काली
घटा, मीठी कजरी और झूमता सावन
जब आकाश पर सावन की पहली बदरी उतरती है, तब केवल मौसम नहीं बदलता, भारतीय मानस की धड़कन भी बदल जाती है। मिट्टी की सोंधी गंध, आम की डालियों पर पड़े झूले, आंगन में लौटती बेटियां और चौपालों से उठती कजरी—ये सब मिलकर उस सांस्कृतिक संसार का निर्माण करते हैं, जिसकी जड़ें हजारों वर्षों पुरानी लोक परंपराओं में हैं। आज महानगरों की चकाचौंध और डिजिटल संगीत के शोर के बीच भी कजरी का स्वर इसलिए जीवित है, क्योंकि वह मनुष्य और प्रकृति के बीच के आत्मीय संवाद को बचाए रखता है। कजरी में वर्षा का संगीत है, खेतों की हरियाली है, मायके की स्मृतियां हैं, विरह की नमी है और मिलन की प्रतीक्षा भी। यह लोकगीत भारतीय स्त्री की संवेदनाओं का ऐसा दस्तावेज है, जिसमें परिवार, प्रेम, सामाजिक रिश्ते और ऋतुचक्र एक साथ बोलते हैं। सावन का महीना हमें यह भी याद दिलाता है कि संस्कृति केवल उत्सवों में नहीं, रोजमर्रा के जीवन में बसती है। जिस समाज में पेड़ बचे रहते हैं, वहां झूले बचते हैं; जहां झूले बचते हैं, वहां गीत बचते हैं; और जहां गीत बचते हैं, वहां मनुष्य की संवेदना भी बची रहती है। कजरी का महत्व केवल लोकसंगीत तक सीमित नहीं है। वह हमारी भाषाई विरासत, पर्यावरण चेतना और सामुदायिक जीवन की धड़कन है। सावन की रिमझिम में गूंजती कजरी दरअसल भारतीय संस्कृति का वह हरा स्वर है, जो हर पीढ़ी को उसकी जड़ों से जोड़ता रहता है
सुरेश गांधी
“सावन
के आइल महिनवा, ओ सखी गावा कजरिया...” यह केवल गीत की पंक्ति नहीं, भारतीय लोकजीवन
की सामूहिक स्मृति है। जैसे ही आकाश में काली घटाएं उमड़ती हैं, धरती हरियाली की चूनर
ओढ़ लेती है और रिमझिम फुहारें हवाओं में घुलती हैं, वैसे ही लोकमानस के भीतर एक अनकहा
संगीत जाग उठता है। यही संगीत कजरी बनकर गांवों की चौपालों, आंगनों, बगीचों और मंदिरों
में गूंजता है। सावन केवल ऋतु परिवर्तन नहीं, संवेदना का पुनर्जन्म है; और कजरी उसकी
सबसे मधुर अभिव्यक्ति। भारतीय लोक परंपरा में कजरी को ‘लोकगीतों की रानी’
कहा गया है। यह गीत भर नहीं, बल्कि स्त्री मन की धड़कनों, स्मृतियों, विरह, श्रृंगार,
प्रतीक्षा और मिलन की आकांक्षाओं का जीवंत दस्तावेज है। यही कारण है कि समय बदल गया,
संगीत के स्वरूप बदल गए, मंच और माध्यम बदल गए, पर कजरी की आत्मा आज भी अक्षुण्ण है।
कजरी का एक महत्वपूर्ण पक्ष उसका सामूहिक
स्वर है। गांव की चौपाल में जब स्त्रियां गोल घेरा बनाकर गाती हैं, तब वहां केवल संगीत
नहीं होता, सामाजिक एकता भी जन्म लेती है। बुजुर्गों की स्मृतियां, युवतियों की हंसी
और बच्चों की उत्सुकता—सब एक ही लोकधुन में बंध जाते हैं। यही
भारतीय लोकसंस्कृति की सबसे बड़ी शक्ति है। सावन का संबंध प्रकृति से भी उतना ही गहरा
है जितना शिव से। हरियाली, वर्षा, नदी, वृक्ष और मिट्टी—ये
सब शिव के पंचतत्व की याद दिलाते हैं। कजरी बार-बार खेतों, मेड़ों, आम्रवनों और पोखरों
का उल्लेख करती है। वह अनकहे ढंग से मनुष्य को प्रकृति के प्रति कृतज्ञ होना सिखाती
है। आज जब पर्यावरण संकट गहराता जा रहा है, तब लोकगीतों की यह चेतना और भी मूल्यवान
हो जाती है।
काशी, मिर्जापुर, भदोही और पूर्वांचल
के अनेक अंचलों में आज भी ‘कजरी दंगल’ आयोजित होते हैं। रात भर लोकगायक शिव,
गंगा और सावन पर आधारित कजरियां सुनाते हैं। कहीं भोलेनाथ को प्रिय बेलपत्र का वर्णन
होता है, कहीं गंगाजल की महिमा, तो कहीं काशी की महत्ता का गायन। शास्त्रीय संगीत के
मंचों पर राग मल्हार जिस भाव को जगाता है, वही भाव लोकजीवन में कजरी जगाती है। सावन
में शिव और शक्ति की आराधना साथ-साथ चलती है। नवविवाहिताएं मायके आकर झूला झूलती हैं,
मेहंदी रचाती हैं और शिव-पार्वती के अखंड दांपत्य का स्मरण करती हैं। उनके गीतों में
मनुहार भी होती है और मंगलकामना भी—
“गौरा
संग बैठे शंकर, बरसे अंबर पानी...”
