Monday, 30 March 2026

डर का नैरेटिव और लोकतंत्र की कसौटी : जब सियासत ‘थाली’ तक सिमटने लगे

डर का नैरेटिव और लोकतंत्र की कसौटी : जब सियासत ‘थाली तक सिमटने लगे 

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का यह बयान कि भाजपा के सत्ता में आने पर मुसलमानों के खान-पान पर रोक लग जाएगी, सियासी गलियारों में एक नई बहस छिड़ गयी है। लेकिन जब इस दावे को उत्तर प्रदेश, दिल्ली, गुजरात और मध्य प्रदेश, उत्तराखंड जैसे भाजपा शासित राज्यों की हकीकत से परखा जाता है, तो तस्वीर अलग नजर आती है। कहीं भी समुदाय विशेष के खान-पान पर ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं दिखता। ऐसे में बड़ा सवाल तो यही है, क्या यह बयान तथ्य है या फिर चुनावी रणनीति के तहत गढ़ा गया डर? क्या वोट बैंक की राजनीति में सच बार-बार हाशिए पर धकेला जा रहा है? अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव और राहुल गांधी जैसे नेताओं पर भी समय-समय पर ऐसे ही आरोप लगते रहे हैं 

सुरेश गांधी

भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती उसकी विविधता में हैभाषा, संस्कृति, खान-पान, परंपराएंसब मिलकर इस देश की आत्मा गढ़ते हैं। लेकिन जब यही विविधता राजनीतिक विमर्श का हथियार बन जाए, तो चिंता स्वाभाविक है। हाल ही में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का यह बयान कि “यदि भाजपा सत्ता में आई तो मुसलमान मांस, मछली और मुर्गा नहीं खा पाएंगे, इसी चिंता को गहराता है। यह कोई साधारण राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि एक ऐसा कथन है जो सीधे तौर पर लोगों की जीवनशैली, उनके अधिकार और उनकी पहचान से जुड़ा हुआ है। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि इस बयान को भावनाओं के बजाय तथ्यों की कसौटी पर कसा जाए।

किसी भी दावे की विश्वसनीयता उसके प्रमाणों से तय होती है। यदि यह कहा जाए कि एक राजनीतिक दल सत्ता में आने पर किसी समुदाय विशेष के खान-पान पर रोक लगा देगा, तो इसका परीक्षण उन राज्यों से शुरू होना चाहिए जहां वह दल पहले से शासन में है। उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों में वर्षों से भाजपा की सरकारें हैं। इन राज्यों में कहीं भी ऐसा कोई कानूनी प्रावधान नहीं है जो किसी एक धर्म के लोगों को मांसाहार से रोकता हो। हाँ, अवैध बूचड़खानों के खिलाफ कार्रवाई हुई है, स्वच्छता और लाइसेंसिंग के नियमों को सख्ती से लागू किया गया है, और कुछ धार्मिक अवसरों पर स्थानीय स्तर पर अस्थायी प्रतिबंध भी लगाए गए हैं। लेकिन इन सभी का आधार प्रशासनिक और कानूनी हैन कि धार्मिक या सामुदायिक।

यह अंतर समझना महत्वपूर्ण हैकानून व्यवस्था बनाए रखना और किसी समुदाय को लक्षित करना, दोनों अलग-अलग बातें हैं। भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। खान-पान की स्वतंत्रता भी इसी दायरे में आती है। ऐसे में यह कल्पना करना कि कोई सरकार खुले तौर पर किसी एक समुदाय को भोजन से वंचित कर देगी, न केवल असंवैधानिक है बल्कि व्यवहारिक रूप से भी असंभव है। अगर वास्तव में ऐसा कोई प्रयास होता, तो देश की न्यायपालिका, मीडिया और नागरिक समाज तत्काल सक्रिय हो जाते। अदालतों में याचिकाओं की बाढ़ आ जाती, राष्ट्रीय बहस छिड़ जाती, और यह मुद्दा अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंच जाता। लेकिन ऐसी कोई स्थिति देखने को नहीं मिलीजो इस पूरे बयान को राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में समझने की आवश्यकता को रेखांकित करती है।

