Thursday, 29 October 2026

बारिश में छिपा चांद, चंद्रदर्शन के बिना बीती करवा चौथ की रात

बारिश में छिपा चांद, चंद्रदर्शन के बिना बीती करवा चौथ की रात

दिनभर निर्जला व्रत, शाम को सोलह शृंगार और चंद्रदर्शन की आस में टिकी रहीं निगाहें

• बादलों और बारिश ने सुहागिनों के इंतजार को बनाया लंबा

• पति की दीर्घायु की कामना के बीच मौसम ने परंपरा के निर्वाह में डाली बाधा

सुरेश गांधी

वाराणसी। चांद की चांदनी में पति के चेहरे को निहारकर व्रत खोलने की आस... कहीं हाथों में रची मेहंदी, कहीं सोलह शृंगार से दमकता रूप, माथे पर सजा सिंदूर और आंखों में अखंड सौभाग्य की कामना के साथ ही पूजा की थाली सजाए चांद के निकलने की प्रतीक्षा। दिनभर पति की लंबी उम्र की कामना में निर्जला व्रत रखने वाली सुहागिनों की उम्मीदों पर गुरुवार की रात मौसम की बेरुखी भारी पड़ी। आसमान में घने बादलों का पहरा रहा और बारिश थमने का नाम नहीं ले रही थी। चंद्रोदय का निर्धारित समय बीतता गया, लेकिन चांद बादलों की ओट से बाहर नहीं आया। देखते-देखते चांदनी रात का इंतजार बेचैनी में बदल गया। इस तरह कई महिलाओं के लिए करवा चौथ की रात चंद्रदर्शन की आस में बीत गई। 

आस्था, प्रेम और समर्पण के प्रतीक करवा चौथ पर महिलाओं ने पूरे विधि-विधान से व्रत रखा। सुबह सरगी के साथ शुरू हुआ निर्जला उपवास दिनभर पूजा-पाठ, साज-शृंगार और पारंपरिक रस्मों के साथ आगे बढ़ा। शाम को घरों में करवा माता की पूजा हुई। सुहागिनों ने कथा सुनी और पति की दीर्घायु, अच्छे स्वास्थ्य तथा सुखी दांपत्य जीवन की कामना की। पूजा की थालियां सजीं तो मन में एक ही अभिलाषा थी—चांद निकलेगा, अर्घ्य दिया जाएगा और फिर पति के हाथों जल ग्रहण कर व्रत पूरा होगा। लेकिन मौसम ने इस प्रतीक्षा को असाधारण रूप से लंबा कर दिया।

चांद का समय आया, मगर बादलों का पहरा नहीं हटा

करवा चौथ पर चंद्रमा के दर्शन का विशेष धार्मिक महत्व है। परंपरा के अनुसार, सुहागिनें चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद पति का चेहरा देखकर व्रत खोलती हैं। मगर इस बार आसमान में छाए बादलों और लगातार होती बारिश ने इस परंपरा के निर्वाह को मुश्किल बना दिया। चंद्रमा के उदय का समय होने के बावजूद उसके दर्शन नहीं हो सके। महिलाओं की निगाहें कभी छत से आसमान की ओर उठतीं तो कभी बारिश की बूंदों के बीच बादलों के छंटने का इंतजार करतीं। हर गुजरते पल के साथ उम्मीद बनी रही कि शायद मौसम करवट ले और चांद की एक झलक मिल जाए।

सोलह शृंगार पर मौसम की बेरुखी भारी

करवा चौथ की तैयारियां कई दिन पहले से शुरू हो जाती हैं। बाजारों में खरीदारी, मेहंदी, चूड़ियों और पारंपरिक परिधानों की रौनक के बीच इस पर्व का उत्साह देखते ही बनता है। महिलाओं ने भी पूरे मनोयोग से व्रत की तैयारी की थी। किसी ने लाल जोड़ा पहना तो किसी ने पारंपरिक परिधान में सोलह शृंगार किया। पूजा की थाली में दीप, करवा, अक्षत और मिठाइयां सजाईं। दिनभर भूखे-प्यासे रहकर शाम तक पहुंचीं महिलाओं को उम्मीद थी कि रात चांदनी के साथ उनके व्रत का पारंपरिक समापन होगा। मगर बारिश ने उत्सव की रंगत में खलल डाल दिया।

