त्योहारी सीजन : चीनी हुई कड़वी, प्याज ने रुलाया... रसोई पर महंगाई का ‘डबल वार’

त्योहारों
की
मिठास
आने
से
पहले
रसोई
का
स्वाद
कड़वा
होने
लगा
है।
चीनी
के
दाम
ने
सबसे
ज्यादा
चौंकाया
है
तो
प्याज
ने
फिर
आंखों
में
आंसू
ला
दिए
हैं।
पिछले
कुछ
दिनों
में
चीनी
की
कीमतों
में
तेज
उछाल
के
साथ
प्याज,
खाद्य
तेल
और
दालों
के
भाव
भी
ऊपर
चढ़े
हैं।
बाजार
का
यह
रुख
ऐसे
समय
में
सामने
आया
है,
जब
त्योहारों
के
कारण
अगले
कुछ
महीनों
में
खाद्य
वस्तुओं
की
मांग
बढ़ने
वाली
है।
यानी
घर
के
बजट
पर
दबाव
अभी
थमता
नहीं
दिख
रहा।
सरकार
ने
चीनी
के
दाम
थामने
के
लिए
दस
लाख
टन
शुल्क-मुक्त
आयात
का
फैसला
किया
है।
जमाखोरी
रोकने
को
स्टॉक
सीमा
लगाई
गई
है
और
चीनी
मिलों
को
इस
बार
जल्दी
पेराई
शुरू
करने
की
तैयारी
है।
प्याज
के
मामले
में
भी
बफर
स्टॉक
बाजार
में
उतारने
की
कवायद
है।
मगर
सवाल
यह
है
कि
सरकारी
फैसलों
की
राहत
बाजार
की
थाली
तक
कब
पहुंचेगी?
महंगाई
की
सबसे
बड़ी
विडंबना
यही
है
कि
आंकड़ों
में
कुछ
प्रतिशत
की
बढ़ोतरी
दिखती
है,
लेकिन
आम
आदमी
के
घर
में
उसका
हिसाब
हर
किलो,
हर
लीटर
और
हर
महीने
के
बढ़ते
खर्च
से
होता
है।
रसोई
का
बजट
बिगड़ा
तो
त्योहारी
खुशियों
पर
भी
महंगाई
की
परछाईं
पड़ना
तय
है
सुरेश गांधी
त्योहारों की आहट के
साथ बाजार में महंगाई ने
फिर करवट ली है।
घर की रसोई में
रोज इस्तेमाल होने वाली चीनी,
प्याज, खाद्य तेल और दालों
के दामों में तेजी ने
परिवारों का बजट बिगाड़ना
शुरू कर दिया है।
सबसे ज्यादा सुर्खियों में चीनी है,
जिसकी कीमत कुछ बाजारों
में एक सप्ताह के
भीतर करीब सात रुपये
और एक महीने में
लगभग 17-20 रुपये किलो तक बढ़ने
की खबर है। पश्चिम
बंगाल के कुछ खुदरा
बाजारों में चीनी का
भाव 70 रुपये किलो तक पहुंच
गया है। हालांकि तस्वीर
पूरे देश में एक
जैसी नहीं है। उपभोक्ता
मंत्रालय के आंकड़ों के
मुताबिक 18 अगस्त को अखिल भारतीय
औसत खुदरा चीनी कीमत करीब
52.30 रुपये किलो थी, जो
एक साल पहले 46.34 रुपये
थी। यानी राष्ट्रीय औसत
में भी करीब 13 प्रतिशत
की सालाना बढ़ोतरी दर्ज हुई है।
यही अंतर बताता है कि महंगाई
की असली कहानी केवल
राष्ट्रीय औसत में नहीं,
बल्कि स्थानीय बाजार में उपभोक्ता को
चुकानी पड़ रही कीमत
में छिपी है। फिलहाल महंगाई
बेकाबू नहीं कही जा
सकती, लेकिन आंकड़ों का रुख सावधानी
का संकेत दे रहा है।
खासकर खाद्य और थोक कीमतों
में बढ़ोतरी यदि आगे भी
जारी रहती है तो
आने वाले महीनों में
इसका असर सीधे उपभोक्ता
