Thursday, 5 November 2026

दीपावली : दीपों की अवली में छिपा है जीवन का दर्शन

दीपावली : दीपों की अवली में छिपा है जीवन का दर्शन 

अमावस्या की रात... चारों ओर पसरा अंधकार... लेकिन इसी अंधेरे को चुनौती देने के लिए जब एक-एक कर लाखों दीप जल उठते हैं तो रात भी रोशनी के उत्सव में बदल जाती है। घरों की देहरी से लेकर मंदिरों के शिखर तक, गलियों से लेकर घाटों तक और मन की चौखट से लेकर रिश्तों की दुनिया तक एक अद्भुत उजास फैल जाता है। यही दीपावली है। एक ऐसा पर्व, जो केवल कैलेंडर की तारीख नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की हजारों वर्षों पुरानी स्मृतियों, आस्थाओं और जीवन-दर्शन का जीवंत दस्तावेज है। दीपावली आती है तो केवल घरों की सफाई नहीं होती, स्मृतियों की भी धूल झड़ती है। आंगन में मिट्टी के दीये सजते हैं तो बचपन लौट आता है। खील-बताशों की मिठास में पुरानी परंपराएं घुलती हैं। पकवानों की खुशबू में रिश्तों की आत्मीयता महसूस होती है। दूर रह रहे अपनों की घर वापसी की प्रतीक्षा में आंखें चमक उठती हैं। बाजारों की चकाचौंध के बीच भी मिट्टी के एक छोटे से दीये की लौ मन को सबसे ज्यादा आकर्षित करती है। दरअसल, दीपावली का सबसे बड़ा चमत्कार यही है कि यह बाहर की रोशनी के बहाने मनुष्य को अपने भीतर झांकने का अवसर देती है। यह बताती है कि अंधकार चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, उसे मिटाने के लिए एक छोटी-सी लौ भी पर्याप्त है

सुरेश गांधी

दीपावली आती है तो सिर्फ घरों की देहरी नहीं सजती, स्मृतियों के दरवाजे भी खुल जाते हैं। आंगन में रखे मिट्टी के दीये, चौखट पर बनी रंगोली, पकवानों की महक, बच्चों की खिलखिलाहट और अपनों के लौट आने की प्रतीक्षा... इन सबके बीच एक ऐसा एहसास जन्म लेता है, जिसे शब्दों में बांधना आसान नहीं। शायद इसी अनुभूति का नाम दीपावली है। यह महज अमावस्या की रात को रोशन करने का उत्सव नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर उम्मीद का दीप जलाने का अवसर है। भारतीय संस्कृति में दीप का अर्थ केवल प्रकाश नहीं है। वह ज्ञान है, विश्वास है, आस्था है और अंधकार के विरुद्ध मनुष्य की अनवरत जिजीविषा भी। इसीलिए हजारों वर्षों से भारतीय जनमानस में दीपावली का स्थान विशिष्ट बना हुआ है। समय बदला, घरों की बनावट बदली, जीवनशैली बदली, बाजार का स्वरूप बदला, लेकिन दीप जलाने की इच्छा आज भी वैसी ही है। दीपावली का सबसे लोकप्रिय पौराणिक प्रसंग भगवान श्रीराम की अयोध्या वापसी से जुड़ा है। मान्यता है कि चौदह वर्ष का वनवास पूरा करने और लंकापति रावण पर विजय प्राप्त करने के बाद जब मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम, माता सीता और अनुज लक्ष्मण अयोध्या लौटे तो उनके स्वागत में पूरी अयोध्या दीपों से जगमगा उठी थी।

यह केवल एक राजा के घर लौटने का उत्सव नहीं था। यह अन्याय पर न्याय, अधर्म पर धर्म और अहंकार पर मर्यादा की विजय का उल्लास था। अयोध्यावासियों ने अपने आराध्य के स्वागत में जो दीप जलाए, वे कालांतर में भारतीय जनमानस की सांस्कृतिक पहचान बन गए। दीपावली शब्द भी अपने भीतर इस परंपरा का अर्थ समेटे हुए है। दीपों की अवली अर्थात दीपों की पंक्ति। एक दीप से दूसरा दीप जलता है और फिर प्रकाश की ऐसी शृंखला बनती है, जिसमें किसी एक की लौ दूसरे की रोशनी कम नहीं करती। यही इस पर्व का सबसे बड़ा जीवन-दर्शन है। खुशियां बांटने से घटती नहीं, बल्कि बढ़ती हैं। हालांकि भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में दीपावली के साथ कई धार्मिक और पौराणिक मान्यताएं जुड़ी हैं। कहीं इसे भगवान श्रीराम की अयोध्या वापसी के रूप में मनाया जाता है तो कहीं मां लक्ष्मी के प्राकट्य और भगवान विष्णु से संबंधित मान्यताओं के साथ। कुछ परंपराओं में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के वध को भी इस पर्व से जोड़ा जाता है। इस विविधता में ही भारतीय संस्कृति की खूबसूरती छिपी है। आस्था के रास्ते अलग हो सकते हैं, लेकिन हर रास्ते की मंजिल प्रकाश, मंगल और समृद्धि है।

लक्ष्मी के साथ गणेश की पूजा, धन के साथ विवेक का संदेश

दीपावली की रात मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा का विशेष विधान है। मां लक्ष्मी धन, वैभव, ऐश्वर्य और समृद्धि की प्रतीक हैं तो भगवान गणेश बुद्धि, विवेक और विघ्नों के विनाश के अधिष्ठाता माने जाते हैं। दोनों की एक साथ पूजा का आध्यात्मिक अर्थ भी गहरा है। धन के साथ विवेक न हो तो समृद्धि स्थायी नहीं रह सकती। वैभव के साथ विनम्रता न हो तो उसका कोई अर्थ नहीं। इसीलिए भारतीय परंपरा में लक्ष्मी के साथ गणेश की आराधना का विधान बनाया गया। लेकिन आज इस मान्यता को एक नए सामाजिक संदर्भ में समझने की जरूरत है। क्या समृद्धि केवल बैंक बैलेंस और तिजोरी में रखे धन से मापी जा सकती है? क्या महंगे घर, चमचमाती गाड़ियां और बाजार से खरीदी गई सजावट ही खुशहाली का प्रमाण हैं? निश्चित रूप से नहीं। परिवार में स्वास्थ्य, रिश्तों में विश्वास, समाज में सद्भाव, जीवन में संतोष और जरूरतमंद की मदद करने की क्षमता भी समृद्धि के ही रूप हैं। यही कारण है कि दीपावली पर मां लक्ष्मी की पूजा के साथ घर की स्वच्छता, सद्भाव और अतिथि सत्कार को भी विशेष महत्व दिया गया है।

