जब गुंडों की जुबान कानून और खाकी उनका हथियार बन गई थी… आज मिट्टी में मिल गए…!
उत्तर प्रदेश की सियासत बदलती रही, सरकारें आती-जाती रहीं, लेकिन अपराध का चेहरा बदलने के साथ उसका भय कई बार वही दिखाई दिया—आम आदमी के सामने खाकी, खाकी के पीछे सत्ता और सत्ता के साये में बेखौफ अपराधी। यह कोई सुनी-सुनाई कहानी नहीं है। उस दौर को अपनी आंखों से देखने और उसकी खबरें लिखने वाले पत्रकार के रूप में मैंने वह समय देखा है, जब अखबारों के फ्रंट पेज पर एक-दो नहीं, कई-कई हत्याओं की खबरें रोजमर्रा की बात लगने लगी थीं। अपहरण माफियाओं के लिए कारोबार बन गया था और रंगदारी ने कारोबारियों की नींद छीन ली थी। सबसे भयावह दौर वह था, जब सच लिखना भी जोखिम बन गया था। पत्रकारों पर हमले हुए, घर-गृहस्थियां उजाड़ी गईं और कई मामलों में कलम को खामोश कराने के लिए अपराध की सारी हदें पार कर दी गईं। थानों में फरियादी कानून की तलाश में जाता था, लेकिन कई जगह उसे यह तय नहीं होता था कि सामने पुलिस है या किसी दबंग का प्रतिनिधि। फर्जी मुकदमे, मनमानी गिरफ्तारी और राजनीतिक संरक्षण के आरोपों ने कानून के भरोसे को भीतर तक चोट पहुंचाई। उस समय के सरकारी आंकड़े भी अपराध की भयावह तस्वीर दिखाते थे। 2013 के शुरुआती तीन महीनों में बलात्कार के 1,199 मुकदमों के मुकाबले अगले साल इसी अवधि में 1,284 मामले दर्ज हुए। शुरुआती पांच महीनों में हत्या के मामले भी 1,961 से बढ़कर 2,057 पहुंच गए। सवाल सिर्फ तब का नहीं है। सवाल यह है—क्या यूपी ने उस दौर से सचमुच सबक लिया, या अपराध की वही परछाईं आज भी सत्ता, खाकी और आम आदमी के बीच खड़ी है? जवाब जनता को देना है, लेकिन जिस तरह वन डिस्ट्रिक्ट वन माफिया पर ब्रेक लगा है, वो जरुर सुकून देने वाला है…
सुरेश गांधी
उत्तर प्रदेश को मैंने दो
अलग-अलग दौरों में
देखा है। एक दौर
वह था जब अपराध
की खबर लिखना भी
किसी जोखिम से कम नहीं
था और दूसरा वह,
जिसमें कानून-व्यवस्था को लेकर सरकारें
अपराधियों के खिलाफ कठोर
कार्रवाई का दावा करती
हैं। इन दोनों दौरों
की तुलना केवल राजनीतिक चश्मे
से नहीं, बल्कि उस पत्रकार की
आंखों से होनी चाहिए
जिसने अपराध को कागज पर
नहीं, जमीन पर देखा
है। एक समय था
जब उत्तर प्रदेश की सुबह अखबारों
के पहले पन्ने पर
हत्या, लूट, अपहरण, रंगदारी
और बलात्कार की खबरों से
होती थी। ऐसा कोई
दिन याद करना मुश्किल
है जब फ्रंट पेज
पर आठ-दस हत्या
की खबरें न हों। अपहरण
मानो अपराधियों का उद्योग बन
गया था और रंगदारी
उनका नियमित कारोबार। थाने की चौखट
आम आदमी के लिए
न्याय का दरवाजा कम
और दबंग की पहुंच
का केंद्र ज्यादा दिखाई देती थी। आरोप
यह भी लगते थे
कि कई स्थानों पर
पुलिस पर राजनीतिक दबाव
इतना प्रभावी था कि अपराधी
की पहचान उसके अपराध से
नहीं, उसकी राजनीतिक पहुंच
से होती थी। मतलब साफ है एक दौर ऐसा
भी था जब यूपी
में अपराध खबर नहीं, रोज
की सुर्खी था—पत्रकार सच
लिखे तो घर उजड़ने
और जान जाने का
खतरा; आज उसी उत्तर
प्रदेश में कानून के
इकबाल की नई कसौटी
सामने है.
