दूध, दवा, राशन, यात्रा और छोटे कारोबार तक झुलसा रही है महंगाई की लपट

भारत
में
महंगाई
का
संकट
एक
बार
फिर
ऐसी
स्थिति
की
ओर
बढ़ता
दिखाई
दे
रहा
है,
जहां
उसका
असर
केवल
आर्थिक
आंकड़ों
तक
सीमित
नहीं
रहेगा,
बल्कि
आम
आदमी
के
जीवन
की
हर
परत
को
प्रभावित
करेगा।
बीते
कुछ
वर्षों
में
महंगाई
के
खिलाफ
जो
स्थिरता
बनी
थी,
वह
अब
टूटती
नजर
आ
रही
है।
पेट्रोल,
डीजल
और
सीएनजी
की
कीमतों
में
लगातार
बढ़ोतरी
ने
यह
संकेत
दे
दिया
है
कि
आने
वाले
दिनों
में
महंगाई
की
नई
लहर
देश
की
अर्थव्यवस्था
और
आम
नागरिक
दोनों
के
लिए
चुनौती
बन
सकती
है।
महंगाई
का
सबसे
खतरनाक
पहलू
यह
होता
है
कि
वह
कभी
सीधे
नहीं
आती।
वह
पहले
ईंधन
महंगा
करती
है,
फिर
परिवहन
महंगा
होता
है,
उसके
बाद
बाजार
में
दूध,
फल,
सब्जियां,
दवाएं,
निर्माण
सामग्री
और
रोजमर्रा
की
वस्तुएं
धीरे-धीरे
महंगी
होने
लगती
हैं।
आज
भारत
ठीक
उसी
मोड़
पर
खड़ा
दिखाई
देता
है।
बीते
10-12 दिनों
के
आंकड़े
इस
चिंता
को
और
गहरा
करते
हैं।
15 मई
से
लेकर
अब
तक
पेट्रोल
और
डीजल
की
कीमतों
में
चार
बार
बढ़ोतरी
हो
चुकी
है।
पेट्रोल
सात
रुपये
से
अधिक
प्रति
लीटर
महंगा
हो
चुका
है,
जबकि
डीजल
में
भी
लगभग
इतनी
ही
वृद्धि
दर्ज
की
गई
है।
ताजा
वृद्धि
में
पेट्रोल
2.61 रुपये
और
डीजल
2.71 रुपये
प्रति
लीटर
महंगा
हुआ
है।
इसके
बाद
राजधानी
दिल्ली
में
पेट्रोल
102.12 रुपये प्रति लीटर
और
डीजल
95.20 रुपये
प्रति
लीटर
के
स्तर
तक
पहुंच
गया।
सीएनजी
भी
राहत
देने
की
स्थिति
में
नहीं
है।
पिछले
दो
सप्ताह
में
चार
बार
बढ़ोतरी
के
बाद
दिल्ली
में
सीएनजी
83.09 रुपये
प्रति
किलोग्राम
तक
पहुंच
गई
है।
कुल
मिलाकर
सीएनजी
छह
रुपये
प्रति
किलो
तक
महंगी
हो
चुकी
है

सुरेश गांधी
फिरहाल, महंगाई के मौजूदा संकट
में एक बड़ा पहलू
यह है कि इसका
असर केवल ईंधन और
खाद्य वस्तुओं तक सीमित नहीं
रहेगा, बल्कि रोजगार और छोटे कारोबार
पर भी गहरा प्रभाव
डाल सकता है। देश
के सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम
उद्योग पहले से ही
नकदी संकट से जूझ
रहे हैं। वित्त मंत्री
निर्मला सीतारमण ने भी स्वीकार
किया है कि करीब
8.1 लाख करोड़ रुपये का भुगतान विभिन्न
संस्थानों और सार्वजनिक उपक्रमों
के स्तर पर अटका
हुआ है। इससे छोटे
उद्योगों के पास कार्यशील
पूंजी (वर्किंग कैपिटल) की कमी बढ़
रही है। ईंधन की
कीमतें बढ़ने से उत्पादन लागत
