शहर बदलते रहे, मगर रिश्ते वहीं रहे—इंदौर में मिला अपनेपन का तीर्थ
सीमा जी
से
बरसों
बाद
मुलाकात
ने
सफर
को
दिया
भावनाओं
का
नया
पड़ाव,
पिता
की
स्मृतियों
से
नम
हुई
आंखें
और
बेटी
की
तरह
मिली
विदाई
ने
दूरी
के
पार
रिश्तों
की
गर्माहट
का
अहसास
कराया
सुरेश गांधी
इंदौर. सतना, मैहर, उज्जैन, महाकाल और ओंकारेश्वर की
यात्रा के बाद जब
इंदौर पहुंचा तो लगा कि
यात्रा का एक और
महत्वपूर्ण पड़ाव सामने है। अब तक
रास्ते में मंदिर मिले
थे, आस्था मिली थी, इतिहास
मिला था, संस्कृति मिली
थी और मालवा की
मिट्टी को करीब से
देखने-समझने का अवसर मिला
था। लेकिन इंदौर में जो मिला,
वह इन सबसे अलग
था—एक ऐसा रिश्ता,
जिसे समय ने परिचय
से परिवार में बदल दिया।
सीमा शर्मा जी
से मिलना मेरे लिए महज
किसी परिचित से मुलाकात नहीं
थी। यह उन दिनों
और उन रिश्तों की
ओर लौटना था, जब पत्रकारिता
में लिखे शब्दों को
पहचान मिलती थी, जब किसी
संपादक का एक छोटा-सा प्रोत्साहन भी
लेखक के भीतर कई
नए शब्दों को जन्म देता
था। सीमा जी नई दुनिया
की फीचर संपादक रही
हैं। पत्रकारिता के उसी दौर
में मेरे कई लेख
उन्होंने प्रकाशित किए। मेरी लेखनी
को जगह देना केवल
संपादकीय निर्णय नहीं था, उसमें
भरोसा और आत्मीयता भी
थी। समय आगे बढ़ता
गया, पद और जिम्मेदारियां
बदलती गईं, लेकिन वह
आत्मीय रिश्ता कहीं पीछे नहीं
छूटा। आज सीमा जी
नई दुनिया के स्कूल में
शिक्षिका के रूप में
बच्चों के भविष्य को
गढ़ने का काम कर
रही हैं, मगर पत्रकारिता
से जुड़ी उनकी स्मृतियां और
पुराने रिश्ते आज भी उतने
ही जीवंत हैं।
मुलाकात हुई तो औपचारिकता का एक शब्द भी नहीं था
इंदौर में जब उनके
घर पहुंचा तो ऐसा नहीं
लगा कि किसी पुराने
परिचित के यहां आया
हूं। लगा जैसे अपने
ही परिवार के किसी सदस्य
के घर पहुंच गया
हूं। चेहरे पर वही अपनापन,
बातचीत में वही गर्माहट
और स्वागत में वही आत्मीयता।
उन्होंने जिस स्नेह से
डिनर कराया, वह सिर्फ भोजन
नहीं था। वह वर्षों
से संजोए रिश्ते का स्वाद था।
बातचीत के बीच बीते
दिनों की यादें आती
रहीं और लगता रहा
कि समय चाहे कितना
भी आगे निकल जाए,
कुछ रिश्तों की घड़ी वहीं
ठहरी रहती है जहां
से उन्होंने आकार लिया था।
लेकिन सबसे भावुक कर
देने वाला क्षण तब
आया, जब उनके घर
में कदम रखते ही
उनके पिता जी की
कमी बहुत खली। घर
वही था, अपनापन वही
था, चेहरे वही थे, मगर
एक बेहद अपना चेहरा
वहां नहीं था। कभी-कभी किसी व्यक्ति
की अनुपस्थिति उसकी मौजूदगी से
कहीं ज्यादा महसूस होती है। घर
की दीवारें, कुर्सियां, आंगन और बातचीत
के बीच अचानक मन
उस शख्स को तलाशने
लगता है, जो अब
इस दुनिया में नहीं है।
सबसे छीन लिया समय ने, मगर यादों से कौन छीन सकता है...