पत्रकारिता भी तब आसान नहीं थी
उस दौर को
याद करते हुए सबसे
कड़वी स्मृतियां पत्रकारों से जुड़ी हैं।
सच लिखने वालों को धमकियां मिलना,
मुकदमों में फंसाने का
भय, घर-परिवार को
निशाना बनाने की कोशिशें—ये
सब पत्रकारिता के सामने खड़ी
वास्तविक चुनौतियां थीं। जागेंद्र सिंह
जैसे पत्रकार की हत्या ने
पूरे देश को झकझोर
दिया था। ऐसे मामलों
ने यह सवाल खड़ा
किया था कि यदि
कलम सच लिखने से
डरने लगेगी तो लोकतंत्र में
सत्ता और अपराध के
गठजोड़ का पर्दाफाश कौन
करेगा? मैं स्वयं उस
दौर का गवाह हूं।
इसलिए यह बात किसी
राजनीतिक भाषण से नहीं,
पत्रकारिता के मैदान में
बिताए वर्षों के अनुभव से
कह रहा हूं।
जब इंस्पेक्टर की कुर्सी ही डर का प्रतीक बन जाए
उस समय सबसे
भयावह बात सिर्फ अपराधियों
का दुस्साहस नहीं था। चिंता
यह थी कि आम
आदमी के मन में
पुलिस के प्रति भरोसा
भी कमजोर पड़ रहा था।
कई जगहों पर ऐसी शिकायतें
सामने आती थीं कि
थाने में जाने से
पहले आदमी यह सोचता
था कि उसकी सुनवाई
होगी या उल्टा उसी
पर मुकदमा दर्ज हो जाएगा।
फर्जी मुकदमों का भय किसी
भी लोकतांत्रिक समाज में बेहद
खतरनाक हथियार है। किसी निर्दोष
को मुकदमे में फंसाना केवल
कानूनी कार्रवाई नहीं, बल्कि उसके परिवार, रोजगार,
प्रतिष्ठा और सामाजिक जीवन
पर हमला है। और
जब पुलिस पर ही राजनीतिक
प्रभाव में कार्रवाई करने
के आरोप लगें तो
सवाल केवल एक थाने
या एक अधिकारी का
नहीं रहता—पूरे सिस्टम
की विश्वसनीयता कटघरे में आ जाती
है।
सपा के माफिया जनप्रतिनिधियों का दौर?
उस दौर की
सबसे बड़ी राजनीतिक आलोचना
यही थी कि अपराध
और राजनीति का गठजोड़ कानून
के रास्ते में खड़ा हो
गया था। सपा के
कुछ नेताओं और जनप्रतिनिधियों पर
माफिया तत्वों को संरक्षण देने
के आरोप विपक्ष लगातार
लगाता था। यहां एक
फर्क समझना जरूरी है—किसी पूरे
दल को अपराधी कहना
उचित नहीं, लेकिन यदि किसी दल
से जुड़े जनप्रतिनिधि पर अपराधियों को
संरक्षण देने के आरोप
लगते हैं तो सरकार
की जिम्मेदारी है कि जांच
कराए और दोषी पाए
जाने पर कार्रवाई करे।
समस्या तब विकराल होती
है जब जनता को
यह संदेश जाने लगे कि
राजनीतिक पहचान कानून से ऊपर है।
तब और अब—सबसे बड़ा फर्क क्या?
तुलना करते समय सिर्फ
अपराध की संख्या देखना
पर्याप्त नहीं है। असली
तुलना इन सवालों पर
होनी चाहिए— तब की तस्वीर
- आज की कसौटी. अपराधियों के
राजनीतिक संरक्षण के आरोप. अपराधी कितना
भी प्रभावशाली हो, कार्रवाई कितनी
निष्पक्ष? थानों पर दबाव की
शिकायतें. पुलिस कितनी जवाबदेह और स्वतंत्र? अपहरण
और रंगदारी का भय. संगठित अपराध
पर कार्रवाई कितनी प्रभावी? पत्रकारों पर दबाव. पत्रकार को
सच लिखने की कितनी स्वतंत्रता?
फर्जी मुकदमों की शिकायतें. एफआईआर और
जांच कितनी पारदर्शी? अपराध के बाद कार्रवाई.
अपराध रोकने की पुलिस क्षमता
कितनी मजबूत? पीड़ित का राजनीतिक सहारा
तलाशना. क्या पीड़ित सीधे कानून पर
भरोसा कर सकता है?
