Sunday, 23 August 2026

सारनाथ में गूंजा हर-हर महादेव, बाबा सारंगनाथ का भव्य रुद्राभिषेक

सारनाथ में गूंजा हर-हर महादेव, बाबा सारंगनाथ का भव्य रुद्राभिषेक 

स्टाम्प एवं पंजीयन राज्य मंत्री रविंद्र जायसवाल ने सपरिवार किया दर्शन-पूजन

हजारों श्रद्धालु, कार्यकर्ता और प्रबुद्धजन हुए शामिल

रुद्राभिषेक के बाद जनकल्याण और क्षेत्र की सुख-समृद्धि की कामना

‘एक पेड़ मां के नाम अभियान के तहत मंदिर परिसर में हुआ पौधरोपण

भक्ति संगीत और भंडारे ने बांधा आध्यात्मिक समां

सुरेश गांधी

वाराणसी। सारनाथ स्थित प्राचीन बाबा सारंगनाथ महादेव मंदिर रविवार को आस्था, भक्ति और लोकमंगल की कामना से सराबोर रहा। शहर उत्तरी विधानसभा क्षेत्र में हर वर्ष की परंपरा के तहत बाबा सारंगनाथ महादेव का भव्य रुद्राभिषेक आयोजित किया गया। वैदिक मंत्रोच्चार और हर-हर महादेव के जयघोष के बीच श्रद्धालुओं ने बाबा का दर्शन-पूजन कर क्षेत्र की सुख-समृद्धि और जनकल्याण की मंगलकामना की।

कार्यक्रम में स्टाम्प एवं पंजीयन राज्य मंत्री रविंद्र जायसवाल ने सपरिवार पहुंचकर बाबा सारंगनाथ का दर्शन-पूजन किया। इस दौरान बड़ी संख्या में विधानसभा क्षेत्र के पदाधिकारी, कार्यकर्ता, प्रबुद्धजन और सम्मानित नागरिक मौजूद रहे। मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की भीड़ के बीच रुद्राभिषेक और पूजन का क्रम चलता रहा। भक्ति संगीत से पूरा परिसर शिवमय हो उठा और श्रद्धालु देर तक भजनों में झूमते रहे।

रुद्राभिषेक में उमड़ी आस्था

सुबह से ही बाबा सारंगनाथ के दरबार में श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया। विधि-विधान से रुद्राभिषेक के बाद भगवान शिव का पूजन-अर्चन किया गया। श्रद्धालुओं ने बाबा के दरबार में माथा टेककर परिवार की सुख-शांति, क्षेत्र की समृद्धि और समाज के कल्याण की प्रार्थना की। मंदिर परिसर में मौजूद लोगों के बीच धार्मिक उत्साह देखते ही बन रहा था।

एक पेड़ मां के नाम का संदेश

धार्मिक अनुष्ठान के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दिया गया। बाबा सारंगनाथ के दरबार में ‘एक पेड़ मां के नाम अभियान के तहत पौधरोपण किया गया। इस पहल के जरिए धार्मिक आस्था के साथ प्रकृति संरक्षण को जोड़ने का संदेश दिया गया। आयोजन में शामिल लोगों ने अधिक से अधिक पौधे लगाने और उनके संरक्षण का संकल्प लेने पर भी जोर दिया।

भक्ति के साथ भंडारे का स्वाद

रुद्राभिषेक और दर्शन-पूजन के बाद श्रद्धालुओं के लिए भंडारे का आयोजन हुआ। इसमें बड़ी संख्या में लोगों ने प्रसाद ग्रहण किया। बाटी-चोखा, चूरमा, दाल-चावल और खीर समेत विभिन्न प्रसाद श्रद्धालुओं को वितरित किए गए। भक्ति संगीत के बीच श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया और आयोजन का आनंद लिया। बाबा सारंगनाथ के दरबार में धार्मिक अनुष्ठान, जनभागीदारी, सेवा और पर्यावरण संरक्षण का यह संगम पूरे आयोजन को खास बनाता रहा। दिनभर मंदिर परिसर में ‘हर-हर महादेव के जयघोष गूंजते रहे और सारनाथ की धरती शिवभक्ति से ओतप्रोत नजर आई।