आस्था कायम, इंतजार में गुजरी रात

करवा चौथ की खूबसूरती केवल चांद देखने और व्रत खोलने की रस्म में नहीं, बल्कि पति-पत्नी के बीच प्रेम, विश्वास और समर्पण की भावना में भी निहित है। यही वजह रही कि मौसम की प्रतिकूलता के बावजूद पर्व के प्रति उत्साह बना रहा। चंद्रदर्शन नहीं होने से व्रत खोलने की विधि को लेकर महिलाओं के सामने असमंजस की स्थिति भी बनी। ऐसी परिस्थितियों में धार्मिक परंपराओं और पारिवारिक मान्यताओं के अनुसार अलग-अलग तरीके अपनाए जाते हैं। बारिश ने चांदनी रात की रौनक भले ही छीन ली, लेकिन सुहागिनों की आस्था को नहीं डिगा सकी। बादलों से ढके आसमान के नीचे चंद्रमा की प्रतीक्षा इस बार करवा चौथ की सबसे मार्मिक तस्वीर बनकर उभरी। चांद भले ही नजर नहीं आया, लेकिन जीवनसाथी की लंबी उम्र और सुखी दांपत्य की कामना हर प्रार्थना में बनी रही।

काशी में सपा की हैट्रिक, भाजपा के लिए आत्ममंथन की घड़ी! बड़ी फौज, यह हश्र कैसे!

सपा के आशुतोष सिन्हा ने एक बार फिर भाजपा के केदारनाथ सिंह को 19,932 मतों से दी पटकनी 

काशी में सपा की हैट्रिक, भाजपा के लिए आत्ममंथन की घड़ी! बड़ी फौज, यह हश्र कैसे! 

काशी की दोनों एमएलसी सीटों पर सपा की जीत के बाद भाजपा के सामने आत्ममंथन की चुनौती

छह साल में 78,799 मतदाता बढ़े, फिर भी आशुतोष सिन्हा की जीत का अंतर 3,650 से बढ़कर 19,932 पहुंचा

मतदाता पंजीकरण से बूथ प्रबंधन तक रणनीति की परीक्षा; संगठन की ताकत, कार्यकर्ताओं की सक्रियता और नेतृत्व तक पहुंचती जमीनी हकीकत पर उठ रहे सवाल

अति आत्मविश्वास, चापलूसी और सत्ता से लाभ उठाने की प्रवृत्ति के आरोपों के बीच निष्ठावान कार्यकर्ताओं की उपेक्षा की चर्चा; मतदाता पंजीकरण से बूथ प्रबंधन तक चुनावी रणनीति की समीक्षा जरूरी

सुरेश गांधी

वाराणसी. काशी की सियासत में विधान परिषद चुनाव के नतीजों ने एक बार फिर संगठन और जनाधार के रिश्ते पर बहस छेड़ दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सक्रियता और विकास परियोजनाओं के व्यापक प्रचार के बीच समाजवादी पार्टी ने शिक्षक और स्नातक, दोनों एमएलसी सीटों पर अपनी पकड़ बरकरार रखी। वैसे भी चुनावी राजनीति में हार केवल आंकड़ों का खेल नहीं होती। कई बार नतीजे उन सवालों को भी सामने ले आते हैं, जिन्हें जीत के शोर में सुनना कठिन होता है। वाराणसी की स्नातक विधान परिषद सीट पर सपा के आशुतोष सिन्हा की लगातार तीसरी जीत और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में लाल बिहारी यादव की सफलता ने भाजपा के सामने ऐसा ही सवाल खड़ा किया है। सवाल सिर्फ दो सीटें गंवाने का नहीं, बल्कि उस संगठनात्मक ताकत के चुनावी नतीजों में अपेक्षित रूप से दिखाई न देने का है, जिसके पास देशव्यापी ढांचा, कार्यकर्ताओं की बड़ी संख्या और चुनाव प्रबंधन का लंबा अनुभव है।

