Friday, 30 October 2026

मिग से सुखोई तक महारत, अब वायुसेना के उप प्रमुख होंगे इंद्रपाल सिंह वालिया

मिग से सुखोई तक महारत, अब वायुसेना के उप प्रमुख होंगे इंद्रपाल सिंह वालिया 

चार दशक का सैन्य अनुभव, पांच प्रमुख लड़ाकू विमानों पर दक्षता; जापान और दक्षिण कोरिया में भी निभा चुके हैं रक्षा अताशे की जिम्मेदारी

सुरेश गांधी

भारतीय वायुसेना के वरिष्ठ अधिकारी एयर मार्शल इंद्रपाल सिंह वालिया (एवीएसएम, वीएम) एक नवंबर से वायुसेना के उप प्रमुख (वाइस चीफ ऑफ एयर स्टाफ) का पदभार संभालेंगे। फिलहाल वह पूर्वी वायु कमान के एयर ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ हैं। रक्षा मंत्रालय के प्रेस सूचना ब्यूरो (पीआईबी) की ओर से 30 अक्टूबर को जारी विज्ञप्ति के मुताबिक, वह एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित का स्थान लेंगे, जो 31 अक्टूबर को भारतीय वायुसेना के 29वें प्रमुख का पदभार ग्रहण करेंगे।

करीब चार दशक के सैन्य करियर में एयर मार्शल वालिया ने लड़ाकू विमान उड़ाने से लेकर महत्वपूर्ण सैन्य संस्थानों की कमान और उच्चस्तरीय प्रशासनिक जिम्मेदारियों तक अपनी दक्षता का परिचय दिया है। वह राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए) के पूर्व छात्र हैं। 11 जून 1988 को भारतीय वायुसेना की फाइटर स्ट्रीम में कमीशन प्राप्त करने के साथ उनके सैन्य जीवन की शुरुआत हुई।

पांच प्रमुख लड़ाकू विमानों पर हासिल की दक्षता

एयर मार्शल वालिया की सैन्य विशेषज्ञता का महत्वपूर्ण पक्ष विभिन्न पीढ़ियों के लड़ाकू विमानों पर उनका अनुभव है। वह मिग-21, मिग-23, मिग-27, जगुआर और सुखोई-30 एमकेआई के सभी संस्करणों पर योग्य हैं। इन विमानों पर उनकी दक्षता भारतीय वायुसेना के अलग-अलग दौर के लड़ाकू विमान बेड़े से उनके लंबे जुड़ाव को दर्शाती है। उनका अनुभव केवल विमान उड़ाने तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने एक अग्रिम मोर्चे के लड़ाकू स्क्वाड्रन की कमान संभाली। इसके बाद टैक्टिक्स एंड एयर कॉम्बैट डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट (टीएसीडीई) का नेतृत्व किया। यह उनके करियर की महत्वपूर्ण कमान नियुक्तियों में शामिल रहा। वह एयर फोर्स स्टेशन बरेली के एयर ऑफिसर कमांडिंग भी रह चुके हैं।

निरीक्षण से लेकर पूर्वी वायु कमान तक जिम्मेदारी

अपने करियर में उन्होंने भारतीय वायुसेना के एयर स्टाफ इंस्पेक्शन निदेशालय (डीएएसआई) का नेतृत्व किया। इसके अलावा पूर्वी वायु कमान में वरिष्ठ एयर स्टाफ ऑफिसर के रूप में भी सेवाएं दीं। वर्तमान में वह इसी कमान के एयर ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ हैं। उनकी इन नियुक्तियों में परिचालन कमान, सैन्य निरीक्षण, वायु युद्ध की रणनीति और वायुसेना के प्रशासनिक दायित्वों का व्यापक अनुभव समाहित है।

ब्रिटेन और बांग्लादेश में हासिल किया उच्च सैन्य प्रशिक्षण

एयर मार्शल वालिया ने अपने पेशेवर ज्ञान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी विस्तार दिया है। उन्होंने ब्रिटेन में एडवांस्ड कमांड एंड स्टाफ कोर्स तथा बांग्लादेश में नेशनल डिफेंस कॉलेज (एनडीसी) का प्रशिक्षण प्राप्त किया। इसके साथ ही उन्होंने जापान और दक्षिण कोरिया स्थित भारतीय दूतावासों में रक्षा अताशे के रूप में अपनी सेवाएं दीं। इस भूमिका में उन्होंने दोनों देशों में भारत के रक्षा प्रतिनिधि के रूप में काम किया।