हर-हर महादेव बोले जापानी गवर्नर, बाबा से मांगी विश्व शांति

हर-हर महादेव बोले जापानी गवर्नर, बाबा से मांगी विश्व शांति  

सारनाथ से विश्वनाथ धाम तक काशी की संस्कृति में रमे जापानी मेहमान, ग्रीन हाइड्रोजन से निवेश-रोजगार तक यूपी-जापान रिश्तों को नई धार

सुरेश गांधी

वाराणसी। काशी में रविवार को जबहर-हर महादेवका जयघोष गूंजा तो उसमें जापान की आवाज भी शामिल हो गई। जापान के यामानाशी प्रीफेक्चर के गवर्नर कोटारो नागासाकी करीब 15 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल के साथ श्री काशी विश्वनाथ धाम पहुंचे। बाबा विश्वनाथ का विधिवत दर्शन-पूजन कर उन्होंने आशीर्वाद लिया और विश्व शांति की प्रार्थना की। मंदिर पहुंचने पर जापानी मेहमानों का रुद्राक्ष की माला और अंगवस्त्र पहनाकर पारंपरिक स्वागत किया गया।

सावन में उमड़ी श्रद्धालुओं और कांवड़ियों की भारी भीड़ के बीचहर-हर महादेवका उद्घोष हुआ तो जापानी प्रतिनिधिमंडल भी श्रद्धालुओं के साथ उसी उत्साह से इस जयघोष में शामिल हो गया। काशी की आस्था से जुड़ा यह दृश्य सांस्कृतिक रिश्तों की उस गहराई का प्रतीक बना, जिसमें भाषा अलग होने के बावजूद भाव एक था।

मंदिर न्यास के एसडीएम शंभू शरण के अनुसार प्रतिनिधिमंडल ने बाबा के दर्शन के साथ काशी की धार्मिक और आध्यात्मिक परंपराओं को समझा। सावन में इतनी बड़ी भीड़ के बीच श्रद्धालुओं की सुविधा और सुरक्षा के लिए की गई व्यवस्थाओं ने जापानी मेहमानों को खास तौर पर प्रभावित किया। धाम की प्राचीन विरासत, भव्यता और आधुनिक सुविधाओं के तालमेल को भी उन्होंने करीब से देखा।

बाबा के दरबार से विश्व शांति का संदेश

दर्शन-पूजन के बाद गवर्नर कोटारो नागासाकी ने कहा कि उत्तर प्रदेश, यामानाशी और जापान के बीच संबंध आने वाले समय में और मजबूत किए जाएंगे। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ मिलकर कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की इच्छा जताते हुए उन्होंने ग्रीन हाइड्रोजन सिस्टम को यूपी और यामानाशी के विकास के लिए महत्वपूर्ण पहल बताया। ऊर्जा सुरक्षा के जरिए विश्व शांति की स्थापना में योगदान देने की इच्छा भी उन्होंने जताई। गवर्नर ने कहा कि काशी आकर उन्हें लोगों की ईश्वर के प्रति श्रद्धा और सम्मान की भावना को करीब से समझने का अवसर मिला। बाबा विश्वनाथ से विश्व शांति की प्रार्थना करना उनके लिए इस यात्रा का विशेष अनुभव रहा।

सारनाथ में बुद्ध, काशी में शिव

जापानी प्रतिनिधिमंडल की यह यात्रा केवल निवेश और उद्योग की तलाश तक सीमित नहीं रही। शनिवार को दल ने सारनाथ पहुंचकर भगवान बुद्ध की प्रथम उपदेशस्थली और बौद्ध विरासत को करीब से जाना। शाम को नमो घाट पर गंगा आरती में शामिल होकर काशी की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपरा का अनुभव किया। रविवार को विश्वनाथ धाम में दर्शन के बाद दल वाराणसी से रवाना हो गया। काशी की यह यात्रा अपने आप में भारत-जापान रिश्तों की दो धाराओंबुद्ध की शांति और बाबा विश्वनाथ की आध्यात्मिकताको जोड़ती दिखाई दी।

यूपी को जापान से क्या मिलेगा?