नतीजों के बाद राजनीतिक गलियारों में एक चुटकी खूब सुनाई दे रही है—जिस संगठन की इतनी बड़ी फौज है, उसका यह हश्र कैसे हो गया? यह तंज अपने आप में चुनावी विश्लेषण नहीं है, लेकिन इसके पीछे छिपे सवाल को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। आखिर ऐसा क्या हुआ कि संगठन की व्यापकता मतपेटी तक उसी अनुपात में नहीं पहुंच सकी? क्या मतदाता पंजीकरण की रणनीति में कमी रह गई, क्या बूथों तक पहुंच कमजोर पड़ी या फिर संगठन के भीतर संवाद और समन्वय की कोई ऐसी दरार थी, जिसका अंदाजा चुनावी नतीजों से पहले नहीं लग पाया? काशी के परिणामों ने इन सवालों को और धार दे दी है। यह परिणाम केवल एक सीट की हार-जीत नहीं है। इसके भीतर मतदाता पंजीकरण, संगठन की सक्रियता, कार्यकर्ताओं की भूमिका, स्थानीय नेतृत्व से संवाद और चुनावी प्रबंधन जैसे कई सवाल छिपे हैं। भाजपा के लिए चुनौती इस नतीजे को महज स्थानीय चुनाव की सीमाओं में समेट देने की नहीं, बल्कि उन कारणों की पड़ताल करने की है, जिनसे चुनावी मुकाबले में उसका अपेक्षित प्रदर्शन नहीं हो सका।

छह साल में बढ़े मतदाता, बढ़ गया हार का अंतर

स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के आंकड़े इस समीक्षा का सबसे महत्वपूर्ण आधार हैं। वर्ष 2020 में इस सीट पर आशुतोष सिन्हा ने भाजपा के केदारनाथ सिंह को 3,650 मतों से हराया था। वर्ष 2026 में सिन्हा की जीत का अंतर बढ़कर 19,932 मतों तक पहुंच गया। अंतिम परिणाम के अनुसार सिन्हा को 55,046 और भाजपा के केदार सिंह को 35,114 मत मिले। इस बीच निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या भी उल्लेखनीय रूप से बढ़ी। वर्ष 2020 में जहां 2,09,754 मतदाता पंजीकृत थे, वहीं 2026 में यह संख्या बढ़कर 2,88,553 हो गई। यानी लगभग छह वर्षों में 78,799 मतदाता बढ़े। मतदान भी 82,498 से बढ़कर 1,18,611 तक पहुंचा। मतदान प्रतिशत 39.33 से बढ़कर 41.11 प्रतिशत हुआ। इन आंकड़ों को साथ रखकर देखें तो तस्वीर कई सवाल खड़े करती है। मतदाताओं की संख्या बढ़ी, मतदान करने वालों की संख्या भी बढ़ी, लेकिन भाजपा जीत की ओर नहीं बढ़ सकी। इसके उलट सपा की जीत का अंतर 16,282 मतों से और बढ़ गया। हालांकि, नए मतदाताओं में किस दल के समर्थकों की संख्या कितनी थी, इसका प्रमाणित आंकड़ा उपलब्ध हुए बिना यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि बढ़े हुए मतदाताओं ने ही भाजपा की हार तय की। मगर इतना जरूर है कि मतदाता आधार के विस्तार के साथ भाजपा की चुनावी चुनौती भी कम नहीं हुई। यही वह बिंदु है, जहां मतदाता पंजीकरण अभियान की प्रभावशीलता और संगठन की चुनावी तैयारी की समीक्षा जरूरी हो जाती है।

पंजीकरण का दावा, जमीन पर कितनी सक्रियता?