भारतीय राजनीति में “डर कोई नया तत्व नहीं है। कभी यह जातीय असुरक्षा के रूप में सामने आया, कभी धार्मिक पहचान के रूप में, और अब यह जीवनशैली के सवाल तक पहुंच गया है। ममता बनर्जी  का यह बयान उसी परंपरा का विस्तार है, जिसमें एक विशेष वर्ग को यह विश्वास दिलाने की कोशिश की जाती है कि उनका अस्तित्व खतरे में है। यह रणनीति केवल एक दल या एक नेता तक सीमित नहीं है। अखिलेश यादव, तेजशवी यादव और राहुल  गांधी  जैसे नेताओं पर भी समय-समय पर इस तरह की राजनीति करने के आरोप लगते रहे हैं। चुनावी मौसम में यह प्रवृत्ति और तेज़ हो जाती हैजहां तर्क और तथ्य पीछे छूट जाते हैं और भावनाएं आगे आ जाती हैं। लोकतंत्र में वोट हासिल करना हर दल का लक्ष्य होता है। लेकिन सवाल यह है कि उस लक्ष्य को पाने के लिए अपनाए जाने वाले तरीके कितने नैतिक हैं? क्या यह उचित है कि लोगों के मन में भय पैदा कर उन्हें एक दिशा में मतदान करने के लिए प्रेरित किया जाए?

अगर वे आए तो आप खत्म हो जाएंगे”—यह संदेश जितना सरल है, उतना ही खतरनाक भी। यह न केवल समाज को विभाजित करता है, बल्कि लोकतांत्रिक संवाद को भी कमजोर करता है। जब राजनीति डर के इर्द-गिर्द घूमने लगती है, तो असली मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचाये सभी विषय, जो आम नागरिक के जीवन को सीधे प्रभावित करते हैं, धीरे-धीरे चर्चा से बाहर हो जाते हैं। इस तरह के बयान अक्सर तब सामने आते हैं जब सरकारें या नेता अपने प्रदर्शन को लेकर दबाव में होते हैं। ऐसे में भावनात्मक मुद्दों को उछालकर जनमत को प्रभावित करने की कोशिश की जाती है।

आज सूचना का युग हैएक बयान सेकंडों में लाखों लोगों तक पहुंच जाता है। ऐसे में मीडिया और आम नागरिक दोनों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वे तथ्यों की जांच करें और बिना सत्यापन के किसी भी बात को स्वीकार न करें। सोशल मीडिया के इस दौर में अफवाह और तथ्य के बीच की रेखा धुंधली हो गई है। इसलिए सजगता ही सबसे बड़ा हथियार है। भारत का सामाजिक ताना-बाना बहुत संवेदनशील है। यह विविधताओं के बीच संतुलन पर टिका हुआ है। जब इस संतुलन को राजनीतिक लाभ के लिए चुनौती दी जाती है, तो उसका असर दूरगामी होता है। अविश्वास की खाई गहरी होती है, और समाज में विभाजन की रेखाएं स्पष्ट होने लगती हैं।

ममता बनर्जी का बयान केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि लोकतंत्र के लिए एक परीक्षा भी है। यह परीक्षा इस बात की है कि क्या हम भावनाओं के आधार पर निर्णय लेंगे या तथ्यों के आधार पर। भाजपा शासित राज्यों की वास्तविकता इस दावे का समर्थन नहीं करती। संविधान इस तरह की किसी भी संभावना को खारिज करता है। ऐसे में यह स्पष्ट हो जाता है कि यह बयान अधिक राजनीतिक है, कम तथ्यात्मक। जब राजनीति डर के सहारे खड़ी हो, तब सच बोलना ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी सेवा है।