की जेब पर दिखाई
दे सकता है। अगस्त
की खुदरा महंगाई का आधिकारिक आंकड़ा
14 सितंबर 2026 को जारी होना
है।
चीनी ने सबसे ज्यादा चौंकाया
चीनी के दामों
में अचानक उछाल ने सरकार
को भी सक्रिय कर
दिया है। घरेलू बाजार
में कीमतों को काबू में
करने के लिए केंद्र
ने करीब एक दशक
बाद बड़ा कदम उठाते
हुए 10 लाख टन कच्ची
चीनी के शुल्क-मुक्त
आयात की अनुमति दी
है। यह आयात 31 अक्टूबर
2026 तक टैरिफ रेट कोटा के
तहत किया जा सकेगा।
सरकार की कोशिश साफ
है—त्योहारों से पहले बाजार
में अतिरिक्त माल पहुंचे, आपूर्ति
की चिंता दूर हो और
कीमतों की तेजी पर
ब्रेक लगे। विशेषज्ञों के
मुताबिक इससे सितंबर-नवंबर
के दौरान घरेलू उपलब्धता में करीब 15 प्रतिशत
तक इजाफा हो सकता है।
लेकिन इसका असर तत्काल
बाजार में दिखना जरूरी
नहीं है। आयात होने
वाली चीनी कच्ची है,
जिसे घरेलू बाजार में पहुंचने से
पहले रिफाइन करना होगा। इसलिए
आने वाले दिनों में
कीमतों पर दबाव बना
रह सकता है।
जमाखोरी पर सरकार का डंडा
सरकार ने केवल आयात
का रास्ता नहीं खोला, बल्कि
जमाखोरी और सट्टेबाजी पर
भी शिकंजा कसा है। एक
अगस्त से चीनी कारोबारियों
पर स्टॉक सीमा लागू है
और यह व्यवस्था 30 नवंबर
तक प्रभावी रहेगी। सरकार ने कहा है
कि कुछ कारोबारियों और
बाजार मध्यस्थों की जमाखोरी तथा
बिना वास्तविक माल की आवाजाही
वाले कागजी कारोबार से बाजार में
कृत्रिम कमी का माहौल
बन सकता है। इसके
बाद बड़े थोक उपभोक्ताओं
के लिए भी स्टॉक
सीमा कड़ी की गई
है। 10 टन से अधिक
मासिक खपत वाले संस्थागत
खरीदारों को सीमित अवधि
की खपत से अधिक
स्टॉक रखने पर रोक
लगाई गई है। यानी
सरकार का तीन तरफा
वार है—आयात बढ़ाओ,
स्टॉक रोकिए और बाजार की
निगरानी बढ़ाइए।
प्याज भी दे रहा आंसू
चीनी के बाद
प्याज ने भी रसोई
का हिसाब बिगाड़ना शुरू किया है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 21 अगस्त
को प्याज का औसत खुदरा
भाव 40.79 रुपये किलो रहा, जबकि
सप्ताह भर पहले यह
36.56 रुपये और एक महीने
पहले 34.87 रुपये किलो था। यानी
एक सप्ताह में करीब चार
रुपये और महीने भर
में करीब छह रुपये
किलो की बढ़ोतरी हुई।
कुछ बाजारों में तेजी इससे
भी ज्यादा रही। प्याज की
कीमतों में तेजी के
पीछे खरीफ प्याज की
नई फसल की आवक
में देरी को प्रमुख
वजह माना जा रहा
है। दक्षिण भारत में आवक
देर से हो रही
है, जबकि महाराष्ट्र के
नासिक क्षेत्र में मानसून की
स्थिति ने खरीफ प्याज
की बुवाई और आपूर्ति की
चिंता बढ़ाई है। हालांकि यहां