भी बढ़ेगी। छोटे उद्योगों को
कच्चा माल लाने और
तैयार माल भेजने में
अधिक खर्च उठाना पड़ेगा।
इसका सीधा असर उत्पादन
पर पड़ सकता है।
मतलब साफ है यदि
महंगाई और ईंधन मूल्य
वृद्धि का दबाव लंबे
समय तक बना रहा,
तो कई छोटे कारोबारियों
को उत्पादन कम करना पड़
सकता है। इसके अलावा बढ़ती महंगाई उपभोक्ता की क्रय शक्ति
भी कमजोर करती है। जब
लोगों की आय का
बड़ा हिस्सा ईंधन और जरूरी
वस्तुओं पर खर्च होने
लगे, तब बाजार में
मांग घटने लगती है।
अर्थव्यवस्था के लिए यह
दोहरी चुनौती है - एक ओर लागत बढ़ना
और दूसरी ओर मांग का
कमजोर होना। यही वह स्थिति
होती है जिसे अर्थशास्त्र
में अक्सर धीमी आर्थिक गति
का शुरुआती संकेत माना जाता है।
संकट की जड़ : होर्मुज का तनाव और भारत की निर्भरता
भारत विश्व का
दूसरा सबसे बड़ा कच्चा
तेल आयातक देश है। देश
अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत
कच्चा तेल विदेशों से
खरीदता है। ऐसे में
पश्चिम एशिया में किसी भी
प्रकार का तनाव भारत
पर सीधा असर डालता
है। अमेरिका-ईरान तनाव और
होर्मुज जलडमरूमध्य में पैदा हुई
अनिश्चितता ने वैश्विक तेल
बाजार को हिलाकर रख
दिया है। दुनिया के
लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस
की आपूर्ति इसी समुद्री मार्ग
से होती है। युद्ध
और भू-राजनीतिक अस्थिरता
ने कच्चे तेल को 70 डॉलर
प्रति बैरल से बढ़ाकर
100 डॉलर प्रति बैरल के पार
पहुंचा दिया है। भारत
जैसे आयात आधारित देश
के लिए यह स्थिति
केवल ईंधन संकट नहीं,
बल्कि व्यापक आर्थिक दबाव है।
पेट्रोल नहीं, पूरी अर्थव्यवस्था महंगी होगी
महंगाई का सबसे बड़ा
असर उस समय सामने
आता है जब ट्रांसपोर्टेशन
महंगा होने लगता है।
ऑल इंडिया ट्रांसपोर्टर्स वेलफेयर एसोसिएशन ने फ्यूल एडजस्टमेंट
फैक्टर लागू करने का
निर्णय लिया है। संगठन
के मुताबिक ट्रकों की परिचालन लागत
का 65 प्रतिशत हिस्सा डीजल पर निर्भर
है। डीजल में प्रति
एक रुपये वृद्धि पर माल ढुलाई
लागत 0.65 प्रतिशत बढ़ेगी। यदि डीजल 10 रुपये
महंगा होता है तो
परिवहन लागत लगभग 6.5 प्रतिशत
तक बढ़ सकती है।
यह आंकड़ा छोटा दिख सकता
है, लेकिन इसका प्रभाव बहुत
बड़ा होगा। इसके सीधे असर
वाले क्षेत्र दूध और डेयरी उत्पाद.
फल और सब्जियां. दवाइयां. किराना सामान. एफएमसीजी उत्पाद. ई-कॉमर्स डिलीवरी. निर्माण सामग्री. यात्रा और टैक्सी सेवाएं.
