Monday, 7 September 2026

सात समंदर पार गूंजा काशी का लोकस्वर

सात समंदर पार गूंजा काशी का लोकस्वर 

सूरीनाम हेरिटेज फेस्टिवल में भोजपुरी की कजरी, सोहर और विवाह गीतों ने जगाईं अपनी जड़ों की स्मृतियां

वाराणसी की सरोज वर्मा के नेतृत्व में 10 सदस्यीय भारतीय दल ने पांच दिनों तक सूरीनाम में बिखेरी उत्तर भारतीय लोकसंस्कृति की खुशबू, पहले हेरिटेज फेस्टिवल में भारत की भोजपुरी परंपरा बनी आकर्षण का केंद्र

सुरेश गांधी

वाराणसी। सात समंदर पार...महाद्वीपों की दूरी लांघकर जब कजरी की तान उठी, सोहर के बोल गूंजे और विवाह गीतों की मिठास मंच पर उतरी तो वह महज संगीत नहीं था। वह स्मृतियों का लौटना था। अपनी मिट्टी, अपने गांव, अपने संस्कार और उन रिश्तों का लौटना था जिन्हें पीढ़ियां और समुद्र भी पूरी तरह मिटा नहीं पाए। दक्षिण अमेरिका के सूरीनाम में पहली बार आयोजित Suriname Heritage Festival में वाराणसी की लोकगायिका एवं आकाशवाणी-दूरदर्शन की -ग्रेड कलाकार सरोज वर्मा के नेतृत्व में पहुंचे 10 सदस्यीय भारतीय सांस्कृतिक दल ने भोजपुरी लोकसंगीत और लोकनृत्य के माध्यम से इसी जीवित सांस्कृतिक रिश्ते को स्वर दिया। भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR) के माध्यम से आमंत्रित दल ने 17 से 24 अगस्त तक सूरीनाम की सांस्कृतिक यात्रा की। पांच दिनों की प्रस्तुतियों में भोजपुरी की विविध लोकविधाओं ने स्थानीय दर्शकों से ऐसा संवाद बनाया, जिसमें भाषा की सीमाएं पीछे छूट गईं और भाव सीधे दिल तक पहुंचे। 

जहां गीत सिर्फ गीत नहीं, घर की याद हैं

सूरीनाम भारत से हजारों किलोमीटर दूर है, लेकिन वहां की सांस्कृतिक स्मृतियों में उत्तर भारत आज भी कहीं कहीं सांस लेता है। भारतीय मूल के लोगों के बीच भोजपुरी और अवधी से जुड़ी भाषाई-सांस्कृतिक परंपराएं पीढ़ियों से अपना अस्तित्व बनाए हुए हैं। सरनामी हिंदुस्तानी में भी इन भाषाई

परंपराओं की छाप दिखाई देती है। ऐसे में जब भारतीय दल ने कजरी, सोहर, विवाह गीत और भजन प्रस्तुत किए तो अनेक लोगों के लिए यह किसी विदेशी मंच पर हुआ कार्यक्रम भर नहीं रहा। गीतों के बोल उन्हें अपनी पारिवारिक स्मृतियों, पुरखों और सांस्कृतिक जड़ों तक ले गए। यही लोकसंस्कृति की सबसे बड़ी ताकत हैवह शब्दों से पहले स्मृतियों में उतरती है।

माता गौरी से शुरू हुआ लोकसुरों का सफर

19 अगस्त को माता गौरी में भारतीय दल की प्रस्तुतियों का आगाज हुआ। सरोज वर्मा ने कजरी, सोहर, विवाह गीत और भजन प्रस्तुत किए। पांच संगीतकारों और चार लोकनृत्य कलाकारों ने संगीत और नृत्य के माध्यम से भोजपुरी लोकजीवन के विविध रंग मंच पर उतारे। 20 अगस्त को Swami Vivekananda Cultural Centre (SVCC) में प्रस्तुति हुई। यहां भोजपुरी लोकसंगीत और लोकनृत्य के प्रति स्थानीय दर्शकों की उत्सुकता खास तौर पर दिखाई दी। 21 अगस्त को Palmentuin (Palm Garden) में भारतीय लोकपरंपरा ने सूरीनाम की बहुरंगी सांस्कृतिक विरासत के बीच अपनी जगह बनाई। वहीं 22 अगस्त को District Commissioner's Office, Nickerie में प्रस्तुति के साथ कलाकारों को स्थानीय समुदाय के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन को करीब से देखने का अवसर मिला।