इस बार रविवार, अमावस्या और स्वाति नक्षत्र का संयोग

इस वर्ष दीपावली ज्योतिषीय दृष्टि से भी चर्चा का विषय है। 8 नवंबर 2026 को रविवार के दिन कार्तिक कृष्ण पक्ष की अमावस्या पर दीपावली मनाई जाएगी। खास बात यह है कि इसी दिन तिथि परिवर्तन के कारण नरक चतुर्दशी और मुख्य दीपावली का पर्व भी एक ही दिन पड़ रहा है। वाराणसी के स्थानीय पंचांग के अनुसार 8 नवंबर को सुबह लगभग 11 बजकर 28 मिनट तक कृष्ण चतुर्दशी रहेगी। इसके बाद अमावस्या तिथि प्रारंभ होगी, जो 9 नवंबर को दोपहर लगभग 12 बजकर 31 मिनट तक रहेगी। इसलिए 8 नवंबर की शाम लक्ष्मी-गणेश पूजन के समय अमावस्या तिथि विद्यमान रहेगी। इस दिन स्वाति नक्षत्र का संयोग भी रहेगा, जो 9 नवंबर की सुबह लगभग 7 बजकर 24 मिनट तक प्रभावी रहेगा। इसके बाद विशाखा नक्षत्र प्रारंभ होगा। स्वाति नक्षत्र का स्वामी राहु माना जाता है। ज्योतिषीय मान्यता में इसे स्वतंत्रता, गति, परिवर्तन और नए अवसरों का प्रतीक माना गया है। स्वाति का प्रतीक हवा में स्वतंत्र रूप से लहराता तिनका भी माना जाता है, जो परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को ढालने की क्षमता का संकेत देता है। इस दिन रविवार होने के कारण सूर्य का विशेष महत्व रहेगा। वहीं आयुष्मान योग का संयोग भी बन रहा है, जो 9 नवंबर को तड़के लगभग 3 बजकर 3 मिनट तक रहेगा। इसके बाद सौभाग्य योग प्रारंभ होगा। ज्योतिषीय मान्यता में आयुष्मान योग को स्वास्थ्य, दीर्घायु और मंगलकारी कार्यों से जोड़ा जाता है। इस प्रकार रविवार, अमावस्या, स्वाति नक्षत्र और आयुष्मान योग का संयोग दीपावली के पंचांग को विशेष बनाता है।

वृषभ लग्न में मां लक्ष्मी की आराधना का विशेष महत्व

दीपावली पर केवल तिथि और नक्षत्र ही नहीं, लग्न का भी विशेष महत्व होता है। मान्यता है कि प्रदोष काल में स्थिर लग्न के दौरान मां लक्ष्मी की पूजा करने से घर में स्थायी सुख-समृद्धि का वास होता है। ज्योतिष में वृषभ, सिंह, वृश्चिक और कुंभ को स्थिर राशियां माना गया है। इनमें वृषभ लग्न को दीपावली के लक्ष्मी पूजन के लिए विशेष महत्व प्राप्त है। वृषभ राशि के स्वामी शुक्र हैं, जिन्हें ज्योतिष में सुख, सौंदर्य, ऐश्वर्य और भौतिक समृद्धि का कारक माना जाता है। इस बार वाराणसी में शाम 5 बजकर 13 मिनट पर सूर्यास्त होगा। इसके बाद प्रदोष काल प्रारंभ होगा।

लक्ष्मी पूजन का प्रमुख मुहूर्त  

दिन : रविवार, 8 नवंबर 2026

प्रदोष काल : शाम 5:13 से 7:49 बजे तक

वृषभ लग्न : शाम 5:37 से 7:34 बजे तक

लक्ष्मी-गणेश पूजन : शाम 5:37 से 7:34 बजे तक

मुहूर्त की अवधि : 1 घंटा 57 मिनट

यह मुहूर्त प्रदोष काल और स्थिर वृषभ लग्न के संयोग पर आधारित है।

निशीथ काल का महत्व

रात्रिकालीन विशेष साधना करने वाले साधकों के लिए निशीथ काल भी महत्वपूर्ण माना जाता है। निशीथ काल : रात 11:16 से 12:08 बजे तक। सिंह लग्न : रात 12:05 से 2:19 बजे तक। सामान्य गृहस्थों के लिए प्रदोष काल में वृषभ लग्न के दौरान पूजा को प्राथमिकता दी जाती है। निशीथ काल विशेष साधना और तांत्रिक परंपराओं से जुड़े साधकों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

ग्रहों की चाल और ज्योतिषीय दृष्टि से दीपावली

दीपावली के समय ग्रहों की स्थिति भी ज्योतिषीय विश्लेषण का विषय रहती है। वैदिक ज्योतिष में सूर्य को आत्मबल और प्रतिष्ठा, चंद्रमा को मन, मंगल को साहस, बुध को बुद्धि, गुरु को ज्ञान, शुक्र को वैभव और शनि को कर्म एवं अनुशासन का कारक माना गया है। राहु और केतु को छाया ग्रह कहा जाता है। इनके आधार पर ज्योतिषाचार्य विभिन्न ग्रहयोगों और उनके पारंपरिक फलादेश का विश्लेषण करते हैं। इस बार सूर्य तुला राशि में रहेगा। वैदिक ज्योतिष में तुला राशि सूर्य की नीच राशि मानी जाती है। ग्रहों की वास्तविक स्थिति, दृष्टि, युति और भावगत प्रभाव के आधार पर ही किसी विशेष योग का फलादेश किया जाता है। इसलिए केवल किसी ग्रह के वक्री या नीच राशि में होने से पूरे वर्ष अथवा किसी व्यक्ति के भविष्य के बारे में निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है। दीपावली का ज्योतिषीय संदेश भी यही है कि ग्रहों की स्थिति चाहे जैसी हो, मनुष्य के जीवन में कर्म, विवेक और सकारात्मकता का महत्व सर्वोपरि है।

एक दीप जरूरतमंद के घर भी जलना चाहिए

दीपावली की सबसे बड़ी खूबसूरती उसका सामाजिक चरित्र है। इस दिन लोग अपने घर सजाते हैं, नए कपड़े पहनते हैं, मिठाइयां बांटते हैं और एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं। लेकिन इस उल्लास के बीच उन चेहरों को भी देखना जरूरी है, जिनके घरों तक त्योहार की रोशनी नहीं पहुंच पाती। किसी जरूरतमंद परिवार को मिठाई देना, किसी बच्चे को नए कपड़े दिलाना, किसी बुजुर्ग का हाल पूछना, किसी अकेले व्यक्ति के साथ कुछ पल बिताना या किसी कारीगर से सीधे खरीदारी करना भी दीपावली मनाने का सुंदर तरीका है। त्योहार की सार्थकता केवल अपने घर को रोशन करने में नहीं, बल्कि किसी दूसरे के जीवन में उम्मीद जगाने में है।