रक्षा अध्ययन में तीन स्नातकोत्तर डिग्रियां  

सैन्य दक्षता के साथ शिक्षा और अध्ययन के प्रति भी उनकी विशेष रुचि है। पीआईबी की विज्ञप्ति के अनुसार, वह पढ़ने के शौकीन हैं और उनके पास रक्षा एवं सामरिक अध्ययन में तीन स्नातकोत्तर डिग्रियां हैं। विशिष्ट सेवाओं के लिए उन्हें वर्ष 2008 में वायु सेना पदक (वीएम) और वर्ष 2018 में अति विशिष्ट सेवा पदक (एवीएसएम) से सम्मानित किया गया। एक नवंबर से उप प्रमुख का पदभार संभालने के साथ एयर मार्शल वालिया भारतीय वायुसेना के शीर्ष नेतृत्व में नई जिम्मेदारी निभाएंगे। उनका लगभग चार दशक का अनुभव, लड़ाकू विमानों पर दक्षता, विभिन्न कमान नियुक्तियां और अंतरराष्ट्रीय रक्षा अनुभव उनके सैन्य करियर की प्रमुख उपलब्धियां हैं।

मोदी का दुनिया को दोटूक : भारत अब दोयम दर्जे का वैश्विक खिलाड़ी नहीं बनेगा!

मोदी का दुनिया को दोटूक : भारत अब दोयम दर्जे का वैश्विक खिलाड़ी नहीं बनेगा! 

दुनिया की सत्ता के गलियारों में भारत अब केवल एक कुर्सी का आकांक्षी नहीं, बराबरी के अधिकार का दावेदार बनकर खड़ा है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता मिले, लेकिन वीटो का अधिकार न हो, भारत को यह मंजूर नहीं। संदेश साफ है- पांच देशों को फैसले रोकने की ताकत और बाकी दुनिया को केवल बहस करने का अवसर, यह व्यवस्था अब नहीं चलनी चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने इस असमानता के खिलाफ अपना रुख फिर मजबूती से रखा है। मसूद अजहर प्रकरण में चीन की अड़ंगेबाजी ने भी साबित किया कि वैश्विक मंच पर केवल मौजूदगी नहीं, निर्णायक अधिकार जरूरी हैं। सवाल यह भी है कि 2004 में समान वीटो की बात करने वाली मनमोहन सिंह सरकार ने 2005 में जी-4 प्रस्ताव के तहत नए सदस्यों के वीटो पर 15 साल बाद समीक्षा की गुंजाइश क्यों छोड़ी? दशकों की कोशिशों के बाद भी भारत को स्थायी सदस्यता नहीं मिली। अब चुनौती केवल मांग दोहराने की नहीं, दुनिया को अपनी शर्तों पर सहमत करने की है। भारत को उपकार नहीं, अधिकार चाहिए

सुरेश गांधी

दुनिया की सबसे बड़ी आबादी, सबसे बड़े लोकतंत्र और तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था वाले भारत को अब वैश्विक सत्ता के गलियारों में केवल मौजूदगी का प्रमाणपत्र नहीं चाहिए। उसे फैसले लेने का अधिकार चाहिए। सम्मान चाहिए तो बराबरी का, जिम्मेदारी चाहिए तो अधिकारों के साथ। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में वीटो के बिना स्थायी सदस्यता के प्रस्ताव पर भारत का ताजा दोटूक रुख इसी बदलते आत्मविश्वास का संकेत है। संदेश साफ है- भारत अब ऐसी व्यवस्था का हिस्सा बनने को तैयार नहीं, जहां नाम तो स्थायी सदस्य का हो, लेकिन फैसलों की चाबी पांच पुराने ताकतवर देशों के हाथों में ही रहे। मोदी सरकार के दौर में भारत की यह मुखरता उस वैश्विक व्यवस्था को सीधी चुनौती है, जो 1945 की शक्ति-संरचना को 2026 की दुनिया पर थोपे रखना चाहती है। 26 अक्टूबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत परवथनेनी हरीश ने स्पष्ट कर दिया कि जब तक वीटो का अधिकार मौजूद है, तब तक नए स्थायी सदस्यों को इससे वंचित रखना स्वीकार्य नहीं हो सकता। स्थायी सदस्यों की दो श्रेणियां बनाना सुधार नहीं, बल्कि असमानता को संस्थागत रूप देना होगा। भारत ने यह भी कहा कि सुरक्षा परिषद को आज की वैश्विक वास्तविकताओं का प्रतिनिधित्व करना चाहिए, न कि आठ दशक पुरानी व्यवस्था का। यह बयान महज कूटनीतिक औपचारिकता नहीं है। इसके पीछे भारत का वह अनुभव है, जिसमें कई बार राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण मामलों पर उसकी आवाज को दूसरे देशों के रणनीतिक हितों ने दबाने की कोशिश की। सवाल इसलिए भी बड़ा है कि क्या भारत केवल उस मेज पर बैठने के लिए तैयार हो जाए, जहां निर्णय लेने का वास्तविक अधिकार किसी और के पास हो?