जब गीतों के पीछे की कहानी भी सुनी गई

23 अगस्त का दिन इस यात्रा का अलग ही पड़ाव रहा। SVCC में विशेष सांस्कृतिक कार्यशाला आयोजित हुई। यहां लोकगीतों को सिर्फ गाया नहीं गया, बल्कि उनके पीछे छिपे अर्थ, परंपरा और सामाजिक संदर्भ भी समझाए गए। सरोज वर्मा ने संस्कार गीतों और भोजपुरी लोकगीतों की सामाजिक भूमिका पर विस्तार से जानकारी दी। प्रतिभागियों ने गीतों के अर्थ और उनके सांस्कृतिक संदर्भों को समझने में सक्रिय रुचि दिखाई। यहां लोकसंगीत मनोरंजन से आगे बढ़कर संस्कृति की पाठशाला बन गया।

कजरी में सावन, सोहर में जन्म, विवाह गीतों में रिश्ते

भारतीय दल के कार्यक्रमों में शामिल लोकविधाएं भोजपुरी समाज के जीवन का पूरा कैनवास अपने भीतर समेटे थीं। कजरी में ऋतु और विरह का भाव था, सोहर में जन्म की खुशी, विवाह गीतों में पारिवारिक उल्लास और भजनों में आस्था का स्वर। यानी इन गीतों में केवल सुर नहीं थे, बल्कि भारतीय लोकजीवन का वह दर्शन था जो जन्म से विवाह और ऋतु से भक्ति तक जीवन के हर पड़ाव को संगीत से जोड़ता है।

बहुसांस्कृतिक मंच पर भोजपुरी की अलग पहचान

Suriname Heritage Festival का पहला संस्करण अपने आप में महत्वपूर्ण था। सूरीनाम की पहचान को गढ़ने वाले विभिन्न समुदायों की सांस्कृतिक परंपराएं एक ही मंच पर दिखाई दीं। हिंदुस्तानी, अफ्रीकी एवं मैरून, जावानीज, चीनी और डच समुदायों की विरासतों के बीच भारतीय दल ने उत्तर भारत की भोजपुरी लोकपरंपरा का प्रतिनिधित्व किया। यहां भोजपुरी किसी एक क्षेत्र की बोली भर नहीं रही। उसने भारतीय लोकसंस्कृति की एक ऐसी तस्वीर पेश की जिसमें मिट्टी की गंध, पारिवारिक रिश्तों की ऊष्मा, ऋतुओं की संवेदना और आस्था के रंग एक साथ दिखाई दिए।

दाल-पराठे से कमल के पत्तों तक...भोजन में भी मिली अपनी मिट्टी

यात्रा केवल मंच और संगीत तक सीमित नहीं रही। सूरीनाम स्थित भारतीय दूतावास की ओर से भारतीय दल का आत्मीय स्वागत किया गया। भारत के राजदूत ने कलाकारों को अपने निवास पर रात्रिभोज के लिए आमंत्रित किया। Nickerie प्रवास के दौरान स्थानीय मेजबान की ओर से आयोजित दोपहर के भोजन में दाल-पराठा, उड़द वड़ा, कढ़ी-चावल और बैंगन का भर्ता जैसे व्यंजन परोसे गए। पारंपरिक ढंग से कमल के पत्तों पर परोसा गया यह भोजन भी कलाकारों के लिए सांस्कृतिक अनुभव बन गया। कभी-कभी किसी देश को उसके मंच से कम, उसकी थाली से ज्यादा समझा जा सकता है। इस यात्रा में भोजन भी दो संस्कृतियों के बीच संवाद का माध्यम बना।