यह लोककाव्य भारतीय परिवार व्यवस्था की
सांस्कृतिक जड़ों को भी सींचता है। आधुनिकता के इस तीव्र दौर में बहुत कुछ बदल गया
है। मोबाइल की धुनों ने चौपाल की आवाज़ को दबाया है, पर सावन आते ही लोकस्मृति फिर
जाग उठती है। मंदिरों के बाहर, गांवों की पगडंडियों पर, कांवड़ यात्राओं में और गंगा
तट की संध्याओं में कजरी आज भी सुनाई देती है। इसका अर्थ है कि हमारी सांस्कृतिक धड़कन
अभी जीवित है। कजरी हमें सिखाती है कि भक्ति केवल मंदिर की दीवारों के भीतर नहीं रहती;
वह खेतों की मेड़ पर भी गाती है, झूले की पींग पर भी झूमती है और बरसात की बूंदों में
भी टपकती है। सावन का वास्तविक सौंदर्य इसी संगम में है—प्रकृति,
लोक और शिवभक्ति के संगम में।
जब सावन लौटता है, बेटियां भी लौटती हैं
सावन का महीना भारतीय परिवार व्यवस्था
में भावनाओं का महीना है। यह वह समय है जब विवाहित बेटियां मायके आती हैं। झूले की
पींगें केवल खेल नहीं रहतीं, वे रिश्तों की मिठास और बचपन की स्मृतियों को फिर से जीवित
कर देती हैं। मां की गोद के बाद यदि किसी चीज़ में सबसे अधिक सुकून है तो वह झूला है।
यही कारण है कि सावन आते ही गांवों में पेड़ों पर झूले पड़ते हैं और उनके साथ गूंज
उठती है कजरी—
“रिमझिम
बरसेले बदरिया, गुइयां गावेले कजरिया...”
यह गीत बारिश का वर्णन भर नहीं करता;
इसमें भीगती धरती के साथ भीगता मन भी शामिल होता है।
कजरी : लोकसंगीत की अनुपम विधा
उत्तर भारत में कजरी की अनेक शैलियां
प्रचलित हैं, जिनमें तीन प्रमुख रूप विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
1.
बनारसी कजरी : बोलों
में ठेठपन, टेक में खिंची हुई तान और बनारसी लोकभाषा की मिठास इसकी पहचान है।
“पिया
सड़िया लियाइब न, जेवना ना बनइबा...”
2.
मिर्जापुरी कजरी : मंचीय
प्रस्तुति में अत्यंत लोकप्रिय। इसमें सावन की मस्ती, देवर-भाभी और ननद-भाभी की चुटकी
तथा लोक हास्य का सुंदर मेल मिलता है।
3.
गोरखपुरी कजरी : “हरे रामा”,
“ऐ हारी” जैसी टेक वाली कजरी, जो प्रायः राधा-कृष्ण के प्रसंगों से
जुड़ी होती है। इन विविध रूपों के बावजूद कजरी की मूल संवेदना एक ही है—सावन
के बहाने मन की बात कहना।
मिथिला से मथुरा तक एक ही लोकधुन
कजरी केवल पूर्वांचल की संपत्ति नहीं
है। मिथिला में हिंडोले पर बैठकर गाए जाने वाले मल्हार, राजस्थान की तीज के गीत और
मथुरा की झूलन लीलाएं उसी लोकधारा के विभिन्न रूप हैं। मथुरा में राधा-कृष्ण के झूला
उत्सव के समय गाई जाने वाली पंक्तियां लोक और भक्ति के अद्भुत संगम का उदाहरण हैं—
“कान्हा
हंसि-हंसि बोली बोलड़, ऊ तो करइ ठिठोली ना...”
