Friday, 15 May 2026

डिजिटल होगी देश की सबसे बड़ी गिनती

डिजिटल होगी देश की सबसे बड़ी गिनती 

पहली बार पेपरलेस जनगणना, मोबाइल से खुद भर सकेंगे पूरा विवरण

2027 में दो चरणों में होगी देश की 16वीं जनगणना

कोविड के कारण 2021 में टली थी प्रक्रिया

वोटर लिस्ट और नागरिकता से अलग है जनगणना

घर, पानी, बिजली, शौचालय और सुविधाओं का होगा आंकलन

जनगणना में जनता की भागीदारी सबसे जरूरी : एडीएम

सुरेश गांधी

वाराणसी. देश की सबसे बड़ी प्रशासनिक कवायद जनगणना अब पूरी तरह डिजिटल और पेपरलेस होने जा रही है। पहली बार ऐसा होगा जब आम नागरिक अपने मोबाइल फोन से स्वयं अपने घर और परिवार का विवरण दर्ज कर सकेंगे। जनगणना 2027 को लेकर आयोजित मीडिया संवाद कार्यक्रम में अपर जिलाधिकारी (वित्त एवं राजस्व) सदानंद गुप्ता ने यह जानकारी दी। उन्होंने कहा कि यह केवल आंकड़ों की प्रक्रिया नहीं, बल्कि देश की सामाजिक, आर्थिक और आधारभूत संरचना को समझने का सबसे बड़ा माध्यम है। राजस्व विभाग के कार्य बहुआयामी होते हैं, लेकिन जनगणना ऐसा विषय है जिसे जितना समझा जाए, उतनी ही नई बातें सामने आती हैं।

2021 में होनी थी जनगणना, कोविड ने रोका कदम

उन्होंने कहा कि जनगणना 2027” नाम को लेकर भ्रम की स्थिति नहीं होनी चाहिए। भारत में जनगणना हमेशा दो चरणों में होती है। यह प्रक्रिया वर्ष 2026 से प्रारंभ होगी, जबकि दोनों चरण पूरे होने के बाद इसे आधिकारिक रूप से जनगणना 2027 कहा जाएगा। उन्होंने बताया कि यह जनगणना मूल रूप से 2021 में प्रस्तावित थी, लेकिन कोविड महामारी के कारण प्रशासनिक तंत्र पूरी तरह आपदा प्रबंधन और राहत कार्यों में व्यस्त हो गया था। ऐसे में इसे स्थगित करना पड़ा।  

1872 से शुरू हुआ सफर, अब डिजिटल युग में प्रवेश

अपर जिलाधिकारी ने बताया कि भारत में पहली जनगणना वर्ष 1872 में सीमित स्तर पर कराई गई थी। स्वतंत्रता के बाद यह आठवीं जनगणना होगी, जबकि कुल मिलाकर यह देश की 16वीं जनगणना है। उन्होंने कहा कि सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब पूरी प्रक्रिया पेपरलेस होगी। पहले कर्मचारियों के पास कागजों के बंडल और फॉर्म होते थे, लेकिन इस बार सारी जानकारी सीधे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर दर्ज होगी। अब हमारे पास कागजी दस्तावेज नहीं होंगे। सबकुछ ऑनलाइन और डिजिटल माध्यम से होगा। इसलिए हमने भी कागज लेकर नहीं, बल्कि डिजिटल तैयारी के साथ आना उचित समझा.

क्या-क्या पूछा जाएगा?

एडीएम ने बताया कि वर्तमान में केवलहाउस लिस्टिंगऔरहाउस एन्यूमरेशनका कार्य होगा। इसमें घरों और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े प्रश्न पूछे जाएंगे। इनमें प्रमुख रूप से : मकान पक्का है या कच्चा. पेयजल की व्यवस्था क्या है. बिजली और प्रकाश की सुविधा. घर में शौचालय है या नहीं. परिवार की आधारभूत सुविधाएं. रहने वाले परिवारों की संख्या. उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया किसी भी प्रकार से नागरिकता, वोटर लिस्ट या संपत्ति के मालिकाना अधिकार से जुड़ी नहीं है।

जहां रहते हैं, वहीं की होगी गणना

उन्होंने कहा कि जनगणना का सीधा अर्थ है व्यक्ति जिस स्थान पर उस समय निवास कर रहा है, उसकी वहीं गणना होगी। इसका वोटर सूची या नागरिकता से कोई संबंध नहीं है। यदि एक मकान में कई परिवार रहते हैं, तो सभी की अलग-अलग गणना होगी। किरायेदारों का भी विवरण अलग से दर्ज किया जाएगा।

