Friday, 24 April 2026

महिलाओं का अधिकार है आरक्षण, विपक्ष का विरोध ‘राजनीतिक स्वार्थ’: सुरेश खन्ना

महिलाओं का अधिकार है आरक्षण, विपक्ष का विरोधराजनीतिक स्वार्थ’: सुरेश खन्ना 

33% आरक्षण लागू होने से लोकसभा में 272 तक पहुंच सकती है महिलाओं की संख्या

जनगणना-परिसीमन के बाद ही लागू होगा कानून, संविधान के तहत अनिवार्य प्रक्रिया

विपक्ष पर धर्म आधारित आरक्षण का मुद्दा उठाकर भ्रम फैलाने का आरोप

यूपी में कन्या सुमंगला, मिशन शक्ति और स्वयं सहायता समूहों से बड़ा बदलाव

सुरेश गांधी

वाराणसी। नारी शक्ति वंदन विधेयक को लेकर राजनीतिक बयानबाजी के बीच प्रदेश के वित्त एवं संसदीय कार्य मंत्री सुरेश खन्ना ने साफ कहा कि महिलाओं को आरक्षण देना कोईउपकारनहीं बल्कि उनका संवैधानिक और स्वाभाविक अधिकार है। उन्होंने कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, टीएमसी और डीएमके जैसे विपक्षी दलों पर महिला विरोधी मानसिकता अपनाने और राजनीतिक स्वार्थ के लिए मुद्दे को भटकाने का आरोप लगाया।

सर्किट हाउस सभागार से आयोजित वीडियो कॉन्फ्रेंस में खन्ना ने कहा कि देश की आधी आबादी को निर्णय प्रक्रिया में समान भागीदारी देना लोकतंत्र को सशक्त बनाने की दिशा में ऐतिहासिक कदम है। उन्होंने चेताया कि जो दल इस विधेयक का विरोध कर रहे हैं, उन्हें आने वाले चुनावों में महिलाओं के आक्रोश का सामना करना पड़ेगा।  

परिसीमन से किसी राज्य को नुकसान नहीं

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बयान का हवाला देते हुए खन्ना ने स्पष्ट किया कि परिसीमन (डेलिमिटेशन) की प्रक्रिया से किसी भी राज्य को नुकसान नहीं होगा। यह पूरी प्रक्रिया संतुलित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए है। उन्होंने बताया कि भविष्य में लोकसभा सीटों में वृद्धि की संभावना है, जिससे महिलाओं को मिलने वाला 33% आरक्षण और प्रभावी हो सकेगा। उन्होंने यह भी कहा कि जनसंख्या नियंत्रण में योगदान देने वाले राज्यों के हितों की रक्षा की जाएगी।

जनगणना और संविधान का प्रावधान

खन्ना ने विस्तार से बताया कि संविधान के प्रावधानों के अनुसार सीटों का निर्धारण जनगणना के आधार पर होता है। परिसीमन आयोग को सीटों के पुनर्गठन का अधिकार दिया गया है और यह प्रक्रिया हर जनगणना के बाद लागू होती है। उन्होंने विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि यह देरी नहीं बल्कि संवैधानिक प्रक्रिया का पालन है। 2011 की जनगणना के आंकड़े उपलब्ध हैं, लेकिन नए परिसीमन के लिए अद्यतन प्रक्रिया जरूरी है।

 धर्म आधारित आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं

उन्होंने समाजवादी पार्टी और अन्य दलों पर हमला बोलते हुए कहा कि ये दल धर्म आधारित आरक्षण की बात उठाकर लोगों को गुमराह कर रहे हैं। संविधान में इस प्रकार के आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है। खन्ना ने कहा, “जो दल संविधान की दुहाई देते हैं, वही उसके मूल सिद्धांतों के खिलाफ खड़े नजर आते हैं।

 संसद में पहले क्यों नहीं पास हुआ बिल?

उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जब 2010 में कांग्रेस की सरकार थी, तब यह विधेयक प्रभावी रूप से लोकसभा में पारित क्यों नहीं कराया गया। उन्होंने कहा कि उस समय दिखावे की राजनीति हुई, जबकि मौजूदा सरकार ने इसे पारित कर ऐतिहासिक कदम उठाया है।

 महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी का गणित

खन्ना ने बताया कि वर्तमान में लोकसभा में महिलाओं की संख्या लगभग 74 है, लेकिन यदि यह विधेयक पहले लागू होता, तो यह संख्या 272 तक पहुंच सकती थी। उन्होंने कहा कि इससे नीतिगत निर्णयों में महिलाओं की भागीदारी कई गुना बढ़ेगी।

ऐतिहासिक संदर्भ और महिला अधिकार

उन्होंने शाहबानो प्रकरण का जिक्र करते हुए कहा कि अतीत में भी महिलाओं के अधिकारों के मुद्दे पर राजनीतिक हस्तक्षेप हुआ है। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने वोट बैंक की राजनीति के चलते महिलाओं के अधिकारों को कमजोर किया।

केंद्र सरकार की पहल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चलाई गई योजनाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा— “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओसे समाज में सकारात्मक सोच आई. महिलाओं को बैंकिंग, गैस कनेक्शन, आवास जैसी योजनाओं से जोड़ा गया. महिला सशक्तिकरण को सरकार की प्राथमिकता बनाया गया

 यूपी सरकार के प्रयास

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार की योजनाओं का जिक्र करते हुए खन्ना ने कहामुख्यमंत्री कन्या सुमंगला योजना के तहत जन्म से शिक्षा तक आर्थिक सहायता. अब तक 27 लाख से अधिक लाभार्थी. स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से लाखों महिलाओं को रोजगार. लखपति महिला योजनासे आर्थिक आत्मनिर्भरता. 2682 से अधिक उचित मूल्य की दुकानों का संचालन महिलाओं के हाथों में.

महिला सुरक्षा और सामाजिक बदलाव

उन्होंने कहा किमिशन शक्तिअभियान के जरिए महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित किया गया है। महिला अपराधों पर सख्त कार्रवाई की जा रही है। मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना के तहत 2017 से अब तक 5.5 लाख से अधिक विवाह संपन्न कराए गए हैं, जिससे आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को राहत मिली है।

 राजनीतिक संदेश और चेतावनी

खन्ना ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि देश की महिलाएंमतदाताभर नहीं, बल्किनिर्णायक शक्तिहैं, जो चुनावी परिणामों को सीधे प्रभावित कर सकती हैं। उन्होंने कहा कि महिला सशक्तिकरण का विरोध करना सामाजिक और लोकतांत्रिक प्रगति को रोकने जैसा है और इसके लिए जिम्मेदार दलों को हर चुनाव में जवाब देना पड़ेगा। नारी शक्ति वंदन विधेयक अब केवल एक कानून नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति की दिशा बदलने वाला निर्णायक मोड़ बनता दिख रहा है। सत्ता पक्ष इसे महिला सशक्तिकरण की ऐतिहासिक पहल बता रहा है, जबकि विपक्ष की आपत्तियों ने इस बहस को और तीखा बना दिया है। अब नजरें इस पर टिकी हैं कि जब यह कानून पूरी तरह लागू होगा, तो भारतीय लोकतंत्र में महिलाओं की भागीदारी किस स्तर तक नई तस्वीर पेश करेगीऔर उससे भी बड़ा सवाल, क्या राजनीतिक दल इस बदलाव को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं?

