मोदी जी, काशी की गलियों में उतरकर देखिए!
मां
गंगा
की
बाढ़
ने
काशी
को
जितना
दर्द
दिया,
उससे
कहीं
ज्यादा
शहर
की
बदहाल
जलनिकासी
व्यवस्था
लोगों
को
रोज
रुला
रही
है।
गोदौलिया
जैसे
प्रमुख
इलाके
में
भी
जलभराव
की
तस्वीर
सामने
आई।
कई
कॉलोनियों
में
तो
पानी
दिनों
तक
जमा
रहने
की
शिकायतें
सामने
आई
हैं।
भेलूपुर के शिवाला इलाके
की
एक
गली
में
सीवर
का
पानी
इस
कदर
भर
गया
है
कि
सड़क
और
नाली
का
फर्क
मिट
गया
है।
घरों
के
दरवाजे
तक
गंदा
पानी
पहुंचने
से
हजारों
लोगों
का
घरों
से
निकलना
मुश्किल
हो
गया
है।
पांडेपुर हुकूलगंज रोड, नयी बस्ती यानी ट्रांसफार्मर गली ढलान गली की दुव्र्यस्था जग
जाहिर है. यहां न सीवेज है न पीने की स्वच्छ पानी. हर घर स्वच्छ जल मिशन के दावे की
पोल खोलने के लिए यह गली काफी है, हल्की बारीश में भी इस गली में घुटने तक पानी लग
जाता है, लोगों के घरों में पानी घूस जाता है. यह तस्वीर अकेले
शिवाला,
हुकूलगंज रोड-नयी बस्ती, शहर के हृदयस्थली गोदौलिया जैसे
प्रमुख
इलाके
की नहीं, बल्कि उन
दावों
पर
बड़ा
सवाल
है,
जिनमें
काशी
को
स्मार्ट
सिटी
बनाने
की
बात
कही
जाती
रही
है।
नगर
निगम
ने
अब
तक
के
सबसे
बड़े
बजट
में
सीवर,
जलनिकासी
और
सफाई
व्यवस्था
को
मजबूत
करने
के
दावे
किए
हैं।
बारिश
से
महीनों
पहले
नालों
और
सीवर
लाइनों
की
सफाई
अभियान
भी
चलाया
गया।
बावजूद
इसके
बारिश
होते
ही
कई
इलाकों
में
व्यवस्था
की
पोल
खुल
गई।
सवाल
यह
है
कि
करोड़ों-अरबों
रुपये
खर्च
होने
के
बाद
भी
शहर
की
गलियां
सीवर
के
पानी
में
क्यों
डूब
रही
हैं?
क्या
सफाई
और
जलनिकासी
का
काम
जमीन
पर
हुआ
या
सिर्फ
कागजों
पर?
पिछले
दो
दशकों
में
बारिश
के
मौसम
में
काशी
की
बेबसी
की
ऐसी
तस्वीर
शायद
ही
कभी
इतनी
भयावह
दिखी
हो।सोशल
मीडिया
पर
वायरल
तस्वीरें
पूछ
रही
हैं
सवाल—कागजों
में
स्मार्ट
सिटी,
जमीन
पर
जलमग्न
गलियां;
नगर
निगम
के
दावों
और
जनता
की
तस्वीरों
में
इतना
फासला
क्यों?
मेयर
और
अफसरों
की
रिपोर्ट
से
अलग
अपनी
टीम
भेजिए...
काशी
की
नब्ज
टटोलिए,
वरना
नाराजगी
का
पानी
सड़कों
से
निकलकर
सियासत
तक
पहुंचते
देर
नहीं
लगेगी.
