Sunday, 9 August 2026

ब्राह्मण कार्ड के बीच दंगों की स्मृति पर भारी पड़ रहा ‘योगी मॉडल’

ब्राह्मण कार्ड के बीच दंगों की स्मृति पर भारी पड़ रहा ‘योगी मॉडल’ 

उत्तर प्रदेश की राजनीति में शायद ही कोई चुनाव ऐसा रहा हो जिसमें जातीय समीकरण चर्चा के केंद्र में न रहे हों। लेकिन इस बार गांव की चौपालों, कस्बों की चाय दुकानों, शहरों के बाजारों और व्यापारिक बैठकों में जो बहस सुनाई दे रही है, उसका स्वर कुछ अलग है। सपा के ब्राह्मण आउटरीच अभियान की चर्चा जरूर है, पर उससे कहीं अधिक चर्चा उस सवाल की है कि प्रदेश ने पिछले डेढ़ दशक में कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर क्या खोया और क्या पाया। पूर्वांचल से लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक बातचीत में बार-बार 2012-2017 का दौर लौट आता है। व्यापारी पुराने दिनों की असुरक्षा याद करते हैं, परिवार बेटियों की चिंता का जिक्र करते हैं और बुजुर्ग उन घटनाओं का उल्लेख करते हैं जिन्होंने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया था। राजनीति में स्मृति एक बड़ा कारक होती है; चुनाव केवल वर्तमान पर नहीं, अतीत की अनुभूतियों पर भी लड़े जाते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के उपलब्ध आंकड़े इस बहस को नया आधार देते हैं। 2016 में उत्तर प्रदेश में हत्या के लगभग 4,889 मामले दर्ज हुए थे। उसी वर्ष डकैती के लगभग 284 और लूट के लगभग 5,100 से अधिक मामले दर्ज किए गए। बाद के वर्षों में हत्या के मामलों में क्रमिक कमी दर्ज हुई और 2024 के उपलब्ध सार्वजनिक आंकड़ों में यह संख्या लगभग 3,500 के आसपास रही। डकैती के मामलों में भी उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई। सरकार इन आंकड़ों को कानून-व्यवस्था में सुधार का प्रमाण मानती है, जबकि विपक्ष उनकी अलग व्याख्या करता है। पर इतना स्पष्ट है कि अपराध के प्रश्न पर जनता के बीच तुलना तेज हुई है 

सुरेश गांधी

फिरहाल, उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय समीकरण कभी स्थिर नहीं रहे। चुनाव की आहट के साथ ही सामाजिक समूहों के बीच नई सक्रियता शुरू हो जाती है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने भी अपनी राजनीतिक रणनीति को नए सिरे से आकार देना शुरू कर दिया है। सबसे अधिक चर्चा उनकी उस कोशिश की है जिसमें वे ब्राह्मण समाज को साधने का प्रयास करते दिखाई दे रहे हैं। देखा जाएं तो  उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण मतदाताओं को साधने की कोशिश नई नहीं है। सवाल यह है कि क्या समाजवादी पार्टी ब्राह्मण समाज का विश्वास जीत पाएगी, और यदि जीतती है तो उसका असर उत्तर प्रदेश की सत्ता पर कितना गहरा होगा? प्रदेश में ब्राह्मण आबादी को लेकर अलग-अलग अनुमान हैं, लेकिन अधिकांश राजनीतिक विश्लेषक इसे लगभग 10 से 12 प्रतिशत मानते हैं। संख्या भले सीमित दिखे, पर प्रभाव कहीं अधिक माना जाता है। लगभग 80 से 100 विधानसभा सीटों पर ब्राह्मण मतदाता निर्णायक भूमिका निभाने की स्थिति में हैं, जबकि वाराणसी, प्रयागराज, गोरखपुर, चंदौली, जौनपुर, भदोही, देवरिया, महाराजगंज, बस्ती, संत कबीर नगर, अमेठी, बलरामपुर और कानपुर जैसे जिलों में उनका प्रभाव विशेष रूप से उल्लेखनीय है। लेकिन मौजूदा माहौल में यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि क्या केवल जातीय समीकरण भाजपा के उस नैरेटिव को चुनौती दे पाएंगे, जिसे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राष्ट्रवाद, सख्त कानून-व्यवस्था और मजबूत शासन के आधार पर खड़ा किया है।

