Sunday, 11 January 2026

गोपेश पांडेय के निधन से काशी का पत्रकार जगत शोकाकुल

गोपेश पांडेय के निधन से काशी का पत्रकार जगत शोकाकुल

काशी पत्रकार संघ के पूर्व अध्यक्ष रहे वरिष्ठ पत्रकार के अवसान पर पत्रकारों से लेकर राजनीतिक जगत तक श्रद्धांजलि, कहाउनका योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता

सुरेश गांधी



वाराणसी।
काशी पत्रकार संघ के पूर्व अध्यक्ष एवं मानद सदस्य, वरिष्ठ पत्रकार गोपेश पांडेय के निधन से काशी ही नहीं, बल्कि संपूर्ण पूर्वांचल का पत्रकारिता जगत गहरे शोक में डूब गया है। निष्पक्ष, निर्भीक और मूल्यनिष्ठ पत्रकारिता के लिए पहचाने जाने वाले गोपेश पांडेय के अवसान को पत्रकारिता की अपूरणीय क्षति बताया जा रहा है। उनके निधन की खबर मिलते ही पत्रकारों, सामाजिक संगठनों और राजनीतिक दलों में शोक की लहर दौड़ गई। घर-घर से लेकर सोशल मीडिया तक उन्हें याद कर श्रद्धांजलि दी जा रही है। 

गोपेश पांडेय ने अपने लंबे पत्रकारिता जीवन में कई प्रतिष्ठित समाचार पत्रों और मीडिया संस्थानों में सेवाएं दीं। उन्होंने समाचार को सिर्फ सूचना नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने का माध्यम माना। सच्चाई के पक्ष में खड़े रहना, सत्ता और व्यवस्था से सवाल पूछना तथा आम जन की आवाज़ को प्रमुखता से उठाना उनकी पत्रकारिता की पहचान रही। काशी पत्रकार संघ के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने संगठन को मजबूती दी और पत्रकारों के हितों की लड़ाई को मर्यादित, लेकिन दृढ़ स्वर में आगे बढ़ाया। 

उनके निधन पर भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने भी गहरा शोक व्यक्त किया है। भाजपा काशी क्षेत्र अध्यक्ष दिलीप पटेल, जिलाध्यक्ष एवं विधान परिषद सदस्य हंसराज विश्वकर्मा, महानगर अध्यक्ष प्रदीप अग्रहरि और क्षेत्रीय मीडिया प्रभारी नवरतन राठी सहित कई नेताओं ने संयुक्त शोक संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि गोपेश पांडेय का जाना पत्रकारिता जगत के लिए अपूरणीय क्षति है। नेताओं ने कहा कि उन्होंने अपने जीवन में निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता के माध्यम से समाज को जागरूक करने का कार्य किया, जिसे भुलाया नहीं जा सकता। पत्रकार साथियों ने उन्हें एक ऐसे मार्गदर्शक के रूप में याद किया, जिन्होंने नई पीढ़ी को पत्रकारिता के मूल्यों से परिचित कराया। उनका सादा जीवन, स्पष्ट विचार और निर्भीक लेखनी हमेशा प्रेरणा देती रहेगी। कई वरिष्ठ पत्रकारों ने कहा कि गोपेश पांडेय जैसे लोग पत्रकारिता के स्तंभ होते हैं, जिनके जाने से एक खालीपन पैदा हो जाता है, जिसकी भरपाई आसान नहीं।

सोशल मीडिया पर भी उन्हें श्रद्धांजलि देने वालों का तांता लगा रहा। फेसबुक, व्हाट्सएप और एक्स जैसे मंचों पर उनके साथियों और शिष्यों ने पुरानी तस्वीरें और संस्मरण साझा कर उन्हें याद किया। सभी ने एक स्वर में कहा कि गोपेश पांडेय का योगदान काशी की पत्रकारिता के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज रहेगा। भाजपा नेताओं एवं पत्रकार संगठनों ने ईश्वर से प्रार्थना की कि दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करें और शोकाकुल परिजनों को इस असहनीय दुःख को सहने की शक्ति दें। निस्संदेह, गोपेश पांडेय की कलम भले ही शांत हो गई हो, लेकिन उनके विचार, मूल्य और योगदान पत्रकारिता की पीढ़ियों को हमेशा मार्गदर्शन देते रहेंगे।