यामानाशी और उत्तर प्रदेश की साझेदारी अब महज औपचारिक मुलाकातों से आगे बढ़ रही है। दोनों पक्ष ग्रीन हाइड्रोजन, स्वच्छ ऊर्जा, उद्योग, पर्यटन और कौशल विकास जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ा रहे हैं। अगस्त 2026 की यूपी-जापान निवेश पहल में ऑटोमोबाइल, उन्नत विनिर्माण, तकनीक, नवाचार और स्वास्थ्य क्षेत्र भी प्रमुख संभावनाओं के रूप में सामने आए हैं।

पहला लाभनिवेश और रोजगार : जापानी कंपनियों के आने से विनिर्माण इकाइयों, सप्लाई चेन और सहायक उद्योगों का विस्तार हो सकता है। इससे प्रत्यक्ष के साथ अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे।

दूसराग्रीन हाइड्रोजन की तकनीक : जापान और खासकर यामानाशी के अनुभव से यूपी को स्वच्छ ऊर्जा, हाइड्रोजन उत्पादन, भंडारण और उपयोग की तकनीक विकसित करने में मदद मिल सकती है। दोनों पक्षों के बीच ग्रीन हाइड्रोजन सहयोग को आगे बढ़ाने पर सहमति भी बनी है।

तीसराजापानी तकनीक और यूपी का बाजार : जापान की तकनीकी दक्षता और यूपी के विशाल बाजार, युवा मानव संसाधन तथा बढ़ते औद्योगिक ढांचे का मेल ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, इंजीनियरिंग और आधुनिक विनिर्माण को नई गति दे सकता है।

चौथाकौशल विकास : जापानी उद्योगों की जरूरत के अनुरूप युवाओं को प्रशिक्षित करने से रोजगार की गुणवत्ता बढ़ सकती है। तकनीकी संस्थानों और कंपनियों के बीच प्रशिक्षण तथा मानव संसाधन आदान-प्रदान के रास्ते भी खुल रहे हैं।

पांचवांकाशी और यूपी का पर्यटन : सारनाथ, काशी विश्वनाथ, गंगा आरती और बौद्ध विरासत जापानी पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण हैं। सांस्कृतिक संबंध मजबूत होने से जापान से यूपी आने वाले पर्यटकों की संख्या बढ़ाने की संभावनाएं भी मजबूत होंगी।

छठावैश्विक निवेश की विश्वसनीयता : जापानी कंपनियों का भरोसा दूसरे अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के लिए भी सकारात्मक संकेत बन सकता है। यूपी की बेहतर कनेक्टिविटी, बड़ा बाजार, मानव संसाधन और निवेश सुविधा तंत्र इस साझेदारी को आधार दे रहे हैं।

600 करोड़ की प्रतिबद्धता से आगे बढ़ी साझेदारी

यामानाशी ने यूपी में अपनी एमएसएमई कंपनियों के निवेश को सुगम बनाने के लिए करीब 600 करोड़ रुपये की प्रतिबद्धता जताई है। प्रस्तावित सहयोग में जापान सिटी, ग्रीन हाइड्रोजन सेंटर ऑफ एक्सीलेंस, तकनीकी सहयोग और औद्योगिक निवेश जैसे आयाम भी शामिल हैं। यानी काशी में बाबा विश्वनाथ के दरबार में गूंजाहर-हर महादेवकेवल आस्था का स्वर नहीं था। इसके पीछे निवेश, तकनीक, स्वच्छ ऊर्जा, रोजगार, पर्यटन और विश्व शांति की साझी आकांक्षा भी सुनाई दी। काशी की धरती पर जापान का यह जुड़ाव अब संस्कृति से कारोबार और कारोबार से विकास की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है।

Saturday, 22 August 2026

त्योहारी सीजन : चीनी हुई कड़वी, प्याज ने रुलाया... रसोई पर महंगाई का ‘डबल वार’

