Thursday, 3 September 2026

चौपड़ के पासे नहीं, जीवन की बाजी कैसे चलानी है, सिखाते हैं श्रीकृष्ण

चौपड़ के पासे नहीं, जीवन की बाजी कैसे चलानी है, सिखाते हैं श्रीकृष्ण

जन्माष्टमी हमें केवल यह याद नहीं दिलाती कि हजारों वर्ष पहले किसी मध्यरात्रि में कृष्ण जन्मे थे। यह भी याद दिलाती है कि हर युग को अपने भीतर कृष्ण की आवश्यकता होती है। आज परिवारों में संवाद कम हो रहा है, रिश्तों में प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है, मित्रता में स्वार्थ प्रवेश कर रहा है और निर्णयों में विवेक के स्थान पर आवेश हावी हो रहा है। ऐसे समय में कृष्ण की ओर लौटना किसी पुराने आख्यान की ओर लौटना नहीं, बल्कि जीवन के मूल प्रश्नों की ओर लौटना है। परिवार को जीतने का नहीं, जोड़ने का स्थान बनाना होगा। किसी अपने को हराकर स्वयं विजेता बनने की कोशिश अंततः पूरे परिवार की हार होती है। कृष्ण हमें संबंधों की जटिलता में भी संतुलन, संवाद और विवेक का रास्ता दिखाते हैं। इसलिए परिवार के केंद्र में कृष्ण जैसा गुरु-भाव होना चाहिएजो जीतने की नहीं, जोड़ने की शिक्षा दे। जीवन में हमारे हाथ में हमेशा सारे पासे नहीं होते। संसाधन सीमित हो सकते हैं, परिस्थितियां प्रतिकूल हो सकती हैं, सामने वाला अधिक शक्तिशाली हो सकता है। लेकिन परिणाम केवल साधनों से तय नहीं होता; निर्णय की गुणवत्ता भी उसे प्रभावित करती है। कौरवों के पास बड़ी सेना थी, पांडवों के पास कृष्ण। यह किसी चमत्कार का नहीं, दृष्टि का प्रतीक है। कृष्ण यानी स्पष्ट चिंतन, दृढ़ निर्णय और आत्मविश्वास। इसलिए कृष्ण हमारे भीतर कहीं बाहर से आने वाले देवता की तरह नहीं, बल्कि विवेक की उस संभावना की तरह भी उपस्थित हैं जिसे जागृत करना होता है 

सुरेश गांधी

श्रीकृष्ण को किसी एक रूप में बांधना शायद स्वयं कृष्ण की विराटता को सीमित करना होगा। वे केवल देवता नहीं हैं, केवल नायक नहीं हैं, केवल प्रेम के प्रतीक नहीं हैं और केवल युद्धभूमि के सारथी भी नहीं। वे जीवन की उन तमाम स्थितियों में साथ खड़े दिखाई देते हैं, जहां मनुष्य कभी प्रेम में पड़ता है, कभी मित्रता निभाता है, कभी मोह में उलझता है, कभी कर्तव्य से पीछे हटता है और कभी धर्म-अधर्म के बीच निर्णय लेने में असमर्थ हो जाता है। इसीलिए कृष्ण भारतीय चेतना के सबसे निकट दिखाई देने वाले देवता हैं। वे मंदिर में जितने हैं, उतने ही मनुष्य के भीतर भी हैं। वे वृंदावन की बांसुरी में हैं तो कुरुक्षेत्र के शंखनाद में भी। वे यशोदा के आंगन में माखन चुराते बालक हैं तो अर्जुन के रथ पर जीवन का सबसे गूढ़ दर्शन समझाते योगेश्वर भी। कृष्ण को समझना वस्तुतः जीवन को समझना है। उनका जीवन बताता है कि हर परिस्थिति में जीतने के लिए केवल शक्ति पर्याप्त नहीं होती, विवेक भी चाहिए। कभी दो कदम पीछे हटना पराजय नहीं, बड़ी विजय की भूमिका हो सकता है। जरासंध के लगातार आक्रमणों के बीच मथुरा से द्वारका की ओर जाना इसी रणनीतिक दृष्टि का उदाहरण माना जाता है। रणभूमि में पीछे हटे कृष्ण, लेकिन इतिहास और रणनीति में आगे निकल गए। यही कृष्ण का जीवन-दर्शन हैहर संघर्ष तलवार से नहीं जीता जाता; कुछ युद्ध बुद्धि, धैर्य और समय की पहचान से जीते जाते हैं।  

