Sunday, 24 May 2026

8 लाख उपभोक्ताओं का बोझ, 2 हजार बिजलीकर्मियों के भरोसे बनारस!

8 लाख उपभोक्ताओं का बोझ, 2 हजार बिजलीकर्मियों के भरोसे बनारस

22 हजार ट्रांसफॉर्मर, 500 से अधिक फीडर; बिजलीकर्मियों का सवालव्यवस्था ध्वस्त तो कार्रवाई हम पर क्यों?

उत्पीड़नात्मक कार्रवाई के विरोध में कल भिखारीपुर स्थित प्रबंध निदेशक कार्यालय पर बिजलीकर्मी करेंगे प्रदर्शन, संघर्ष समिति ने प्रबंधन पर संवादहीनता का लगाया आरोप

सुरेश गांधी

वाराणसी। भीषण गर्मी के बीच बनारस की बिजली व्यवस्था को लेकर बिजली कर्मचारियों और प्रबंधन के बीच टकराव खुलकर सामने गया है। विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति ने दावा किया है कि शहर में आठ लाख से अधिक बिजली उपभोक्ता, 22 हजार से ज्यादा ट्रांसफॉर्मर और 500 से अधिक फीडरों की जिम्मेदारी महज दो हजार बिजलीकर्मियों के भरोसे छोड़ दी गई है।

मीडिया प्रभारी अंकुर पांडेय का कहना है कि निगम के निर्धारित मानकों के अनुसार कम से कम चार हजार कर्मचारियों की आवश्यकता है, लेकिन कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने के बजाय लगातार कटौती और कार्रवाई की जा रही है। संघर्ष समिति ने घोषणा की है कि कर्मचारियों के विरुद्ध जारी उत्पीड़नात्मक कार्रवाई के विरोध में सोमवार 25 मई को शाम तीन बजे भिखारीपुर स्थित प्रबंध निदेशक कार्यालय पर विरोध प्रदर्शन किया जाएगा।

समिति का कहना है कि उत्तर प्रदेश इस समय देश में सर्वाधिक बिजली मांग वाले राज्यों में शामिल है। तापमान बढ़ने के साथ बिजली की खपत लगातार नए स्तर पर पहुंच रही है। ऐसे में बिजली कर्मचारी दिन-रात फील्ड में काम कर निर्बाध विद्युत आपूर्ति बनाए रखने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन दूसरी ओर प्रबंधन का रवैया कर्मचारियों के प्रति कठोर और एकतरफा बना हुआ है।

संघर्ष समिति ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री के निर्देशों के अनुरूप बिजली कर्मचारी पूरी निष्ठा के साथ काम कर रहे हैं, लेकिन प्रबंधन कर्मचारियों और अभियंताओं के साथ संवाद स्थापित करने को तैयार नहीं है। बिजली व्यवस्था में सुधार के लिए कर्मचारियों की ओर से कई व्यावहारिक सुझाव दिए गए, मगर उन पर विचार करने के बजाय कार्रवाई का रास्ता अपनाया जा रहा है। समिति ने यह भी आरोप लगाया कि वर्टिकल रिस्ट्रक्चरिंग जैसे निर्णय बिना कर्मचारियों को विश्वास में लिए लागू किए गए।

इसके अलावा 20 से 25 वर्षों का अनुभव रखने वाले कई संविदा कर्मचारियों को कार्य से अलग कर दिया गया, जिसका सीधा असर बिजली व्यवस्था पर पड़ा है। समिति के अनुसार इसका नुकसान उपभोक्ताओं को उठाना पड़ रहा है, क्योंकि अब कई बार लोगों को यह तक स्पष्ट नहीं हो पा रहा कि उनकी समस्या का समाधान कौन करेगा। बिजली कर्मचारियों का कहना है कि आगामी दिनों में तापमान और बढ़ने की संभावना है तथा बिजली मांग भी नए रिकॉर्ड बना सकती है। ऐसी स्थिति में व्यवस्था को मजबूत करने के लिए टकराव नहीं, बल्कि संवाद और समन्वय की आवश्यकता है।

