फागुन का
पहला
शंखनाद
रंगभरी एकादशी : शिव की नगरी में उतरता आस्था, प्रेम और परंपरा का विराट रंगोत्सव
सनातन
आस्था
की
शाश्वत
राजधानी
वाराणसी
में
रंगभरी
एकादशी
केवल
पर्व
नहीं,
बल्कि
भगवान
शिव
की
कृपा
से
शुरू
होने
वाला
दिव्य
रंगोत्सव
माना
जाता
है।
धार्मिक
मान्यता
है
कि
महाशिवरात्रि
के
बाद
भगवान
भोलेनाथ
माता
पार्वती
को
अपने
धाम
काशी
लेकर
आते
हैं
और
उसी
दिन
भक्तों
को
रंग
खेलने
की
अनुमति
प्रदान
करते
हैं।
यही
क्षण
काशी
में
आध्यात्मिक
होली
के
औपचारिक
शुभारंभ
का
प्रतीक
बन
जाता
है।
धर्म
और
श्रद्धा
के
केंद्र
काशी
विश्वनाथ
मंदिर
में
इस
दिन
विशेष
पूजन,
भव्य
श्रृंगार
और
पारंपरिक
रंगोत्सव
का
आयोजन
होता
है।
बाबा
विश्वनाथ
को
अबीर-गुलाल
अर्पित
करते
हुए
श्रद्धालु
यह
विश्वास
करते
हैं
कि
शिव
की
कृपा
से
जीवन
में
प्रेम,
सुख
और
समरसता
के
रंग
खिलते
हैं।
मंदिर
परिसर
से
लेकर
काशी
की
संकरी
गलियों
तक
भक्ति,
फाग
गीतों
और
आध्यात्मिक
उल्लास
की
अद्भुत
छटा
दिखाई
देती
है।
साधु-संत,
श्रद्धालु
और
स्थानीय
लोग
शिवमय
वातावरण
में
रंगों
के
साथ
श्रद्धा
का
उत्सव
मनाते
हैं।
रंगभरी
एकादशी
काशी
की
उस
गौरवशाली
परंपरा
का
प्रतीक
है,
जहां
अध्यात्म
लोकजीवन
से
जुड़कर
सांस्कृतिक
विरासत
को
जीवंत
बनाए
रखता
है।
यह
पर्व
केवल
रंगों
का
उत्सव
नहीं
बल्कि
शिव
और
शक्ति
के
दिव्य
मिलन
का
संदेश
देता
है,
जो
काशी
को
सनातन
संस्कृति
की
आध्यात्मिक
धुरी
बनाता
है
सुरेश गांधी
फाल्गुन की मादक बयार
जब धरती पर रंगों
की चादर बिछाने लगती
है, तब भारतीय संस्कृति
का उत्सवी हृदय भी उल्लास
से भर उठता है।
ऋतु परिवर्तन, प्रकृति का श्रृंगार और
मानव जीवन की उमंग,
इन सबके बीच एक
ऐसा पर्व आता है,
जो केवल धार्मिक अनुष्ठान
नहीं बल्कि भारतीय लोकजीवन और आध्यात्मिक चेतना
का विराट उत्सव बन जाता है।
मतलब साफ है रंगभरी
एकादशी केवल एक धार्मिक
पर्व नहीं बल्कि भारतीय
जीवनदर्शन का जीवंत प्रतीक
है। यह पर्व हमें
यह सिखाता है कि जीवन
में रंग तभी आते
हैं जब श्रद्धा, प्रेम
और उत्साह का संगम होता
है। जो काशी में
फागोत्सव की पहली आधिकारिक
दस्तक मानी जाती है।
इस दिन संपूर्ण वाराणसी
शिवमय हो उठती है।
मंदिरों की घंटियां, डमरू
की थाप, वैदिक मंत्रों
की ध्वनि और गुलाल की
उड़ती रंगत इस नगरी
को एक ऐसे आध्यात्मिक
रंगोत्सव में बदल देती
है, जिसमें श्रद्धा और आनंद एक
साथ प्रवाहित होते हैं।

यह शिव-पार्वती
के दिव्य मिलन, सामाजिक समरसता, लोकसंस्कृति और आध्यात्मिक चेतना
का अनूठा उत्सव है। पूरे शहर
की आत्मा में रंग, भक्ति
और उल्लास भर देता है।
इस दिन बाबा का
दरबार विशेष रूप से सजाया
जाता है और काशी
विश्वनाथ मंदिर में भक्तों का