चुनाव से पहले मतदाता सूची में नाम जुड़वाने को लेकर राजनीतिक दलों के बीच सक्रियता दिखाई दी। भाजपा जैसे कैडर आधारित संगठन से अपेक्षा स्वाभाविक थी कि उसका बूथ नेटवर्क इस काम में निर्णायक भूमिका निभाएगा। लेकिन चुनावी नतीजों के बाद अब सवाल उठ रहा है कि अभियान की चर्चा और वास्तविक भागीदारी के बीच कहीं अंतर तो नहीं रह गया था? राजनीति में केवल अभियान चलाने की घोषणा पर्याप्त नहीं होती। असली परीक्षा यह है कि कितने संभावित मतदाताओं तक कार्यकर्ता पहुंचे, कितने पात्र लोगों का पंजीकरण पूरा हुआ और मतदान के दिन कितने मतदाता केंद्र तक आए। मतदाता सूची में नाम जुड़वाने के बाद भी मतदाता को मतदान के लिए प्रेरित करना अलग जिम्मेदारी है। पंजीकरण, संपर्क और मतदान—इन तीनों कड़ियों में से कोई कमजोर हो तो संगठनात्मक प्रयास का चुनावी लाभ सीमित रह जाता है। काशी के नतीजों के बाद यही पड़ताल जरूरी है कि भाजपा का अभियान कितनी दूर तक पहुंचा और क्या उसकी समीक्षा समय रहते हुई। किसी एक पदाधिकारी या कार्यकर्ता को जिम्मेदार ठहराने के बजाय पूरे अभियान के आंकड़ों, क्षेत्रवार प्रदर्शन और बूथवार मतदान की जांच अधिक उपयोगी होगी।

संगठन के भीतर की आवाज, नेतृत्व के लिए संकेत

चुनाव के बाद संगठन से जुड़े विभिन्न स्तरों पर हो रही चर्चाओं में भी आत्ममंथन की मांग सुनाई दे रही है। नाम सार्वजनिक न करने की शर्त पर बातचीत करने वाले कुछ संगठनात्मक सूत्रों के अनुसार, चिंता केवल परिणाम को लेकर नहीं, बल्कि उस कार्यशैली को लेकर भी है, जिसमें जमीन पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं की बात नेतृत्व तक किस रूप में पहुंचती है। इन चर्चाओं में एक सवाल बार-बार उभरता है—क्या संगठन के भीतर वास्तविक काम और नेतृत्व से निकटता को एक ही तराजू पर तौला जा रहा है? क्या जमीनी मेहनत करने वाले कार्यकर्ताओं की प्रतिक्रिया को उतना महत्व मिल रहा है, जितना औपचारिक बैठकों और सार्वजनिक कार्यक्रमों में दिखाई देने वाली सक्रियता को? और क्या चुनाव से पहले उठने वाले असहज सवालों पर गंभीरता से विचार होता है? यह किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध आरोप नहीं, बल्कि संगठनात्मक समीक्षा के बिंदु हैं। इन चर्चाओं की व्यापकता या हर दावे की पुष्टि अलग-अलग तथ्यों से ही हो सकती है। फिर भी, जब संगठन के भीतर से ही निष्पक्ष समीक्षा की मांग सामने आती है, तो उसे केवल चुनाव बाद की निराशा कहकर खारिज करना उचित नहीं होगा। भाजपा के सामने चुनौती यह भी है कि वह आत्मविश्वास और अति-आत्मविश्वास के बीच की सीमा पहचाने। किसी दल के पास बड़ी संख्या में पदाधिकारी और कार्यकर्ता हों, तो यह उसकी ताकत है; लेकिन संख्या अपने आप में चुनावी सफलता की गारंटी नहीं। संगठन की वास्तविक शक्ति तब सामने आती है, जब कार्यकर्ता सक्रिय हों, मतदाता से संवाद बना रहे और नेतृत्व तक जमीन की सही तस्वीर पहुंचे।