कृष्ण को पाने के लिए भीतर का अंधकार हटाना होगा

जन्माष्टमी की मध्यरात्रि का आध्यात्मिक अर्थ शायद यही है। जब बाहर अंधकार है, तब भीतर प्रकाश जन्म ले। जब मन भयभीत है, तब विश्वास जन्म ले। जब जीवन में मोह छाया है, तब विवेक जन्म ले। जब अन्याय सामने है, तब धर्म के पक्ष में खड़े होने का साहस जन्म ले। कृष्ण का जन्म हर वर्ष केवल मथुरा की कारागार में नहीं होना चाहिए। वह हमारे भीतर भी होना चाहिए। जब हम क्रोध पर करुणा को चुनें, तब कृष्ण जन्म लें। जब हम स्वार्थ पर मित्रता को चुनें, तब कृष्ण जन्म लें। जब हम निराशा पर कर्म को चुनें, तब कृष्ण जन्म लें। जब हम भय पर सत्य को चुनें, तब कृष्ण जन्म लें। और जब हम अपने हिस्से का धर्म निभाने के लिए खड़े हों, तब समझना चाहिए कि हमारे भीतर का कृष्ण जाग रहा है। मित्रता में सुदामा, प्रेम में राधा, करुणा में विदुर, नीति में पार्थसारथि और धर्म में गीताश्रीकृष्ण जीवन के हर प्रश्न का अपना-सा उत्तर हैं.

कृष्णमित्रता, प्रेम, भक्ति और करुणा का संगम

कृष्ण का व्यक्तित्व जितना विराट है, उतना ही आत्मीय भी। यही उनकी सबसे बड़ी विशेषता है। वे राजा के मित्र हो सकते हैं, निर्धन सुदामा के सखा भी। वे अर्जुन के सारथी बन सकते हैं और द्रौपदी की पुकार पर रक्षक भी। सुदामा के प्रसंग में कृष्ण की मित्रता सामाजिक ऊंच-नीच की सारी दीवारें तोड़ देती है। द्वारका के वैभव में रहने वाला राजा अपने निर्धन बालसखा को देखते ही पद और प्रतिष्ठा भूल जाता है। सुदामा के लिए कृष्ण का भावुक हो जाना यह बताता है कि सच्ची मित्रता में व्यक्ति की हैसियत नहीं, हृदय का रिश्ता देखा जाता है। कृष्ण सुदामा के चरणों का आदर करते हैं। मित्र के साथ उनका यह व्यवहार उस समाज के लिए संदेश है जिसमें मनुष्य अक्सर दूसरे मनुष्य को उसके पद, संपत्ति और प्रतिष्ठा से आंकने लगता है। अर्जुन के साथ कृष्ण का संबंध मित्रता का दूसरा आयाम सामने रखता है। अर्जुन जब मोह और विषाद से भरकर गांडीव रख देता है, तब कृष्ण उसके भीतर छिपे योद्धा को जगाते हैं। वे उसे केवल युद्ध करने के लिए नहीं कहते, बल्कि कर्म, आत्मा, कर्तव्य, मोह, ज्ञान और समत्व का ऐसा दर्शन देते हैं जो हजारों वर्षों बाद भी मनुष्य के मनोविज्ञान को समझने की कुंजी बना हुआ है। यही वह क्षण है जब कृष्ण सारथी से योगेश्वर बन जाते हैं।

विषाद से प्रसाद तक की यात्रा है गीता

कुरुक्षेत्र में अर्जुन की समस्या केवल युद्ध की नहीं थी। उसके सामने अपने ही संबंधी, गुरु और प्रियजन खड़े थे। मनुष्य की सबसे बड़ी लड़ाई अक्सर बाहर नहीं, भीतर होती है। अर्जुन का संकट इसी आंतरिक संघर्ष का प्रतीक है। श्रीकृष्ण ने उसे पलायन का मार्ग नहीं दिखाया। उन्होंने कहा कि जीवन से भागना समाधान नहीं है। अपने स्वधर्म और कर्तव्य को समझकर कर्म करना ही मनुष्य की सार्थकता है। गीता का संदेश इसी कारण किसी एक युग या किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं है। यह उस हर व्यक्ति की पुस्तक है जो निर्णय के क्षण में खड़ा है। कृष्ण अर्जुन को भय से वीरता की ओर, विषाद से प्रसाद की ओर और मोह से विवेक की ओर ले जाते हैं। इसीलिए कृष्ण का दर्शन केवल पूजा का विषय नहीं, जीवन-प्रबंधन का भी दर्शन है।