युद्ध के साए में कारपेट इंडस्ट्री, फिर भी वैश्विक पहचान दिलाने की तैयारी

युद्ध के साए में कारपेट इंडस्ट्री, फिर भी वैश्विक पहचान दिलाने की तैयारी 

दिल्ली का बड़ा कालीन मेला टला, आवाजाही पर असर; सीईपीसी ने वर्चुअल प्लेटफॉर्म और नए बाजारों पर फोकस बढ़ाया

दुनिया के बाजारों में भारतीय हुनर की धमक तेज करने की होगी संभव कोशिश

सीईपीसी की 208वीं बैठक मेंकालीन लेबलसे ब्रांडिंग, डीजीएफटी से सीओओ अधिकार की पहल; छोटे निर्यातकों को राहत देने पर मंथन

सुरेश गांधी

वाराणसी. भारतीय हस्तनिर्मित कालीन उद्योग को वैश्विक बाजार में नई ऊंचाई देने की दिशा में कारपेट एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (सीईपीसी) की 208वीं प्रशासनिक समिति (सीओए) की बैठक में बड़े फैसले लिए गए। कैप्टन मुकेश कुमार गोम्बर की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में निर्यात बढ़ाने, ब्रांडिंग मजबूत करने और छोटे कारोबारियों को राहत देने पर विशेष जोर रहा। हाइब्रिड मोड में आयोजित इस बैठक में उपाध्यक्ष असलम महबूब सहित कई और कार्यकारी निदेशक (प्रभार) डॉ. स्मिता नागरकोटी की उपस्थिति में कालीन उद्योग के विकास और निर्यात संवर्धन से जुड़े अहम मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की गई।

बैठक का फोकस भारतीय कालीनों की अंतरराष्ट्रीय पहचान को और सशक्त बनाने पर रहा। सबसे अहम निर्णयकालीन लेबलको व्यापक स्तर पर लागू करने का रहा, जिससे भारतीय कालीनों की गुणवत्ता, प्रामाणिकता और ब्रांड वैल्यू को वैश्विक बाजार में मजबूती मिलेगी। परिषद ने स्पष्ट किया कि यह कदममेड इन इंडियाकालीनों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग पहचान देगा। इसके साथ ही वैश्विक बाजारों में भारतीय कालीनों की पहुंच बढ़ाने के लिए लक्षित प्रचार और ब्रांडिंग अभियान चलाने की रणनीति पर भी सहमति बनी। आगामी अंतरराष्ट्रीय और घरेलू ट्रेड फेयर में प्रभावी भागीदारी के जरिए निर्यातकों के लिए नए अवसर सृजित करने का रोडमैप तैयार किया गया।

बैठक में छोटे निर्यातकों को राहत देने के लिए सदस्यता शुल्क ढांचे की समीक्षा का मुद्दा भी प्रमुखता से उठा। परिषद इस प्रस्ताव को एजीएम में रखकर सरकार से मंजूरी लेगी, ताकि शुल्क को अधिक किफायती बनाया जा सके। इसके अलावा, विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी) से मूल प्रमाण पत्र (सर्टिफिकेट ऑफ ओरिजीन - सीओओ) जारी करने का अधिकार लेने की पहल भी की जाएगी, जिससे निर्यात प्रक्रिया को सरल और तेज बनाया जा सके।