मोबाइल से खुद भर सकेंगे जानकारी

जनगणना प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए सेल्फ एन्यूमरेशन की सुविधा भी दी गई है। नागरिक अपने मोबाइल फोन के माध्यम से वेबसाइट पर जाकर स्वयं जानकारी दर्ज कर सकेंगे। इसके लिए नागरिकों को गूगल क्रोम खोलना होगा. “census.gov.in” वेबसाइट पर जाना होगा. राज्य और जिला चयन करना होगा. मोबाइल नंबर दर्ज कर सत्यापन करना होगा. फिर बहुविकल्पीय प्रश्नों के उत्तर भरने होंगे. उन्होंने कहा कि सभी प्रश्न मल्टीपल चॉइस आधारित होंगे, इसलिए सामान्य मोबाइल उपयोगकर्ता भी आसानी से प्रक्रिया पूरी कर सकेंगे।

मीडिया से सहयोग की अपील

अपर जिलाधिकारी ने मीडिया प्रतिनिधियों से अपील की कि वे जनगणना को लेकर फैली भ्रांतियों को दूर करें और लोगों तक सही जानकारी पहुंचाएं। उन्होंने कहा कि जनगणना केवल सरकारी प्रक्रिया नहीं, बल्कि देश की विकास योजनाओं की आधारशिला है। उन्होंने कहा, जनगणना से ही सरकार को पता चलता है कि कहां कितने लोग रहते हैं, किन क्षेत्रों में पानी, सड़क, बिजली, स्कूल और स्वास्थ्य सुविधाओं की जरूरत है। इसलिए इसमें हर नागरिक की भागीदारी बेहद महत्वपूर्ण है।

Thursday, 14 May 2026

भारतीय विवाहों में सोना केवल आभूषण नहीं, जीवन दर्शन है...!

मां लक्ष्मी का आशीर्वाद, सूर्य का तेज, परंपरा की विरासत और भविष्य की सुरक्षा

धन, धर्म, दांपत्य, ग्रह-नक्षत्र मां की ममता से बेटी के श्रृंगार तक : विवाह में सोना है शुभ  

भारतीय विवाहों की चमक केवल रोशनी, संगीत और उत्सव से नहीं बढ़ती, बल्कि उस स्वर्णिम परंपरा से भी बढ़ती है जो सदियों से हर रिश्ते को मजबूती देती आई है। भारत में सोना केवल गहना नहीं, बल्कि विश्वास, वैभव, सुरक्षा और संस्कार का जीवंत प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि बेटी के जन्म से ही माता-पिता उसके विवाह के लिए थोड़ा-थोड़ा सोना जोड़ना शुरू कर देते हैं। यह केवल आर्थिक तैयारी नहीं होती, बल्कि भावनाओं की वह थाती होती है जिसमें मां की ममता, पिता का संघर्ष और परिवार के सपने छिपे होते हैं। सनातन परंपरा में स्वर्ण को मां लक्ष्मी का स्वरूप और सूर्य का तेज माना गया है। विवाह जैसे मांगलिक अवसर पर इसका प्रयोग इसलिए शुभ माना जाता है क्योंकि यह समृद्धि, सौभाग्य और स्थायी रिश्तों का प्रतीक है। बदलते समय में भले ही फैशन और खरीदारी के तरीके बदल गए हों, लेकिन भारतीय समाज में सोने की प्रतिष्ठा आज भी वैसी ही कायम है। दुल्हन के श्रृंगार से लेकर पारिवारिक विरासत तक, स्वर्ण भारतीय संस्कृति में केवल धातु नहीं बल्कि पीढ़ियों से चली रही आस्था और आत्मीयता की सबसे चमकदार पहचान बन चुका है 

