मोक्षस्थली मणिकर्णिका में अफवाह का धुआँ, राजनीति की आग

जहां
चिता
की
अग्नि
अहंकार
को
भस्म
कर
देती
है,
जहां
मृत्यु
भी
सत्य
का
पाठ
पढ़ाती
है,
उसी
मणिकर्णिका
घाट
को
इन
दिनों
झूठ,
भ्रम
और
सियासी
शोर
से
ढकने
की
कोशिश
हो
रही
है।
काशी
की
इस
मोक्षस्थली
पर
बहस
आस्था
की
नहीं,
अफवाहों
की
प्रयोगशाला
बनती
जा
रही
है।
विकास
को
विनाश
बताने
का
वही
पुराना
खेल,
बस
इस
बार
हथियार
बदले
हैं,
अब
शब्द
नहीं,
एआई
से
गढ़ी
गई
तस्वीरें
और
डीपफेक
वीडियो
इस्तेमाल
हो
रहे
हैं।
मणिकर्णिका
घाट
का
कायाकल्प
वर्षों
से
लंबित
एक
आवश्यक
कदम
था।
असुरक्षित
प्लेटफॉर्म,
गंदगी,
अव्यवस्था
और
शोक
में
डूबे
परिजनों
की
पीड़ा
किसी
से
छिपी
नहीं
थी।
लेकिन
जैसे
ही
सरकार
ने
इस
महाश्मशान
को
उसकी
गरिमा
लौटाने
की
पहल
की,
संस्कृति
की
दुहाई
देकर
भ्रम
फैलाने
वालों
की
भीड़
अचानक
सक्रिय
हो
गई।
कुछ
राजनीतिक
दलों
ने
इसे
मुद्दा
बनाकर
खोई
जमीन
तलाशनी
शुरू
कर
दी,
तो
कुछ
तथाकथित
विद्वानों
ने
बिना
तथ्य
परखे
अपनी
लेखनी
से
आग
में
घी
डालने
का
काम
किया।
स्थिति
तब
और
गंभीर
हुई
जब
सोशल
मीडिया
पर
मणिकर्णिका
को
‘ध्वस्त’
दिखाने
वाली
तस्वीरें
वायरल
की
गईं।
जांच
में
सामने
आया
कि
ये
दृश्य
या
तो
पुराने
थे
या
फिर
पूरी
तरह
एआई
जनरेटेड।
अफवाह
का
यह
नया
डिजिटल
अवतार
सिर्फ
सरकार
नहीं,
समाज
की
विवेकशीलता
को
चुनौती
दे
रहा
है...

सुरेश गांधी
मणिकर्णिका घाट, जहां मृत्यु
भी मोक्ष का उत्सव है,
आज आस्था से नहीं, अफवाह
और सियासत के धुएं से
घिरा है। घाट के
कायाकल्प को लेकर आर्टिफिशियल
इंटेलिजेंस से गढ़ी गई
तस्वीरें, डीपफेक वीडियो और आधे-अधूरे
सच को हथियार बनाकर
एक बार फिर वही
पुराना खेल खेला गया,
विकास को विनाश बताने
का। काशी विश्वनाथ कॉरिडोर
की तरह इस बार
भी भ्रम फैलाकर सरकार
को कठघरे में खड़ा करने
की कोशिश हुई। मुख्यमंत्री योगी
आदित्यनाथ की मणिकर्णिका पर
मौजूदगी ने इस पूरे
नैरेटिव को पलट दिया।
घाट पर खड़े होकर
दिया गया उनका संदेश
साफ था, आस्था से
समझौता नहीं होगा, लेकिन
अव्यवस्था अब परंपरा नहीं
कहलाएगी। पुलिसिया सख्ती ने यह भी
स्पष्ट कर दिया कि
एआई के सहारे धार्मिक
भावनाएं भड़काना अब महज शरारत
नहीं, अपराध है। यह विवाद
घाट का नहीं, मानसिकता
का है। कुछ राजनीतिक
दल और तथाकथित विद्वान
संस्कृति की दुहाई देकर
उसी अव्यवस्था को बचाना चाहते
हैं, जिससे काशी दशकों तक
जूझती रही। सवाल सीधा
है, क्या गंदगी, असुरक्षा
और पीड़ा ही सनातन
की पहचान हैं? मणिकर्णिका की
चिता की आग ने
एक बार फिर बता
दिया है, काशी बदनाम
नहीं, बदली जा रही
है।
दरआसल,
