Thursday, 30 July 2026

काली घटा, मीठी कजरी और झूमता सावन

काली घटा, मीठी कजरी और झूमता सावन  

जब आकाश पर सावन की पहली बदरी उतरती है, तब केवल मौसम नहीं बदलता, भारतीय मानस की धड़कन भी बदल जाती है। मिट्टी की सोंधी गंध, आम की डालियों पर पड़े झूले, आंगन में लौटती बेटियां और चौपालों से उठती कजरीये सब मिलकर उस सांस्कृतिक संसार का निर्माण करते हैं, जिसकी जड़ें हजारों वर्षों पुरानी लोक परंपराओं में हैं। आज महानगरों की चकाचौंध और डिजिटल संगीत के शोर के बीच भी कजरी का स्वर इसलिए जीवित है, क्योंकि वह मनुष्य और प्रकृति के बीच के आत्मीय संवाद को बचाए रखता है। कजरी में वर्षा का संगीत है, खेतों की हरियाली है, मायके की स्मृतियां हैं, विरह की नमी है और मिलन की प्रतीक्षा भी। यह लोकगीत भारतीय स्त्री की संवेदनाओं का ऐसा दस्तावेज है, जिसमें परिवार, प्रेम, सामाजिक रिश्ते और ऋतुचक्र एक साथ बोलते हैं। सावन का महीना हमें यह भी याद दिलाता है कि संस्कृति केवल उत्सवों में नहीं, रोजमर्रा के जीवन में बसती है। जिस समाज में पेड़ बचे रहते हैं, वहां झूले बचते हैं; जहां झूले बचते हैं, वहां गीत बचते हैं; और जहां गीत बचते हैं, वहां मनुष्य की संवेदना भी बची रहती है। कजरी का महत्व केवल लोकसंगीत तक सीमित नहीं है। वह हमारी भाषाई विरासत, पर्यावरण चेतना और सामुदायिक जीवन की धड़कन है। सावन की रिमझिम में गूंजती कजरी दरअसल भारतीय संस्कृति का वह हरा स्वर है, जो हर पीढ़ी को उसकी जड़ों से जोड़ता रहता है

सुरेश गांधी

सावन के आइल महिनवा, ओ सखी गावा कजरिया...” यह केवल गीत की पंक्ति नहीं, भारतीय लोकजीवन की सामूहिक स्मृति है। जैसे ही आकाश में काली घटाएं उमड़ती हैं, धरती हरियाली की चूनर ओढ़ लेती है और रिमझिम फुहारें हवाओं में घुलती हैं, वैसे ही लोकमानस के भीतर एक अनकहा संगीत जाग उठता है। यही संगीत कजरी बनकर गांवों की चौपालों, आंगनों, बगीचों और मंदिरों में गूंजता है। सावन केवल ऋतु परिवर्तन नहीं, संवेदना का पुनर्जन्म है; और कजरी उसकी सबसे मधुर अभिव्यक्ति। भारतीय लोक परंपरा में कजरी को ‘लोकगीतों की रानी कहा गया है। यह गीत भर नहीं, बल्कि स्त्री मन की धड़कनों, स्मृतियों, विरह, श्रृंगार, प्रतीक्षा और मिलन की आकांक्षाओं का जीवंत दस्तावेज है। यही कारण है कि समय बदल गया, संगीत के स्वरूप बदल गए, मंच और माध्यम बदल गए, पर कजरी की आत्मा आज भी अक्षुण्ण है।

कजरी का एक महत्वपूर्ण पक्ष उसका सामूहिक स्वर है। गांव की चौपाल में जब स्त्रियां गोल घेरा बनाकर गाती हैं, तब वहां केवल संगीत नहीं होता, सामाजिक एकता भी जन्म लेती है। बुजुर्गों की स्मृतियां, युवतियों की हंसी और बच्चों की उत्सुकतासब एक ही लोकधुन में बंध जाते हैं। यही भारतीय लोकसंस्कृति की सबसे बड़ी शक्ति है। सावन का संबंध प्रकृति से भी उतना ही गहरा है जितना शिव से। हरियाली, वर्षा, नदी, वृक्ष और मिट्टीये सब शिव के पंचतत्व की याद दिलाते हैं। कजरी बार-बार खेतों, मेड़ों, आम्रवनों और पोखरों का उल्लेख करती है। वह अनकहे ढंग से मनुष्य को प्रकृति के प्रति कृतज्ञ होना सिखाती है। आज जब पर्यावरण संकट गहराता जा रहा है, तब लोकगीतों की यह चेतना और भी मूल्यवान हो जाती है।

काशी, मिर्जापुर, भदोही और पूर्वांचल के अनेक अंचलों में आज भी ‘कजरी दंगल आयोजित होते हैं। रात भर लोकगायक शिव, गंगा और सावन पर आधारित कजरियां सुनाते हैं। कहीं भोलेनाथ को प्रिय बेलपत्र का वर्णन होता है, कहीं गंगाजल की महिमा, तो कहीं काशी की महत्ता का गायन। शास्त्रीय संगीत के मंचों पर राग मल्हार जिस भाव को जगाता है, वही भाव लोकजीवन में कजरी जगाती है। सावन में शिव और शक्ति की आराधना साथ-साथ चलती है। नवविवाहिताएं मायके आकर झूला झूलती हैं, मेहंदी रचाती हैं और शिव-पार्वती के अखंड दांपत्य का स्मरण करती हैं। उनके गीतों में मनुहार भी होती है और मंगलकामना भी

गौरा संग बैठे शंकर, बरसे अंबर पानी...”