त्योहारी सीजन : चीनी हुई कड़वी, प्याज ने रुलाया... रसोई पर महंगाई काडबल वार

त्योहारों की मिठास आने से पहले रसोई का स्वाद कड़वा होने लगा है। चीनी के दाम ने सबसे ज्यादा चौंकाया है तो प्याज ने फिर आंखों में आंसू ला दिए हैं। पिछले कुछ दिनों में चीनी की कीमतों में तेज उछाल के साथ प्याज, खाद्य तेल और दालों के भाव भी ऊपर चढ़े हैं। बाजार का यह रुख ऐसे समय में सामने आया है, जब त्योहारों के कारण अगले कुछ महीनों में खाद्य वस्तुओं की मांग बढ़ने वाली है। यानी घर के बजट पर दबाव अभी थमता नहीं दिख रहा। सरकार ने चीनी के दाम थामने के लिए दस लाख टन शुल्क-मुक्त आयात का फैसला किया है। जमाखोरी रोकने को स्टॉक सीमा लगाई गई है और चीनी मिलों को इस बार जल्दी पेराई शुरू करने की तैयारी है। प्याज के मामले में भी बफर स्टॉक बाजार में उतारने की कवायद है। मगर सवाल यह है कि सरकारी फैसलों की राहत बाजार की थाली तक कब पहुंचेगी? महंगाई की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि आंकड़ों में कुछ प्रतिशत की बढ़ोतरी दिखती है, लेकिन आम आदमी के घर में उसका हिसाब हर किलो, हर लीटर और हर महीने के बढ़ते खर्च से होता है। रसोई का बजट बिगड़ा तो त्योहारी खुशियों पर भी महंगाई की परछाईं पड़ना तय है 

सुरेश गांधी

त्योहारों की आहट के साथ बाजार में महंगाई ने फिर करवट ली है। घर की रसोई में रोज इस्तेमाल होने वाली चीनी, प्याज, खाद्य तेल और दालों के दामों में तेजी ने परिवारों का बजट बिगाड़ना शुरू कर दिया है। सबसे ज्यादा सुर्खियों में चीनी है, जिसकी कीमत कुछ बाजारों में एक सप्ताह के भीतर करीब सात रुपये और एक महीने में लगभग 17-20 रुपये किलो तक बढ़ने की खबर है। पश्चिम बंगाल के कुछ खुदरा बाजारों में चीनी का भाव 70 रुपये किलो तक पहुंच गया है। हालांकि तस्वीर पूरे देश में एक जैसी नहीं है। उपभोक्ता मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक 18 अगस्त को अखिल भारतीय औसत खुदरा चीनी कीमत करीब 52.30 रुपये किलो थी, जो एक साल पहले 46.34 रुपये थी। यानी राष्ट्रीय औसत में भी करीब 13 प्रतिशत की सालाना बढ़ोतरी दर्ज हुई है। यही अंतर बताता है कि महंगाई की असली कहानी केवल राष्ट्रीय औसत में नहीं, बल्कि स्थानीय बाजार में उपभोक्ता को चुकानी पड़ रही कीमत में छिपी है। फिलहाल महंगाई बेकाबू नहीं कही जा सकती, लेकिन आंकड़ों का रुख सावधानी का संकेत दे रहा है। खासकर खाद्य और थोक कीमतों में बढ़ोतरी यदि आगे भी जारी रहती है तो आने वाले महीनों में इसका असर सीधे उपभोक्ता की जेब पर दिखाई दे सकता है। अगस्त की खुदरा महंगाई का आधिकारिक आंकड़ा 14 सितंबर 2026 को जारी होना है।

चीनी ने सबसे ज्यादा चौंकाया

चीनी के दामों में अचानक उछाल ने सरकार को भी सक्रिय कर दिया है। घरेलू बाजार में कीमतों को काबू में करने के लिए केंद्र ने करीब एक दशक बाद बड़ा कदम उठाते हुए 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी है। यह आयात 31 अक्टूबर 2026 तक टैरिफ रेट कोटा के तहत किया जा सकेगा। सरकार की कोशिश साफ हैत्योहारों से पहले बाजार में अतिरिक्त माल पहुंचे, आपूर्ति की चिंता दूर हो और कीमतों की तेजी पर ब्रेक लगे। विशेषज्ञों के मुताबिक इससे सितंबर-नवंबर के दौरान घरेलू उपलब्धता में करीब 15 प्रतिशत तक इजाफा हो सकता है। लेकिन इसका असर तत्काल बाजार में दिखना जरूरी नहीं है। आयात होने वाली चीनी कच्ची है, जिसे घरेलू बाजार में पहुंचने से पहले रिफाइन करना होगा। इसलिए आने वाले दिनों में कीमतों पर दबाव बना रह सकता है।