सैलाब उमड़ पड़ता है।
श्रद्धालु बाबा को अबीर-गुलाल अर्पित करते हैं और
आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। मंदिर
परिसर में भक्तिरस और
उत्सव का ऐसा संगम
दिखाई देता है, जो
काशी की सांस्कृतिक पहचान
बन चुका है। काशी
में मनाया जाने वाला यह
उत्सव भारतीय संस्कृति की उस विरासत
का प्रतीक है, जो पीढ़ी
दर पीढ़ी आस्था, उल्लास
और समरसता का संदेश देती
चली आ रही है।
यह पर्व भारतीय संस्कृति
में विवाह के बाद बेटी
के मायके से ससुराल विदाई
की भावनाओं को भी दर्शाता
है, जिससे यह उत्सव धार्मिक
होने के साथ-साथ
सामाजिक संवेदनाओं से भी जुड़
जाता है। काशी में
इस दिन हर गलियारा,
हर घाट और हर
मंदिर एक ही संदेश
देता है, जहां शिव
हैं, वहां प्रेम है,
रंग है और अनंत
आनंद है।
शिव-पार्वती के दांपत्य प्रेम का उत्सव
रंगभरी एकादशी का उल्लेख कई
धार्मिक ग्रंथों और पुराणों में
मिलता है। धार्मिक मान्यतानुसार,
रंगभरी एकादशी का मूल भाव
भगवान भगवान शिव और उनकी
अर्धांगिनी माता पार्वती के
दांपत्य प्रसंग से जुड़ा हुआ
है। लोक मान्यताओं के
अनुसार महाशिवरात्रि के दिन विवाह
के पश्चात रंगभरी एकादशी को माता पार्वती
का गौना होता है
और इसी दिन शिव
उन्हें पहली बार काशी
लेकर आते हैं। यह
प्रसंग केवल धार्मिक कथा
नहीं बल्कि भारतीय पारिवारिक परंपराओं का सांस्कृतिक प्रतिबिंब
भी है। बेटी के
गौना की भावनाएं, मायके
से विदाई का स्नेह और
वैवाहिक जीवन का मंगल
आरंभ, इन सबका प्रतीक
यह उत्सव बन जाता है।
काशी में इस दिन
बाबा विश्वनाथ को दूल्हे के
रूप में सजाया जाता
है। माता गौरा को
नववधू के रूप में
श्रृंगारित कर पालकी यात्रा
निकाली जाती है। श्रद्धालु
इस दिव्य युगल का स्वागत
गुलाल और फूलों से
करते हैं। यही वह
अवसर होता है जब
काशी में भगवान शिव
भक्तों के साथ रंग
और गुलाल से होली खेलते
हैं। धार्मिक दृष्टि से यह पर्व
दांपत्य जीवन की मधुरता,
प्रेम और सामाजिक समरसता
का प्रतीक माना जाता है।
यह पर्व भगवान विष्णु
की उपासना से भी जुड़ा
हुआ है क्योंकि इसे
आमलकी एकादशी भी कहा जाता
है। इस दिन आंवले
के वृक्ष की पूजा का
विशेष विधान है। धार्मिक ग्रंथों
में आंवले को देवताओं का
निवास स्थान बताया गया है।

तिथि, मुहूर्त और दुर्लभ योगों का अद्भुत महासंयोग
फाल्गुन मास की शुक्ल
पक्ष एकादशी का पर्व केवल
धार्मिक आस्था का ही नहीं
बल्कि ज्योतिषीय दृष्टि से भी अत्यंत
शुभ और दुर्लभ माना
जाता है। रंगों और
आध्यात्मिक उल्लास से सराबोर यह
पावन तिथि काशी में
विशेष रूप से महत्त्व
रखती है, जहां भगवान
काशी विश्वनाथ मंदिर में यह पर्व
उत्साह, भक्ति और पारंपरिक वैभव
के साथ मनाया जाता
है। इस वर्ष रंगभरी
एकादशी कई शुभ योगों
