आस्था की
विराट
लहर
: प्रयागराज
संगम
से
काशी
घाटों
तक
भव्य
उत्सव,
उमड़ा
महासैलाब
मौनी अमावस्या पर 4.52 करोड़ श्रद्धालुओं ने किया पावन स्नान
कड़े सुरक्षा
इंतजामों
और
चुस्त
प्रशासनिक
व्यवस्था
के
बीच
शांतिपूर्ण
संपन्न
हुआ
पर्व
श्रद्धालुओं पर
हेलीकॉप्टर
से
फूलों
की
बारिश
की
गई
योतिष्ठ पीठाधीश्वर
शंकराचार्य
अविमुक्तेश्वरानंद
के
रथ
को
पुलिस
ने
संगम
जाने
से
रोक,
काफी
देर
तक
माहौल
अशांत
रहा
सुरेश गांधी
प्रयागराज- वाराणसी.
मौनी अमावस्या के पावन अवसर
पर सनातन संस्कृति की तपोभूमि तीर्थराज
प्रयागराज से लेकर अविनाशी
काशी तक आस्था, श्रद्धा
और अनुशासन का अद्भुत एवं
विराट दृश्य देखने को मिला। त्रिवेणी
संगम में 4.52 करोड़ से अधिक
श्रद्धालुओं ने गंगा-यमुना-सरस्वती के पवित्र संगम
में डुबकी लगाकर पुण्य लाभ अर्जित किया,
और भारतीय संस्कृति की शाश्वत परंपरा
को नमन किया. वहीं
काशी के विभिन्न घाटों
पर भी सुबह से
ही श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़
पड़ा। काशी में भी
तकरीबन तीन लाख से
अधिक आस्थावनों ने गंगा में
डूबकी लगायी. यह पर्व न
केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक बना,
बल्कि भारत की आत्मा
का विराट उत्सव था, जहाँ भक्ति,
व्यवस्था और सेवा एक
साथ प्रवाहित हुईं।
श्रद्धालुओं पर हेलीकॉप्टर से
फूलों की बारिश की
गई। इससे पहले,
मौनी
अमावस्या पर संगम स्नान
करने जा रहे ज्योतिष्ठ
पीठाधीश्वर शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के रथ को
पुलिस प्रशास ने संगम जाने
से रोक दिया। उनके
रथ और जुलूस को
रास्ते में रोकने पर
माहौल तनावपूर्ण हो गया। प्रयागराज
में ब्रह्म मुहूर्त से ही संगम
तटों पर स्नान का
क्रम शुरू हो गया।
देश-
विदेश से आए संत-
महात्मा,
अखाड़ों के साधु,
कल्पवासी
और सामान्य श्रद्धालु,
सभी ने मौन,
संयम और श्रद्धा के
भाव के साथ त्रिवेणी
में स्नान किया। “
हर-
हर गंगे”
और “
हर-
हर महादेव”
के जयघोष से संगम क्षेत्र
गूंजता रहा। खास यह
है कि गंगा-
यमुना-
सरस्वती के पावन संगम
में डुबकी लगाते श्रद्धालुओं की कतारें इस
बात की साक्षी बनीं
कि सनातन परंपरा समय की सीमाओं
से परे है। प्रशासन
द्वारा बनाए गए स्नान
घाटों,
बैरिकेडिंग और यातायात योजना
के चलते जनसैलाब के
बावजूद कहीं अव्यवस्था नहीं
दिखी। इस विराट स्नान
पर्व को सुरक्षित और
शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न
कराने के लिए पुलिस
प्रशासन,
मेला प्रबंधन,
एनडीआरएफ,
स्वास्थ्य विभाग,
स्वच्छता सेवक,
स्वयंसेवी संगठन और नाविक बंधु
पूरी मुस्तैदी से तैनात रहे।
ड्रोन और सीसीटीवी के
माध्यम से निगरानी की
गई,
वहीं मेडिकल टीमों
की 24
घंटे तैनाती रही।
स्वच्छता अभियान के तहत घाटों
और मेला क्षेत्र में
लगातार सफाई की जाती
रही,
जिससे श्रद्धालुओं को स्वच्छ वातावरण
मिला। उधर,
काशी में
भी मौनी अमावस्या पर
विशेष धार्मिक उल्लास देखने को मिला। अस्सी,
दशाश्वमेध,
मणिकर्णिका,
राजघाट समेत प्रमुख घाटों
पर गंगा स्नान के
लिए श्रद्धालुओं की लंबी कतारें
लगी रहीं। स्नान के उपरांत श्रद्धालुओं
ने बाबा विश्वनाथ के
दर्शन-
पूजन कर लोक-
कल्याण की कामना की।
मंदिर और घाट क्षेत्रों
में सुरक्षा के कड़े इंतजाम
रहे। पुलिस बल की पर्याप्त
तैनाती,
यातायात नियंत्रण और भीड़ प्रबंधन
के चलते दर्शन व्यवस्था
सुचारु बनी रही।
गंगा आरती स्थलों
पर आध्यात्मिक वातावरण सघन हुआ। स्नान
के उपरांत दान,
जप-
तप
और पूजन का क्रम
चलता रहा। काशी ने
एक बार फिर यह
संदेश दिया कि वह