भी सरकार के पास राहत
का हथियार मौजूद है। केंद्र ने
मूल्य स्थिरीकरण बफर के लिए
प्याज की खरीद कीमत
1875 रुपये से बढ़ाकर 2125 रुपये
प्रति क्विंटल कर दी है
और नाफेड-एनसीसीएफ के जरिये बफर
खरीद जारी है।
दाल में भी धीरे-धीरे चढ़ रही गर्मी
अरहर, मूंग, उड़द और चना
जैसी दालों की कीमतों में
भी हाल के सप्ताहों
में हल्की तेजी दिखाई दे
रही है। लेकिन यहां
तस्वीर चीनी जितनी चिंताजनक
नहीं है। 14 अगस्त तक खरीफ दलहन
की बुवाई 108.14 लाख हेक्टेयर थी,
जो पिछले साल की समान
अवधि के 108.49 लाख हेक्टेयर से
महज 35 हजार हेक्टेयर कम
थी। अरहर की बुवाई
जरूर करीब 1.69 लाख हेक्टेयर कम
रही थी, लेकिन बाद
के आंकड़ों में स्थिति सुधरी
है और 21 अगस्त तक कुल दलहन
रकबा पिछले साल की समान
अवधि से ऊपर पहुंच
गया। इसलिए फिलहाल दालों की बड़ी किल्लत
का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगा। फिर भी मौसम
यहां सबसे बड़ा खिलाड़ी
है। यदि प्रमुख उत्पादक
क्षेत्रों में बारिश कमजोर
रही तो अरहर और
मूंग जैसी दालों की
कीमतों पर दबाव बढ़
सकता है।
खाद्य तेल भी नहीं दे रहा राहत
रसोई में तेल
का खर्च भी कम
होने का नाम नहीं
ले रहा। वैश्विक खाद्य
तेल बाजार की हलचल का
सीधा असर भारत पर
पड़ता है क्योंकि देश
अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा
आयात करता है। हालांकि
ताजा आंकड़ा एक दिलचस्प तस्वीर
पेश करता है। जुलाई
में भारत का खाद्य
तेल आयात 10 महीने के उच्चतम स्तर
पर पहुंच गया। पाम तेल
का आयात जून के
मुकाबले 50 प्रतिशत बढ़कर करीब 7.31 लाख टन हो
गया, जबकि सोया तेल
का आयात भी 31 प्रतिशत
बढ़ा। वहीं रूस-यूक्रेन
युद्ध के कारण सूरजमुखी
तेल की आपूर्ति प्रभावित
हुई है। भारत में
अगस्त में सूरजमुखी तेल
का आयात फरवरी के
बाद सबसे कम रहने
का अनुमान है, जबकि उसकी
भरपाई के लिए सोया
तेल का आयात बढ़ाया
जा रहा है।
असली चिंता त्योहारों की
महंगाई का यह दौर
ऐसे समय आया है
जब बाजार में खपत बढ़ने
वाली है। अगस्त से
नवंबर तक गणेश चतुर्थी,
दशहरा और दीपावली जैसे
त्योहारों के कारण चीनी,
तेल, सूखे मेवे, मिठाई
और दूसरे खाद्य पदार्थों की मांग बढ़ती
है। यही वजह है
कि सरकार चीनी की आपूर्ति
को लेकर अभी से
सक्रिय हो गई है।
अगर आपूर्ति समय पर बढ़ी
तो कीमतों की तेजी थम
सकती है। लेकिन आयातित
चीनी बाजार में देर से
पहुंची या मानसून और
फसल से जुड़ी चिंताएं
बढ़ीं तो त्योहारों से
पहले रसोई का खर्च
और बढ़ सकता है।
रसोई का ताजा महंगाई मीटर