के संयोग से अत्यंत फलदायी
और सिद्धिदायक मानी जा रही
है, जो इसे सामान्य
धार्मिक तिथि से कहीं
अधिक दिव्य बना देती है।
तिथि और काल गणना
हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन
शुक्ल एकादशी तिथि का आरंभ:
27 फरवरी को रात्रि 12.33 बजे
से है. तिथि का
समापन: 27 फरवरी को रात्रि 10.32 बजे
है. उदयातिथि के अनुसार यह
व्रत और पर्व 27 फरवरी
शुक्रवार को मनाया जाएगा।
रंगभरी एकादशी को आमलकी एकादशी
भी कहा जाता है
क्योंकि इस दिन भगवान
विष्णु के साथ आंवले
के वृक्ष की पूजा का
विशेष महत्व माना जाता है।
इस वर्ष के चार महाशुभ योग
इस बार रंगभरी
एकादशी पर चार दुर्लभ
और अत्यंत शुभ योग बन
रहे हैं, जो आध्यात्मिक
साधना और शुभ कार्यों
के लिए अत्यंत फलदायी
माने जाते हैं।
1. रवि योग: प्रातः 06.48 बजे से 10.48 बजे
तक: यह योग नकारात्मक
शक्तियों को समाप्त करने
वाला माना जाता है
और किसी भी शुभ
कार्य की शुरुआत के
लिए अत्यंत श्रेष्ठ होता है।
2. सर्वार्थ सिद्धि
योग:
प्रातः 10.48 बजे से प्रारंभ
होकर 28 फरवरी सुबह 06.47 बजे तक है.
यह योग नाम के
अनुरूप सभी कार्यों को
सफल बनाने वाला माना जाता
है। धार्मिक अनुष्ठान, दान, पूजन और
संकल्प इस योग में
विशेष फल प्रदान करते
हैं।
3. आयुष्मान योग:
प्रातः काल से लेकर
शाम 07.44 बजे तक: यह
योग आयु वृद्धि, स्वास्थ्य
और मानसिक शांति प्रदान करने वाला माना
जाता है।
4. सौभाग्य योग:
शाम 07.44 बजे के बाद
प्रारंभ, यह योग वैवाहिक
सुख, समृद्धि और पारिवारिक मंगल
का प्रतीक माना जाता है।
पूजा और व्रत के विशेष शुभ मुहूर्त
ब्रह्म
मुहूर्त:
सुबह 05.17 बजे से 06.05 बजे
तक, यह समय ध्यान,
जप और आध्यात्मिक साधना
के लिए अत्यंत पवित्र
माना जाता है।
पूजा
का
श्रेष्ठ
समय:
सुबह 06.48 बजे से 11.08 बजे
तक, इस अवधि में
भगवान विष्णु, शिव और माता
पार्वती की पूजा करना
अत्यंत शुभ माना गया
है।
लाभ-उन्नति
मुहूर्त:
सुबह 08.15 बजे से 09.41 बजे
तक, धन, व्यापार और
करियर से जुड़ी कामनाओं
के लिए यह समय
अत्यंत शुभ माना जाता
है।
अमृत
सर्वाेत्तम
मुहूर्त:
सुबह 09.41 बजे से 11.08 बजे
तक, यह मुहूर्त सर्वश्रेष्ठ
और अत्यंत फलदायी माना जाता है।
इस समय की गई
पूजा विशेष रूप से सिद्धिदायक
मानी जाती है।
अभिजीत
मुहूर्त:
दोपहर 12.16 बजे से 01.02 बजे
तक, अभिजीत मुहूर्त को विजय और
सफलता का प्रतीक माना
जाता है।
राहुकाल:
दोपहर के पूर्व पूजा
पूर्ण करना श्रेष्ठ माना
गया है क्योंकि इसके
बाद राहुकाल प्रारंभ हो जाता है,
जिसमें शुभ कार्य वर्जित
माने जाते हैं।
व्रत
पारण
का
शुभ
समय:
रंगभरी एकादशी व्रत का पारण:
28 फरवरी, शनिवार सुबह 06.47 बजे से 09.06 बजे
तक है.