प्रमुख बिंदु

बनारस में 8 लाख से अधिक बिजली उपभोक्ता

22 हजार से अधिक ट्रांसफॉर्मर संचालन में

500 से अधिक फीडरों का नेटवर्क

मात्र 2000 कर्मचारियों के सहारे पूरी व्यवस्था

निगम मानक के अनुसार 4000 कर्मचारियों की जरूरत

25 मई को भिखारीपुर में विरोध प्रदर्शन

गर्मी बढ़ी, फॉल्ट बढ़े और बढ़ा दबाव

गर्मी के बढ़ते असर के साथ शहर में ट्रांसफॉर्मरों पर लोड बढ़ने और लोकल फॉल्ट की घटनाएं भी बढ़ रही हैं। ऐसे में सीमित संख्या में कर्मचारियों पर कई-कई क्षेत्रों की जिम्मेदारी गई है। कई इलाकों में शिकायतों के निस्तारण में देरी होने से उपभोक्ताओं की नाराजगी भी बढ़ रही है। बिजलीकर्मियों का कहना है कि पर्याप्त स्टाफ और संसाधन के बिना व्यवस्था को सुचारु रखना बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।

नमो घाट की मौत और काशी का मौन : जब सुरक्षा के हाथों कुचली जाए इंसानियत

नमो घाट की मौत और काशी का मौन : जब सुरक्षा के हाथों कुचली जाए इंसानियत 

घाटों से लेकर बड़े आयोजनों और कई सार्वजनिक स्थलों तक निजी बाउंसरों की मौजूदगी तेजी से बढ़ी है। सुरक्षा व्यवस्था के नाम पर कई जगह इनकी भूमिका भी बढ़ी है। हालांकि सवाल यह उठने लगा है कि क्या कहीं यह व्यवस्था नियंत्रण से आगे जाकर भय का कारण तो नहीं बन रही? शहर में चर्चाएं यह भी हैं कि अनुशासन और कठोरता के बीच की सीमा कई बार धुंधली होती दिखाई देती है। काशी पूछ रही है... क्या सुरक्षा के नाम पर शक्ति प्रदर्शन का लाइसेंस बांटा जा रहा है? क्या कानून अब वर्दी या निजी ड्रेस देखकर बदल जाएगा? क्या पहले उठी शिकायतों पर समय रहते ध्यान दिया गया होता तो यह घटना टल सकती थी? क्या घाटों पर आने वाले श्रद्धालु और पर्यटक सुरक्षित महसूस कर रहे हैं? काशी की पहचान श्रद्धा से है, भय से नहीं 

सुरेश गांधी

काशी केवल एक शहर नहीं है। यह भारत की आत्मा है, सभ्यता की चेतना है और वह आस्था है जहां आने वाला हर व्यक्ति अपने भीतर एक शांति लेकर लौटने की उम्मीद करता है। यहां आने वाला पर्यटक केवल घाट नहीं देखता, वह संस्कृति देखता है; वह मंदिरों के शिखर नहीं, बल्कि भारत की आध्यात्मिक विरासत का दर्शन करता है। लेकिन जब इसी काशी में सुरक्षा के नाम पर खड़े लोग किसी युवक को पीट-पीटकर मौत के घाट उतार दें, तब सवाल केवल कानून-व्यवस्था का नहीं रह जाता, बल्कि समाज की संवेदनशीलता और प्रशासनिक व्यवस्था की आत्मा पर भी उठता है।

नमो घाट पर हुई कथित बर्बर पिटाई और उसमें एक युवक की मौत ने पूरे शहर को झकझोर दिया है। आरोप है कि मामूली विवाद के बाद एक पर्यटक को निजी सुरक्षा गार्डों और बाउंसरों ने हॉकी, रॉड और डंडों से बेरहमी से पीटा, जिससे उसकी जान चली गई। यदि यह आरोप जांच में पूरी तरह सही साबित होते हैं तो यह केवल हत्या नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता का ऐसा उदाहरण होगा, जिसने काशी के चेहरे पर एक गहरा दाग लगा दिया है। यह घटना कई ऐसे सवाल छोड़ गई है जिन्हें केवल पुलिसिया कार्रवाई से शांत नहीं किया जा सकता। चार लोगों की गिरफ्तारी निश्चित रूप से कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन क्या केवल कुछ गिरफ्तारियां उस मानसिकता को समाप्त कर देंगी, जो सुरक्षा की आड़ में शक्ति प्रदर्शन को अधिकार समझने लगती है?

सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि सुरक्षा और आतंक के बीच की रेखा आखिर इतनी धुंधली कैसे होती जा रही है? सुरक्षा कर्मियों का कार्य व्यवस्था बनाए रखना, लोगों की रक्षा करना और अनुशासन स्थापित करना होता है। लेकिन जब वही लोग कथित तौर पर कानून हाथ में लेकर दंड देने लगें, तब स्थिति खतरनाक हो जाती है। कानून किसी व्यक्ति, समूह या निजी संस्था को यह अधिकार नहीं देता कि वह मौके पर ही फैसला करे और सजा भी सुना दे। वास्तविक चिंता का विषय यह है कि वाराणसी में ऐसी घटनाओं की चर्चा पहली बार नहीं हो रही। घाटों, धार्मिक स्थलों और भीड़भाड़ वाले इलाकों में निजी बाउंसरों और सुरक्षा कर्मियों के व्यवहार को लेकर समय-समय पर शिकायतें सामने आती रही हैं। कई लोगों ने कथित तौर पर दुर्व्यवहार, दबंगई और मारपीट जैसे आरोप लगाए हैं। यदि लगातार शिकायतें उठ रही थीं, तो क्या उन पर गंभीरता से ध्यान दिया गया? यदि पहले ही कठोर कार्रवाई होती तो क्या आज एक परिवार का बेटा जीवित होता?

आज आधुनिकता की चमक में शहर तेजी से बदल रहे हैं। वाराणसी भी स्मार्ट सिटी परियोजनाओं के माध्यम से नई पहचान बना रहा है। चौड़ी सड़कें, सुंदर घाट, आकर्षक प्रकाश व्यवस्था और आधुनिक सुविधाएं शहर के विकास का संकेत हैं। लेकिन विकास केवल सीमेंट, पत्थर और रोशनी से नहीं मापा जाता। किसी भी शहर की वास्तविक पहचान उसके नागरिकों की सुरक्षा, संवेदनशीलता और व्यवस्था के मानवीय स्वरूप से बनती है। यदि किसी स्थान पर जाने वाला व्यक्ति यह सोचने लगे कि वहां अपराधियों से नहीं, बल्कि सुरक्षा के नाम पर खड़े लोगों से डरना पड़ेगा, तो यह स्थिति गंभीर चिंता का विषय है। सुरक्षा का अर्थ भय पैदा करना नहीं, बल्कि विश्वास पैदा करना है। जब विश्वास टूटता है तो केवल एक घटना नहीं होती, बल्कि पूरे तंत्र की साख पर प्रश्नचिह्न लग जाता है।

इस घटना का एक सामाजिक पक्ष भी है, जो कहीं अधिक दर्दनाक है। जिस युवक की जान गई, वह किसी बड़े परिवार या प्रभावशाली पृष्ठभूमि से नहीं था। बताया जा रहा है कि वह सब्जी बेचकर अपने परिवार का भरण-पोषण करता था। घर की जिम्मेदारियां उसके कंधों पर थीं। एक सामान्य परिवार का बेटा कुछ दोस्तों के साथ घूमने निकला था, लेकिन घर लौटने के बजाय उसकी अर्थी लौट आई। यह केवल एक व्यक्ति की मौत नहीं, बल्कि एक परिवार के सपनों की मृत्यु भी है। इस समय आवश्यकता केवल अपराधियों को पकड़ने की नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की समीक्षा करने की है। निजी सुरक्षा एजेंसियों के चयन, प्रशिक्षण, जवाबदेही और अधिकारों की स्पष्ट सीमाएं तय होनी चाहिए। सार्वजनिक स्थलों पर तैनात कर्मियों के लिए आचार संहिता का कड़ाई से पालन कराया जाना चाहिए। यह भी सुनिश्चित करना होगा कि किसी व्यक्ति को कानून अपने हाथ में लेने की छूट न मिले।