यह लोककाव्य भारतीय परिवार व्यवस्था की सांस्कृतिक जड़ों को भी सींचता है। आधुनिकता के इस तीव्र दौर में बहुत कुछ बदल गया है। मोबाइल की धुनों ने चौपाल की आवाज़ को दबाया है, पर सावन आते ही लोकस्मृति फिर जाग उठती है। मंदिरों के बाहर, गांवों की पगडंडियों पर, कांवड़ यात्राओं में और गंगा तट की संध्याओं में कजरी आज भी सुनाई देती है। इसका अर्थ है कि हमारी सांस्कृतिक धड़कन अभी जीवित है। कजरी हमें सिखाती है कि भक्ति केवल मंदिर की दीवारों के भीतर नहीं रहती; वह खेतों की मेड़ पर भी गाती है, झूले की पींग पर भी झूमती है और बरसात की बूंदों में भी टपकती है। सावन का वास्तविक सौंदर्य इसी संगम में हैप्रकृति, लोक और शिवभक्ति के संगम में।

जब सावन लौटता है, बेटियां भी लौटती हैं

सावन का महीना भारतीय परिवार व्यवस्था में भावनाओं का महीना है। यह वह समय है जब विवाहित बेटियां मायके आती हैं। झूले की पींगें केवल खेल नहीं रहतीं, वे रिश्तों की मिठास और बचपन की स्मृतियों को फिर से जीवित कर देती हैं। मां की गोद के बाद यदि किसी चीज़ में सबसे अधिक सुकून है तो वह झूला है। यही कारण है कि सावन आते ही गांवों में पेड़ों पर झूले पड़ते हैं और उनके साथ गूंज उठती है कजरी

रिमझिम बरसेले बदरिया, गुइयां गावेले कजरिया...”

यह गीत बारिश का वर्णन भर नहीं करता; इसमें भीगती धरती के साथ भीगता मन भी शामिल होता है।

कजरी : लोकसंगीत की अनुपम विधा

उत्तर भारत में कजरी की अनेक शैलियां प्रचलित हैं, जिनमें तीन प्रमुख रूप विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

1. बनारसी कजरी : बोलों में ठेठपन, टेक में खिंची हुई तान और बनारसी लोकभाषा की मिठास इसकी पहचान है।

पिया सड़िया लियाइब न, जेवना ना बनइबा...”

2. मिर्जापुरी कजरी : मंचीय प्रस्तुति में अत्यंत लोकप्रिय। इसमें सावन की मस्ती, देवर-भाभी और ननद-भाभी की चुटकी तथा लोक हास्य का सुंदर मेल मिलता है।

3. गोरखपुरी कजरी : हरे रामा, “ऐ हारी जैसी टेक वाली कजरी, जो प्रायः राधा-कृष्ण के प्रसंगों से जुड़ी होती है। इन विविध रूपों के बावजूद कजरी की मूल संवेदना एक ही हैसावन के बहाने मन की बात कहना।

मिथिला से मथुरा तक एक ही लोकधुन

कजरी केवल पूर्वांचल की संपत्ति नहीं है। मिथिला में हिंडोले पर बैठकर गाए जाने वाले मल्हार, राजस्थान की तीज के गीत और मथुरा की झूलन लीलाएं उसी लोकधारा के विभिन्न रूप हैं। मथुरा में राधा-कृष्ण के झूला उत्सव के समय गाई जाने वाली पंक्तियां लोक और भक्ति के अद्भुत संगम का उदाहरण हैं

कान्हा हंसि-हंसि बोली बोलड़, ऊ तो करइ ठिठोली ना...”

यहां सावन केवल प्रकृति नहीं, प्रेम का उत्सव बन जाता है।

विरह की भीगी हुई आवाज़

कजरी का सबसे मार्मिक पक्ष उसका विरह है। झमाझम वर्षा हो रही है, सहेलियां झूला झूल रही हैं, पर परदेश गया प्रियतम नहीं लौटा। तब नवविवाहिता की आंखों से बूंदों की तरह आंसू झरते हैं

करूं कौन जतन अरी सखी, मोरे नयनों से बरसे बदरिया...”

लोकगीत की यही शक्ति है कि वह निजी पीड़ा को सामूहिक अनुभव बना देता है। हर सुनने वाले को लगता है कि यह गीत उसी के मन से निकला है।  

कजरी अखाड़े : जीवित लोक विश्वविद्यालय

पूर्वी उत्तर प्रदेश के गांवों में आज भी ‘कजरी अखाड़े लोक परंपरा के जीवंत केंद्र हैं। गुरुपूजन से इनका प्रारंभ होता है। कजरी रचने वाले गुरु अपनी रचनाएं लिखित नहीं, मौखिक रूप से शिष्यों को सौंपते हैं। यह परंपरा केवल गायन नहीं, स्मृति, अनुशासन और सांस्कृतिक उत्तराधिकार का अद्भुत उदाहरण है। यहां प्रतिस्पर्धा भी होती है, पर वह कला की प्रतिष्ठा के लिए होती है, अहंकार के लिए नहीं।

मंदिरों में झूलन और भक्ति की कजरी

सावन में श्रीकृष्ण को झूले में बैठाकर झूलन उत्सव मनाया जाता है। भक्त प्रेमरस से भीगी कजरियां गाते हुए उन्हें झुलाते हैं

कान्हा हंसि-हंसि बोलें, बोड़ऊ तो करैं ठिठोली ना...”

इस क्षण कजरी लोकगीत से आगे बढ़कर भक्ति का माध्यम बन जाती है। श्रृंगार और अध्यात्म यहां एक-दूसरे में विलीन हो जाते हैं।

पर्यावरण चेतना की लोकधुन

कजरी में केवल प्रेम नहीं, प्रकृति के प्रति गहरा अनुराग भी है। खेत, मेड़, आम्रवन, पीपल, बरगद, पोखर और वर्षाये सब इसके स्थायी पात्र हैं। जब गीत कहता है

मोर सवरिया भीजै न, ओही धनियां की कियरिया...”