रणभूमि में भी धर्म, जीवन में भी धर्म

कृष्ण का चरित्र इसलिए अद्वितीय है कि वे जीवन की जटिलताओं से आंखें नहीं चुराते। वे जानते हैं कि संसार हमेशा सरल नैतिक परिस्थितियां नहीं देता। कभी धर्म की रक्षा के लिए ऐसी रणनीति भी अपनानी पड़ती है जिसे सतही दृष्टि से देखने वाला व्यक्ति स्वीकार कर पाए। दुर्योधन के पास विशाल सेना थी, लेकिन कृष्ण पांडवों के साथ खड़े हुए। उन्होंने स्वयं शस्त्र उठाने का निर्णय लिया, फिर भी उनकी उपस्थिति ने युद्ध की दिशा बदल दी। वे चाहते तो अपनी पूरी सेना पांडवों को दे सकते थे और स्वयं कौरवों की ओर चले जाते, लेकिन उन्होंने अपने लिए युद्ध से अधिक महत्वपूर्ण भूमिका चुनीसारथी की। यह निर्णय बताता है कि नेतृत्व हमेशा सिंहासन पर बैठकर नहीं किया जाता। कई बार सबसे बड़ा नेतृत्व किसी दूसरे के रथ की लगाम अपने हाथ में लेकर किया जाता है।

कृष्णसमग्रता में ही सुंदरता

भारतीय चिंतन ने जीवन के चार पुरुषार्थ बताएधर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। कृष्ण इन चारों को एक-दूसरे का विरोधी नहीं मानते, बल्कि जीवन की समग्रता में देखते हैं। वृंदावन में वे प्रेम और उल्लास के कृष्ण हैं। मथुरा में अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करने वाले कृष्ण हैं। द्वारका में शासन और राजनीति की जटिलताओं से जूझते कृष्ण हैं। कुरुक्षेत्र में योगेश्वर हैं। इसलिए कृष्ण को केवल विरक्ति में खोजना उनके व्यक्तित्व को अधूरा समझना होगा। वे जीवन को छोड़ने की नहीं, जीवन को समझकर जीने की प्रेरणा देते हैं। उनके लिए कर्म है, लेकिन कर्म में आसक्ति नहीं। प्रेम है, लेकिन प्रेम में स्वामित्व नहीं। शक्ति है, लेकिन शक्ति में अहंकार नहीं। राजनीति है, लेकिन राजनीति में व्यापक लोकहित की दृष्टि है। यही कृष्ण की समग्रता है और यही उनकी सुंदरता।

जब धर्म कमजोर होता है, तब कृष्ण की जरूरत बढ़ जाती है

गीता में श्रीकृष्ण का प्रसिद्ध संदेश हैयदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत...” अर्थात जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब धर्म की पुनर्स्थापना के लिए ईश्वर का अवतरण होता है। इस कथन का अर्थ केवल किसी चमत्कार की प्रतीक्षा करना नहीं है। इसका एक गहरा सामाजिक अर्थ भी है। जब अन्याय बढ़े तो मनुष्य को निष्क्रिय दर्शक नहीं बने रहना चाहिए। जब असत्य शक्तिशाली हो जाए तो सत्य को साहस चाहिए। जब समाज में भय फैलने लगे तो किसी कृष्ण की तरह विवेकपूर्ण नेतृत्व की आवश्यकता होती है। कृष्ण का सबसे बड़ा संदेश शायद यही है कि धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि सही समय पर सही पक्ष में खड़े होने का साहस भी है।