पांच दिनों का महापर्व, हर दिन में छिपा अलग संदेश

दीपावली केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि कई परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं से जुड़ा पांच दिवसीय महापर्व है। धनतेरस, 6 नवंबर: भगवान धन्वंतरि की आराधना, स्वास्थ्य और समृद्धि की कामना तथा नए बर्तन, धातु और अन्य वस्तुओं की खरीदारी का पर्व। नरक चतुर्दशी, 8 नवंबर: भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के वध की मान्यता से जुड़ा पर्व। इस बार तिथि के विशेष संयोग के कारण छोटी दीपावली और मुख्य दीपावली एक ही दिन पड़ रही हैं। दीपावली, 8 नवंबर: मां लक्ष्मी, भगवान गणेश और मां सरस्वती की आराधना का मुख्य पर्व। घरों और प्रतिष्ठानों में दीप जलाकर सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। गोवर्धन पूजा, 10 नवंबर: भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत धारण कर प्रकृति और ब्रजवासियों की रक्षा करने की स्मृति में पूजा। यह पर्व प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का संदेश भी देता है। भाई दूज, 11 नवंबर: भाई-बहन के स्नेह, विश्वास और आत्मीय संबंधों का पर्व। बहनें भाइयों के मंगलमय जीवन की कामना करती हैं।

असली दीपावली तब, जब भीतर का अंधेरा भी मिटे

आज मनुष्य के पास पहले से अधिक साधन हैं। बड़े घर हैं, महंगी गाड़ियां हैं, आधुनिक सजावट है और बाजार में हर तरह की वस्तु उपलब्ध है। इसके बावजूद रिश्तों में दूरियां, अकेलापन, तनाव और असंतोष जीवन की बड़ी चुनौतियां बने हुए हैं। ऐसे समय में दीपावली का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। यह हमें अपने भीतर झांकने का अवसर देती है। क्या हमने किसी का दिल दुखाया है? क्या किसी जरूरतमंद की मदद कर सकते हैं? क्या परिवार के साथ बैठकर कुछ पल बिता सकते हैं? क्या अपने भीतर के क्रोध, अहंकार, ईर्ष्या और नकारात्मकता को कम कर सकते हैं? उपनिषद का कालजयी मंत्र इसी जीवन-दर्शन को अभिव्यक्त करता है—

असतो मा सद्गमय।

तमसो मा ज्योतिर्गमय।

मृत्योर्मा अमृतं गमय॥

अर्थात हमें असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर और मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चलो। यह केवल धार्मिक मंत्र नहीं, बल्कि मनुष्य की अनंत आकांक्षा का उद्घोष है। सत्य की तलाश, ज्ञान की प्राप्ति और जीवन को बेहतर बनाने की निरंतर कोशिश ही वास्तविक प्रकाश है। इसलिए इस दीपावली पर दीप केवल घर की चौखट पर न जलाएं। उसे अपने व्यवहार, विचार और रिश्तों में भी जलने दें। किसी के चेहरे पर मुस्कान बनकर, किसी के जीवन में उम्मीद बनकर और किसी जरूरतमंद के घर में रोशनी बनकर। क्योंकि दीपावली की सार्थकता इस बात में नहीं कि हमारे घर में कितने दीप जले, बल्कि इस बात में है कि हमारे कारण कितने जीवन रोशन हुए। दीप की लौ छोटी जरूर होती है, लेकिन उसका संदेश अनंत है। वह कहती है—अंधकार से समझौता मत करो, एक दीप जलाओ और उजाले की शुरुआत करो।

धनतेरस पर खुलेगा मां अन्नपूर्णा का खजाना, बाबा को लगेगा छप्पन भोग

धनतेरस पर खुलेगा मां अन्नपूर्णा का खजाना, बाबा को लगेगा छप्पन भोग 

पांच दिन तक मिलेगा प्रसाद, अन्नकूट पर लड्डुओं से बने शिवालय में विराजेंगे बाबा 

सुरेश गांधी

वाराणसी। काशी में धनतेरस का पर्व इस बार मां अन्नपूर्णा के खजाने और बाबा विश्वनाथ के छप्पन भोग की दिव्य परंपरा के नाम रहेगा। धन-धान्य और समृद्धि की अधिष्ठात्री मां अन्नपूर्णा के दरबार में छह नवंबर की भोर चार बजे विशेष पूजा-अर्चना, भव्य शृंगार और महाआरती होगी। इसके बाद श्रद्धालुओं के लिए मां के दर्शन और उनके पावन प्रसाद ‘खजाना’ वितरण की शुरुआत होगी। यह सिलसिला दस नवंबर को अन्नकूट महापर्व की शयन आरती तक जारी रहेगा।

श्री काशी विश्वनाथ धाम में धनतेरस से अन्नकूट तक पांच दिनों तक भक्ति और परंपरा का विशेष उत्सव सजेगा। अन्नपूर्णा मंदिर में मां के दर्शन के साथ खजाना प्रसाद पाने के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने की संभावना है। काशी की धार्मिक मान्यता में मां अन्नपूर्णा का खजाना केवल प्रसाद नहीं, बल्कि अन्न, धन-धान्य और अक्षय समृद्धि के आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है।

बाबा को अर्पित होंगे 56 तरह के पकवान

अन्नकूट महापर्व पर दस नवंबर को मध्याह्न भोग आरती के दौरान भगवान विश्वेश्वर को छप्पन भोग अर्पित किए जाएंगे। इसमें तरह-तरह के मिष्ठान्न, फल, नमकीन, मेवे और पारंपरिक पकवान शामिल होंगे। इस अवसर पर भगवान विश्वनाथ के शिव परिवार की चल प्रतिमा गर्भगृह में विराजमान कर विशेष शृंगार किया जाएगा।

लड्डुओं से बनेगा भव्य शिवालय

अन्नकूट का एक और खास आकर्षण लड्डुओं से निर्मित भव्य शिवालय होगा। इसका निर्माण गर्भगृह के पश्चिमी द्वार के समीप स्थित श्री वैकुंठ महादेव प्रांगण में किया जाएगा। श्रद्धालु यहां लड्डुओं से बने शिवालय के दर्शन कर सकेंगे। मध्याह्न भोग आरती के बाद शिव परिवार की चल प्रतिमा के दर्शन भी गर्भगृह के बाहर से झांकी स्वरूप होंगे।