तो उसमें खेत की हरियाली और अन्न की चिंता भी शामिल होती है। इस अर्थ में कजरी लोक पर्यावरण का गीत है। वह मनुष्य और प्रकृति के सहजीवी संबंध की स्मृति को बचाए रखती है।

स्वतंत्रता संग्राम की हुंकार भी बनी कजरी

लोकधुनें केवल प्रेमगीत नहीं गातीं; वे समय की आवाज़ भी बनती हैं। स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में कजरी ने जनजागरण का रूप लिया

हरे रामा सुभाष चन्द्र ने फौज सजाई रे हारी...”

यह बताता है कि लोकसंगीत जनता की चेतना से कितना गहरे जुड़ा होता है।

धुनमुनिया : नृत्य और गीत का अद्भुत मेल

अवध और इलाहाबाद अंचल में कजरी केवल गाई नहीं जाती, ‘खेली भी जाती है। ‘धुनमुनिया शैली में महिलाएं अर्धवृत्त बनाकर झुक-झुक कर नृत्य करती हैं। ढोलक की थाप, सामूहिक स्वर और लयबद्ध देहभंगिमाएं मिलकर ऐसा दृश्य रचती हैं जिसमें सावन स्वयं नाचता हुआ प्रतीत होता है।

कचौड़ी गली से रंगून तक : लोकस्मृति का विस्तार  

लोकगीत जीवन की घटनाओं को इतिहास की तरह सहेज लेते हैं। बनारस की प्रसिद्ध कजरी

कचौड़ी गली सून कइले बलमू, पिया चलि गइले रंगून हो...”

प्रवास, बिछोह और आर्थिक विवशता की कथा कहती है। यह गीत बताता है कि लोकसाहित्य केवल मनोरंजन नहीं, समाज का संवेदनात्मक अभिलेख है।

आधुनिकता के बीच भी जीवित है कजरी

उपभोक्तावादी चमक-दमक और डिजिटल मनोरंजन के इस दौर में कजरी का स्वर भले कुछ सीमित हुआ हो, पर उसका महत्व कम नहीं हुआ। वह आज भी गांवों की चौपालों, श्रावणी मेलों, मंदिरों और पारिवारिक उत्सवों में सांस ले रही है। जब भी सावन की पहली बारिश पड़ती है, लोकमन के भीतर कोई पुराना स्वर जाग उठता है। कजरी हमें याद दिलाती है कि संस्कृति केवल संग्रहालयों में नहीं रहती; वह लोगों की बोली, स्मृति और गीतों में जीवित रहती है।

हरियाली रहेगी तो कजरी भी रहेगी

आज आवश्यकता केवल कजरी को सुनने की नहीं, उसे समझने और बचाने की है। यह हमारी भाषाई विविधता, स्त्री अनुभव, लोकसंगीत और पर्यावरणीय चेतना की साझा धरोहर है। जिस दिन गांवों से झूले गायब हो जाएंगे, पेड़ों की छाया कम हो जाएगी और सावन केवल कैलेंडर की तारीख बनकर रह जाएगा, उस दिन कजरी का स्वर भी क्षीण पड़ जाएगा। लेकिन अभी भी जब कहीं से यह पंक्ति सुनाई देती है

रिमझिम बरसेले बदरिया, गुइयां गावेले कजरिया...”

तो लगता है कि भारतीय मानस की हरियाली अब भी सुरक्षित है। कजरी तब तक जीवित रहेगी, जब तक धरती पर सावन उतरता रहेगा, पेड़ों पर झूले पड़ते रहेंगे, बेटियां मायके लौटती रहेंगी और मनुष्य प्रकृति से अपना संवाद बनाए रखेगा। यही कजरी का सौंदर्य है, यही उसका शाश्वत लोकगीतत्व।

रिमझिम बरसे बदरिया, कजरी गावे बनारस

सावन की पहली बूंद जब धरती को छूती है, तब केवल मिट्टी ही नहीं महकती, भारतीय आत्मा भी भीग उठती है। मंदिरों की घंटियां, गंगा तट पर गूंजता ‘हर-हर महादेव, कांवड़ियों की पदयात्रा और गांवों में उठती कजरी की तानये सब मिलकर श्रावण को एक अद्भुत आध्यात्मिक उत्सव बना देते हैं। उत्तर भारत में सावन केवल ऋतु नहीं, शिव का महीना है; और कजरी केवल लोकगीत नहीं, उस भक्ति का सहज संगीत है जो बिना शास्त्र पढ़े भी सीधे हृदय तक पहुंचती है। काशी में कहा जाता है कि सावन आते ही स्वयं भोलेनाथ अपने भक्तों के बीच उतर आते हैं। भोर में विश्वनाथ धाम की आरती, गंगा किनारे दीपों की झिलमिलाहट और संध्या में लोकगायकों की कजरियांयह दृश्य किसी जीवित संस्कृति का महोत्सव लगता है। यहां भक्ति और लोकजीवन अलग-अलग धाराएं नहीं, एक ही नदी के दो किनारे हैं। कजरी की मूल संवेदना स्त्री मन से जुड़ी मानी जाती है, किंतु सावन में उसका स्वर शिवभक्ति से भी भर उठता है। गांवों में महिलाएं झूला झूलते हुए गाती हैं

भोला बाबा आइहें नगरी, सजि गइल काशी धाम...”