पांच देशों की चौधराहट, बाकी दुनिया केवल दर्शक!

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्य अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस हैं। इन पांचों के पास वीटो का विशेषाधिकार है। किसी महत्वपूर्ण प्रस्ताव पर इनमें से एक भी देश नकारात्मक मत दे दे तो प्रस्ताव रुक सकता है। परिषद के दस अस्थायी सदस्य दो वर्षों के लिए चुने जाते हैं और उनके पास वीटो का अधिकार नहीं होता। यानी दुनिया के तमाम देशों के बीच पांच देशों को ऐसा विशेषाधिकार मिला है, जिसके सामने बहुमत की राय भी कई बार बेअसर हो जाती है। भारत की आपत्ति इसी असमानता पर है। यदि स्थायी सदस्यता का अर्थ केवल लंबे समय तक परिषद में बैठे रहना है, लेकिन निर्णायक फैसलों में कोई समान अधिकार नहीं है, तो फिर ऐसी सदस्यता की उपयोगिता क्या होगी? क्या यह भारत जैसे देश को केवल प्रतीकात्मक सम्मान देकर वास्तविक शक्ति से दूर रखने की कोशिश नहीं होगी? भारत का तर्क है कि या तो वीटो व्यवस्था समाप्त हो या फिर जब तक यह व्यवस्था कायम है, नए स्थायी सदस्यों को भी समान अधिकार मिले। आधी ताकत देकर बराबरी का दावा करना कूटनीतिक छलावा होगा।

मसूद अजहर प्रकरण : चीन के वीटो ने दिखाया असली चेहरा

भारत के इस रुख को समझने के लिए मसूद अजहर प्रकरण से बेहतर उदाहरण शायद ही मिले। पठानकोट से पुलवामा तक आतंकी हमलों के बाद जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित कराने के लिए भारत ने संयुक्त राष्ट्र में लगातार प्रयास किए। लेकिन चीन ने अपने प्रभाव और तकनीकी रोक का इस्तेमाल करते हुए कई बार इस प्रक्रिया को बाधित किया। 2016, 2017 और 2019 में चीन की आपत्तियों ने भारत की कोशिशों को झटका दिया। आखिरकार मई 2019 में चीन ने अपना विरोध वापस लिया और मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र की प्रतिबंध सूची में शामिल किया गया। यह प्रकरण केवल एक आतंकी की घोषणा तक सीमित नहीं था। इसने दुनिया को दिखाया कि आतंकवाद से पीड़ित देश की चिंता भी किसी दूसरे देश के रणनीतिक हितों के सामने किस तरह अटक सकती है। भारत के लिए यह एक कूटनीतिक सबक था। अगर सुरक्षा परिषद में मौजूदगी के बावजूद भारत के पास निर्णायक अधिकार नहीं होगा, तो भविष्य में भी कोई दूसरा देश अपने राजनीतिक हितों के लिए भारत के महत्वपूर्ण प्रस्तावों को रोक सकता है। ऐसे में बिना वीटो वाली स्थायी सदस्यता स्वीकार करना क्या भारत के लिए अपने ही हाथ बांधने जैसा नहीं होगा?

2004 में बात उठी, 2005 में 15 साल की रियायत क्यों?

