मकर संक्रांति : सूर्य की उत्तरायण, परिवर्तन का उत्सव और भारतीय आत्मा का महापर्व

भारतीय
सनातन
परंपरा
में
कुछ
पर्व
केवल
तिथि
नहीं
होते,
वे
समय
के
प्रवाह
को
दिशा
देने
वाले
संकेत
होते
हैं।
मकर
संक्रांति
ऐसा
ही
एक
पर्व
है,
जो
न
केवल
पंचांग
की
गणना
में
महत्वपूर्ण
है,
बल्कि
भारतीय
जीवन-दर्शन,
कृषि-संस्कृति,
लोकाचार
और
आध्यात्मिक
चेतना
का
केंद्रबिंदु
भी
है।
यह
पर्व
सूर्य
के
उत्तरायण
होने
का
उत्सव
है,
अंधकार
से
प्रकाश
की
ओर,
जड़ता
से
गति
की
ओर
और
निराशा
से
आशा
की
ओर
बढ़ते
जीवन
का
प्रतीक।
मकर
संक्रांति
हर
वर्ष
14 जनवरी
को
मनाई
जाती
है।
लेकिन
सूर्य
के
गोचर
की
सूक्ष्म
गणना
के
कारण
यह
पर्व
15 जनवरी
को
है.
ज्योतिषीय
गणना
के
अनुसार,
सूर्य
देव
14 जनवरी
की
रात
9ः19
बजे
मकर
राशि
(उत्तरायण)
यानी
धनु
राशि
से
मकर
राशि
में
प्रवेश
करेंगे।
इस
दिन
माघ
कृष्ण
पक्ष
द्वादशी
है.
परंपरागत
धर्मशास्त्रों
के
अनुसार
यदि
संक्रांति
प्रदोष
के
समय
या
उसके
बाद
होती
है,
तो
पुण्यकाल
अगले
दिन
माना
जाता
है.
इस
वर्ष
स्नान
और
दान
का
शुभ
समय
सूर्योदय
से
दोपहर
1ः39
बजे
तक
है.
मान्यता
है
कि
इसी
दिन
भगवान
विष्णु
के
शरीर
से
तिल
की
उत्पत्ति
हुई
थी.
इसलिए
तिल
का
सेवन
और
दान
विशेष
पुण्यदायी
माना
जाता
है.
साथ
ही,
सूर्य
की
पूजा
और
उत्तरायण
के
अवसर
पर
स्नान
करने
से
स्वास्थ्य,
सुख-समृद्धि
और
आध्यात्मिक
उन्नति
होती
है.
खास
यह
है
कि
मकर
संक्रांति
पर
इस
वर्ष
22 वर्ष
बाद
एकादशी
का
शुभ
संयोग
बन
रहा
है।
संक्रांति
और
एकादशी
एक
दिन
होने
के
कारण
इसे
आध्यात्मिक
रूप
से
अक्षय
पुण्यफल
देने
वाला
माना
जाता
है।
मतलब
साफ
है
15 जनवरी
की
मकर
संक्रांति
न
केवल
धार्मिक
महत्व
रखती
है,
बल्कि
सूर्य
की
ऊर्जा
और
उत्तरायण
के
सकारात्मक
प्रभाव
का
उत्सव
भी
है.
