50 फीसदी टैरिफ़ के
संकट
से
उबरा
हस्तनिर्मित
कालीन
उद्योग
टैरिफ की दीवार टूटी, कारपेट इंडस्ट्री में लौटी रौनक
मोदी सरकार
के
समझौते
से
अमेरिकी
बाज़ार
फिर
भारत
के
नाम
इंडिया यूएस
बीटीए
से
18 फीसदी
शुल्क
पर
मिली
नई
सांस
25 लाख कारीगरों के
चेहरे
खिले
सुरेश गांधी
वाराणसी. वर्षों से ऊंचे टैरिफ
की मार झेल रहे
भारतीय हस्तनिर्मित कालीन उद्योग के लिए भारत
- अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौता (इंडिया - यूएस बीटीए) किसी
संजीवनी से कम नहीं
साबित हुआ है। कालीन
निर्यात संवर्धन परिषद (सीईपीसी) ने इस समझौते
का स्वागत करते हुए इसे
उस लंबे टैरिफ संकट
से निर्णायक मुक्ति बताया है, जिसने बीते
कुछ वर्षों में उद्योग की
कमर तोड़ दी थी।
कारोबारियों का कहना है
कि अमेरिकी टैरिफ 50 प्रतिशत से घटकर 18 प्रतिशत
किए जाने की घोषणा
ने वर्षों से संकट झेल
रहे भारतीय कालीन उद्योग में नई जान
फूंक दी है। इस
फैसले के बाद देश
की प्रमुख कालीन पट्टी भदोही, मिर्ज़ापुर और वाराणसीउ में
उत्साह का माहौल है।
कालीन निर्यात संवर्धन परिषद सहित उद्योग से
जुड़े संगठनों, निर्यातकों और कारीगर प्रतिनिधियों
ने इसे ऐतिहासिक राहत
बताते हुए मोदी सरकार
की मुक्त कंठ से सराहना
की है।
सीईपीसी के अनुसार, अमेरिकी
बाजार भारतीय हस्तनिर्मित कालीनों का सबसे बड़ा
खरीदार रहा है। भारत
के कुल हस्तनिर्मित कालीन
निर्यात का करीब 60 प्रतिशत
हिस्सा अमेरिका को जाता है।
लेकिन बीते वर्षों में
अमेरिका द्वारा 50 फीसदी तक लगाए गए
भारी टैरिफ ने भारतीय कालीनों
को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में न सिर्फ
पीछे ढकेल दिया, बल्कि
इस परंपरागत उद्योग को गहरे संकट
में डाल दिया था।
नतीजा यह हुआ कि
निर्यात घटा, ऑर्डर रुके,
और भदोही, मिर्ज़ापुर, बनारस, कश्मीर और राजस्थान जैसे
कालीन केंद्रों में लाखों कारीगरों
की आजीविका पर संकट मंडराने
लगा। वाराणसी, जो डिज़ाइन, फिनिशिंग
और निर्यात प्रबंधन का अहम केंद्र
है, वहां भी कारोबार
ठहराव की स्थिति में
पहुंच गया था। सीईपीसी
ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री
पीयूष गोयल और वस्त्र
मंत्री गिरिराज सिंह के नेतृत्व
में सरकार द्वारा की गई सतत
और सशक्त व्यापार कूटनीति की सराहना की
है। परिषद का कहना है
कि सरकार ने वैश्विक मंचों
पर भारतीय उद्योग की पीड़ा को
मजबूती से रखा और
उसी का परिणाम है
कि अब भारतीय कालीनों
के लिए अमेरिकी बाजार
के दरवाज़े दोबारा खुल गए हैं।
इस ऐतिहासिक फैसले
का स्वागत करते हुए सीईपीसी
के पूर्व चेयरमैन सिद्धनाथ सिंह, परिषद के पूर्व प्रशासनिक
सदस्य उमेश गुप्ता ‘मुन्ना’,
योगेंद्र राय ‘काका’, संजय
मेहरोत्रा, रवि पाटोदिया, ओपी
गुप्ता, धरम प्रकाश गुप्ता,
प्रहलाददास गुप्ता, संजय गुप्ता, बृजेश
गुप्ता, राजेंद्र मिश्रा, घनश्याम शुक्ला, ओमकारनाथ मिश्रा, पूर्व मंत्री रंगनाथ मिश्रा, बच्चा मिश्रा सहित कई वरिष्ठ
उद्योग प्रतिनिधियों ने इसे कालीन
उद्योग के लिए टर्निंग
पॉइंट बताया। एकमा के पूर्व
अध्यक्ष हाजी शौकत अली
अंसारी, वर्तमान अध्यक्ष रज़ा खान, अहसन
रऊफ खान, असलम महबूब
अंसारी, रोहित गुप्ता, कुलदीप राज बॉटल, कुंवर
शमीम अंसारी, पंकज बरनवाल, रूपेश
बरनवाल, डॉ. ए.के.