2017 के बाद भाजपा ने उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था को अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धियों में शामिल किया। माफिया कार्रवाई, अपराध नियंत्रण और प्रशासनिक सख्ती को भाजपा समर्थक वर्ग निर्णायक बदलाव के रूप में प्रस्तुत करता है। योगी आदित्यनाथ की छवि एक ऐसे नेता की बनाई गई है जो कानून लागू कराने में समझौता नहीं करते। यही कारण है कि भाजपा का समर्थक आधार केवल जातीय पहचान तक सीमित नहीं रहकर शासन और सुरक्षा के मुद्दे पर भी लामबंद दिखाई देता है। दूसरी ओर, अखिलेश यादव का ब्राह्मण आउटरीच अभी प्रतीकात्मक राजनीति से आगे बढ़कर व्यापक विश्वास में पूरी तरह तब्दील होता नहीं दिख रहा। सपा के पिछले शासनकाल को लेकर विरोधी दल कानून-व्यवस्था के प्रश्न उठाते रहे हैं और भाजपा उसी स्मृति को लगातार राजनीतिक रूप से सक्रिय रखती है। ऐसे में अखिलेश की चुनौती केवल ब्राह्मण वोट आकर्षित करने की नहीं, बल्कि यह भरोसा पैदा करने की भी है कि सपा सत्ता में आने पर स्थिर और सख्त प्रशासन दे सकेगी। भाजपा की रणनीति जातीय समीकरणों को पूरी तरह नकारती नहीं, बल्कि उन्हें व्यापक हिंदुत्व और राष्ट्रवादी विमर्श के भीतर समाहित करती है। यही वजह है कि ब्राह्मण सहित कई परंपरागत सामाजिक समूहों में भाजपा की पकड़ अभी भी मजबूत मानी जाती है। राम मंदिर, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दे इस राजनीतिक कथा को अतिरिक्त ऊर्जा देते हैं।

हालांकि राजनीति स्थिर नहीं होती। महंगाई, बेरोजगारी, स्थानीय असंतोष, टिकट वितरण और क्षेत्रीय समीकरण चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं। ब्राह्मण समाज के भीतर भी विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग राजनीतिक रुझान देखने को मिलते हैं। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि मुकाबला एकतरफा हो चुका है। फिर भी वर्तमान राजनीतिक संकेत यही बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव का ब्राह्मण कार्ड फिलहाल योगी आदित्यनाथ के राष्ट्रवाद और कानून-व्यवस्था वाले नैरेटिव के सामने अपेक्षित बढ़त हासिल करता नहीं दिख रहा। 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा पीडीए’—पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यकके फार्मूले पर चुनाव लड़ा और उल्लेखनीय सफलता हासिल की। पार्टी को लगभग 33.59 प्रतिशत वोट मिले और उसने 80 में से 37 सीटें जीतीं। यह प्रदर्शन भाजपा के लिए बड़ा झटका माना गया। लेकिन विधानसभा चुनाव लोकसभा से अलग होते हैं। प्रदेश की सत्ता तक पहुंचने के लिए लगभग 45 प्रतिशत वोट शेयर की आवश्यकता मानी जाती है। यही कारण है कि सपा नेतृत्व को लग रहा है कि केवल पीडीए के सहारे 2027 की लड़ाई जीतना कठिन होगा। यह अलग बात है कि जनेश्वर मिश्र की जयंती पर आयोजित ब्राह्मण सम्मेलन, माता प्रसाद पांडेय, सनातन पांडेय और पवन पांडेय जैसे चेहरों को आगे बढ़ाना तथा ब्राह्मण समाज के बीच संवाद बढ़ाना उसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