मथुरा की कारा से वृंदावन के आंगन तक

भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी की मध्यरात्रि। मथुरा की कारागार। बाहर घनघोर अंधकार और वर्षा। भीतर देवकी और वसुदेव के जीवन में जन्म लेता एक बालक, जिसके जन्म की कथा भारतीय सभ्यता के सबसे लोकप्रिय आख्यानों में शामिल हो जाती है। कृष्ण का जन्म अत्याचार के बीच होता है। कंस को भय है कि देवकी का आठवां पुत्र उसके अंत का कारण बनेगा। जन्म लेते ही वसुदेव कृष्ण को लेकर यमुना पार गोकुल पहुंचते हैं। नंद-यशोदा के घर बालकृष्ण का पालन-पोषण होता है। यहीं से कृष्ण की बाल-लीलाओं का वह संसार आरंभ होता है, जिसमें माखन की मटकी है, गोप-बालकों की टोली है, बांसुरी है, गायें हैं, यशोदा की डांट है और वृंदावन का निश्छल उल्लास है। यही बालक आगे चलकर कंस का अंत करता है, अत्याचार के विरुद्ध खड़ा होता है और धर्म की स्थापना के व्यापक अभियान का नायक बनता है।

कान्हा से योगेश्वर तककृष्ण के अनेक आयाम

कृष्ण के जीवन में विरोधाभास दिखाई देते हैं, लेकिन यही विरोधाभास उनके व्यक्तित्व की पूर्णता बन जाते हैं। वे माखन चोर हैं और गीता के उपदेशक भी। वे रास के रसिक हैं और योगेश्वर भी। वे गोवर्धनधारी हैं और रणभूमि के सारथी भी। वे सुदामा के मित्र हैं और द्वारका के शासक भी। उनकी बांसुरी मन को मोहती है, तो उनका सुदर्शन चक्र अधर्म के विरुद्ध चेतावनी देता है। वह कृष्ण ही हैं जो कालिय नाग के फण पर नृत्य करते हैं, गोवर्धन पर्वत उठाकर ब्रजवासियों की रक्षा करते हैं और कुरुक्षेत्र में विराट स्वरूप का दर्शन कराते हैं। कृष्ण का यही बहुआयामी स्वरूप उन्हें अन्य पौराणिक पात्रों से अलग बनाता है।

राधा में प्रेम, सुदामा में मित्रता और द्रौपदी में विश्वास

कृष्ण और राधा का संबंध भारतीय भक्ति परंपरा में प्रेम का सर्वोच्च प्रतीक बन गया। यह प्रेम केवल सांसारिक आकर्षण नहीं, बल्कि आत्मा और परमात्मा के बीच के उस संबंध का प्रतीक माना गया जिसमें पाने से अधिक समर्पण महत्वपूर्ण है। सुदामा कृष्ण की मित्रता का प्रतीक हैं। द्रौपदी कृष्ण पर उस अटूट विश्वास का प्रतीक हैं जिसमें संकट की अंतिम घड़ी में भी मनुष्य को भरोसा रहता है कि कोई है जो उसकी पुकार सुनेगा। विदुर के घर कृष्ण का सादा आतिथ्य स्वीकार करना भी इसी आत्मीयता का उदाहरण है। कृष्ण को राजसी वैभव से अधिक प्रेम और भाव की कीमत मालूम है। इसीलिए कृष्ण गरीब की कुटिया में भी उतने ही सहज हैं जितने राजमहल में।

कृष्ण और युवा मन

आज का युवा कृष्ण को इसलिए भी अपना मानता है क्योंकि कृष्ण केवल उपदेश देने वाले देवता नहीं हैं। उनके भीतर मित्र है, प्रेमी है, रणनीतिकार है, नेतृत्वकर्ता है और सबसे बढ़कर संकट में रास्ता दिखाने वाला साथी है। आज जब रिश्ते सुविधा के आधार पर बदलते दिखाई देते हैं, कृष्ण-सुदामा की मित्रता प्रश्न खड़ा करती हैक्या हम मित्रता में भी व्यक्ति की हैसियत देखते हैं? जब प्रेम अधिकार और स्वामित्व में बदलने लगता है, राधा-कृष्ण का प्रेम समर्पण का अर्थ समझाता है। जब करियर और प्रतिस्पर्धा के बीच युवा मानसिक दबाव से गुजरता है, गीता का कर्मयोग उसे बताता है कि परिणाम की चिंता में वर्तमान कर्म को कमजोर नहीं किया जा सकता। और जब जीवन के निर्णय कठिन लगते हैं, अर्जुन के सामने खड़े कृष्ण बताते हैंनिर्णय से भागना भी एक निर्णय है।