इन पंक्तियों में श्रृंगार नहीं, स्वागत है; विरह नहीं, दर्शन की आकांक्षा है। लोकधुन यहां आराधना बन जाती है। श्रावण सोमवारों का दृश्य अपने आप में अद्वितीय होता है। गेरुए वस्त्रों में कांवड़िए गंगाजल लेकर शिवालयों की ओर बढ़ते हैं। उनके कदमों की लय और दूर कहीं बजती ढोलक पर उठती कजरी एक अद्भुत ताल रचती है। ऐसा लगता है मानो पूरा समाज एक साथ ‘बोल बम की धुन में चल पड़ा हो। जब तक श्रावण की बदरियां धरती पर उतरती रहेंगी, गंगा बहती रहेगी, काशी में ‘हर-हर महादेव गूंजता रहेगा और गांवों में कजरी की तान उठती रहेगी, तब तक भारतीय संस्कृति की यह हरित धारा कभी सूखेगी नहीं। कजरी सावन की आत्मा है और सावन शिव की मुस्कान; दोनों मिलकर भारतीय लोकजीवन को हर वर्ष फिर से पवित्र, प्राणवान और आनंदमय बना देते हैं। 

109 करोड़ से बदलेगी वाराणसी मंडल की सूरत

109 करोड़ से बदलेगी वाराणसी मंडल की सूरत 

22 परियोजनाओं के साथ काशी बनेगी धार्मिक-सांस्कृतिक पर्यटन की धुरी

घाट, मंदिर, संग्रहालय, ऑडिटोरियम और इको टूरिज्म पर सरकार का फोकस; मंत्री जयवीर सिंह बोले- गुणवत्ता और समयसीमा से समझौता नहीं

सुरेश गांधी

वाराणसी। काशी और पूर्वांचल की धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत को नई पहचान देने की दिशा में योगी सरकार ने बड़ा कदम बढ़ाया है। वाराणसी मंडल में पर्यटन, संस्कृति और धर्मार्थ कार्य विभाग की लगभग 109.20 करोड़ रुपये लागत वाली 36 परियोजनाओं पर गुरुवार को विस्तृत मंथन हुआ। लखनऊ से आए पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह और अपर मुख्य सचिव अमित अभिजात ने कमिश्नरी सभागार में समीक्षा बैठक कर अधिकारियों को समयबद्ध और गुणवत्तापूर्ण कार्य सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। 

बैठक में धार्मिक स्थलों के सौंदर्यीकरण, सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण और पर्यटकों के लिए आधुनिक सुविधाओं के विकास को प्राथमिकता देने पर जोर दिया गया। सरकार का लक्ष्य काशी को राष्ट्रीय ही नहीं, वैश्विक धार्मिक-सांस्कृतिक पर्यटन मानचित्र पर और अधिक सशक्त पहचान दिलाना है। मंडल की 36 परियोजनाओं में वाराणसी की सर्वाधिक 22, जौनपुर की 6, गाजीपुर की 5 और चंदौली की 3 परियोजनाएं शामिल हैं। इनमें धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों के विकास, पर्यटन सुविधाओं के विस्तार और श्रद्धालुओं के लिए बेहतर व्यवस्थाएं सुनिश्चित करने की योजनाएं शामिल हैं। सरकार का मानना है कि इन परियोजनाओं से स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे।

वाराणसी की प्रमुख परियोजनाओं में कैंट क्षेत्र स्थित सती माई मंदिर, प्राचीन रामबाग मंदिर, रोहनिया का प्राचीन शिवधाम मंदिर, पिंडरा का पौहारी बाबा मंदिर, निर्माण दास बाबा कुटी तथा भगवान राम-जानकी महावीर मंदिर का विकास शामिल है। इसके अलावा शिवपुर स्थित सराय मोहनाघाट पर लगभग 15 करोड़ रुपये की लागत से स्थायी घाट निर्माण, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में लगभग 17 करोड़ रुपये की लागत से एक हजार क्षमता वाले ऑडिटोरियम का निर्माण तथा ‘परंपरा केंद्र के विकास जैसी महत्वपूर्ण परियोजनाओं की समीक्षा की गई। शहर के प्रमुख स्थलों पर दिशा-सूचक और सूचना पट्ट लगाने का प्रस्ताव भी रखा गया है। रोहनिया में संत रविदास संग्रहालय (24.63 करोड़ रुपये) और मुंशी प्रेमचंद स्मारक संग्रहालय एवं पुस्तकालय (5.21 करोड़ रुपये) की प्रगति की भी समीक्षा की गई।

गाजीपुर में बूढ़े महादेव मंदिर, हनुमान चौतरा और हथियाराम मठ के सौंदर्यीकरण तथा पर्यटन सुविधाओं के विकास पर चर्चा हुई। चंदौली में विश्वकर्मा मंदिर, दुखहरण महादेव बाबा मंदिर और काली माता मंदिर के विकास प्रस्तावों की समीक्षा की गई। जौनपुर में गोमतेश्वर महादेव धाम, मां वैष्णो देवी धाम और राधा-कृष्ण मंदिर सहित छह प्रमुख धार्मिक स्थलों को पर्यटन की दृष्टि से विकसित करने की योजना प्रस्तुत की गई। संस्कृति विभाग की तीन महत्वपूर्ण परियोजनाओं पर भी विचार हुआ। इनमें वाराणसी उत्तर क्षेत्र स्थित बत्तीस खंभा, बकरियाकुंड, कैंट क्षेत्र का गुरुधाम मंदिर और अजगरा स्थित पंचो शिवाला के संरक्षण एवं जीर्णोद्धार का प्रस्ताव शामिल है। इन परियोजनाओं का उद्देश्य मंडल की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखते हुए उन्हें पर्यटन आकर्षण के रूप में विकसित करना है।