दक्षिणी द्वार से होगी शयन आरती

अन्नकूट के दिन शाम छह बजे के बाद नियमित आरतियां निर्धारित समय पर होंगी। हालांकि, इस दिन शयन आरती की व्यवस्था में बदलाव रहेगा। सामान्य दिनों में गर्भगृह के पश्चिमी द्वार से होने वाली शयन आरती इस बार दक्षिणी द्वार से संपन्न की जाएगी। मंदिर प्रशासन ने श्रद्धालुओं की सुविधा, सुरक्षा और सुगम दर्शन के लिए विशेष इंतजाम करने की बात कही है।

त्रिग्रही योग, मालव्य और लक्ष्मी नारायण राजयोग में मनेगा धनतेरस

त्रिग्रही योग, मालव्य और लक्ष्मी नारायण राजयोग में मनेगा धनतेरस

धन-वैभव और आरोग्य की कामना से होगी भगवान धन्वंतरि, मां लक्ष्मी और कुबेर की आराधना

सुरेश गांधी

वाराणसी। कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष त्रयोदशी यानी धनतेरस केवल खरीदारी का पर्व नहीं, बल्कि धन, आरोग्य और समृद्धि की मंगलकामना का भी उत्सव है। दीपावली से पहले आने वाला यह पर्व घर-परिवार में सुख-शांति और खुशहाली के स्वागत का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन शुभ मुहूर्त में सोना-चांदी, धातु के बर्तन अथवा नई वस्तुओं की खरीदारी करने से घर में बरकत आती है। भगवान धन्वंतरि, मां लक्ष्मी और भगवान कुबेर की पूजा के साथ लोग अपने जीवन में आरोग्य, वैभव और संपन्नता की कामना करते हैं। इस बार धनतेरस 6 नवंबर, शुक्रवार को मनाई जाएगी। ज्योतिषीय गणना के अनुसार, इस दिन तुला राशि में सूर्य, बुध और शुक्र की युति से त्रिग्रही योग बनेगा। इसके साथ बुधादित्य, शुक्रादित्य, लक्ष्मी नारायण और मालव्य राजयोग का भी संयोग बताया जा रहा है। ज्योतिषीय मान्यताओं में इन योगों को धन, वैभव, सुख-सुविधा, बुद्धि और ऐश्वर्य से जोड़कर देखा जाता है।

पांच शुभ योगों से बढ़ेगी पर्व की ज्योतिषीय महत्ता

तुला राशि में सूर्य, बुध और शुक्र की युति से बनने वाला त्रिग्रही योग इस दिन का प्रमुख ज्योतिषीय संयोग है। सूर्य और बुध की युति से बुधादित्य योग तथा सूर्य और शुक्र की युति से शुक्रादित्य योग बनेगा। बुध और शुक्र की युति को लक्ष्मी नारायण योग कहा जाता है। वहीं शुक्र के अपनी राशि तुला में स्थित होने से मालव्य महापुरुष राजयोग का निर्माण होगा। ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार, मालव्य योग भौतिक सुख, वैभव और ऐश्वर्य का प्रतीक है, जबकि लक्ष्मी नारायण योग को आर्थिक उन्नति और बुद्धि-विवेक से जोड़कर देखा जाता है।

धन्वंतरि पूजा से आरोग्य की कामना

धनतेरस का संबंध केवल धन-संपत्ति से नहीं, बल्कि आरोग्य से भी है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। उन्हें आयुर्वेद और चिकित्सा का देवता माना जाता है। इसीलिए धनतेरस पर उनकी पूजा कर निरोगी जीवन की कामना की जाती है। शाम को मां लक्ष्मी और भगवान कुबेर की आराधना के साथ घर के मुख्य द्वार पर दीपदान की परंपरा भी निभाई जाती है।

धनतेरस 2026 के शुभ मुहूर्त

कब से कब तक रहेगी त्रयोदशी तिथि?

प्रारंभ : 6 नवंबर, सुबह 10:30 बजे

समाप्त : 7 नवंबर, सुबह 11:47 बजे

पर्व : शुक्रवार, 6 नवंबर 2026

मां लक्ष्मी और कुबेर पूजा

पूजा का शुभ मुहूर्त : शाम 6:02 से 7:57 बजे तक

कुल अवधि : 1 घंटा 56 मिनट

प्रदोष काल : शाम 5:33 से रात 8:09 बजे तक

वृषभ काल : शाम 6:02 से 7:57 बजे तक

अन्य शुभ समय

अभिजीत मुहूर्त : सुबह 11:48 से दोपहर 12:32 बजे तक

अमृत काल : रात 10:30 से 12:10 बजे तक

सोना-चांदी खरीदने का मुहूर्त

6 नवंबर सुबह 10:30 से 7 नवंबर सुबह 6:37 बजे तक

कुल अवधि : 20 घंटे 7 मिनट

वाहन खरीदने के शुभ चौघड़िया

लाभ : सुबह 7:54 से 9:17 बजे

अमृत : सुबह 9:16 से 10:38 बजे

अभिजीत : दोपहर 12:00 से 12:45 बजे

चर : दोपहर 4:11 से शाम 5:33 बजे

शुभ : शाम 6:03 से 7:19 बजे

लाभ : रात 8:49 से 10:27 बजे

धनतेरस पर क्या खरीदें?

धनतेरस पर इन वस्तुओं को घर लाना शुभ

सोना-चांदी : धन और समृद्धि का प्रतीक।

पीतल-तांबे के बर्तन : शुभता और आरोग्य से जुड़ी परंपरा।

झाड़ू : मां लक्ष्मी के आगमन और स्वच्छता का प्रतीक।

साबुत धनिया : धन-धान्य और बरकत की कामना।

गोमती चक्र : सुख-समृद्धि का पारंपरिक प्रतीक।

कौड़ी : धन और ऐश्वर्य से जुड़ी मान्यता।

लक्ष्मी-गणेश प्रतिमा : दीपावली पूजन के लिए शुभ।

धार्मिक मान्यता: धनतेरस पर खरीदी गई वस्तुओं को केवल भौतिक संपत्ति नहीं, बल्कि घर में मंगल और समृद्धि के आगमन का प्रतीक माना जाता है।

धनतेरस की दस्तक से बाजार गुलजार, बरसेगी लक्ष्मी तो खनकेंगे कारोबारियों के चेहरे

सिर्फ बर्तन नहीं, स्मार्ट किचन और डिजाइनर होम डेकोर की भी धूम

धनतेरस की दस्तक से बाजार गुलजार, बरसेगी लक्ष्मी तो खनकेंगे कारोबारियों के चेहरे

बाइक से चम्मच तक, सोने के सिक्कों से डायमंड ज्वेलरी तक बढ़ी चमक, कल शुभ मुहूर्त में खरीदारी का इंतजार

धनतेरस की पूर्व संध्या पर बाजारों में दिखा दीपोत्सव का उल्लास, वाहनों से लेकर बर्तन, सराफा, इलेक्ट्रॉनिक्स और पूजन सामग्री की दुकानों तक रौनक