काशी में जब
-
जब विकास की बात होती
है,
कुछ चेहरे और
कुछ राजनीतिक दल अचानक ‘
संस्कृति
के ठेकेदार’
बन जाते हैं।
उन्हें न तो दशकों
की अव्यवस्था दिखती है,
न गंदगी
से कराहती आस्था,
न शोक में
डूबे परिजनों की पीड़ा। उन्हें
दिखता है तो केवल
वही क्षण,
जब व्यवस्था बनने
लगती है। मणिकर्णिका घाट
के पुनर्निर्माण को लेकर मचाया
जा रहा शोर उसी
मानसिकता का ताजा उदाहरण
है। वही आशंकाएं,
वही
धमकियां,
वही भ्रम,
जो
कभी काशी विश्वनाथ धाम
कॉरिडोर,
नमो घाट,
अस्सी
घाट,
डालमंडी और शहर की
सड़कों के सौंदर्यीकरण के
समय सुनाई दिया था। मणिकर्णिका
घाट कोई साधारण श्मशान
नहीं,
बल्कि सनातन दर्शन का जीवंत प्रतीक
है। यहां मृत्यु भय
नहीं जगाती,
बल्कि जीवन का अंतिम
सत्य समझाती है। यहां चिता
की लपटें डराती नहीं,
बल्कि अहंकार जलाकर विवेक जगाती हैं। फिर भी,
दशकों तक इस पवित्र
स्थल पर अव्यवस्था,
गंदगी
और असुरक्षा को ‘
परंपरा’
कहकर
स्वीकार कर लिया गया।
सवाल यह है,
क्या
अव्यवस्था ही संस्कृति है?
क्या असुरक्षित दाह-
संस्कार स्थल,
फिसलन भरे प्लेटफॉर्म,
गंदे
मुंडन स्थल और शोकाकुल
परिजनों की अनदेखी ही
काशी की पहचान है?
काशी : समय के पार खड़ा सत्य
अब इन विरोधियों
को कौन समझाए कि
काशी कोई साधारण शहर
नहीं,
कोई सामान्य तीर्थ
नहीं,
कोई केवल धार्मिक
स्थल नहीं। काशी समय के
पार खड़ा वह सत्य
है,
जहां जीवन और
मृत्यु आमने -
सामने संवाद करते हैं। और
इसी काशी की आत्मा
का सबसे तीखा,
सबसे
निर्विवाद और सबसे शाश्वत
प्रतीक है,
मणिकर्णिका घाट।
पुराणों में वर्णन है
कि यहीं भगवान विष्णु
के कान का कुंडल
(
मणि)
गिरा,
यहीं माता सती
की मणि गिरी,
यहीं
स्वयं महादेव मृत्यु के क्षण में
तारक मंत्र का उपदेश देते
हैं। स्कंद पुराण,
काशी खंड और
पद्म पुराण,
सभी मणिकर्णिका को
मोक्ष का प्रथम सोपान
बताते हैं। यह घाट
केवल दाह-
संस्कार स्थल
नहीं,
सभ्यता का दर्पण है।
लेकिन विडंबना यह रही कि
सदियों से पूजित इस
घाट को दशकों तक
प्रशासनिक उपेक्षा और राजनीतिक उदासीनता
के हवाले छोड़ दिया गया।
श्रद्धा कभी कम नहीं
हुई,
पर व्यवस्था हमेशा
जर्जर रही।
अव्यवस्था का सच, जिसे नजरअंदाज किया गया
मणिकर्णिका की वास्तविक स्थिति
से जिसने भी आंख मिलाई
है,
वह जानता है,
शवदाह प्लेटफॉर्म असुरक्षित थे.
लकड़ी खुले
में बिखरी रहती थी.
पूजा
सामग्री और मुंडन स्थलों
का कोई व्यवस्थित स्थान
नहीं.
बारिश में फिसलन और
आग से दुर्घटनाओं का
खतरा.
गंगा में राख
और अवशेषों का अनियंत्रित प्रवाह.
शोक में डूबे परिजनों
के लिए बैठने-
ठहरने
की न्यूनतम सुविधा तक नहीं.