यही वह जगह है
जहां आज के उत्तर
प्रदेश को पुराने दौर
से अपनी तुलना करनी
चाहिए। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं
होती. आज यदि सरकार अपराधियों
के खिलाफ कठोर कार्रवाई का
दावा करती है तो
उसकी अगली परीक्षा और
भी महत्वपूर्ण है—क्या कार्रवाई
कानून के दायरे में
और समान रूप से
हो रही है? किसी
अपराधी पर कार्रवाई स्वागतयोग्य
है, लेकिन कानून का राज तभी
स्थापित माना जाएगा जब
अपराधी के साथ-साथ
पुलिस की मनमानी पर
भी कार्रवाई हो। बुलडोजर, गिरफ्तारी,
गैंगस्टर एक्ट या संपत्ति
जब्ती सुर्खियां बना सकते हैं,
लेकिन लोकतांत्रिक शासन की स्थायी
ताकत है—निष्पक्ष जांच,
मजबूत अभियोजन और अदालत में
दोषसिद्धि।
अपराधी का डर खत्म हुआ या पुलिस का डर बढ़ा?
यह सवाल भी
उतना ही महत्वपूर्ण है।
यदि आज अपराधी पुलिस
से डरता है तो
यह कानून के इकबाल की
जीत है। लेकिन यदि
आम नागरिक पुलिस से डरता है,
अपनी शिकायत दर्ज कराने में
हिचकता है या उसे
लगता है कि प्रभावशाली
व्यक्ति के खिलाफ जाना
उसके लिए भारी पड़
सकता है, तो व्यवस्था
को अभी लंबा रास्ता
तय करना है। कानून-व्यवस्था का अर्थ यह
नहीं कि पुलिस शक्तिशाली
हो जाए। कानून-व्यवस्था
का अर्थ है कि
कानून शक्तिशाली हो।
उस दौर की आग से आज की सीख
जिस उत्तर प्रदेश
में कभी अपराधी राजनीतिक
संरक्षण की छतरी तलाशते
थे, वहां आज जनता
यह देखना चाहती है कि सत्ता
की छतरी केवल कानून
के लिए हो। जिस
दौर में पत्रकार के
लिए सच लिखना जोखिम
था, वहां आज पत्रकार
को बिना भय के
सवाल पूछने का अधिकार मिलना
चाहिए। जिस दौर में
अपहरण अपराधियों का कारोबार बन
गया था, वहां आज
हर बच्चे, व्यापारी, महिला और सामान्य नागरिक
को यह विश्वास होना
चाहिए कि पुलिस उसके
साथ है। और जिस
दौर में थाने पर
दबंग की आवाज भारी
पड़ने की शिकायतें थीं,
वहां आज थाने की
कुर्सी पर बैठा अधिकारी
न किसी नेता का
आदमी हो, न किसी
माफिया का—सिर्फ कानून
का आदमी हो।
मैंने वह दौर देखा है...
इसलिए आज जब कोई
कानून-व्यवस्था की बहस को
केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप में
बदल देता है तो
मुझे लगता है कि
वह उस भयावह दौर
की वास्तविकता को भूल रहा
है। मैंने वह समय देखा
है जब अपराध की
खबर लिखना भी जोखिम था।
मैंने वह समय देखा
है जब अपराधी का
नाम लेने से पहले
पत्रकार अपने परिवार के
बारे में सोचता था।
मैंने वह समय देखा
है जब अपहरण की
खबर किसी एक शहर
की नहीं, पूरे प्रदेश की
चिंता बन जाती थी।
मैंने वह समय भी
देखा है जब थाने
की चौखट पर पहुंचा
कमजोर आदमी न्याय से
पहले अपनी सुरक्षा के
बारे में सोचता था।
इसीलिए आज की व्यवस्था
से मेरी अपेक्षा भी
ज्यादा है। उत्तर प्रदेश
को न गुंडाराज चाहिए,
न पुलिसराज। उसे चाहिए—कानून
का राज। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ी