जमाखोरी पर सरकार का डंडा

सरकार ने केवल आयात का रास्ता नहीं खोला, बल्कि जमाखोरी और सट्टेबाजी पर भी शिकंजा कसा है। एक अगस्त से चीनी कारोबारियों पर स्टॉक सीमा लागू है और यह व्यवस्था 30 नवंबर तक प्रभावी रहेगी। सरकार ने कहा है कि कुछ कारोबारियों और बाजार मध्यस्थों की जमाखोरी तथा बिना वास्तविक माल की आवाजाही वाले कागजी कारोबार से बाजार में कृत्रिम कमी का माहौल बन सकता है। इसके बाद बड़े थोक उपभोक्ताओं के लिए भी स्टॉक सीमा कड़ी की गई है। 10 टन से अधिक मासिक खपत वाले संस्थागत खरीदारों को सीमित अवधि की खपत से अधिक स्टॉक रखने पर रोक लगाई गई है। यानी सरकार का तीन तरफा वार हैआयात बढ़ाओ, स्टॉक रोकिए और बाजार की निगरानी बढ़ाइए।

प्याज भी दे रहा आंसू

चीनी के बाद प्याज ने भी रसोई का हिसाब बिगाड़ना शुरू किया है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 21 अगस्त को प्याज का औसत खुदरा भाव 40.79 रुपये किलो रहा, जबकि सप्ताह भर पहले यह 36.56 रुपये और एक महीने पहले 34.87 रुपये किलो था। यानी एक सप्ताह में करीब चार रुपये और महीने भर में करीब छह रुपये किलो की बढ़ोतरी हुई। कुछ बाजारों में तेजी इससे भी ज्यादा रही। प्याज की कीमतों में तेजी के पीछे खरीफ प्याज की नई फसल की आवक में देरी को प्रमुख वजह माना जा रहा है। दक्षिण भारत में आवक देर से हो रही है, जबकि महाराष्ट्र के नासिक क्षेत्र में मानसून की स्थिति ने खरीफ प्याज की बुवाई और आपूर्ति की चिंता बढ़ाई है। हालांकि यहां भी सरकार के पास राहत का हथियार मौजूद है। केंद्र ने मूल्य स्थिरीकरण बफर के लिए प्याज की खरीद कीमत 1875 रुपये से बढ़ाकर 2125 रुपये प्रति क्विंटल कर दी है और नाफेड-एनसीसीएफ के जरिये बफर खरीद जारी है।

दाल में भी धीरे-धीरे चढ़ रही गर्मी

अरहर, मूंग, उड़द और चना जैसी दालों की कीमतों में भी हाल के सप्ताहों में हल्की तेजी दिखाई दे रही है। लेकिन यहां तस्वीर चीनी जितनी चिंताजनक नहीं है। 14 अगस्त तक खरीफ दलहन की बुवाई 108.14 लाख हेक्टेयर थी, जो पिछले साल की समान अवधि के 108.49 लाख हेक्टेयर से महज 35 हजार हेक्टेयर कम थी। अरहर की बुवाई जरूर करीब 1.69 लाख हेक्टेयर कम रही थी, लेकिन बाद के आंकड़ों में स्थिति सुधरी है और 21 अगस्त तक कुल दलहन रकबा पिछले साल की समान अवधि से ऊपर पहुंच गया। इसलिए फिलहाल दालों की बड़ी किल्लत का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगा। फिर भी मौसम यहां सबसे बड़ा खिलाड़ी है। यदि प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में बारिश कमजोर रही तो अरहर और मूंग जैसी दालों की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।

खाद्य तेल भी नहीं दे रहा राहत

रसोई में तेल का खर्च भी कम होने का नाम नहीं ले रहा। वैश्विक खाद्य तेल बाजार की हलचल का सीधा असर भारत पर पड़ता है क्योंकि देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। हालांकि ताजा आंकड़ा एक दिलचस्प तस्वीर पेश करता है। जुलाई में भारत का खाद्य तेल आयात 10 महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। पाम तेल का आयात जून के मुकाबले 50 प्रतिशत बढ़कर करीब 7.31 लाख टन हो गया, जबकि सोया तेल का आयात भी 31 प्रतिशत बढ़ा। वहीं रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण सूरजमुखी तेल की आपूर्ति प्रभावित हुई है। भारत में अगस्त में सूरजमुखी तेल का आयात फरवरी के बाद सबसे कम रहने का अनुमान है, जबकि उसकी भरपाई के लिए सोया तेल का आयात बढ़ाया जा रहा है।

