सीता नवमी : धरती की कोख से जन्मी मर्यादा की महाशक्ति : जागृत होती आस्था और आदर्श का उत्सव
वैशाख शुक्ल नवमी का पावन पर्व सीता नवमी केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति के मूल स्वरों, त्याग, सत्य, मर्यादा और समर्पण, का जीवंत उत्सव है। यह वह दिन है जब पृथ्वी की कोख से प्रकट हुई जनकनंदिनी मां सीता के रूप में ‘शक्ति’ स्वयं मानव जीवन को दिशा देने अवतरित होती है। रामचरितमानस में वर्णित सीता का स्वरूप सृष्टि की मूल ऊर्जा के रूप में स्थापित है, वे केवल भगवान राम की अर्धांगिनी नहीं, बल्कि समस्त सृजन की आधारशिला हैं। सीता नवमी हमें उस आदर्श की याद दिलाती है, जिसमें एक नारी पुत्री, पत्नी, वधू और मां के रूप में हर भूमिका में उत्कृष्टता का मानक स्थापित करती है। वनवास की कठिनाइयों से लेकर अशोक वाटिका की यातना तक, उनका जीवन संघर्षों से भरा रहा, लेकिन उन्होंने कभी धर्म और मर्यादा का मार्ग नहीं छोड़ा। यही कारण है कि वे आज भी भारतीय समाज में ‘आदर्श नारी’ की सर्वोच्च प्रतीक मानी जाती हैं। इस वर्ष 25 अप्रैल को पड़ रही सीता नवमी विशेष संयोगों, रवि योग और अबूझ मुहूर्त, से युक्त है, जो इसे और अधिक फलदायी बनाती है। मान्यता है कि इस दिन की गई पूजा न केवल दांपत्य जीवन में सुख-शांति लाती है, बल्कि परिवार में समृद्धि और संतुलन भी स्थापित करती है। दरअसल, सीता नवमी एक पर्व नहीं, बल्कि जीवन के उस सत्य का उत्सव है, जहां शक्ति, सहनशीलता और संस्कार मिलकर ‘पूर्णता’ का निर्माण करते हैं
सुरेश गांधी
भारतीय सनातन परंपरा में कुछ तिथियां
केवल पर्व नहीं होतीं,
वे जीवन-दर्शन की
पुनर्स्मृति होती हैं। वैशाख
शुक्ल नवमी का पावन
दिन ऐसा ही एक
अवसर है, जब हम
उस आदर्श नारी स्वरूप को
नमन करते हैं, जिसने
अपने जीवन से धर्म,
त्याग और मर्यादा की
पराकाष्ठा को साकार किया,
माता सीता। सीता नवमी केवल
एक जन्मोत्सव नहीं, बल्कि शक्ति, सहनशीलता और समर्पण की
उस दिव्य चेतना का उत्सव है,
जो हर युग में
समाज को दिशा देती
रही है। गोस्वामी तुलसीदास
कृत रामचरितमानस में वर्णित है
कि सीता केवल एक
पात्र नहीं, बल्कि सृष्टि की उत्पत्ति, पालन
और संहार की आधारशक्ति हैं।
वे इच्छा, क्रिया और ज्ञान, तीनों
शक्तियों का संगम हैं।
इसीलिए उन्हें ‘परमात्मा की शक्ति स्वरूपा’
कहा गया है।
दुर्लभ संयोगों से युक्त पावन अवसर
इस वर्ष सीता
नवमी 25 अप्रैल (वैशाख शुक्ल नवमी) को मनाई जाएगी।
यह तिथि कई दृष्टियों
से विशेष है, नवमी तिथि
प्रारंभ : 24 अप्रैल, सायं 7ः21 बजे. नवमी
तिथि समाप्त : 25 अप्रैल, सायं 6ः27 बजे. पूजन
का श्रेष्ठ समय : प्रातः 10ः58 बजे से
दोपहर 1ः34 बजे तक.