जीत यह नहीं कि
अपराधी जेल में है।
सबसे बड़ी जीत तब
होगी जब ईमानदार नागरिक
को थाने जाने से
डर न लगे, पत्रकार
को सच लिखने से
डर न लगे और
अपराधी को सत्ता के
गलियारों में अपना कोई
संरक्षक न मिले। यही वह
फर्क है जो किसी
सरकार को सिर्फ सत्ता
चलाने वाली सरकार से
अलग करता है। 2013-14 के
आधिकारिक आंकड़े इस बात को
काफी स्पष्ट करते हैं। एनसीआरबी
के अनुसार उत्तर प्रदेश में बलात्कार के
मामले 2012 के 1,963 से बढ़कर 2013 में
3,050 और 2014 में 3,467 हो गए। यानी
केवल दो वर्षों में
दर्ज मामलों में लगभग 77 प्रतिशत
की वृद्धि हुई। 2014 में देश में
दर्ज 36,735 बलात्कार मामलों में अकेले उत्तर
प्रदेश के 3,467 मामले थे। हत्या की
तस्वीर भी कम भयावह
नहीं थी। 2014 में उत्तर प्रदेश
में 5,150 हत्याएं दर्ज हुईं, जो
उस वर्ष देश में
दर्ज 33,981 हत्याओं का लगभग 15.2 प्रतिशत
थीं—देश में सर्वाधिक।
महिलाओं के खिलाफ अपराध
में भी वृद्धि दर्ज
हुई। उत्तर प्रदेश पुलिस के 2014 के आंकड़ों के
अनुसार महिलाओं के खिलाफ बलात्कार
2013 के 3,050 से बढ़कर 2014 में
3,467, अपहरण एवं बंधक बनाने
के मामले 9,737 से बढ़कर 10,626, दहेज
हत्या 2,335 से बढ़कर 2,469, छेड़छाड़
7,303 से बढ़कर 8,605 और पति/रिश्तेदारों
द्वारा क्रूरता के मामले 8,781 से
बढ़कर 10,471 हो गए। 2013 में
यूपी के 3,050 बलात्कार मामलों में 2,302 मामलों में चार्जशीट दाखिल
हुई थी और 2014 में
3,467 में 2,850 में चार्जशीट हुई।
यानी उस समय का
सवाल केवल यह नहीं
था कि अपराध हो
रहा था या नहीं,
बल्कि यह था कि
अपराध के कई प्रमुख
सिरों में लगातार बढ़ोतरी
क्यों हो रही थी।
लेकिन आज की तुलना
केवल यह बताने के
लिए नहीं होनी चाहिए
कि तब अपराध ज्यादा
था और अब कम।
असली सवाल यह है
कि आज अपराध पर
कार्रवाई कितनी तेज है, पुलिस
कितनी निष्पक्ष है और अपराधी
चाहे कितना भी प्रभावशाली क्यों
न हो, क्या कानून
उसके सामने उसी ताकत से
खड़ा होता है? क्योंकि
कानून का राज आंकड़ों
से नहीं, जनता के भरोसे
से स्थापित होता है।
अपराध के आंकड़े बोलते हैं—तब यूपी की तस्वीर कितनी भयावह थी
अपराध 2012 2013 2014
बलात्कार
1,963 3,050 3,467
महिलाओं
का अपहरण/बंधक बनाना
7,910 9,737 10,626
दहेज
हत्या
2,244 2,335 2,469
महिला
से छेड़छाड़
3,247 7,303 8,605
पति/रिश्तेदारों की क्रूरता
7,661 8,781 10,471
ये आंकड़े यूपी
पुलिस की 2014 की आधिकारिक रिपोर्ट
में दर्ज हैं। खास
तौर पर बलात्कार के
मामले 2012 के 1,963 से बढ़कर 2013 में
3,050 और 2014 में 3,467 हो गए। महिलाओं
के अपहरण के मामले भी
7,910 से बढ़कर 10,626 हो गए।
और हत्या की तस्वीर भी भयावह थी
2012 की यूपी पुलिस
रिपोर्ट में हत्या के
13,983 मामले दर्ज होने का
आंकड़ा मिलता है। तब और
अब : असली सवाल आंकड़ों
से आगे का है.
