Monday, 3 August 2026

संसद के कथित स्किट से काशी में उबाल, सड़कों पर उतरेगा धर्मसंसद का हुंकार

संसद के कथित स्किट से काशी में उबाल, सड़कों पर उतरेगा धर्मसंसद का हुंकार 

राम मंदिर चंदा विवाद पर संसद परिसर में हुए प्रदर्शन के बाद बढ़ा विवाद

वाराणसी में एफआईआर दर्ज

संत बोलेआस्था के प्रश्न पर चुप नहीं रहेगी काशी

सुरेश गांधी

वाराणसी. संसद परिसर में भगवा चोला पहनकर पप्पू यादव ने चढ़ावा चोरी का जो नाटक किया... उसे लेकर संतों का गुस्सा सांतवें आसमान पर है. सावन की भक्ति, घंटों की अनुगूंज और हर-हर महादेव के जयघोष के बीच काशी में एक नया धार्मिक-राजनीतिक तूफान उठ खड़ा हुआ है। बिहार के सांसद पप्पू यादव की कथित मिमिक्री और चंदा चोरी संबंधी विवादित टिप्पणी को लेकर संत समाज में तीखा आक्रोश फैल गया है। अखाड़ों, मठों और सनातन संगठनों ने इसे केवल राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था पर सीधा प्रहार बताया है।

उनका कहना है कि इसके कृत्य के लिए उन्हें माफी मांगनी चाहिए. हालांकि पप्पू यादव ने माफी मांगने से इनकार करते हुए कहा कि उनका उद्देश्य साधु-संतों का अपमान करना नहीं था. सावन की संध्या में जब काशी के घाटों पर दीपों की पंक्तियां गंगा की लहरों से संवाद करती हैं और मंदिरों की घंटियां शिवनाम का संगीत रचती हैं, तभी राष्ट्रीय राजनीति से उठी एक बहस ने धार्मिक संवेदनाओं को झकझोर दिया है। संसद परिसर में राम मंदिर चंदा विवाद को लेकर हुए विरोध प्रदर्शन और कथित स्किट के बाद काशी का संत समाज मुखर हो उठा है। अखाड़ों, मठों और सनातन संगठनों ने इसे आस्था से जुड़े प्रश्नों को हल्के ढंग से प्रस्तुत करने का प्रयास बताते हुए व्यापक विरोध की चेतावनी दी है।

जिस तरह संसद परिसर में विपक्षी सांसदों ने राम मंदिर चंदा/दान से जुड़े कथित मुद्दों को लेकर प्रदर्शन किया था। इसी प्रदर्शन के दौरान प्रस्तुत कथित व्यंग्यात्मक स्किट पर आपत्ति जताते हुए वाराणसी में शिकायतें दी गईं। शिकायतों के आधार पर राहुल गांधी, पप्पू यादव और अवधेश प्रसाद सहित कुछ नेताओं के विरुद्ध धार्मिक भावनाएं आहत करने और सनातन परंपरा के अपमान के आरोपों में प्राथमिकी दर्ज की गई है। विपक्षी नेताओं ने आरोपों को अस्वीकार करते हुए कहा है कि उनका विरोध कथित वित्तीय अनियमितताओं के मुद्दे पर था, कि भगवान राम या सनातन आस्था के अपमान के उद्देश्य से। इस कृत्य को सनातन धर्म, साधु-संतों और संपूर्ण हिंदू समाज का अपमान बताया.

लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अनिवार्य है, परंतु सार्वजनिक जीवन में शब्दों की जिम्मेदारी उससे कम महत्वपूर्ण नहीं। धार्मिक आस्था से जुड़े विषयों पर व्यंग्य, नाटक या राजनीतिक प्रदर्शन करते समय संवेदनशीलता आवश्यक है। दूसरी ओर किसी भी आहत भावना की अभिव्यक्ति संविधान और कानून की मर्यादा के भीतर ही होनी चाहिए। काशी इस समय केवल एक राजनीतिक विवाद पर प्रतिक्रिया नहीं दे रही; वह यह प्रश्न उठा रही है कि क्या लोकतांत्रिक संवाद में आस्था के सम्मान की पर्याप्त जगह बची हुई है। यदि संवाद, संयम और संवेदनशीलता साथ रहें तो विवाद सामाजिक टकराव नहीं, बल्कि मर्यादित सार्वजनिक विमर्श का अवसर भी बन सकता है। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि संसद परिसर से उठी यह बहस अब काशी की गलियों में गूंज रही है और उसके स्वर राष्ट्रीय राजनीति तक सुनाई दे रहे हैं।

