सोमनाथ से साधा ‘सियासी शिवधनुष’!
आक्रांताओं का जिक्र कर मोदी ने फिर छेड़ा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का सबसे बड़ा नैरेटिव
गजनवी, खिलजी और ‘स्वाभिमान
की उपेक्षा’ वाले बयान के कई राजनीतिक
मायने
• राम मंदिर के बाद अब
सोमनाथ के जरिए हिंदुत्व की नई वैचारिक धार तेज करने की कोशिश
• विपक्ष के लिए जवाब देना
आसान नहीं
सुरेश गांधी
सोमनाथ अमृत महोत्सव केवल धार्मिक आयोजन
नहीं था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे सांस्कृतिक स्मृति, ऐतिहासिक पीड़ा और राजनीतिक
संदेश—तीनों के संगम में बदल दिया। मंच से महमूद गजनवी, अलाउद्दीन
खिलजी और “आजादी के बाद स्वाभिमान प्रतीकों की उपेक्षा”
का जिक्र महज इतिहास दोहराना नहीं था, बल्कि 2027 और उससे आगे की राजनीति का संकेत
भी माना जा रहा है।
मोदी ने सोमनाथ को सिर्फ मंदिर नहीं,
बल्कि “भारत की अस्मिता पर हुए हमलों” का प्रतीक बनाकर पेश किया। यही वह बिंदु
है जहां भाजपा का सबसे मजबूत वैचारिक आधार खड़ा होता है—सांस्कृतिक
राष्ट्रवाद। राम मंदिर के बाद अब सोमनाथ को उसी भावनात्मक धुरी पर स्थापित करने की
कोशिश साफ दिखाई दी। प्रधानमंत्री का यह कहना कि “आक्रांताओं ने सोमनाथ को पत्थर समझा,
लेकिन यह हमारी आस्था का केंद्र था” सीधे तौर पर उस बहस को फिर जिंदा करता
है जिसमें इतिहास, हिंदुत्व और राष्ट्रीय पहचान एक साथ जुड़ जाते हैं। भाजपा लंबे समय
से यह नैरेटिव गढ़ती रही है कि सदियों तक भारत की सांस्कृतिक पहचान को दबाया गया और
अब उसका पुनर्जागरण हो रहा है।
लोगों की नजर मोदी के उस बयान पर भी रही जिसमें उन्होंने आजादी के बाद की सरकारों पर स्वाभिमान प्रतीकों की उपेक्षा का आरोप लगाया। बिना सीधे हमला किए यह इशारा कांग्रेस और नेहरू युग की राजनीति की ओर था। सरदार पटेल और डॉ. राजेंद्र प्रसाद का नाम लेकर मोदी ने एक बार फिर कांग्रेस की ऐतिहासिक विरासत के भीतर वैचारिक विभाजन को उभारने की कोशिश की।
सोमनाथ का मंच भाजपा के लिए इसलिए भी
अहम माना जा रहा है क्योंकि यह केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि “हमले और पुनर्जागरण”
की कहानी है। यही कारण है कि मोदी ने इसे पोखरण परमाणु परीक्षण, ऑपरेशन शक्ति और शिव-शक्ति
जैसे प्रतीकों से जोड़ा। संदेश साफ था—भारत अब “आस्था और शक्ति”
दोनों का राष्ट्र है। राजनीतिक तौर पर इसका सबसे बड़ा फायदा भाजपा को हिंदू वोटों के
भावनात्मक ध्रुवीकरण के रूप में मिल सकता है। खासकर तब, जब विपक्ष अभी भी हिंदुत्व
के मुद्दों पर स्पष्ट वैचारिक जवाब खोजता नजर आता है। राम मंदिर के समय की तरह ही सोमनाथ
का विमर्श भी विपक्ष के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकता है—क्योंकि
इसका विरोध करना आस्था के विरोध की तरह पेश किया जा सकता है और समर्थन देना भाजपा के
नैरेटिव को मजबूती देता है।
हालांकि विपक्ष इसे चुनावी ध्रुवीकरण
की रणनीति बताकर हमला कर सकता है। आलोचक कह सकते हैं कि इतिहास के आक्रांताओं को बार-बार
उठाकर वर्तमान राजनीति को धार्मिक भावनाओं से जोड़ा जा रहा है। लेकिन भाजपा के लिए
यही उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी भी है—ऐसा नैरेटिव जिसमें इतिहास का दर्द, धार्मिक
गौरव और राष्ट्रवाद एक साथ जुड़ जाते हैं। सोमनाथ से निकला संदेश केवल मंदिर तक सीमित
नहीं दिखा। यह उस व्यापक राजनीति का हिस्सा नजर आया जिसमें भाजपा खुद को “सभ्यता के
पुनर्जागरण” की वाहक और विपक्ष को “उस इतिहास की उपेक्षा करने वाली ताकत”
के रूप में स्थापित करना चाहती है।
आस्था का महासागर उमड़ा
समुद्र की गर्जन करती
लहरों, डमरुओं की गूंज, शंखनाद,
वैदिक मंत्रों और “हर-हर
महादेव” के आसमान चीरते
उद्घोष के बीच सोमवार
को प्रभास पाटन सिर्फ एक
तीर्थ नहीं रहा, वह
भारत की हजार वर्षों
की सभ्यता, संघर्ष और सनातन स्वाभिमान
का जीवंत घोष बन गया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब
मंदिर शिखर पर स्थापित
760 किलो वजनी कलश का
11 तीर्थों के जल से
अभिषेक कराया तो ऐसा लगा
मानो सदियों के घावों पर
भारत अपनी आस्था का
अमृत चढ़ा रहा हो।
सुबह से ही लाखों श्रद्धालुओं
की भीड़ मंदिर परिसर
और प्रभास क्षेत्र में उमड़ पड़ी
थी। हाथों में भगवा ध्वज,
माथे पर भस्म और
होंठों पर “जय सोमनाथ”
का उद्घोष लिए भक्तों का
सैलाब सड़कों पर दिखाई देता
रहा। पीएम मोदी जब
जामनगर से हेलिकॉप्टर द्वारा
सोमनाथ पहुंचे और रोड शो
करते हुए मंदिर की
ओर बढ़े तो पूरा
रास्ता शिवभक्ति से भर उठा।
जगह-जगह पुष्पवर्षा हुई,
डमरू बजे और शंखनाद
के बीच लोगों ने
“मोदी-मोदी” और “हर-हर
महादेव” के नारे लगाए।
समारोह का सबसे दिव्य
क्षण तब आया जब
मंदिर शिखर पर लगे
विशाल कलश का कुंभाभिषेक
हुआ। 90 मीटर ऊंची क्रेन
से बंधे इस कलश
में 1100 लीटर जल भरा
गया था। प्रधानमंत्री मोदी
ने रिमोट के जरिए देश
के 11 प्रमुख तीर्थों के पवित्र जल
से उसका अभिषेक कराया।
उस समय पूरा परिसर
“ॐ नमः शिवाय” के
जाप से कांप उठा।
सोमनाथ परिसर में दिनभर सांस्कृतिक
प्रस्तुतियां, नृत्य-नाटिकाएं और शिव स्तुति
का आयोजन चलता रहा। भारतीय
वायुसेना की सूर्यकिरण एरोबैटिक
टीम ने छह हॉक
विमानों के साथ आसमान
में तिरंगा और दिल का
आकार बनाकर लोगों को रोमांचित कर
दिया। हेलिकॉप्टर से हुई पुष्पवर्षा
ने पूरे आयोजन को
अलौकिक बना दिया।











