जब अभिनेता नहीं, स्वयं सम्राट बन गए विक्रम सिंह चौहान
वाराणसी
की
सांस्कृतिक
चेतना
के
केंद्र
में
सजे
“सम्राट
विक्रमादित्य”
महानाट्य
ने
केवल
एक
नाट्य
प्रस्तुति
नहीं
दी,
बल्कि
इतिहास
को
जीवंत
कर
दिया।
इस
विराट
मंचन
का
सबसे
प्रभावशाली
चेहरा
बनकर
उभरे
कलाकार
विक्रम
सिंह
चौहान,
जिन्होंने
अपने
सशक्त
अभिनय
से
यह
सिद्ध
कर
दिया
कि
जब
कलाकार
अपने
पात्र
को
जीता
है,
तो
वह
केवल
अभिनय
नहीं
करताकृवह
एक
युग
को
पुनर्जीवित
करता
है।
उनकी
हर
चाल
में
राजसी
गरिमा,
हर
संवाद
में
न्याय
का
तेज
और
हर
भाव
में
प्रजा
के
प्रति
करुणा
स्पष्ट
दिखाई
दी।
ऐसा
प्रतीत
हुआ
मानो
स्वयं
सम्राट
विक्रमादित्य
मंच
पर
अवतरित
हो
गए
हों।
घोड़ों
की
टाप,
युद्ध
के
दृश्य
और
भव्य
दरबार
के
बीच
उनका
आत्मविश्वास
और
नियंत्रण
दर्शकों
को
बांधे
रखने
में
सफल
रहा।
यह
प्रस्तुति
केवल
मनोरंजन
नहीं,
बल्कि
सामाजिक
और
सांस्कृतिक
चेतना
का
संदेश
भी
थी,
न्याय,
धर्म
और
लोककल्याण
ही
सच्चे
नेतृत्व
की
पहचान
हैं।
विक्रम
सिंह
चौहान
ने
अपने
अभिनय
से
यह
स्पष्ट
कर
दिया
कि
रंगमंच
केवल
कला
नहीं,
बल्कि
समाज
को
दिशा
देने
का
सशक्त
माध्यम
भी
है
सुरेश गांधी
काशी की सांस्कृतिक
सरजमी पर जब “सम्राट
विक्रमादित्य” महानाट्य का मंच सजा,
तो दर्शकों ने केवल एक
भव्य आयोजन नहीं देखा, उन्होंने
इतिहास को सांस लेते
हुए महसूस किया। इस जीवंत इतिहास
के केंद्र में थे कलाकार
विक्रम सिंह चौहान, जिन्होंने
सम्राट की भूमिका को
इस तरह जिया कि
मंच और वास्तविकता के
बीच की रेखा धुंधली
हो गई। उनकी चाल
में राजसी गरिमा, स्वर में अधिकार,
और आंखों में न्याय का
तेज, हर दृश्य में
ऐसा प्रतीत हुआ मानो स्वयं
सम्राट विक्रमादित्य ही उपस्थित हों।
प्रस्तुत है वरिष्ठ पत्रकार
सुरेश गांधी के साथ उनकी
विस्तृत, संवेदनशील और गहराई से
भरी बातचीत के कुछ प्रमुख
अंश, जो न सिर्फ
विक्रम सिंह चौहान की
जुबानी एक युग की
कहानी महसूस हुई बल्कि उन्होंने
साफ शब्दों में कहा, अभिनय
नहीं, साधना है यह भूमिका...
सुरेश
गांधी
: विक्रमादित्य
जैसा
विराट
और
ऐतिहासिक
चरित्र
निभाना,
क्या
यह
केवल
अभिनय
है
या
उससे
कहीं
अधिक?
विक्रम
सिंह
चौहान
: सच कहूं तो यह
अभिनय नहीं, एक साधना है।
सम्राट विक्रमादित्य का नाम लेते
ही एक ऐसा व्यक्तित्व
सामने आता है, जिसमें
वीरता, न्याय, दानशीलता और करुणा का
अद्भुत संगम है। इस
चरित्र को निभाने के
लिए मैंने केवल संवाद याद
नहीं किए, बल्कि उनके
जीवन को महसूस करने
की कोशिश की। मंच पर
उतरते समय मैं खुद
को कलाकार नहीं, बल्कि उस युग का
प्रतिनिधि मानता हूँ।
सवाल
: आपके
अभिनय
की
वह
कौन-सी
विशेषता
रही,
जिसने
दर्शकों
को
इतना
प्रभावित
किया?