बता दें, वैश्विक स्तर पर जारी युद्ध और तनावपूर्ण हालात का असर अब भारतीय हस्तनिर्मित कालीन उद्योग पर भी साफ दिखाई देने लगा है। अंतरराष्ट्रीय खरीदारों की आवाजाही प्रभावित होने के चलते दिल्ली में आयोजित होने वाला कालीन क्षेत्र का सबसे बड़ा व्यापार मेला स्थगित करना पड़ा है। हालांकि चुनौतियों के इस दौर में भी उद्योग ने उम्मीद नहीं छोड़ी है। सीईपीसी इस संकट से निपटने के लिए वैकल्पिक रास्तों पर गंभीरता से मंथन कर रही है. बैठक में माना गया कि युद्ध के कारण विदेशी खरीदारों का भारत आना कम हुआ है, जिससे प्रत्यक्ष व्यापारिक गतिविधियां प्रभावित हुई हैं। लेकिन इसके समानांतर वर्चुअल मीटिंग्स, ऑनलाइन ट्रेड शो और डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए कारोबार को जारी रखने की रणनीति तैयार की जा रही है। परिषद ने यह भी स्पष्ट किया कि पारंपरिक बाजारों के साथ-साथ नए अंतरराष्ट्रीय बाजारों में पहुंच बढ़ाने पर जोर दिया जाएगा, ताकि निर्यात पर पड़ रहे दबाव को संतुलित किया जा सके।

बैठक के अंत में यह स्पष्ट संदेश दिया गया कि भारतीय कालीन उद्योग को वैश्विक स्तर पर नई पहचान दिलाने और निर्यात को गति देने के लिए परिषद ठोस और निर्णायक कदम उठाने जा रही है। बैठक में भारतीय हस्तनिर्मित कालीनों की वैश्विक स्थिति को मजबूत करने और निर्यातकों को अधिक सहयोग देने के उपायों पर विशेष जोर दिया गया। उद्योग से जुड़े जानकारों का मानना है कि मौजूदा हालात में भले ही प्रत्यक्ष कारोबार की रफ्तार धीमी पड़ी हो, लेकिन डिजिटल और वैकल्पिक माध्यमों के जरिए नए अवसर भी सामने रहे हैं। बैठक में यह संदेश उभरकर आया कि युद्ध का संकट जरूर है और आवाजाही प्रभावित है, लेकिन कारोबार को थामने के लिए नए रास्ते भी खुले हैं, और अब फोकस इन्हीं विकल्पों को मजबूती से अपनाने पर है।

खादी बनेगी रोजगार की नई धुरी, स्वदेशी से सशक्त होगा गांव 

वाराणसी में मंडल स्तरीय खादी सेमिनार, बुनकरों-कतिनों को मिला बढ़ावा

खादी : विचार, विरासत और विकास का सूत्र, रोजगार क्रांति की नई बुनावट : पूनम मौर्या

सुरेश गांधी

वाराणसी. गांव, गरीब और स्वावलंबन की धुरी मानी जाने वाली खादी को नई ऊर्जा देने की दिशा में सोमवार को वाराणसी में एक महत्वपूर्ण पहल देखने को मिली। ऊ.प्र. खादी तथा ग्रामोद्योग बोर्ड, वाराणसी मंडल द्वारा महमूरगंज स्थित होटल वंशी वट बैंक्वेट में मंडल स्तरीय एक दिवसीय खादी सेमिनार का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता जिला पंचायत वाराणसी की माननीय अध्यक्ष श्रीमती पूनम मौर्या ने की, जिसमें खादी के विस्तार, नवाचार और रोजगार सृजन के विविध आयामों पर गंभीर मंथन हुआ। 

सेमिनार में वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि खादी आज केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि भविष्य की आर्थिक आत्मनिर्भरता का मजबूत आधार बन सकती है। बदलते समय के साथ खादी को आधुनिक बाजार, डिज़ाइन और डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया, ताकि युवाओं को इससे जोड़ा जा सके और रोजगार के नए अवसर सृजित हों। 

मुख्य अतिथि श्रीमती पूनम मौर्या ने अपने प्रेरक संबोधन में कहा किखादी केवल पहनने का कपड़ा नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, स्वदेशी भावना और स्वतंत्रता संग्राम की पहचान है।उन्होंने महात्मा गांधी के स्वदेशी विचारों को याद करते हुए कहा कि खादी ने आजादी की लड़ाई में देश को एक सूत्र में पिरोने का कार्य किया था और आज वही खादी आत्मनिर्भर भारत के सपने को साकार करने में अहम भूमिका निभा सकती है। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे विदेशी उत्पादों के बजाय स्वदेशी खादी उत्पादों को अपनाएं, जिससे गांवों में रोजगार बढ़े और कारीगरों का जीवन स्तर सुधरे।

