Thursday, 21 May 2026

काशी बनेगी ब्रिक्स संस्कृति संवाद का वैश्विक मंच, तैयारियों ने पकड़ी रफ्तार

काशी बनेगी ब्रिक्स संस्कृति संवाद का वैश्विक मंच, तैयारियों ने पकड़ी रफ्तार 

4-5 जून को ताज होटल में जुटेंगे ब्रिक्स देशों के प्रतिनिधि | संस्कृति कार्य समूह की बैठक को लेकर प्रशासन अलर्ट | काशी की विरासत, आतिथ्य और सांस्कृतिक पहचान दिखाने की तैयारी 

सुरेश गांधी

वाराणसी। विश्व मंच पर अपनी सांस्कृतिक पहचान को और अधिक सशक्त करने की दिशा में काशी एक बार फिर महत्वपूर्ण भूमिका निभाने जा रही है। आगामी ब्रिक्स सम्मेलन के अंतर्गत आयोजित होने वाले संस्कृति कार्य समूह (कल्चर वर्किंग ग्रुप) की मेजबानी को लेकर प्रशासनिक तैयारियां तेज हो गई हैं। इसी क्रम में बुधवार को कमिश्नरी सभागार में मंडलायुक्त एस. राजलिंगम और भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय की निदेशक श्रीमती प्रियंका चंद्र की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक आयोजित की गई, जिसमें कार्यक्रम से जुड़ी व्यवस्थाओं को अंतिम रूप देने पर व्यापक चर्चा हुई।

बैठक में ब्रिक्स देशों से आने वाले प्रतिनिधियों और अतिथियों के स्वागत से लेकर सुरक्षा, यातायात, सांस्कृतिक कार्यक्रम, आवागमन, स्वच्छता, प्रकाश व्यवस्था और आतिथ्य प्रबंधन जैसे विभिन्न पहलुओं पर विस्तृत मंथन हुआ। अधिकारियों को निर्देश दिया गया कि प्रत्येक व्यवस्था समयबद्ध और समन्वित तरीके से सुनिश्चित की जाए ताकि किसी प्रकार की असुविधा की स्थिति उत्पन्न न हो। मंडलायुक्त एस. राजलिंगम ने कहा कि यह आयोजन केवल एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन भर नहीं, बल्कि काशी की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और उसकी प्राचीन पहचान को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करने का एक महत्वपूर्ण अवसर है। उन्होंने कहा कि दुनिया के विभिन्न देशों के प्रतिनिधि जब काशी आएंगे तो यहां की आध्यात्मिकता, परंपरा, संस्कृति और आतिथ्य का अनुभव भी अपने साथ लेकर जाएंगे। इसलिए सभी विभाग आपसी समन्वय के साथ कार्य करें और निर्धारित समयसीमा के भीतर तैयारियां पूरी करें।

बैठक में अधिकारियों ने आयोजन स्थल से लेकर अतिथियों की आवाजाही तक की व्यवस्थाओं की विस्तृत जानकारी प्रस्तुत की। नगर निगम को स्वच्छता और सौंदर्यीकरण की जिम्मेदारी सौंपी गई, जबकि लोक निर्माण विभाग को मार्गों की स्थिति और मरम्मत कार्यों पर ध्यान देने के निर्देश दिए गए। पुलिस प्रशासन को सुरक्षा और यातायात प्रबंधन के लिए व्यापक कार्ययोजना तैयार करने को कहा गया। बताया गया कि भारत इस वर्ष "लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण" थीम के तहत ब्रिक्स देशों और सहयोगी देशों की विभिन्न बैठकों का आयोजन कर रहा है। इसी श्रृंखला के अंतर्गत आगामी 4 और 5 जून को वाराणसी के ताज होटल में ब्रिक्स संस्कृति कार्य समूह की बैठक आयोजित होगी। सम्मेलन में आने वाले प्रतिनिधियों का आगमन चार अलग-अलग समूहों में प्रस्तावित है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह आयोजन काशी के लिए केवल एक कूटनीतिक अवसर नहीं, बल्कि पर्यटन और सांस्कृतिक पहचान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और मजबूत करने का भी महत्वपूर्ण माध्यम साबित हो सकता है। काशी की संगीत परंपरा, गंगा तट, मंदिर संस्कृति, हस्तशिल्प और प्राचीन विरासत को दुनिया के सामने प्रस्तुत करने का अवसर इस सम्मेलन के जरिए मिलेगा। बैठक में जिलाधिकारी सत्येंद्र कुमार, अपर पुलिस आयुक्त शिवहरि मीणा, विकास प्राधिकरण उपाध्यक्ष पूर्ण बोरा, नगर आयुक्त हिमांशु नागपाल, एडीएम प्रशासन पंकज कुमार, एडीएम सिटी राजेश जी, एडीएम प्रोटोकॉल विनय कुमार, एडीएम एफआर सदानंद गुप्ता, एसडीएम पिंडरा प्रतिभा मिश्रा सहित संबंधित विभागों के अधिकारी उपस्थित रहे।