बैठक में निर्माणाधीन परियोजनाओं की भी समीक्षा की गई। गाजीपुर स्थित शहीद वीर अब्दुल हमीद स्मारक के विकास, रोहनिया में लगभग 24.63 करोड़ रुपये की लागत से प्रस्तावित संत रविदास संग्रहालय तथा लगभग 5.21 करोड़ रुपये की लागत वाले मुंशी प्रेमचंद स्मारक संग्रहालय एवं पुस्तकालय की प्रगति पर चर्चा हुई। मुंशी प्रेमचंद संग्रहालय परियोजना वर्तमान में टेंडर प्रक्रिया में है। धर्मार्थ कार्य विभाग की ओर से जौनपुर के बड़े हनुमान मंदिर के विकास, वाराणसी स्थित भिंगराज अनाथालय परिसर में लगभग 24.04 करोड़ रुपये की लागत से नए अनाथालय निर्माण तथा दंडी सेवाश्रम परिसर में लगभग 23.41 करोड़ रुपये की लागत से सेवाश्रम विकास से जुड़े प्रस्ताव प्रस्तुत किए गए। इन योजनाओं के माध्यम से धार्मिक और सामाजिक सरोकारों को पर्यटन विकास से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।

प्रकृति आधारित पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए पिंडरा क्षेत्र की करखियां झील को लगभग 10 करोड़ रुपये की लागत से इको टूरिज्म डेस्टिनेशन के रूप में विकसित करने का प्रस्ताव भी रखा गया। योजना के तहत झील के प्राकृतिक स्वरूप को सुरक्षित रखते हुए पर्यटकों के लिए आकर्षक सुविधाएं विकसित की जाएंगी। पर्यटन मंत्री जयवीर सिंह ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि सभी परियोजनाओं में स्थानीय सांस्कृतिक पहचान और विरासत का संरक्षण सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि एक करोड़ रुपये तक की सभी स्वीकृत निर्माणाधीन परियोजनाएं नवंबर माह तक हर हाल में पूरी की जाएं। अपर मुख्य सचिव अमित अभिजात ने विभागों और कार्यदायी संस्थाओं के बीच बेहतर समन्वय स्थापित कर निर्धारित समयसीमा के भीतर गुणवत्तापूर्ण कार्य सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार सभी मंडलों में पर्यटन, संस्कृति और धर्मार्थ कार्य विभाग की परियोजनाओं की व्यापक समीक्षा कर सतत और विरासत आधारित पर्यटन को नई दिशा देने के लिए प्रतिबद्ध है।

वाराणसी मंडल पर्यटन पैकेज

कुल परियोजनाएं 36

कुल लागत ₹109.20 करोड़

वाराणसी 22 परियोजनाएं

जौनपुर 6

गाजीपुर 5

चंदौली 3

आया सावन झूम के…! जब काशी की सांसों में उतर आया शिव

आया सावन झूम के…! जब काशी की सांसों में उतर आया शिव 

मंदिरों से घाटों तक उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब, कांवड़ियों के जयघोष से गूंजी नगरी

• बिछड़ी महिला श्रद्धालु को मंदिर प्रशासन ने परिजनों से मिलवाया

सुरेश गांधी

वाराणसी। सुबह की पहली बारिश ने जैसे ही काशी की गलियों को भिगोया, शहर ने बिना किसी घोषणा के मान लियासावन आ गया है। भीगे पत्थरों से उठती मिट्टी की गंध, गंगा की सतह पर गिरती बूंदों की लय और मंदिरों से आती घंटियों की ध्वनि ने गुरुवार को काशी को शिवमय कर दिया। श्रावण मास के प्रथम दिवस पर ऐसा लगा मानो पूरी नगरी एक साथ महादेव की ओर चल पड़ी हो।

भोर का पहला उजाला अभी गंगा की सतह पर पूरी तरह फैला भी नहीं था कि दशाश्वमेघ घाट से लेकर बाबा विश्वनाथ गंगा द्वार तक राजेन्द्र प्रसाद घाट से लेकर अस्सी घाट की सीढ़ियों पर घंटियों की आवाज उतरने लगी। दूर कहीं शंख बजा, फिर एक स्वर उठा—“हर-हर महादेव”—और देखते ही देखते वह स्वर लहर बनकर घाट से गलियों तक फैल गया। सावन की पहली सुबह काशी ने जैसे अपनी प्राचीन स्मृतियों का द्वार खोल दिया हो। दशाश्वमेध घाट पर श्रद्धालुओं का जमघट लग गया। कोई गंगा स्नान कर रहा था, कोई कलश में जल भर रहा था, तो कोई सीढ़ियों पर बैठकर शिव चालीसा का पाठ कर रहा था। केसरिया वस्त्र पहने कांवड़िए कतारबद्ध होकर जल भरते दिखाई दिए। उनके कंधों पर सजी कांवड़, हाथों में डमरू और होंठों पर ‘हर-हर महादेव का उद्घोष पूरे घाट को भक्तिरस से भर रहा था। 

अस्सी से दशाश्वमेध तक चलते हुए लगा कि शहर चल नहीं रहा, श्रद्धा बह रही है। गीले पत्थरों पर नंगे पांव उतरते श्रद्धालु, हाथों में कलश लिए महिलाएं, कंधों पर केसरिया कांवड़ उठाए युवक और उनके पीछे-पीछे चलते बुजुर्गहर चेहरा अलग था, पर आंखों में एक ही दिशा थी, बाबा विश्वनाथ की ओर। अस्सी से राजघाट तक गंगा किनारे हर दृश्य आस्था का जीवंत चित्र था। हल्की फुहारों के बीच भी श्रद्धालुओं का उत्साह कम नहीं हुआ। कई परिवार बच्चों और बुजुर्गों के साथ स्नान कर सीधे विश्वनाथ धाम की ओर बढ़ते दिखे। नाविकों का कहना था कि सुबह से ही घाटों पर सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक भीड़ रही। 

