Thursday, 26 February 2026

काशी में रंगों का आध्यात्मिक आरंभ : रंगभरी एकादशी पर बाबा संग होली खेलेंगे काशीवासी

काशी में रंगों का आध्यात्मिक आरंभ : रंगभरी एकादशी पर बाबा संग होली खेलेंगे काशीवासी 

ब्रह्ममुहूर्त पूजन, बाबा की पालकी और फूलों की होली से गूंजेगी शिवनगरी, अगले दिन मणिकर्णिका पर होगीमसान होलीकी अनूठी परंपरा

सुरेश गांधी

वाराणसी। फाल्गुन मास की सुगंधित हवाओं के साथ शिवनगरी काशी एक बार फिर रंग और भक्ति के दिव्य संगम में डूबने जा रही है। काशीवासियों के लिए रंगभरी एकादशी केवल एक पर्व नहीं, बल्कि अपने आराध्य के साथ आत्मीय संबंध का उत्सव है। इस दिन काशी विश्वनाथ धाम में सदियों पुरानी परंपरा जीवंत होती है, जब भक्त प्रतीकात्मक रूप से बाबा विश्वनाथ के साथ होली खेलते हैं और इसी के साथ काशी में होली का आध्यात्मिक शुभारंभ माना जाता

है।

मान्यता है कि महाशिवरात्रि पर विवाह के पश्चात रंगभरी एकादशी के दिन भगवान विश्वनाथ माता गौरा को पहली बार काशी लेकर आते हैं। इस अवसर कोगौनाके रूप में मनाया जाता है और बाबा को अबीर-गुलाल अर्पित कर भक्त अपने जीवन में प्रेम, उल्लास और मंगल की कामना करते हैं। यही कारण है कि काशी में होली का पहला रंग बाबा के दरबार से ही उठता है।

इस वर्ष 27 फरवरी को पड़ रही रंगभरी एकादशी पर ब्रह्ममुहूर्त में विशेष पूजन की भव्य तैयारी की गई है। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच बाबा विश्वनाथ, माता गौरा और प्रथमेश का पूजन पारंपरिक विधि से संपन्न होगा। सुबह 7 बजे भोग और शृंगार के बाद 9 बजे से श्रद्धालुओं के लिए दर्शन प्रारंभ होंगे, जबकि दोपहर 1230 बजे भोग आरती का आयोजन किया जाएगा। मंदिर प्रशासन के अनुसार, श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए सुरक्षा और व्यवस्था के व्यापक इंतजाम किए गए हैं।

शाम 5 बजे बाबा विश्वनाथ की पारंपरिक पालकी मंदिर परिसर से प्रस्थान करेगी, जो रंगभरी एकादशी का सबसे आकर्षक और भावनात्मक दृश्य माना जाता है। पालकी यात्रा काशी में होली के औपचारिक आरंभ का प्रतीक है। मार्ग में श्रद्धालु अबीर-गुलाल, रंग और गुलाब की पंखुड़ियों से बाबा और माता गौरा का स्वागत करेंगे। ढोल-नगाड़ों, शंखध्वनि औरहर-हर महादेवके जयघोष के बीच यह यात्रा भक्तिरस की अलौकिक अनुभूति कराती है। इस वर्ष मंदिर न्यास ने परंपरा और व्यवस्था के संतुलन को ध्यान में रखते हुए कुछ विशेष बदलाव भी किए हैं। शिवार्चनम मंच पर आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों में अबीर-गुलाल के स्थान पर फूलों की होली आयोजित की जाएगी, ताकि मंदिर परिसर की गरिमा और स्वच्छता बनी रहे। वहीं मंदिर प्रांगण के भीतर बाबा की चल प्रतिमा के साथ पारंपरिक रूप से रंगों की होली खेलने की अनुमति दी गई है।

वर्षों से चली रही परंपरा के अनुसार बाबा की चल प्रतिमा बाहर से लाई जाती है और काशीवासी अपने आराध्य के साथ होली खेलते हैं। हालांकि इस बार संकरी गलियों और भीड़ प्रबंधन को देखते हुए प्रशासन और पूर्व महंत परिवार की बैठक में निर्णय लिया गया है कि प्रतिमा के साथ आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या 64 तक सीमित रहेगी, जिससे व्यवस्था सुचारु बनी रहे। मंदिर परिसर को गेंदे, गुलाब और विविध पुष्पों से सजाया गया है, जिससे पूरा धाम रंग और सुगंध की आध्यात्मिक आभा में निखर उठा है। शाम से आरंभ होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम रात 10 बजे तक चलेंगे, जिनमें शिवभक्ति से ओतप्रोत भजन, पारंपरिक प्रस्तुतियां और ब्रज शैली की फूलों की होली विशेष आकर्षण होगी।

घाटों पर भी इस पर्व की अलग ही छटा दिखाई दे रही है। श्रद्धालु प्रातःकाल गंगा नदी में स्नान कर बाबा के दर्शन के लिए मंदिर की ओर बढ़ रहे हैं। गंगा तट से उठती आरती की ध्वनि और मंदिर में गूंजते शिवनाम के स्वर काशी की आध्यात्मिक पहचान को और अधिक प्रखर बना रहे हैं। रंगभरी एकादशी की सबसे अनूठी परंपरा इसके अगले दिन देखने को मिलती है, जब काशी के अद्भुत भक्त मणिकर्णिका घाट परमसान होलीखेलते हैं। यहां जीवन और मृत्यु के दर्शन एक साथ उपस्थित होते हैं। चिताओं की अग्नि, डमरू की ध्वनि और शिवनाम के बीच खेली जाने वाली यह होली काशी की आध्यात्मिकता का गहनतम स्वरूप प्रस्तुत करती है। यह परंपरा संदेश देती है कि जीवन क्षणभंगुर है, पर भक्ति और उत्सव सनातन हैं। काशीवासियों के लिए रंगभरी एकादशी इसलिए भी विशेष होती है क्योंकि यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि अपने आराध्य से आत्मीय संवाद का अवसर है। यहां भक्त केवल दर्शक नहीं होते, बल्कि उत्सव का हिस्सा बनते हैं। बाबा के साथ खेला गया यह रंग जीवन में आनंद, समर्पण और आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है।

