आ गए… मेरी मौत का तमाशा देखने?
नहीं नाना, आपकी मौत का तमाशा देखने नहीं… पूरी जिंदगी को सलाम करने आया है देश
जी
हां, मुंबई ने सितारा बनाया,
रंगमंच
ने
अभिनेता
गढ़ा
और
गांव
ने
उन्हें
कभी
स्टार
नहीं
बनने
दिया—परदे
पर
‘मौत
का
तमाशा’
देखने
वालों
को
ललकारने
वाला
नटसम्राट
अब
खामोश
हो गया है. नाना पाटेकर से काशी में श्री काशी विश्वनाथ मंदिर की आध्यात्मिक आभा के बीच उनसे आत्मीय संवाद का वह अवसर आज भी स्मृतियों में उतना ही जीवंत है। नाना उन दिनों
काशी में फिल्म की शूटिंग के सिलसिले में थे। अभिनय की दुनिया का यह सख्त, बेबाक और
भीतर तक उतर जाने वाला चेहरा जब सामने था, तो बातचीत महज औपचारिक मुलाकात तक कैसे सीमित
रहती? बात निकली तो फिल्मों से लेकर जिंदगी तक जा पहुंची। उनके संवादों की चर्चा हुई
और फिर वही आवाज सामने थी, जिसे पर्दे पर सुनकर दर्शक ठिठक जाते हैं—
“आ
गए मेरी मौत का तमाशा देखने…” और फिर उनका वह बेहद चर्चित
संवाद—
“एक
मच्छर इंसान को हिजड़ा बना देता है…”
ये सिर्फ संवाद नहीं थे। नाना की आवाज में वे जिंदगी की कड़वी सच्चाइयों, व्यवस्था
पर व्यंग्य और आदमी के भीतर छिपे संघर्ष की गूंज बन जाते थे। उनसे बातचीत में महसूस
हुआ कि पर्दे का नाना और सामने बैठा नाना—दोनों
अलग होकर भी कहीं एक ही जगह मिलते हैं। अभिनय उनके लिए केवल संवाद बोलना नहीं, बल्कि
शब्दों के पीछे छिपी संवेदना को जीना था. नाना पाटेकर का
असली
नाम
विश्वनाथ
पाटेकर
था.
वह
हिंदी
और
मराठी
सिनेमा
के
सम्मानित
अभिनेताओं
में
शामिल
थे.
उन्होंने
1978 में
फिल्म
‘गमन’
से
अपने
फिल्मी
करियर
की
शुरुआत
की
थी.
इसके
बाद
उन्होंने
‘परिंदा’,
‘क्रांतिवीर’,
‘अग्नि
साक्षी’,
‘खामोशी:
द
म्यूजिकल’,
‘अब
तक
छप्पन’
और
‘नटसम्राट’
जैसी
फिल्मों
में
यादगार
अभिनय
किया.
उन्हें
तीन
नेशनल
फिल्म
अवॉर्ड
मिले
थे
और
2013 में
पद्मश्री
से
सम्मानित
किया
गया
था
सुरेश गांधी
नाना पाटेकर का
जन्म विश्वनाथ पाटेकर के रूप में
महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले
के मुरुड-जंजीरा में हुआ। जन्म
भले 1951 में हुआ, लेकिन
उनके व्यक्तित्व की पहली पाठशाला
कोई फिल्म संस्थान नहीं, गांव और संघर्ष
था। बचपन में ही
रंगमंच से जुड़ गए।
तीसरी कक्षा में गांव के
नाटकों में हिस्सा लेने
लगे थे। परिवार की
आर्थिक परिस्थितियां आसान नहीं थीं।
बाद में मुंबई आए,
सर जे.जे. स्कूल
ऑफ आर्ट्स में पढ़ाई की
और विज्ञापन एजेंसी में काम किया।
यहीं से उनकी यात्रा
शुरू हुई— मुरुड → मुंबई
→ रंगमंच → सिनेमा → राष्ट्रीय पहचान → फिर गांव। यह
यात्रा बाकी फिल्मी सितारों
से अलग थी। मुंबई ने
उन्हें चमक दी, लेकिन
उन्होंने अपनी चमक को
अपने ऊपर हावी नहीं
होने दिया। नाना की अभिनय-शैली
किसी अभिनय स्कूल की चमकदार तकनीक
से नहीं बनी थी।
उसमें गांव का अनुभव
था, भूख थी, संघर्ष
था, अपमान था और जीवन
को बहुत करीब से
देखने की बेचैनी थी।
मराठी रंगमंच से निकले इस
कलाकार ने जब कैमरे
के सामने खड़ा होना शुरू
किया तो वह कैमरे
को देखकर अभिनय नहीं करता था।
कैमरा उसके सामने होता
था, लेकिन नाना किरदार के
भीतर होते थे।
नाना पाटेकर की
अभिनय-यात्रा में ‘क्रांतिवीर’ सिर्फ
एक फिल्म नहीं, एक पड़ाव है।
फिल्म के चरम दृश्य
में उनका लंबा भाषण
आज भी याद किया
जाता है। खास बात
यह कि वह दृश्य
पूरी तरह लिखे हुए
संवाद की तरह नहीं