जन्माष्टमी : व्रत से आगे, आत्मसंयम का उत्सव

कृष्ण जन्माष्टमी केवल जन्मोत्सव नहीं, आत्मचिंतन का पर्व भी है। परंपरा में इस व्रत को अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना गया है। श्रद्धालु उपवास रखते हैं, रात्रि में कृष्ण जन्म की प्रतीक्षा करते हैं और मध्यरात्रि में बालगोपाल का जन्मोत्सव मनाते हैं। कई परंपराओं में अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के संयोग को विशेष महत्त्व दिया जाता है। इसी कारण जन्माष्टमी की तिथि निर्धारण में विभिन्न संप्रदायों और पंचांग परंपराओं के अनुसार अंतर भी दिखाई दे सकता है। व्रत का मूल भाव केवल भोजन का त्याग नहीं है। यह इंद्रियों पर संयम, मन को एकाग्र करने और भीतर के अंधकार को दूर करने का संकल्प है। मध्यरात्रि इसलिए भी प्रतीकात्मक हैअंधकार के सबसे गहरे क्षण में प्रकाश का जन्म। कृष्ण जन्म का यही दर्शन है।

व्रतराजकी मान्यता और भक्ति का अनुशासन

धार्मिक परंपराओं में जन्माष्टमी व्रत कोव्रतराजकहा गया है। मान्यता है कि श्रद्धा और विधि-विधान से इस व्रत का पालन करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। भक्त दिनभर उपवास रखते हैं। कई लोग फलाहार करते हैं और मध्यरात्रि में जन्मोत्सव के बाद प्रसाद ग्रहण करते हैं। कुछ परंपराओं में पारण का समय तिथि और नक्षत्र की स्थिति के आधार पर निर्धारित किया जाता है। पूजन में पंचामृत, दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल, तुलसीदल, माखन-मिश्री और विभिन्न नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं। बालगोपाल को पालने में झुलाने की परंपरा भी अत्यंत लोकप्रिय है। परंपराओं का बाहरी रूप चाहे जितना अलग हो, उनका केंद्र एक ही हैभक्ति, संयम और समर्पण।

जन्माष्टमी की रात : जब घर-घर बन जाता है गोकुल

जन्माष्टमी की रात मंदिरों में भजन-कीर्तन गूंजते हैं। कहीं रासलीला होती है, कहीं झांकियां सजती हैं, कहीं पालना सजाया जाता है और कहीं शंख-घंटों के बीच बालकृष्ण के जन्म का उत्सव होता है। मध्यरात्रि में जैसे ही जन्म का क्षण आता है, भक्तों की आंखों में एक साथ आनंद और श्रद्धा उतर आती है। कहीं भगवान का दूध और पंचामृत से अभिषेक होता है, कहीं पालने में बालगोपाल को झुलाया जाता है और कहीं जन्म के प्रतीक रूप में खीरा चीरकर बालकृष्ण की आविर्भाव-लीला की जाती है। यह वह क्षण होता है जब भक्त के लिए मथुरा दूर नहीं रहती। उसका अपना घर ही गोकुल बन जाता है।

नंदोत्सव और छप्पन भोग : आनंद का विस्तार

जन्माष्टमी के अगले दिन कई स्थानों पर नंदोत्सव मनाया जाता है। कृष्ण के जन्म की खुशी में मिष्ठान और विविध पकवानों का भोग लगाया जाता है। छप्पन भोग की परंपरा भी कृष्ण भक्ति में विशेष स्थान रखती है। माखन-मिश्री, खीर, लड्डू, पेड़े, फल और अनेक प्रकार के व्यंजन भगवान को अर्पित किए जाते हैं और बाद में प्रसाद के रूप में वितरित किए जाते हैं। भोग का वास्तविक अर्थ भी यही हैजो मिला है, उसे पहले ईश्वर को समर्पित करना और फिर समाज के साथ बांटना।