स्नान,
दान
और
पूजा
से
आप
अपने
जीवन
में
स्वास्थ्य,
सुख-समृद्धि
और
सकारात्मक
ऊर्जा
बढ़ा
सकते
हैं. जबकि कुछ विद्वानों का कहना है कि इस साल मकर संक्रांति बुधवार, 14 जनवरी को मनाई जाएगी। इस दिन का पुण्यकाल दोपहर 2ः49 बजे से शाम 5ः45 बजे तक रहेगा। वहीं महापुण्य काल दोपहर 2ः49 से 3ः42 तर है। इस मुहूर्त को स्नान-दान के लिए शुभ माना गया है

सुरेश गांधी
भारतीय संस्कृति में कुछ पर्व
केवल तिथियों का संकेत नहीं
होते, वे समय की
दिशा बदलने वाले उत्सव होते
हैं। मकर संक्रांति ऐसा
ही पर्व है, जो
सूर्य की गति के
साथ जीवन की गति
को भी नया अर्थ
देता है। यह पर्व
अंधकार से प्रकाश, जड़ता
से गति और निराशा
से आशा की ओर
बढ़ते भारतीय जीवन का प्रतीक
है। यही कारण है
कि मकर संक्रांति को
केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि
सकारात्मक परिवर्तन और समृद्धि का
सांस्कृतिक उद्घोष माना गया है।
मकर संक्रांति सूर्यदेव की आराधना का
पर्व है। जब ग्रहों
के राजा सूर्य धनु
राशि को छोड़कर मकर
राशि में प्रवेश करते
हैं, तभी मकर संक्रांति
का पुण्यकाल आरंभ होता है।
इसी क्षण से सूर्य
की उत्तरायण गति प्रारंभ होती
है, जिसे भारतीय परंपरा
में शुभ, सात्त्विक और
कल्याणकारी माना गया है।
उत्तरायण का अर्थ केवल
खगोलीय परिवर्तन नहीं, बल्कि चेतना का उर्ध्वगमन है।
यही कारण है कि
इसे कई अंचलों में
उत्तरायणी भी कहा जाता
है।
सूर्य की उत्तरायण गति
का प्रभाव केवल आकाश तक
सीमित नहीं रहता। इसका
प्रभाव समस्त राशियों,
ऋतुओं,
कृषि,
प्रकृति और मानव जीवन
पर पड़ता है। विशेष
रूप से जब सूर्य
कर्क और मकर राशि
में प्रवेश करते हैं,
तो
यह परिवर्तन जातकों के लिए अत्यंत
फलदायक माना गया है।
मकर संक्रांति का दिन नई
शुरुआत,
आध्यात्मिक साधना और शुभ कर्मों
के लिए श्रेष्ठ माना
गया है। शास्त्रों में
कहा गया है कि
इस दिन सूर्यदेव की
आराधना से जीवन के
कष्ट दूर होते हैं
और घर-
परिवार में
सुख,
समृद्धि और खुशहाली का
वास होता है। यह
दिन तमस से सत्
की ओर यात्रा का
प्रतीक है,
एक ऐसा
क्षण,
जब प्रकृति स्वयं
मनुष्य को आगे बढ़ने
का संदेश देती है। इस
दिन प्राय :
उत्तराषाढ़ा या श्रवण नक्षत्र
का संयोग बनता है। उत्तराषाढ़ा
विजय,
स्थायित्व और धर्म के
मार्ग पर अडिग रहने
का संकेत देता है। श्रवण
नक्षत्र ज्ञान,
श्रवण,
परंपरा और गुरु-
शिष्य
परंपरा का प्रतीक है।
कई वर्षों में इस दिन
सिद्ध,
साध्य या शुभ योग
भी बनते हैं,
जिससे
दान-
पुण्य,
स्नान और जप-
तप
का फल कई गुना
बढ़ जाता है। शास्त्रों
में कहा गया है
कि मकर संक्रांति के
दिन किया गया दान
अक्षय फल देता है।
उत्तरायण केवल खगोलीय घटना
नहीं है,
यह आध्यात्मिक
उर्ध्वगमन का प्रतीक है।
महाभारत में वर्णित है
कि भीष्म पितामह ने अपने देहत्याग
के लिए उत्तरायण की
प्रतीक्षा की थी। यह
इस विश्वास को पुष्ट करता
है कि उत्तरायण काल
मोक्ष की दिशा में
अग्रसर होने का काल
है। गीता में श्रीकृष्ण
कहते हैं, “
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्।”
अर्थात उत्तरायण का काल आत्मोन्नति
का काल है।
शुभ मुहूर्त
मकर संक्रांति 15
जनवरी
गुरुवार को है.
इस
दिन सूर्य मकर राशि में
प्रवेश करेंगे और उत्तरायण का
शुभ आरंभ होगा,
जिससे
दिन लंबे होंगे और
सकारात्मक ऊर्जा बढ़ेगी.
खास यह है
कि मकर संक्रांति पर
इस साल दुर्लभ योग
बन रहा है। संक्रांति
के दिन षटतिला एकादशी
भी है.