काशी की पहचान भय से नहीं, विश्वास से बनी है। यह शहर मृत्यु को भी मोक्ष का दर्शन देने वाला माना जाता है, लेकिन यदि यहां जीवन ही असुरक्षित हो जाए तो यह चिंता केवल प्रशासन की नहीं, पूरे समाज की होनी चाहिए। नमो घाट की यह घटना केवल एक अपराध की कहानी नहीं है। यह चेतावनी है कि यदि शक्ति और जिम्मेदारी के बीच संतुलन बिगड़ जाए, तो सुरक्षा भी कभी-कभी भय का दूसरा नाम बन सकती है। और यदि समाज इस पर मौन रहा, तो कल यह प्रश्न किसी और घाट, किसी और सड़क और किसी और परिवार के सामने खड़ा हो सकता है।

घाट पर दर्शन नहीं, डर की चर्चा

नमो घाट पर हुई घटना के बाद घाटों पर आने वाले लोगों के बीच सबसे ज्यादा चर्चा सुरक्षा व्यवस्था नहीं, बल्कि कथित तौर पर बढ़ती दबंगई की सुनाई दी। कई लोगों का कहना है कि घाटों पर तैनात कुछ निजी सुरक्षा कर्मियों का व्यवहार कई बार जरूरत से अधिक आक्रामक दिखाई देता है। लोगों का कहना है कि श्रद्धालुओं को निर्देश देने और उनके साथ व्यवहार करने के तरीके पर गंभीर प्रश्न खड़े होते रहे हैं। एक स्थानीय युवक ने कहा, सुरक्षा जरूरी है, लेकिन सुरक्षा के नाम पर किसी को अपमानित करने या डराने का अधिकार किसी को नहीं होना चाहिए।

सवालों के घेरे में निजी सुरक्षा का सिस्टम

वाराणसी में घाटों, आयोजनों और कई सार्वजनिक स्थलों पर बड़ी संख्या में निजी सुरक्षा एजेंसियों के कर्मचारी तैनात हैं। सवाल यह उठ रहा है कि इन कर्मियों को किस प्रकार का प्रशिक्षण दिया जाता है? क्या उन्हें भीड़ नियंत्रण और संवाद की तकनीक सिखाई जाती है या केवल शक्ति प्रदर्शन ही व्यवस्था का माध्यम बनता जा रहा है? विशेषज्ञों का मानना है कि सुरक्षा कर्मी और कानून लागू करने वाली एजेंसियां अलग-अलग जिम्मेदारियां निभाती हैं। निजी सुरक्षा का काम व्यवस्था बनाए रखना है, कानून हाथ में लेना नहीं।

एक बेटे की मौत, घर में बुझ गया चूल्हा

सोनभद्र के गांव में जैसे ही राजेश उर्फ चिंटू की मौत की सूचना पहुंची, पूरे इलाके में सन्नाटा पसर गया। बताया जा रहा है कि वह परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी संभालता था। रोज सब्जी बेचकर घर चलाने वाला युवक दोस्तों के साथ घूमने निकला था, लेकिन वापस लौटा तो शव बनकर। परिवार के लोगों की आंखों में एक ही सवाल थाघूमने गया बेटा आखिर किस अपराध की सजा लेकर लौटा?

8 लाख उपभोक्ताओं का बोझ, 2 हजार बिजलीकर्मियों के भरोसे बनारस!

8 लाख उपभोक्ताओं का बोझ , 2 हजार बिजलीकर्मियों के भरोसे बनारस !  22 हजार ट्रांसफॉर्मर , 500 से अधिक फीडर ; बिजलीकर्मियों का सव...