संसद के कथित स्किट से काशी में उबाल, सड़कों पर उतरेगा धर्मसंसद का हुंकार
राम मंदिर
चंदा
विवाद
पर
संसद
परिसर
में
हुए
प्रदर्शन
के
बाद
बढ़ा
विवाद
• वाराणसी में एफआईआर
दर्ज
•
संत बोले—आस्था
के
प्रश्न
पर
चुप
नहीं
रहेगी
काशी
सुरेश गांधी
वाराणसी. संसद परिसर में
भगवा चोला पहनकर पप्पू
यादव ने चढ़ावा चोरी
का जो नाटक किया...
उसे लेकर संतों का
गुस्सा सांतवें आसमान पर है. सावन
की भक्ति, घंटों की अनुगूंज और
हर-हर महादेव के
जयघोष के बीच काशी
में एक नया धार्मिक-राजनीतिक तूफान उठ खड़ा हुआ
है। बिहार के सांसद पप्पू
यादव की कथित मिमिक्री
और चंदा चोरी संबंधी
विवादित टिप्पणी को लेकर संत
समाज में तीखा आक्रोश
फैल गया है। अखाड़ों,
मठों और सनातन संगठनों
ने इसे केवल राजनीतिक
बयान नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था पर
सीधा प्रहार बताया है।
उनका कहना है
कि इसके कृत्य के
लिए उन्हें माफी मांगनी चाहिए.
हालांकि पप्पू यादव ने माफी
मांगने से इनकार करते
हुए कहा कि उनका
उद्देश्य साधु-संतों का
अपमान करना नहीं था.
सावन की संध्या में
जब काशी के घाटों
पर दीपों की पंक्तियां गंगा
की लहरों से संवाद करती
हैं और मंदिरों की
घंटियां शिवनाम का संगीत रचती
हैं, तभी राष्ट्रीय राजनीति
से उठी एक बहस
ने धार्मिक संवेदनाओं को झकझोर दिया
है। संसद परिसर में
राम मंदिर चंदा विवाद को
लेकर हुए विरोध प्रदर्शन
और कथित स्किट के
बाद काशी का संत
समाज मुखर हो उठा
है। अखाड़ों, मठों और सनातन
संगठनों ने इसे आस्था
से जुड़े प्रश्नों को हल्के ढंग
से प्रस्तुत करने का प्रयास
बताते हुए व्यापक विरोध
की चेतावनी दी है।
जिस तरह संसद परिसर में विपक्षी सांसदों
ने राम मंदिर चंदा/दान से जुड़े
कथित मुद्दों को लेकर प्रदर्शन
किया था। इसी प्रदर्शन
के दौरान प्रस्तुत कथित व्यंग्यात्मक स्किट
पर आपत्ति जताते हुए वाराणसी में
शिकायतें दी गईं। शिकायतों
के आधार पर राहुल
गांधी, पप्पू यादव और अवधेश
प्रसाद सहित कुछ नेताओं
के विरुद्ध धार्मिक भावनाएं आहत करने और
सनातन परंपरा के अपमान के
आरोपों में प्राथमिकी दर्ज
की गई है। विपक्षी
नेताओं ने आरोपों को
अस्वीकार करते हुए कहा
है कि उनका विरोध
कथित वित्तीय अनियमितताओं के मुद्दे पर
था, न कि भगवान
राम या सनातन आस्था
के अपमान के उद्देश्य से।
इस कृत्य को सनातन धर्म,
साधु-संतों और संपूर्ण हिंदू
समाज का अपमान बताया.
लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की
स्वतंत्रता अनिवार्य है, परंतु सार्वजनिक
जीवन में शब्दों की
जिम्मेदारी उससे कम महत्वपूर्ण
नहीं। धार्मिक आस्था से जुड़े विषयों
पर व्यंग्य, नाटक या राजनीतिक
प्रदर्शन करते समय संवेदनशीलता
आवश्यक है। दूसरी ओर
किसी भी आहत भावना
की अभिव्यक्ति संविधान और कानून की
मर्यादा के भीतर ही
होनी चाहिए। काशी इस समय
केवल एक राजनीतिक विवाद
पर प्रतिक्रिया नहीं दे रही;
वह यह प्रश्न उठा
रही है कि क्या
लोकतांत्रिक संवाद में आस्था के
सम्मान की पर्याप्त जगह
बची हुई है। यदि
संवाद, संयम और संवेदनशीलता
साथ रहें तो विवाद
सामाजिक टकराव नहीं, बल्कि मर्यादित सार्वजनिक विमर्श का अवसर भी
बन सकता है। फिलहाल
इतना स्पष्ट है कि संसद
परिसर से उठी यह
बहस अब काशी की
गलियों में गूंज रही
है और उसके स्वर
राष्ट्रीय राजनीति तक सुनाई दे
रहे हैं।
काशी में संतों की बैठकें, विरोध की रूपरेखा
सोमवार को शहर के
कई प्रमुख मठों और धर्मस्थलों
में संतों की बैठकों का
दौर चला। संत समाज
ने कहा कि लोकतांत्रिक
व्यवस्था में विरोध का
अधिकार सबको है, किंतु
धार्मिक प्रतीकों और आस्थाओं से
जुड़े विषयों पर सार्वजनिक आचरण
में मर्यादा अपेक्षित है। संतों ने
संकेत दिया कि आने
वाले दिनों में धर्मसभा, ज्ञापन
और शांतिपूर्ण विरोध मार्च आयोजित किए जा सकते
हैं। एक वरिष्ठ संत
ने कहा, “काशी विचारों की
भूमि है, परंतु श्रद्धा
की अवमानना का प्रश्न उठेगा
तो समाज अपनी बात
