Wednesday, 25 February 2026

स्लम के सपनों को मंच मिला: नुक्कड़ नाटक बना जागरूकता का स्वर

स्लम के सपनों को मंच मिला: नुक्कड़ नाटक बना जागरूकता का स्वर 

युवाओं की पहलशिक्षा, सम्मान और अवसर के संदेश से समाज को जोड़ा

सुरेश गांधी

वाराणसी। शहर के युवाओं द्वारा संचालित सामाजिक संस्था स्नोड्रॉप फाउंडेशन ने अपने स्थापना दिवस के अवसर पर प्रभावशाली नुक्कड़ नाटक का आयोजन कर वंचित बच्चों की वास्तविक स्थिति और उनकी छिपी संभावनाओं को समाज के सामने प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का उद्देश्य संस्था के कार्यों से लोगों को अवगत कराना और समाज को सहयोग के लिए प्रेरित करना रहा।

कॉलेज के विद्यार्थियों द्वारा शुरू की गई इस संस्था का मुख्य लक्ष्य स्लम क्षेत्रों में रहने वाले बच्चों को शिक्षा और समग्र विकास के अवसर उपलब्ध कराना है। “स्नोड्रॉप नाम एक छोटे सफेद फूल से प्रेरित है, जो कठिन परिस्थितियों में भी खिलकर आशा, दृढ़ता और नई शुरुआत का संदेश देता है।

संस्था के स्वयंसेवक बच्चों को निःशुल्क शिक्षा प्रदान करने के साथ-साथ आवश्यक सामग्री जैसे कपड़े व अन्य उपयोगी वस्तुओं की व्यवस्था करते हैं। साथ ही बच्चों को उनके अधिकारों, अवसरों और भविष्य की संभावनाओं के प्रति जागरूक किया जाता है। संस्था विशेष रूप से बच्चों में आत्मसम्मान और आत्मविश्वास विकसित करने पर कार्य कर रही है, ताकि वे स्वयं को समाज से अलग न समझें।

नुक्कड़ नाटक के माध्यम से समाज की उदासीनता को चुनौती देते हुए यह संदेश दिया गया कि गरीबी प्रतिभा की कमी नहीं, बल्कि अवसरों की कमी का परिणाम है। संस्था ने लोगों से अपील की कि वे स्वयंसेवक बनकर या अन्य माध्यमों से इस अभियान से जुड़ें।

कार्यक्रम में अदिति पांडेय, मानिशा त्रिपाठी, प्रियंशु राय, ओमकार पांडेय, शोभा पासवान, स्वाति रंजन, मोहित, आयुषी, श्रवण और पल्लवी ने अभिनय किया, जबकि आयोजन का समन्वय सोनू तथा सचिव के रूप में शोभोजीत मिश्रा ने जिम्मेदारी निभाई। संस्था के सदस्यों ने कहा कि उनका उद्देश्य बच्चों की बेबसी को उम्मीद में बदलना और उन्हें यह विश्वास दिलाना है कि वे भी अपने सपनों को साकार कर सकते हैं।


श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में प्राचीन पीपल के संरक्षण का अभियान

श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में प्राचीन पीपल के संरक्षण का अभियान

वैज्ञानिक और पारंपरिक उपचार का संगम, 200 वर्षों तक सुरक्षित रखने की पहल

सुरेश गांधी

वाराणसी। आस्था और परंपरा की नगरी में स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर प्रांगण के प्राचीन पीपल वृक्ष के संरक्षण के लिए एक विशेष अभियान प्रारंभ किया गया है। इस पवित्र वृक्ष को आने वाले 100 से 200 वर्षों तक सुरक्षित और सजीव बनाए रखने के उद्देश्य से वैज्ञानिक तकनीकों और पारंपरिक विधियों के समन्वय से उपचार प्रक्रिया शुरू की गई।

इस अवसर पर प्रोफेसर एस.पी. सिंह, डॉ. प्रशांत, डॉ. कल्याण बर्मन, श्री ओम प्रकाश तथा श्री तेजनाथ वर्मा सहित विशेषज्ञों की टीम उपस्थित रही। सभी ने बाबा विश्वनाथ से प्रार्थना की कि यह प्राचीन वृक्ष अपनी आध्यात्मिक गरिमा और ऐतिहासिक महत्व के साथ आने वाली पीढ़ियों को आशीर्वाद देता रहे।

उपचार प्रक्रिया के अंतर्गत वृक्ष पर औषधीय तत्वों के साथ नीम तेल का जैविक मिश्रण तैयार कर छिड़काव किया गया। विशेष बात यह रही कि इस उपचार में लगभग 1200 लीटर गंगा नदी का जल तथा त्रिवेणी संगम का पवित्र जल सम्मिलित किया गया, जिससे आध्यात्मिक पवित्रता और पर्यावरणीय शुद्धता दोनों का ध्यान रखा गया।