Thursday, 23 April 2026

त्रिकोणीय रण में सत्ता की कसौटी : 2027 में ‘मॉडल’ बनाम ‘मूड’ की निर्णायक जंग

त्रिकोणीय रण में सत्ता की कसौटी : 2027 मेंमॉडलबनाममूडकी निर्णायक जंग 

यूपी में 2027 की जंग अब सीधे ज़मीन पर उतर चुकी है। योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में बीजेपीकानून-व्यवस्था $ विकासके मॉडल पर हैट्रिक का दावा ठोक रही है, जबकि अखिलेश यादव रोजगार, किसान और सामाजिक न्याय के मुद्दों से घेराबंदी में जुटे हैं। उधर मायावती ब्राह्मण-मुस्लिम-दलित समीकरण के सहारे खेल बदलने की तैयारी में हैं। असली लड़ाई सीटों से ज्यादा वोटों के बंटवारे की है, अगर विपक्ष बिखरा, तो वही बिखराव बीजेपी के लिए सत्ता की हैट्रिक का सबसे बड़ा हथियार बन सकता है. मतलब साफ है योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व पर दांव, मायावती की सोशल इंजीनियरिंग और अखिलेश यादव की चुनौती, कानून-व्यवस्था, विकास और वोटों के बंटवारे के बीच उत्तर प्रदेश में किस ओर झुकेगा जनादेश? ये अपने आप में बड़ा सवाल है... मतलब साफ है तीन ध्रुवों की इस जंग में जीत उसी की होगी, जो अपने वोट जोड़े और विरोधी के वोट तोड़ दे। यूपी 2027 : जहां हर वोट सिर्फ गिना नहीं जाएगा, बल्कि बांटा भी जाएगा 

सुरेश गांधी

सुबह का वक्त है। काशी की हवा में गंगा की नमी और घंटों की ध्वनि घुली हुई है। मणिकर्णिका घाट पर चिताएं अपनी अनवरत लय में जल रही हैं, जीवन और मृत्यु के बीच का वह शाश्वत संतुलन, जो काशी कोअनादिबनाता है। इसी घाट की सीढ़ियों पर बैठे एक संत, स्वामी संतोषानंद, दूर बहती गंगा को देखते हुए कहते हैं, “राजनीति भी गंगा की धारा जैसी है। कभी तेज, कभी शांत, पर अंत में सबको अपने में समेट लेती है। 2027 का चुनाव केवल सरकार का नहीं, जनता के मन का चुनाव होगा, लोग देख रहे हैं किसने उनके जीवन में बदलाव किया और कौन केवल वादे कर रहा है।यह वाक्य केवल एक संत की टिप्पणी नहीं, बल्कि उस व्यापक मनोविज्ञान का प्रतिबिंब है जो आज यूपी के गांव-शहर, चौराहों और घाटों पर महसूस किया जा सकता है.

यूपी का आगामी विधानसभा चुनाव एक साधारण राजनीतिक घटना नहीं है। यह उस राज्य की दिशा तय करेगा, जो देश की राजनीति का धुरी रहा है। एक ओर हैमजबूत नेतृत्वऔरकानून-व्यवस्थाका दावा, तो दूसरी ओरसामाजिक न्यायऔरआर्थिक असंतोषका सवाल। बीच में उभरती तीसरी ताकत चुनाव को और जटिल बना रही है। भाजपा ने समय रहते यह स्पष्ट कर दिया है कि 2027 का चुनाव योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा। यह फैसला केवल रणनीतिक नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक भी है। 2017 में बिना चेहरे के चुनाव और 2022 में आंशिक सस्पेंस के बाद अब पार्टी किसी भ्रम की स्थिति नहीं छोड़ना चाहती। योगी आदित्यनाथ की छवि, एक सख्त प्रशासक, निर्णायक नेता और स्पष्ट विचारधारा वाले चेहरे की, बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत बन चुकी है।

यूपी, जिसे कभी अपराध और माफिया के लिए बदनाम किया जाता था, आज कानून-व्यवस्था के मामले में एक अलग छवि पेश करने की कोशिश कर रहा है। माफिया के खिलाफ कठोर कार्रवाई, पुलिस की सक्रियता, महिलाओं की सुरक्षा के लिए अभियान, यह बदलाव आम जनमानस में सुरक्षा का एहसास पैदा करता है, लेकिन सवाल भी उठते हैं, क्या यह सख्ती हर स्तर पर समान है? क्या इसमें संतुलन बना हुआ है? स्वामी संतोषानंद कहते हैं, “भय का अंत होना चाहिए, लेकिन न्याय का संतुलन भी जरूरी है। जहां दोनों साथ हों, वही राज टिकता है।

