Sunday, 8 February 2026

काशी में सजेगा शिव-गौरा विवाह का अद्भुत आसमानी श्रृंगार, महाशिवरात्रि पर पहली बार असमिया वैभव में दिखेंगे विश्वनाथ-गौरा

काशी में सजेगा शिव-गौरा विवाह का अद्भुत आसमानी श्रृंगार, महाशिवरात्रि पर पहली बार असमिया वैभव में दिखेंगे विश्वनाथ-गौरा 

शिवसागर से आए चेलेंग-गसोमा और मेखेला साड़ी में सजेगा दिव्य दांपत्य स्वरूप

जूनबीरी, गुमखारू और थुरिया आभूषणों से नववधू रूप में दमकेंगी माता गौरा

टेढ़ीनीम महंत आवास में हल्दी, विवाह और गौना की रस्मों से भक्तिमय हुआ वातावरण

कलाकार आकांक्षा गुप्ता के नेतृत्व में भक्ति और लोकसंस्कृति का साकार होता सौंदर्य

ऐतिहासिक शिव बारात में काशी की मलमल और जरी से सजेगा राजसी स्वरूप

काशी और असम की आध्यात्मिक परंपराओं का अनूठा सांस्कृतिक संगम बनेगा आकर्षण का केंद्र

सुरेश गांधी

वाराणसी। देवाधिदेव महादेव की नगरी काशी एक बार फिर महाशिवरात्रि के दिव्य उल्लास में डूबने को तैयार है। इस वर्ष महाशिवरात्रि पर काशी में शिव-विवाह की सदियों पुरानी परंपरा में एक नया सांस्कृतिक अध्याय जुड़ने जा रहा है। पहली बार बाबा विश्वनाथ और माता गौरा की चल प्रतिमा असमिया पारंपरिक परिधान और आभूषणों से सुसज्जित होकर भक्तों को अलौकिक दर्शन देंगी। यह श्रृंगार केवल सौंदर्य का विस्तार नहीं, बल्कि काशी और असम की प्राचीन आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के मधुर संगम का सजीव प्रतीक बनेगा।

महाशिवरात्रि में अब एक सप्ताह का समय शेष है और शिव-विवाह से जुड़ी तैयारियां अपने चरम पर पहुंच चुकी हैं। टेढ़ीनीम स्थित विश्वनाथ मंदिर के पूर्व महंत आवास में बाबा विश्वनाथ की हल्दी, विवाह, शिव बारात और गौना की रस्मों को लेकर वातावरण पूरी तरह भक्तिरस में सराबोर हो चुका है। श्रद्धालुओं में इस दिव्य आयोजन को लेकर विशेष उत्साह देखने को मिल रहा है और भक्त स्वयं को शिव बारात का बराती मानकर इस अनुष्ठान में सहभागी बनने को आतुर हैं।

पूर्व महंत के पुत्र वाचस्पति तिवारी ने बताया कि इस वर्ष महाशिवरात्रि के अवसर पर बाबा विश्वनाथ और माता गौरा के विशेष परिधान असम के शिवसागर से मंगाए गए हैं। बाबा विश्वनाथ की चल प्रतिमा को असमिया पुरुष परिधानचेलेंगऔरगसोमासे अलंकृत किया जाएगा। असम की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा यह परिधान बाबा को राजसी और दिव्य स्वरूप प्रदान करेगा। वहीं माता गौरा को लाल और सुनहरे रंग की पारंपरिक रेशमीमेखेला साड़ीपहनाई जाएगी, जो असम की स्त्री सौंदर्य परंपरा का प्रतिनिधित्व करती है।

माता गौरा के श्रृंगार को और अधिक भव्य बनाने के लिए असमिया पारंपरिक आभूषणों का भी विशेष चयन किया गया है। जूनबीरी के अर्धचंद्राकार हार, गुमखारू के पारंपरिक कंगन और थुरिया के मांगटिका से माता गौरा का स्वरूप नववधू के रूप में अद्भुत और अलौकिक दिखाई देगा। यह श्रृंगार भक्तों को शिव-पार्वती विवाह की पौराणिक स्मृतियों से भावविभोर कर देगा।