2012–14 का दौर
1,963 → 3,050 →
3,467
बलात्कार
के
दर्ज
मामले
7,910 → 9,737 →
10,626
महिलाओं
के
अपहरण
के
मामले
2,244 → 2,335 →
2,469
दहेज
हत्या
3,247 → 7,303 →
8,605
छेड़छाड़
के
मामले
7,661 → 8,781 →
10,471
पति/रिश्तेदारों
द्वारा
क्रूरता
के
मामले
जिस दौर का
मैं प्रत्यक्ष गवाह हूं, उस
दौर की भयावहता केवल
मेरी स्मृतियों में नहीं, सरकारी
आंकड़ों में भी दर्ज
है। 2012 में उत्तर प्रदेश
में बलात्कार के 1,963 मामले दर्ज हुए थे।
2013 में यह संख्या बढ़कर
3,050 और 2014 में 3,467 हो गई। महिलाओं
के अपहरण के मामले 7,910 से
बढ़कर 10,626 तक पहुंच गए।
दहेज हत्या 2,244 से बढ़कर 2,469 और
पति या रिश्तेदारों द्वारा
महिलाओं के साथ क्रूरता
के मामले 7,661 से बढ़कर 10,471 हो
गए। यानी अपराध की
वह आग केवल अखबारों
के पन्नों पर नहीं जल
रही थी, उसके आंकड़े
सरकारी दस्तावेजों में भी दर्ज
हो रहे थे।
योगी राज में टूटे बड़े माफिया के तिलिस्म
नाम क्या
हुआ
विकास दुबे 10 जुलाई 2020 को पुलिस मुठभेड़
में मारा गया
अतीक अहमद 15
अप्रैल 2023 को प्रयागराज में
तीन हमलावरों ने गोली मारकर
हत्या की
अशरफ अहमद अतीक
के साथ 15 अप्रैल 2023 को हत्या
असद अहमद 13 अप्रैल 2023 को
झांसी में STF मुठभेड़ में मारा गया
मोहम्मद गुलाम असद के साथ
STF मुठभेड़ में मारा गया
अनिल दुजाना 4
मई 2023 को मेरठ में
पुलिस मुठभेड़ में मारा गया
अरशद जनवरी 2025 में शामली में
STF मुठभेड़ में मारा गया
अनुज कनौजिया मार्च
2025 में जमशेदपुर में यूपी STF और
झारखंड पुलिस की कार्रवाई में
मारा गया
मुख्तार अंसारी 28 मार्च 2024 को
जेल में तबीयत बिगड़ने
के बाद मृत्यु
संजीव उर्फ
जीवा 7 जून 2023 को
लखनऊ कोर्ट परिसर में गोली मारकर
हत्या
मुन्ना बजरंगी
9 जुलाई 2018, बागपत जेल में हत्या
बड़ा आंकड़ा
मार्च
2017 से मई 2026 तक — 289 अपराधी मुठभेड़ों में ढेर
9 वर्षों
में — 17,043 पुलिस मुठभेड़
2026 में 22,306 इनामी
अपराधी गिरफ्तार
2017 से नवंबर 2023 तक गैंगस्टर एक्ट के तहत 22,301 मामले दर्ज, 70,879 गिरफ्तारियां और ₹120 अरब से अधिक की संपत्ति जब्ती
योगी राज में ढहे बड़े माफिया के किले
विकास दुबे
— कानपुर : बिकरू कांड में आठ
पुलिसकर्मियों की हत्या के
आरोपी विकास दुबे को उज्जैन
से कानपुर लाते समय 10 जुलाई
2020 को पुलिस ने मुठभेड़ में
मारे जाने की बात
कही। उसके खिलाफ 62 आपराधिक
मामले दर्ज थे।
अतीक अहमद
— प्रयागराज : माफिया
से नेता बने अतीक
अहमद और उसके भाई
अशरफ की 15 अप्रैल 2023 को प्रयागराज में
मेडिकल जांच के लिए
ले जाते समय तीन
हमलावरों ने गोली मारकर
हत्या कर दी। यह
पुलिस एनकाउंटर नहीं था।
असद अहमद
— प्रयागराज : अतीक
के बेटे असद को
13 अप्रैल 2023 को झांसी में
यूपी एसटीएफ ने मुठभेड़ में
मार गिराया। उसके साथ शूटर
गुलाम भी मारा गया।
गुलाम मोहम्मद
— प्रयागराज : असद का सहयोगी
और उमेश पाल हत्याकांड
का आरोपी गुलाम भी उसी झांसी
मुठभेड़ में मारा गया।
अनिल दुजाना
— गौतमबुद्धनगर/मेरठ : पश्चिमी यूपी का कुख्यात
गैंगस्टर। उसके खिलाफ 60 से
अधिक मामले थे, जिनमें हत्या,
अपहरण, रंगदारी और जमीन कब्जाने
जैसे आरोप शामिल थे।
4 मई 2023 को मेरठ में
यूपी एसटीएफ से मुठभेड़ में
मारा गया। उसके गिरोह
में करीब 35 सदस्य बताए गए थे।
यह भी पुलिस एनकाउंटर
नहीं था।
मुख्तार अंसारी
— पूर्वांचल : माफिया-राजनीतिज्ञ मुख्तार अंसारी मार्च 2024 में बांदा जेल
में तबीयत बिगड़ने के बाद अस्पताल
में मृत घोषित हुआ।
पोस्टमार्टम में मृत्यु का
कारण हार्ट अटैक/मायोकार्डियल इंफार्क्शन
बताया गया और बाद
की विसरा जांच में जहर
नहीं मिला। इसलिए इसे “एनकाउंटर में
मारा गया” कहना गलत
होगा।