जिससे लोग
इस चिंता में हैं कि
अब संक्रांति के दिन चावल
वाली खिचड़ी कैसे खाएंगे,
क्योंकि
एकादशी के दिन चावल
खाना वर्जित है। खास यह
है कि मकर संक्रांति
पर इस वर्ष 22
वर्ष
बाद एकादशी का शुभ संयोग
बन रहा है। संक्रांति
और एकादशी एक दिन होने
के कारण इसे आध्यात्मिक
रूप से अक्षय पुण्यफल
देने वाला माना जाता
है। एकादशी तिथि भगवान विष्णु
को समर्पित है जो मोक्ष
और पापों के नाश करने
वाली मानी जाती है।
ज्योतिषाचार्यो के अनुसार,
विष्णु
पुराण के मुताबिक चावल
का दान में दोष
नहीं लगता है। संक्रांति
और एकादशी एक दिन होने
के कारण चावल दान
को लेकर भ्रांति न
पालें। दीर्घायु और निरोगी रहने
के लिए रोगी को
इस दिन औषधि,
तेल,
आहार का दान करना
चाहिए। इस दिन जप,
तप,
दान,
स्नान,
श्राद्ध,
तर्पण का विशेष महत्व
है। भगवान विष्णु को पीले रंग
की वस्तुएं अति प्रिय हैं।
पूजा के दौरान भगवान
को पीले फूल,
पीले
फल और पीले वस्त्र
अर्पित करें।
गंगा अवतरण और तीर्थ स्नान की परंपरा
मकर संक्रांति का
पौराणिक महत्व गंगा अवतरण से
भी जुड़ा है। मान्यता
है कि इसी दिन
मां गंगा,
राजा भगीरथ के
पीछे-
पीछे चलकर कपिल
मुनि के आश्रम से
होते हुए गंगासागर में
प्रवाहित हुई थीं। इसी
कारण संक्रांति के दिन गंगा,
संगम और अन्य पवित्र
नदियों में स्नान का
विशेष महत्व है। प्रयागराज,
काशी,
हरिद्वार और गंगासागर जैसे
तीर्थों पर इस दिन
श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़
पड़ता है। यह स्नान
केवल शरीर की शुद्धि
नहीं,
बल्कि आत्मा के संस्कारों को
धोने का प्रतीक है।
मान्यता है कि इस
दिन स्नान और दान से
मोक्ष की प्राप्ति होती
है। इस दिन गंगा
स्नान से जीवन के
पाप कटते हैं और
पुण्य का संचय होता
है। यह केवल आस्था
नहीं,
बल्कि आत्मशुद्धि की अनुभूति है।
दान का पर्व : तन, मन और धन का संगम
मकर संक्रांति को
दान का महापर्व कहा
गया है। काली उड़द
की खिचड़ी, काला तिल, गुड़,
नमक, तेल, चावल और
शीतकालीन वस्त्रों का दान अत्यंत
पुण्यकारी माना गया है।
इसी कारण इसे तन,
मन और धन के
मिलन का पर्व कहा
गया है पहले देह
का स्नान, फिर धन का
दान, और अंत में
मन की ऊंची उड़ान।
तिल और गुड़ का
प्रतीकात्मक अर्थ भी गहरा
है। तिल का स्नेह
और गुड़ की मिठास
समाज में कटुता को
समाप्त कर सौहार्द और
सामाजिक एकता का संदेश
देती है। लोक कहावत
है, “तिल-गुड़ खाइये,
मन में बैर न
लाइये।”
किसान और खेतिहर भारत का उत्सव
मकर संक्रांति छठ
पर्व की तरह ही
एक महा लोकपर्व है।
यह किसान और खेतिहर भारत
की सहज उमंग की
अभिव्यक्ति है। नई फसल,
नया अन्न और नया
उत्साह, सब कुछ इस
पर्व में समाहित होता
है। यह पर्व बताता
है कि भारतीय संस्कृति
में कृषि केवल आजीविका
नहीं, बल्कि आस्था है। धान, चावल,
चूड़ा, दही, गुड़, तिल,
सब्जियों की नई फसल,
सब मिलकर मकर संक्रांति को
स्वाद, स्वास्थ्य और संतुलन का
पर्व बनाते हैं। यह शरीर
को आने वाले वसंत
और ग्रीष्म ऋतु के लिए
तैयार करने का प्राकृतिक
विज्ञान भी है। यह
रबी फसल के आगमन
का समय होता है।
किसान अपनी मेहनत का
फल पाकर प्रकृति के
प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता है। इसलिए
यह पर्व केवल मंदिरों
तक सीमित नहीं, बल्कि खेत-खलिहानों, आंगनों
और चौपालों तक जीवंत रहता
है।