महंत आवास में इस दिव्य श्रृंगार को मूर्त रूप देने का कार्य काशी की सांस्कृतिक कलाकार आकांक्षा गुप्ता के नेतृत्व में किया जा रहा है। कलाकारों की टोली लोक कल्याण और अखंड सौभाग्य की मंगल कामना के साथ माता गौरा के स्वरूप को आकार दे रही है। पारंपरिक कला, श्रद्धा और आध्यात्मिक भावनाओं का यह स्मरणीय संगम श्रृंगार को विशेष आभा प्रदान कर रहा है।

इस बार ऐतिहासिक शिव बारात में भी काशी की पारंपरिक कारीगरी की झलक दिखाई देगी। आयोजन समिति के संयोजक संजीव रत्न मिश्र ने बताया कि शिव बारात में शामिल होने वाली प्रतीकात्मक बाबा विश्वनाथ की प्रतिमा को काशी में ही तैयार किए गए मलमल और जरी से बने राजसी परिधान पहनाए जाएंगे। इस विशेष पोशाक को भी कलाकार आकांक्षा गुप्ता द्वारा तैयार किया जा रहा है, जिससे काशी की प्राचीन बुनाई और हस्तशिल्प कला को वैश्विक पहचान मिलने की उम्मीद है।

महाशिवरात्रि का यह आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सांस्कृतिक एकता और आध्यात्मिक समरसता का जीवंत उत्सव बनकर उभर रहा है। काशी और असम की परंपराओं का यह अनूठा संगम श्रद्धालुओं के लिए दिव्यता, सौंदर्य और भक्ति का अविस्मरणीय अनुभव लेकर आएगा। जब बाबा विश्वनाथ बारात लेकर निकलेंगे और माता गौरा नववधू के रूप में विराजमान होंगी, तब काशी की गलियां एक बार फिर हर-हर महादेव के जयघोष से गुंजायमान हो

शिवनाद से जागेगा ब्रह्मांड, महाशिवरात्रि पर काशी से देवताओं को दिव्य आमंत्रण

शिवनाद से जागेगा ब्रह्मांड, महाशिवरात्रि पर काशी से देवताओं को दिव्य आमंत्रण 

श्री काशी विश्वनाथ धाम में पहली बार मंत्रोच्चार से होगा समस्त देव शक्तियों का आवाहन, भक्ति-ऊर्जा से गुंजित होगा पूरा धाम

सुरेश गांधी

वाराणसी। अनादि काल से शिव की नगरी काशी केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति की जीवंत आत्मा मानी जाती रही है। इस वर्ष महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर श्री काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास द्वारा एक ऐसा आध्यात्मिक नवाचार किया जा रहा है, जो भक्ति, परंपरा और आध्यात्मिक अनुभूति को एक नई ऊँचाई प्रदान करेगा। मंदिर न्यास ने समस्त ब्रह्मांड की सनातन, सात्त्विक एवं शिव-अनुग्रही शक्तियों को विधिवत आमंत्रण पत्र के माध्यम से श्री काशी विश्वनाथ धाम में पधारने का अभिनव उपक्रम किया है।

इस दिव्य पहल के अंतर्गत धाम में विराजमान सभी देव विग्रहों के समक्ष यह पावन आमंत्रण सादर अर्पित किया गया। साथ ही महाशिवरात्रि महोत्सव को आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण बनाने हेतु एक विशेष मंत्र-श्लोक की रचना की गई है, जिसके माध्यम से देवताओं का विधिवत आवाहन किया जा रहा है।