द्वादशी
तिथि
का
समापन:
रात्रि 08.43 बजे, धार्मिक मान्यता
के अनुसार पारण द्वादशी तिथि
समाप्त होने से पूर्व
करना अत्यंत आवश्यक माना गया है।
मणिकर्णिका घाट: जीवन और मृत्यु का अद्भुत दर्शन
रंगभरी एकादशी का सबसे रहस्यमयी
और आध्यात्मिक स्वरूप अनादि तीर्थ मणिकर्णिका घाट पर देखने
को मिलता है। यह वह
स्थान है जहां जीवन
और मृत्यु का दर्शन एक
साथ होता है। यह
घाट भारतीय दर्शन का जीवंत प्रतीक
है, जहां जलती चिताओं
के बीच भक्त भस्म
और गुलाल से होली खेलते
हैं। यह दृश्य मानव
जीवन के उस शाश्वत
सत्य को प्रकट करता
है कि मृत्यु अंत
नहीं, बल्कि आत्मा की यात्रा का
एक पड़ाव है। लोक
मान्यता है कि देवताओं
के साथ होली खेलने
के बाद शिव अपने
गणों, भूत, प्रेत और
पिशाच, के साथ भस्म
होली खेलते हैं। यह शिव
के समभाव और अघोर दर्शन
का प्रतीक माना जाता है।
आमलकी पूजा का आध्यात्मिक महत्व
रंगभरी एकादशी को आमलकी एकादशी
भी कहा जाता है।
इस दिन आंवले के
वृक्ष की पूजा का
विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यता
के अनुसार, आंवले के मूल में
भगवान विष्णु का निवास माना
जाता है, मध्य भाग
में भगवान रुद्र, शीर्ष भाग में ब्रह्मा.
इस दिन वृक्ष की
पूजा, दीपदान और परिक्रमा करने
से पापों का नाश और
सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती
है।
काशी की परंपरा: रंगों में रचा-बसा आध्यात्मिक उत्सव
काशी में रंगभरी
एकादशी केवल धार्मिक अनुष्ठान
नहीं बल्कि लोकजीवन का उत्सव बन
जाती है। इस दिन
पूरी वाराणसी शिवमय हो जाती है।
बाबा विश्वनाथ के दरबार में
माता पार्वती का विशेष श्रृंगार
किया जाता है। मंदिर
परिसर में भक्त अबीर-गुलाल अर्पित करते हैं और
भजन-कीर्तन से पूरा वातावरण
शिवमय हो जाता है।
श्रद्धालु अनादि तीर्थ मणिकर्णिका घाट सहित विभिन्न
घाटों पर स्नान और
पूजन करते हैं। इस
दिन भगवान शिव माता पार्वती
का गौना कर भक्तों
के साथ होली खेलते
हैं। यही परंपरा काशी
में फागोत्सव की औपचारिक शुरुआत
मानी जाती है।
होली उत्सव की आधिकारिक शुरुआत
काशी में रंगभरी
एकादशी को होली उत्सव
की औपचारिक शुरुआत माना जाता है।
यह पर्व केवल धार्मिक
आस्था तक सीमित नहीं
बल्कि सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक एकता
का भी प्रतीक है।
इस दिन काशी की
गलियां, फाग गीतों से
गूंज उठती हैं. मंदिरों
में विशेष उत्सव आयोजित होते हैं. साधु-संतों और श्रद्धालुओं के
बीच रंगोत्सव मनाया जाता है.
सामाजिक और सांस्कृतिक आयाम
रंगभरी एकादशी काशी की जीवंत
लोकसंस्कृति को भी प्रदर्शित
करती है। यह पर्व
परिवारिक संबंधों को मजबूत करता
है. समाज में प्रेम
और सौहार्द का संदेश देता
है. सांस्कृतिक परंपराओं को जीवंत बनाए
रखता है. काशी की
परंपरा में यह पर्व
महिलाओं के लिए विशेष
महत्व रखता है। माता
पार्वती के गौना की
परंपरा नारी सम्मान और
वैवाहिक जीवन की मधुरता
का प्रतीक मानी जाती है।
आध्यात्मिक संदेश और जीवन दर्शन
रंगभरी एकादशी केवल रंगों का
उत्सव नहीं बल्कि जीवन
दर्शन का भी प्रतीक
है। यह पर्व सिखाता
है कि जीवन में
प्रेम और समरसता आवश्यक
है. आध्यात्मिक साधना मानसिक शांति प्रदान करती है. सामाजिक
एकता ही संस्कृति की
शक्ति है.