देशभर में विविध नाम, एक भाव
भारत की सांस्कृतिक
विविधता मकर संक्रांति पर
अपने चरम पर दिखती
है, उत्तर भारत : मकर संक्रांति / खिचड़ी,
तमिलनाडु : पोंगल, पंजाब : लोहड़ी, हरियाणा : माघी, गुजरात : उत्तरायण (पतंग उत्सव), असम
: माघ बिहू, महाराष्ट्र में तिल-गुड़,
बंगाल : पौष संक्रांति व
गंगा सागर मेला. भारत
के बाहर भी इसका
प्रभाव दिखता है, नेपाल में
माघी संक्रांति, बांग्लादेश में पौष संक्रांति,
थाईलैंड में सोंगक्रान, श्रीलंका
में पोंगल। नाम अलग हैं,
पर भाव एक, सामूहिकता,
कृतज्ञता और जीवन का
उत्सव।
भीष्म पितामह और मोक्ष का प्रतीक
महाभारत में वर्णित है
कि भीष्म पितामह ने अपने देहत्याग
के लिए उत्तरायण की
प्रतीक्षा की थी। यह
इस विश्वास का प्रतीक है
कि उत्तरायण काल साधना, सिद्धि
और मोक्ष का काल है।
यही कारण है कि
मकर संक्रांति को देवताओं का
दिन भी कहा गया
है।
पतंगों में उड़ती आशाएं
गुजरात और उत्तर भारत
में मकर संक्रांति का
अर्थ है पतंगों का
उत्सव। आसमान में रंग-बिरंगी
पतंगें मानो यह संदेश
देती हैं कि जीवन
भी तभी सुंदर है,
जब वह ऊंचाइयों को
छूने का साहस करे।
वैज्ञानिक दृष्टि से मकर संक्रांति
आधुनिक विज्ञान भी यह स्वीकार
करता है कि उत्तरायण
के बाद दिन बड़े
होने लगते हैं. सूर्य
की किरणें अधिक स्वास्थ्यप्रद होती
हैं. रोग प्रतिरोधक क्षमता
बढ़ती है. तिल और
गुड़ जैसे पदार्थ शीत
ऋतु में शरीर को
ऊर्जा और ऊष्मा प्रदान
करते हैं। यानी भारतीय
परंपराएं केवल आस्था नहीं,
वैज्ञानिक विवेक से भी जुड़ी
हैं।
समकालीन संदर्भ और संदेश
आज जब समाज
वैचारिक विभाजन, तनाव और स्वार्थ
की ओर बढ़ रहा
है, मकर संक्रांति हमें
सामूहिकता, दानशीलता और सकारात्मक परिवर्तन
का संदेश देती है। यह
पर्व सिखाता है अंधकार स्थायी
नहीं, परिश्रम व्यर्थ नहीं, परिवर्तन ही जीवन का
सत्य है.
परंपरा का सूर्य, भविष्य की रोशनी
मकर संक्रांति केवल
एक पर्व नहीं, यह
भारतीय आत्मा का उत्सव है।
यह हमें हमारी जड़ों
से जोड़ता है और भविष्य
की ओर देखने की
दृष्टि देता है। उत्तरायण
का यह पर्व हर
व्यक्ति के जीवन में
भी एक उत्तरायण लाए,
यही इसकी सार्थकता है।
सूर्य का यह संक्रमण
केवल आकाश में नहीं,
मन में भी होकृयही
मकर संक्रांति का वास्तविक संदेश
है।
वैज्ञानिक दृष्टि और जीवन विज्ञान
मकर संक्रांति के
बाद दिन बड़े होने
लगते हैं और रात
छोटी। सूर्य की किरणें अधिक
प्रखर और स्वास्थ्यवर्धक हो
जाती हैं। तिल, गुड़
और खिचड़ी जैसे खाद्य पदार्थ
शरीर की पाचन शक्ति
बढ़ाते हैं, कफ-पित्त
को संतुलित रखते हैं और
रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करते
हैं। यानी यह पर्व
आस्था के साथ-साथ
जीवन विज्ञान का भी उत्सव
है।
राष्ट्रीय पर्व होने की पात्रता
मकर संक्रांति लोक
और शास्त्र, धर्म और विज्ञान,
प्रकृति और संस्कृति का
दुर्लभ संगम है। यह
पर्व बचपन में उत्सव
जगाता है, युवाओं में
ऊर्जा भरता है और
बुजुर्गों में नव-उमंग।
यह शिशिर की ठंड और
वसंत की मिठास की
संधि है। यदि भारत
के उत्सवधर्मी चरित्र का कोई राष्ट्रीय
पर्व हो सकता है,
तो वह मकर संक्रांति
ही है, क्योंकि यह
पूरे देश को एक
ही भाव, एक ही
दिशा और एक ही
सूर्य के नीचे जोड़
देता है। सूर्य जब
दिशा बदलता है, तब जीवन
भी बदलता है, मकर संक्रांति
का यही शाश्वत संदेश
है।