स्मैश से स्वप्न तक : काशी के कोर्ट पर उगा पूर्वांचल के युवाओं का भविष्य

स्मैश से स्वप्न तक : काशी के कोर्ट पर उगा पूर्वांचल के युवाओं का भविष्य 

काशी, जहाँ शंखनाद से दिन का आरंभ होता है और आरती की लौ पर रात विश्राम पाती है, वहीं अब स्मैश की गूंज भी स्थायी स्मृति बन चुकी है। सिगरा स्टेडियम के इंडोर कोर्ट पर संपन्न 72वीं सीनियर नेशनल वॉलीबॉल चैंपियनशिप केवल एक खेल आयोजन नहीं रही; यह उत्तर प्रदेश, पूर्वांचल और विशेषकर प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी के लिए भविष्य की नींव साबित हुई। 35 वर्षों बाद यूपी को मिली राष्ट्रीय मेजबानी और पहली बार बनारस में हुए इस महोत्सव ने यह स्पष्ट कर दिया कि काशी अब आध्यात्मिक राजधानी के साथ-साथ खेल चेतना की भी राजधानी बनने की ओर अग्रसर है। यह आयोजन उस समयबोध का प्रतीक है जब खेल को मनोरंजन नहीं, राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया के रूप में देखा जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी केखेलो इंडियासंकल्प और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खेल-अवसंरचना केंद्रित विकास मॉडल ने जिस धरातल को तैयार किया, उस पर सिगरा स्टेडियम का यह राष्ट्रीय आयोजन आत्मविश्वास का पर्व बनकर उभरा

सुरेश गांधी

काशी की पहचान सहस्राब्दियों पुरानी है, यहाँ ज्ञान बहता है, संस्कार फलते हैं। पर खेल? लंबे समय तक खेल को यहाँ प्रतिभा तो मिली, मंच नहीं। गलियों में खेलते बच्चे थे, सपने थे, पर संसाधन सीमित। 72वीं सीनियर नेशनल वॉलीबॉल चैंपियनशिप ने इस ऐतिहासिक असंतुलन को तोड़ा। राष्ट्रीय मंच काशी आया, और काशी ने उसे भव्य अनुशासन, अतिथि-सत्कार और खेल-संस्कृति के साथ अपनाया। डॉ संपूर्णानंद स्टेडियम, सिगरा वाराणसी के फुल-हाउस फाइनल, तालियों की गड़गड़ाहट, और आठ दिनों तक चले सौ से अधिक मुकाबले, इन सबने यह प्रमाणित किया कि पूर्वांचल में खेल का दर्शक, संस्कार और संवेदना, तीनों मौजूद हैं। यह सिर्फ आयोजन नहीं, आत्म-स्वीकृति थी, कि हम तैयार हैं।

प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में यह आयोजन प्रतीकात्मक नहीं, नीतिगत है। जब शीर्ष नेतृत्व किसी क्षेत्र में खेल को प्राथमिकता देता है, तो संदेश स्पष्ट होता है, युवा ही भविष्य हैं। वर्चुअल उद्घाटन से लेकर मुख्यमंत्री की भौतिक उपस्थिति तक, शासन-प्रशासन की सक्रिय भागीदारी ने यह बताया कि खेल अब हाशिए पर नहीं, मुख्यधारा की नीति है। इस आयोजन ने काशी मॉडल प्रस्तुत किया, जहाँ नगर निगम, राज्य संघ, प्रशासन, स्वयंसेवक और समाज एक साथ खड़े दिखे। होटल, परिवहन, भोजन, चिकित्सा, सुरक्षा, हर स्तर पर व्यावसायिकता और संवेदनशीलता का संतुलन दिखा। यही वह मॉडल है जिसे पूर्वांचल के अन्य जिलों मिर्ज़ापुर, भदोही, जौनपुर, चंदौली, आज़मगढ़ में दोहराया जा सकता है।