था। नाना ने उसे
अपने भीतर से निकाला
और पर्दे पर वह दृश्य
इतिहास बन गया। बाद
में उन्होंने खुद कहा था
कि उन्हें उस समय बोले
गए सारे शब्द याद
भी नहीं थे। यही
नाना थे। संवाद उनके
पास आते नहीं थे,
जैसे भीतर से फूट
पड़ते थे। इसीलिए उनका
अभिनय कई बार अभिनय
की सीमा पार कर
जाता था।
मुंबई उनकी कर्मभूमि थी,
लेकिन उनकी कला की
कोई एक भौगोलिक सीमा
नहीं थी। दिल्ली के
रंगमंच और सिनेमा जगत
में उनकी चर्चा उतनी
ही तीखी रही जितनी
मुंबई में। देश के
अलग-अलग शहरों में
फिल्म और रंगमंच की
यात्राओं ने उन्हें उस
भारत से जोड़े रखा
जिसे चमकदार स्टूडियो अक्सर पर्दे के बाहर छोड़
देते हैं। और फिर
आया काशी का अध्याय।
काशी में नाना—एक अभिनेता नहीं, बनारस को महसूस करता आदमी
नाना पाटेकर का
वाराणसी से रिश्ता नया
नहीं था। करीब ढाई
दशक पहले, वर्ष 2000 में फिल्म ‘आंच’
की शूटिंग के सिलसिले में
वह वाराणसी आए थे। चौबेपुर
के छितौनी गांव में शूटिंग
हुई थी। फिर वर्षों
बाद वह काशी लौटे।
2023 में अनिल शर्मा की
फिल्म ‘जर्नी’ की शूटिंग ने
नाना को फिर बनारस
की गलियों, घाटों और सुबह-ए-बनारस के बीच ला
खड़ा किया। अस्सी घाट पर डमरू-मजीरे की धुन, भजन
मंडली, गंगा किनारा और
कैमरे के सामने नाना—काशी ने उन्हें
फिर अपनी लय में
समेट लिया। फिल्म की शूटिंग शहर
के करीब 22 स्थानों पर हुई और
लगभग 500 स्थानीय कलाकार भी इससे जुड़े।
तब नाना ने कहा
था कि वह 35 साल
बाद बनारस को देखने के
लिए उत्साहित हैं और शूटिंग
खत्म होते ही सबसे
पहले बनारस घूमना चाहते हैं। यही बात
आज उनकी स्मृति में
सबसे ज्यादा चुभती है। जिस बनारस
को शूटिंग के बाद घूमने
की बात उन्होंने कही
थी, वह यात्रा अधूरी
रह गई।
काशी में कई मुलाकातें… पत्रकार के कैमरे से परे एक नाना
काशी में उनकी
शूटिंग के दौरान उनसे
कई बार मुलाकात हुई।
सामने वही चेहरा था
जिसे करोड़ों भारतीयों ने पर्दे पर
देखा था, लेकिन कैमरे
के बाहर नाना का
अपना अलग संसार था।
न स्टारडम का अनावश्यक प्रदर्शन,
न कृत्रिम मुस्कान। वह बातचीत में
भी नाना ही थे—सीधे, सहज, कभी तीखे
और कभी बेहद आत्मीय।
एक पत्रकार के रूप में
उनसे हुई वे मुलाकातें
आज स्मृति की ऐसी तस्वीरें
हैं, जिनकी कीमत किसी फोटो
या खबर से कहीं
अधिक है। काशी में
उनका होना सिर्फ किसी
फिल्म की शूटिंग नहीं
था। वह उन दिनों
शहर के लोगों के
बीच एक ऐसा चेहरा
बन गए थे, जिसे
देखकर लोग पर्दे के
नाना और सामने खड़े
इंसान के बीच का
फर्क भूल जाते थे।
‘मौत का तमाशा’ देखने वालों को ललकारने वाला कलाकार
नाना के निधन
की खबर के बाद
‘क्रांतिवीर’ का वही दृश्य
फिर याद आ रहा
है— “आ गए मेरी
मौत का तमाशा देखने…”
एक अभिनेता के संवाद की
इससे बड़ी विडंबना क्या
होगी कि उसकी मृत्यु
के दिन वही संवाद
फिर देश की स्मृति
में लौट आए। नाना
की कला में मृत्यु
भी सिर्फ मृत्यु नहीं थी। वह
जीवन से सवाल करती
थी। ‘नटसम्राट’ में टूटता कलाकार
हो या ‘क्रांतिवीर’ का
विद्रोही, ‘परिंदा’ का अंधेरा हो
या ‘खामोशी’ की संवेदना—नाना
ने हर बार जीवन
के उस हिस्से को
छुआ, जिसे आम आदमी
महसूस तो करता है,
लेकिन शब्द नहीं दे
पाता।
स्टारडम से खेत तक लौट आया नाना
नाना की कहानी
का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा
शायद फिल्में नहीं, फिल्मों के बाद की
जिंदगी है। जिस आदमी