कोरोना
काल ने इस अव्यवस्था
को भयावह त्रासदी में बदल दिया
था। तब भी यही
राजनीतिक वर्ग मौन था।
तब न संस्कृति याद
आई,
न परंपरा।
विकास की शुरुआत और विरोध का पुराना पैटर्न
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री
योगी आदित्यनाथ ने काशी को
लेकर एक स्पष्ट दृष्टि
रखी,
विकास ऐसा हो,
जो
संस्कृति को चोट न
पहुंचाए,
बल्कि उसे और उजागर
करे। काशी विश्वनाथ धाम
कॉरिडोर इसका सबसे बड़ा
उदाहरण है। जिसे कभी
‘
तोड़फोड़’
कहा गया,
आज
वही विश्वस्तरीय आध्यात्मिक धरोहर बन चुका है।
नमो घाट,
अस्सी घाट,
शहर की सड़कें,
लटकते
बिजली के तार,
हर
बार वही आरोप लगे,
हर बार वही विरोध
हुआ,
और हर बार
वही विरोध आज मौन है।
इतिहास गवाह है, “
जब
-
जब काशी बदली,
तब
-
तब हंगामा हुआ।”
मणिकर्णिका पुनर्निर्माणः उद्देश्य और सच्चाई
‘विजन काशी’ के
तहत मणिकर्णिका घाट का कायाकल्प
कोई आकस्मिक निर्णय नहीं था। पहले
चरण में 35 करोड़ रुपये की
राशि आवंटित की गई। उद्देश्य
बिल्कुल स्पष्ट है, अंतिम संस्कार
के लिए सुरक्षित और
विस्तृत प्लेटफॉर्म, स्वच्छता और जल निकासी
की आधुनिक व्यवस्था, डोम समाज, पुरोहितों
और शोकाकुल परिजनों के लिए मानवीय
सुविधाएं. सरकार बार - बार स्पष्ट कर
चुकी है न कोई
मंदिर तोड़ा जा रहा
है, न कोई पौराणिक
संरचना नष्ट हो रही
है। अहिल्याबाई होलकर की कृतियां पूर्णतः
सुरक्षित हैं। सभी कलाकृतियां
संस्कृति विभाग के संरक्षण में
हैं और पुनर्निर्माण के
बाद यथास्थान पुनः स्थापित होंगी।
फिर शोर क्यों? क्योंकि
जहां व्यवस्था आती है, वहां
उपद्रव की दुकान बंद
होती है।
चिता की आग और सत्य
मणिकर्णिका की चिता की
आग केवल शरीर नहीं,
झूठ और भ्रम को
भी भस्म करती है।
यह घाट न किसी
पार्टी की बपौती है,
न किसी नेता की
ढाल। यह सनातन सत्य
है, और सत्य को
व्यवस्थित होने से डर
नहीं लगता। जो लोग आज
शोर मचा रहे हैं,
वे काशी से नहीं,
व्यवस्था से डर रहे
हैं। और काशी अब
डरने के दौर से
निकल चुकी है। इतिहास
साक्षी है, काशी कभी
टूटने से नहीं, ठहर
जाने से कमजोर हुई
है। और हर बार
शोर मचाने वाले अंततः इतिहास
के हाशिए पर चले गए
हैं। इस विवाद के
बीच यही सबसे बड़ा
सत्य उभरकर आता है कि
काशी को न तो
अफवाह समझ सकती है,
न सियासत। काशी को समझने
के लिए उसकी आत्मा
समझनी होगी, जहां मृत्यु भी
सत्य बोलती है और जहां
अंततः झूठ राख हो
जाता है। मणिकर्णिका आज
भी वहीं है, अडिग,
शाश्वत। फर्क सिर्फ इतना
है कि इस बार
चिता के चारों ओर
खड़े लोग नहीं, बल्कि
शब्द, तस्वीरें और नैरेटिव जल
रहे हैं। और काशी
साक्षी है कि अंत
में बचेगा वही, जो सत्य
है।
सियासत और खोई जमीन की तलाश
राजनीतिक दृष्टि से यह विवाद
कुछ दलों के लिए
अवसर बनता दिखा, संस्कृति
बनाम सरकार का नैरेटिव गढ़कर
खोई हुई जमीन वापस
पाने की कोशिश। लेकिन
काशी भावनात्मक जरूर है, भोली
नहीं। वह जानती है
कि कौन उसकी आत्मा
की चिंता कर रहा है
और कौन उसकी चिता
पर राजनीति की रोटी सेंकना
चाहता है।
लेखनी, विद्वान और संस्कृति की जिम्मेदारी
इस पूरे विमर्श
में आत्ममंथन की सबसे बड़ी
जिम्मेदारी बुद्धिजीवियों और लेखकों की
है। संस्कृति की रक्षा भावनात्मक
नारों से नहीं होती।
बिना तथ्यों की पुष्टि, यदि
लेखनी भ्रम फैलाती है,
तो वह संस्कृति की
सेवा नहीं, उसका नुकसान करती
है। संस्कृति कोई जड़ संग्रहालय
नहीं, बल्कि जीवंत प्रवाह है। उसे रोकना
भी उतना ही घातक
है, जितना उसे नष्ट करना।
50,000 करोड़ का सच और काशी का भविष्य
काशी में अब
तक लगभग 50,000 करोड़ रुपये के
विकास कार्य हो चुके हैं।
यह पैसा काशी की
आत्मा बेचने के लिए नहीं,
बल्कि उसकी गरिमा लौटाने
के लिए खर्च हुआ
है। आज काशी वैश्विक
धार्मिक पर्यटन का केंद्र बन
रही है, रोजगार का
बड़ा स्रोत बन रही है,
अव्यवस्था से निकलकर व्यवस्था
की ओर बढ़ रही
है। सवाल अब मणिकर्णिका
का नहीं, मानसिकता का है, क्या
काशी को गंदगी में
छोड़ दिया जाए? या
संवेदनशीलता, सम्मान और सुरक्षा के
साथ उसका स्वरूप और
सशक्त बनाया जाए?