जैसे-जैसे होली का पर्व निकट आता है, काशी का वातावरण और अधिक उल्लासमय होता जा रहा है। गलियों में उड़ता गुलाल, मंदिरों में गूंजते भजन और घाटों पर उमड़ती आस्था यह संकेत दे रही है कि शिवनगरी में रंगों का यह उत्सव केवल परंपरा नहीं, बल्कि जीवन का उत्सव है। रंगभरी एकादशी से प्रारंभ यह आध्यात्मिक रंगोत्सव काशी की सनातन संस्कृति, लोकआस्था और भक्ति की उस परंपरा को जीवंत करता है, जो सदियों से इस नगरी को विश्व की आध्यात्मिक राजधानी बनाती आई है।

ब्रज के आँगन से काशी के धाम तक पहुँचा प्रेम का रंग

ब्रज के आँगन से काशी के धाम तक पहुँचा प्रेम का रंग 

रंगभरी एकादशी पर परंपरा का अद्भुत विस्तार, ब्रज से चली आस्था की शोभायात्रा पहुँचेगी शिवनगरी

सुरेश गांधी

वाराणसी. मथुरा से रवाना हुई भव्य गुलाल-यात्रा, अबीर-गुलाल, संकीर्तन और ब्रज होली की रसधारा में सराबोर हुए श्रद्धालु ; ब्रज-काशी सांस्कृतिक सेतु हुआ और सुदृढ़। फाल्गुन की रंगभरी उमंग और भक्ति की मधुर लय के बीच गुरुवार को ब्रजभूमि से एक ऐसी परंपरा ने आकार लिया, जिसने दो महान आध्यात्मिक धामों को फिर से भावनाओं के रंग में जोड़ दिया। रंगभरी एकादशी के पावन अवसर पर श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर से काशी विश्वनाथ धाम के लिए भव्य गुलाल-यात्रा श्रद्धा और उत्साह के वातावरण में रवाना की गई।

शोभायात्रा के प्रारंभ होते ही वातावरणराधे-श्यामऔरहर-हर महादेवके जयघोष से गूंज उठा। पारंपरिक वेशभूषा में सजे ग्वाल-बाल और गोपियों की झांकी, रसिया गीतों की मधुर धुन और ढोल-मृदंग की थाप ने ब्रज की होली को सजीव कर दिया। गुलाल की हल्की उड़ती परतों के बीच भक्तों का उत्साह ऐसा था मानो फाल्गुन स्वयं रंगों का आशीर्वाद लेकर उतर आया हो।

श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान के पदाधिकारियों ने बताया कि ब्रज और काशी के मध्य होली के अवसर पर फाग, प्रसाद और पूजन सामग्री के आदान-प्रदान की परंपरा पिछले वर्ष से आरंभ हुई है, जो अब सांस्कृतिक संवाद का स्वरूप ले चुकी है। इस वर्ष काशी से प्राप्त सुगंधित गुलाल, वस्त्र और प्रसाद को ब्रज के रंगोत्सव में अर्पित किया जाएगा, जबकि ब्रज से नील-गुलाल, फल और मेवा को विशेष रूप से सजाए गए वाहन द्वारा काशी भेजा गया है।

भव्य गुलाल-यात्रा में संतों और कलाकारों ने संकीर्तन के साथ नृत्य प्रस्तुत किया, वहीं हजारों श्रद्धालु इस आध्यात्मिक उत्सव के साक्षी बने। पुष्पवर्षा के बीच यात्रा को विदाई दी गई, जिसने पूरे आयोजन को उत्सवी और भावपूर्ण बना दिया। ब्रज परंपरा में होली केवल उत्सव नहीं, बल्कि दिव्य प्रेम और आध्यात्मिक अनुभूति का प्रतीक मानी जाती है। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण और राधा की होली लीला के आकर्षण से स्वयं भगवान शिव भी ब्रज पधारे थे। उनके विरक्त स्वरूप को देखकर गोपियां चकित हुईं, तब श्रीकृष्ण के संकेत पर उन्होंने गोपी रूप धारण कर इस लीला में सहभागिता की। आज भी यह आस्था ब्रज में रंगेश्वर महादेव मंदिर से जुड़ी परंपराओं में जीवित दिखाई देती है।

रंगभरी एकादशी पर दोनों धामों में आयोजित होने वाले विशेष होली उत्सव में इस प्रसादी गुलाल का उपयोग किया जाएगा। ब्रज और काशी के बीच रंगों का यह आध्यात्मिक आदान-प्रदान केवल परंपरा नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति की उस निरंतर प्रवाहित धारा का प्रतीक है, जो देश की आस्था, लोकजीवन और सांस्कृतिक एकता को युगों से सशक्त करती रही है।


काशी में रंगों का आध्यात्मिक आरंभ : रंगभरी एकादशी पर बाबा संग होली खेलेंगे काशीवासी

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