भाजपा का परंपरागत आधार और सपा की चुनौती

2014 के बाद से ब्राह्मण मतदाता बड़े पैमाने पर भाजपा के साथ जुड़े रहे हैं। विभिन्न चुनावी सर्वेक्षणों के अनुसार 2022 विधानसभा चुनाव में ब्राह्मण मतदाताओं का बहुत बड़ा हिस्सा भाजपा के पक्ष में गया। भाजपा को कुल 41.29 प्रतिशत वोट मिले और वह 255 सीटों के साथ सत्ता में लौटी। वहीं समाजवादी पार्टी लगभग 32 प्रतिशत वोट के साथ 111 सीटों पर सिमट गई। लोकसभा चुनाव 2024 में भी भाजपा गठबंधन का वोट शेयर लगभग 41.37 प्रतिशत रहा, जो सपा से काफी अधिक था। सपा का आकलन है कि यदि वह ब्राह्मण वोटों में 4–5 प्रतिशत की भी सेंध लगा देती है, तो भाजपा के वोट शेयर पर सीधा असर पड़ेगा और कई सीटों पर मुकाबला बदल सकता है।

योगी युग और ब्राह्मण उपेक्षा की बहस

2017 में भाजपा पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में लौटी और गोरक्षपीठ से जुड़े योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने। इसके बाद ब्राह्मण समाज के एक हिस्से में प्रतिनिधित्व और उपेक्षा को लेकर चर्चा शुरू हुई। हालांकि यह असंतोष राजनीतिक विमर्श में समय-समय पर उभरा, लेकिन अब तक ब्राह्मण मतदाताओं का बड़ा हिस्सा भाजपा से अलग नहीं हुआ है। यही वह जगह है जहां सपा अवसर देख रही है। पार्टी को लगता है कि ब्राह्मण समाज का एक तबका योगी नेतृत्व से दूरी महसूस कर सकता है। यदि उस तबके को राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सम्मान का भरोसा दिया जाए तो वह सपा की ओर झुक सकता है।

इतिहास क्या कहता है?

उत्तर प्रदेश की राजनीति का इतिहास बताता है कि ब्राह्मण समाज कई बार सत्ता परिवर्तन में महत्वपूर्ण कारक रहा है। आजादी के बाद लंबे समय तक ब्राह्मण समाज कांग्रेस के साथ रहा और कांग्रेस सत्ता में बनी रही। 1990 के दशक में मंडल और कमंडल राजनीति के बाद उसका बड़ा हिस्सा कांग्रेस से दूर हुआ। 2007 में मायावती ने ब्राह्मण-दलित सोशल इंजीनियरिंग के सहारे पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। 2014 के बाद यह वर्ग बड़े पैमाने पर भाजपा के साथ जुड़ गया। इस इतिहास ने सभी दलों को यह संदेश दिया है कि ब्राह्मण मतदाता संख्या से अधिक राजनीतिक प्रभाव रखते हैं।

मायावती का हमला और पीडीए की नई व्याख्या

ब्राह्मण राजनीति की बहस तब और तेज हो गई जब जनेश्वर मिश्र जयंती समारोह में पीडीए केपीकी नई व्याख्या को लेकर चर्चा छिड़ी। बसपा प्रमुख मायावती ने अखिलेश यादव पर हमला बोलते हुए कहा कि जोपीपहले पिछड़ा था, अब राजनीतिक स्वार्थ मेंपंडितकर दिया गया है। उन्होंने इसे अवसरवादी राजनीति बताते हुए कहा कि बसपासर्वजन हिताय, सर्वजन सुखायकी राजनीति करती है, जबकि सपा चुनावी लाभ के लिए सामाजिक समीकरण बदलती रहती है। मायावती का यह बयान केवल आलोचना नहीं था; यह बसपा की अपनी रणनीति का संकेत भी था। बसपा भी ब्राह्मण समाज को फिर से जोड़ने की कोशिश कर रही है और कई ब्राह्मण प्रत्याशियों को टिकट दे चुकी है।

