Wednesday, 4 February 2026

विचारों का वैश्विक महाकुंभ : बीएलएफ की सफलता में शिक्षा, संस्कृति और नेतृत्व का स्वर्णिम समागम

काशी की सांस्कृतिक धारा में साहित्य और शिक्षा का नवजागरण

विचारों का वैश्विक महाकुंभ : बीएलएफ की सफलता में शिक्षा, संस्कृति और नेतृत्व का स्वर्णिम समागम 

काशी की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपरा के बीच आयोजित बनारस लिटरेचर फेस्टिवल ने इस बार साहित्य, शिक्षा और युवा चेतना का ऐसा संगम प्रस्तुत किया, जिसने शहर को राष्ट्रीय बौद्धिक संवाद के केंद्र के रूप में नई पहचान दिलाई। इस आयोजन की सफलता में सनबीम ग्रुप ऑफ एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस की सक्रिय भागीदारी और इसके चेयरमैन डॉ. दीपक मधोक की दूरदर्शी सोच महत्वपूर्ण रही। वरिष्ठ पत्रकार सुरेश गांधी से विशेष बातचीत में डॉ. मधोक ने स्पष्ट किया कि शिक्षा केवल पाठ्यक्रम तक सीमित न रहकर संस्कृति, संवेदना और व्यक्तित्व विकास से जुड़नी चाहिए। उन्होंने बताया कि फेस्टिवल में विद्यार्थियों और स्वयंसेवकों की व्यापक भागीदारी ने युवाओं में नेतृत्व क्षमता और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना को मजबूत किया। कार्यक्रम में बॉलीवुड अभिनेता अनुपम खेर, सांसद एवं भोजपुरी गायक मनोज तिवारी, तथा पद्मश्री मालिनी अवस्थी जैसी विभूतियों की उपस्थिति ने आयोजन को सांस्कृतिक और वैचारिक रूप से समृद्ध बनाया। डॉ. मधोक ने प्रशासनिक सेवा से शिक्षा क्षेत्र में आने के अपने निर्णय को समाज में स्थायी परिवर्तन की दिशा बताया। उन्होंने भविष्य की शिक्षा को तकनीक, नवाचार और सांस्कृतिक मूल्यों के संतुलन पर आधारित बताया। यह साक्षात्कार शिक्षा, साहित्य और युवा शक्ति के माध्यम से समाज निर्माण की संभावनाओं को रेखांकित करता है। प्रस्तुत है बातचीत के कुछ प्रमुख अंश :-

सुरेश गांधी

गंगा की पावन धारा, घाटों की आध्यात्मिक आभा और शताब्दियों पुरानी विद्वता की परंपरा से समृद्ध काशी केवल धार्मिक नगरी ही नहीं, बल्कि ज्ञान और विचारों की वैश्विक राजधानी भी रही है। इसी सांस्कृतिक विरासत को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में साकार करते हुए आयोजित बनारस लिटरेचर फेस्टिवल ने इस बार साहित्य, संस्कृति और शिक्षा के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक अध्याय रचा। इस आयोजन की सफलता में जहां देश-विदेश के साहित्यकारों, कलाकारों और विद्वानों की भागीदारी रही, वहीं सनबीम ग्रुप ऑफ एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस की सक्रिय सहभागिता और इसके चेयरमैन डॉ. दीपक मधोक की दूरदर्शी सोच ने इसे नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बनारस लिटरेचर फेस्टिवल की सफलता, युवा पीढ़ी की भागीदारी, शिक्षा के बदलते स्वरूप और सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण जैसे मुद्दों पर प्रस्तुत है डॉ. दीपक मधोक से वरिष्ठ पत्रकार सुरेश गांधी की विस्तृत बातचीत के कुछ अंश :-

सुरेश गांधी : काशी सदियों से ज्ञान और संस्कृति की राजधानी रही है। हाल ही में आयोजित बनारस लिटरेचर फेस्टिवल को लेकर देश-विदेश में काफी चर्चा रही। आप इस आयोजन की सफलता को किस रूप में देखते हैं?

