स्पीड पोस्ट की रफ्तार या सिस्टम की चूक?
ऑनलाइन ट्रैकिंग
में
'डिलीवर',
हकीकत
में
प्रेषक
के
पास
लौटी
डाक
ने
बढ़ाई
उलझन;
डिजिटल
व्यवस्था
में
तकनीक
के
साथ
मानवीय
जवाबदेही
पर
भी
बड़ा
सवाल
सुरेश गांधी
वाराणसी. डिजिटल भारत का सपना
केवल इंटरनेट, मोबाइल एप या कृत्रिम
बुद्धिमत्ता (एआई) तक सीमित
नहीं है। इसका सबसे
बड़ा आधार है—नागरिक
का विश्वास। जब कोई व्यक्ति
किसी सरकारी व्यवस्था का उपयोग करता
है, तो वह केवल
सेवा नहीं खरीदता, बल्कि
उस व्यवस्था की विश्वसनीयता पर
भरोसा भी करता है।
भारतीय डाक विभाग भी
इसी विश्वास की एक सदी
पुरानी विरासत का नाम है।
लेकिन यदि किसी स्पीड
पोस्ट की ऑनलाइन ट्रैकिंग
में पहले "आइटम डिलीर्वड (एड्रेस)"
दिखाई दे और कुछ
दिन बाद वही लिफाफा
प्रेषक के घर वापस
पहुँच जाए, तो सवाल
केवल एक पत्र का
नहीं रह जाता, बल्कि
पूरी डिजिटल ट्रैकिंग प्रणाली की विश्वसनीयता पर
खड़ा हो जाता है।
भारत में डाक
विभाग का इतिहास केवल
पत्रों का इतिहास नहीं
है, बल्कि भावनाओं, भरोसे और सामाजिक संबंधों
का इतिहास भी है। एक
समय था जब डाकिए
की घंटी पूरे परिवार
के चेहरे पर मुस्कान ला
देती थी। नौकरी का
नियुक्ति-पत्र, परीक्षा का परिणाम, बेटे
की चिट्ठी, पिता का संदेश
या किसी सैनिक का
पत्र—सब कुछ डाकिए
के हाथों से होकर गुजरता
था। उस दौर में
न बारकोड था, न डिजिटल
ट्रैकिंग, लेकिन भरोसा इतना मजबूत था
कि लोग महीनों तक
धैर्य से प्रतीक्षा करते
थे।
समय बदला। तकनीक
आई। बारकोड, ऑटोमैटिक सॉर्टिंग मशीन, ऑनलाइन ट्रैकिंग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता
ने डाक व्यवस्था को
पहले से कहीं अधिक
तेज़ और आधुनिक बना
दिया। यह बदलाव स्वागतयोग्य
भी है। आज कोई
भी नागरिक अपने मोबाइल पर
यह देख सकता है
कि उसका पत्र किस
डाकघर में है, कब
रवाना हुआ और कब
डिलीवर हुआ। लेकिन प्रश्न
तब उठता है, जब
स्क्रीन पर दिखाई देने
वाला सच और वास्तविकता
एक-दूसरे से मेल न
खाएँ।
यदि ऑनलाइन रिकॉर्ड
कहे कि "डिलीवरी हो गई", लेकिन
कुछ दिन बाद वही
पत्र वापस प्रेषक के
हाथ में आ जाए,
तो नागरिक किस पर विश्वास
करे? मोबाइल स्क्रीन पर दिखाई दे
रहे डिजिटल रिकॉर्ड पर या अपने
हाथ में पड़े लौटे
हुए लिफाफे पर? यह केवल
तकनीकी त्रुटि नहीं, बल्कि विश्वास का संकट है।
तकनीक की सबसे बड़ी
विशेषता उसकी गति है,
लेकिन सार्वजनिक सेवा की सबसे
बड़ी पहचान उसकी विश्वसनीयता है।
यदि गति बढ़े और
भरोसा घट जाए, तो
आधुनिकता का उद्देश्य अधूरा
रह जाता है। मशीनें
बारकोड पढ़ सकती हैं,
लेकिन वे परिस्थिति नहीं
समझतीं। वे केवल वही
करती हैं, जो उन्हें
निर्देशित किया गया है।
इसलिए अंतिम जिम्मेदारी आज भी उस
कर्मचारी की है, जो
स्क्रीन पर दिख रही
सूचना और लिफाफे पर
लिखे पते—दोनों को
देखकर निर्णय लेता है।
यहीं एक बड़ा
प्रश्न खड़ा होता है।
आज डाकघरों में पहले जैसी
भीड़ नहीं है। अंतर्देशीय
पत्र, पोस्टकार्ड और तार अब