राजभर का तीखा हमला

सुभासपा प्रमुख और भाजपा सहयोगी ओम प्रकाश राजभर ने भी सपा पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि भाजपा ने राम मंदिर निर्माण के बाद ब्राह्मण समाज को सम्मान और रोजगार से जोड़ा, जबकि सपा सरकारों में यादव वर्चस्व रहा। उन्होंने पुलिस, लेखपाल, कानूनगो और अन्य भर्तियों में पक्षपात के आरोप लगाए। उनके बयान का उद्देश्य स्पष्ट थाब्राह्मण मतदाताओं को यह संदेश देना कि सपा की राजनीति परिवार और जाति तक सीमित है। हालांकि इन दावों की राजनीतिक व्याख्या अलग-अलग हो सकती है, लेकिन चुनावी माहौल में ऐसे बयान सामाजिक ध्रुवीकरण को प्रभावित करते हैं।

ब्राह्मण सम्मेलन और जनेश्वर मिश्र की विरासत

सपा की रणनीति का एक महत्वपूर्ण पक्ष जनेश्वर मिश्र की विरासत है। जनेश्वर मिश्र केवल समाजवादी विचारक ही नहीं, बल्कि ब्राह्मण समाज के प्रभावशाली नेता भी माने जाते थे। सपा उसी विरासत को पुनर्जीवित करने की कोशिश कर रही है। लेकिन भाजपा ने पलटवार करते हुए कहा कि जनेश्वर मिश्र के समाजवादी विचारों पर चर्चा करने के बजाय सम्मेलन को चुनावी मंच बना दिया गया। उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक ने आरोप लगाया कि सपा ब्राह्मणों से वोट तो चाहती है, लेकिन सत्ता परिवार के भीतर ही रखती है। उन्होंने कहा कि जनेश्वर मिश्र की जयंती का उपयोग समाजवादी विचारधारा के प्रचार के बजाय राजनीतिक लाभ के लिए किया गया।

क्या ब्राह्मण वोट आधा भी खिसका तो बदल जाएगा खेल?

सपा का आकलन है कि यदि ब्राह्मण समाज का आधा वोट भी उसके साथ जाता है तो उत्तर प्रदेश की राजनीति का समीकरण बदल सकता है। यह दावा राजनीतिक रूप से आकर्षक जरूर है, लेकिन व्यावहारिक रूप से कठिन दिखता है। वर्तमान में ब्राह्मण मतदाता भाजपा के सबसे संगठित समर्थन समूहों में माने जाते हैं। फिर भी यह मानना गलत होगा कि कोई वोट बैंक स्थायी होता है। स्थानीय उम्मीदवार, क्षेत्रीय मुद्दे, प्रशासनिक संतोष-असंतोष और सामाजिक प्रतिनिधित्व चुनावी व्यवहार को प्रभावित करते हैं। पूर्वांचल की कई सीटों पर ब्राह्मण मतदाताओं का रुझान चुनाव परिणामों में निर्णायक साबित हो सकता है।

सिर्फ जाति नहीं, भरोसे की राजनीति

सपा की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह ब्राह्मण समाज के बीच भरोसा कैसे बनाए। केवल सम्मेलन, बयान या प्रतीकात्मक चेहरे पर्याप्त नहीं होंगे। प्रतिनिधित्व, संगठन में हिस्सेदारी, उम्मीदवार चयन और प्रशासनिक दृष्टि से विश्वास पैदा करना होगा। भाजपा की ताकत यह है कि उसने ब्राह्मण समाज को व्यापक हिंदुत्व और राष्ट्रीय राजनीति से जोड़ा है। सपा को उस भावनात्मक और वैचारिक संबंध में सेंध लगानी होगी, जो आसान नहीं है।