अवश्य कहेगा।” संतों ने समर्थकों से
संयम बनाए रखने और
कानूनसम्मत तरीके से विरोध दर्ज
कराने की अपील भी
की।
सावन के कारण बढ़ी संवेदनशीलता
धार्मिक जानकारों का मानना है
कि यह विवाद सावन
माह में सामने आने
के कारण अधिक संवेदनशील
हो गया है। इन
दिनों काशी में देशभर
से लाखों श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। कांवड़
यात्राएं, विशेष पूजन और मंदिरों
में बढ़ती भीड़ के बीच
धार्मिक विषयों पर कोई भी
तीखी राजनीतिक बहस तेजी से
जनभावनाओं को प्रभावित करती
है। घाटों और मंदिरों के
आसपास दिन भर श्रद्धालुओं
के बीच इसी मुद्दे
पर चर्चा होती रही। कई
लोगों ने कहा कि
राजनीतिक दलों को धार्मिक
प्रतीकों से जुड़े विषयों
पर शब्दों का चयन अधिक
सावधानी से करना चाहिए।
प्रशासन सतर्क, सोशल मीडिया पर निगरानी
विवाद को देखते हुए
जिला प्रशासन और पुलिस ने
संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी बढ़ा
दी है। अधिकारियों ने
स्पष्ट किया है कि
शांति व्यवस्था बनाए रखना सर्वोच्च
प्राथमिकता है। सोशल मीडिया
पर प्रसारित वीडियो, पोस्ट और टिप्पणियों की
निगरानी की जा रही
है तथा भड़काऊ सामग्री
साझा करने वालों के
विरुद्ध कार्रवाई की चेतावनी दी
गई है। पुलिस सूत्रों
के अनुसार अब तक शहर
में किसी बड़ी अप्रिय
घटना की सूचना नहीं
है, लेकिन भीड़भाड़ वाले धार्मिक क्षेत्रों
में अतिरिक्त सतर्कता बरती जा रही
है।
संसद से सड़क तक राजनीतिक प्रतिध्वनि
यह विवाद अब
संसद की बहस से
निकलकर सड़क और समाज
तक पहुंच गया है। सत्ता
पक्ष के कई नेताओं
ने संतों की भावनाओं के
समर्थन में बयान दिए
हैं, जबकि विपक्ष का
कहना है कि उनके
विरोध को गलत अर्थों
में प्रस्तुत किया जा रहा
है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है
कि काशी से उठने
वाली धार्मिक प्रतिक्रिया अक्सर राष्ट्रीय विमर्श को प्रभावित करती
है, इसलिए यह मुद्दा आने
वाले दिनों में और व्यापक
चर्चा का विषय बन
सकता है।
काशी की परंपरा और वर्तमान की चुनौती
काशी ने सदियों
तक शास्त्रार्थ, मतभेद और संवाद की
परंपरा को जीवित रखा
है। यहां विचारों का
संघर्ष भी हुआ और
सहअस्तित्व का मार्ग भी
निकला। आज की चुनौती
यह है कि लोकतांत्रिक
असहमति और धार्मिक सम्मान
के बीच संतुलन कैसे
बना रहे। संत समाज
विरोध की तैयारी कर
रहा है, वहीं प्रशासन
शांति बनाए रखने की
कोशिश में है; दोनों
के बीच यही संतुलन
शहर की परीक्षा बन
गया है।
माफी न मांगने पर होगा उग्र आंदोलन
संतो ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा
कि संसद में विरोध
के नाम पर भगवान
श्री राम लला और
सनातन परंपराओं का अपमान संत
समाज किसी भी कीमत
पर सहन नहीं करेगा.
इस कृत्य के लिए सार्वजनिक
रूप से माफी नहीं
मांगी गई, तो देशभर
का संत समाज सड़कों
पर उतरकर उग्र प्रदर्शन करने
के लिए बाध्य होगा.
'बिना शर्त लगाए ये
क्षमा नहीं मांगते तो
कार्रवाई करने का अधिकार
लोकसभा को है। लोकसभा
अध्यक्ष को इनकी सदस्यता
समाप्त करनी चाहिए अन्यथा
हिंदू समाज का धैर्य
जवाब दे जाएगा। जहां
तक राम मंदिर का
प्रश्न है, एसआईटी जांच
कर रही है। सुप्रीम
कोर्ट उस विषय को
देख रहा है। जो
भी निर्णय होगा, हम उसे स्वीकार
करेंगे। चोरों को कड़ी से
कड़ी सजा मिलेगी।'
पप्पू यादव का अक्षम्य अपराध
इस देश को,
इस देश के साधु
संतों को, भगवा वस्त्र
को बदनाम करने का जो
षड्यंत्र पप्पू यादव ने किया
है, वह अक्षम्य अपराध
है। अखिल भारतीय संत
समिति उसकी संसद सदस्यता
बर्खास्त करने की मांग
लोकसभा के अध्यक्ष से
करती है। ….स्वामी जीतेंद्रानंद
“सनातन का अपमान नहीं सहेंगे” और “काशी का सम्मान सर्वोपरि”
अस्सी से मैदागिन, गोदौलिया से चौक तक कई स्थानों पर सनातन संगठनों ने पोस्टर और बैनर लगाने शुरू कर दिए हैं। सोशल मीडिया पर भी अभियान तेज हो गया है। “सनातन का अपमान नहीं सहेंगे” और “काशी का सम्मान सर्वोपरि” जैसे संदेश तेजी से साझा किए जा रहे हैं।