ने करोड़ों रुपये कमाने वाले उद्योग में
दशकों बिताए, वह धीरे-धीरे
गांव और खेत की
तरफ लौट गया। महाराष्ट्र
के ग्रामीण जीवन और किसानों
की पीड़ा से उनका जुड़ाव
महज दिखावा नहीं था। 2015 में
उन्होंने मकरंद अनासपुरे के साथ नाम
फाउंडेशन की शुरुआत की।
सूखा, किसान परिवारों की परेशानी, जल
संरक्षण और ग्रामीण विकास
उनके सामाजिक जीवन का बड़ा
हिस्सा बन गए। उनका
मानना था कि किसानों
को केवल आर्थिक मदद
नहीं, यह भरोसा भी
चाहिए कि वे अकेले
नहीं हैं। यानी— मुंबई
ने उन्हें अभिनेता बनाया, लेकिन गांव ने उन्हें
फिर इंसान बना दिया।
गोवा से पुणे के डोंजे तक—आखिरी सफर
नाना की आखिरी
सांस गोवा में थमी,
लेकिन उनकी अंतिम यात्रा
उस जमीन की ओर
बढ़ रही है जिसे
उन्होंने अपने जीवन के
उत्तरार्ध में अपना आश्रय
बनाया था। ताजा रिपोर्टों
के मुताबिक उनका पार्थिव शरीर
एअरलिफ्ट कर पुणे लाया
जाएगा और डोंजे गांव
स्थित उनके फार्महाउस पर
अंतिम संस्कार किया जाएगा। यही
वह ग्रामीण संसार था जहां नाना
फिल्मी भीड़ से दूर
रहना पसंद करते थे।
एक कलाकार की यह कैसी
यात्रा है— मुरुड की
मिट्टी से निकला। मुंबई
में संघर्ष किया।रंगमंच पर खुद को
गढ़ा। देश के पर्दे
पर छा गया। दिल्ली-मुंबई सहित देश के
शहरों में अभिनय की
छाप छोड़ी। काशी के घाटों
तक पहुंचा। और अंत में
फिर खेत और गांव
की मिट्टी में लौट गया।
नाना की सबसे बड़ी फिल्म—उनकी अपनी जिंदगी
नाना पाटेकर की
जिंदगी को अगर किसी
फिल्म की तरह देखें
तो इसमें नायक का प्रवेश
किसी आलीशान कार से नहीं
होता। वह गांव से
आता है। गरीबी देखता
है। मुंबई जाता है। पोस्टर
बनाता है। रंगमंच पर
खड़ा होता है। छोटे
किरदार करता है। एक
दिन देश उसे ‘क्रांतिवीर’
के रूप में पहचानता
है। फिर वही आदमी
‘नटसम्राट’ बनकर अपने ही
भीतर टूटता दिखाई देता है। और
जब देश उसे स्टार
मान चुका होता है,
वह खेतों में लौटकर किसान
के दुख को अपना
दुख बना लेता है।
यही नाना की असली
कहानी है। उनके अभिनय
की ऊंचाई जितनी बड़ी थी, उनके
जीवन की सादगी उतनी
ही गहरी।
परदा गिरा… किरदार नहीं
नाना पाटेकर अब
कैमरे के सामने नहीं
आएंगे। कोई नई फिल्म
के सेट पर उनके
लिए ‘लाइट… कैमरा… एक्शन’ नहीं बोलेगा। काशी
की किसी गली में
अचानक उनकी झलक नहीं
मिलेगी। मुंबई के किसी स्टूडियो
में उनकी भारी आवाज
नहीं गूंजेगी। मुरुड की मिट्टी में
उनका बचपन अब सिर्फ
स्मृति होगा। डोंजे के खेतों में
उनकी मौजूदगी अब एक खालीपन
की तरह महसूस होगी।
लेकिन अभिनेता नाना पाटेकर के
लिए शायद यही सबसे
बड़ा सच है— कलाकार
शरीर से जाता है,
किरदारों से नहीं। ‘क्रांतिवीर’
का आक्रोश रहेगा। ‘परिंदा’ की बेचैनी रहेगी।
‘खामोशी’ की संवेदना रहेगी।
‘वेलकम’ की हंसी रहेगी।
‘अब तक छप्पन’ का
तेवर रहेगा। ‘नटसम्राट’ की पीड़ा रहेगी।
और काशी की स्मृतियों
में वह आदमी भी
रहेगा, जो कैमरे के
सामने जितना बड़ा अभिनेता था,
कैमरे के पीछे उतना
ही सहज इंसान। नाना
पाटेकर चले गए। लेकिन
उनकी आवाज अभी बाकी
है। किसी पुराने दृश्य
में। किसी संवाद में।
किसी रंगमंच की खामोशी में।
किसी किसान के खेत में।
किसी बनारसी गली की स्मृति
में। और शायद किसी
दिन फिर कोई पर्दा
उठेगा… और सामने नाना
होंगे। “आ गए… मेरी
मौत का तमाशा देखने?”
इस
बार जवाब पूरा देश
देगा— नहीं नाना… आपकी
मौत का तमाशा देखने
नहीं, आपकी पूरी जिंदगी
को सलाम करने आए
हैं।