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे असहज सवाल पिछली सरकारों की विदेश नीति से जुड़ा है। यह कहना गलत होगा कि मनमोहन सिंह सरकार ने वीटो के बिना स्थायी सदस्यता का विरोध कभी नहीं किया। 21 दिसंबर 2004 को तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने राज्यसभा में साफ कहा था कि स्थायी सदस्यों के अधिकारों में भेदभाव नहीं होना चाहिए। यदि पांचों के पास वीटो है तो नए स्थायी सदस्यों को भी समान अधिकार मिलने चाहिए। लेकिन इसके बाद 2005 में जो हुआ, वह आज समीक्षा की मांग करता है। भारत, जापान, जर्मनी और ब्राजील के जी-4 गठबंधन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के विस्तार के लिए प्रस्ताव पेश किया। इस प्रस्ताव में छह नए स्थायी और चार नए अस्थायी सदस्य जोड़कर परिषद का आकार 15 से बढ़ाकर 25 करने की बात थी। मगर नए स्थायी सदस्यों के वीटो अधिकार का फैसला तत्काल करने के बजाय 15 वर्ष बाद समीक्षा के लिए छोड़ने की व्यवस्था रखी गई। व्यावहारिक रूप से नए स्थायी सदस्य शुरुआती 15 वर्षों तक वीटो का इस्तेमाल नहीं कर पाते। यहीं सवाल उठता है कि जब भारत की नीति समान अधिकारों की थी तो फिर ऐसी रियायत देने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या स्थायी सदस्यता पाने की जल्दबाजी में भारत अपनी मूल मांग को पीछे रखने के लिए तैयार हो गया था? क्या दुनिया की महाशक्तियों के विरोध के सामने भारत को अपनी शर्तों में लचीलापन दिखाना पड़ा? तत्कालीन विदेश मंत्री के संसदीय वक्तव्य में इस समझौते का तर्क यह दिया गया था कि यदि वीटो का मुद्दा संयुक्त राष्ट्र सुधार में बाधा बन रहा है तो उसे 15 वर्षों के लिए अलग रखा जाए। यानी सरकार इसे सुधार की राह खोलने वाला व्यावहारिक समझौता मान रही थी। लेकिन इतिहास का दूसरा पक्ष यह भी है कि न तो भारत को स्थायी सदस्यता मिली और न ही सुरक्षा परिषद में कोई निर्णायक सुधार हो सका। दशकों की पैरवी, बैठकों, प्रस्तावों और कूटनीतिक कोशिशों के बाद भी भारत आज उसी प्रतीक्षा में है। सवाल यह नहीं कि पिछली सरकारों ने प्रयास नहीं किए। सवाल यह है कि उन प्रयासों का परिणाम क्या निकला और क्या भारत की मूल मांग को पर्याप्त दृढ़ता से आगे बढ़ाया गया?

मोदी युग में बदली भाषा, अब अधिकारों पर आर-पार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की विदेश नीति में राष्ट्रीय हितों और रणनीतिक स्वायत्तता पर जोर लगातार दिखाई देता है। रूस से संबंध हों, अमेरिका के साथ साझेदारी हो, चीन के साथ सीमा विवाद हो या वैश्विक मंचों पर भारत की भूमिका- भारत ने अपने हितों के अनुरूप स्वतंत्र निर्णय लेने की नीति अपनाई है। संयुक्त राष्ट्र में अक्टूबर 2026 का वक्तव्य भी इसी व्यापक कूटनीतिक दृष्टिकोण का हिस्सा है। भारत ने केवल सदस्यता की मांग नहीं दोहराई, बल्कि यह भी स्पष्ट किया कि स्थायी सदस्यता के नाम पर अधिकारों की दो श्रेणियां स्वीकार नहीं होंगी। हालांकि इस बात को भी समझना होगा कि यह सिद्धांत भारत की पुरानी विदेश नीति का हिस्सा रहा है। मनमोहन सिंह सरकार ने भी समान वीटो अधिकार की मांग की थी। इसलिए इस मांग का आविष्कार किसी एक प्रधानमंत्री के कार्यकाल में हुआ, ऐसा कहना इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा। अंतर यह है कि आज भारत इस असमानता को अधिक मुखरता से वैश्विक बहस के केंद्र में रख रहा है. लेकिन मोदी सरकार के सामने भी चुनौती कम नहीं है। दुनिया को केवल दोटूक संदेश देना पर्याप्त नहीं होगा। भारत को उन देशों का मजबूत गठबंधन बनाना होगा, जो सुरक्षा परिषद के वास्तविक लोकतंत्रीकरण के पक्षधर हैं। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका की आवाज को साथ लेकर इस मुद्दे को ठोस अंतरराष्ट्रीय दबाव में बदलना होगा।

चीन की सहमति के बिना कैसे बदलेगी व्यवस्था?