रवि योग : 25 अप्रैल सुबह 5ः54 बजे से
अगले दिन सुबह 5ः53
बजे तक. इस दिन
रवि योग और स्वयंसिद्ध
‘अबूझ मुहूर्त’ का अद्भुत संयोग
बन रहा है। मान्यता
है कि इस दिन
बिना पंचांग देखे भी कोई
भी शुभ कार्य किया
जा सकता है। सूर्य
के समान तेज देने
वाला रवि योग साधना
और पूजा को विशेष
फलदायी बनाता है।
भूमि से प्रकट हुई ‘अन्नपूर्णा’
वाल्मीकि रामायण के अनुसार वाल्मीकि
रामायण मिथिला के राजा जनक
जब यज्ञ भूमि को
जोत रहे थे, तब
हल की नोक से
एक दिव्य बालिका प्रकट हुई। ‘सीता’ शब्द का अर्थ
ही है, हल की
रेखा। इसीलिए उनका नाम ‘सीता’
पड़ा और वे ‘जानकी’
के नाम से विख्यात
हुईं। भूमि से उत्पन्न
होने के कारण उन्हें
‘अन्नपूर्णा’ और ‘प्रकृति स्वरूपा’
भी कहा गया है।
सीता उपनिषद में उन्हें सृष्टि
की मूल शक्ति, योगमाया
और अक्षरब्रह्म की अभिव्यक्ति बताया
गया है।
आदर्श नारी का शिखर : त्याग, तप और तपस्या की प्रतिमूर्ति
माता सीता का
जीवन भारतीय संस्कृति में नारीत्व का
सर्वोच्च आदर्श है, पुत्री के
रूप में, जनक की
आज्ञाकारी और संस्कारी संतान.
पत्नी के रूप में,
पति के साथ वनवास
स्वीकार करने वाली पतिव्रता.
वधू के रूप में,
मर्यादा और संयम की
प्रतिमूर्ति. माता के रूप
में, लव-कुश का
संस्कारवान पालन. उनका जीवन यह
सिखाता है कि कठिन
से कठिन परिस्थितियों में
भी मर्यादा और धैर्य नहीं
छोड़ना चाहिए। अशोक वाटिका में
भी उन्होंने अपने पतिव्रत धर्म
की रक्षा की और रावण
के समक्ष अडिग रहीं।
व्रत और पूजा का महत्व : सौभाग्य और समृद्धि का वरदान
पूजा विधि : सरल, पवित्र और प्रभावी
प्रातः स्नान कर व्रत का
संकल्प लें और पूजा
स्थल पर राम-सीता
की प्रतिमा स्थापित करें। इसके बाद गंगाजल
से स्नान कराएं. धूप, दीप, पुष्प,
तिल, जौ, अक्षत अर्पित
करें. ‘श्री सीतायै नमः’
या ‘श्री रामाय नमः’
मंत्र का जप करें.