इतिहास से आगे बढ़कर वर्तमान में जीवित रिश्ता

भारत और सूरीनाम का सांस्कृतिक संबंध इतिहास की किताबों तक सीमित नहीं है। उन्नीसवीं शताब्दी में भारत से सूरीनाम पहुंचे लोगों के साथ भाषा, गीत-संगीत, धार्मिक परंपराएं और सामाजिक रीति-रिवाज भी वहां पहुंचे। समय के साथ इन परंपराओं ने स्थानीय परिस्थितियों के साथ नया रूप लिया, लेकिन जड़ों की स्मृति बनी रही। वाराणसी से गए कलाकारों ने इस संबंध को सिर्फ इतिहास के पन्नों में नहीं, बल्कि लोगों की आवाज, उनके उत्साह और गीतों से जुड़ती स्मृतियों में महसूस किया। यही इस यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि भी रही।

लोकसंस्कृति की कोई सरहद नहीं होती

सात समंदर की दूरी भोजपुरी के सुरों को रोक नहीं सकी। भाषा बदल सकती है, उच्चारण बदल सकता है, पीढ़ियां बदल सकती हैं, लेकिन लोकस्मृति अपने रास्ते तलाश लेती है। सूरीनाम में गूंजी काशी की यह लोकधुन उसी जीवित स्मृति की गवाही है। पहली बार आयोजित हेरिटेज फेस्टिवल में भारतीय भोजपुरी लोकपरंपरा की मौजूदगी ने यह संदेश दिया कि संस्कृति पासपोर्ट की मोहताज नहीं होती। जब काशी की कजरी सूरीनाम में गूंजती है तो वह सिर्फ गीत नहीं रहतीवह दो महाद्वीपों के बीच खिंची एक अदृश्य सांस्कृतिक डोर बन जाती है।

लहरी प्रकरण : आरोप, इनकार और जांच के बीच सच की तलाश

लहरी प्रकरण : आरोप, इनकार और जांच के बीच सच की तलाश

पद्मश्री डॉ. टीके लहरी प्रकरण में नया मोड़ : मुख्यमंत्री के संज्ञान के बाद मंत्री पहुंचे बीएचयू, डॉ. लहरी ने कहाकोई अप्रिय घटना नहीं हुई

देखरेख कर रहे डॉक्टर हटाए गए, अस्पताल की सात सदस्यीय और शासन की तीन सदस्यीय जांच शुरू

सुरेश गांधी

वाराणसी। जिस डॉक्टर के लिए मरीज कभी सिर्फ बीमारी का नाम या मेडिकल केस नहीं रहे, बल्कि भरोसे और अपनत्व की तलाश में आए इंसान रहे, आज वही पद्मश्री डॉ. टीके लहरी बीएचयू के अस्पताल में उपचाराधीन हैं और उनके इर्द-गिर्द उठे सवाल पूरे चिकित्सा तंत्र की संवेदना को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। बीएचयू में भर्ती 85 वर्षीय प्रो. टीके लहरी के साथ कथित दुर्व्यवहार और थप्पड़ मारने के आरोप सामने आने के बाद मामला अब जांच के घेरे में है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के संज्ञान के बाद प्रदेश सरकार के राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार रविंद्र जायसवाल रविवार को बीएचयू पहुंचे और डॉ. लहरी से मुलाकात की।

मुलाकात के बाद सामने आई तस्वीर ने पूरे मामले को एक नया मोड़ दे दिया। डॉ. लहरी ने मंत्री से अपने साथ किसी अप्रिय घटना से इनकार किया। इसके बावजूद मंत्री ने मामले को वहीं समाप्त मानने के बजाय तथ्यों की पूरी पड़ताल के निर्देश दिए। बीएचयू के चीफ प्रॉक्टर, आईएमएस निदेशक और डीसीपी को शामिल करते हुए तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की गई है, जिसे पूरे घटनाक्रम की तथ्यात्मक जांच कर रिपोर्ट देने को कहा गया है।