कोरोना काल ने हम
सभी से बहुत कुछ
छीना। सीमा जी के
पिता जी भी हमसे
चले गए। उस कठिन
दौर की स्मृतियां आज
भी मन में ताजा
हैं। इंदौर में उनके घर
पहुंचा तो लगा जैसे
उनकी आवाज कहीं आसपास
ही है। बस नजर
उठाकर देखने भर की देर
है। लेकिन वे नहीं थे।
उनकी कमी ने इस
मुलाकात को भीतर तक
भावुक कर दिया। वे
हमारे लिए केवल सीमा
जी के पिता नहीं
थे। उनका स्नेह इतना
सहज था कि उन्होंने
मुझे और मेरे परिवार
को हमेशा अपने बच्चों की
तरह माना। रिश्तों में औपचारिकता नहीं
थी। कोई हिसाब नहीं
था। कोई अपेक्षा नहीं
थी। बस अपनापन था।
शायद इसीलिए उनके न रहने
का खालीपन भी उतना ही
बड़ा है। कुछ लोग
दुनिया से चले जाते
हैं, लेकिन घर से नहीं
जाते। वे तस्वीरों में,
स्मृतियों में, बातचीत के
बीच अचानक ठहर जाने वाली
खामोशी में और आंखों
के कोरों में हमेशा बने
रहते हैं।
वाराणसी से इंदौर तक रिश्ते की डोर
सीमा जी और
उनके परिवार का वाराणसी से
भी गहरा रिश्ता रहा
है। वह अपने माता-पिता और पति
के साथ वाराणसी आ
चुकी हैं। मेरे घर
आईं। बाबा विश्वनाथ के
दरबार में पहुंचीं, कालभैरव
के दर्शन किए। परिवार के
साथ बिताए वे पल आज
भी स्मृतियों में वैसे ही
सुरक्षित हैं। तब शायद
किसी ने नहीं सोचा
था कि पत्रकारिता से
शुरू हुआ यह परिचय
धीरे-धीरे इतना गहरा
हो जाएगा कि दोनों परिवारों
के बीच रिश्तों की
एक ऐसी डोर बंध
जाएगी, जिसे दूरी भी
कमजोर नहीं कर पाएगी।
वाराणसी में उनका आना
और मेरे घर आना
मेरे लिए हमेशा परिवार
के किसी सदस्य के
आने जैसा रहा। उनके
माता-पिता का स्नेह
भी ऐसा ही था।
उन्होंने हम सभी को
बच्चों की तरह माना।
यही कारण है कि
इंदौर में उनके घर
जाना अपनेपन की उसी परंपरा
को आगे बढ़ाने जैसा
लगा।
बेटी की तरह विदा किया तो आंखें नम हो गईं
मुलाकात का सबसे भावुक
क्षण विदाई का था। सीमा
जी ने मेरी पत्नी
को जिस आत्मीयता से
बेटी की तरह विदा
किया, वह दृश्य मन
में ठहर गया। रिश्तों
की असली पहचान शायद
ऐसे ही क्षणों में
होती है। जब विदाई
के समय शब्द कम
पड़ जाएं और आंखें
वह सब कह दें,
जिसे होंठ कह नहीं
पाते। मेरी पत्नी को
बेटी की तरह विदा
करते हुए सीमा जी
का स्नेह देखकर लगा कि वर्षों
में बना यह रिश्ता
अब किसी परिचय या
दोस्ती का मोहताज नहीं
है। यह परिवार का
रिश्ता है—बिना किसी
औपचारिक घोषणा के, बिना किसी
नाम के।
डिनर के बाद भी खत्म नहीं हुआ अपनापन
विदाई के समय लगा
कि अब मुलाकात खत्म
हो गई। लेकिन सीमा
जी का अपनापन यहीं
नहीं रुका। उन्होंने ट्रेन के सफर के
लिए भी स्वादिष्ट खाना
साथ में रख दिया।
ट्रेन में जब वह
खाना खोला तो उसमें
केवल भोजन नहीं था।
उसमें इंदौर की आत्मीयता थी,
एक बहन का स्नेह
था, परिवार का अपनापन था
और उस रिश्ते की
मिठास थी, जो वर्षों
की दूरी के बाद
भी वैसा ही बना
हुआ है। सफर में
खाना तो खत्म हो
गया, लेकिन उस स्नेह का
स्वाद आज भी बाकी
है।
यात्रा बहुत कुछ दिखाती है, लेकिन कुछ यात्राएं रिश्ते लौटा देती हैं
सतना से मैहर,
फिर उज्जैन के महाकाल, हरसिद्धि
और शिप्रा तट, ओंकारेश्वर की
नर्मदा और फिर इंदौर
की गलियों तक इस यात्रा
ने बहुत कुछ दिखाया।
मंदिरों की भव्यता देखी,
आस्था का विराट रूप
देखा, इतिहास के पन्नों को
महसूस किया और मालवा
की संस्कृति को करीब से
जाना। लेकिन इंदौर में सीमा जी
के घर की वह
शाम इस यात्रा की
सबसे निजी और सबसे
भावुक स्मृति बन गई। क्योंकि
मंदिरों में भगवान मिलते
हैं और यात्राओं में
कभी-कभी ऐसे रिश्ते
मिल जाते हैं, जिनमें
भगवान जैसा ही अपनापन
होता है।
लौटते समय मन में एक ही बात थी—
रास्ते बदलते रहते हैं, शहर
बदलते रहते हैं, लोग
अपनी-अपनी जिम्मेदारियों में
दूर होते जाते हैं,
लेकिन सच्चे रिश्ते दूरी से नहीं
टूटते। वे समय के
साथ और गहरे होते
जाते हैं। इंदौर से
ट्रेन चली तो पीछे
शहर छूट रहा था।
मगर मन में सीमा
जी का स्नेह, उनके
माता-पिता की स्मृतियां,
पत्नी को बेटी की
तरह मिली विदाई और
ट्रेन के लिए प्यार
से दिया गया वह
भोजन साथ चल रहा
था। और शायद यही
किसी यात्रा की सबसे बड़ी
उपलब्धि होती है— शहर
पीछे छूट जाएं, रास्ते
खत्म हो जाएं, तस्वीरें
पुरानी पड़ जाएं, लेकिन
कुछ मुलाकातें ऐसी हों जो
उम्र भर दिल में
रोशनी करती रहें। इंदौर
की इस यात्रा में
सीमा जी से मुलाकात
ऐसी ही एक रोशनी
है।