खासकर किसी भी राष्ट्रीय आयोजन का सबसे बड़ा लाभ स्थानीय युवाओं को मिलता है। जब देश के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी सामने खेलते हैं, तो सपने यथार्थ बनते हैं। इस चैंपियनशिप ने यूपी और पूर्वांचल के खिलाड़ियों को यह एहसास कराया कि राष्ट्रीय स्तर दूर नहीं, बस तैयारी चाहिए। कोचिंग, स्काउटिंग, चयनकर्ता, रेफरी, सब एक ही छत के नीचे। यह दृश्य युवा खिलाड़ियों के लिए जीवंत कक्षा था। तकनीक, रणनीति, फिटनेस, मानसिक मजबूतीकृसब कुछ सीखने को मिला। खेल का यह प्रत्यक्ष पाठ किसी पाठ्यक्रम से बड़ा होता है। खेल आयोजन केवल पदक नहीं, अर्थव्यवस्था भी गढ़ते हैं। होटल बुकिंग, परिवहन, स्थानीय व्यवसाय, पर्यटन, सबको गति मिली। गंगा दर्शन, क्रूज, सांस्कृतिक अनुभव, मेहमान खिलाड़ियों ने काशी को खेल-पर्यटन के नक्शे पर देखा। यह वह बिंदु है जहाँ आस्था और अर्थ एक-दूसरे के पूरक बनते हैं।

महिला वर्ग का रोमांचक फाइनल, केरल बनाम रेलवे, सिर्फ खेल नहीं, सामाजिक संदेश था। अनुशासन, आक्रामकता और रणनीति के साथ खेलती महिलाएँ यह बताती हैं कि समान अवसर मिलें तो परिणाम असाधारण होते हैं। पूर्वांचल की बेटियों के लिए यह दृश्य प्रेरणा का दीप है कि मैदान भी उनका है, मंच भी। पुरुष वर्ग में रेलवे की संगठित रफ्तार और महिला वर्ग में केरल की सामूहिक जिद, दोनों ने उत्कृष्टता के मानक स्थापित किए। यह संदेश यूपी के खेल तंत्र के लिए स्पष्ट है, प्रतिभा के साथ संरचना जरूरी है। अकादमी, नियमित प्रतियोगिताएँ, खेल विज्ञान, इन पर निवेश ही अगली छलांग है।

सिगरा स्टेडियम का अनुभव बताता है कि सुविधा प्रेरणा बनती है। अच्छी लाइटिंग, फ्लोर, दर्शक व्यवस्था, इनसे खिलाड़ी बेहतर खेलते हैं और दर्शक जुड़ते हैं। अब आवश्यकता है कि जिला स्तर पर मिनी इंडोर हॉल, ब्लॉक स्तर पर खेल मैदान, और विद्यालयों में प्रशिक्षित कोच उपलब्ध हों। काशी ने रास्ता दिखाया है, अब प्रदेश को गति देनी है। इस आयोजन की सफलता का रहस्य सामूहिकता है। स्वयंसेवकों की ऊर्जा, अधिकारियों की तत्परता, जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी, सबने मिलकर यह सिद्ध किया कि जब उद्देश्य स्पष्ट हो, तो परिणाम भव्य होते हैं। यह गवर्नेंस का खेल मॉडल हैकृजहाँ समन्वय जीतता है।