डॉ. लहरी की चुप्पी से बड़ा सवाल

सवाल यह नहीं है कि आरोप सही हैं या गलत। सवाल यह है कि इतने गंभीर आरोप सामने आने की नौबत आखिर आई क्यों? और यदि कोई अप्रिय घटना हुई ही नहीं, तो फिर आरोपों, शिकायतों, अस्पताल के स्पष्टीकरण और संबंधित डॉक्टर की सफाई के बीच इतनी विसंगति क्यों दिखाई दे रही है? बीएचयू प्रशासन का कहना है कि डॉ. लहरी लंबे समय से गंभीर उम्रजनित और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं तथा उन्हें विशेष चिकित्सकीय निगरानी में रखा गया है। अस्पताल के अनुसार उन्हें जनवरी से उपचार दिया जा रहा है और विभिन्न विशेषज्ञ चिकित्सकों की निगरानी में उनकी जांच-देखभाल की जा रही है। दूसरी ओर, परिजनों की शिकायत के बाद सामने आए आरोपों ने अस्पताल की देखभाल व्यवस्था पर सवाल खड़े किए. इसी बीच जिस चिकित्सक डॉ. अरविंद पांडेय की देखरेख में डॉ. लहरी थे, उन्हें ड्यूटी से हटा दिया गया है। अस्पताल ने सात सदस्यीय जांच समिति भी गठित की है। यानी अब एक नहीं, बल्कि दो स्तरों पर जांच की तस्वीर सामने है।

थप्पड़ नहीं, बलपूर्वक रोकना था’—आरोपी डॉक्टर की सफाई

आरोपों के बीच डॉ. अरविंद पांडेय की ओर से भी सफाई सामने आई है। उनका कहना है कि डॉ. लहरी को थप्पड़ नहीं मारा गया, बल्कि सफाई की प्रक्रिया पूरी कराने के लिए उन्हेंफोर्सफुली रीस्ट्रेनकिया गया। उनका दावा है कि उस समय डॉ. लहरी सफाई कर्मचारी को सहयोग नहीं कर रहे थे और स्थिति को संभालने के लिए उन्हें बलपूर्वक रोकना पड़ा। यहीं से जांच की असली जरूरत सामने आती है। यदि यह महज चिकित्सा प्रक्रिया के दौरान मरीज को नियंत्रित करने की स्थिति थी, तो क्या निर्धारित प्रोटोकॉल का पालन हुआ? क्या बल प्रयोग आवश्यक और आनुपातिक था? क्या घटना की तत्काल चिकित्सकीय और प्रशासनिक रिपोर्ट बनी? और यदि आरोप थप्पड़ या दुर्व्यवहार के हैं तो क्या मेडिकल रिकॉर्ड में उसके कोई संकेत मिले? इन सवालों का जवाब जांच से ही मिल सकता है।

जिसने दो किमी पैदल चलकर मरीजों को उम्मीद दी

डॉ. टीके लहरी की पहचान किसी सामान्य चिकित्सक की नहीं रही है। कार्डियोथोरेसिक सर्जरी के क्षेत्र में उनके योगदान और मरीजों के प्रति समर्पण ने उन्हें अलग पहचान दी। सेवानिवृत्ति के बाद भी उनका अस्पताल से रिश्ता समाप्त नहीं हुआ। वर्षों तक वह मरीजों की सेवा के लिए पैदल अस्पताल पहुंचते रहे। उनके जीवन की यह तस्वीर चिकित्सा पेशे में उस दौर की याद दिलाती है, जब डॉक्टर और मरीज का संबंध केवल दवा, जांच और रिपोर्ट तक सीमित नहीं था। मरीज उनके लिए एक केस नंबर नहीं था। बीमारी से जूझते व्यक्ति के साथ मानसिक संबल, भरोसा और अपनापन भी उपचार का हिस्सा था। शायद यही कारण है कि डॉ. लहरी की मौजूदा स्थिति सिर्फ एक वरिष्ठ डॉक्टर की बीमारी भर नहीं है; यह उस चिकित्सा संस्कृति की परीक्षा भी है जिसकी वह खुद मिसाल रहे हैं। जिस डॉक्टर ने जीवनभर दूसरों को बीमारी से लड़ने का हौसला दिया, आज वही स्वयं बीमारी से जूझ रहे हैं। और जब उनके साथ कथित दुर्व्यवहार की खबर सामने आती है तो स्वाभाविक रूप से समाज के भीतर बेचैनी पैदा होती है।