काशी में संतों की बैठकें, विरोध की रूपरेखा

सोमवार को शहर के कई प्रमुख मठों और धर्मस्थलों में संतों की बैठकों का दौर चला। संत समाज ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध का अधिकार सबको है, किंतु धार्मिक प्रतीकों और आस्थाओं से जुड़े विषयों पर सार्वजनिक आचरण में मर्यादा अपेक्षित है। संतों ने संकेत दिया कि आने वाले दिनों में धर्मसभा, ज्ञापन और शांतिपूर्ण विरोध मार्च आयोजित किए जा सकते हैं। एक वरिष्ठ संत ने कहा, “काशी विचारों की भूमि है, परंतु श्रद्धा की अवमानना का प्रश्न उठेगा तो समाज अपनी बात अवश्य कहेगा।संतों ने समर्थकों से संयम बनाए रखने और कानूनसम्मत तरीके से विरोध दर्ज कराने की अपील भी की।

सावन के कारण बढ़ी संवेदनशीलता

धार्मिक जानकारों का मानना है कि यह विवाद सावन माह में सामने आने के कारण अधिक संवेदनशील हो गया है। इन दिनों काशी में देशभर से लाखों श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। कांवड़ यात्राएं, विशेष पूजन और मंदिरों में बढ़ती भीड़ के बीच धार्मिक विषयों पर कोई भी तीखी राजनीतिक बहस तेजी से जनभावनाओं को प्रभावित करती है। घाटों और मंदिरों के आसपास दिन भर श्रद्धालुओं के बीच इसी मुद्दे पर चर्चा होती रही। कई लोगों ने कहा कि राजनीतिक दलों को धार्मिक प्रतीकों से जुड़े विषयों पर शब्दों का चयन अधिक सावधानी से करना चाहिए।

प्रशासन सतर्क, सोशल मीडिया पर निगरानी

विवाद को देखते हुए जिला प्रशासन और पुलिस ने संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी बढ़ा दी है। अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि शांति व्यवस्था बनाए रखना सर्वोच्च प्राथमिकता है। सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो, पोस्ट और टिप्पणियों की निगरानी की जा रही है तथा भड़काऊ सामग्री साझा करने वालों के विरुद्ध कार्रवाई की चेतावनी दी गई है। पुलिस सूत्रों के अनुसार अब तक शहर में किसी बड़ी अप्रिय घटना की सूचना नहीं है, लेकिन भीड़भाड़ वाले धार्मिक क्षेत्रों में अतिरिक्त सतर्कता बरती जा रही है।

संसद से सड़क तक राजनीतिक प्रतिध्वनि

यह विवाद अब संसद की बहस से निकलकर सड़क और समाज तक पहुंच गया है। सत्ता पक्ष के कई नेताओं ने संतों की भावनाओं के समर्थन में बयान दिए हैं, जबकि विपक्ष का कहना है कि उनके विरोध को गलत अर्थों में प्रस्तुत किया जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि काशी से उठने वाली धार्मिक प्रतिक्रिया अक्सर राष्ट्रीय विमर्श को प्रभावित करती है, इसलिए यह मुद्दा आने वाले दिनों में और व्यापक चर्चा का विषय बन सकता है।

काशी की परंपरा और वर्तमान की चुनौती

काशी ने सदियों तक शास्त्रार्थ, मतभेद और संवाद की परंपरा को जीवित रखा है। यहां विचारों का संघर्ष भी हुआ और सहअस्तित्व का मार्ग भी निकला। आज की चुनौती यह है कि लोकतांत्रिक असहमति और धार्मिक सम्मान के बीच संतुलन कैसे बना रहे। संत समाज विरोध की तैयारी कर रहा है, वहीं प्रशासन शांति बनाए रखने की कोशिश में है; दोनों के बीच यही संतुलन शहर की परीक्षा बन गया है।

