Friday, 6 November 2026

दीयों की लौ में सिर्फ तेल नहीं, पीढ़ियों का अपनापन भी जलता है…

दीयों की लौ में सिर्फ तेल नहीं, पीढ़ियों का अपनापन भी जलता है… 

दीपावली की शाम ढलते ही शहर का चेहरा बदलने लगता है। कहीं चौखट पर सजे दीप मुस्कराते हैं तो कहीं रंगोली के रंग घर के आंगन को उत्सव का निमंत्रण देते हैं। बाजारों की चहल-पहल, मिठाइयों की खुशबू और अपनों के आने की प्रतीक्षा—सब मिलकर ऐसा वातावरण रचते हैं, जिसमें समय कुछ पल के लिए ठहर-सा जाता है। यह वह अवसर है, जब दूरियां सिमटती हैं और पुरानी यादें फिर से दरवाजा खटखटाने लगती हैं। कभी दीपावली का अर्थ नए कपड़ों से अधिक नए रिश्तों की गर्माहट हुआ करता था। घर के बड़े-बुजुर्गों के चरण छूना, पड़ोसियों के यहां मिठाई पहुंचाना, बच्चों का उत्साह और परिवार के साथ बैठकर पकवानों का आनंद लेना—इन छोटी-छोटी परंपराओं में ही पर्व की बड़ी खुशी छिपी रहती थी। आज रोशनी के साधन बदल गए हैं, सजावट के तौर-तरीके बदल गए हैं, लेकिन मन की प्रतीक्षा अब भी वैसी ही है—कोई अपना आए, कोई हाल पूछे, कोई पुरानी बात छेड़े। दीपावली हमें स्मृतियों से जोड़ने वाला उत्सव भी है। जिन आंगनों में कभी दादा-दादी दीये सजाते थे, वहां आज नई पीढ़ी अपने ढंग से त्योहार मना रही है। यही तो परंपरा की खूबसूरती है—रूप बदलता है, लेकिन आत्मीयता का धागा नहीं टूटता। इस बार दीपावली पर घर लौटें, अपनों के पास बैठें और किसी रूठे रिश्ते को मनाने की पहल करें। क्योंकि त्योहार की सबसे अनमोल सजावट सामान से नहीं, अपनों की मौजूदगी से पूरी होती है

सुरेश गांधी

त्योहारों की असली खूबसूरती केवल उनके उल्लास में नहीं, बल्कि उन मूल्यों में छिपी होती है जिन्हें वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे जीवन का हिस्सा बनाते हैं। दीपावली भी ऐसा ही पर्व है। इसके पांच दिनों की परंपराओं को ध्यान से देखें तो यह केवल पूजा-पाठ और उत्सव का क्रम नहीं, बल्कि मनुष्य के आचरण को परखने वाली पांच कसौटियां दिखाई देती हैं। धन का उपयोग कैसा हो, शक्ति का उद्देश्य क्या हो, प्रकृति के प्रति हमारा व्यवहार कैसा रहे, सफलता के बाद हमारा स्वभाव कैसा हो और रिश्तों में सम्मान की जगह कितनी हो—दीपोत्सव इन सभी सवालों के जवाब अपने भीतर समेटे हुए है। धनतेरस से भाई दूज तक का पर्व हमें जीवन के अलग-अलग पक्षों से रूबरू कराता है। इसमें समृद्धि की कामना है, लेकिन धन के मद में डूबने की सीख नहीं; शक्ति की आराधना है, लेकिन उसके दुरुपयोग की छूट नहीं; प्रकृति की पूजा है, लेकिन उसके दोहन का अधिकार नहीं। यही दीपावली का वह सामाजिक दर्शन है, जो इसे महज एक धार्मिक आयोजन से आगे ले जाता है।