डॉ. दीपक मधोक : बनारस लिटरेचर फेस्टिवल वास्तव में काशी की सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत का आधुनिक स्वरूप है। यह केवल एक साहित्यिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि विचारों का महाकुंभ है। इस आयोजन ने यह सिद्ध किया कि काशी आज भी ज्ञान, संवाद और सांस्कृतिक चेतना की वैश्विक भूमि है। देश और विदेश के साहित्यकारों, कलाकारों, शिक्षाविदों और नीति-निर्माताओं का एक मंच पर आना अपने आप में इस आयोजन की सफलता का प्रमाण है। यह फेस्टिवल साहित्य के साथ-साथ समाज और शिक्षा के भविष्य पर भी गहन विमर्श का माध्यम बना।

सुरेश गांधी : सनबीम ग्रुप की इस फेस्टिवल में भागीदारी काफी व्यापक रही। इसकी शुरुआत कैसे हुई?

डॉ. मधोक : सनबीम का मूल उद्देश्य हमेशा समग्र शिक्षा देना रहा है। जब हमें इस फेस्टिवल से जुड़ने का अवसर मिला तो हमने इसे केवल सहभागिता नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के व्यक्तित्व निर्माण का मंच माना। हमारी सोच थी कि विद्यार्थी केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित न रहें, बल्कि उन्हें वैश्विक विचारों और सांस्कृतिक संवादों से जोड़ा जाए। इसी उद्देश्य से हमने विद्यार्थियों, शिक्षकों और स्वयंसेवकों को बड़े स्तर पर इसमें शामिल किया।

सुरेश गांधी : लगभग 270 विद्यार्थियों की भागीदारी को बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। विद्यार्थियों पर इसका क्या प्रभाव पड़ा?

डॉ. मधोक : यह अनुभव विद्यार्थियों के लिए अत्यंत प्रेरणादायी और परिवर्तनकारी रहा। उन्होंने केवल व्याख्यान नहीं सुने, बल्कि देश-विदेश के प्रसिद्ध लेखकों, कलाकारों और विचारकों से सीधे संवाद किया। ऐसे संवाद विद्यार्थियों की सोच को व्यापक बनाते हैं। उनमें आत्मविश्वास बढ़ता है और वे अपने जीवन के लक्ष्य को अधिक स्पष्ट रूप से समझ पाते हैं। साहित्य विद्यार्थियों को संवेदनशील बनाता है और समाज के प्रति जिम्मेदारी का भाव विकसित करता है।

सुरेश गांधी : फेस्टिवल में 175 छात्र स्वयंसेवकों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आप इसे शिक्षा के दृष्टिकोण से कितना महत्वपूर्ण मानते हैं?

डॉ. मधोक : स्वयंसेवा शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। जब विद्यार्थी किसी बड़े आयोजन की जिम्मेदारी निभाते हैं, तो वे नेतृत्व, अनुशासन और टीमवर्क सीखते हैं। सनबीम के विद्यार्थियों ने जिस समर्पण के साथ कार्यक्रमों का संचालन किया, वह अत्यंत सराहनीय है। यह अनुभव उन्हें जीवन की व्यावहारिक चुनौतियों के लिए तैयार करता है।

सुरेश गांधी : इस आयोजन में सनबीम द्वारा संचालित लाइव पॉडकास्ट स्टूडियो भी चर्चा में रहे। इस पहल का उद्देश्य क्या था?

डॉ. मधोक : आज का युग डिजिटल संवाद का युग है। हमने महसूस किया कि विद्यार्थियों को आधुनिक मीडिया तकनीकों का व्यावहारिक अनुभव मिलना चाहिए। पॉडकास्ट स्टूडियो के माध्यम से विद्यार्थियों ने संवाद, प्रस्तुति और तकनीकी संचालन की कला सीखी। यह पहल उन्हें भविष्य की संभावनाओं के लिए तैयार करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

सुरेश गांधी : बनारस लिटरेचर फेस्टिवल में अनुपम खेर, सांसद मनोज तिवारी और पद्मश्री मालिनी अवस्थी जैसी विभूतियों की उपस्थिति को आप किस रूप में देखते हैं?