फाल्गुने कृष्णपक्षेस्मिन् शिवरात्रिमहोत्सवे

शिवशक्तिमयान् देवान् प्रणुमोऽनुग्रहेच्छया ।।

विश्वनाथस्य सेवायां शुभाशीराशिकांक्षया

आमन्त्रणे समायान्तु काशीधाम्नि समागमे ।।

इस मंत्र का भावार्थ भक्तिभाव से परिपूर्ण है, जिसमें फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की महाशिवरात्रि पर समस्त देवताओं, सात्त्विक शक्तियों एवं सनातन सत्ताओं को प्रणाम करते हुए, श्री काशी विश्वनाथ की सेवा में उनके शुभ आशीर्वाद की कामना के साथ काशी धाम में पधारने का आग्रह किया गया है। मंदिर न्यास द्वारा इस मंत्रोच्चार को धाम के पब्लिक एड्रेस सिस्टम के माध्यम से लगातार एक घंटे तक प्रसारित किया जाएगा। सनातन परंपरा में मंत्रों के नाद को देव शक्तियों के आवाहन और आध्यात्मिक ऊर्जा के संचार का माध्यम माना जाता है। इसी विश्वास और श्रद्धा के साथ यह दिव्य अनुष्ठान संपन्न किया जाएगा, जिससे पूरा धाम मंत्रमय वातावरण में सराबोर हो उठेगा।

श्री काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास स्वयं को बाबा विश्वनाथ का सेवक मानते हुए, समस्त न्यासकर्मियों एवं काशीवासियों की ओर से सभी देव शक्तियों को इस महाशिवरात्रि महोत्सव में ससम्मान आमंत्रित कर रहा है। न्यास की कामना है कि भगवान विश्वनाथ की कृपा और समस्त देव शक्तियों के आशीर्वाद से यह पर्व श्रद्धालुओं के जीवन में मंगल, कल्याण और आध्यात्मिक चेतना का नवीन प्रकाश फैलाए। महाशिवरात्रि के इस अलौकिक आयोजन के साथ काशी एक बार फिर अपनी सनातन परंपरा की गूंज से ब्रह्मांड को संदेश देने को तैयार हैजहां भक्ति केवल अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मा का परमात्मा से मिलन बन जाती है।

ब्रज से काशी पहुंचा भक्ति का दिव्य श्रृंगार, बाबा विश्वनाथ को अर्पित हुई पूजन सामग्री

ब्रज से काशी पहुंचा भक्ति का दिव्य श्रृंगार, बाबा विश्वनाथ को अर्पित हुई पूजन सामग्री 

महाशिवरात्रि पर श्रीकृष्ण जन्मस्थली की अनूठी भेंट, काशीब्रज सांस्कृतिक संबंधों को मिला नया आयाम

सुरेश गांधी

वाराणसी। महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर सनातन परंपरा की अद्भुत झलक उस समय देखने को मिली जब मथुरा स्थित श्रीकृष्ण जन्मस्थली से बाबा श्री काशी विश्वनाथ के लिए विशेष श्रृंगार एवं पूजन सामग्री भेंट स्वरूप अर्पित की गई। इस आध्यात्मिक भेंट ने काशी और ब्रज धाम के सांस्कृतिक एवं धार्मिक संबंधों को एक नया और ऐतिहासिक आयाम प्रदान किया है। यह पहल श्रद्धा, समन्वय और सनातन संस्कृति की अखंडता का जीवंत प्रतीक बनकर सामने आई है।

महाशिवरात्रि भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य विवाहोत्सव का पर्व माना जाता है। इस अवसर पर बाबा विश्वनाथ का विशेष श्रृंगार और पूजन अत्यंत धार्मिक महत्व रखता है। इसी परंपरा को और भव्य बनाने के उद्देश्य से श्रीकृष्ण जन्मस्थली से पूजन एवं श्रृंगार सामग्री काशी भेजी गई, जिसे विधि-विधान और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच बाबा विश्वनाथ को समर्पित किया गया। इस दिव्य आयोजन ने श्रद्धालुओं के बीच विशेष उत्साह और आध्यात्मिक उल्लास का वातावरण बना दिया।