शक्ति वही, जो किसी निर्बल का संबल बने

नरक चतुर्दशी और काली चौदस की परंपरा शक्ति के स्वरूप पर विचार करने का अवसर देती है। मां काली का उग्र रूप केवल भय का प्रतीक नहीं, बल्कि अन्याय और आसुरी प्रवृत्तियों के प्रतिरोध का संदेश भी माना जाता है। शक्ति का अर्थ किसी पर प्रभुत्व जमाना नहीं, बल्कि कमजोर की रक्षा करना है। जिस सामर्थ्य से किसी की सुरक्षा हो, वही सार्थक है; जो किसी को भयभीत करे, वह शक्ति नहीं, अहंकार है। आज के सामाजिक संदर्भ में इस संदेश का अर्थ और व्यापक हो जाता है। महिलाओं की सुरक्षा, उनके सम्मान और आत्मनिर्भरता की बात केवल नारों से पूरी नहीं होगी। समाज को अपनी सोच और व्यवहार में भी बदलाव लाना होगा। परिवार से लेकर सार्वजनिक जीवन तक महिलाओं को समान अवसर, निर्णय की स्वतंत्रता और सम्मान देना ही शक्ति-पूजा की वास्तविक भावना के अनुरूप है। देवी की आराधना तभी सार्थक होगी, जब समाज स्त्री के आत्मसम्मान को भी उतना ही महत्व देगा।

गोवर्धन पूजा : प्रकृति के प्रति मनुष्य का ऋण

गोवर्धन पूजा का प्रसंग प्रकृति के साथ मनुष्य के संबंध को समझने की अनूठी दृष्टि देता है। परंपरा के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाकर प्रकृति और सामूहिक संरक्षण के महत्व को सामने रखा। इस प्रसंग का एक गहरा अर्थ यह भी है कि मनुष्य का जीवन केवल अपनी क्षमता और उपलब्धियों पर निर्भर नहीं है। वह जल, जंगल, जमीन, पशु-पक्षियों और पर्यावरण की अनगिनत देन पर टिका है। आज जब नदियां प्रदूषण, जंगल कटान और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों से जूझ रहे हैं, तब गोवर्धन पूजा का संदेश और प्रासंगिक हो जाता है। पर्वत, वृक्ष, नदियां और पशुधन केवल संसाधन नहीं, जीवन-व्यवस्था के आधार हैं। उनकी रक्षा करना किसी एक दिन की धार्मिक गतिविधि नहीं, बल्कि रोजमर्रा के व्यवहार का हिस्सा होना चाहिए। प्लास्टिक का कम इस्तेमाल, जल संरक्षण, पौधारोपण और पशुओं के प्रति संवेदना—ये छोटे कदम भी प्रकृति के प्रति हमारी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।

बलि प्रतिपदा : पराजय में भी बचा रह सकता है बड़प्पन

गोवर्धन पूजा के साथ कई क्षेत्रों में बलि प्रतिपदा की परंपरा भी जुड़ी है। राजा बलि का प्रसंग दान, वचन और समर्पण की स्मृति जगाता है। लोकमान्यता में उन्हें परोपकार और उदारता के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है। इस प्रसंग का एक महत्वपूर्ण संकेत यह है कि किसी व्यक्ति का मूल्यांकन केवल उसकी सत्ता, पद या विजय से नहीं किया जाना चाहिए। उसका आचरण और उदारता भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। जीवन में हर व्यक्ति हमेशा विजेता नहीं होता। कभी परिस्थितियां प्रतिकूल होती हैं, कभी निर्णय हमारे पक्ष में नहीं आते। लेकिन हार या विरोध के क्षणों में भी यदि मनुष्य अपना बड़प्पन, उदारता और वचन की गरिमा बनाए रखे, तो उसका व्यक्तित्व छोटा नहीं होता। बलि प्रतिपदा इसी मानवीय गुण की याद दिलाती है—वास्तविक ऊंचाई दूसरों को छोटा करने में नहीं, अपने व्यवहार को बड़ा बनाने में है।