रामचरितमानस, जानकी स्तोत्र या रामचंद्राष्टक का
पाठ करें. अंत में आरती
कर सुख-समृद्धि की
कामना करें।
उपाय : दांपत्य सुख और सौभाग्य के लिए
जनकपुर : आस्था का जीवंत केंद्र
भारत-नेपाल सीमा
के निकट स्थित जनकपुर
को माता सीता की
जन्मस्थली माना जाता है।
यहां स्थित भव्य जानकी मंदिर
श्रद्धालुओं की आस्था का
प्रमुख केंद्र है। यह स्थान
आज भी मिथिला संस्कृति
और परंपरा का जीवंत प्रतीक
है। जनकपुर, नेपाल के धानुषा जिले
के दक्षिणी तराई शहर से
लगभग 200 किमी दूर दक्षिण-पूर्व है। जनकपुर में
मां सीता का भव्य
मंदिर है, जो भारतीय
सीमा से महज 22 किमी
दूरी पर है। जनकपुर
के निवासी सीता जी को
जानकी देवी कहते हैं।
जनकपुर के केंद्र उत्तर
और पश्चिम में जानकी मंदिर
है। यह मंदिर 1911 में
बनाया गया था। जनकपुर
में कई तालाब हैं
जिनमें 2 सबसे महत्वपूर्ण हैं
धनुष सागर और गंगा
सागर। यहां की बोली
मैथिली अभी भी व्यापक
रूप से इस क्षेत्र
में बोली जाती है।
त्याग, तप और तेज की त्रयी में साकार ‘जनकनंदिनी’,
हर युग के लिए प्रासंगिक संदेश
आज के दौर
में जब रिश्तों में
विश्वास और धैर्य की
कमी देखी जा रही
है, माता सीता का
जीवन एक मार्गदर्शक बनकर
सामने आता है। उनका
संदेश स्पष्ट है, संबंधों में
विश्वास और सम्मान जरूरी
है. त्याग और समर्पण से
ही रिश्ते मजबूत होते हैं. विपरीत
परिस्थितियों में भी नैतिकता
का साथ न छोड़ें.
हर युग में जीवंत है ‘सीता तत्व’
सीता नवमी केवल
एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि
उस ‘सीता तत्व’ की
पुनर्स्मृति है, जो हर
नारी में विद्यमान है
- त्याग, करुणा, धैर्य और शक्ति का
अद्भुत संगम। जब समाज इन
मूल्यों से दूर होने
लगता है, तब सीता
का जीवन हमें पुनः
सही दिशा दिखाता है।
धरती से उत्पन्न होकर
धरती में विलीन हो
जाने वाली यह दिव्य
शक्ति हमें सिखाती है
कि जीवन का सार
भौतिक नहीं, बल्कि नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों
में निहित है। यही है
सीता नवमी का संदेश,
मर्यादा में ही महानता
है, और समर्पण में
ही शक्ति।
पौराणिक मान्यताएं
पौराणिक पवित्र ग्रंथ रामायण की मुख्य नायक
और नायिका भगवान श्रीराम और माता सीता
है। श्रीराम के तीन भाई
थे। लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न।
श्रीराम सबसे बड़े पुत्र
थे। ठीक इसी तरह
माता सीता की तीन
बहनें मांडवी, श्रुतकीर्ति और उर्मिला थी।
माता सीता सबसे बड़ी
थीं। सीता उपनिषद में
वर्णित है कि सीता
उपनिषद अथर्ववेद का एक भाग
है। इसलिए इसे अथर्ववेदीय उपनिषद
भी कहते हैं। इस
उपनिषद के अनुसार देवगण
तथा प्रजापति के मध्य हुए
प्रश्नोत्तर में ‘सीता‘ को
शाश्वत शक्ति का आधार माना
गया है। इसमें सीता
को प्रकृति का स्वरूप बताया
गया है। उन्हें ही
प्रकृति में परिलक्षित होते
हुए देखा गया है।
सीता जी को प्रकृति
का स्वरूप कहा गया है।
यहां सीता शब्द का
अर्थ अक्षरब्रह्म की शक्ति के
रूप में हुआ है।
यह नाम साक्षात ‘योगमाया‘
का है। सीता को
भगवान श्रीराम का सानिध्य प्राप्त
है, जिसके कारण वे विश्वकल्याणकारी
हैं। सीता जी ही
प्रकृति हैं वही प्रणव
और उसका कारक भी