माफी मांगने पर होगा उग्र आंदोलन

संतो ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि संसद में विरोध के नाम पर भगवान श्री राम लला और सनातन परंपराओं का अपमान संत समाज किसी भी कीमत पर सहन नहीं करेगा. इस कृत्य के लिए सार्वजनिक रूप से माफी नहीं मांगी गई, तो देशभर का संत समाज सड़कों पर उतरकर उग्र प्रदर्शन करने के लिए बाध्य होगा. 'बिना शर्त लगाए ये क्षमा नहीं मांगते तो कार्रवाई करने का अधिकार लोकसभा को है। लोकसभा अध्यक्ष को इनकी सदस्यता समाप्त करनी चाहिए अन्यथा हिंदू समाज का धैर्य जवाब दे जाएगा। जहां तक राम मंदिर का प्रश्न है, एसआईटी जांच कर रही है। सुप्रीम कोर्ट उस विषय को देख रहा है। जो भी निर्णय होगा, हम उसे स्वीकार करेंगे। चोरों को कड़ी से कड़ी सजा मिलेगी।'

पप्पू यादव का अक्षम्य अपराध

इस देश को, इस देश के साधु संतों को, भगवा वस्त्र को बदनाम करने का जो षड्यंत्र पप्पू यादव ने किया है, वह अक्षम्य अपराध है। अखिल भारतीय संत समिति उसकी संसद सदस्यता बर्खास्त करने की मांग लोकसभा के अध्यक्ष से करती है। ….स्वामी जीतेंद्रानंद  

सनातन का अपमान नहीं सहेंगेऔरकाशी का सम्मान सर्वोपरि

अस्सी से मैदागिन, गोदौलिया से चौक तक कई स्थानों पर सनातन संगठनों ने पोस्टर और बैनर लगाने शुरू कर दिए हैं। सोशल मीडिया पर भी अभियान तेज हो गया है।सनातन का अपमान नहीं सहेंगेऔरकाशी का सम्मान सर्वोपरिजैसे संदेश तेजी से साझा किए जा रहे हैं।

पुष्पवर्षा के बीच बाबा के दरबार उमड़ा आस्था का महाज्वार

पुष्पवर्षा के बीच बाबा के दरबार उमड़ा आस्था का महाज्वार 

रात से लगी कतारें, हर-हर महादेव से गूंजी काशी; कपाट बंद होने से पहले तक सवा छह लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने किया दर्शन-पूजन 

सुरेश गांधी

वाराणसी. सावन माह का पहला सोमवार जैसे ही आया, काशी ने स्वयं को फिर एक बार शिवमय होते देखा। आधी रात ढलने के साथ ही श्री काशी विश्वनाथ धाम की ओर बढ़ते कदमों की आहट तेज होने लगी थी। कोई गंगाजल की छोटी कलशी थामे था, कोई बेलपत्र और धतूरा लिए हुए, तो कोई परिवार सहित बाबा के दरबार में हाजिरी लगाने निकला था। रात के लगभग डेढ़ बजे गोदौलिया की गलियां जाग चुकी थीं। दुकानों के आधे उठे शटर, हाथों में जल कलश लिए श्रद्धालु, कांवरियों की थकी मगर दमकती आंखें और दूर से आती घंटियों की ध्वनिकाशी उस समय सो नहीं रही थी, वह बाबा विश्वनाथ के स्वागत में स्वयं को तैयार कर रही थी। सावन के पहले सोमवार की यह रात धीरे-धीरे भोर में बदल रही थी और भोर की पहली किरण फूटने से पहले ही धाम के प्रवेश मार्ग श्रद्धालुओं से भर चुके थे.