भाई दूज : रिश्तों में अधिकार से पहले सम्मान

दीपोत्सव का अंतिम पड़ाव भाई दूज है। यह पर्व भाई-बहन के स्नेह का प्रतीक माना जाता है। बहन का तिलक और भाई की मंगलकामना के पीछे केवल पारिवारिक परंपरा नहीं, बल्कि एक-दूसरे के सुख, सुरक्षा और सम्मान की कामना छिपी है। बदलते समय में इस पर्व का संदेश और विस्तार मांगता है। बहन की रक्षा का अर्थ केवल उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी लेना नहीं, बल्कि उसके निर्णयों, सपनों और स्वतंत्रता का सम्मान करना भी है। रिश्ते अधिकार से नहीं, विश्वास से मजबूत होते हैं। भाई-बहन का संबंध तभी सुंदर बनता है, जब उसमें स्नेह के साथ समानता भी हो। बहन को केवल संरक्षण की पात्र मानने के बजाय परिवार के बराबर अधिकार और अवसर देना इस पर्व की भावना को अधिक अर्थपूर्ण बनाता है। यही बात परिवार के हर रिश्ते पर लागू होती है—जहां सम्मान है, वहीं आत्मीयता टिकती है।

उत्सव के बाद भी जीवित रहें ये मूल्य

दीपावली की परंपराएं हमें याद दिलाती हैं कि समृद्धि का आनंद तभी है, जब उसमें उदारता हो; शक्ति का गौरव तभी है, जब उसमें करुणा हो; पूजा तभी सार्थक है, जब उसमें प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी हो और रिश्ते तभी मजबूत हैं, जब उनमें बराबरी और सम्मान हो। हम अक्सर त्योहारों को कुछ दिनों के उत्सव तक सीमित कर देते हैं। पूजा समाप्त होते ही संकल्प भी पीछे छूट जाते हैं। जबकि किसी पर्व की वास्तविक सफलता इस बात से तय होती है कि उसके मूल्य हमारे व्यवहार में कितने समय तक बने रहते हैं। दीपावली का सामाजिक संदेश यही है कि उत्सव की रोशनी कैलेंडर की तारीख के साथ समाप्त न हो। वह हमारे फैसलों, संबंधों और सार्वजनिक जीवन में भी दिखाई दे। इस बार दीप जलाते समय यह भी सोचें कि हमारी शक्ति किसी निर्बल के काम आ रही है या नहीं, हमारा विकास प्रकृति को कितना सुरक्षित रख रहा है और हमारे रिश्तों में सम्मान कितना है। यदि इन सवालों के जवाब सकारात्मक होने लगें, तो समझिए दीपावली का प्रकाश घरों की चौखट पार कर समाज के जीवन में उतरने लगा है।

दीपावली : शब्द में ही छिपा है उत्सव का अर्थ

‘दीपावली’ दो शब्दों से मिलकर बना है—‘दीप’ और ‘आवली’। दीप यानी प्रकाश और आवली यानी पंक्ति या श्रृंखला। इस तरह दीपावली का शाब्दिक अर्थ हुआ—दीपों की पंक्ति। लेकिन इस शब्द का सांस्कृतिक अर्थ इससे कहीं व्यापक है। एक दीप से दूसरा दीप जलता है, फिर तीसरा और देखते ही देखते अंधकार के बीच प्रकाश की श्रृंखला बन जाती है। यही भारतीय जीवन-दृष्टि भी है—ज्ञान बांटने से घटता नहीं, बल्कि बढ़ता है। एक व्यक्ति की सकारात्मक सोच दूसरे को प्रेरित करती है और धीरे-धीरे समाज में बदलाव की लौ जगाती है।