वार्षिक राष्ट्रीय/अंतरराज्यीय कैलेंडर, काशी को नियमित खेल गंतव्य बनाना। खेल अकादमी नेटवर्क, वॉलीबॉल के साथ एथलेटिक्स, कुश्ती, बैडमिंटन।स्कॉलरशिप और स्पोर्ट्स जॉब लिंक, युवाओं को करियर सुरक्षा। महिला खेल विशेष पैकेज, कोचिंग, पोषण, मानसिक प्रशिक्षण। खेल-पर्यटन ब्रांडिंगकृकाशी स्पोर्ट्स वीक/फेस्टिवल। मतलब साफ है 72वीं सीनियर नेशनल वॉलीबॉल चैंपियनशिप ने यह सिद्ध कर दिया कि काशी केवल अतीत नहीं, भविष्य भी है। यह आयोजन स्मैश और ब्लॉक से आगे जाकर स्वप्न और संकल्प का उत्सव बना। प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र से उठी यह खेल-चेतना यदि निरंतरता पाए, तो वह दिन दूर नहीं जब पूर्वांचल के युवा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर परचम लहराएँगे। काशी ने पहली मेजबानी में इतिहास रचा है। अब समय है कि इस इतिहास को परंपरा बनाया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ कह सकें : “यहाँ मंत्र भी गूंजते हैं और मेडल भी।

काशी की मिट्टी ने सदियों से संत, शास्त्र और संस्कृति को जन्म दिया है, लेकिन इस बार इसी धरती ने सपनों को उड़ान दी। सिगरा स्टेडियम के इंडोर कोर्ट से उठती स्मैश की गूंज ने यह साफ कर दिया कि प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में अब केवल विरासत ही नहीं, भविष्य भी आकार ले रहा है। 35 वर्षों बाद उत्तर प्रदेश और पहली बार बनारस में आयोजित 72वीं सीनियर नेशनल वॉलीबॉल चैंपियनशिप ने पूर्वांचल को वह राष्ट्रीय मंच दिया, जिसकी कमी ने अब तक यहां की प्रतिभा को सीमित कर रखा था। यह आयोजन एक खेल प्रतियोगिता नहीं, बल्कि युवा आत्मविश्वास, सामाजिक परिवर्तन और काशी के नवगौरव का उद्घोष बन गया। यह आयोजन बताता है कि काशी अब अतीत की विरासत ही नहीं, भविष्य की संभावनाओं की भी भूमि है।

करीब 35 वर्षों बाद उत्तर प्रदेश को राष्ट्रीय स्तर की सीनियर नेशनल वॉलीबॉल चैंपियनशिप की मेजबानी मिली और पहली बार यह अवसर बनारस को प्राप्त हुआ। प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में हुए इस आयोजन ने एक स्पष्ट संदेश दियाखेल अब हाशिए पर नहीं, विकास की मुख्यधारा में है। यह संदेश सिर्फ खिलाड़ियों तक सीमित नहीं, बल्कि उन लाखों युवाओं तक पहुंचा है जो संसाधनों के अभाव में अपने सपनों को मन ही मन दबा देते थे।

खेल से आत्मविश्वास, आत्मविश्वास से भविष्य

पूर्वांचल लंबे समय तक प्रतिभा के बावजूद मंच के अभाव से जूझता रहा। गांव-देहात और कस्बों में खेलते बच्चे, सीमित संसाधनों में अभ्यास करते युवाइन सबके भीतर क्षमता थी, पर अवसर नहीं। काशी में आयोजित राष्ट्रीय प्रतियोगिता ने इस दूरी को पाटने का काम किया। जब देश के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी एक ही कोर्ट पर खेलते दिखे, तो स्थानीय युवाओं के लिए यह सिर्फ मुकाबला नहीं, सपनों का सजीव पाठ था। यह आयोजन बताता है कि खेल केवल पदक या ट्रॉफी तक सीमित नहीं होते। खेल अनुशासन सिखाता है, टीमवर्क गढ़ता है और हारजीत से ऊपर उठकर संघर्ष की ताकत देता है। यही गुण किसी भी समाज को आगे ले जाते हैं। पूर्वांचल के युवाओं के लिए यह संदेश बेहद अहम है, जहां रोजगार और अवसर की तलाश अक्सर महानगरों की ओर पलायन कराती रही है। खेल इस प्रवृत्ति को रोकने का एक सशक्त माध्यम बन सकता है।