श्री काशी विश्वनाथ धाम के बाहर लंबी कतारें सुबह से ही लग गई थीं। बैरिकेडिंग के बीच धीरे-धीरे आगे बढ़ते श्रद्धालुओं के चेहरों पर थकान से अधिक प्रतीक्षा का तेज था। मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही घंटों, शंखों और वैदिक मंत्रों की ध्वनि वातावरण को अलौकिक बना रही थी। शिवलिंग पर जलाभिषेक का क्रम लगातार चलता रहा। बेलपत्र, धतूरा, आक और गंगाजल अर्पित करते श्रद्धालुओं की आंखों में गहरी श्रद्धा झलक रही थी। इसी भीड़ के बीच काशी की संवेदनशीलता का एक मार्मिक दृश्य भी सामने आया। राजस्थान के झुंझुनू जनपद से दर्शन के लिए आई श्रद्धालु श्रीमती संजना गोयल अपने सहयोगी दल से बिछुड़ गईं। भीड़ में अकेली रह गई महिला की सूचना मिलते ही श्री काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास सक्रिय हो गया। मंदिर प्रशासन ने उपलब्ध विवरण के आधार पर उनके सुपुत्र से दूरभाष पर संपर्क स्थापित किया, परिजनों को स्थिति की जानकारी दी और तत्परता से उन्हें सुरक्षित उनके परिवार तक पहुंचाने की व्यवस्था की। भीड़ के बीच यह घटना केवल प्रशासनिक दक्षता नहीं, बल्कि तीर्थ की मानवीय आत्मा का परिचय बन गई।

धाम में सक्रिय हेल्पडेस्क, सूचना केंद्र और खोया-पाया केंद्र लगातार श्रद्धालुओं की सहायता करते रहे। मंदिर न्यास के कर्मियों को कई स्थानों पर बुजुर्गों और महिलाओं को मार्गदर्शन देते देखा गया। श्रावण मास के दौरान 24 घंटे सहायता व्यवस्था बनाए रखने का दावा गुरुवार को जमीन पर दिखाई भी दिया। विश्वनाथ गली में सावन का अलग ही रंग था। फूलों की दुकानों पर भीड़, बेलपत्र के गट्ठर, रुद्राक्ष मालाएं, भस्म और पूजा सामग्री खरीदते श्रद्धालु, गर्म जलेबी और मालपुए की खुशबूहर मोड़ पर उत्सव का विस्तार दिखाई देता था। दुकानदारों के अनुसार सुबह से ही बिक्री में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई।

कांवड़ियों का प्रवाह दोपहर बाद और तेज हो गया। पूर्वांचल और बिहार से आए जत्थे बारिश की बूंदों के बीच भी निर्बाध आगे बढ़ते रहे। कई स्थानों पर स्थानीय लोगों ने शरबत, फल और चिकित्सा सहायता के शिविर लगाए। सड़क किनारे बैठकर पैर धोते कांवड़ियों के चेहरे पर यात्रा की थकान कम और बाबा तक पहुंचने का संतोष अधिक दिखाई देता था। शाम ढलते-ढलते दशाश्वमेध घाट की गंगा आरती ने सावन की पहली तारीख को पूर्णता दी। बादलों से ढका आकाश, गंगा पर तैरती रोशनी और आरती की लौ के बीच हजारों श्रद्धालु मंत्रमुग्ध खड़े रहे। उस क्षण काशी केवल एक शहर नहीं, बल्कि साझा आस्था की धड़कन बन गई थी।

सावन का पहला दिन यह बता गया कि काशी में पर्व कैलेंडर से नहीं उतरते, वे जीवन में उतरते हैं। यहां बारिश भी भक्ति का संकेत बन जाती है, गंगा भी स्मृति बन जाती है और भीड़ भी परिवार का विस्तार। गुरुवार को काशी सचमुच झूम उठीगंगा की लहरों में, कांवड़ियों के कदमों में और महादेव के नाम से धड़कते हर हृदय में। प्रदेश के आयुष, राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. दयाशंकर मिश्र 'दयालु' ने कार्यकर्ताओं के साथ गुरु पूर्णसिद्ध पीठ श्री जागेश्वर महादेव मंदिर, पतालपूरी मठ, औसनगंज में विधि-विधान से दर्शन-पूजन किया और प्रदेश की सुख-समृद्धि की कामना की। इस अवसर पर मंत्री जी के साथ बाबा का दर्शन किया और प्रसाद ग्रहण किया।

Wednesday, 29 July 2026

काशी में गुरु वंदना का महापर्व: मठ, मंदिर और आश्रमों में उमड़ी श्रद्धा

काशी में गुरु वंदना का महापर्व: मठ, मंदिर और आश्रमों में उमड़ी श्रद्धा 

वेदपाठ, चरण पूजन, भंडारे और सत्संग से दिनभर गूंजती रही धर्मनगरी

सुरेश गांधी

वाराणसी. गुरु पूर्णिमा पर बुधवार को काशी की आध्यात्मिक धड़कन अपने चरम पर रही। भोर की पहली आरती के साथ ही मठों, मंदिरों और आश्रमों के कपाट खुले और गुरु वंदना का महापर्व आरंभ हो गया। गंगा तट से लेकर शहर के प्राचीन अखाड़ों तक श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगी रहीं। वेदपाठ, चरण पूजन, भजन-कीर्तन, सत्संग और भंडारों ने पूरी काशी को आध्यात्मिक उत्सव में बदल दिया। सबसे अधिक श्रद्धालु श्री काशी विश्वनाथ धाम, कालभैरव मंदिर, संकटमोचन मंदिर, दुर्गाकुंड, तुलसी मानस मंदिर और अन्नपूर्णा मंदिर में पहुंचे। 