गंगा की
बाढ़
से
ज्यादा
‘भ्रष्टतंत्र’
ने
डुबोई
काशी
की
उम्मीदें,
शिवाला
में
सीवर
के
पानी
ने
घरों
में
कैद
किए
हजारों
लोग
सुरेश गांधी
काशी सिर्फ एक
शहर नहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीतिक
पहचान का वह अध्याय
है, जिसे दुनिया पूरे
देश की नजर से
देखती है। यही वजह
है कि काशी की
किसी गली में जमा
पानी सिर्फ नगर निगम की
नाकामी का सवाल नहीं
रहता, वह सीधे उस
राजनीतिक भरोसे का सवाल बन
जाता है जो इस
शहर ने वर्षों से
प्रधानमंत्री के साथ जोड़ा
है। इन दिनों सोशल मीडिया पर
वाराणसी की जलमग्न गलियों
की तस्वीरें और वीडियो खूब
घूम रहे हैं। कहीं
सड़क तालाब बनी है तो
कहीं गली में घुटने
भर पानी। कहीं बच्चे और
बुजुर्ग पानी के बीच
रास्ता तलाश रहे हैं
तो कहीं दुकानदार अपनी
दुकान तक पहुंचने के
लिए पानी चीरने को
मजबूर हैं। सितंबर की
बारिश के बाद शहर
के हृदयस्थली गोदौलिया जैसे प्रमुख इलाके
में भी जलभराव की
तस्वीर सामने आई। कई कॉलोनियों
में तो पानी दिनों
तक जमा रहने की
शिकायतें सामने आई हैं। भेलूपुर के
शिवाला इलाके की एक गली
में सीवर का पानी
इस कदर भर गया
है कि सड़क और
नाली का फर्क मिट
गया है। घरों के
दरवाजे तक गंदा पानी
पहुंचने से हजारों लोगों
का घरों से निकलना
मुश्किल हो गया है।
यह तस्वीर अकेले शिवाला की नहीं, बल्कि
उन दावों पर बड़ा सवाल
है, जिनमें काशी को स्मार्ट
सिटी बनाने की बात कही
जाती रही है।
नगर निगम का
अपना दावा है कि
इस बार पहले से
तैयारी, नालों की सफाई, सीवर
लाइन और गली-पिट
की सफाई तथा पंपों
की व्यवस्था के कारण पुराने
जलभराव वाले कई स्थानों
पर स्थिति सुधरी है। 11 सितंबर की रिपोर्ट में
निगम अधिकारियों ने कई पुराने
जलभराव स्थलों पर पानी जल्दी
निकलने का दावा भी
किया है। लेकिन सवाल
यही है—अगर व्यवस्था
इतनी दुरुस्त है तो सोशल
मीडिया पर जनता की
यह बेचैन तस्वीर कौन दिखा रहा
है? यहीं से असली
सवाल शुरू होता है।
सवाल यह है कि करोड़ों-अरबों रुपये खर्च होने के
बाद भी शहर की
गलियां सीवर के पानी
में क्यों डूब रही हैं?
क्या सफाई और जलनिकासी
का काम जमीन पर
हुआ या सिर्फ कागजों
पर? पिछले दो दशकों में
बारिश के मौसम में
काशी की बेबसी की
ऐसी तस्वीर शायद ही कभी
इतनी भयावह दिखी हो। शहर उत्तरी के पांडेपुर हुकूलगंज रोड, नयी बस्ती यानी
ट्रांसफार्मर गली ढलान गली की दुव्र्यस्था जग जाहिर है. यहां न सीवेज है न पीने की
स्वच्छ पानी. हर घर स्वच्छ जल मिशन के दावे की पोल खोलने के लिए यह गली काफी है, हल्की
बारीश में भी इस गली में घुटने तक पानी लग जाता है, लोगों के घरों में पानी घूस जाता
है. मुहल्ले के लोग पार्षद व मेयर से अपनी पीडा कहते कहते जुबान को भी लकवा मार गया,
लेकिन बेरहम नगर निगम हाथ पर हाथ धरे किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार कर रहा है.
मोदी जी, सिर्फ रिपोर्ट मत मंगाइए... अपनी टीम भेजिए
मेयर और नगर
निगम के अफसरों से
रिपोर्ट लेना अपनी जगह
जरूरी है, लेकिन काशी
की वास्तविक तस्वीर जानने के लिए एक
बार ऐसी स्वतंत्र टीम
भी भेजी जानी चाहिए
जिसे न नगर निगम
को पहले से सूचना
हो और न ही
निरीक्षण का रूट पता
हो। टीम शहर की
गलियों में जाए। कैमरा
हो, लेकिन दिखावे के लिए नहीं।
नागरिकों से पूछे—पानी
कितने दिन से है?
नाला कब साफ हुआ?
शिकायत कितनी बार की? किसने
सुना? किसने नहीं सुना? एक-एक वार्ड की
रिपोर्ट तैयार हो। क्योंकि फाइलों
में नाला साफ हो
सकता है, लेकिन अगर
उसके सामने की गली में
पानी खड़ा है तो
नागरिक के लिए वह
नाला साफ नहीं है।
काशी की गलियां सवाल कर रही हैं
बजरडीहा-जोल्हा दक्षिणी जैसे इलाकों में
लंबे समय से जलभराव
की शिकायतें सामने आई हैं। कंदवा
की सुरभि नगर कॉलोनी में
भी बारिश के बीच जलजमाव
से सामान्य जनजीवन प्रभावित होने की खबर
आई। बीएचयू-लंका क्षेत्र के
लिए नगर निगम को
अलग से स्टॉर्म वाटर
योजना पर काम करना
पड़ा। बाढ़ के बाद
तो एक दूसरी चुनौती
भी सामने है—गंदगी, सिल्ट
और संक्रमण का खतरा। गंगा
का पानी घटने के
बाद घाटों और प्रभावित क्षेत्रों
में जमा सिल्ट की
सफाई चुनौती बनी हुई है।
यह सब उस समय हो
रहा है जब काशी
को देश के सबसे
महत्वपूर्ण धार्मिक, सांस्कृतिक और पर्यटन केंद्रों
में गिना जा रहा
है। क्या दुनिया को दिखने वाली
काशी और काशी के
नागरिकों को भुगतने वाली
काशी अलग-अलग हो
गई है?
बारिश को दोष देकर कब तक बचेंगे जिम्मेदार?
