सवालों से डरती भीड़, कैमरों पर हमला और लोकतंत्र का घायल चेहरा
असहमति लोकतंत्र की आत्मा
है, लेकिन यदि विरोध की आवाज़ पत्रकारों की आवाज़ दबाने लगे, तो आंदोलन अपने नैतिक
आधार से भटक जाता है
जंतर-मंतर की हालिया घटनाएँ
इसी चिंताजनक सच की गवाही देती हैं
पत्रकार की आवाज़ दबेगी
तो लोकतंत्र की प्रतिध्वनि भी कमजोर पड़ जाएगी; क्योंकि सवालों से भागने वाले समाज
कभी मजबूत लोकतंत्र नहीं बना सकते
सुरेश गांधी
वाराणसी. जंतर-मंतर एक बार फिर देश की लोकतांत्रिक
चेतना का केंद्र बना। हजारों युवाओं की भीड़, हाथों में तख्तियां, व्यवस्था के खिलाफ
नाराजगी, परीक्षा प्रणाली पर सवाल और भविष्य को लेकर बेचैनी—यह
सब लोकतंत्र का स्वाभाविक और स्वीकार्य स्वरूप है। लेकिन जब इसी भीड़ के बीच कैमरा
थामे पत्रकारों को घेरा जाने लगे, उनके साथ धक्का-मुक्की हो, महिला पत्रकारों के साथ
अभद्रता की जाए, कैमरे तोड़ने की कोशिश हो, कपड़े फाड़ दिए जाएं और जान बचाने के लिए
उन्हें पुलिस सुरक्षा में बाहर निकालना पड़े, तब यह केवल एक घटना नहीं रहती; यह लोकतंत्र
के माथे पर लगा एक गहरा प्रश्नचिह्न बन जाती है।
लोकतंत्र चुनाव से बनता है, संविधान से
संचालित होता है, सवालों से मजबूत होता है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जीवित रहता
है। यदि इन्हीं चार स्तंभों में से किसी एक पर हमला होता है तो लोकतंत्र भीतर से कमजोर
होने लगता है। पत्रकारिता उन्हीं स्तंभों में से एक है, जो सत्ता से भी प्रश्न पूछती
है और समाज से भी। इसलिए पत्रकार पर हमला किसी व्यक्ति पर नहीं, बल्कि जनता के जानने
के अधिकार पर हमला है। सरकार से शिकायत है तो खुलकर कीजिए। परीक्षा व्यवस्था पर सवाल
हैं तो पूरे दमखम से उठाइए। पुलिस की कार्रवाई गलत लगती है तो उसका लोकतांत्रिक विरोध
कीजिए। मुख्यधारा की मीडिया से असहमति है तो उसकी कठोर आलोचना कीजिए। लेकिन किसी पत्रकार
को घेर लेना, उसका चश्मा तोड़ देना, कैमरा छीन लेना, उसके कपड़े फाड़ देना या उसकी
गाड़ी पर हमला कर देना—यह विरोध नहीं, यह लोकतंत्र की भाषा नहीं,
बल्कि भीड़तंत्र की हिंसा है।
सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि क्या बोलने
की आज़ादी केवल प्रदर्शनकारियों की है? क्या सवाल पूछने का अधिकार सिर्फ उसी के पास
है जो नारे लगा रहा है? जिस पत्रकार के हाथ में माइक है, क्या उसकी गरिमा और सुरक्षा
अब भीड़ की इच्छा पर निर्भर करेगी? यदि ऐसा है तो यह केवल पत्रकारिता का संकट नहीं,
बल्कि लोकतंत्र के भविष्य का संकट है। इतिहास गवाह है कि हर बड़े जनआंदोलन की विश्वसनीयता
उसकी नैतिक शक्ति से बनती है, हिंसा से नहीं। जब आंदोलन में असामाजिक तत्व प्रवेश कर
जाते हैं तो सबसे पहले आंदोलन का चरित्र बदलता है। वे चाहते हैं कि कैमरा आए, लेकिन