जवाब
: मैंने कोशिश की कि हर
भाव सजीव और स्वाभाविक
हो। जब मैं युद्ध
के दृश्य में होता हूँ,
तो भीतर से एक
योद्धा जागता है, और जब
दरबार में न्याय करता
हूँ, तो मन पूरी
तरह संतुलित और गंभीर हो
जाता है। सम्राट विक्रमादित्य
केवल पराक्रमी नहीं थे, वे
अत्यंत संवेदनशील शासक भी थे,
उसी संतुलन को दर्शकों तक
पहुँचाना ही मेरा उद्देश्य
था।
सवाल
: इतने
विशाल
मंचन,
घोड़े,
हाथी,
युद्ध
दृश्य,
के
बीच
अभिनय
करना
कितना
कठिन
रहा?
जवाब
: यह अनुभव अद्भुत और चुनौतीपूर्ण दोनों
रहा। जब मंच पर
वास्तविक घोड़े दौड़ते हैं,
युद्ध के दृश्य सामने
होते हैं और हजारों
दर्शकों की निगाहें आप
पर होती हैं, तब
एक अलग ही ऊर्जा
महसूस होती है। उस
क्षण अभिनय नहीं होता, आप
उस युग को जी
रहे होते हैं।
सवाल
: इस
महानाट्य
का
सामाजिक
और
सांस्कृतिक
संदेश
आप
कैसे
देखते
हैं?
जवाब
: यह नाटक समाज के
लिए एक आईना है।
आज के समय में
जब मूल्य और आदर्श कहीं
खोते नजर आते हैं,
यह मंचन हमें याद
दिलाता है कि एक
सशक्त समाज का आधार
न्याय, धर्म और जनकल्याण
होता है। यह नई
पीढ़ी को अपनी जड़ों
से जोड़ने का एक प्रभावी
माध्यम है।
सवाल
: आपकी
व्यक्तिगत
प्रेरणा
क्या
रही
इस
भूमिका
के
पीछे?
जवाब
: मेरी प्रेरणा स्वयं सम्राट विक्रमादित्य का व्यक्तित्व है।
उनका जीवन त्याग, समर्पण
और न्याय का प्रतीक है।
जब मैंने उनके बारे में
पढ़ा और समझा, तो
लगा कि यह भूमिका
निभाना मेरे लिए सौभाग्य
है। मैंने इसे केवल निभाया
नहीं, बल्कि आत्मसात किया है।
सवाल
: आज
के
युवाओं
के
लिए
आपका
क्या
संदेश
है?
जवाब
: मैं युवाओं से कहना चाहूँगा
कि अपने इतिहास को
जानें और उस पर
गर्व करें। हमारे पूर्वजों ने जो आदर्श
स्थापित किए हैं, वे
आज भी उतने ही
प्रासंगिक हैं। अगर हम
उन मूल्यों को अपनाएं, तो
समाज और राष्ट्र दोनों
मजबूत बनेंगे।
सवाल
: जब
आप
मंच
से
उतरते
हैं,
तो
क्या
वह
सम्राट
आपके
भीतर
बना
रहता
है?
जवाब
: (मुस्कुराते हुए) जी हाँ,
यह भूमिका ऐसी है जो
मंच से उतरने के
बाद भी आपके भीतर
रहती है। कई बार
ऐसा लगता है कि
विक्रमादित्य केवल एक पात्र
नहीं, बल्कि एक विचार हैं,
जो हर समय हमें
सही मार्ग पर चलने की
प्रेरणा देते हैं।
जब कला इतिहास बन जाती है
विक्रम सिंह चौहान का
अभिनय इस बात का
प्रमाण है कि जब
कलाकार अपने पात्र में
पूरी तरह डूब जाता
है, तो वह केवल
प्रस्तुति नहीं करता, वह
इतिहास रचता है। आज
के दौर में, जब
रंगमंच मनोरंजन तक सीमित होता
जा रहा है, ऐसे
कलाकार यह साबित करते
हैं कि कला समाज
को दिशा देने का
माध्यम भी हो सकती
है। वास्तव में, यह केवल
एक महानाट्य नहीं थाकृयह उस
स्वर्णिम युग की पुनर्रचना
थी, जिसे विक्रम सिंह
चौहान ने अपने अभिनय
से जीवंत कर दिया।