सुरेश गांधी

वाराणसी। कहीं नई बाइक की चाबी हाथ में आने का इंतजार है तो कहीं सोने की चमक में लक्ष्मी के स्वागत की तैयारी। किसी दुकान पर पीतल और तांबे के बर्तनों की खनक है तो कहीं चांदी के सिक्कों और आकर्षक आभूषणों की चमक ग्राहकों को ठहरने पर मजबूर कर रही है। दीपावली से पहले धनतेरस की दस्तक ने काशी के बाजारों की धड़कन बढ़ा दी है। गुरुवार को पर्व की पूर्व संध्या पर बाजारों में उमड़ी भीड़ ने साफ संकेत दे दिया कि इस बार त्योहार का उल्लास कारोबार में भी नई जान फूंकने को तैयार है।

धनतेरस पर खरीदारी की परंपरा भले ही सदियों पुरानी हो, लेकिन बदलते समय के साथ बाजार की पसंद और खरीदारी का अंदाज भी बदल रहा है। अब बर्तन खरीदने का मतलब केवल कटोरी, गिलास और चम्मच तक सीमित नहीं है। आकर्षक डिजाइन वाले किचन सेट, कॉपर की बोतलें, स्टाइलिश सर्विंग ट्रे, प्रीमियम डिनर सेट और आधुनिक कुकवेयर भी ग्राहकों को आकर्षित कर रहे हैं। वहीं दोपहिया और चारपहिया वाहनों के शोरूम में भी ग्राहकों की आवाजाही बढ़ी है। कई लोग पसंदीदा मॉडल और रंग देखने के साथ बुकिंग की औपचारिकता पूरी कर रहे हैं।

सराफा बाजार में परंपरा के साथ आधुनिकता का मेल

धनतेरस पर सोना-चांदी खरीदने की परंपरा का आकर्षण इस बार भी बरकरार है। हालांकि महंगी धातुओं के बीच ग्राहकों की पसंद में बदलाव दिखाई दे रहा है। भारी आभूषणों के साथ हल्की चेन, छोटे पेंडेंट, अंगूठियां, रोजाना पहनने योग्य ज्वेलरी और कम वजन के डिजाइन चर्चा में हैं। सोने के सिक्कों के साथ चांदी के सिक्के, लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां, चांदी की कटोरी, गिलास और चम्मच भी खरीदारी की सूची में शामिल हैं। युवाओं में डायमंड जड़ित आभूषण और नए डिजाइन की ज्वेलरी का आकर्षण भी बढ़ा है।

पूजन सामग्री से लेकर आतिशबाजी तक तैयारी

उधर, दीपावली की पूजा के लिए लक्ष्मी-गणेश की आकर्षक प्रतिमाओं, पीतल और चांदी के पूजन सेट, रंग-बिरंगी दीपमालाओं, मिट्टी के दीयों, सजावटी बंदनवार और रंगोली सामग्री से दुकानें सज गई हैं। पारंपरिक मिट्टी के दीयों के साथ डिजाइनर और सजावटी दीयों की भी खूब वैरायटी है। आतिशबाजी की दुकानों पर फुलझड़ी, अनार, चकरी और आसमान में रंग बिखेरने वाले पटाखों की मांग को लेकर तैयारियां हैं। कम धुआं और कम आवाज वाले ग्रीन पटाखों के विकल्प भी ग्राहकों के बीच चर्चा में हैं।

मुहूर्त की खरीदारी पर टिकी निगाहें

गुरुवार को बाजारों में भीड़ के बावजूद कई ग्राहक पसंदीदा सामान देखकर लौटते नजर आए। वजह साफ है, धनतेरस पर शुभ मुहूर्त में खरीदारी की धार्मिक मान्यता। ऐसे में शुक्रवार को सुबह से ही बाजारों में खरीदारों की भीड़ बढ़ने की उम्मीद है। दुकानदारों ने भी देर रात तक प्रतिष्ठान खुले रखने और ग्राहकों की सुविधा के लिए अतिरिक्त व्यवस्था की तैयारी की है। कुल मिलाकर इस बार धनतेरस पर बाजार में परंपरा और आधुनिकता साथ-साथ दिखाई दे रही है। किसी के लिए यह सोने-चांदी में निवेश का अवसर है तो किसी के लिए घर में नई वस्तु लाने की खुशी। किसी के लिए नई गाड़ी का सपना है तो किसी के लिए महज एक चम्मच खरीदकर भी शुभ शुरुआत करने का विश्वास। बाजार की यही विविधता धनतेरस को खास बनाती है।

इस बार बाजार में क्या नया?

कॉपर और स्टेनलेस स्टील की आकर्षक बोतलें।

डिजाइनर सर्विंग ट्रे और प्रीमियम डिनर सेट।

नॉनस्टिक और मल्टीपर्पज कुकवेयर।

एलईडी डेकोरेटिव लैंप और सेंसर वाली लाइटें।

फ्लोटिंग और सुगंधित सजावटी दीये।

इलेक्ट्रिक दीपमाला और डिजिटल रंगोली लाइट।

घर सजाने के लिए थीम आधारित तोरण और बंदनवार।

पारंपरिक पूजा थाली के साथ डिजाइनर पूजा किट।

ज्वेलर्स की दुकानों पर बदली पसंद

भारी गहनों से आगे बढ़कर हल्के वजन और छोटे निवेश पर जोर

इस बार सराफा बाजार में परंपरागत सोने के गहनों के साथ खरीदारी की नई पसंद भी दिख रही है।

सोने के छोटे और हल्के सिक्के।

लक्ष्मी-गणेश अंकित चांदी के सिक्के।

कम वजन की सोने की चेन और पेंडेंट।

डायमंड स्टडेड अंगूठियां और ईयररिंग्स।

पुरुषों के लिए सोने की अंगूठियां और चेन ब्रेसलेट।

चांदी की कटोरी, गिलास और चम्मच।

चांदी की लक्ष्मी-गणेश प्रतिमाएं।

रोजाना पहनने योग्य मिनिमल डिजाइन की ज्वेलरी।

खास बदलाव : महंगे सोने के बीच ग्राहक कम वजन में आकर्षक डिजाइन और बजट के मुताबिक खरीदारी के विकल्प तलाश रहे हैं।  