वृक्ष की वर्तमान स्थिति पर जानकारी देते हुए डॉ. प्रशांत ने बताया कि पीपल की पत्तियाँ पूर्णतः पीली हो चुकी हैं, जो हरितहीनता और पोषक तत्वों की कमी का संकेत है। सामान्य पत्तियों की तुलना में इसमें स्पष्ट अंतर दिखाई दे रहा है। यदि समय रहते उपचार नहीं किया गया तो भविष्य में वृक्ष के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।

इसी को ध्यान में रखते हुए विशेषज्ञों द्वारा नियमित अंतराल पर उपचार और छिड़काव जारी रखने का निर्णय लिया गया है, ताकि यह प्राचीन पीपल वृक्ष आने वाली पीढ़ियों के लिए आस्था, संस्कृति और पर्यावरण चेतना का प्रतीक बना रहे।

श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में रंगभरी एकादशी की भव्य तैयारी

श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में रंगभरी एकादशी की भव्य तैयारी

संकरी गलियों में सुव्यवस्था पर विशेष जोर, फूलों की होली बनेगी मुख्य आकर्षण

सुरेश गांधी

वाराणसी। रंग और भक्ति के अद्भुत संगम का प्रतीक रंगभरी एकादशी पर्व को लेकर काशी में तैयारियाँ अंतिम चरण में पहुँच चुकी हैं। इस वर्ष आयोजन को अधिक व्यवस्थित, सांस्कृतिक और गरिमामय बनाने के लिए व्यापक स्तर पर प्रबंध सुदृढ़ किए गए हैं। मंदिर प्रांगण में काशीवासियों को अपने आराध्य महादेव की चल प्रतिमा के साथ पारंपरिक अबीर-गुलाल की होली खेलने हेतु आमंत्रित किया गया है, जिससे सदियों पुरानी परंपरा का उल्लासपूर्ण स्वरूप पुनः जीवंत होगा।

मुख्य कार्यपालक अधिकारी विश्वभूषण मिश्र ने बताया कि परंपरा के अनुसार बाबा की चल प्रतिमा बाहर से शोभायात्रा के रूप में मंदिर परिसर तक लाई जाएगी। क्षेत्र की संकरी गलियों और बढ़ती श्रद्धालु संख्या को देखते हुए पुलिस प्रशासन एवं महंत परिवार की संयुक्त बैठक में यह निर्णय लिया गया कि प्रतिमा के साथ आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या 64 तक सीमित रखी जाएगी, ताकि सुरक्षा और सुव्यवस्था सुनिश्चित हो सके।

लोकाचार और शास्त्रीय परंपरा के अनुरूप चल प्रतिमा को गर्भगृह में विराजमान कराया जाएगा, जहाँ सप्तऋषि आरती सहित अन्य वैदिक अनुष्ठान विधिपूर्वक संपन्न होंगे। इस वर्ष आयोजन में एक विशेष परिवर्तन करते हुए शिवार्चनम मंच पर अबीर-गुलाल की बजाय केवलफूलों की होलीका आयोजन किया जाएगा, जिससे कार्यक्रम की आध्यात्मिक गरिमा और सांस्कृतिक सौंदर्य दोनों का संतुलन बना रहे।

श्रद्धालुओं से अपील की गई है कि वे शालीन वेशभूषा में उपस्थित हों तथा रात्रि 10 बजे तक चलने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों का अनुशासनपूर्वक आनंद लें। कार्यक्रम का समापन ब्रज के रसिक कलाकारों द्वारा प्रस्तुत फूलों की होली से होगा, जो काशी और ब्रज की सांस्कृतिक एकात्मता का सजीव प्रतीक बनेगा।

ज्ञान, परंपरा और सभ्यता की प्राचीन नगरी काशी में यह आयोजन केवल उत्सव नहीं, बल्कि संस्कृति और भक्ति का सामूहिक उत्सर्जन है। आयोजकों ने श्रद्धालुओं से आग्रह किया है कि वे अपने संस्कार, शालीनता और आस्था के साथ बाबा विश्वनाथ को रंगों की भक्ति अर्पित करें।

Tuesday, 24 February 2026

ब्रज की पंद्रह दिनी होली : जहां समय भी गुलाल बन जाता है...

ब्रज की पंद्रह दिनी होली : जहां समय भी गुलाल बन जाता है... 