बड़ी फौज का मतलब हर मोर्चे पर जीत नहीं

भाजपा की संगठनात्मक क्षमता पर देशभर में चर्चा होती रही है। बूथ स्तर तक संरचना, चुनावी प्रबंधन और कार्यकर्ताओं की सक्रियता उसकी पहचान का हिस्सा रहे हैं। ऐसे में काशी जैसे राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र में मिली हार स्वाभाविक रूप से अधिक सवाल पैदा करती है। लेकिन किसी भी चुनाव में संगठन की ताकत का आकलन केवल पदाधिकारियों की संख्या, बैठकों की भीड़ या प्रचार के विस्तार से नहीं किया जा सकता। निर्णायक बात यह है कि मतदाता के मन में क्या है और पार्टी उसके साथ कितना प्रभावी संवाद बना पा रही है। बड़ी फौज होने के बावजूद यदि मतदाता तक संदेश नहीं पहुंचता, स्थानीय असंतोष का समय रहते समाधान नहीं होता या चुनावी रणनीति कागज से जमीन पर उतरने में कमजोर पड़ती है, तो संख्या का लाभ सीमित हो जाता है। यही वजह है कि राजनीतिक गलियारों में उठ रही चुटकी को केवल विरोधियों का मजाक मानकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं होगा। भाजपा के लिए जरूरी है कि वह इस सवाल का जवाब अपने आंकड़ों और संगठनात्मक समीक्षा से दे।

प्रदेश का परिणाम भी कम महत्वपूर्ण नहीं

उत्तर प्रदेश की 11 विधान परिषद सीटों के चुनावी नतीजों में भाजपा को छह और समाजवादी पार्टी को पांच सीटें मिलने का परिणाम भी राजनीतिक संकेत देता है। काशी में दोनों संबंधित सीटों पर सपा की सफलता इस व्यापक तस्वीर का महत्वपूर्ण हिस्सा है। स्नातक सीट पर आशुतोष सिन्हा की हैट्रिक ने सपा को लगातार तीसरी बार अपना प्रभाव साबित करने का अवसर दिया, जबकि शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में लाल बिहारी यादव की जीत ने इस बढ़त को और अहम बना दिया। यह परिणाम अपने आप में विधानसभा चुनाव का पूर्वानुमान नहीं है। विधान परिषद के स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों का मतदाता वर्ग, चुनावी मुद्दे और स्थानीय समीकरण विधानसभा चुनावों से अलग होते हैं। फिर भी, ऐसे चुनाव संगठन की सक्रियता, संपर्क व्यवस्था और स्थानीय नेतृत्व की स्वीकार्यता को परखने का अवसर देते हैं। इसलिए 2027 की तैयारी कर रही भाजपा के लिए इन नतीजों में छिपे संकेतों को समझना जरूरी है।