लक्ष्मी-गणेश के दरबार में भी डिजाइन का नया संसार

मिट्टी की पारंपरिक मूर्तियों से लेकर चांदी और मेटल की प्रतिमाओं तक

इस बार दीपावली पूजन के लिए बाजार में कई तरह के विकल्प हैं।

पारंपरिक मिट्टी की लक्ष्मी-गणेश प्रतिमाएं।

चांदी और पीतल की छोटी प्रतिमाएं।

एंटीक फिनिश वाली मेटल मूर्तियां।

आकर्षक डिजाइन वाली पूजा चौकियां।

लक्ष्मी-गणेश के साथ कुबेर यंत्र।

सजावटी पीतल के दीपस्तंभ।

डिजाइनर पूजा थाली और पंचदीप।

मिट्टी के पारंपरिक दीये और रंगीन दीयामालाएं।

इसके अलावा धनिया, गोमती चक्र, कौड़ियां, श्रीयंत्र, कलश और पूजन के अन्य पारंपरिक सामान भी खरीदारी का हिस्सा हैं।

आतिशबाजी में रंगों का नया अंदाज

अनार, फुलझड़ी और चकरी के साथ कम धुआं और कम आवाज वाले विकल्पों पर जोर

दीपावली की खुशियों में आतिशबाजी का अपना आकर्षण है। बाजार में पारंपरिक पटाखों के साथ कई तरह की वैरायटी उपलब्ध है।

रंगीन रोशनी बिखेरने वाले अनार।

बच्चों के आकर्षण की फुलझड़ियां।

जमीन पर घूमने वाली चकरी।

रंग-बिरंगी रोशनी वाले स्काई शॉट।

कम आवाज वाले ग्रीन पटाखों के विकल्प।

आकर्षक पैकिंग वाले फैमिली फायरवर्क पैक।

बदलती सोच: तेज आवाज की जगह रोशनी और रंगों को प्राथमिकता देने तथा पर्यावरण अनुकूल आतिशबाजी की ओर रुझान बढ़ाने की कोशिश दिख रही है। पटाखे केवल अधिकृत विक्रेताओं से और निर्धारित नियमों के अनुसार ही खरीदें। 

ऑटोमोबाइल बाजार: कितनी बाइक और कारों की बुकिंग हुई है? कितने वाहनों की डिलीवरी धनतेरस पर होनी है? यह आंकड़ा मिल जाए तो बाजार की वास्तविक गर्मी सामने आएगी।

सराफा बाजार: सोने-चांदी के भाव में पिछले साल के मुकाबले कितना अंतर है? कितने ग्राहक हल्के गहने और चांदी के सिक्के पसंद कर रहे हैं? यह इस बार की खरीदारी का सबसे मजबूत आर्थिक एंगल होगा।

बर्तन और इलेक्ट्रॉनिक्स: क्या ग्राहक परंपरागत पीतल-तांबे के बजाय आधुनिक किचन आइटम, स्मार्ट टीवी, वॉशिंग मशीन, फ्रिज और छोटे घरेलू उपकरणों की ओर अधिक आकर्षित हैं?

जहां अमृत की बूंदों से कालजयी हुई काशी, वहां आज भी पूजे जाते हैं आरोग्य के देवता धन्वंतरि

जहां अमृत की बूंदों से कालजयी हुई काशी, वहां आज भी पूजे जाते हैं आरोग्य के देवता धन्वंतरि 

सोने-चांदी की चमक और बाजारों की रौनक के बीच काशी धनतेरस पर एक ऐसा रहस्य सहेजती है, जिसका मोल दुनिया की किसी दौलत से नहीं आंका जा सकता। मान्यता है कि समुद्र मंथन से निकले अमृत की कुछ बूंदें काशी में भी छलकी थीं। इसी अमृत परंपरा की स्मृतियां महामृत्युंजय मंदिर परिसर के प्राचीन धन्वंतरि कूप से जुड़ी हैं। कहते हैं, सात घाटों वाले इस कूप के हर घाट के जल की तासीर अलग है। राजा परीक्षित, नागराज तक्षक और आयुर्वेद के देवता धन्वंतरि की भेंट का पौराणिक प्रसंग भी इसी कूप से जुड़ा है। काशी में भगवान धन्वंतरि का दूसरा अनूठा धाम बुलानाला स्थित धन्वंतरि निवास है, जहां लगभग 300 साल पुरानी अष्टधातु की प्रतिमा के सार्वजनिक दर्शन साल में सिर्फ धनतेरस पर होते हैं। चार हाथों में अमृत कलश, शंख, चक्र और जोंक धारण किए भगवान के दर्शन को श्रद्धालु उमड़ते हैं। उनकी कामना होती है—परिवार निरोग रहे, आयु दीर्घ हो। काशी का यह पर्व संदेश देता है कि सोना-चांदी संपन्नता के प्रतीक हो सकते हैं, लेकिन स्वस्थ शरीर ही जीवन का सबसे अनमोल धन है

सुरेश गांधी

दुनिया जहां धन की चमक में समृद्धि का चेहरा तलाशती है, वहीं काशी धनतेरस पर एक ऐसा संदेश देती है, जो सोने-चांदी की चमक से कहीं अधिक मूल्यवान है। यहां धनतेरस का अर्थ केवल तिजोरी भरना नहीं, बल्कि जीवन को आरोग्य, दीर्घायु और निर्भयता के अमृत से सींचना भी है। यह वही नगरी है, जिसके बारे में लोकमान्यता है कि समुद्र मंथन से निकले अमृत की कुछ बूंदें यहां भी छलकी थीं। शायद इसीलिए काशी की आध्यात्मिक चेतना में भगवान धन्वंतरि का स्थान केवल आयुर्वेद के प्रवर्तक या देव वैद्य का नहीं, बल्कि जीवन की निरंतरता और काल पर विजय की कामना से भी जुड़ा है। महामृत्युंजय मंदिर परिसर में स्थित प्राचीन धन्वंतरि कूप इस मान्यता को आज भी अपने भीतर समेटे हुए है। वहीं बुलानाला स्थित धन्वंतरि निवास में भगवान की लगभग तीन सौ वर्ष पुरानी अष्टधातु प्रतिमा साल में केवल धनतेरस के दिन सार्वजनिक दर्शन देती है। एक ओर धरती की गहराई में समाई अमृत की लोककथा और दूसरी ओर भक्तों को साल में एक दिन दर्शन देने वाले आरोग्य के देवता। काशी में धनतेरस की यह विशिष्टता इसे देश के दूसरे हिस्सों में मनाए जाने वाले धनतेरस से अलग पहचान देती है।