असली चिंता त्योहारों की

महंगाई का यह दौर ऐसे समय आया है जब बाजार में खपत बढ़ने वाली है। अगस्त से नवंबर तक गणेश चतुर्थी, दशहरा और दीपावली जैसे त्योहारों के कारण चीनी, तेल, सूखे मेवे, मिठाई और दूसरे खाद्य पदार्थों की मांग बढ़ती है। यही वजह है कि सरकार चीनी की आपूर्ति को लेकर अभी से सक्रिय हो गई है। अगर आपूर्ति समय पर बढ़ी तो कीमतों की तेजी थम सकती है। लेकिन आयातित चीनी बाजार में देर से पहुंची या मानसून और फसल से जुड़ी चिंताएं बढ़ीं तो त्योहारों से पहले रसोई का खर्च और बढ़ सकता है।

रसोई का ताजा महंगाई मीटर

चीनी : कुछ बाजारों में 70 रुपये किलो तक

देश का औसत चीनी भाव : 18 अगस्त को करीब 52.30 रुपये किलो

प्याज : 21 अगस्त को औसत 40.79 रुपये किलो

प्याज एक सप्ताह पहले : 36.56 रुपये किलो

प्याज एक माह पहले : 34.87 रुपये किलो

शुल्क-मुक्त चीनी आयात : 10 लाख टन

आयात की समयसीमा : 31 अक्टूबर 2026 तक

दलहन बुवाई : 21 अगस्त तक 113.63 लाख हेक्टेयर

खाद्य तेल आयात : जुलाई में 10 महीने के उच्चतम स्तर पर

महंगाई की नई कहानी में सवाल सिर्फ दाम का नहीं

महंगाई का आंकड़ा जब सरकारी रिपोर्ट में आता है तो वह एक प्रतिशत होता है, लेकिन घर की रसोई में उसकी गिनती किलो, लीटर और रुपये में होती है। पांच रुपये महंगा प्याज, दस रुपये महंगा तेल या बीस रुपये महंगी चीनी अकेले परिवार को नहीं तोड़ती, लेकिन जब ऐसी कई छोटी बढ़ोतरी एक साथ आती है तो महीने का बजट चुपचाप खिसक जाता है। अभी सरकार ने चीनी पर आयात, स्टॉक सीमा और बाजार निगरानी के जरिये हस्तक्षेप शुरू कर दिया है। प्याज के लिए बफर स्टॉक है और खाद्य तेलों की आपूर्ति बढ़ाने की कोशिश जारी है। इसलिए स्थिति को बेकाबू महंगाई कहना अभी सही नहीं होगा। मगर रसोई के जिन सामानों की कीमत सीधे आम आदमी की जेब पर असर डालती है, उनमें एक साथ तेजी जरूर सावधानी की घंटी है। त्योहारों से पहले अब सबसे बड़ी परीक्षा यही होगी कि सरकारी फैसले कागज से निकलकर बाजार तक कितनी जल्दी पहुंचते हैंक्योंकि आम आदमी को राहत आदेश में नहीं, किराने की दुकान पर चाहिए।

सब्जियों पर भी चढ़ी महंगाई की आंच

रसोई में चीनी, तेल और दाल के साथ अब सब्जियों की कीमतों ने भी बजट बिगाड़ना शुरू कर दिया है। 22 अगस्त के सरकारी मूल्य निगरानी आंकड़ों में अखिल भारतीय औसत थोक भाव में आलू करीब ₹16.92, प्याज ₹33.97 और टमाटर ₹29.57 प्रति किलो रहे। सबसे ज्यादा दबाव प्याज पर दिख रहा है। जुलाई में ही प्याज के थोक भाव में सालाना आधार पर करीब 51 फीसदी की उछाल दर्ज की गई थी। खुदरा बाजार में भी कई शहरों में तस्वीर और तीखी है। आंध्र प्रदेश में प्याज जून के करीब ₹25 से बढ़कर अगस्त में ₹60 किलो तक पहुंचने की रिपोर्ट है।मानसून की बारिश से फसल की आवक और परिवहन प्रभावित होने के कारण हरी सब्जियों, धनिया, अदरक और लहसुन जैसी चीजों के भाव भी दबाव में हैं। हालांकि हर सब्जी महंगी नहीं हुईआलू और टमाटर के थोक भाव कई क्षेत्रों में अपेक्षाकृत नरम हैं। यही बाजार का विरोधाभास है: एक तरफ किसान को कम भाव, दूसरी तरफ ग्राहक को महंगी सब्जी।

सारनाथ में गूंजा हर-हर महादेव, बाबा सारंगनाथ का भव्य रुद्राभिषेक

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