपये से अधिक के बजट वाली यह नगर निकाय देश की सबसे अमीर स्थानीय संस्था है। सड़क, जलापूर्ति, स्वास्थ्य, शिक्षा, झुग्गी पुनर्विकास और करोड़ों की इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं का नियंत्रण बीएमसी के हाथ में होता है। पिछले करीब ढाई दशक तक शिवसेना (अविभाजित) ने बीएमसी को अपनी राजनीतिक शक्ति का आधार बनाए रखा। यही वह मंच था, जहां से पार्टी को आर्थिक संसाधन, संगठनात्मक ताकत और मुंबई की राजनीति पर वर्चस्व मिलता रहा। अब इस गढ़ का ढहना ठाकरे राजनीति के लिए सबसे बड़ा झटका माना जा रहा है।

चुनावी नतीजे क्या कहते हैं?

मतगणना के ताज़ा अपडेट के अनुसार, 227 सीटों वाली बीएमसी में महायुति गठबंधन 118 से अधिक सीटों पर बढ़त या जीत दर्ज करता दिख रहा है। विपक्षी गठबंधन, जिसमें उद्धव ठाकरे गुट, कांग्रेस और एनसीपी शामिल हैंकृकरीब 60दृ70 सीटों के बीच सिमटता नजर रहा है। यह अंतर केवल संख्याओं का नहीं है, बल्कि राजनीतिक संदेश का है। शहरी मतदाता ने स्पष्ट कर दिया है कि वह स्थिर सरकार, स्पष्ट नेतृत्व और विकास आधारित राजनीति को तरजीह दे रहा है।

भाजपा की जीत के कारण

1. डबल इंजन सरकार का भरोसा : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार और राज्य में फडणवीसदृशिंदे की सरकार नेडबल इंजनका जो मॉडल पेश किया, उसका असर शहरी मतदाताओं पर साफ दिखा। बुनियादी ढांचे, मेट्रो नेटवर्क, तटीय सड़क, डिजिटल सेवाओं और शहरी आवास योजनाओं ने भाजपा के पक्ष में माहौल बनाया। 2. संगठन की मजबूती : भाजपा का सांगठनिक ढांचा बीएमसी चुनावों में निर्णायक साबित हुआ। बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं की सक्रियता, माइक्रो मैनेजमेंट और डेटा आधारित रणनीति ने पार्टी को बढ़त दिलाई। 3. नेतृत्व की स्पष्टता : देवेंद्र फडणवीस और एकनाथ शिंदे की जोड़ी ने मतदाताओं को स्थिरता का भरोसा दिया। जहां फडणवीस शहरी और मध्यम वर्ग के नेता के रूप में उभरे, वहीं शिंदे ने मराठी अस्मिता और जमीनी राजनीति को साधा।

ठाकरे बंधु और बदली राजनीति

बीएमसी के नतीजों ने उद्धव ठाकरे और आदित्य ठाकरे की राजनीति के भविष्य पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। शिवसेना का जो आधार मुंबई और आसपास के शहरी क्षेत्रों में था, वह तेजी से कमजोर होता दिख रहा है। उद्धव ठाकरे की राजनीति लंबे समय तक भावनात्मक अपील, पारिवारिक विरासत औरमराठी मानूसकी पहचान पर टिकी रही। लेकिन बदलते शहरी मतदाता ने विकास, प्रशासन और नेतृत्व की क्षमता को अधिक महत्व दिया। आदित्य ठाकरे को युवा और आधुनिक नेता के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश जरूर हुई, लेकिन जमीनी संगठन और स्पष्ट राजनीतिक लाइन के अभाव में यह प्रयोग सफल नहीं हो सका।

क्या खत्म हो रही है ठाकरे राजनीति?