...ताकि चिता की राख घरों में न जाए
मॉनसून में पूरा घाट
जलमग्न होता है, लेकिन
पुनर्निमाण के बाद ये
मुश्किल दूर हो जाएगी.
गंगा के अधिकतम जलस्तर
से ऊपर दो स्तर
प्लेटफॉर्म तैयार कराए जाएंगे. निचले
स्तर पर 18 प्लेटफॉर्म होंगे और ऊपर वाले
स्तर पर 19. चिता जलाते वक्त
निकलने वाले धुएं के
लिए खास इंतजाम किए
जा रहे हैं. इस
श्मशान घाट पर 25 मीटर
ऊंची चिमनी लगाई जाएगी, ताकि
चिता की राख हवा
के साथ उड़ जाए
और आसपास के घरों में
न जाए. दाह संस्कार
क्षेत्र में वेटिंग एरिया
और चेंजिंग रूम का भी
निर्माण कराया जा रहा है.
पुनर्निर्माण के बाद मणिकर्णिका
घाट पर आखिरी संस्कार
से जुड़े हर रिवाजों
के लिए अलग इंतजाम
किए जा रहे हैं.
शवों के स्नान के
लिए जलकुंड के साथ मुंडन
क्षेत्र बनाया जा रहा है.
साथ ही लकड़ी भंडारण
क्षेत्र का निर्माण किया
जाएगा. इस घाट पर
दो सामुदायिक शौचालय का निर्माण भी
कराया जाएगा. पूरा निर्माण कार्य
चुनार और जयपुर के
पत्थरों से किया जाएगा.
एआई, डीपफेक और अफवाह का नया युग
इस पूरे प्रकरण
में सबसे खतरनाक मोड़
तब आया, जब आर्टिफिशियल
इंटेलिजेंस और डीपफेक तकनीक
का सहारा लेकर भ्रामक तस्वीरें
और वीडियो सोशल मीडिया पर
फैलाए गए। कहीं मूर्तियों
के टूटने के झूठे दृश्य,
कहीं घाट को ‘पूरी
तरह ध्वस्त’ करने का दावा,
कहीं यह नैरेटिव कि
महाश्मशान को पर्यटन स्थल
बनाया जा रहा है.
