महाशिवरात्रि पर काशी से उठा वैश्विक सनातन एकात्मता का शंखनाद
आस्था के सागर में डूबी काशी, बाबा धाम में उमड़ा करोड़ों श्रद्धा का ज्वार
श्रीकाशी विश्वनाथ
धाम
के
श्रीचरणों
में
पहुंचा
63 तीर्थों
का
प्रसाद,
सजा
महाशिवरात्रि
का
अलौकिक
शृंगार
काशी विश्वनाथ
धाम
में
देश-विदेश
के
ज्योतिर्लिंग,
शक्तिपीठ
और
सिद्धपीठों
से
आई
पावन
भेंट
रामेश्वरम् के
जल
से
हुआ
विशेष
अभिषेक,
‘वसुधैव
कुटुम्बकम्’
की
आध्यात्मिक
परंपरा
को
मिला
नया
आयाम
सुरेश गांधी
वाराणसी. महाशिवरात्रि के पावन अवसर
पर धर्म और आस्था
की वैश्विक राजधानी बनी वाराणसी रविवार
को सचमुच शिवमय हो उठी। देवाधिदेव
महादेव दूल्हे के रूप में
अलंकृत हुए तो श्रद्धालुओं
की भावनाएं भक्ति की पराकाष्ठा पर
पहुंच गईं। महाशिवरात्रि पर
विश्वभर के आठ और
देश के 63 प्रमुख मंदिरों से आए प्रसाद
से बाबा का विशेष
भोग लगाया गया, जिसने इस
आध्यात्मिक पर्व को वैश्विक
स्वरूप प्रदान कर दिया।
भोर में मंगला
आरती के साथ ही
बाबा के दर्शन का
सिलसिला शुरू होते ही
श्रद्धालुओं का अभूतपूर्व सैलाब
उमड़ पड़ा। मंदिर के
सभी प्रवेश द्वारों पर चार किलोमीटर
से अधिक लंबी कतारें
लग गईं। मंदिर प्रशासन
के अनुसार केवल एक घंटे
में ही 30 से 40 हजार श्रद्धालुओं ने
दर्शन किए। सुबह 6ः40
बजे तक दर्शनार्थियों की
संख्या 1.60 लाख तक पहुंच
गई और 7 बजे के
बाद यह आंकड़ा दो
लाख पार कर गया।
पूर्वाह्न 9 बजे तक करीब
चार लाख श्रद्धालु बाबा
के चरणों में शीश नवाकर
कृतार्थ हो चुके थे।
जबकि रात में यह
संख्या 10 लाख पार कर
गयी.
मंदिर परिसर, गलियां, घाट और कॉरिडोर
श्रद्धालुओं से पूरी तरह
भर गए। दशाश्वमेध घाट
से लेकर गोदौलिया और
मैदागिन क्षेत्र तक भक्तों का
डेरा रहा। रात ढलते
ही श्रद्धालु गंगा स्नान कर
कतारों में शामिल हो
गए। कई भक्त पूरी
रात बैरिकेडिंग में रतजगा कर
भोर की मंगला आरती
का इंतजार करते रहे। वातावरण
“हर-हर महादेव” और
“ॐ नमः शिवाय” के
जयघोष से गूंजता रहा।
महाशिवरात्रि के परम पावन
अवसर पर धर्मनगरी वाराणसी
एक बार फिर वैश्विक
आध्यात्मिक समन्वय का केंद्र बनकर
उभरी है।
श्री काशी विश्वनाथ
मंदिर न्यास की ओर से
इस वर्ष एक अभिनव
एवं ऐतिहासिक आध्यात्मिक पहल का शुभारंभ
किया गया, जिसके अंतर्गत
देश-विदेश के प्रमुख ज्योतिर्लिंगों,
शक्तिपीठों, सिद्धपीठों तथा प्राचीन तीर्थस्थलों
से प्राप्त पावन प्रसाद, पूजित
वस्त्र, रज और पवित्र
जल भगवान श्री विश्वेश्वर महादेव
के श्रीचरणों में अर्पित किए
गए। इस अनूठी पहल
के तहत अब तक
कुल 63 प्रमुख मंदिरों से पावन भेंट
और प्रसाद काशी धाम पहुंच
चुका है। प्राप्त प्रसादों
का विधि-विधानपूर्वक अंश
ग्रहण कर मध्याह्न भोग
आरती में भगवान को
समर्पित किया गया। इसके
बाद धाम में उपस्थित
श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद
वितरण कर विभिन्न तीर्थस्थलों
की आध्यात्मिक भावना को काशी में
सजीव रूप दिया गया।
यह आयोजन सनातन परंपरा की सांस्कृतिक, धार्मिक
और भावनात्मक एकता का सशक्त
प्रतीक बनकर सामने आया
है।
महाशिवरात्रि पर बाबा का
दूल्हा स्वरूप विशेष आकर्षण का केंद्र बना।
दोपहर बाद बाबा का
दिव्य शृंगार किया गया, जिसे
देखने के लिए श्रद्धालुओं
में गजब का उत्साह
उमड़ पड़ा। इस अवसर
पर 45 घंटे तक स्पर्श
दर्शन बंद रखा गया,
जिससे व्यवस्थाएं सुचारु रूप से संचालित
हो सकें। काशी के अन्य
प्रमुख शिवालयों में भी आस्था
का महासमागम देखने को मिला। मार्कण्डेय
महादेव मंदिर में श्रद्धालुओं की
सुरक्षा और भीड़ नियंत्रण
को लेकर वरिष्ठ अधिकारियों
ने निरीक्षण किया, वहीं मणि मंदिर
दुर्गाकुंड में जलाभिषेक के
लिए सुबह से ही
श्रद्धालुओं की लंबी कतार
लगी रही। काशी में
भगवान शिव के नाम
के 171 शिवलिंगों का विशेष पूजन
भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था
का अद्भुत केंद्र बना।
सुरक्षा व्यवस्था को लेकर प्रशासन
पूरी तरह सतर्क नजर
आया। पुलिस और अर्धसैनिक बलों
की तैनाती के साथ ही
सीसीटीवी और ड्रोन कैमरों
से निगरानी की गई। किसी
भी आपात स्थिति से
निपटने के लिए राष्ट्रीय
आपदा मोचन बल को
भी तैनात किया गया। श्रद्धालुओं
की सुविधा के लिए खोया-पाया केंद्र, स्वास्थ्य
शिविर और लाउडस्पीकर से
निरंतर सूचना प्रसारण की व्यवस्था की
गई। मंदिर प्रशासन ने श्रद्धालुओं की
भारी भीड़ को देखते
हुए ऑनलाइन बुकिंग व्यवस्था अस्थायी रूप से बंद
कर दी है और
श्रद्धालुओं से निर्धारित मार्गों
का पालन करने की
अपील की है।
महाशिवरात्रि पर उमड़ी इस
विराट श्रद्धा ने एक बार
फिर सिद्ध कर दिया कि
काशी केवल एक नगर
नहीं, बल्कि सनातन आस्था की जीवंत आत्मा
है, जहां शिवभक्ति अनवरत
धारा बनकर सदियों से
प्रवाहित हो रही है।
इसी क्रम में महाशिवरात्रि
के पावन पर्व पर
धाम स्थित गंगेश्वर महादेव मंदिर में विशेष जलाभिषेक
का आयोजन किया गया। दक्षिण
भारत के पवित्र रामेश्वरम्
तीर्थ से लाए गए
पावन जल से भगवान
का विधि-विधानपूर्वक अभिषेक
संपन्न हुआ। यह आयोजन
उत्तर और दक्षिण भारत
की धार्मिक परंपराओं के अद्वितीय संगम
का प्रतीक बन गया, जिसने
सनातन संस्कृति की अखंडता को
और सुदृढ़ किया।
मंदिर न्यास का मानना है
कि महाशिवरात्रि के अवसर पर
आरंभ की गई यह
परंपरा केवल धार्मिक आदान-प्रदान तक सीमित नहीं
है, बल्कि यह “वसुधैव कुटुम्बकम्”
की उस सनातन अवधारणा
को साकार कर रही है,
जिसमें समस्त विश्व को एक परिवार
के रूप में देखा
जाता है। इस पहल
के माध्यम से राष्ट्र और
विश्व के विविध तीर्थस्थलों
को एक आध्यात्मिक सूत्र
में संगठित करने की दिशा
में महत्वपूर्ण और प्रेरणादायी शुरुआत
हुई है। महाशिवरात्रि पर
इस विराट आध्यात्मिक समागम ने एक बार
फिर सिद्ध कर दिया कि
काशी केवल आस्था का
केंद्र नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति की वैश्विक आत्मा
है, जहां से आध्यात्मिक
एकता और सांस्कृतिक समरसता
का संदेश पूरी दुनिया तक
प्रवाहित होता है।
हर-हर महादेव के जयघोष से गूंजा पूर्वांचल
महाशिवरात्रि के पावन अवसर
पर धर्मनगरी वाराणसी सहित पूरे पूर्वांचल
क्षेत्र में आस्था और
उल्लास का अद्भुत संगम
देखने को मिला। भोर
की मंगल आरती के
साथ ही काशी विश्वनाथ
धाम में श्रद्धालुओं का
सैलाब उमड़ पड़ा। देश-विदेश से पहुंचे लाखों
श्रद्धालु बाबा के दर्शन-पूजन के लिए
घंटों कतार में खड़े
नजर आए। मंदिर परिसर
को आकर्षक फूल-मालाओं और
रंग-बिरंगी झालरों से सजाया गया
है, जिससे पूरा धाम दुल्हन
की तरह सुसज्जित दिखाई
दे रहा है। गंगा
घाटों पर भी श्रद्धालुओं
की भारी भीड़ देखी
गयी. श्रद्धालु गंगा स्नान कर
जल, दूध, बेलपत्र और
धतूरा अर्पित कर भगवान शिव
की पूजा-अर्चना कर
रहे हैं। वहीं प्रशासन
की ओर से सुरक्षा
के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं।
ड्रोन कैमरों से निगरानी, बैरिकेडिंग,
मेडिकल कैंप और यातायात
व्यवस्था को सुचारु रखने
के लिए विशेष योजना
लागू की गई है।
पूर्वांचल के मिर्जापुर, जौनपुर,
गाजीपुर, बलिया और सोनभद्र सहित
अन्य जिलों के प्रमुख शिवालयों
में भी श्रद्धालुओं की
भारी भीड़ उमड़ रही
है। जगह-जगह भजन-कीर्तन, रुद्राभिषेक और भंडारे का
आयोजन किया जा रहा
है। पूरे क्षेत्र में
“हर-हर महादेव” के
जयघोष से वातावरण भक्तिमय
बना हुआ है। महाशिवरात्रि
को लेकर स्थानीय प्रशासन
और मंदिर समितियों का दावा है
कि इस वर्ष श्रद्धालुओं
की संख्या पिछले वर्षों की तुलना में
अधिक रहने की संभावना
है। श्रद्धालुओं की सुविधा और
सुरक्षा को प्राथमिकता देते
हुए 24 घंटे व्यवस्थाएं संचालित
की जा रही हैं,
जिससे भक्तों को सुगम दर्शन
का लाभ मिल सके।