ब्रिक्स सम्मेलन : एक नजर

आयोजन: 4-5 जून 2026

स्थान: ताज होटल, वाराणसी

विषय: संस्कृति कार्य समूह (Culture Working Group)

थीम: लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण

प्रतिनिधि: ब्राजील, चीन, भारत, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, इंडोनेशिया, रूस, दक्षिण अफ्रीका और संयुक्त अरब अमीरात समेत सहयोगी देश..

घर-घर पहुंचेगी विकास की दस्तक, आज से शुरू होगी जनगणना की बड़ी कवायद

घर-घर पहुंचेगी विकास की दस्तक, आज से शुरू होगी जनगणना की बड़ी कवायद 

22 मई से 20 जून तक चलेगा जनगणना अभियान | हर घर पहुंचेगी टीम, नागरिकों से सही जानकारी देने की अपील | डीएम बोलेयह सिर्फ आंकड़ों का नहीं, राष्ट्र निर्माण का अभियान

सुरेश गांधी

वाराणसी। शहर की गलियों से लेकर गांवों की चौपालों तक अब विकास की नई तस्वीर दर्ज होने जा रही है। जनपद में जनगणना-2027 के तहत वास्तविक जनगणना कार्य शुक्रवार 22 मई से शुरू होकर 20 जून तक चलेगा। इसके लिए प्रशासन ने अपनी तैयारियां पूरी कर ली हैं। प्रशिक्षित प्रगणकों और सुपरवाइजरों की तैनाती कर दी गई है और उन्हें संबंधित क्षेत्र के नक्शे, ड्यूटी कार्ड तथा जनगणना किट उपलब्ध करा दी गई हैं।

जिलाधिकारी एवं प्रमुख जिला जनगणना अधिकारी सत्येंद्र कुमार ने स्पष्ट किया कि जनगणना केवल सरकारी प्रक्रिया नहीं, बल्कि देश के विकास की दिशा तय करने वाला एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय अभियान है। उन्होंने कहा कि इसमें जनता की सक्रिय भागीदारी सबसे महत्वपूर्ण है। सही आंकड़े ही भविष्य की योजनाओं का आधार बनते हैं और इसी के आधार पर शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, रोजगार तथा अन्य विकास कार्यों की दिशा तय होती है।

डीएम ने कहा कि सभी प्रगणकों और पर्यवेक्षकों को निर्देश दिए गए हैं कि वे अपने निर्धारित क्षेत्रों में भौतिक रूप से पहुंचकर पूरी पारदर्शिता और जिम्मेदारी के साथ कार्य संपादित करें। किसी भी स्तर पर लापरवाही या शिथिलता स्वीकार नहीं की जाएगी। जनगणना कार्य को निष्पक्षता और समयबद्धता के साथ पूरा करना प्रशासन की प्राथमिकता है। प्रशासन की ओर से यह भी सुनिश्चित किया गया है कि तैनात किए गए सभी कार्मिक प्रशिक्षण प्राप्त हों और जनगणना प्रक्रिया की बारीकियों से परिचित हों। उन्हें घर-घर जाकर सूचनाओं के संकलन की जिम्मेदारी सौंपी गई है। अधिकारियों को निर्देशित किया गया है कि किसी भी स्तर पर भ्रम या त्रुटि की स्थिति बने।