भारत में होली का पर्व जितना लोकप्रिय है, ब्रजभूमि में उतना ही व्यापक और आध्यात्मिक भी। यहां होली एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि लगभग पंद्रह दिनों तक चलने वाली सांस्कृतिक, धार्मिक और लोक परंपराओं की अद्भुत श्रृंखला है। फाल्गुन मास लगते ही ब्रज का वातावरण बदल जाता है, मंदिरों में फाग गूंजने लगते हैं, गलियों में अबीर उड़ने लगता है और लोकजीवन में उत्सव का रंग उतर आता है। मथुरा, वृंदावन, बरसाना और नंदगांवकृये चारों स्थान मिलकर ब्रज की होली का सांस्कृतिक मानचित्र बनाते हैं। हर दिन का अपना अलग महत्व है और हर आयोजन श्री कृष्ण और राधा की लीलाओं से जुड़ा हुआ है। यह केवल त्योहार नहीं, बल्कि जीवित परंपरा हैकृजहाँ इतिहास, आस्था और लोकसंस्कृति एक साथ रंगों में घुलते हैं 

सुरेश गांधी

भारत की सांस्कृतिक परंपराओं में यदि किसी उत्सव को सबसे अधिक बहुरंगी, बहुस्तरीय और बहुआयामी कहा जाए तो वह होली है। किंतु जब बात ब्रजभूमि की होली की आती है, तो यह उत्सव केवल रंगों का पर्व नहीं रह जाता, बल्कि धार्मिक प्रतीकवाद, लोकसाहित्य, सांस्कृतिक मनोविज्ञान, सामुदायिक संरचना और ऐतिहासिक निरंतरता का जीवंत दस्तावेज बन जाता है। ब्रज की होली को समझना वास्तव में भारतीय लोकसंस्कृति की आत्मा को समझना है। मथुरा, वृंदावन, बरसाना और नंदगांव, ये चारों केंद्र मिलकर ब्रज की होली का सांस्कृतिक चतुर्भुज बनाते हैं। यहाँ फाल्गुन मास में लगभग पंद्रह दिनों तक चलने वाले उत्सवों की श्रृंखला भारतीय लोकजीवन की एक अद्भुत सांस्कृतिक प्रयोगशाला प्रस्तुत करती है। ब्रज में होली की शुरुआत फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से मानी जाती है।

मंदिरों में विशेष श्रृंगार होता है और फाग गायन प्रारंभ हो जाता है। ब्रजभाषा के पारंपरिक गीतों में प्रेम, भक्ति और हास्य का अद्भुत मिश्रण दिखाई देता है। ढोलक, झांझ और मंजीरों के साथ गाए जाने वाले ये फाग गीत केवल संगीत नहीं, बल्कि ब्रज की सांस्कृतिक स्मृति हैं। ब्रज क्षेत्र केवल भौगोलिक परिभाषा नहीं है, बल्कि यह एक सांस्कृतिक अवधारणा है।ब्रजशब्द का अर्थ है, गायों का चरागाह, परंतु धार्मिक संदर्भ में यह वह भूमि है जहाँ श्री कृष्ण ने बाल और किशोर लीलाएं कीं। ब्रज मंडल लगभग 84 कोस क्षेत्र में फैला माना जाता है, जिसमें उत्तर प्रदेश और राजस्थान के कुछ हिस्से शामिल हैं। इस क्षेत्र का सांस्कृतिक केंद्र मथुरा और वृंदावन रहे हैं। ब्रज की पहचान केवल मंदिरों से नहीं, बल्कि लोकगीतों, परंपराओं और उत्सवों से भी है। यहाँ प्रत्येक त्योहार किसी किसी लीला से जुड़ा हुआ है।

पौराणिक मान्यताएं : रास और फाल्गुन उत्सव

ब्रज की होली का मूल आधार श्रीकृष्ण और राधा की लीलाओं से जुड़ा हुआ है। धार्मिक ग्रंथों विशेषकर भागवत पुराण में वर्णित रासलीला और वसंतोत्सव को होली की परंपरा का आधार माना जाता है। भागवत पुराण में फाल्गुन मास के उत्सवों का वर्णन मिलता है, जिसमें श्रीकृष्ण गोपियों के साथ रंग और आनंद के उत्सव में भाग लेते हैं। हालाँकिलाठीमार होलीका सीधा उल्लेख ग्रंथों में नहीं मिलता, लेकिन इसकी प्रेरणा लोक परंपराओं से विकसित मानी जाती है।

ब्रज की होली का सांस्कृतिक मनोविज्ञान

ब्रज की होली केवल धार्मिक उत्सव नहीं बल्कि सामाजिक संवाद भी है। यह त्योहार समाज में आनंद, हास्य और सामूहिकता का भाव पैदा करता है। यहाँ औपचारिकताएँ समाप्त हो जाती हैं और लोकजीवन खुलकर उत्सव मनाता है।