दीपावली : आस्था की अलग-अलग परंपराएं

दीपावली का उत्सव अलग-अलग समुदायों और परंपराओं में विशिष्ट अर्थ रखता है। जैन परंपरा में कार्तिक अमावस्या भगवान महावीर के निर्वाण दिवस के रूप में स्मरण की जाती है। वहीं सिख परंपरा में इसी अवसर पर बंदी छोड़ दिवस मनाया जाता है। यह दिन गुरु हरगोबिंद साहिब की ग्वालियर किले से मुक्ति और उनके साथ अन्य राजाओं की रिहाई की स्मृति से जुड़ा है। अलग-अलग ऐतिहासिक और धार्मिक संदर्भों के बावजूद इन परंपराओं में स्वतंत्रता, आत्मिक उन्नति और शुभता का भाव प्रमुख है। यही विविधता भारतीय संस्कृति की खूबसूरती है। दीपावली दो शब्दों 'दीप' और 'आवली' से मिलकर बना है, जिसका अर्थ होता है "दीपों की श्रृंखला" या "पंक्ति"। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीराम 14 वर्ष का वनवास पूरा कर और रावण पर विजय प्राप्त कर इसी दिन अयोध्या वापस लौटे थे। श्रीराम के आगमन पर अयोध्यावासियों ने पूरी नगरी को घी के दीये जलाकर रोशन किया था, तभी से हर साल यह त्योहार परंपरा के अनुसार मनाया जाता है। दिवाली की शाम को धन की देवी मां लक्ष्मी और बुद्धि के देवता भगवान श्री गणेश की विशेष पूजा की जाती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार कार्तिक अमावस्या के दिन ही देवताओं और असुरों द्वारा किए गए समुद्र मंथन से माता लक्ष्मी प्रकट हुई थीं। जैन धर्म में इस दिन को भगवान महावीर स्वामी के मोक्ष (निर्वाण) दिवस के रूप में मनाया जाता है। सिख इतिहास में इस दिन को छठे गुरु, गुरु हरगोविंद साहिब जी के ग्वालियर किले से 52 राजाओं संग रिहा होने की खुशी में 'बंदी छोड़ दिवस' के रूप में मनाया जाता है। यह त्योहार हमें सिखाता है कि सत्य, ज्ञान और अच्छाई का प्रकाश हमेशा अज्ञानता व बुराई के अंधकार को मिटा देता है। व्यापारी इस दिन से नए बही-खाते और वित्तीय वर्ष की शुरुआत करते हैं। नेपाल में दिवाली को 'तिहार' या 'स्वंती' कहा जाता है। यहां पांच दिनों तक चलने वाले इस पर्व में कौए, कुत्ते, गाय और बैल की भी पूजा की जाती है। पारंपरिक रूप से सरसों के तेल से जलाए जाने वाले मिट्टी के दीये कीट-पतंगों को आकर्षित कर खत्म करते हैं और पर्यावरण को शुद्ध करने में मदद करते हैं। भारत के अलावा नेपाल, मॉरीशस, फिजी, गुयाना, सूरीनाम, त्रिनिदाद और टोबैगो, श्रीलंका, सिंगापुर और मलेशिया में भी दिवाली पर आधिकारिक सरकारी छुट्टी होती है।दीवाली केवल दिए जलाने और पटाखों का त्योहार नहीं है, बल्कि यह हमारे भीतर के अंधकार, अज्ञानता, स्वार्थ और बुराई को मिटाकर ज्ञान, प्रेम और भाईचारे का प्रकाश फैलाने का प्रतीक है। यह पर्व हमें सिखाता है कि सत्य और अच्छाई की हमेशा विजय होती है। आइए इस दिवाली हम अपने समाज को अधिक रोशन, हरित और सहिष्णु बनाने का संकल्प लें।

दीयों की लौ में सिर्फ तेल नहीं, पीढ़ियों का अपनापन भी जलता है…

दीयों की लौ में सिर्फ तेल नहीं, पीढ़ियों का अपनापन भी जलता है…  दीपावली की शाम ढलते ही शहर का चेहरा बदलने लगता है। कहीं चौखट पर सजे दीप मु...