दही-हांडी : उत्सव में छिपा सामूहिकता का संदेश

महाराष्ट्र सहित देश के कई हिस्सों में जन्माष्टमी दही-हांडी उत्सव के रूप में मनाई जाती है। ऊंचाई पर बांधी गई हांडी को युवाओं की टोली मानवीय पिरामिड बनाकर फोड़ती है। बाहरी रूप से यह खेल है, लेकिन इसके भीतर सामूहिक प्रयास का संदेश भी है। अकेला व्यक्ति ऊंचाई तक नहीं पहुंच सकता। एक दूसरे के कंधे का सहारा लेकर ही लक्ष्य हासिल होता है। कृष्ण का उत्सव इसीलिए केवल पूजा नहीं, सहभागिता का उत्सव भी है।

ब्रज से ब्राजील तककृष्ण की बांसुरी की वैश्विक गूंज

कृष्ण जन्माष्टमी अब केवल मथुरा, वृंदावन या भारत की सीमा तक सीमित पर्व नहीं रह गई है। दुनिया के अनेक देशों में भारतीय समुदाय और कृष्ण भक्ति से जुड़े लोग इसे श्रद्धा और उल्लास से मनाते हैं। कृष्ण की लोकप्रियता का रहस्य केवल उनकी कथा में नहीं, उनके उस मानवीय स्पर्श में है जो हर संस्कृति के व्यक्ति को अपने भीतर कुछ पहचानने का अवसर देता है। वृंदावन में वे कान्हा हैं, कहीं गोविंदा, कहीं गोपाल, कहीं गोवर्धनधारी और कहीं योगेश्वर। नाम बदलते हैं, भाव नहीं।

बांके बिहारी : जहां भगवान से पहले भक्त का भाव दिखाई देता है

वृंदावन का बांके बिहारी मंदिर कृष्ण भक्ति की विशिष्ट परंपरा का केंद्र है। यहां बिहारीजी के दर्शन से जुड़ी अनेक लोकमान्यताएं भक्तों को आकर्षित करती हैं। दर्शन के बीच परदा लगाए जाने की परंपरा के पीछे यह भाव जुड़ा है कि भक्त और भगवान का संबंध केवल देखने का नहीं, अनुभूति का है। यहां भगवान को बालक की तरह सेवा और स्नेह देने की भावना दिखाई देती है। सुबह जगाने से लेकर शयन तक की सेवा में कृष्ण को जीवंत उपस्थिति की तरह अनुभव किया जाता है। यही तो भक्ति की सबसे सुंदर अवस्था हैजहां मूर्ति पत्थर नहीं रहती और श्रद्धा केवल कर्मकांड नहीं रहती।

कृष्ण के बारह रूप : भक्ति की बारह मनोभूमियां

कृष्ण की आराधना में अनेक रूपों का ध्यान किया जाता है। विभिन्न परंपराओं में इनके नाम और साधना-विधियां अलग-अलग मिलती हैं, लेकिन इन रूपों को व्यापक रूप से मनुष्य की अलग-अलग आकांक्षाओं और भावनाओं से जोड़ा जाता है। 

लड्डू गोपालबाल सुलभ आनंद और समृद्धि की कामना का रूप। बंसीबजइयामन की शांति और माधुर्य का प्रतीक।

कालियामर्दनविष और भय पर विजय का संदेश।

बाल गोपालनिष्कपट बालभाव और संतान-सुख की कामना से जुड़ा रूप।

माखन चोरकृष्ण की बाल-लीला और सहज आनंद का रूप।

गोपाल कृष्णप्रकृति, गौ और सखा भाव से जुड़ा स्वरूप।

गोवर्धनधारीसंकट में समुदाय की रक्षा करने वाला कृष्ण।

राधानाथप्रेम, समर्पण और माधुर्य का स्वरूप।

रक्षा गोपालशरणागत की रक्षा का भाव।

भक्तवत्सलभक्त के प्रति करुणा और आत्मीयता का रूप।

योगीश्वर कृष्णज्ञान, कर्म और आत्मसंयम का प्रतीक।

विराट कृष्णउस विराट सत्ता का बोध, जिसमें संपूर्ण सृष्टि समाहित है। इन रूपों को केवल मनोकामना पूरी करने के साधन के रूप में देखना कृष्ण की व्यापकता को छोटा करना होगा। प्रत्येक रूप अपने भीतर जीवन का कोई कोई मूल्य छिपाए हुए है।