सुरेश गांधी

भारत में विवाह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं होता, यह दो परिवारों, दो संस्कृतियों और दो वंश परंपराओं का पवित्र संगम माना जाता है। यही कारण है कि भारतीय विवाहों में हर वस्तु का धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व होता है। इनमें यदि किसी वस्तु ने हजारों वर्षों से अपनी सर्वोच्च प्रतिष्ठा बनाए रखी है, तो वह है सोना। भारतीय समाज में सोना केवल धातु नहीं है। यह विश्वास है, सुरक्षा है, सम्मान है, समृद्धि है और शुभता का प्रतीक है। यही वजह है कि जैसे ही विवाह का मौसम आता है, सर्राफा बाजारों की चमक बढ़ जाती है। दुल्हन के गहनों से लेकर वर-वधू के उपहारों तक, हर रस्म में स्वर्ण का विशेष स्थान दिखाई देता है। भारत के गांवों से लेकर महानगरों तक, गरीब से अमीर तक, हर वर्ग अपनी क्षमता के अनुसार सोना अवश्य खरीदता है। दरअसल भारतीय मानस में सोना केवल सौंदर्य नहीं, बल्किसौभाग्यका प्रतीक है। यही कारण है कि नवविवाहिता कोगृहलक्ष्मीकहा जाता है और उसे स्वर्णाभूषणों से अलंकृत किया जाता है। माना जाता है कि जिस घर में सोना और संस्कार दोनों हों, वहां सुख-समृद्धि स्थायी रूप से निवास करती है।

सोने का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व

भारतीय सनातन परंपरा में सोने को अत्यंत पवित्र माना गया है। वेदों, पुराणों और धार्मिक ग्रंथों में स्वर्ण का उल्लेख दिव्यता और तेज के प्रतीक के रूप में मिलता है।

मां लक्ष्मी और स्वर्ण : धन, वैभव और समृद्धि की देवी मां लक्ष्मी को स्वर्ण प्रिय माना गया है। दीपावली, धनतेरस और अक्षय तृतीया जैसे पर्वों पर सोना खरीदना इसलिए शुभ माना जाता है क्योंकि यह मां लक्ष्मी के आगमन का प्रतीक माना जाता है। विवाह में दुल्हन कोलक्ष्मी स्वरूपाकहा जाता है। इसलिए उसे स्वर्णाभूषण पहनाना केवल श्रृंगार नहीं, बल्कि देवी स्वरूप का सम्मान माना जाता है।

सूर्य देव और स्वर्ण : सोने का रंग सूर्य के समान तेजस्वी होता है। हिंदू मान्यता के अनुसार सूर्य ऊर्जा, आत्मबल और जीवन के स्रोत हैं। स्वर्ण को सूर्य का अंश माना जाता है। यही कारण है कि प्राचीन राजाओं के मुकुट, मंदिरों के कलश और देव प्रतिमाओं के आभूषण स्वर्ण से बनाए जाते थे।

यज्ञ और दान में स्वर्ण : सनातन धर्म मेंस्वर्ण दानको महादान कहा गया है। विवाह में कन्यादान के साथ स्वर्णदान की परंपरा इसी मान्यता से जुड़ी हुई है। माना जाता है कि सोना शुभ ऊर्जा को आकर्षित करता है और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करता है।

भारतीय विवाह और सोने का अटूट संबंध

भारतीय शादियों की कल्पना सोने के बिना अधूरी मानी जाती है। चाहे उत्तर भारत की भारी जड़ाऊ ज्वेलरी हो, दक्षिण भारत के मंदिर आभूषण हों, बंगाल का पारंपरिक हार हो या महाराष्ट्र का ठुस्सी हारहर क्षेत्र में विवाह और स्वर्ण का गहरा रिश्ता दिखाई देता है।

दुल्हन का श्रृंगार और स्वर्ण

भारतीय संस्कृति मेंसोलह श्रृंगारका विशेष महत्व है। इनमें अधिकांश आभूषण स्वर्ण के होते हैं। मांगटीका, हार, झुमके, कंगन, नथ, कमरबंद, पायलये केवल गहने नहीं, बल्कि वैवाहिक जीवन के मंगल प्रतीक माने जाते हैं। मंगलसूत्र स्वयं इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है। अलग-अलग राज्यों में इसका स्वरूप भले बदल जाए, लेकिन स्वर्ण का प्रयोग लगभग हर जगह अनिवार्य माना जाता है।

स्त्रीधन : भारतीय समाज की अद्भुत आर्थिक व्यवस्था

आज के आधुनिक समय में बैंक, बीमा और निवेश योजनाएं मौजूद हैं, लेकिन एक समय ऐसा था जब महिलाओं के पास आर्थिक स्वतंत्रता के सीमित साधन थे। उस दौर में स्वर्णाभूषण ही महिलाओं की सबसे बड़ी सुरक्षा हुआ करते थे।

स्त्रीधन का महत्व

शादी में जो सोना दुल्हन को दिया जाता था, वह उसका व्यक्तिगत अधिकार माना जाता था। संकट की स्थिति में वही उसके लिए आर्थिक सहारा बनता था। यही कारण है कि भारतीय परिवार अपनी बेटियों के लिए धीरे-धीरे सोना जोड़ते थे। आज भी ग्रामीण भारत में लाखों परिवारों के लिए सोना बैंक खाते से ज्यादा भरोसेमंद निवेश माना जाता है।