व्रत और पूजा विधि
इस दिन श्रद्धालु
प्रातः स्नान कर व्रत का
संकल्प लेते हैं। पूजा
में भगवान विष्णु और शिव की
आराधना, आंवले के वृक्ष की
पूजा, दान और भजन
विशेष फलदायी माना जाता है।
ज्योतिषीय दृष्टि से विशेष महत्व
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस
दिन किया गया व्रत,
आयु वृद्धि करता है. दांपत्य
जीवन में सुख देता
है. आर्थिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त
करता है. मानसिक शांति
प्रदान करता है. पापों
का नाश करता है.
स्वास्थ्य और आयु में
वृद्धि करता है. पितरों
की मुक्ति का मार्ग प्रशस्त
करता है.
आध्यात्मिक ऊर्जा और सामाजिक उल्लास का संगम
रंगभरी एकादशी काशी की उस
सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है
जहां धर्म, अध्यात्म और लोकजीवन एक
साथ प्रवाहित होते हैं। यह
पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान
नहीं बल्कि जीवन में रंग,
प्रेम और आध्यात्मिक ऊर्जा
भरने का संदेश देता
है।
परंपरा, संस्कृति और आधुनिकता का संतुलन
आज के तेजी
से बदलते सामाजिक परिवेश में रंगभरी एकादशी
जैसे पर्व भारतीय संस्कृति
की जड़ों को मजबूत
करने का कार्य कर
रहे हैं। यह पर्व
हमें याद दिलाता है
कि आधुनिकता के साथ परंपराओं
का संतुलन बनाए रखना आवश्यक
है। काशी की यह
परंपरा केवल धार्मिक उत्सव
नहीं बल्कि भारतीय सांस्कृतिक पहचान का जीवंत प्रतीक
है।
रंगों में समाहित अध्यात्म का उत्सव
रंगभरी एकादशी केवल एक धार्मिक
तिथि नहीं बल्कि जीवन
के रंगों को समझने और
उन्हें आध्यात्मिक ऊर्जा से जोड़ने का
अवसर है। जब शिव
और शक्ति का मिलन रंगों
के माध्यम से अभिव्यक्त होता
है, तब यह पर्व
जीवन में प्रेम, संतुलन
और समरसता का संदेश देता
है। काशी की यह
परंपरा सदियों से भारतीय संस्कृति
की जीवंतता और आध्यात्मिक समृद्धि
का प्रतीक बनी हुई है।
राजशाही स्वरूप और पालकी यात्रा की परंपरा
रंगभरी एकादशी का सबसे आकर्षक
दृश्य बाबा विश्वनाथ की
राजसी पालकी यात्रा होती है। पूर्व
महंत आवास से बाबा
की चल प्रतिमा राजसी
वेशभूषा में नगर भ्रमण
के लिए निकलती है।
माता गौरा की पालकी
यात्रा के दौरान भक्त
मंगल गीत गाते हैं
और गुलाल उड़ाते हैं। इस परंपरा
को काशी की जीवंत
सांस्कृतिक धरोहर माना जाता है,
जो सदियों से चली आ
रही है।
पौराणिक कथा और आध्यात्मिक विश्वास
रंगभरी एकादशी से जुड़ी एक
प्राचीन कथा राजा चित्रसेन
से संबंधित है। कहा जाता
है कि राजा एकादशी
व्रत के अत्यंत श्रद्धालु
थे। एक बार शिकार
के दौरान डाकुओं ने उन पर
हमला किया। तभी भगवान की
कृपा से राजा के
शरीर से दिव्य शक्ति
प्रकट हुई और दुष्टों
का संहार कर दिया। यह
कथा इस व्रत की
आध्यात्मिक शक्ति और श्रद्धा के
महत्व को दर्शाती है।