यह सही है
कि इस साल गंगा
में भीषण बाढ़ आई।
नदी किनारे के इलाकों में
जलस्तर बढ़ा और हजारों
लोग प्रभावित हुए। प्रधानमंत्री ने
भी जिलाधिकारी और मेयर से
स्थिति की जानकारी लेकर
राहत कार्य तेज करने के
निर्देश दिए थे। लेकिन
हर जलभराव को गंगा की
बाढ़ के खाते में
डाल देना भी समस्या
का समाधान नहीं है। बारिश
प्रकृति का काम है,
पानी निकालना व्यवस्था का। जहां हर
बारिश के बाद वही
गली तालाब बनती है, वहां
सवाल बारिश से ज्यादा ड्रेनेज
व्यवस्था का है। जहां
नाला जाम होता है,
वहां सवाल सफाई व्यवस्था
का है। जहां कूड़ा
नाले में पहुंचता है,
वहां सवाल कचरा प्रबंधन
का है। और जहां
नागरिक बार-बार शिकायत
करता है फिर भी
समस्या जस की तस
रहती है, वहां सवाल
जवाबदेही का है।
2024 ने चेताया था, 2027 को भूलना मत
2024 का लोकसभा चुनाव
भी काशी के लिए
एक राजनीतिक संकेत छोड़ गया। प्रधानमंत्री
मोदी को 2019 में वाराणसी से
6,74,664 वोट मिले थे। 2024 में
यह संख्या घटकर 6,12,970 रह गई—यानी
करीब 61,694 वोटों की कमी। वहीं
जीत का अंतर 2019 के
4,79,505 से घटकर 2024 में 1,52,513 रह गया। मतदान
प्रतिशत भी 57.13 से घटकर 56.35 हुआ।
इस गिरावट के अनेक कारण
हो सकते हैं। इसे
केवल नगर निगम की
कार्यप्रणाली से जोड़ना उचित
नहीं होगा। लेकिन स्थानीय नाराजगी, शहर की मूलभूत
सुविधाएं और जनता के
रोजमर्रा के अनुभव को
राजनीति में नजरअंदाज करना
भी खतरनाक भूल होगी। चुनाव
के समय सड़क पर
उतरकर जनता से वोट
मांगना आसान है। मुश्किल
यह है कि चुनाव
के बीच के वर्षों
में उसी जनता की
गली में उतरकर उसकी
परेशानी सुनना।
काशी को सिर्फ सजाइए नहीं, संभालिए भी
काशी के घाट
चमक रहे हों, कॉरिडोर
सुंदर हो, बड़ी परियोजनाएं
आकार ले रही हों—यह सब स्वागत
योग्य है। लेकिन विकास
की असली परीक्षा उस
चमकदार तस्वीर में नहीं है
जिसे कैमरा चुनकर दिखाता है। विकास की
असली परीक्षा उस गली में
है जहां कैमरा पहुंचना
नहीं चाहता। जहां बारिश के
बाद बच्चा स्कूल जाने से डरता
है। जहां बुजुर्ग घर
से निकल नहीं पाता।
जहां दुकानदार दुकान खोलने से पहले पानी
निकालता है। जहां घर
के बाहर कूड़ा और
भीतर बदबू पहुंचती है।
यही काशी की असली
परीक्षा है।
मोदी जी, साख बचानी है तो सिस्टम की आंख खोलिए
प्रधानमंत्री मोदी के लिए
यह सिर्फ नगर निगम की
आलोचना नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश
है। मोदी जी, काशी
की तस्वीर आपको नगर निगम
के प्रेस नोट से नहीं,
काशीवासियों की आंखों से
देखनी होगी। अपनी टीम लगाइए।
वार्डवार रिपोर्ट लीजिए। जलभराव वाले स्थानों की
जियो-टैगिंग कराइए। कितनी शिकायतें आईं, कितनी हल
हुईं और कितनी लंबित
हैं—सार्वजनिक कराइए। नालों की सफाई के
दावों का मौके पर
सत्यापन कराइए। कूड़ा उठाने की व्यवस्था की
स्वतंत्र जांच कराइए। और
सबसे जरूरी—जिम्मेदारी तय कीजिए। क्योंकि
जनता को अब आश्वासन
नहीं, परिणाम चाहिए। काशी की जनता
ने बहुत कुछ सहा
है, बहुत कुछ देखा
है और बहुत कुछ
स्वीकार भी किया है।
लेकिन जनता की सहनशीलता
को उसकी कमजोरी समझना
किसी भी व्यवस्था की
सबसे बड़ी भूल होगी।
सड़कों पर जमा पानी
आखिरकार सूख जाएगा। लेकिन
अगर उसी पानी में
जनता का भरोसा भी
बह गया, तो उसे
सुखाने में बहुत समय
लगेगा। और चुनाव की
राजनीति में इतना समय
शायद किसी के पास
नहीं होगा। काशी को पोस्टर
की नहीं, पानी से बाहर
निकली जमीन की जरूरत
है। मोदी जी, अभी
वक्त है—काशी की
गलियों में उतरकर देख
लीजिए। कहीं ऐसा न
हो कि नगर निगम
की बदहाली का पानी धीरे-धीरे आपकी राजनीतिक
साख तक पहुंच जाए।