प्रधानमंत्री का क्षेत्र, राष्ट्रीय प्रतीक

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र में इस आयोजन का होना महज संयोग नहीं है। यह उस नीतिगत सोच का परिणाम है, जिसमें खेल को राष्ट्र निर्माण का माध्यम माना गया है।खेलो इंडियाजैसी पहल और राज्य सरकार द्वारा खेल अवसंरचना पर किया जा रहा निवेश अब धरातल पर दिखने लगा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मौजूदगी ने खिलाड़ियों का मनोबल बढ़ाया और यह भरोसा दिया कि शासन खेल प्रतिभाओं के साथ खड़ा है। काशी में इस सफल आयोजन ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि यदि प्रशासन, स्थानीय निकाय और समाज मिलकर कामि कोशिश करें, तो पूर्वांचल जैसे क्षेत्र भी राष्ट्रीय आयोजनों के लिए पूरी तरह सक्षम हैं। सिगरा स्टेडियम का फुल हाउस रहना यह दर्शाता है कि यहां खेल देखनेसमझने वाला दर्शक वर्ग मौजूद है।

महिला खेल और सामाजिक संदेश

महिला वर्ग के फाइनल मुकाबले ने विशेष संदेश दिया। केरल और रेलवे की खिलाड़ियों ने जिस आत्मविश्वास और आक्रामकता के साथ खेल दिखाया, वह महिला सशक्तिकरण का जीवंत उदाहरण था। यह दृश्य पूर्वांचल की बेटियों के लिए प्रेरणा हैकि मैदान भी उनका है और मंच भी। जब समाज महिलाओं को समान अवसर देता है, तो परिणाम राष्ट्रीय गौरव में बदलते हैं।

खेल और अर्थव्यवस्था का संबंध

राष्ट्रीय आयोजन ने काशी की स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी गति दी। होटल, परिवहन, छोटे व्यवसाय, पर्यटनसभी को लाभ मिला। गंगा दर्शन, सांस्कृतिक भ्रमण और स्थानीय व्यंजनों से परिचय ने यह साबित किया कि खेल और पर्यटन एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं। यदि ऐसे आयोजन नियमित हों, तो काशी पूर्वांचल का खेलपर्यटन केंद्र बन सकती है।

आगे की राह

यह आयोजन एक शुरुआत है, मंज़िल नहीं। अब आवश्यकता है कि जिला और ब्लॉक स्तर पर खेल सुविधाओं का विस्तार हो, स्कूलकॉलेजों में प्रशिक्षित कोच और नियमित प्रतियोगिताएं हों, खेल को करियर से जोड़ा जाए ताकि प्रतिभा आर्थिक असुरक्षा के डर से पीछे हटे। पूर्वांचल की धरती पर राष्ट्रीय खेल चेतना का उदय यह संकेत है कि बदलाव की लहर चल पड़ी है। काशी ने पहली मेजबानी में यह साबित कर दिया कि वह केवल परंपरा की वाहक नहीं, भविष्य की निर्माता भी है। यदि यह सिलसिला निरंतर चला, तो वह दिन दूर नहीं जब पूर्वांचल के युवा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रदेश और देश का नाम रोशन करेंगे। खेल के इस नवजागरण ने काशी को नया गौरव दिया हैऔर उत्तर प्रदेश को नया

गोपेश पांडेय के निधन से काशी का पत्रकार जगत शोकाकुल

गोपेश पांडेय के निधन से काशी का पत्रकार जगत शोकाकुल काशी पत्रकार संघ के पूर्व अध्यक्ष रहे वरिष्ठ पत्रकार के अवसान पर ...