इस बार जनगणना के पहले चरण में मकान सूचीकरण और मकानों की गणना से जुड़ी सूचनाओं का संकलन किया जाएगा। यह प्रक्रिया सीमित समयावधि में पूरी की जानी है। ऐसे में नागरिकों से अपेक्षा की गई है कि जब जनगणना दल उनके घर पहुंचे तो वे सही और पूरी जानकारी उपलब्ध कराएं। प्रशासन का कहना है कि नागरिकों द्वारा दी गई सटीक जानकारी आने वाले वर्षों में विकास योजनाओं की नींव तय करेगी। जिलाधिकारी ने जनपदवासियों से अपील करते हुए कहा कि जनगणना दल को सहयोग देना प्रत्येक नागरिक का दायित्व है। यदि सभी लोग जिम्मेदारी के साथ अपनी भूमिका निभाते हैं तो वाराणसी जनगणना-2027 में प्रदेश के अग्रणी जिलों में शामिल हो सकता है।

उन्होंने अब तक नागरिकों से मिले सहयोग के लिए आभार भी जताया और कहा कि सामूहिक प्रयास से ही यह अभियान सफल होगा। प्रशासन की कोशिश है कि जनगणना का कार्य पारदर्शी, त्रुटिरहित और समयसीमा के भीतर पूरा हो।

जनगणना को लेकर प्रशासन की ओर से दो संदेश भी दिए गए हैं

हमारी जनगणनाहमारा विकास

सही जनगणनासशक्त भारत

क्या होगा पहले चरण में?

घरों और भवनों का सूचीकरण

मकानों से जुड़ी आधारभूत जानकारी का संकलन

प्रगणकों द्वारा घर-घर जाकर जानकारी जुटाना

सीमित समयावधि में पूरे जिले का सर्वेक्षण

नागरिक क्या करें?

प्रगणकों को सही और पूरी जानकारी दें

आवश्यक दस्तावेज और सूचनाएं तैयार रखें

गलत या अधूरी जानकारी देने से बचें

जनगणना टीम के साथ सहयोग करें

सांसारिक दौड़ के बीच आत्मा का विराम है पुरुषोत्तम मास

सांसारिक दौड़ के बीच आत्मा का विराम है पुरुषोत्तम मास 

कभी आपने सोचा है कि यदि जीवन की भागती हुई घड़ी अचानक कुछ अतिरिक्त दिन दे दे तो मनुष्य उनका क्या करेगा? शायद कुछ लोग और धन कमाने की योजना बनाएंगे, कुछ अधूरे काम पूरे करेंगे और कुछ नई इच्छाओं की सूची तैयार कर लेंगे। लेकिन भारतीय संस्कृति ने इन अतिरिक्त दिनों को एक बिल्कुल अलग अर्थ दिया है। उसने कहा, यह समय संसार बढ़ाने के लिए नहीं, स्वयं को बेहतर बनाने के लिए है। यही समय है पुरुषोत्तम मास का। भारतीय पंचांग में आने वाला यह मास केवल गणितीय गणना का परिणाम नहीं है। यह केवल चंद्र और सूर्य की गति के अंतर को संतुलित करने का उपाय भी नहीं है। सनातन परंपरा ने इसे भगवान विष्णु के नाम से जोड़कर साधना, आत्मशुद्धि और भक्ति का ऐसा पर्व बना दिया, जिसमें मनुष्य बाहरी उपलब्धियों से अधिक भीतर की यात्रा पर निकलता है। कहा जाता है कि जिस अतिरिक्त महीने को कभी उपेक्षित समझा गया, उसे स्वयं भगवान विष्णु ने अपना नाम देकर पुरुषोत्तम मास बना दिया। शायद इसलिए यह महीना जीवन का भी एक बड़ा संदेश देता है कि ईश्वर की दृष्टि में कोई भी तुच्छ नहीं होता। आज के दौर में, जब मोबाइल की स्क्रीन की चमक चेहरों की मुस्कान से अधिक दिखाई देने लगी है, जब व्यस्तता ने मनुष्य को स्वयं से दूर कर दिया है, तब पुरुषोत्तम मास केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं रह जाता, बल्कि यह आत्मसंवाद का अवसर बन जाता है। यह मानो समय का संदेश है, कुछ देर ठहरो, संसार बाद में भी मिलेगा, पहले स्वयं से मिलो 