हार का ठीकरा नहीं, कमियों की पहचान जरूरी

काशी की हार के बाद सबसे आसान रास्ता किसी एक चेहरे, पदाधिकारी या कार्यकर्ता पर जिम्मेदारी डाल देना होगा। लेकिन इससे समस्या का वास्तविक कारण सामने नहीं आएगा। जरूरत इस बात की है कि मतदाता पंजीकरण से लेकर मतदान केंद्र तक की पूरी प्रक्रिया की समीक्षा हो। किन क्षेत्रों में अपेक्षित प्रदर्शन नहीं हुआ, कहां मतदाता संपर्क कमजोर रहा, किस स्तर पर समन्वय में कमी आई और कार्यकर्ताओं से मिली प्रतिक्रियाओं पर कितना ध्यान दिया गया—इन सवालों के तथ्यपरक उत्तर तलाशे जाएं। संगठन की बड़ी फौज तभी प्रभावी होती है, जब उसके हर हिस्से को अपनी भूमिका का भरोसा हो और उसकी आवाज सुनी जाए। यदि कार्यकर्ता को लगे कि उसकी मेहनत का आकलन नहीं हो रहा या जमीनी हकीकत ऊपर तक नहीं पहुंच रही, तो संगठनात्मक ढांचे की मजबूती भी अपेक्षित परिणाम देने में पीछे रह सकती है। यह किसी दल तक सीमित सिद्धांत नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक राजनीति की बुनियादी सच्चाई है। काशी का चुनावी संदेश साफ है—संगठन की ताकत का प्रमाण उसकी संख्या नहीं, मतदाता के बीच उसकी विश्वसनीयता है। भाजपा चाहे तो इन नतीजों को दो सीटों की हार मानकर आगे बढ़ सकती है, लेकिन यदि वह इन्हें समय रहते मिले संकेत के रूप में पढ़ती है, तो समीक्षा की यही प्रक्रिया आगे की रणनीति को अधिक प्रभावी बना सकती है। आखिरकार सवाल यह नहीं कि भाजपा के पास कितनी बड़ी फौज है। असली सवाल यह है कि वह फौज मतदाता के बीच कितनी सक्रिय है, उसकी आवाज नेतृत्व तक कितनी ईमानदारी से पहुंचती है और चुनाव के दिन उसका प्रयास नतीजों में कितना दिखाई देता है। काशी ने यह सवाल सामने रख दिया है। अब जवाब संगठन को अपने काम, संवाद और आगामी चुनावी तैयारी से देना है।

उत्तर प्रदेश एमएलसी चुनाव 2026—किसे कितनी सीटें?

29 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित परिणामों के अनुसार, उत्तर प्रदेश की 11 शिक्षक-स्नातक विधान परिषद सीटों में भाजपा ने छह और समाजवादी पार्टी ने पांच सीटें जीतीं। सपा ने वाराणसी की शिक्षक और स्नातक, दोनों सीटों पर अपना कब्जा बरकरार रखा।  

निर्वाचन क्षेत्र                         विजेता               दल

मेरठ स्नातक                         दिनेश कुमार गोयल            भाजपा

मेरठ शिक्षक                   श्रीचंद शर्मा                     भाजपा

आगरा स्नातक                      डॉ. मानवेंद्र प्रताप सिंह       भाजपा

आगरा शिक्षक                      डॉ. आकाश अग्रवाल          सपा

इलाहाबाद स्नातक               डॉ. मान सिंह यादव             सपा

लखनऊ शिक्षक                  उमेश द्विवेदी                         भाजपा

लखनऊ स्नातक                   कांति सिंह                             सपा

वाराणसी शिक्षक                 लाल बिहारी यादव               सपा

वाराणसी स्नातक                  आशुतोष सिन्हा                    सपा

बरेली शिक्षक                       डॉ. हरि सिंह ढिल्लों             भाजपा

गोरखपुर शिक्षक             ध्रुव कुमार त्रिपाठी               भाजपा

कुल सीटें : 11 | भाजपा : 6 | सपा : 5  

काशी की दोनों सीटों का परिणाम

वाराणसी शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र

विजेता : लाल बिहारी यादव (सपा)

प्राप्त मत : 11,612

निकटतम प्रतिद्वंद्वी : डॉ. प्रमोद मिश्रा (भाजपा)

प्राप्त मत : 6,597

जीत का अंतर : 5,015 मत

वाराणसी स्नातक निर्वाचन क्षेत्र

विजेता : आशुतोष सिन्हा (सपा)

निकटतम प्रतिद्वंद्वी : केदारनाथ सिंह (भाजपा)

आशुतोष सिन्हा को 55,046 और केदारनाथ सिंह को 35,114 मत मिले थे; जीत का अंतर : 19,932 मत  

बारिश में छिपा चांद, चंद्रदर्शन के बिना बीती करवा चौथ की रात

बारिश में छिपा चांद , चंद्रदर्शन के बिना बीती करवा चौथ की रात दिनभर निर्जला व्रत , शाम को सोलह शृंगार और चंद्रदर्शन की ...