चीनी : कुछ
बाजारों
में
70 रुपये
किलो
तक
देश का
औसत
चीनी
भाव
: 18 अगस्त
को
करीब
52.30 रुपये
किलो
प्याज : 21 अगस्त
को
औसत
40.79 रुपये
किलो
प्याज एक
सप्ताह
पहले
: 36.56 रुपये किलो
प्याज एक
माह
पहले
: 34.87 रुपये किलो
शुल्क-मुक्त
चीनी
आयात
: 10 लाख
टन
आयात की
समयसीमा
: 31 अक्टूबर
2026 तक
दलहन बुवाई
: 21 अगस्त
तक
113.63 लाख हेक्टेयर
खाद्य तेल
आयात
: जुलाई
में
10 महीने
के
उच्चतम
स्तर
पर
महंगाई की नई कहानी में सवाल सिर्फ दाम का नहीं
महंगाई का आंकड़ा जब
सरकारी रिपोर्ट में आता है
तो वह एक प्रतिशत
होता है, लेकिन घर
की रसोई में उसकी
गिनती किलो, लीटर और रुपये
में होती है। पांच
रुपये महंगा प्याज, दस रुपये महंगा
तेल या बीस रुपये
महंगी चीनी अकेले परिवार
को नहीं तोड़ती, लेकिन
जब ऐसी कई छोटी
बढ़ोतरी एक साथ आती
है तो महीने का
बजट चुपचाप खिसक जाता है।
अभी सरकार ने चीनी पर
आयात, स्टॉक सीमा और बाजार
निगरानी के जरिये हस्तक्षेप
शुरू कर दिया है।
प्याज के लिए बफर
स्टॉक है और खाद्य
तेलों की आपूर्ति बढ़ाने
की कोशिश जारी है। इसलिए
स्थिति को बेकाबू महंगाई
कहना अभी सही नहीं
होगा। मगर रसोई के
जिन सामानों की कीमत सीधे
आम आदमी की जेब
पर असर डालती है,
उनमें एक साथ तेजी
जरूर सावधानी की घंटी है।
त्योहारों से पहले अब
सबसे बड़ी परीक्षा यही
होगी कि सरकारी फैसले
कागज से निकलकर बाजार
तक कितनी जल्दी पहुंचते हैं—क्योंकि आम
आदमी को राहत आदेश
में नहीं, किराने की दुकान पर
चाहिए।
सब्जियों पर भी चढ़ी महंगाई की आंच
रसोई में चीनी,
तेल और दाल के
साथ अब सब्जियों की
कीमतों ने भी बजट
बिगाड़ना शुरू कर दिया
है। 22 अगस्त के सरकारी मूल्य
निगरानी आंकड़ों में अखिल भारतीय
औसत थोक भाव में
आलू करीब ₹16.92, प्याज ₹33.97 और टमाटर ₹29.57 प्रति
किलो रहे। सबसे ज्यादा
दबाव प्याज पर दिख रहा
है। जुलाई में ही प्याज
के थोक भाव में
सालाना आधार पर करीब
51 फीसदी की उछाल दर्ज
की गई थी। खुदरा
बाजार में भी कई
शहरों में तस्वीर और
तीखी है। आंध्र प्रदेश
में प्याज जून के करीब
₹25 से बढ़कर अगस्त में ₹60 किलो तक पहुंचने
की रिपोर्ट है।मानसून की बारिश से
फसल की आवक और
परिवहन प्रभावित होने के कारण
हरी सब्जियों, धनिया, अदरक और लहसुन
जैसी चीजों के भाव भी
दबाव में हैं। हालांकि
हर सब्जी महंगी नहीं हुई—आलू
और टमाटर के थोक भाव
कई क्षेत्रों में अपेक्षाकृत नरम
हैं। यही बाजार का
विरोधाभास है: एक तरफ
किसान को कम भाव,
दूसरी तरफ ग्राहक को
महंगी सब्जी।