कृष्ण का सबसे बड़ा मंदिर मनुष्य का अंत:करण है

कृष्ण के इतने रूपों के बाद भी प्रश्न वही हैकृष्ण कहां मिलेंगे? क्या वे केवल मंदिर में हैं? क्या वे केवल जन्माष्टमी की मध्यरात्रि में मिलते हैं? क्या वे केवल मूर्ति, झांकी और आरती में हैं? शायद नहीं। कृष्ण उस क्षण में हैं जब कोई शक्तिशाली व्यक्ति कमजोर के पक्ष में खड़ा होता है। कृष्ण उस मित्रता में हैं जिसमें हिसाब नहीं रखा जाता। कृष्ण उस प्रेम में हैं जिसमें अधिकार से अधिक समर्पण है। कृष्ण उस निर्णय में हैं जिसमें भय के बावजूद कर्तव्य चुना जाता है। कृष्ण उस विवेक में हैं जो संसाधनों की कमी में भी सही रणनीति खोज लेता है। कृष्ण उस साहस में हैं जो अधर्म के सामने झुकने से इनकार करता है।

कृष्णरसमय भी, रहस्यमय भी

कृष्ण रस के भी देवता हैं और योग के भी। उनकी बांसुरी में संगीत है, गीता में दर्शन है, वृंदावन में प्रेम है और कुरुक्षेत्र में नीति। वे जितने दिखाई देते हैं, उससे कहीं अधिक अनकहे हैं। दूध में छिपे मक्खन की तरह कृष्ण का आनंद भी साधारण दृष्टि से दिखाई नहीं देता। उसे अनुभव करने के लिए भीतर उतरना पड़ता है। कृष्ण को पाने का रास्ता बाहर से भीतर की ओर जाता है। वह मंदिर से मन तक, आरती से आचरण तक और कथा से कर्म तक पहुंचता है।

कृष्ण को पूजना पर्याप्त नहीं

कृष्ण की पूजा आसान है, कृष्ण को जीना कठिन। मंदिर में फूल चढ़ाना आसान है, जीवन में करुणा चढ़ाना कठिन। माखन-मिश्री का भोग लगाना आसान है, अपने हिस्से का अहंकार छोड़ना कठिन। गीता पढ़ना आसान है, उसके कर्मयोग को जीवन में उतारना कठिन। कृष्ण के नाम का जाप आसान है, संकट में कृष्ण जैसी विवेकपूर्ण दृढ़ता दिखाना कठिन। लेकिन शायद जन्माष्टमी का सबसे बड़ा संदेश यही कठिन यात्रा है। कृष्ण को केवल जन्मदिन की शुभकामनाएं देने के बजाय उनके भीतर के मनुष्य, मित्र, रणनीतिकार, दार्शनिक और योगेश्वर को समझना होगा। क्योंकि कृष्ण किसी एक मंदिर में बंद होने वाले देवता नहीं हैं। वे जीवन की खुली किताब हैं। वे कहते हैंपरिस्थितियां कैसी भी हों, अपने भीतर के सारथी को जागृत करो। रथ तुम्हारा है, रणभूमि तुम्हारी है, निर्णय तुम्हारा है; लेकिन लगाम यदि विवेक के हाथ में है तो कठिन से कठिन यात्रा भी दिशा पा सकती है। और शायद इसी अर्थ में कृष्ण आज भी जन्म लेते हैंजब मनुष्य अपने भीतर के अंधकार के विरुद्ध खड़ा होता है। जब वह मोह से ऊपर उठकर कर्तव्य चुनता है। जब वह शक्ति के बजाय धर्म का साथ देता है। जब वह मित्रता को स्वार्थ से ऊपर रखता है। जब प्रेम को अधिकार नहीं, समर्पण समझता है। तभी जन्माष्टमी उत्सव से आगे बढ़कर जीवन-दर्शन बनती है। तभी कान्हा मंदिर से निकलकर मनुष्य के आचरण में उतरते हैं। और तभी कृष्ण को पूजना नहीं पड़ताकृष्ण को जीना शुरू हो जाता है।

चौपड़ के पासे नहीं, जीवन की बाजी कैसे चलानी है, सिखाते हैं श्रीकृष्ण

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