भारत की मांग के सामने सबसे बड़ी व्यावहारिक बाधा संयुक्त राष्ट्र का अपना चार्टर है। सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यों की संख्या और अधिकारों में बदलाव के लिए चार्टर संशोधन आवश्यक है। संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 108 के अनुसार संशोधन के लिए महासभा के दो-तिहाई सदस्यों का समर्थन और सभी पांच स्थायी सदस्यों सहित दो-तिहाई सदस्य देशों की संवैधानिक प्रक्रिया के तहत पुष्टि जरूरी है। अर्थात चीन सहित मौजूदा पांचों स्थायी शक्तियों की सहमति के बिना यह बदलाव संभव नहीं है। यही वजह है कि भारत की लड़ाई केवल सदस्यता पाने की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था को बदलने की है जिसमें बदलाव का अंतिम रास्ता भी उन्हीं पांच देशों की सहमति से होकर गुजरता है। यहां भारत की कूटनीति की असली परीक्षा होगी। क्या वह चीन के विरोध के बावजूद व्यापक वैश्विक समर्थन जुटा सकेगा? क्या अमेरिका, रूस, फ्रांस और ब्रिटेन को समान अधिकारों की अनिवार्यता पर सहमत कर पाएगा? और क्या विकासशील देशों को यह भरोसा दिला पाएगा कि सुरक्षा परिषद का विस्तार केवल कुछ नए शक्तिशाली देशों को कुर्सी देने का अभियान नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के प्रतिनिधित्व को मजबूत करने की पहल है?

भारत को कृपा नहीं, अधिकार चाहिए!

भारत आज अंतरिक्ष विज्ञान से लेकर डिजिटल तकनीक, रक्षा उत्पादन, वैश्विक व्यापार और अंतरराष्ट्रीय शांति अभियानों तक अपनी भूमिका मजबूत कर चुका है। वह दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। उसकी आवाज को नजरअंदाज करना अब आसान नहीं। फिर भी वैश्विक फैसलों की सबसे महत्वपूर्ण संस्था में उसकी स्थायी भागीदारी नहीं है। यह विरोधाभास जितना बड़ा है, उतना ही बड़ा सवाल भी। भारत को किसी की कृपा से मिली कुर्सी नहीं चाहिए। उसे ऐसा अधिकार चाहिए, जो उसकी वैश्विक भूमिका और जिम्मेदारी के अनुरूप हो। मसूद अजहर प्रकरण ने बता दिया कि केवल परिषद में बैठना पर्याप्त नहीं, निर्णय प्रक्रिया में प्रभावी भूमिका भी जरूरी है। पुरानी सरकारों से सवाल पूछना भी इसलिए जरूरी है कि उन्होंने जिस समानता की बात की, उसे हासिल करने के लिए 2005 में 15 वर्षों की रियायत क्यों दी? और आज की सरकार से सवाल यह है कि मुखरता को वास्तविक उपलब्धि में बदलने की रणनीति क्या होगी? इतिहास केवल बयानों से नहीं बनता, परिणामों से बनता है। भारत को अब इस बहस को कूटनीतिक वक्तव्यों से आगे ले जाकर वैश्विक शक्ति-संतुलन में वास्तविक बदलाव तक पहुंचाना होगा। दुनिया को यह समझना होगा कि भारत किसी की कठपुतली नहीं, अपनी शर्तों पर चलने वाला संप्रभु राष्ट्र है। उसे सुरक्षा परिषद में केवल एक स्थायी कुर्सी नहीं चाहिए, बल्कि उस कुर्सी पर बैठकर दुनिया के फैसलों में बराबरी से बोलने और जरूरत पड़ने पर उन्हें रोकने का अधिकार भी चाहिए। भारत अब वैश्विक व्यवस्था का दर्शक नहीं, उसके निर्णायक मंच पर बराबरी का भागीदार बनना चाहता है।

मिग से सुखोई तक महारत, अब वायुसेना के उप प्रमुख होंगे इंद्रपाल सिंह वालिया

मिग से सुखोई तक महारत , अब वायुसेना के उप प्रमुख होंगे इंद्रपाल सिंह वालिया  चार दशक का सैन्य अनुभव , पांच प्रमुख लड़ाकू...