यह कहना जल्दबाजी होगी कि ठाकरे राजनीति का पूरी तरह अंत हो गया है, लेकिन इतना तय है कि बीएमसी की हार ने उसकी रीढ़ तोड़ दी है। बिना मुंबई के संसाधनों और सांगठनिक ताकत के शिवसेना (ठाकरे गुट) के लिए राज्यव्यापी राजनीति करना बेहद कठिन होगा। अब ठाकरे गुट के सामने दो ही रास्ते बचते हैंकृया तो वह अपनी राजनीति का पुनर्गठन करे, नए मुद्दों और नए नेतृत्व के साथ मैदान में उतरे, या फिर धीरे-धीरे सीमित प्रभाव वाली पार्टी बनकर रह जाए।  

कंग्रेस - एनसीपी की भूमिका

बीएमसी चुनावों में कांग्रेस और एनसीपी की भूमिका सीमित और कमजोर रही। शहरी महाराष्ट्र में कांग्रेस पहले ही अपना आधार खो चुकी है, जबकि एनसीपी आंतरिक गुटबाजी से जूझ रही है। ठाकरे गुट के साथ गठबंधन भी उन्हें अपेक्षित लाभ नहीं दिला सका।

महाराष्ट्र की राजनीति पर असर

बीएमसी में भाजपा की जीत का असर पूरे महाराष्ट्र पर पड़ेगा। इससे केवल राज्य सरकार की स्थिति मजबूत होगी, बल्कि 2029 के विधानसभा और लोकसभा चुनावों के लिए भी भाजपा को मनोवैज्ञानिक बढ़त मिलेगी। मुंबई जैसे महानगर पर नियंत्रण का मतलब हैकृराजनीतिक नैरेटिव, मीडिया प्रभाव और आर्थिक ताकत पर पकड़। यह भाजपा को राज्य की राजनीति में और मजबूत करेगी।

शहरी भारत का संदेश

बीएमसी चुनावों ने शहरी भारत का मिजाज साफ कर दिया है। मतदाता अब पहचान की राजनीति से आगे बढ़कर प्रदर्शन आधारित राजनीति चाहता है। सड़क, पानी, परिवहन, रोजगार और पारदर्शी प्रशासन उसके लिए प्राथमिक मुद्दे हैं. भाजपा ने इस बदले हुए मिजाज को समझा, जबकि विपक्ष अभी भी पुराने नारों और भावनात्मक अपील में उलझा दिखा। भाजपा और महायुति के लिए यह जीत जितनी बड़ी है, उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी भी। मुंबई की अपेक्षाएं बहुत ऊंची हैं। यदि बीएमसी में पारदर्शी और प्रभावी प्रशासन नहीं दिया गया, तो यह जीत जल्दी ही असंतोष में बदल सकती है। दूसरी ओर, ठाकरे गुट के लिए यह आत्ममंथन का समय है। यदि पार्टी समय रहते संगठन और राजनीति की नई दिशा तय नहीं करती, तो उसका प्रभाव और सिमट सकता है।

मुंबई ने बदल दी सियासत

बीएमसी चुनाव परिणामों ने यह साबित कर दिया है कि महाराष्ट्र की राजनीति एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है। भाजपा की यह जीत केवल संख्या बल नहीं, बल्कि विचार और नेतृत्व की जीत है। वहीं ठाकरे बंधुओं के लिए यह परिणाम चेतावनी है कि राजनीति में विरासत तभी चलती है, जब वह प्रदर्शन से जुड़ी हो। मुंबई ने अपना फैसला सुना दिया है। अब देखना यह है कि यह फैसला महाराष्ट्र और देश की राजनीति को किस दिशा में ले जाता है। इन चुनाव नतीजों ने यह संकेत दे दिया है कि शहरी मतदाता अब पारंपरिक भावनात्मक और क्षेत्रीय राजनीति से आगे निकलकर विकास, स्थिरता और मजबूत नेतृत्व को प्राथमिकता दे रहा है। बीते एक दशक से जिन नगर निकायों पर शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) और कांग्रेसदृएनसीपी का प्रभाव रहा, वहां भाजपा की बढ़त ने पुराने राजनीतिक समीकरणों को तोड़ दिया है। बीएमसी पर लंबे समय से शिवसेना का वर्चस्व रहा है। यह निगम केवल प्रशासनिक इकाई नहीं, बल्कि राजनीतिक ताकत का प्रतीक भी रहा है। यहां से मिलने वाला आर्थिक और सांगठनिक बल किसी भी पार्टी को राज्य की राजनीति में मजबूत स्थिति देता है। ऐसे में बीएमसी में महायुति की बढ़त को उद्धव ठाकरे गुट के लिए सबसे बड़ा झटका माना जा रहा है।

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