मंदिरों में विशेष श्रृंगार किया गया और गुरु-शिष्य परंपरा पर प्रवचन हुए। संकटमोचन परिसर में सुंदरकांड पाठ और सामूहिक हनुमान चालीसा का आयोजन देर शाम तक चलता रहा। काशी विश्वनाथ मंदिर में भव्य एवं विशेष आरती का आयोजन किया गया। इस अवसर पर बाबा विश्वनाथ का दिव्य श्रृंगार कर उन्हें राजसी पोशाक धारण कराई गई। मंदिर परिसर में देर रात तक दर्शन-पूजन का सिलसिला जारी रहा।

गढ़वाघाट स्थित संतमत पीठ पर गुरु स्वामी सरनानंद जी महाराज के दर्शन हेतु सुबह से ही श्रद्धालुओं का रेला उमड़ पड़ा। पूरा आश्रम क्षेत्र भक्ति, अनुशासन और अध्यात्म से सराबोर रहा। भक्तों ने उनके श्रीचरणों में वंदन कर पादुका पूजन किया। भजनों की मधुर ध्वनि और मंत्रोच्चार से आश्रम गूंज उठा। कबीरचौरा मठ में संत कबीर की वाणी का अखंड पाठ हुआ। सारनाथ स्थित बौद्ध विहारों में भी गुरु पूर्णिमा को धर्मचक्र प्रवर्तन दिवस के रूप में मनाया गया। सीर गोवर्धनपुर स्थित संत रविदास मंदिर में विशेष गुरु पूजन और कीर्तन हुआ। संत रविदास की 650वीं जयंती वर्ष के अवसर पर समरसता संकल्प के साथ श्रद्धालुओं ने सामाजिक सद्भाव का संदेश दिया। मंदिर परिसर में भव्य भंडारे का आयोजन किया गया, जिसमें हजारों लोगों ने प्रसाद ग्रहण किया।

जंगमबाड़ी मठ, निर्वाणी अखाड़ा, निरंजनी अखाड़ा, दशनाम संन्यासी आश्रम, रामानुज एवं वैष्णव मठों में शिष्यों ने अपने गुरुओं का पाद पूजन कर आशीर्वाद लिया। अस्सी, तुलसी और पंचगंगा घाट पर सुबह से ही साधु-संतों की मंडलियां जुटीं। गंगा स्नान के बाद श्रद्धालुओं ने अपने गुरुओं का तिलक कर चरण स्पर्श किया। शाम को दशाश्वमेध घाट की गंगा आरती में गुरु पूर्णिमा की विशेष आरती उतारी गई, जिसमें देशभर से आए श्रद्धालु शामिल हुए।

गुरु पूर्णिमा की इस संध्या पर काशी ने एक बार फिर अपनी सनातन पहचान को जीवंत किया। मंदिरों की घंटियां, वेदों की ऋचाएं, संतों के उपदेश और गंगा की लहरों के बीच धर्मनगरी ने यह संदेश दिया कि गुरु केवल परंपरा नहीं, बल्कि समाज को प्रकाश देने वाली शाश्वत चेतना हैं। “गुरु वह भगवंत प्रसाद हैं, जिन्हें प्राप्त कर जीवन धन्य हो जाता है। गुरु ही जागरण के द्वार खोलते हैं और आचरण को धर्ममय बनाते हैं। ईश्वर तक पहुंचने का पथ गुरु ही दिखाता है। उन्होंने युवाओं से संयम, सेवा और साधना को जीवन का आधार बनाने का आह्वान किया।

मणिकर्णिका घाट स्थित सतुआ बाबा आश्रम में सतुआ बाबा रणछोड़ दास और षष्ठपीठाधीश्वर यमुनाचार्य महाराज की चरण पादुकाओं का विशेष पूजन हुआ। महामंडलेश्वर संतोष दास ने कहा  गुरु जीवन जीने की दिशा देते हैं। शांति, भाईचारा और परिवार में सुख-समृद्धि का मार्ग सनातन धर्म ही सिखाता है। बाबा कीनाराम स्थली क्रींकुंड शिवाला में प्रातः आरती, श्रमदान और अघोरेश्वर की समाधियों का पूजन हुआ, जबकि पड़ाव स्थित अवधूत भगवान राम आश्रम में पीठाधीश्वर गुरु पद संभव राम का विशेष पूजन-अर्चन संपन्न हुआ।

लोककल्याण की कामना संग योगी ने टेका बाबा विश्वनाथ के दर पर माथा

लोककल्याण की कामना संग योगी ने टेका बाबा विश्वनाथ के दर पर माथा 

काल भैरव मंदिर में विधि-विधान से पूजन, श्रद्धालुओं की सुविधा-सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने के निर्देश

सुरेश गांधी

वाराणसी. गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर गोरक्षपीठाधीश्वर एवं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बुधवार को श्री काशी विश्वनाथ धाम और काशी के कोतवाल बाबा काल भैरव मंदिर में दर्शन-पूजन कर प्रदेश और देशवासियों के सुख, समृद्धि तथा लोककल्याण की कामना की। श्रावण मास की पूर्व संध्या पर मुख्यमंत्री का यह काशी प्रवास आध्यात्मिक आस्था और जनकल्याण के संदेश के रूप में देखा गया।

मुख्यमंत्री सबसे पहले बाबा काल भैरव मंदिर पहुंचे, जहां उन्होंने विधि-विधान से पूजा-अर्चना और आरती कर आशीर्वाद प्राप्त किया। मंदिर परिसर में उपस्थित श्रद्धालुओं ने उनका स्वागत किया और मुख्यमंत्री ने हाथ जोड़कर सभी का अभिवादन स्वीकार किया. 