सुरेश गांधी

कभी-कभी जीवन की भागती हुई घड़ी के बीच समय स्वयं ठहरकर मनुष्य से कहता है अब बाहर नहीं, भीतर देखो। भारतीय संस्कृति में एक ऐसा ही समय आता है, जिसे केवल तिथि या कैलेंडर का हिस्सा नहीं माना जाता, बल्कि आत्मा के परिष्कार और ईश्वर से निकटता का दुर्लभ अवसर समझा जाता है। यह है पुरुषोत्तम मास, जिसे सामान्य भाषा में अधिक मास भी कहा जाता है। सामान्य दिनों में मनुष्य संसार की दौड़ में उलझा रहता है। इच्छाएं, आवश्यकताएं, प्रतिस्पर्धा और संघर्ष उसे बाहर की ओर खींचते रहते हैं, लेकिन पुरुषोत्तम मास मानो जीवन के बीच एक विराम चिह्न है। यह केवल अतिरिक्त दिनों का जोड़ नहीं, बल्कि जीवन में अतिरिक्त चेतना जोड़ने का काल है। यह वह समय है, जब भारतीय परंपरा मनुष्य से कहती है कि धन, प्रतिष्ठा और उपलब्धियों की चिंता कुछ क्षण के लिए छोड़कर स्वयं के भीतर झांकिए। पुरुषोत्तम मास की विशेषता यह है कि यह केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। इसके भीतर दर्शन है, विज्ञान है, अध्यात्म है और मनुष्य के आत्मिक विकास का एक गहरा संदेश छिपा हुआ है। इस मास में समय मानो तपस्वी बन जाता है और मनुष्य को भी तप, संयम और भक्ति के मार्ग पर चलने का निमंत्रण देता है।

भारतीय पंचांग चंद्रमा और सूर्य दोनों की गति पर आधारित है। सूर्य वर्ष लगभग 365 दिन 6 घंटे का होता है, जबकि चंद्र वर्ष लगभग 354 दिन का होता है। इस प्रकार दोनों के बीच लगभग 11 दिनों का अंतर पैदा हो जाता है। यदि इस अंतर को संतुलित किया जाए तो ऋतुएं और पर्व धीरे-धीरे अपने वास्तविक समय से हटने लगेंगे। इसी अंतर को संतुलित करने के लिए लगभग 32 महीने 16 दिन 8 घंटे के बाद एक अतिरिक्त मास जोड़ा जाता है, जिसे अधिक मास कहा जाता है। लेकिन भारतीय आध्यात्मिक परंपरा ने इसे मात्र गणितीय प्रक्रिया नहीं रहने दिया। इसे भगवान विष्णु से जोड़कर पुरुषोत्तम मास के रूप में प्रतिष्ठित किया गया। पद्मपुराण की कथा के अनुसार, जब यह अतिरिक्त मास उत्पन्न हुआ तो उसकी कोई पहचान नहीं थी। किसी देवता ने उसे अपना नाम देने को स्वीकार नहीं किया। सभी ने उसे तिरस्कार की दृष्टि से देखा। दुखी होकर वह मास भगवान विष्णु के पास पहुंचा। उसने कहा, प्रभु! मेरा कोई सम्मान नहीं करता। मुझे अशुभ और उपेक्षित समझा जाता है। भगवान विष्णु करुणा से भर उठे। उन्होंने कहा, मैं तुम्हें अपना नाम देता हूं। अब तुम पुरुषोत्तम मास कहलाओगे। जो व्यक्ति इस मास में भक्ति करेगा, वह मेरे विशेष आशीर्वाद का अधिकारी होगा।