हैं। सीता जी जग
माता हैं और श्री
राम को जगत-पिता
बताया गया है। एकमात्र
सत्य यही है कि
श्रीराम ही बहुरूपिणीमाया को
स्वीकार कर विश्वरूप में
भासित हो रहे हैं
और सीता जी ही
वही योगमाया है। वाल्मीकि रामायण
तथा वेद-उपनिषदों में
माता सीता के स्वरूप
का विस्तार पूर्वक वर्णन किया गया है।
ऋग्वेद में एक स्तुति
में कहा गया है
कि असुरों का नाश करने
वाली सीता जी आप
हमारा कल्याण करें।
सीता नवमी की पौराणिक कथाएं
सीता नवमी की पौराणिक कथा के अनुसार मारवाड़ क्षेत्र में एक वेदवादी श्रेष्ठ धर्मधुरीण ब्राह्मण निवास करते थे। उनका नाम देवदत्त था। उन ब्राह्मण की बड़ी सुंदर रूपगर्विता पत्नी थी, उसका नाम शोभना था। ब्राह्मण देवता जीविका के लिए अपने ग्राम से अन्य किसी ग्राम में भिक्षाटन के लिए गए हुए थे। इधर ब्राह्मणी कुसंगत में फंसकर व्यभिचार में प्रवृत्त हो गई। अब तो पूरे गांव में उसके इस निंदित कर्म की चर्चाएं होने लगीं। परंतु उस दुष्टा ने गांव ही जलवा दिया। दुष्कर्मों में रत रहने वाली वह दुर्बुद्धि मरी तो उसका अगला जन्म चांडाल के घर में हुआ। पति का त्याग करने से वह चांडालिनी बनी, ग्राम जलाने से उसे भीषण कुष्ठ हो गया तथा व्यभिचार-कर्म के कारण वह अंधी भी हो गई। अपने कर्म का फल उसे भोगना ही था। इस प्रकार वह अपने कर्म के योग से दिनों दिन दारुण दुख प्राप्त करती हुई देश-देशांतर में भटकने लगी। एक बार दैवयोग से वह भटकती हुई कौशलपुरी पहुंच गई। संयोगवश उस दिन वैशाख मास, शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि थी, जो समस्त पापों का नाश करने में समर्थ है। सीता (जानकी) नवमी के पावन उत्सव पर भूख-प्यास से व्याकुल वह दुखियारी इस प्रकार प्रार्थना करने लगी- हे सज्जनों! मुझ पर कृपा कर कुछ भोजन सामग्री प्रदान करो। मैं भूख से मर रही हूं- ऐसा कहती हुई वह स्त्री श्री कनक भवन के सामने बने एक हजार पुष्प मंडित स्तंभों से गुजरती हुई उसमें प्रविष्ट हुई। उसने पुनः पुकार लगाई- भैया! कोई तो मेरी मदद करो- कुछ भोजन दे दो। इतने में एक भक्त ने उससे कहा- देवी! आज तो सीता नवमी है, भोजन में अन्न देने वाले को पाप लगता है, इसीलिए आज तो अन्न नहीं मिलेगा। कल पारणा करने के समय आना, ठाकुर जी का प्रसाद भरपेट मिलेगा, किंतु वह नहीं मानी। अधिक कहने पर भक्त ने उसे तुलसी एवं जल प्रदान किया। वह पापिनी भूख से मर गई। किंतु इसी बहाने अनजाने में उससे सीता नवमी का व्रत पूरा हो गया। अब तो परम कृपालिनी ने उसे समस्त पापों से मुक्त कर दिया। इस व्रत के प्रभाव से वह पापिनी निर्मल होकर स्वर्ग में आनंदपूर्वक अनंत वर्षों तक रही। तत्पश्चात् वह कामरूप देश के महाराज जयसिंह की महारानी काम कला के नाम से विख्यात हुई। उसने अपने राज्य में अनेक देवालय बनवाए, जिनमें जानकी-रघुनाथ की प्रतिष्ठा करवाई। अतः सीता नवमी पर जो श्रद्धालु माता जानकी का पूजन-अर्चन करते है, उन्हें सभी प्रकार के सुख-सौभाग्य प्राप्त होते हैं। इस दिन जानकी स्तोत्र, रामचंद्रष्टाकम्, रामचरित मानस आदि का पाठ करने से मनुष्य के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।