गुप्ता, श्यानारायण यादव, छविराज पटेल, रवि बरनवाल, दीपक
खन्ना, शारीक अंसारी, वासिफ अंसारी और रियाज़ुल हसनैन
अंसारी ने भी सरकार
के फैसले का स्वागत करते
हुए कहा कि इससे
पूर्वांचल के गांव-गांव
में फिर से काम
और आत्मविश्वास लौटेगा।
सीईपीसी के चेयरमैन कैप्टन
मुकेश गोम्बर ने कहा कि
भारत - ईयू और भारत
- यूके मुक्त व्यापार समझौतों से उद्योग को
पहले ही कुछ राहत
मिली थी, लेकिन भारत
- अमेरिका समझौते ने वर्षों पुराने
टैरिफ संकट पर निर्णायक
प्रहार किया है। उन्होंने
बताया कि अमेरिकी बाजार
में कालीनों पर शुल्क 50 प्रतिशत
से घटकर 18 प्रतिशत हो जाना भारतीय
हस्तनिर्मित कालीनों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता
को पूरी तरह बहाल
करता है। इससे न
सिर्फ निर्यातकों का आत्मविश्वास लौटा
है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय खरीदार भी दोबारा भारत
की ओर आकर्षित हो
रहे हैं। सीईपीसी के
उपाध्यक्ष असलम महबूब ने
कहा कि ऊंचे टैरिफ
के कारण जो उद्योग
ठहराव और अनिश्चितता के
दौर से गुजर रहा
था, वह अब नए
वित्तीय वर्ष में उम्मीद
और स्थिरता के साथ प्रवेश
कर रहा है। उन्होंने
कहा कि ये व्यापार
समझौते 2 अरब डॉलर के
भारतीय हस्तनिर्मित कालीन उद्योग को नई गति
देंगे और देशभर में
इससे जुड़े लगभग 25 लाख
कारीगरों की आजीविका को
मजबूती प्रदान करेंगे।
सीईपीसी की कार्यकारी निदेशक (प्रभारी) डॉ. स्मिता नागरकोटी ने बताया कि परिषद निर्यातकों और हितधारकों के लिए जागरूकता व प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाएगी, ताकि इंडिया - यूएस, इंडिया - यूके और इंडिया ईयू व्यापार समझौतों से जुड़ी प्रक्रियाओं, नियमों और अवसरों की जानकारी जमीनी स्तर तक पहुंचे और कारीगर व छोटे निर्यातक भी इनका पूरा लाभ उठा सकें। सीईपीसी ने स्पष्ट किया कि परिषद सरकार के साथ मिलकर काम करती रहेगी, ताकि टैरिफ संकट के अंधेरे से निकलकर भारतीय हस्तनिर्मित कालीन उद्योग एक बार फिर वैश्विक नेतृत्व की भूमिका निभा सके, और “मेड इन इंडिया” कालीन दुनिया भर के बाज़ारों में अपनी चमक बिखेरते रहें।