डॉ. मधोक : इन महान हस्तियों की उपस्थिति ने इस आयोजन को विशेष गरिमा प्रदान की। अनुपम खेर ने अपने जीवन अनुभवों और संघर्षों के माध्यम से युवाओं को प्रेरित किया। उनका संदेश था कि आत्मविश्वास और निरंतर प्रयास ही सफलता की कुंजी है। मनोज तिवारी ने भोजपुरी भाषा और लोकसंस्कृति के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि भारतीय भाषाएं हमारी सांस्कृतिक पहचान का आधार हैं। मालिनी अवस्थी ने भारतीय लोकसंगीत और परंपराओं को संरक्षित करने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। उनकी प्रस्तुति और विचारों ने विद्यार्थियों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने की प्रेरणा दी।

सुरेश गांधी : अस्सी घाट से फेस्टिवल की शुरुआत हुई, जिसे काशी की आत्मा कहा जाता है। उस अनुभव को आप कैसे देखते हैं?

डॉ. मधोक : अस्सी घाट पर उद्घाटन समारोह वास्तव में आध्यात्मिक और सांस्कृतिक अनुभव था। गंगा तट पर साहित्य और संस्कृति का संगम विद्यार्थियों और प्रतिभागियों के लिए अविस्मरणीय रहा। यह अनुभव बताता है कि भारतीय सभ्यता में ज्ञान और संस्कृति एक-दूसरे के पूरक रहे हैं।

सुरेश गांधी : सनबीम स्कूल वरुणा में आयोजित अमित टंडन शो को लेकर भी युवाओं में उत्साह देखा गया। साहित्य और मनोरंजन के इस संतुलन को आप कैसे देखते हैं?

डॉ. मधोक : साहित्य केवल गंभीर विमर्श तक सीमित नहीं है। हास्य और कला भी समाज को जोड़ने का प्रभावशाली माध्यम हैं। अमित टंडन जैसे कलाकार सामाजिक विषयों को सहज और मनोरंजक तरीके से प्रस्तुत करते हैं, जिससे युवा आसानी से जुड़ते हैं। यह संतुलन साहित्य को अधिक लोकप्रिय बनाता है।

सुरेश गांधी : आपने प्रशासनिक सेवा छोड़कर शिक्षा क्षेत्र को अपना जीवन समर्पित किया। इस निर्णय के पीछे क्या सोच रही?

डॉ. मधोक : प्रशासनिक सेवा में कार्य करते हुए मैंने महसूस किया कि समाज में स्थायी परिवर्तन शिक्षा के माध्यम से ही संभव है। प्रशासन व्यवस्था सुधार सकता है, लेकिन शिक्षा समाज की सोच को बदल सकती है। इसी विचार से मैंने शिक्षा क्षेत्र में आने का निर्णय लिया। मेरा लक्ष्य था कि पूर्वांचल में गुणवत्तापूर्ण और आधुनिक शिक्षा उपलब्ध कराई जाए।

सुरेश गांधी : आज सनबीम ग्रुप सात स्वयं के विद्यालयों, सत्रह संबद्ध विद्यालयों और महिला कॉलेजों के नेटवर्क का संचालन कर रहा है। इस यात्रा को आप कैसे देखते हैं?

डॉ. मधोक : यह यात्रा संघर्ष, सीख और नवाचार से भरी रही है। हमने हमेशा शिक्षा को मूल्य और आधुनिकता के साथ जोड़ने का प्रयास किया है। हमारा उद्देश्य केवल विद्यालय खोलना नहीं, बल्कि ऐसे शैक्षिक संस्थान विकसित करना है, जहां विद्यार्थी ज्ञान के साथ संस्कार और नेतृत्व क्षमता भी विकसित कर सकें।

सुरेश गांधी : आपको राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई सम्मान मिले हैं, जिनमें नेशनल लीडरशिप अवार्ड भी शामिल है। इन सम्मानों को आप कैसे देखते हैं?