रंगों में लिखी जाती संस्कृति की कहानी

ब्रज की पंद्रह दिनी होली हमें यह सिखाती है कि त्योहार केवल उत्सव नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने का माध्यम हैं। यहाँ रंग केवल चेहरे नहीं रंगते, बल्कि पीढ़ियों को जोड़ते हैं। जब बरसाना की लाठियाँ, नंदगांव के रंग और वृंदावन के फूल एक साथ मिलते हैं, तब भारतीय संस्कृति का सबसे सुंदर रूप सामने आता है।  ब्रज की होली वास्तव में रंगों में लिखी गई वह सांस्कृतिक गाथा है जो हर वर्ष नई होकर भी सदियों पुरानी लगती है।

लोकपरंपरा से सांस्कृतिक संस्थान तक

ब्रज की होली का वर्तमान स्वरूप कई शताब्दियों के सांस्कृतिक विकास का परिणाम है। मध्यकाल में भक्ति आंदोलन के दौरान ब्रज क्षेत्र में कृष्ण भक्ति का व्यापक प्रसार हुआ। विशेषकर 16वीं शताब्दी में वैष्णव संतों और कवियों ने फाग गीतों और रास परंपराओं को संगठित स्वरूप दिया। भक्ति काल के कवियों, सूरदास, नंददास और रसखान, की रचनाओं में ब्रज की होली का अत्यंत सुंदर वर्णन मिलता है। इन काव्य परंपराओं ने लोकगीतों को धार्मिक स्वरूप प्रदान किया।

ब्रज के फाग गीत : लोकसाहित्य का अमूल्य खजाना

ब्रज की होली को समझने के लिए फाग गीतों का अध्ययन आवश्यक है। ये गीत लोकजीवन के सांस्कृतिक दस्तावेज हैं। फाग गीतों में निम्न तत्व मिलते हैं : प्रेम और हास्य, सामाजिक व्यंग्य, धार्मिक प्रतीकवाद, ग्रामीण जीवन की झलक ब्रजभाषा का साहित्यिक महत्व भी इन गीतों से मजबूत हुआ है।

रंगों का सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक अर्थ

ब्रज की होली में रंगों का प्रयोग केवल मनोरंजन नहीं बल्कि प्रतीकात्मक है। लाल प्रेम और ऊर्जा, पीला आध्यात्मिकता, हरा प्रकृति, गुलाबी सौम्यता. लोकमनोविज्ञान के अनुसार रंग सामाजिक दूरी को कम करते हैं और सामूहिकता को बढ़ाते हैं।

सामुदायिक संरचना और उत्सव

ब्रज की होली सामाजिक संरचना को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम है। इसमें वर्ग, जाति और आर्थिक अंतर कम दिखाई देते हैं। उत्सव सामाजिक समरसता का माध्यम बनता है। विशेष रूप से लाठीमार होली में स्त्री-पुरुष संवाद सामाजिक संतुलन का प्रतीक है।

आधुनिकता और परंपरा का संतुलन

डिजिटल युग में ब्रज की होली का प्रसारण विश्वभर में होने लगा है। ड्रोन कैमरे, लाइव स्ट्रीमिंग और सोशल मीडिया ने इसकी लोकप्रियता बढ़ाई है। फिर भी लोक परंपरा का मूल स्वरूप सुरक्षित है।

ब्रज की होली एक सांस्कृतिक प्रयोगशाला

ब्रज की होली केवल उत्सव नहीं बल्कि बहुआयामी सांस्कृतिक अध्ययन का विषय है। यहाँ धर्म, समाज, मनोविज्ञान, अर्थशास्त्र और लोकसाहित्य एक साथ दिखाई देते हैं। यह आयोजन भारतीय संस्कृति की जीवंतता का प्रमाण है।

परंपरा से भविष्य तक

आज जब आधुनिक जीवनशैली लोक परंपराओं को प्रभावित कर रही है, तब ब्रज की होली जैसी परंपराएँ हमारी सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित करती हैं। यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक धरोहर है। इसका संरक्षण आने वाली पीढ़ियों के लिए आवश्यक है।

रंगों में जीवित भारतीयता

ब्रज की होली वास्तव में भारतीय संस्कृति का जीवंत रूप है। यहाँ रंग केवल चेहरे नहीं रंगते, बल्कि इतिहास, परंपरा और भावनाओं को भी रंग देते हैं। जब फाग गूंजता है, गुलाल उड़ता है और रास की स्मृतियाँ जीवित होती हैं, तब लगता है कि ब्रज केवल एक स्थान नहीं, बल्कि एक अनुभव है। ब्रज की होली हमें यह सिखाती है कि संस्कृति केवल संग्रहालयों में नहीं, बल्कि लोकजीवन में जीवित रहती है।

स्लम के सपनों को मंच मिला: नुक्कड़ नाटक बना जागरूकता का स्वर

स्लम के सपनों को मंच मिला: नुक्कड़ नाटक बना जागरूकता का स्वर  युवाओं की पहल — शिक्षा, सम्मान और अवसर के संदेश से समाज को जोड़ा सुरेश गा...