इसके बाद योगी आदित्यनाथ श्री काशी विश्वनाथ धाम पहुंचे। गर्भगृह में उन्होंने षोडशोपचार विधि से बाबा विश्वनाथ का पूजन किया और प्रदेश तथा राष्ट्र की सुख-शांति, समृद्धि एवं लोकमंगल की प्रार्थना की। उनके दर्शन के दौरान धाम परिसर हर-हर महादेव के जयघोष से गूंज उठा और पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया। 

दर्शन-पूजन के बाद मुख्यमंत्री ने मंदिर परिसर में मौजूद अधिकारियों के साथ श्रावण मास की व्यवस्थाओं की समीक्षा की। 

उन्होंने स्पष्ट निर्देश दिए कि सावन में आने वाले लाखों श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो। 

सुगम दर्शन, सुरक्षा, स्वच्छता, पेयजल, चिकित्सा सहायता और भीड़ प्रबंधन की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित करने को कहा गया, ताकि श्रद्धालुओं को सहज एवं व्यवस्थित दर्शन का लाभ मिल सके।

दर्शन के उपरांत मुख्यमंत्री ने मंदिर परिसर में मौजूद बच्चों को चॉकलेट वितरित की और स्नेहपूर्वक दुलार किया। उनके इस आत्मीय व्यवहार से बच्चे और उनके परिजन उत्साहित दिखाई दिए। पूजन-अर्चन के दौरान केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल, राज्यसभा सांसद तरुण चुग तथा प्रदेश के समाज कल्याण राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) असीम अरुण सहित कई जनप्रतिनिधि एवं अधिकारी उपस्थित रहे.

रविदास घाट पर दीपों से जगमगाई काशी, समरसता दीप अभियान का शुभारंभ

रविदास घाट पर दीपों से जगमगाई काशी, समरसता दीप अभियान का शुभारंभ 

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने संत रविदास प्रतिमा पर माल्यार्पण कर किया दीपोत्सव का उद्घाटन

सुरेश गांधी

वाराणसी। संत शिरोमणि गुरु रविदास महाराज के 650वें प्रकाश पर्व वर्ष के अवसर पर मंगलवार की शाम काशी आध्यात्मिक आभा और सामाजिक समरसता के संदेश से आलोकित हो उठी। 

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने श्री काशी विश्वनाथ मंदिर और कालभैरव मंदिर में दर्शन-पूजन कर प्रदेश की सुख-समृद्धि की कामना की। इसके बाद उन्होंने नगवां स्थित रविदास पार्क पहुंचकर संत रविदास की प्रतिमा पर माल्यार्पण एवं पुष्पांजलि अर्पित की। 

मुख्यमंत्री ने संत रविदास के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए उनके समता, श्रमसम्मान और मानवता के संदेश को आज के समाज के लिए अत्यंत प्रासंगिक बताया। उन्होंने कहा कि संत रविदास की वाणी समाज को भेदभाव से ऊपर उठकर मानवता के पथ पर चलने की प्रेरणा देती है। इसके पश्चात मुख्यमंत्री रविदास घाट पहुंचे, जहां उन्होंने दीप प्रज्ज्वलित कर 'गुरु रविदास महाराज समरसता दीप अभियान' का शुभारंभ किया। मुख्यमंत्री के दीप प्रज्ज्वलन के साथ ही गंगा तट पर हजारों दीप एक साथ जल उठे और पूरा रविदास घाट स्वर्णिम प्रकाश से जगमगा उठा। गंगा की लहरों पर झिलमिलाते दीपों का दृश्य श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत आकर्षण का केंद्र रहा।

समरसता दीप अभियान के अंतर्गत घाट पर उपस्थित संत-महात्माओं, सामाजिक संगठनों, युवाओं और महिलाओं ने दीप जलाकर सामाजिक सद्भाव और समानता का संकल्प लिया। कार्यक्रम स्थल पर संत रविदास के पदों का गायन, भजन और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां भी हुईं, जिससे वातावरण पूरी तरह भक्तिमय बना रहा। मुख्यमंत्री ने कहा कि संत रविदास ने जिस ऐसे समाज की कल्पना की थी जहां सबको सम्मान, अवसर और अन्न मिले, उसी आदर्श को आत्मसात कर समरस भारत के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ना होगा। उन्होंने युवाओं से संतों की शिक्षाओं को जन-जन तक पहुंचाने का आह्वान किया।

रविदास घाट पर आयोजित दीपोत्सव को लेकर प्रशासन ने व्यापक व्यवस्था की थी। घाट परिसर को आकर्षक प्रकाश सज्जा से सजाया गया था तथा सुरक्षा, यातायात और श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए विशेष प्रबंध किए गए थे। बड़ी संख्या में श्रद्धालु, संत समाज और स्थानीय नागरिक कार्यक्रम में शामिल हुए। काशी में आयोजित यह दीपोत्सव केवल धार्मिक आयोजन नहीं रहा, बल्कि संत रविदास के समरस समाज के संदेश को जनमानस तक पहुंचाने का सशक्त सांस्कृतिक अभियान बनकर उभरा। गंगा तट पर जलते दीपों ने मानो यह संदेश दिया कि संत परंपरा की ज्योति आज भी समाज को एकता, समानता और सद्भाव की दिशा दिखा रही है। 

काली घटा, मीठी कजरी और झूमता सावन

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