डॉ. मधोक : ये सम्मान मेरे लिए व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं हैं। यह पूरी टीम और विद्यार्थियों के प्रयासों की पहचान है। ऐसे सम्मान हमें और बेहतर कार्य करने की प्रेरणा देते हैं।

सुरेश गांधी : वर्तमान समय में शिक्षा तेजी से बदल रही है। आप भविष्य की शिक्षा को किस दिशा में जाते हुए देखते हैं?

डॉ. मधोक : भविष्य की शिक्षा बहुआयामी होगी। इसमें तकनीक, अनुभवात्मक अधिगम और वैश्विक दृष्टिकोण का विशेष महत्व होगा। केवल सैद्धांतिक ज्ञान पर्याप्त नहीं रहेगा। विद्यार्थियों को व्यावहारिक अनुभव और सामाजिक समझ विकसित करनी होगी। शिक्षा को जीवन से जोड़ना ही भविष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

सुरेश गांधी : बनारस लिटरेचर फेस्टिवल जैसे आयोजनों का विद्यार्थियों के व्यक्तित्व विकास में कितना महत्व है?

डॉ. मधोक : ऐसे आयोजन विद्यार्थियों को वास्तविक जीवन के अनुभव प्रदान करते हैं। जब विद्यार्थी विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों से मिलते हैं, तो उनका दृष्टिकोण व्यापक होता है। वे समाज और संस्कृति को बेहतर समझते हैं। यह अनुभव उन्हें आत्मनिर्भर और जागरूक नागरिक बनने में मदद करता है।

सुरेश गांधी : शिक्षा और साहित्य के बीच संबंध को आप किस रूप में देखते हैं?

डॉ. मधोक : साहित्य समाज की आत्मा है और शिक्षा उसका मार्गदर्शन। साहित्य हमें संवेदनशील बनाता है, जबकि शिक्षा हमें सक्षम बनाती है। जब ये दोनों साथ चलते हैं, तब समाज में सकारात्मक परिवर्तन संभव होता है।

सुरेश गांधी : युवा पीढ़ी के लिए आपका क्या संदेश है?

डॉ. मधोक : युवाओं से मेरा केवल इतना कहना है कि वे सीखने की जिज्ञासा को कभी समाप्त न होने दें। साहित्य पढ़ें, संस्कृति से जुड़ें और समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाएं। यदि युवा ज्ञान और संवेदनशीलता को अपनाते हैं, तो वे देश और समाज को नई दिशा दे सकते हैं।

सुरेश गांधी : अंत में, आप बनारस लिटरेचर फेस्टिवल को किस रूप में याद करेंगे?

डॉ. मधोक : यह आयोजन मेरे लिए एक सांस्कृतिक और शैक्षिक आंदोलन के रूप में याद रहेगा। इसने यह सिद्ध किया कि जब साहित्य, शिक्षा और युवा शक्ति एक साथ आते हैं, तो समाज में सकारात्मक परिवर्तन संभव होता है। काशी की सांस्कृतिक धारा और युवाओं की ऊर्जा का यह संगम भविष्य के लिए प्रेरणा बनेगा।

सुरेश गांधी : आपका बहुत-बहुत धन्यवाद डॉ. मधोक। आपने शिक्षा, साहित्य और युवा शक्ति के महत्व को जिस विस्तार से समझाया, वह निश्चित रूप से पाठकों के लिए प्रेरणादायी रहेगा।

डॉ. दीपक मधोक : धन्यवाद। मेरा विश्वास है कि शिक्षा और साहित्य के माध्यम से हम समाज को बेहतर दिशा दे सकते हैं।  