यह केवल कथा नहीं, बल्कि एक गहरा जीवन-दर्शन है। समाज जिन चीजों को उपेक्षित समझता है, ईश्वर उन्हीं में भी मूल्य खोज लेते हैं। कथा हमें यह भी सिखाती है कि किसी व्यक्ति या परिस्थिति को केवल बाहरी दृष्टि से नहीं आंकना चाहिए। कभी-कभी उपेक्षित दिखने वाली चीजें ही सबसे अधिक मूल्यवान सिद्ध होती हैं। पुरुषोत्तम शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है पुरुष उत्तम अर्थात् सभी पुरुषों या जीवों में श्रेष्ठ। भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं, यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः। अर्थात मैं नश्वर और अविनाशी दोनों से परे हूं, इसलिए मैं पुरुषोत्तम हूं। इस प्रकार यह मास केवल अतिरिक्त समय नहीं, बल्कि परम चेतना से जुड़ने का अवसर है।

भारतीय संस्कृति में समय का दर्शन

भारतीय परंपरा समय को केवल घड़ी की सुई या कैलेंडर की तारीख नहीं मानती। यहां समय को भी जीवंत सत्ता माना गया है। हमारे यहां कहा गया, कालो हि दुरतिक्रमः अर्थात समय से बढ़कर कुछ नहीं। इसीलिए भारतीय जीवन में समय को भी पूजा गया है। सुबह ब्रह्ममुहूर्त, संध्या वंदन, एकादशी, पूर्णिमा, अमावस्या सब समय की पवित्रता को दर्शाते हैं। पुरुषोत्तम मास इसी विचार का विस्तार है। यह हमें बताता है कि यदि समय का उपयोग सही दिशा में हो जाए तो जीवन बदल सकता है।

पुरुषोत्तम मास में क्या करना चाहिए?

शास्त्रों के अनुसार इस मास में कुछ विशेष कार्य अत्यंत पुण्यदायक माने गए हैं :-

1. भगवान विष्णु की उपासना : इस मास में भगवान विष्णु की पूजा का विशेष महत्व माना गया है। विष्णुसहस्रनाम का पाठ, गीता पाठ, श्रीमद्भागवत श्रवण, रामायण पाठ, मंत्र जाप. इनका विशेष फल बताया गया है।

2. दान : भारतीय संस्कृति में दान केवल वस्तु देने का कार्य नहीं है, बल्कि अहंकार त्यागने का अभ्यास भी है। इस मास में अन्नदान, वस्त्रदान, गौसेवा, जलदान, गरीबों की सहायता विशेष फलदायी माने जाते हैं।

3. व्रत और संयम : पुरुषोत्तम मास केवल भोजन त्यागने का नाम नहीं है। सच्चा व्रत है क्रोध का त्याग, कटु वचन का त्याग, बुरी आदतों से दूरी, आत्मसंयम. यदि व्यक्ति केवल भोजन छोड़ दे और व्यवहार में कटुता बनाए रखे, तो व्रत अधूरा माना गया है।

4. सत्संग : मनुष्य जैसा सुनता है, वैसा ही बनने लगता है। इसलिए इस मास में सत्संग, धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन और श्रेष्ठ विचारों का चिंतन विशेष महत्व रखता है।

पुरुषोत्तम मास में विवाह और मांगलिक कार्य नहीं होते?

परंपरागत रूप से इस मास में विवाह, गृहप्रवेश और कुछ बड़े मांगलिक कार्यों को स्थगित रखा जाता है। इसके पीछे केवल धार्मिक कारण नहीं, बल्कि एक सामाजिक और आध्यात्मिक दृष्टि भी दिखाई देती है। मनुष्य का अधिकांश समय सांसारिक कार्यों में बीतता है। इसलिए वर्ष के इस विशेष समय को केवल आध्यात्मिक चिंतन के लिए सुरक्षित रखा गया। यह ऐसा है जैसे भागते हुए जीवन में कुछ समय आत्मा के लिए बचा लिया जाए।

यह अंधविश्वास है या विज्ञान?