वही दिखाए जो उन्हें पसंद हो। सवाल पूछे जाएं, लेकिन वही जो उनके पक्ष में हों। यह
मानसिकता लोकतंत्र नहीं, वैचारिक तानाशाही की पहचान है।
सच को दबाने की हर कोशिश अंततः सच की
ताकत ही बढ़ाती है। पत्रकार पर हमला कैमरे को कुछ देर के लिए रोक सकता है, लेकिन सच्चाई
की रोशनी को कभी बंद नहीं कर सकता। देश के लाखों छात्र अपने भविष्य के लिए संघर्ष कर
रहे हैं। उनकी पीड़ा वास्तविक है, उनके सवाल भी जायज़ हैं। लेकिन इन्हीं सवालों की
आड़ लेकर यदि कुछ लोग हिंसा का रास्ता चुनते हैं, तो वे सबसे पहले उन्हीं छात्रों के
संघर्ष को कमजोर करते हैं। आंदोलन का नैतिक बल उसकी शालीनता, अनुशासन और लोकतांत्रिक
आचरण में होता है, न कि लाठी, पत्थर और धमकी में। पत्रकार किसी सरकार का प्रवक्ता नहीं
होता और न ही किसी आंदोलन का विरोधी। उसका एकमात्र धर्म है—सच
को समाज के सामने रखना। यदि पत्रकार सवाल पूछना छोड़ देगा तो सत्ता निरंकुश हो जाएगी
और यदि भीड़ सवाल पूछने वालों पर हमला करेगी तो लोकतंत्र भीड़तंत्र में बदल जाएगा।
आज आवश्यकता केवल पत्रकारों की सुरक्षा की नहीं, बल्कि उस लोकतांत्रिक संस्कृति की
रक्षा की है जिसमें असहमति का सम्मान हो, संवाद का स्थान हो और सवाल पूछने वाले हाथों
से माइक छीनने के बजाय उन्हें जवाब दिया जाए। क्योंकि जिस दिन कैमरे खामोश हो जाएंगे,
उस दिन लोकतंत्र भी मौन हो जाएगा।
सिर्फ हंगामा नहीं, समाधान भी चाहिए
परीक्षा व्यवस्था में खामियां हैं तो उन पर सवाल उठाना पूरी तरह लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन जंतर-मंतर पर जिस तरह पत्रकारों पर हमले किए जा रहे हैं, कैमरे तोड़े जा रहे हैं, कपड़े फाड़े जा रहे हैं और महिला पत्रकारों के साथ अभद्र व्यवहार हो रहा है, वह किसी भी परिस्थिति में स्वीकार्य नहीं हो सकता। इससे आंदोलन की नैतिक शक्ति कमजोर होती है और असली मुद्दा पीछे छूट जाता है। यदि व्यवस्था में दोष हैं तो केवल विरोध ही नहीं, उसका ठोस समाधान भी सामने आना चाहिए। विशेषज्ञों द्वारा परीक्षा प्रणाली पर अध्ययन किए गए हैं और कई महत्वपूर्ण सिफारिशें भी दी गई हैं। अब आवश्यकता इस बात की है कि परीक्षा प्रक्रिया को पूरी तरह लीक-प्रूफ, पारदर्शी और जवाबदेह बनाने के लिए स्थायी सुधार लागू किए जाएं। सवाल केवल यह नहीं कि पेपर लीक क्यों होते हैं, बल्कि यह भी है कि भविष्य में उन्हें हमेशा के लिए कैसे रोका जाए। परीक्षा प्रणाली की पूरी "पाइपलाइन"—प्रश्नपत्र तैयार करने से लेकर मुद्रण, परिवहन, सुरक्षा और मूल्यांकन तक—कहां-कहां सुधार की जरूरत है, इस पर गंभीर मंथन होना चाहिए। सिर्फ आंदोलन, नारेबाजी और तोड़फोड़ से समाधान नहीं निकलेगा। इसके लिए संसद में व्यापक बहस, नीति निर्माण और ठोस कानूनों की आवश्यकता है। लोकतंत्र में बदलाव का सबसे प्रभावी रास्ता हिंसा नहीं, बल्कि संवाद, नीति और सुधार है।