शिक्षा, संस्कृति और युवा शक्ति का नया युग

बनारस लिटरेचर फेस्टिवल केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि विचारों और संस्कृति का ऐसा संगम बनकर सामने आया, जिसने शिक्षा के नए आयाम प्रस्तुत किए। डॉ. दीपक मधोक के नेतृत्व में सनबीम संस्थानों की सहभागिता इस बात का प्रमाण है कि जब शिक्षा को संस्कृति और अनुभव से जोड़ा जाता है, तब वह समाज में सकारात्मक परिवर्तन का माध्यम बनती है। काशी की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक धारा में प्रवाहित यह साहित्यिक महोत्सव आने वाले समय में शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में नई संभावनाओं का मार्ग प्रशस्त करता दिखाई देता है।

युवा ऊर्जा, साहित्य और संस्कृति का अद्भुत महाकुंभ

काशी की सांस्कृतिक धारा में साहित्य और शिक्षा का नवजागरण

युवा ऊर्जा, साहित्य और संस्कृति का अद्भुत महाकुंभ 

काशी की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपरा के बीच आयोजित बनारस लिटरेचर फेस्टिवल ने इस बार साहित्य, शिक्षा और युवा चेतना का ऐसा संगम प्रस्तुत किया, जिसने शहर को राष्ट्रीय बौद्धिक संवाद के केंद्र के रूप में नई पहचान दिलाई। इस आयोजन की सफलता में सनबीम ग्रुप ऑफ एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस की सक्रिय भागीदारी और इसके चेयरमैन डॉ. दीपक मधोक की दूरदर्शी सोच महत्वपूर्ण रही। वरिष्ठ पत्रकार सुरेश गांधी से विशेष बातचीत में डॉ. मधोक ने स्पष्ट किया कि शिक्षा केवल पाठ्यक्रम तक सीमित न रहकर संस्कृति, संवेदना और व्यक्तित्व विकास से जुड़नी चाहिए। उन्होंने बताया कि फेस्टिवल में विद्यार्थियों और स्वयंसेवकों की व्यापक भागीदारी ने युवाओं में नेतृत्व क्षमता और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना को मजबूत किया। कार्यक्रम में बॉलीवुड अभिनेता अनुपम खेर, सांसद एवं भोजपुरी गायक मनोज तिवारी, तथा पद्मश्री मालिनी अवस्थी जैसी विभूतियों की उपस्थिति ने आयोजन को सांस्कृतिक और वैचारिक रूप से समृद्ध बनाया। डॉ. मधोक ने प्रशासनिक सेवा से शिक्षा क्षेत्र में आने के अपने निर्णय को समाज में स्थायी परिवर्तन की दिशा बताया। उन्होंने भविष्य की शिक्षा को तकनीक, नवाचार और सांस्कृतिक मूल्यों के संतुलन पर आधारित बताया। यह साक्षात्कार शिक्षा, साहित्य और युवा शक्ति के माध्यम से समाज निर्माण की संभावनाओं को रेखांकित करता है। प्रस्तुत है बातचीत के कुछ प्रमुख अंश :-

सुरेश गांधी  

गंगा की पावन धारा, घाटों की आध्यात्मिक आभा और शताब्दियों पुरानी विद्वता की परंपरा से समृद्ध काशी केवल धार्मिक नगरी ही नहीं, बल्कि ज्ञान और विचारों की वैश्विक राजधानी भी रही है। इसी सांस्कृतिक विरासत को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में साकार करते हुए आयोजित बनारस लिटरेचर फेस्टिवल ने इस बार साहित्य, संस्कृति और शिक्षा के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक अध्याय रचा। इस आयोजन की सफलता में जहां देश-विदेश के साहित्यकारों, कलाकारों और विद्वानों की भागीदारी रही, वहीं सनबीम ग्रुप ऑफ एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस की सक्रिय सहभागिता और इसके चेयरमैन डॉ. दीपक मधोक की दूरदर्शी सोच ने इसे नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बनारस लिटरेचर फेस्टिवल की सफलता, युवा पीढ़ी की भागीदारी, शिक्षा के बदलते स्वरूप और सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण जैसे मुद्दों पर प्रस्तुत है डॉ. दीपक मधोक से वरिष्ठ पत्रकार सुरेश गांधी की विस्तृत बातचीत के कुछ अंश :-

सुरेश गांधी : काशी की सांस्कृतिक पहचान सदियों पुरानी है। ऐसे में बनारस लिटरेचर फेस्टिवल को आप किस दृष्टि से देखते हैं?