कुछ लोग प्रश्न करते हैं कि अतिरिक्त मास का धार्मिक महत्व क्यों? वास्तव में इसकी शुरुआत खगोल विज्ञान से हुई। चंद्र और सौर वर्ष के बीच अंतर को संतुलित करने के लिए अधिक मास आवश्यक था। लेकिन भारतीय मनीषियों की विशेषता यह थी कि उन्होंने विज्ञान को केवल गणना तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने उसे संस्कृति और अध्यात्म से जोड़ दिया। इस प्रकार यहां विज्ञान और अध्यात्म विरोधी नहीं, बल्कि पूरक बन गए।

आधुनिक जीवन और पुरुषोत्तम मास

आज मनुष्य के पास साधन अधिक हैं, लेकिन शांति कम है। मोबाइल की स्क्रीन चमक रही है, लेकिन चेहरों की चमक कम होती जा रही है। सूचनाएं बढ़ी हैं, लेकिन आत्मज्ञान घटता दिखाई देता है। सुविधाएं बढ़ी हैं, लेकिन संतोष घट रहा है। ऐसे समय में पुरुषोत्तम मास का संदेश पहले से अधिक प्रासंगिक हो जाता है। यह हमें बताता है, कुछ समय स्वयं को दीजिए। अपने भीतर उतरिए। संबंधों को सुधारिए। ईश्वर से संवाद कीजिए। सामाजिक दृष्टि से पुरुषोत्तम मास यह मास केवल व्यक्तिगत साधना तक सीमित नहीं है। इसके माध्यम से समाज में अनेक सकारात्मक कार्यों को बढ़ावा मिला :- गरीबों की सहायता, सामूहिक भजन, धार्मिक आयोजन, अन्नक्षेत्र, पर्यावरण संरक्षण, पुराने समय में लोग इस अवधि में वृक्षारोपण भी करते थे। क्योंकि भारतीय परंपरा केवल मनुष्य नहीं, संपूर्ण प्रकृति को परिवार मानती है।

साहित्य और पुरुषोत्तम मास

भारतीय साहित्य में भक्ति का स्वर अत्यंत व्यापक है। गोस्वामी तुलसीदास ने कहा, परहित सरिस धर्म नहि भाई। भक्ति साहित्य हमें केवल पूजा करना नहीं सिखाता, बल्कि दूसरों के लिए जीना भी सिखाता है। पुरुषोत्तम मास इसी भावना को और अधिक गहरा करता है।

पुरुषोत्तम मास का वास्तविक संदेश

यदि कोई व्यक्ति पूरे महीने पूजा करे, व्रत रखे, दान करे, लेकिन उसके भीतर अहंकार बना रहे तो पुरुषोत्तम मास अधूरा रह जाता है। इस मास का वास्तविक उद्देश्य है मन की सफाई, विचारों की शुद्धि, व्यवहार की मधुरता, ईश्वर के प्रति समर्पण, क्योंकि मनुष्य की सबसे बड़ी यात्रा बाहर नहीं, भीतर की यात्रा है।

जब अतिरिक्त समय, अतिरिक्त जीवन बन जाए

जीवन में अक्सर हम कहते हैं समय नहीं है. लेकिन पुरुषोत्तम मास मानो ईश्वर का उत्तर है लो, मैंने तुम्हें अतिरिक्त समय दिया है। अब इसे केवल खर्च मत करो, इसे सार्थक भी बनाओ। पुरुषोत्तम मास केवल पंचांग का अतिरिक्त अध्याय नहीं है, बल्कि जीवन का अतिरिक्त अवसर है। यह हमें याद दिलाता है कि मनुष्य केवल शरीर नहीं, केवल इच्छाओं का समूह नहीं, केवल सफलता का नाम नहीं है। उसके भीतर एक चेतना भी है, जिसे समय-समय पर जागृत करना आवश्यक है। जब संसार की दौड़ थका दे, जब मन अशांत हो जाए, जब उपलब्धियां भी खाली लगने लगेंतब पुरुषोत्तम मास का संदेश सुनाई देता है कुछ देर रुकिए, स्वयं से मिलिए, क्योंकि ईश्वर तक जाने का मार्ग बाहर नहीं, भीतर से होकर गुजरता है।

काशी बनेगी ब्रिक्स संस्कृति संवाद का वैश्विक मंच, तैयारियों ने पकड़ी रफ्तार

काशी बनेगी ब्रिक्स संस्कृति संवाद का वैश्विक मंच, तैयारियों ने पकड़ी रफ्तार  4-5 जून को ताज होटल में जुटेंगे ब्रिक्स देशों के प्रतिनिधि | ...