त्याग की आदत वाले डॉक्टर कामुकरनाभी सवाल

डॉ. लहरी ने मंत्री से किसी अप्रिय घटना से इनकार किया है। इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लेकिन इसी तरह सामने आए आरोपों और शिकायतों को भी केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि स्वयं डॉ. लहरी ने घटना से इनकार कर दिया। क्योंकि जिस व्यक्ति ने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा संस्थान, मरीजों और चिकित्सा सेवा को दिया हो, उसके लिए अपने साथ हुई किसी कथित घटना को लेकर भी संस्थान की प्रतिष्ठा को प्राथमिकता देना असंभव नहीं। संभव है कि उन्होंने किसी व्यक्तिगत असुविधा या विवाद को महत्व दिया हो। लेकिन यही कारण है कि उनके कथन के साथ-साथ स्वतंत्र तथ्यों की जांच भी जरूरी हो जाती है। तो आरोप को अंतिम सत्य माना जा सकता है, इनकार को जांच का अंत। सच दोनों के बीच मौजूद हो सकता है।

बीएचयू के सामने सिर्फ एक घटना नहीं, भरोसा बचाने की चुनौती

इस पूरे प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बीएचयू प्रशासन ने अब जांच की प्रक्रिया शुरू की है। डॉ. अरविंद पांडेय को डॉ. लहरी की देखरेख से हटाया गया है और सात सदस्यीय समिति बनाई गई है। शासन स्तर पर भी तीन सदस्यीय समिति को जांच की जिम्मेदारी दी गई है। अब जांच को केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहना चाहिए। घटना के समय मौजूद लोगों के बयान, मेडिकल रिकॉर्ड, डॉ. लहरी की चिकित्सकीय स्थिति, वार्ड की निगरानी व्यवस्था और संबंधित कर्मचारियों की भूमिकाहर पहलू की निष्पक्ष पड़ताल जरूरी है। क्योंकि बीएचयू केवल एक अस्पताल नहीं है। यह चिकित्सा शिक्षा, शोध और सेवा की ऐसी परंपरा का नाम है जिसकी प्रतिष्ठा देशभर में है। यहां किसी मरीज की गरिमा, किसी वरिष्ठ चिकित्सक का सम्मान और संस्थान की प्रतिष्ठाइनमें से किसी एक को दूसरे के मुकाबले छोटा नहीं माना जा सकता।

सवाल अब जांच से जवाब मांग रहे हैं

डॉ. लहरी ने कहाकोई अप्रिय घटना नहीं हुई। संबंधित डॉक्टर का कहना हैथप्पड़ नहीं मारा, सफाई के लिए बलपूर्वक रोका। बीएचयू कह रहा है कि डॉ. लहरी उम्रजनित मानसिक और शारीरिक समस्याओं से जूझ रहे हैं। परिजनों ने सवाल उठाए हैं। अस्पताल ने जांच समिति बनाई है और शासन ने अलग जांच के निर्देश दिए हैं। इन तमाम दावों के बीच अब सबसे जरूरी है कोई पूर्वाग्रह, कोई दबाव, कोई जल्दबाजी। सच जो भी हो, वह सामने आना चाहिए। क्योंकि जिस डॉक्टर ने जीवनभर मरीजों को भरोसा दिया, उसके मामले में सबसे बड़ा न्याय यही होगा कि संस्थान भी उसके साथ वही भरोसा कायम रखेइलाज में भी, जांच में भी और इंसानियत में भी।

बीएचयू का पक्ष

मारपीट के आरोप तथ्यहीन : बीएचयू के चिकित्सा अधीक्षक ने डॉ. टीके लहरी के साथ मारपीट या दुर्व्यवहार के आरोपों को तथ्यहीन बताया है। -मेल मिलने के बाद आईएमएस निदेशक और चिकित्सा अधीक्षक ने वार्ड पहुंचकर डॉ. लहरी का हाल जाना। विशेषज्ञों ने की जांच : 3 सितंबर को हृदय रोग, मेडिसिन, मनोचिकित्सा, वृद्धावस्था रोग, न्यूरोलॉजी, क्रिटिकल केयर तथा टीबी-छाती रोग विशेषज्ञों ने उनकी जांच की। रिपोर्ट में विभिन्न शारीरिक बीमारियों के साथ उम्रजनित सीनाइल डिमेंशिया और व्यवहार परिवर्तन की समस्या बताई गई है। 27 जनवरी से भर्ती : डॉ. लहरी 27 जनवरी 2026 से छाती संबंधी समस्या के उपचार के लिए भर्ती हैं। बीएचयू का दावा है कि चिकित्सक-कर्मचारी लगातार उनकी देखभाल कर रहे हैं और उन्हें विशेष निगरानी में रखा गया है।

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