हर-हर महादेव के उद्घोष से संपूर्ण काशी का वातावरण अलौकिक हो उठा। विश्वनाथ धाम की ओर बढ़ते कदमों का सिलसिला ऐसा था मानो पूरी काशी एक ही दिशा में चल पड़ी हो। धाम परिसर में ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो श्रद्धा स्वयं चलकर बाबा के द्वार पर पहुंच गई हो। महिलाओं के मंगलगीत, कांवड़ियों की टोलियां, शिवभक्त युवाओं का उत्साह और बुजुर्गों की शांत आस्थाइन सबने मिलकर उस दृश्य को एक जीवंत आध्यात्मिक उत्सव में बदल दिया, जिसे शब्दों में पूरी तरह बांध पाना कठिन है। कोई बिहार से आया था, कोई बुंदेलखंड से, कोई राजस्थान से तो कोई दक्षिण भारत से। भाषा अलग-अलग थी, लेकिन हर कंठ पर एक ही पुकार थीहर-हर महादेव।  

भोर से पहले ही भर गया बाबा का दरबार

सुबह के चार बजते-बजते धाम के प्रवेश मार्ग श्रद्धालुओं से पूरी तरह भर चुके थे। पुलिस बैरिकेडिंग के भीतर कतारें अनुशासित ढंग से आगे बढ़ रही थीं, पर भीड़ का उत्साह हर पल बढ़ता

जा रहा था। एक वृद्ध दंपती ने मुस्कुराते हुए कहा, “साल भर इंतजार रहता है इस सोमवार का। बाबा बुलाते हैं तभी दर्शन होता है।गंगा स्नान कर लौटते श्रद्धालुओं के गीले वस्त्रों से उठती गंगाजल की गंध, बेलपत्र की हरियाली और धूप-अगरबत्ती की सुगंध मिलकर पूरे वातावरण को अलौकिक बना रही थी। ऐसा लग रहा था मानो काशी की हवा में भी शिवनाम घुल गया हो।

फूल बरसे तो भावुक हो उठे भक्त

सावन माह के प्रथम सोमवार पर मंडलायुक्त एस. राजलिंगम ने श्री काशी विश्वनाथ धाम पहुंचकर बाबा का विधि-विधान से दर्शन-पूजन किया। इसके बाद जब श्रद्धालुओं पर पुष्पवर्षा हुई तो कुछ क्षणों के लिए पूरा धाम जयघोष से गूंज उठा। फूलों की पंखुड़ियां श्रद्धालुओं के सिर और कंधों पर गिरती रहीं और अनेक भक्त हाथ जोड़कर आकाश की ओर निहारते रहे। उस क्षण भीड़ नहीं, भक्ति दिखाई दे रही थी। मंडलायुक्त ने प्रदेश और देशवासियों के सुख, समृद्धि और मंगल की कामना की तथा धाम में की गई व्यवस्थाओं का निरीक्षण कर अधिकारियों को निर्देश दिए कि प्रत्येक श्रद्धालु को सुरक्षित और सुगम दर्शन की सुविधा मिले। इस दौरान मुख्य कार्यपालक अधिकारी विश्व भूषण मिश्र, एसडीएम शंभू कुमार और मंदिर प्रशासन के अन्य अधिकारी उपस्थित रहे।

आंकड़ों से परे आस्था का विस्तार

मंदिर प्रशासन के अनुसार कपाट बंद होने से पहले तक सवा छह लाख से अधिक श्रद्धालु बाबा श्री काशी विश्वनाथ का दर्शन-पूजन और जलाभिषेक कर चुके थे। यह संख्या केवल एक प्रशासनिक आंकड़ा नहीं, बल्कि उस अटूट विश्वास का प्रमाण है जो सदियों से काशी को भारत की आध्यात्मिक राजधानी बनाए हुए है। धाम परिसर में तैनात एक अधिकारी ने बताया कि भीड़ लगातार बढ़ती रही और देर शाम तक दर्शन का क्रम बिना रुके चलता रहा। चिकित्सा शिविर, पेयजल केंद्र, मोबाइल शौचालय और स्वयंसेवकों की टीमें लगातार सक्रिय रहीं।

गंगा से धाम तक एक ही धड़कन

अस्सी घाट से दशाश्वमेध और राजघाट तक सुबह से ही श्रद्धालुओं का रेला दिखाई देता रहा। स्नान के बाद हजारों भक्त गंगाजल लेकर धाम पहुंचे। घाटों पर बजती घंटियां और धाम में गूंजते वैदिक मंत्र एक-दूसरे में घुलते रहे। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो गंगा स्वयं जल लेकर विश्वनाथ के चरणों में उपस्थित हो रही हो।