दरअसल बाजार तक पहुंचने वाली
लगभग हर वस्तु ट्रकों
के जरिए ही आती
है। इसलिए डीजल की कीमतों
में बढ़ोतरी अंततः उपभोक्ता की जेब तक
पहुंचती है।
संकेत मिलने लगे हैं
महंगाई का असर अब
दिखाई भी देने लगा
है। 15 मई को पेट्रोल-डीजल और सीएनजी
की कीमतों में वृद्धि के
बाद पैकेज्ड दूध कंपनियों ने
कीमतें बढ़ाईं। कुछ शहरों में
ब्रेड महंगी हुई। टैक्सी संगठनों
ने किराया बढ़ाने की मांग शुरू
कर दी। यह सिर्फ
शुरुआत हो सकती है।
रुपया, सोना और महंगाई का त्रिकोण
पहले भारतीय रुपया
डॉलर के मुकाबले दबाव
में आया। कमजोर रुपया
आयात महंगा करता है। उसके
बाद ईंधन महंगा हुआ।
अब इसका असर सोना-चांदी जैसे सुरक्षित निवेश
विकल्पों में भी दिखाई
देने लगा है। एमसीएक्स
में चांदी एक दिन में
5,399 रुपये प्रति किलोग्राम उछल गई, जबकि
सोने में भी 821 रुपये
प्रति दस ग्राम की
बढ़ोतरी दर्ज हुई। जब
वैश्विक संकट बढ़ता है,
निवेशक सुरक्षित परिसंपत्तियों की ओर भागते
हैं। इसका परिणाम यह
होता है कि आम
उपभोक्ता पर दोहरी मार
पड़ती है—एक तरफ
खर्च बढ़ता है और दूसरी
तरफ बचत के साधन
भी महंगे हो जाते हैं।
सरकार का '3F' फॉर्मूला कितना कारगर?
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने मौजूदा संकट
के बीच तीन महत्वपूर्ण
क्षेत्रों - फ्यूल, फर्टीलाइजर
व फाॅरेक्स पर विशेष ध्यान देने की बात
कही है। सरकार ने
ईंधन पर उत्पाद शुल्क
कम कर कुछ राहत
देने की कोशिश की
है, लेकिन अनुमान है कि इससे
वित्तीय वर्ष 2026-27 में लगभग एक
लाख करोड़ रुपये के राजस्व का
नुकसान हो सकता है।
साथ ही एमएसएमइ क्षेत्र में लगभग 8.1 लाख
करोड़ रुपये का भुगतान अटका
हुआ है, जिससे छोटे
उद्योगों की कार्यशील पूंजी
पर गंभीर असर पड़ रहा
है। ऐसे समय में
महंगाई छोटे उद्योगों के
लिए दोहरी चुनौती बन सकती है।
राजनीति बनाम अर्थशास्त्र
महंगाई का मुद्दा हमेशा
राजनीतिक बहस का केंद्र
बनता है। विपक्ष सरकार
पर हमलावर है और सरकार
वैश्विक परिस्थितियों का हवाला दे
रही है। लेकिन सच्चाई
यह है कि आम
आदमी के लिए महंगाई
न राजनीतिक होती है और
न आर्थिक सिद्धांत; वह सीधे रसोई,
जेब और जीवन स्तर
से जुड़ी होती है। सोशल
मीडिया पर फिर वही
पुराना व्यंग्य लौट आया है
- "सखी, सैंया तो खूब ही
कमात हैं, महंगाई डायन
खाए जात है..." यह
केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज की आर्थिक
बेचैनी की अभिव्यक्ति है।
चुनौती केवल कीमतें नहीं, विश्वास बचाने की है
महंगाई के इस दौर
में सबसे बड़ी चुनौती
केवल ईंधन की कीमतों
को नियंत्रित करना नहीं है।
चुनौती यह है कि
आम नागरिक का आर्थिक विश्वास
बना रहे। यदि ईंधन
की आग लंबी चली,
तो उसका असर रोजगार,
उपभोग, छोटे उद्योग और
घरेलू बजट तक जाएगा।
भारत ने इससे पहले
भी वैश्विक संकटों का सामना किया
है, लेकिन इस बार सवाल
केवल तेल का नहीं
है; सवाल उस चूल्हे
का है, जहां महंगाई
धीरे-धीरे अपनी आंच
बढ़ा रही है। और
इतिहास गवाह है—जब
महंगाई रसोई तक पहुंचती
है, तब उसका असर
केवल बाजार पर नहीं, समाज
के मनोविज्ञान पर भी पड़ता
है।