समुद्र मंथन से काशी तक पहुंची अमृत की दास्तां

पौराणिक आख्यानों के अनुसार देवताओं और असुरों के बीच हुए समुद्र मंथन से जब चौदह रत्न निकले तो उनमें भगवान धन्वंतरि भी अमृत कलश लेकर प्रकट हुए। उनके एक हाथ में अमृत कलश, दूसरे में औषधि, शंख और चक्र विराजमान थे। आयुर्वेद के देवता के रूप में उनकी प्रतिष्ठा हुई और उन्हें देव वैद्य कहा गया। मान्यता है कि भगवान विष्णु के वरदान के अनुसार धन्वंतरि ने द्वापर युग में काशी के राजपरिवार में पुनर्जन्म लिया। काशीराज के वंश में जन्म लेकर उन्होंने आयुर्वेद को पुनः व्यवस्थित किया और उसके आठ अंगों में विभाजन की परंपरा से उनका नाम जुड़ा। काशी की लोकआस्था में इससे भी आगे एक प्रसंग मिलता है। कहा जाता है कि भगवान शिव द्वारा समुद्र मंथन से निकला हलाहल विष ग्रहण करने के बाद धन्वंतरि ने उन्हें अमृत प्रदान किया था। इसी क्रम में अमृत की कुछ बूंदें काशी में भी छलकीं। यह पौराणिक मान्यता काशी को कालजयी और अविनाशी मानने वाली धार्मिक चेतना से जुड़ती है। इसीलिए यहां भगवान धन्वंतरि की आराधना केवल रोगों से मुक्ति की प्रार्थना नहीं, बल्कि जीवन की रक्षा और दीर्घायु की कामना का भी प्रतीक है।

धन्वंतरि कूप में सिमटी है अमृत और अमरता की मान्यता

काशी के महामृत्युंजय मंदिर परिसर में स्थित प्राचीन धन्वंतरि कूप इस पूरे आख्यान का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव है। मंदिर के तीसरे खंड परिसर में स्थित इस कूप को स्थानीय धार्मिक परंपरा में भगवान धन्वंतरि से जोड़कर देखा जाता है। सदियों से यह स्थान श्रद्धालुओं के लिए कौतूहल, आस्था और आरोग्य की कामना का केंद्र बना हुआ है। इसके बारे में प्रचलित मान्यता है कि इसके सात घाट हैं और प्रत्येक घाट के जल की तासीर अलग-अलग है। जल के इन अलग-अलग स्वरूपों को लेकर अनेक धार्मिक धारणाएं प्रचलित हैं। श्रद्धालु इसे सामान्य जलस्रोत भर नहीं मानते, बल्कि आयुर्वेद के अधिष्ठाता देवता की स्मृति और उनकी कृपा से जुड़ा पवित्र स्थल मानते हैं। धन्वंतरि कूप से जुड़ा एक अन्य पौराणिक प्रसंग महाभारत काल के राजा परीक्षित और नागराज तक्षक का है। कथा के अनुसार राजा परीक्षित को ऋषि के शाप के कारण सर्पदंश से मृत्यु का विधान प्राप्त हुआ था। उन्हें बचाने के लिए आयुर्वेद के ज्ञाता धन्वंतरि चले थे, जबकि नागराज तक्षक भी अपने निर्धारित विधान के अनुसार उन्हें डसने जा रहे थे। रास्ते में दोनों की भेंट इसी स्थान पर हुई। कहा जाता है कि तक्षक ने अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हुए एक वृक्ष को भस्म कर दिया। धन्वंतरि ने अपनी विद्या और संजीवनी शक्ति से उसे फिर हरा-भरा कर दिया। इसके बाद दोनों के प्रभाव और सामर्थ्य का परीक्षण हुआ। यह प्रसंग धन्वंतरि की चिकित्सा विद्या और जीवन को पुनः संबल देने वाली शक्ति का प्रतीक माना जाता है। यह कथा इतिहास की प्रमाणित घटना से अधिक पौराणिक आख्यान और स्थानीय धार्मिक विश्वास का हिस्सा है, लेकिन काशी की सांस्कृतिक स्मृति में इसकी जगह महत्वपूर्ण है। धन्वंतरि कूप इसी स्मृति का साक्षी बना हुआ है। मृत्यु और जीवन, विष और अमृत तथा रोग और उपचार के बीच चलने वाले शाश्वत संघर्ष का यह स्थल धनतेरस पर विशेष अर्थ ग्रहण करता है। जिस पर्व पर लोग धन-संपदा की कामना करते हैं, उसी दिन यहां आरोग्य और दीर्घायु की प्रार्थना का भाव भी गहरा हो उठता है।

बुलानाला में साल में एक दिन होते हैं भगवान के दर्शन

काशी में भगवान धन्वंतरि की उपस्थिति का दूसरा विशिष्ट केंद्र बुलानाला स्थित धन्वंतरि निवास है। यहां भगवान की अष्टधातु की लगभग तीन सौ 28 वर्ष पुरानी प्रतिमा स्थापित है। वर्ष भर श्रद्धालुओं की प्रतीक्षा के बाद धनतेरस के दिन प्रतिमा के सार्वजनिक दर्शन का अवसर मिलता है। यही इस स्थान की सबसे बड़ी विशेषता है। रजत सिंहासन पर विराजमान लगभग ढाई फुट ऊंची रत्नजड़ित प्रतिमा के दर्शन भक्तों को दिव्य अनुभूति कराते हैं। भगवान के चार हाथों में अमृत कलश, शंख, चक्र और जोंक विराजमान हैं। प्रतिमा के दोनों ओर सेविकाएं चंवर डुलाती दिखाई देती हैं। पूरा स्वरूप आयुर्वेद, औषधि और आरोग्य की देव परंपरा का सजीव प्रतीक लगता है। धनतेरस के दिन यहां देश-विदेश से श्रद्धालु पहुंचते हैं। उनकी प्रार्थना में एक ही भाव प्रमुख रहता है—परिवार निरोग रहे, जीवन में व्याधियों का प्रवेश न हो और आरोग्य की कृपा बनी रहे। ऐसी लोकमान्यता है कि भगवान धन्वंतरि के दर्शन मात्र से वर्ष भर निरोग एवं व्याधिमुक्त रहने का आशीर्वाद मिलता है। इस तरह काशी में धनतेरस के दो अलग-अलग केंद्र एक ही भाव को विस्तार देते हैं। महामृत्युंजय मंदिर का धन्वंतरि कूप जहां अमृत और जीवन रक्षा की पौराणिक स्मृतियों को संजोए है, वहीं बुलानाला का धन्वंतरि निवास भगवान के साक्षात दर्शन और आरोग्य की कामना का केंद्र है।