लखनऊ से लेकर पूर्वांचल तक, सड़कों का जाल और बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स एक नई तस्वीर पेश करते हैं। एक्सप्रेसवे, एयरपोर्ट, निवेश परियोजनाएं, नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट जैसे प्रोजेक्ट्स यूपी को वैश्विक मानचित्र पर लाने की कोशिश हैं। लेकिन वाराणसी के लंका चौराहे पर खड़े एक युवा की बात इस चमक के पीछे का सवाल भी उठाती है, “सड़कें तो बन गईं, पर नौकरी कहां है?” काशी में काशी विश्वनाथ धाम का भव्य रूप केवल एक निर्माण परियोजना नहीं, बल्कि एक भावनात्मक जुड़ाव है। यह वह पक्ष है जहां राजनीति और आस्था का संगम दिखता है। बीजेपी इसे अपनी उपलब्धि मानती है, जबकि विपक्ष इसेभावनात्मक राजनीतिकरार देता है।

अखिलेश यादव के नेतृत्व में सपा इस चुनाव कोविकास बनाम रोजगारऔरसख्ती बनाम सामाजिक न्यायके रूप में पेश कर रही है। पश्चिमी यूपी से अभियान की शुरुआत यह संकेत देती है कि सपा जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों को फिर से सक्रिय करने की कोशिश में है। मायावती की बसपा एक बार फिर अपने पुराने समीकरण को नए अंदाज में प्रस्तुत कर रही है, दलित $ ब्राह्मण $ मुस्लिम. नाराज वोटों को जोड़ने की रणनीति. बसपा की कोशिश है कि वह खुद कोतीसरा विकल्पनहीं, बल्किनिर्णायक विकल्पके रूप में स्थापित करे।

यूपी की राजनीति में यह बार-बार देखा गया है कि चुनाव जीतने के लिए केवल वोट पाना जरूरी नहीं, बल्कि विरोधी वोटों का बंटना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अगर सपा और बसपा अलग-अलग लड़ती हैं, तो मुस्लिम वोटों का विभाजन. दलित वोटों का आंशिक खिसकाव. ओबीसी समीकरण में उलझन. यह स्थिति बीजेपी के लिए सीधा लाभ बन सकती है। वाराणसी के अस्सी घाट से लेकर लखनऊ के हजरतगंज तक, बातचीत में एक दिलचस्प मिश्रण दिखता है, सरकार के काम की सराहना. रोजगार और महंगाई पर चिंता. नेतृत्व को लेकर स्पष्ट राय. स्वामी संतोषानंद का एक और वाक्य इस पूरी बहस को समेट देता है, “जनता अब केवल नारों से नहीं, अपने अनुभव से वोट देती है। जिसने जीवन आसान किया, वही याद रहता है।

बीजेपी के पास मजबूत नेतृत्व, स्पष्ट नैरेटिव और संगठनात्मक ताकत है। लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं, बेरोजगारी, स्थानीय असंतोष, एंटी-इंकम्बेंसी. मतलब साफ है, यह चुनाव अंततः तीन सवालों पर टिकेगा, पहला क्या कानून-व्यवस्था का भरोसा कायम रहेगा? दुसरा क्या विकास का लाभ हर वर्ग तक पहुंचेगा? और तीसरा क्या विपक्ष एकजुट हो पाएगा? फिरहाल, 2027 का यूपी चुनाव केवल सत्ता का नहीं, बल्कि सोच का चुनाव होगा। एक तरफ योगी आदित्यनाथ कामॉडलहै, तो दूसरी ओर अखिलेश यादव और मायावती की चुनौती। लेकिन असली कुंजी शायद वहीं छिपी है, जहां राजनीति अक्सर नजरअंदाज कर देती है, वोटों का बंटवारा।काशी के घाटों से उठती आवाज यही कहती है, 2027 में यूपी केवल सरकार नहीं चुनेगा, बल्कि यह तय करेगा कि उसका भविष्यकामसे तय होगा यासमीकरणसे।