धार्मिक विद्वानों का मानना है कि काशी और ब्रज धाम सनातन संस्कृति के दो प्रमुख आध्यात्मिक स्तंभ हैं। काशी जहां भगवान शिव की मोक्षदायिनी नगरी के रूप में विश्व विख्यात है, वहीं मथुरा और ब्रजभूमि भगवान श्रीकृष्ण की लीला, प्रेम और भक्ति की पावन धरती मानी जाती है। इन दोनों तीर्थों के मध्य धार्मिक परंपराओं का यह आदान-प्रदान सनातन संस्कृति की उस मूल भावना को साकार करता है, जिसमें संपूर्ण भारत की आध्यात्मिक धारा एक सूत्र में बंधी हुई दिखाई देती है।

यह अभिनव पहल हरिहर के शाश्वत और अद्भुत संबंध को भी सजीव रूप में प्रस्तुत करती है। सनातन मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु और भगवान शिव एक-दूसरे के पूरक माने जाते हैं। भगवान विष्णु जहां सृष्टि के पालनकर्ता हैं, वहीं भगवान शिव संहार और कल्याण के अधिष्ठाता हैं। दोनों की उपासना और समन्वय लोकमंगल और सृष्टि संतुलन का आधार माना जाता है। ऐसे में श्रीकृष्ण जन्मस्थली से बाबा विश्वनाथ के लिए श्रृंगार सामग्री की भेंट इस दिव्य एकत्व का आध्यात्मिक संदेश लेकर आई है।

उल्लेखनीय है कि तीर्थों के मध्य धार्मिक सांस्कृतिक संबंधों को सुदृढ़ करने की यह परंपरा पिछले कुछ वर्षों में नई गति से आगे बढ़ रही है। गत वर्ष रंगभरी एकादशी के अवसर पर काशी और मथुरा के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान की पहल की गई थी। इसके अतिरिक्तपवित्र तीर्थ जल योजनाके माध्यम से काशी और रामेश्वरम धाम के मध्य आध्यात्मिक सेतु स्थापित करने का प्रयास भी किया गया है। इसी क्रम में काशी और ब्रज धाम के बीच यह नई परंपरा सनातन संस्कृति के विस्तार और एकता को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

महाशिवरात्रि के इस पावन अवसर पर बाबा विश्वनाथ को अर्पित की गई यह भेंट श्रद्धालुओं के लिए भक्ति, समरसता और सांस्कृतिक गौरव की अनुपम अनुभूति लेकर आई। इस आयोजन ने केवल काशी और ब्रज के मध्य धार्मिक संबंधों को प्रगाढ़ किया, बल्कि देशभर के श्रद्धालुओं के बीच सनातन संस्कृति की व्यापकता और एकात्मता का संदेश भी प्रसारित किया।

श्री काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास ने इस पावन भेंट के लिए श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर न्यास के प्रति आभार व्यक्त करते हुए इसे सनातन परंपरा के संरक्षण और संवर्धन की महत्वपूर्ण पहल बताया है। साथ ही मंदिर न्यास ने भगवान शिव और भगवान श्रीकृष्ण के भक्तों को इस आध्यात्मिक नवाचार में सहभागी बनने पर शुभकामनाएं भी प्रेषित की हैं।


काशी में सजेगा शिव-गौरा विवाह का अद्भुत आसमानी श्रृंगार, महाशिवरात्रि पर पहली बार असमिया वैभव में दिखेंगे विश्वनाथ-गौरा

काशी में सजेगा शिव - गौरा विवाह का अद्भुत आसमानी श्रृंगार , महाशिवरात्रि पर पहली बार असमिया वैभव में दिखेंगे विश्वनाथ - गौरा...