सोना : भावनाओं का निवेश

भारत में लोग केवल निवेश के लिए सोना नहीं खरीदते, बल्कि भावनाओं के लिए भी खरीदते हैं। एक मां जब बेटी के जन्म पर छोटी सी चेन खरीदती है, तब वह केवल आभूषण नहीं खरीद रही होती, बल्कि बेटी के भविष्य के सपनों को संजो रही होती है। अक्षय तृतीया, धनतेरस, दीवाली और तीज-त्योहारों पर थोड़ा-थोड़ा सोना जोड़ना भारतीय परिवारों की परंपरा रही है। शादी तक वही सोना माता-पिता के संघर्ष, त्याग और प्रेम की कहानी बन जाता है।

ग्रह-नक्षत्र और स्वर्ण का संबंध

भारतीय ज्योतिष में भी सोने का विशेष महत्व बताया गया है। सूर्य ग्रह से संबंध: स्वर्ण को सूर्य का धातु माना जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जिन लोगों की कुंडली में सूर्य कमजोर होता है, उन्हें  : सोना धारण करने की सलाह दी जाती है। माना जाता है कि इससे आत्मविश्वास, नेतृत्व क्षमता और सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है। बृहस्पति और विवाह : विवाह का कारक ग्रह बृहस्पति माना जाता है। स्वर्ण का संबंध भी बृहस्पति से जोड़ा जाता है। इसलिए विवाह में सोने का प्रयोग दांपत्य जीवन की स्थिरता और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। शुभ मुहूर्त और स्वर्ण खरीदारी: भारत में अक्षय तृतीया और धनतेरस पर सोना खरीदने की परंपरा केवल व्यापारिक नहीं, बल्कि ज्योतिषीय मान्यताओं से जुड़ी हुई है। माना जाता है कि इन दिनों खरीदा गया स्वर्ण कभी क्षय नहीं होता और घर में स्थायी समृद्धि लाता है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सोने का महत्व

हालांकि धार्मिक मान्यताएं अपनी जगह हैं, लेकिन वैज्ञानिक रूप से भी सोने की कई विशेषताएं हैं। कभी खराब नहीं होता : सोने में जंग नहीं लगती। यह हजारों वर्षों तक अपनी चमक बनाए रख सकता है। यही कारण है कि इसे शाश्वत संबंधों का प्रतीक माना जाता है। स्वास्थ्य से जुड़ी मान्यताएं : आयुर्वेद में स्वर्ण भस्म का उल्लेख मिलता है। प्राचीन मान्यता के अनुसार सोना शरीर में सकारात्मक ऊर्जा बढ़ाता है। कई लोग मानते हैं कि यह मानसिक शांति और आत्मविश्वास में मदद करता है। हालांकि आधुनिक विज्ञान इन दावों की सीमित पुष्टि करता है, फिर भी भारतीय समाज में यह विश्वास गहराई से मौजूद है।

भारत की अर्थव्यवस्था और सोना

भारत दुनिया के सबसे बड़े स्वर्ण उपभोक्ताओं में से एक है। भारतीय परिवारों के पास हजारों टन सोना मौजूद है। यह केवल व्यक्तिगत संपत्ति नहीं, बल्कि देश की आर्थिक संस्कृति का हिस्सा है।

गांवों की असली बैंकिंग व्यवस्था

ग्रामीण भारत में आज भी लोग बैंक से ज्यादा सोने पर भरोसा करते हैं। किसान अच्छी फसल होने पर सोना खरीदते हैं। जरूरत पड़ने पर वही गिरवी रखकर आर्थिक संकट से बाहर निकलते हैं।

महंगाई से सुरक्षा

सोना लंबे समय में महंगाई के खिलाफ सुरक्षा कवच माना जाता है। यही कारण है कि भारतीय परिवार इसेसुरक्षित निवेशमानते हैं।

भारतीय संस्कृति में विरासत का प्रतीक

भारतीय परिवारों में पीढ़ियों से चले रहे गहनों का भावनात्मक महत्व अत्यंत गहरा होता है। दादी की नथ, नानी का हार या मां की चूड़ियां केवल गहने नहीं होते, बल्कि परिवार के इतिहास की जीवित स्मृतियां होती हैं। जब ये गहने नई बहू को दिए जाते हैं, तब केवल आभूषण नहीं सौंपे जाते, बल्कि परिवार की परंपरा, आशीर्वाद और संस्कार आगे बढ़ाए जाते हैं।