जांच में सामने आया
कि कई दृश्य एआई
जनरेटेड, कुछ पुराने संदर्भों
से काटकर पेश किए गए
और कुछ पूरी तरह
काल्पनिक थे। लेकिन डिजिटल
युग में अफवाह की
सबसे बड़ी ताकत है
उसकी रफ्तार। सच जब तक
जूते पहनता है, झूठ भीड़
जुटा चुका होता है।
पुलिसिया सख्ती : अफवाह अब अपराध
वाराणसी पुलिस और साइबर क्राइम
यूनिट ने समय रहते
इस खतरे को समझा।
सोशल मीडिया अकाउंट्स की निगरानी बढ़ाई
गई, भ्रामक कंटेंट फैलाने वालों को चिह्नित किया
गया। स्पष्ट संदेश दिया गया, एआई
और अफवाह के जरिए धार्मिक
भावनाएं भड़काना गंभीर अपराध है। यह कार्रवाई
केवल कानून - व्यवस्था नहीं, बल्कि सांस्कृतिक सुरक्षा का सवाल है।
योगी की मौजूदगी : प्रतीक और संदेश
इसी पृष्ठभूमि में
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का
मणिकर्णिका घाट पहुंचना एक
गंभीर सांस्कृतिक वक्तव्य था। उन्होंने घाट
पर खड़े होकर कहा
कि काशी को बदनाम
करने की कोशिशें नई
नहीं हैं। काशी विश्वनाथ
कॉरिडोर के समय भी
भ्रम फैलाया गया था, लेकिन
आज वही कॉरिडोर काशी
की पहचान बन चुका है।
मुख्यमंत्री की मौजूदगी ने
साफ कर दिया कि
सरकार निर्णय हवा में नहीं,
महाश्मशान की अग्नि को
साक्षी बनाकर ले रही है।
महाश्मशान की आत्मा और काशी की स्मृति
काशी में मृत्यु
भी एक उत्सव है,
एक दर्शन है, एक शाश्वत
संवाद है। यहां जीवन
का अंत शून्य नहीं,
बल्कि मुक्ति का द्वार माना
गया है। इसी काशी
में गंगा के पावन
तट पर स्थित मणिकर्णिका
घाट, जिसे महाश्मशान कहा
गया, सदियों से यह घोषणा
करता आया है कि
संसार नश्वर है, सत्य ही
शाश्वत है। लेकिन विडंबना
यह है कि आज
वही मणिकर्णिका मृत्यु या मोक्ष के
कारण नहीं, बल्कि अफवाह, सियासत, डिजिटल भ्रम और सांस्कृतिक
राजनीति के कारण राष्ट्रीय
बहस के केंद्र में
है। यह विवाद केवल
एक घाट के निर्माण
या पुनरुद्धार का नहीं है।
यह विवाद उस प्रश्न का
है कि क्या आस्था
को जड़ बनाकर रखा
जाए या उसे समय
के साथ संवेदनशील रूप
से आगे बढ़ाया जाए?
और इससे भी बड़ा
प्रश्न यह कि क्या
संस्कृति की रक्षा के
नाम पर झूठ, अफवाह
और भय का सहारा
लिया जा सकता है?
मणिकर्णिका घाट केवल ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं।
यह सनातन स्मृति का वह बिंदु
है, जहां शिव स्वयं
तारक मंत्र देते हैं, ऐसी
मान्यता है। यहां चिता
की आग कभी बुझती
नहीं। यहां राजा और
रंक, विद्वान और अनपढ़, सभी
एक समान हो जाते
हैं। यही समता, यही
शाश्वत सत्य मणिकर्णिका को
अद्वितीय बनाता है। परंतु समय
के साथ इस घाट
की भौतिक स्थिति बदहाल होती चली गई।
संकरी गलियां, जर्जर प्लेटफॉर्म, अव्यवस्थित दाह संस्कार स्थल,
गंदगी और असुरक्षाकृये सब
उस स्थान की गरिमा के
साथ अन्याय थे, जिसे मोक्ष
का द्वार कहा गया। सवाल
यह है कि क्या
इन अव्यवस्थाओं को ढोते रहना
ही परंपरा की रक्षा है?
अफवाह के युग में विवेक की जरूरत
यह पूरा प्रकरण
हमें चेतावनी देता है कि
डिजिटल युग में आस्था
सबसे आसान निशाना है।
एआई और सोशल मीडिया
ने झूठ को विश्वसनीय
बनाने के नए औजार
दे दिए हैं। ऐसे
में सरकार, समाज, मीडिया और बुद्धिजीवियोंकृसभी की जिम्मेदारी
बढ़ जाती है। कहते
हैं भगवान शिव ने मणिकर्णिका
घाट अपने रहने के
लिए बसाया था. जब ये
घाट बसा तो गंगा
नहीं थी, बल्कि एक
कुंड हुआ करता था.
स्नान करते वक्त भगवान
शिव के कान का
कुंडल उस कुंड में
गिर गया और तब
से इसका नाम मणिकर्णिका
पड़ गया. अब चूंकि
भगवान शिव यहां वास
करते हैं, इसलिए यहां
मृत्यु को भी मंगल
माना जाता है. मणिकर्णिका
घाट का पुनर्निर्माण नगर
निगम के तहत कार्यदायी
संस्था द्वारा 18 करोड़ की लागत
से किया जा रहा
है. मान्यता है कि मान्यता
है कि औघड़ रूप
में शिव यहां विराजते
हैं.