केवल नगर नहीं,
जीवंत
तीर्थ है,
जहाँ हर
पर्व आत्मिक अनुशासन के साथ मनाया
जाता है। प्रशासनिक अधिकारियों
के अनुसार,
प्रयागराज और काशी,
दोनों
ही तीर्थों पर पर्व पूरी
तरह शांतिपूर्ण रहा। किसी भी
प्रकार की बड़ी अव्यवस्था
या अप्रिय घटना की सूचना
नहीं मिली। यह मौनी अमावस्या
न केवल आस्था का
महापर्व बनी,
बल्कि यह
संदेश भी दे गई
कि सुनियोजित व्यवस्था और जन-
सहयोग
से विशालतम आयोजनों को भी सफलतापूर्वक
संपन्न किया जा सकता
है। संगम में डुबकी
और काशी में दर्शन
के साथ यह पर्व
भारतीय संस्कृति की उस अविरल
धारा को फिर रेखांकित
कर गया,
जिसमें श्रद्धा,
अनुशासन और सेवा,
तीनों
एक साथ प्रवाहित होते
हैं।
सेवा, सुरक्षा और स्वच्छताः पर्व की मौन साधना
प्रयागराज और काशी,
दोनों
ही तीर्थों पर स्वच्छता कर्मियों
की निःशब्द सेवा,
स्वयंसेवकों की तत्परता और
नाविकों की जिम्मेदारी ने
पर्व को सफल बनाया।
मेडिकल टीमों की तैनाती,
जल-
स्थल सुरक्षा और
यातायात प्रबंधन ने जनसैलाब को
सुव्यवस्थित दिशा दी। यह
मौनी अमावस्या केवल मौन का
व्रत नहीं,
बल्कि सेवा का संकल्प
बनकर उभरी।
सनातन की अविरल धारा
मौनी अमावस्या 2026 ने
एक बार फिर सिद्ध
किया कि भारतीय संस्कृति
की जड़ें जितनी प्राचीन
हैं, उतनी ही सशक्त
और समकालीन भी। प्रयागराज के
संगम से काशी के
घाटों तक बहती यह
आस्था की धारा आने
वाली पीढ़ियों को संस्कार, अनुशासन
और समरसता का संदेश देती
है। संगम में स्नान,
काशी में दर्शन, और
दोनों में भारत की
आत्मा का प्रतिबिंब।
प्रयागराज पुलिस कमिश्नर कहिन
प्रयागराज पुलिस कमिश्नर जोगेंद्र कुमार ने कहा, ’स्वामी
अविमुक्तेश्वरानंद सुबह करीब 9 बजे
यहां आए, यह जगह
सुरक्षा कारणों से कल से
बंद है। उनकी और
उनके समर्थकों की पुलिस के
साथ झड़प हुई। उनके
समर्थकों ने बैरिकेड भी
तोड़े, जिसका सीसीटीवी फुटेज हमारे पास है।
जब
उन्हें बताया गया कि वे
परंपरा के खिलाफ जा
रहे हैं, तो उन्होंने
अपने रथ और समर्थकों
के साथ लगभग तीन
घंटे तक वापसी का
रास्ता अवरुद्ध किया। इससे अफरा-तफरी
मच गई। वे अपने
सभी 200 समर्थकों और एक रथ
के साथ संगम नोज
पर जाने की जिद
पर अड़े थे, जो
परंपरा के खिलाफ है।
यहां आने वाला हर
श्रद्धालु बराबर है। हमने उन्हें
समझाने की कोशिश की
कि अगर वे रथ
और 200 लोगों के साथ आगे
बढ़ते हैं, तो भगदड़
मच सकती है।
सुबह
कोहरे की वजह से
संगम पर सबसे ज़्यादा
भीड़ सुबह 9-10 बजे के आसपास
थी, तभी वे आए
और संगम नोज पर
जाने की जिद पर
अड़ गए। किसी भी
संत को परंपरा के
खिलाफ जाने की इजाजत
नहीं दी गई है,
और सभी से आम
आदमी की तरह ’स्नान’
करने को कहा गया
है। तीन घंटे तक
वापसी का रास्ता रोकने
के बाद, वे अपने
आश्रम लौट गए। हर
व्यक्ति की हर गतिविधि
पर सीसीटीवी से नजर रखी
जा रही है, इसलिए
कहीं भी किसी तरह
के भेदभाव का सवाल ही
नहीं है। हम सीसीटीवी
फुटेज का विश्लेषण करने
के बाद जरूरी कार्रवाई
करेंगे।
वे बिना अनुमति के अपनी पालकी पर आए थे : डीएम
प्रयागराज डीएम मनीष कुमार
वर्मा ने कहा कि
“परंपरा के विपरीत संगम
पर स्नान करने वे (स्वामी
अविमुक्तेश्वरानंद) बिना अनुमति के
अपनी पालकी पर आए थे।
उस समय संगम पर
बहुत ज्यादा भीड़ थी, बार-बार अनुरोध करने
के बाद भी वे
बिना अनुमति के यहां आए
और अपनी ज़िद पर
अड़े रहे, यह गलत
था। अन्य कई पहलु
भी संज्ञान में आए हैं
कि उनके समर्थकों द्वारा
बैरियर तोड़े गए और
पुलिस के साथ धक्का-मुक्की की गई तो
इस पूरे मामले की
हम जांच कर रहे
हैं... हम सभी पहलुओं
की जांच कर विधिक
कार्रवाई करेंगे।