यहां सावन केवल प्रकृति नहीं, प्रेम का
उत्सव बन जाता है।
विरह की भीगी हुई आवाज़
कजरी का सबसे मार्मिक पक्ष उसका विरह
है। झमाझम वर्षा हो रही है, सहेलियां झूला झूल रही हैं, पर परदेश गया प्रियतम नहीं
लौटा। तब नवविवाहिता की आंखों से बूंदों की तरह आंसू झरते हैं—
“करूं
कौन जतन अरी सखी, मोरे नयनों से बरसे बदरिया...”
लोकगीत की यही शक्ति है कि वह निजी पीड़ा
को सामूहिक अनुभव बना देता है। हर सुनने वाले को लगता है कि यह गीत उसी के मन से निकला
है।
कजरी अखाड़े : जीवित लोक विश्वविद्यालय
पूर्वी उत्तर प्रदेश के गांवों में आज
भी ‘कजरी अखाड़े’ लोक परंपरा के जीवंत केंद्र हैं। गुरुपूजन
से इनका प्रारंभ होता है। कजरी रचने वाले गुरु अपनी रचनाएं लिखित नहीं, मौखिक रूप से
शिष्यों को सौंपते हैं। यह परंपरा केवल गायन नहीं, स्मृति, अनुशासन और सांस्कृतिक उत्तराधिकार
का अद्भुत उदाहरण है। यहां प्रतिस्पर्धा भी होती है, पर वह कला की प्रतिष्ठा के लिए
होती है, अहंकार के लिए नहीं।
मंदिरों में झूलन और भक्ति की कजरी
सावन में श्रीकृष्ण को झूले में बैठाकर
झूलन उत्सव मनाया जाता है। भक्त प्रेमरस से भीगी कजरियां गाते हुए उन्हें झुलाते हैं—
“कान्हा
हंसि-हंसि बोलें, बोड़ऊ तो करैं ठिठोली ना...”
इस क्षण कजरी लोकगीत से आगे बढ़कर भक्ति
का माध्यम बन जाती है। श्रृंगार और अध्यात्म यहां एक-दूसरे में विलीन हो जाते हैं।
पर्यावरण चेतना की लोकधुन
कजरी में केवल प्रेम नहीं, प्रकृति के
प्रति गहरा अनुराग भी है। खेत, मेड़, आम्रवन, पीपल, बरगद, पोखर और वर्षा—ये
सब इसके स्थायी पात्र हैं। जब गीत कहता है—
“मोर
सवरिया भीजै न, ओही धनियां की कियरिया...”
तो उसमें खेत की हरियाली और अन्न की चिंता
भी शामिल होती है। इस अर्थ में कजरी लोक पर्यावरण का गीत है। वह मनुष्य और प्रकृति
के सहजीवी संबंध की स्मृति को बचाए रखती है।
स्वतंत्रता संग्राम की हुंकार भी बनी कजरी
लोकधुनें केवल प्रेमगीत नहीं गातीं; वे
समय की आवाज़ भी बनती हैं। स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में कजरी ने जनजागरण का रूप लिया—
“हरे
रामा सुभाष चन्द्र ने फौज सजाई रे हारी...”
यह बताता है कि लोकसंगीत जनता की चेतना
से कितना गहरे जुड़ा होता है।
धुनमुनिया : नृत्य और गीत का अद्भुत मेल
अवध और इलाहाबाद अंचल में कजरी केवल गाई
नहीं जाती, ‘खेली’ भी जाती है। ‘धुनमुनिया’
शैली में महिलाएं अर्धवृत्त बनाकर झुक-झुक कर नृत्य करती हैं। ढोलक की थाप, सामूहिक
स्वर और लयबद्ध देहभंगिमाएं मिलकर ऐसा दृश्य रचती हैं जिसमें सावन स्वयं नाचता हुआ
प्रतीत होता है।
कचौड़ी गली से रंगून तक : लोकस्मृति का
विस्तार
लोकगीत जीवन की घटनाओं को इतिहास की तरह
सहेज लेते हैं। बनारस की प्रसिद्ध कजरी—
“कचौड़ी
गली सून कइले बलमू, पिया चलि गइले रंगून हो...”