विभिन्न राज्यों की स्वर्ण परंपराएं

दक्षिण भारत : दक्षिण भारत में विवाह के दौरान भारी मात्रा में सोना पहनने की परंपरा है। यहां सोना सामाजिक प्रतिष्ठा और समृद्धि का प्रमुख प्रतीक माना जाता है। बंगाल : बंगाल में पारंपरिकसिता हारऔरचूड़का विशेष महत्व है। राजस्थान: राजस्थान में कुंदन और जड़ाऊ आभूषण शाही संस्कृति का प्रतीक हैं। उत्तर भारत : उत्तर भारत में मंगलसूत्र, चूड़ा, हार और कंगनों का विशेष महत्व होता है।

सोना और सामाजिक प्रतिष्ठा

भारतीय समाज में शादी केवल निजी आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा का भी प्रतीक रही है। ऐसे में स्वर्णाभूषण परिवार की आर्थिक स्थिति और सामाजिक सम्मान से भी जुड़ जाते हैं। हालांकि समय के साथ दिखावे की प्रवृत्ति ने कई बार इस परंपरा को बोझ भी बनाया है। कई परिवार सामाजिक दबाव में जरूरत से ज्यादा खर्च कर देते हैं। यही कारण है कि आज संतुलित और जिम्मेदार विवाह संस्कृति की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

क्या बदल रही है नई पीढ़ी की सोच?

नई पीढ़ी अब पारंपरिक भारी गहनों की जगह हल्के और उपयोगी डिजाइनों को पसंद कर रही है। डिजिटल गोल्ड, गोल्ड बॉन्ड और मिनिमल ज्वेलरी का चलन बढ़ रहा है। फिर भी, विवाह में स्वर्ण की उपस्थिति आज भी अनिवार्य मानी जाती है। क्योंकि आधुनिकता चाहे जितनी बढ़ जाए, भारतीय संस्कृति में सोने का भावनात्मक और आध्यात्मिक महत्व कम नहीं हुआ है।

सोने से जुड़े शुभ अवसर

भारत में कई ऐसे अवसर हैं जब सोना खरीदना विशेष रूप से शुभ माना जाता हैअक्षय तृतीया. धनतेरस. दीपावली. गुरु पुष्य नक्षत्र. विवाह मुहूर्त. संतान जन्म. गृह प्रवेश. इन अवसरों पर सोना खरीदना केवल परंपरा नहीं, बल्कि भविष्य की समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।

स्वर्ण और नारी सम्मान

भारतीय संस्कृति में नारी को शक्ति और समृद्धि का स्वरूप माना गया है। स्वर्णाभूषणों के माध्यम से समाज ने सदियों तक महिलाओं को आर्थिक सुरक्षा देने का प्रयास किया। हालांकि आज महिलाओं को कानूनी अधिकार और आर्थिक स्वतंत्रता प्राप्त है, फिर भी विवाह में स्वर्ण देने की परंपरा एक भावनात्मक सुरक्षा और सम्मान का प्रतीक बनी हुई है।

सोना : केवल आभूषण नहीं, भारतीय सभ्यता का दर्पण

यदि भारतीय सभ्यता को कुछ प्रतीकों में समझना हो, तो उनमें स्वर्ण अवश्य शामिल होगा। मंदिरों के शिखर, देवताओं के मुकुट, राजाओं के सिंहासन, दुल्हनों के गहने और त्योहारों की खरीदारीहर जगह सोना भारतीय मानस की चमक को प्रतिबिंबित करता है। यह केवल धन नहीं, बल्कि श्रम, विश्वास, संस्कार और भविष्य का प्रतीक है।

स्वर्ण की चमक में भारतीय संस्कृति की आत्मा

भारतीय विवाहों में सोना इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि वह महंगा है, बल्कि इसलिए कि वह भावनाओं, विश्वासों और परंपराओं का वाहक है। उसकी चमक केवल शरीर को नहीं सजाती, बल्कि रिश्तों को भी प्रकाशित करती है। वह बेटी के सपनों में, मां की ममता में, पिता के संघर्ष में और परिवार की प्रतिष्ठा में बसता है। समय बदल सकता है, फैशन बदल सकते हैं, लेकिन भारतीय संस्कृति में स्वर्ण का महत्व शायद कभी कम नहीं होगा। क्योंकि यहां सोना केवल धातु नहीं—“संस्कारों की स्वर्णिम विरासतहै।

डिजिटल होगी देश की सबसे बड़ी गिनती

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