प्रशासन की परीक्षा और श्रद्धालुओं का धैर्य

भीड़ असाधारण थी, फिर भी कतारों में धैर्य दिखाई दिया। कहीं स्वयंसेवक वृद्धों को सहारा दे रहे थे, कहीं पुलिसकर्मी बच्चों को सुरक्षित आगे बढ़ा रहे थे। कई श्रद्धालुओं ने बताया कि प्रतीक्षा लंबी अवश्य रही, लेकिन व्यवस्था संतोषजनक थी। काशी की भीड़ में भी एक अदृश्य अनुशासन दिखाई देता हैशायद इसे ही तीर्थ की संस्कृति कहते हैं।

गंगा से धाम तक शिवमय हुई काशी

अस्सी घाट से लेकर दशाश्वमेध और राजघाट तक गंगा तटों पर भोर से ही स्नान और जलाभिषेक की तैयारियां शुरू हो गई थीं। अनेक श्रद्धालु पहले गंगा स्नान कर पवित्र जल लेकर विश्वनाथ धाम पहुंचे। घाटों पर घंटों की ध्वनि और धाम में गूंजते वैदिक मंत्रों ने काशी को एक विराट शिव आराधना में रूपांतरित कर दिया।

काशी का शाश्वत संदेश

सावन का पहला सोमवार केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय लोकजीवन की उस जीवित परंपरा का उत्सव है जिसमें आस्था, अनुशासन और सामूहिकता साथ-साथ चलती हैं। विश्वनाथ धाम में उमड़ी यह भीड़ किसी आयोजन की भीड़ नहीं थी; यह उस विश्वास का प्रवाह था जो पीढ़ियों से बिना रुके बहता रहा है। जब लाखों कंठ एक साथ हर-हर महादेव का उद्घोष करते हैं, जब फूलों की वर्षा के बीच भक्त बाबा के दर्शन करते हैं और जब गंगा से उठी आस्था विश्वनाथ के द्वार पर आकर ठहरती है, तब काशी केवल एक शहर नहीं रहतीवह भारतीय आत्मा का स्पंदन बन जाती है। सावन के प्रथम सोमवार की यह सुबह उसी स्पंदन का विराट, जीवंत और अविस्मरणीय रूप थी। 

सप्तऋषि आरती दर्शन

श्रावण मास के प्रथम सोमवार पर श्री काशी विश्वनाथ धाम में कपाट बंद होने से पूर्व भगवान श्री विश्वेश्वर की दिव्य सप्तऋषि आरती संपन्न हुई। वैदिक मंत्रोच्चार, घंटा-घड़ियाल और शंखध्वनि के बीच बाबा का विशेष श्रृंगार कर आरती उतारी गई। धाम परिसर हर-हर महादेव के जयघोष से गुंजायमान रहा और श्रद्धालुओं ने भावविभोर होकर दर्शन किए। मंदिर प्रशासन के अनुसार सप्तऋषि आरती के उपरांत निर्धारित समय पर बाबा की शयन आरती संपन्न होगी।

श्री शंकर स्वरूप श्रृंगार आरती

श्रावण मास-2026 के प्रथम सोमवार पर श्री काशी विश्वनाथ धाम में भगवान श्री विश्वेश्वर का दिव्य श्री शंकर स्वरूप श्रृंगार आरती दर्शन भक्तों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। बाबा का भस्म, चंदन, पुष्पमालाओं और रजत आभूषणों से अलौकिक श्रृंगार किया गया। वैदिक मंत्रोच्चार, शंखध्वनि और घंटा-घड़ियाल के मध्य संपन्न आरती से धाम परिसर भक्तिमय हो उठा। श्रद्धालुओं ने भावविभोर होकर दर्शन-पूजन किया और हर-हर महादेव के जयघोष से वातावरण गुंजायमान रहा।

संसद के कथित स्किट से काशी में उबाल, सड़कों पर उतरेगा धर्मसंसद का हुंकार

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