प्रवास, बिछोह और आर्थिक विवशता की कथा
कहती है। यह गीत बताता है कि लोकसाहित्य केवल मनोरंजन नहीं, समाज का संवेदनात्मक अभिलेख
है।
आधुनिकता के बीच भी जीवित है कजरी
उपभोक्तावादी चमक-दमक और डिजिटल मनोरंजन
के इस दौर में कजरी का स्वर भले कुछ सीमित हुआ हो, पर उसका महत्व कम नहीं हुआ। वह आज
भी गांवों की चौपालों, श्रावणी मेलों, मंदिरों और पारिवारिक उत्सवों में सांस ले रही
है। जब भी सावन की पहली बारिश पड़ती है, लोकमन के भीतर कोई पुराना स्वर जाग उठता है।
कजरी हमें याद दिलाती है कि संस्कृति केवल संग्रहालयों में नहीं रहती; वह लोगों की
बोली, स्मृति और गीतों में जीवित रहती है।
हरियाली रहेगी तो कजरी भी रहेगी
आज आवश्यकता केवल कजरी को सुनने की नहीं,
उसे समझने और बचाने की है। यह हमारी भाषाई विविधता, स्त्री अनुभव, लोकसंगीत और पर्यावरणीय
चेतना की साझा धरोहर है। जिस दिन गांवों से झूले गायब हो जाएंगे, पेड़ों की छाया कम
हो जाएगी और सावन केवल कैलेंडर की तारीख बनकर रह जाएगा, उस दिन कजरी का स्वर भी क्षीण
पड़ जाएगा। लेकिन अभी भी जब कहीं से यह पंक्ति सुनाई देती है—
“रिमझिम
बरसेले बदरिया, गुइयां गावेले कजरिया...”
तो लगता है कि भारतीय मानस की हरियाली
अब भी सुरक्षित है। कजरी तब तक जीवित रहेगी, जब तक धरती पर सावन उतरता रहेगा, पेड़ों
पर झूले पड़ते रहेंगे, बेटियां मायके लौटती रहेंगी और मनुष्य प्रकृति से अपना संवाद
बनाए रखेगा। यही कजरी का सौंदर्य है, यही उसका शाश्वत लोकगीतत्व।
रिमझिम बरसे बदरिया, कजरी गावे बनारस
सावन की पहली बूंद जब धरती को छूती है,
तब केवल मिट्टी ही नहीं महकती, भारतीय आत्मा भी भीग उठती है। मंदिरों की घंटियां, गंगा
तट पर गूंजता ‘हर-हर महादेव’, कांवड़ियों की पदयात्रा और गांवों में
उठती कजरी की तान—ये सब मिलकर श्रावण को एक अद्भुत आध्यात्मिक
उत्सव बना देते हैं। उत्तर भारत में सावन केवल ऋतु नहीं, शिव का महीना है; और कजरी
केवल लोकगीत नहीं, उस भक्ति का सहज संगीत है जो बिना शास्त्र पढ़े भी सीधे हृदय तक
पहुंचती है। काशी में कहा जाता है कि सावन आते ही स्वयं भोलेनाथ अपने भक्तों के बीच
उतर आते हैं। भोर में विश्वनाथ धाम की आरती, गंगा किनारे दीपों की झिलमिलाहट और संध्या
में लोकगायकों की कजरियां—यह दृश्य किसी जीवित संस्कृति का महोत्सव
लगता है। यहां भक्ति और लोकजीवन अलग-अलग धाराएं नहीं, एक ही नदी के दो किनारे हैं।
कजरी की मूल संवेदना स्त्री मन से जुड़ी मानी जाती है, किंतु सावन में उसका स्वर शिवभक्ति
से भी भर उठता है। गांवों में महिलाएं झूला झूलते हुए गाती हैं—
“भोला
बाबा आइहें नगरी, सजि गइल काशी धाम...”
इन पंक्तियों में श्रृंगार नहीं, स्वागत है; विरह नहीं, दर्शन की आकांक्षा है। लोकधुन यहां आराधना बन जाती है। श्रावण सोमवारों का दृश्य अपने आप में अद्वितीय होता है। गेरुए वस्त्रों में कांवड़िए गंगाजल लेकर शिवालयों की ओर बढ़ते हैं। उनके कदमों की लय और दूर कहीं बजती ढोलक पर उठती कजरी एक अद्भुत ताल रचती है। ऐसा लगता है मानो पूरा समाज एक साथ ‘बोल बम’ की धुन में चल पड़ा हो। जब तक श्रावण की बदरियां धरती पर उतरती रहेंगी, गंगा बहती रहेगी, काशी में ‘हर-हर महादेव’ गूंजता रहेगा और गांवों में कजरी की तान उठती रहेगी, तब तक भारतीय संस्कृति की यह हरित धारा कभी सूखेगी नहीं। कजरी सावन की आत्मा है और सावन शिव की मुस्कान; दोनों मिलकर भारतीय लोकजीवन को हर वर्ष फिर से पवित्र, प्राणवान और आनंदमय बना देते हैं।




