इतिहास का हिस्सा बन
चुके हैं। अधिकांश व्यक्तिगत
संवाद मोबाइल और इंटरनेट पर
स्थानांतरित हो चुके हैं।
डाक विभाग के पास अब
मुख्यतः सरकारी पत्राचार, न्यायालयी दस्तावेज़, कानूनी नोटिस, बैंकिंग सेवाएँ और पार्सल जैसी
जिम्मेदारियाँ हैं। ऐसे में
अपेक्षा यह स्वाभाविक है
कि प्रत्येक महत्वपूर्ण पत्र पर पहले
से अधिक सावधानी बरती
जाए।
तकनीक ने काम का
स्वरूप बदला है, लेकिन
कहीं-कहीं ऐसा महसूस
होता है कि कर्मचारी
भी मशीन की गति
के साथ स्वयं को
मशीन जैसा बना बैठे
हैं। बारकोड स्कैन हुआ, स्क्रीन पर
संकेत आया और अगला
पैकेट आगे बढ़ गया।
प्रक्रिया पूरी हो गई,
लेकिन क्या हर बार
यह सुनिश्चित किया गया कि
पता सही है? क्या
किसी असामान्य स्थिति में मानवीय विवेक
का उपयोग किया गया? यही
वे छोटे-छोटे प्रश्न
हैं, जिनके उत्तर किसी भी सार्वजनिक
व्यवस्था की गुणवत्ता तय
करते हैं।
यहाँ उद्देश्य किसी
कर्मचारी या पूरे डाक
विभाग पर आरोप लगाना
नहीं है। भारतीय डाक
विभाग आज भी दुनिया
के सबसे बड़े और
सबसे विश्वसनीय डाक नेटवर्कों में
से एक है। देश
के दुर्गम पहाड़ों से लेकर सुदूर
द्वीपों तक उसकी पहुँच
है। लाखों कर्मचारी प्रतिदिन करोड़ों लोगों तक सेवाएँ पहुँचाते
हैं। इसलिए यदि कहीं तकनीकी
या प्रक्रियागत विसंगति दिखाई देती है, तो
उसे सुधार की दृष्टि से
देखना चाहिए।
डिजिटल व्यवस्था का अर्थ केवल
कंप्यूटर लगाना नहीं होता, बल्कि
ऐसा तंत्र विकसित करना होता है
जिसमें प्रत्येक डिजिटल प्रविष्टि वास्तविक स्थिति से मेल खाए।
यदि किसी कारण से
पत्र वापस भेजा जाता
है, तो ट्रैकिंग में
उसका कारण स्पष्ट और
पारदर्शी होना चाहिए। यदि
डिलीवरी नहीं हुई, तो
"Delivered" जैसी
प्रविष्टि नागरिक के विश्वास को
भ्रमित करती है। सार्वजनिक
सेवा में पारदर्शिता का
अर्थ केवल सूचना देना
नहीं, बल्कि सही सूचना देना
है।
आज जब सरकार
डिजिटल गवर्नेंस, ई-ऑफिस और
पेपरलेस प्रशासन की दिशा में
तेजी से आगे बढ़
रही है, तब डाक
विभाग की डिजिटल ट्रैकिंग
व्यवस्था भी उसी भरोसे
का हिस्सा है। इस भरोसे
को मजबूत करना उतना ही
आवश्यक है, जितना नई
तकनीक अपनाना। क्योंकि नागरिक का विश्वास किसी
सॉफ्टवेयर से नहीं, बल्कि
उसके सही अनुभव से
बनता है।
डिजिटल भारत की सफलता
केवल इस बात से
तय नहीं होगी कि
मशीनें कितनी तेज़ हैं, बल्कि
इस बात से होगी
कि नागरिक को कितनी सटीक,
पारदर्शी और भरोसेमंद सेवा
मिलती है। तकनीक व्यवस्था
को गति देती है,
लेकिन उसकी आत्मा आज
भी मानवीय संवेदनशीलता, जवाबदेही और सतर्कता में
ही बसती है।
अंततः प्रश्न मशीनों से नहीं, बल्कि
उस व्यवस्था से है जो
मशीनों का संचालन करती
है। यदि 'डिलीवर' हुआ
पत्र भी लौटकर घर
आ जाए, तो समस्या
केवल डाक की नहीं,
बल्कि उस विश्वास की
है, जिस पर डिजिटल
भारत की पूरी इमारत
खड़ी है। रफ्तार जितनी
आवश्यक है, उतनी ही
आवश्यक है सटीकता; क्योंकि
नागरिक को केवल सेवा
नहीं, भरोसा भी चाहिए।