कार्यक्रम का संचालन परिक्षेत्रीय ग्रामोद्योग अधिकारी यू.पी. सिंह ने प्रभावशाली ढंग से किया। उन्होंने खादी और ग्रामोद्योग से जुड़ी विभिन्न योजनाओं, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और स्वरोजगार के अवसरों की विस्तार से जानकारी दी। साथ ही यह भी बताया कि किस प्रकार सरकार की योजनाओं के माध्यम से बुनकरों और कतिनों को वित्तीय सहायता, प्रशिक्षण और विपणन सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है।

इस अवसर पर संयुक्त आयुक्त उद्योग वाराणसी मंडल मोहन कुमार शर्मा ने कहा कि खादी क्षेत्र में अपार संभावनाएं हैं, जिन्हें सही दिशा और तकनीकी सहयोग के माध्यम से बड़े उद्योग का स्वरूप दिया जा सकता है। सहायक निदेशक खादी ग्रामोद्योग आयोग के.पी. मिश्रा ने खादी उत्पादों की गुणवत्ता और ब्रांडिंग पर विशेष बल देते हुए कहा कि यदि उत्पादों को आधुनिक बाजार की मांग के अनुरूप ढाला जाए, तो खादी वैश्विक स्तर पर अपनी अलग पहचान बना सकती है।

सहायक निदेशक हथकरघा निशीथ गौड़ तथा परिक्षेत्रीय ग्रामोद्योग अधिकारी विंध्याचल मंडल अमितेश कुमार सिंह ने भी अपने विचार रखते हुए कहा कि खादी और हथकरघा क्षेत्र को तकनीकी नवाचार और प्रशिक्षण के साथ जोड़ना समय की आवश्यकता है। उन्होंने युवाओं को इस क्षेत्र से जोड़ने पर विशेष बल दिया। कार्यक्रम में जौनपुर, गाजीपुर, चंदौली और भदोही के जिला ग्रामोद्योग अधिकारियों विनोद कुमार सिंह, श्रीमती अमिता श्रीवास्तव, गिरजा प्रसाद और राजेश कुमार सिंहकी गरिमामयी उपस्थिति रही। इसके अलावा प्रभारी उद्यमिता संस्थान अजय कन्नौजिया, वरिष्ठ सहायक पवन कुमार, अमन जायसवाल सहित अनेक अधिकारी, कर्मचारी, खादी संस्थाओं के पदाधिकारी, बुनकर, कतिन और खादी में रुचि रखने वाले गणमान्य लोग बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

सेमिनार के दौरान बुनकरों और कतिनों ने भी अपने अनुभव साझा किए और खादी क्षेत्र में रही चुनौतियोंजैसे विपणन, उचित मूल्य, कच्चे माल की उपलब्धता और आधुनिक तकनीक की कमीकी ओर ध्यान आकर्षित किया। अधिकारियों ने इन समस्याओं के समाधान का आश्वासन देते हुए कहा कि सरकार खादी क्षेत्र को मजबूत बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। कार्यक्रम का समापन इस संकल्प के साथ हुआ कि खादी को गांव-गांव तक पहुंचाकर इसे रोजगार का सशक्त माध्यम बनाया जाएगा। साथ ही, खादी को आधुनिकता से जोड़ते हुए इसे युवा पीढ़ी की पहली पसंद बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएंगे। इस सेमिनार ने यह स्पष्ट कर दिया कि खादी अब केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि भविष्य की आर्थिक क्रांति की बुनियाद बनने की ओर अग्रसर है।

डर का नैरेटिव और लोकतंत्र की कसौटी : जब सियासत ‘थाली’ तक सिमटने लगे

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