2027 की लड़ाई: त्रिकोणीय नहीं, बहुस्तरीय मुकाबला

2027 का चुनाव केवल भाजपा बनाम सपा नहीं होगा। बसपा भी सक्रिय है और ब्राह्मण समाज को आकर्षित करने की कोशिश कर रही है। यदि बसपा ब्राह्मण वोटों का कुछ हिस्सा वापस खींचने में सफल होती है तो उसका असर सपा और भाजपा दोनों पर पड़ेगा। इसलिए ब्राह्मण राजनीति का अर्थ केवल सपा की रणनीति नहीं, बल्कि तीनों प्रमुख दलों के बीच प्रभाव की प्रतिस्पर्धा है।

आंकड़ों में चुनावी तस्वीर

चुनाव               भाजपा वोट शेयर        सपा वोट शेयर             परिणाम

2022 विधानसभा                 41.29%                  ~32%                                     भाजपा 255 सीट

2024 लोकसभा                   41.37%                  33.59%                                  सपा 37 सीट

इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि सपा और भाजपा के बीच लगभग 8 प्रतिशत का अंतर बना हुआ है। यदि सपा ब्राह्मण वोटों में 4–5 प्रतिशत की वृद्धि करती है और वह सीधे भाजपा से आता है, तो यह अंतर काफी कम हो सकता है। यही गणित सपा की पूरी रणनीति के केंद्र में है।

क्या 2007 दोहराया जा सकता है?

बहुत से विश्लेषक 2007 की तुलना कर रहे हैं, लेकिन परिस्थितियां अलग हैं। तब बसपा के पास मजबूत दलित आधार और मायावती का केंद्रीकृत नेतृत्व था। आज भाजपा राज्य की प्रमुख शक्ति है और विपक्ष सामाजिक गठबंधन का विस्तार करने की कोशिश कर रहा है। इसलिए 2007 की हूबहू पुनरावृत्ति की संभावना सीमित मानी जाती है।

ब्राह्मण कार्ड बना चुनावी केंद्र

उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण समाज की भूमिका फिर केंद्र में गई है। सपा पीडीए के बाद ब्राह्मणों को जोड़कर व्यापक सामाजिक गठबंधन बनाना चाहती है। भाजपा अपने पारंपरिक समर्थन को बनाए रखने में लगी है, जबकि बसपा ब्राह्मण-दलित समीकरण को फिर सक्रिय करना चाहती है। अंततः 2027 का चुनाव यह तय करेगा कि ब्राह्मण समाज भाजपा के साथ मजबूती से बना रहता है, सपा की ओर आंशिक रूप से झुकता है या बहुजन राजनीति की ओर नया रास्ता तलाशता है। इतना तय है कि आने वाले महीनों में उत्तर प्रदेश की राजनीति का सबसे बड़ा प्रश्न यही रहेगाक्या ब्राह्मण वोट केवल प्रभावशाली रहेगा या वास्तव में सत्ता परिवर्तन का निर्णायक कारक बनेगा?

मिश्रा जी, कुछ तो…’

अखिलेश यादव की हालिया प्रेस कॉन्फ्रेंस में पत्रकार से जाति पूछने और पत्रकार द्वारामिश्राबताने पर अखिलेश की टिप्पणी—“अरे मिश्रा जी, कुछ तो…”—ने सियासी बहस को नई धार दे दी है। भाजपा ने इसेचयनात्मक जातीय राजनीतिकरार दिया, जबकि सपा खेमे ने इसे सामान्य संवाद बताया। इस घटनाक्रम ने 2007 की उस राजनीति की याद ताजा कर दी है जब मायावती ने बसपा की पारंपरिक लाइन बदलकर ब्राह्मण-दलित सोशल इंजीनियरिंग का सफल प्रयोग किया था। तब बसपा ने बड़ी संख्या में ब्राह्मण प्रत्याशी उतारे थे और चालीस से अधिक ब्राह्मण विधायक विधानसभा पहुंचे थे। कई मंत्री बने और सत्ता में उनकी भागीदारी स्पष्ट दिखाई दी थी।

क्या सपा फिर वही फार्मूला आजमा रही है?

राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि सपापीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के साथ ब्राह्मण समाज को भी जोड़ने की कोशिश कर रही है। पार्टी नेताओं की हालिया सक्रियता, ब्राह्मण सम्मेलनों और कुछ प्रतीकात्मक राजनीतिक संदेशों को इसी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। सपा समर्थकों का तर्क है कि पार्टी सामाजिक सम्मान और प्रतिनिधित्व की बात कर रही है। वहीं भाजपा का आरोप है कि यह केवल चुनावी गणित है और सपा का इतिहास ब्राह्मण विरोधी राजनीति से जुड़ा रहा है।

भाजपा का पलटवार: ‘ब्राह्मण राष्ट्रवादी और सनातनवादी

भाजपा नेताओं का कहना है कि ब्राह्मण मतदाता लंबे समय से भाजपा के साथ हैं क्योंकि पार्टी ने उन्हें सम्मानजनक प्रतिनिधित्व दिया है। पार्टी यह भी याद दिला रही है कि वर्तमान में कई राज्यों में ब्राह्मण चेहरे मुख्यमंत्री पद पर हैं और भाजपा का सामाजिक आधार केवल एक जाति तक सीमित नहीं है।

ब्राह्मण वोट कितना असरदार?

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार राष्ट्रीय स्तर पर ब्राह्मण आबादी सीमित है, लेकिन उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में उनका प्रभाव कई सीटों पर निर्णायक हो सकता है। विशेषकर त्रिकोणीय मुकाबलों में उनका झुकाव परिणाम बदलने की क्षमता रखता है।

2007 बनाम 2027: फर्क क्या है?

विशेषज्ञ मानते हैं कि 2007 का राजनीतिक वातावरण आज से अलग था। तब बसपा के पास स्पष्ट दलित आधार और मायावती का मजबूत नेतृत्व था। आज भाजपा राज्य की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक शक्ति है और विपक्ष विभिन्न सामाजिक समूहों को जोड़ने की कोशिश कर रहा है। इसलिए वही परिणाम दोहराना आसान नहीं माना जा रहा।

सियासत का बड़ा सवाल

अखिलेश यादव की प्रेस कॉन्फ्रेंस की टिप्पणी भले एक क्षणिक संवाद रही हो, लेकिन उसने उत्तर प्रदेश की राजनीति का बड़ा सवाल फिर सामने ला दिया हैक्या 2027 का चुनाव पीडीए बनाम हिंदुत्व होगा, या उसके भीतर ब्राह्मण राजनीति एक नया निर्णायक अध्याय लिखेगी? फिलहाल इतना तय है कि 2007 की सोशल इंजीनियरिंग की स्मृतियां फिर राजनीतिक मंच पर लौट आई हैं, और सभी दल ब्राह्मण समाज को संदेश देने की होड़ में दिखाई दे रहे हैं।

यूपी में अपराध : तब और अब

NCRB के उपलब्ध सार्वजनिक आंकड़ों पर आधारित तुलना

अपराध श्रेणी       2016    -           2024

हत्या                  4,889               लगभग 3,500

डकैती लगभग 284 काफी कम

लूट लगभग 5,100+ उतार-चढ़ाव, पर अपेक्षाकृत कम

संपत्ति अपराध उच्च स्तर कमी का दावा

चौपालों में सुनाई देता बदलता स्वर

अब बाजारों में पहले जैसी दहशत नहीं दिखती

फिरौती के लिए अपहरण की घटनाएं पहले जितनी चर्चा में नहीं रहीं

व्यापारी वर्ग देर रात कारोबार को लेकर अधिक सुरक्षित महसूस करने की बात करता है

ग्रामीण इलाकों में भी कानून-व्यवस्था पर चर्चा का स्वर बदला हुआ बताया जा रहा है

ब्राह्मण कार्ड के बीच दंगों की स्मृति पर भारी पड़ रहा ‘योगी मॉडल’

ब्राह्मण कार्ड के बीच दंगों की स्मृति पर भारी पड़ रहा ‘योगी मॉडल ’  उत्तर प्रदेश की राजनीति में शायद ही कोई चुनाव ऐसा रहा हो जिसमें जातीय ...