धनतेरस : धन से पहले आरोग्य का स्मरण

कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को मनाया जाने वाला धनतेरस धनत्रयोदशी और धन्वंतरि जयंती के नाम से भी जाना जाता है। पांच दिवसीय दीपोत्सव का शुभारंभ इसी दिन से होता है। सामान्य तौर पर धनतेरस का नाम आते ही बाजार, सोना-चांदी, नए बर्तन, आभूषण और खरीदारी की तस्वीर उभरती है। दुकानों पर ग्राहकों की भीड़, सजे बाजार और नए सामान के साथ घर लौटते परिवार इस पर्व की बाहरी रौनक हैं। लेकिन इसके भीतर छिपा जीवन दर्शन इससे कहीं व्यापक है। धनतेरस का संबंध भगवान धन्वंतरि से है, इसलिए यह दिन स्वास्थ्य और आरोग्य के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का भी अवसर है। धन की सार्थकता तभी है, जब उसका उपभोग करने वाला शरीर स्वस्थ हो और मन प्रसन्न रहे। रोगों से घिरा जीवन संपन्नता के बावजूद अधूरा रह जाता है। इसीलिए भारतीय परंपरा ने धनतेरस को केवल आर्थिक समृद्धि का उत्सव नहीं बनाया, बल्कि आरोग्य को भी धन का सर्वोच्च स्वरूप माना। आयुर्वेद की दृष्टि से भी भगवान धन्वंतरि का स्मरण महत्वपूर्ण है। आयुर्वेद केवल रोग होने पर उपचार की पद्धति नहीं, बल्कि शरीर, मन, आहार, दिनचर्या और प्रकृति के बीच संतुलन बनाए रखने की जीवनशैली है। धनतेरस इसी संतुलन को याद करने का अवसर है। यह दिन हमें बताता है कि शरीर की देखभाल, स्वच्छता, संतुलित भोजन और संयमित दिनचर्या भी किसी बड़ी संपत्ति से कम नहीं।

कुबेर पूजन और यमदीप : समृद्धि के साथ जीवन रक्षा की कामना

धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि के साथ धन के अधिष्ठाता कुबेर और मृत्यु के देवता यमराज की पूजा की भी परंपरा है। कुबेर को धन-संपदा का रक्षक और उत्तर दिशा का लोकपाल माना जाता है। इस दिन घर और प्रतिष्ठानों में दीप जलाकर लक्ष्मी-कुबेर का पूजन किया जाता है। व्यापारी वर्ग के लिए नए बही-खाते, लेखा-जोखा और कारोबारी शुभारंभ का भी विशेष महत्व रहता है। इसी दिन संध्या में दक्षिण दिशा की ओर यमदीप जलाने की परंपरा है। आटे या मिट्टी के दीपक में तेल और बाती रखकर उसे यमराज को समर्पित किया जाता है। इसके पीछे मान्यता है कि दीपदान से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है। यह परंपरा मृत्यु से भयभीत होने के बजाय जीवन के महत्व को समझने का संदेश देती है। दीपक की छोटी-सी लौ मनुष्य को याद दिलाती है कि जीवन अनमोल है और उसकी रक्षा के लिए स्वास्थ्य, सदाचार और सत्कर्म आवश्यक हैं। काशी में इस भाव का विस्तार गंगा के घाटों तक दिखाई देता है। दीपदान की परंपरा में श्रद्धालु अपने परिवार की सुख-समृद्धि और दीर्घायु की कामना करते हैं। गंगा की धारा पर तैरते दीप मानो जीवन की उस ज्योति के प्रतीक बन जाते हैं, जिसे हर परिस्थिति में जलाए रखना है।

अमृत की खोज बाहर नहीं, जीवन के भीतर भी

समुद्र मंथन का प्रसंग केवल देवताओं और असुरों के संघर्ष की कथा नहीं, बल्कि भारतीय दर्शन में निरंतर प्रयास, धैर्य और आत्ममंथन का भी प्रतीक है। मंथन से विष भी निकला और अमृत भी। इसका संकेत है कि किसी भी बड़ी उपलब्धि के लिए कठिनाइयों और चुनौतियों से गुजरना पड़ता है। मनुष्य के जीवन में भी जब विचारों, कर्मों और दृष्टिकोण का निष्पक्ष मंथन होता है, तभी वास्तविक समृद्धि का मार्ग खुलता है। धनतेरस इसी आत्ममंथन का अवसर है। हम कितना धन अर्जित कर रहे हैं, इससे बड़ा प्रश्न यह है कि हमारा स्वास्थ्य कैसा है, हमारा मन कितना शांत है और हमारी समृद्धि से समाज को कितना लाभ मिल रहा है। प्रकृति की रक्षा, दूसरों के प्रति संवेदना, स्वच्छता और संयम भी आरोग्यपूर्ण जीवन के आधार हैं। धनतेरस पर जब बाजारों में सोने-चांदी की चमक होगी, घरों में नए बर्तन आएंगे और दीपों से आंगन जगमगाएंगे, तब काशी अपने धन्वंतरि कूप के जरिए एक पुराना लेकिन सबसे जरूरी संदेश दोहराएगी—धन जीवन को सुविधा दे सकता है, लेकिन जीवन को सार्थक बनाने के लिए आरोग्य जरूरी है। तिजोरी का धन घट-बढ़ सकता है, लेकिन स्वस्थ शरीर और शांत मन ही वास्तविक संपदा हैं। शायद इसीलिए काशी में धनतेरस केवल धन की आराधना का दिन नहीं, अमृत की कामना का पर्व भी है। यहां दीप केवल घरों में नहीं जलते, वे जीवन के प्रति आस्था और निरोग रहने की आकांक्षा को भी प्रकाशित करते हैं।

धन्वंतरि कूप की खासियत

महामृत्युंजय मंदिर परिसर के तीसरे खंड में स्थित प्राचीन कूप। स्थानीय मान्यता के अनुसार सात घाटों वाले इस कूप के जल की तासीर अलग-अलग है। राजा परीक्षित, नागराज तक्षक और धन्वंतरि से जुड़ा पौराणिक प्रसंग। आरोग्य, आयुर्वेद और जीवन रक्षा की आस्था का प्रमुख केंद्र।

बुलानाला में धन्वंतरि के दर्शन

लगभग 300 वर्ष पुरानी अष्टधातु की प्रतिमा। रजत सिंहासन पर विराजमान लगभग ढाई फुट ऊंचा विग्रह। चार हाथों में अमृत कलश, शंख, चक्र और जोंक। साल में केवल धनतेरस पर सार्वजनिक दर्शन की परंपरा। श्रद्धालु निरोगी जीवन और दीर्घायु की कामना लेकर पहुंचते हैं।

धनतेरस के पांच प्रमुख संदेश

धन से पहले स्वास्थ्य को महत्व दें। भगवान धन्वंतरि से आरोग्य की कामना करें। लक्ष्मी-कुबेर पूजन के साथ सदाचार से धन अर्जित करने का संकल्प लें। यमदीप जलाकर जीवन की रक्षा और दीर्घायु की प्रार्थना करें। मां अन्नपूर्णा की परंपरा से अन्नदान और लोककल्याण का संदेश ग्रहण करें।

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