चेहरा बनाम चेहराविहीन विपक्ष : योगी आदित्यनाथ पर बीजेपी का स्पष्ट दांव, विपक्ष में नेतृत्व का बिखराव.

कानून-व्यवस्था बनाम सामाजिक न्याय : सख्त शासनबनामअधिकार और प्रतिनिधित्वकी सीधी बहस.

विकास बनाम रोजगार : एक्सप्रेसवे और निवेश बनाम युवाओं की नौकरी का सवाल

तीसरी ताकत का असर : मायावती का ब्राह्मण-दलित-मुस्लिम समीकरण खेल बिगाड़ सकता है.

सबसे बड़ा फैक्टर, वोट बंटवारा : अखिलेश यादव और बसपा अलग रहे तो सीधा फायदा बीजेपी को.

पिछले चुनाव, अगला संकेत

चुनाव वर्ष            बीजेपी सीटें        सपा सीटें             बसपा सीटें          मुख्य ट्रेंड

2017                       300                         47                           19           मोदी लहर $ विपक्ष बिखरा

2022                       250$                       110                         1              बीजेपी मजबूत, सपा उभरी

2027                      ???                         ???                         ???

वोट बंटवारा बनाम एकजुटता

2027 का परिणाम पूरी तरह विपक्ष की रणनीति और वोट ट्रांसफर पर निर्भर

निर्णायक फैक्टर

नेतृत्व : योगी की स्पष्ट बढ़त

मुद्दे : कानून-व्यवस्था बनाम बेरोजगारी

गणित : सपा-बसपा का समीकरण या बिखराव

यूपी में जीत सिर्फ वोटों से नहीं, विरोधी वोटों के बंटवारे से तय होती है, 2027 इसका सबसे बड़ा उदाहरण बन सकता है। अगर विपक्ष नहीं जुड़ा, तो हर बंटा वोट बीजेपी के लिए सत्ता की सीढ़ी बन जाएगा। 2027 में लड़ाई सिर्फ चेहरों की नहीं, गणित की है, और यही गणित सत्ता की दिशा तय करेगा।

तीन ध्रुव, एक जंग

3 चेहरे, 3 रणनीति, 1 सत्ता

योगी आदित्यनाथ : बीजेपी

फोकस : कानून-व्यवस्था $ विकास

रणनीतिःमजबूत नेतृत्वऔरडिलीवरीके दम पर हैट्रिक

अखिलेश यादव : सपा

फोकस : रोजगार, किसान, सामाजिक न्याय

रणनीति : एंटी-इंकम्बेंसी को भुनाकर जनादेश बदलने की कोशिश

मायावती : बसपा

फोकस : दलित $ ब्राह्मण $ मुस्लिम समीकरण

रणनीति : सोशल इंजीनियरिंग 2.0 से त्रिकोणीय मुकाबला

चुनावी गणित : असली खेल कहां?

सीधी लड़ाई नहीं, बिखरी लड़ाई

वोट शेयर से ज्यादा वोट ट्रांसफर अहम

सपा-बसपा अलग = बीजेपी मजबूत

निर्णायक सवाल

क्या योगी का कानून-व्यवस्था मॉडल फिर भरोसा दिलाएगा?

क्या सपा बेरोजगारी और किसान मुद्दों को वोट में बदल पाएगी?

क्या बसपा समीकरण बनाएगी या वोट काटेगी?

महिलाओं का अधिकार है आरक्षण, विपक्ष का विरोध ‘राजनीतिक स्वार्थ’: सुरेश खन्ना

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