डॉ. दीपक मधोक : काशी केवल एक शहर नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा का जीवंत प्रतीक है। यहां सदियों से दर्शन, साहित्य और आध्यात्मिक चिंतन का प्रवाह रहा है। बनारस लिटरेचर फेस्टिवल इसी विरासत का आधुनिक स्वरूप है। यह आयोजन साहित्य को केवल पुस्तक या मंच तक सीमित नहीं रखता, बल्कि इसे समाज, संस्कृति और शिक्षा से जोड़ता है। इस फेस्टिवल ने यह सिद्ध किया कि काशी आज भी वैश्विक बौद्धिक संवाद का केंद्र बनने की क्षमता रखती है।

सुरेश गांधी : इस आयोजन की सफलता को आप किन प्रमुख कारणों से जोड़ते हैं?

डॉ. मधोक : इसकी सफलता का सबसे बड़ा कारण इसकी व्यापकता और विविधता रही। इसमें साहित्य, संस्कृति, शिक्षा, कला और समाज के विभिन्न पहलुओं पर संवाद हुआ। देश-विदेश के प्रतिष्ठित साहित्यकारों, कलाकारों और शिक्षाविदों की सहभागिता ने इसे वैश्विक पहचान दी। इसके साथ ही युवाओं की बड़ी भागीदारी ने इस आयोजन को जीवंत और ऊर्जा से भरपूर बना दिया।

सुरेश गांधी : सनबीम ग्रुप की भागीदारी इस आयोजन में काफी प्रभावशाली रही। इसकी प्रेरणा क्या रही?

डॉ. मधोक : सनबीम का उद्देश्य हमेशा शिक्षा को समग्र बनाना रहा है। हमारा मानना है कि शिक्षा केवल परीक्षा और पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं होनी चाहिए। जब हमें इस फेस्टिवल से जुड़ने का अवसर मिला तो हमने इसे विद्यार्थियों के व्यक्तित्व विकास और सांस्कृतिक जागरूकता के मंच के रूप में देखा। हमने यह सुनिश्चित किया कि विद्यार्थी केवल दर्शक न रहें, बल्कि सक्रिय भागीदारी करें।

सुरेश गांधी : लगभग 270 विद्यार्थियों की सहभागिता को कैसे देखते हैं?

डॉ. मधोक : यह हमारे लिए गर्व का विषय है। विद्यार्थियों ने विभिन्न साहित्यिक और वैचारिक सत्रों में भाग लेकर अपनी अभिव्यक्ति क्षमता का शानदार प्रदर्शन किया। जब युवा पीढ़ी साहित्य और विचारों से जुड़ती है तो समाज में सकारात्मक परिवर्तन की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। इस अनुभव ने विद्यार्थियों के आत्मविश्वास और नेतृत्व क्षमता को मजबूत किया।

सुरेश गांधी : इस आयोजन में 175 छात्र स्वयंसेवकों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसे आप शिक्षा के संदर्भ में कैसे देखते हैं?

डॉ. मधोक : स्वयंसेवा शिक्षा का सबसे प्रभावशाली माध्यम है। जब विद्यार्थी किसी बड़े आयोजन की जिम्मेदारी निभाते हैं तो वे नेतृत्व, अनुशासन और सामूहिक कार्य की भावना सीखते हैं। यह अनुभव उन्हें जीवन की वास्तविक चुनौतियों के लिए तैयार करता है। सनबीम के विद्यार्थियों ने जिस समर्पण और दक्षता के साथ अपनी जिम्मेदारियां निभाईं, वह अत्यंत सराहनीय है।

सुरेश गांधी : इस फेस्टिवल में अनुपम खेर, सांसद मनोज तिवारी और पद्मश्री मालिनी अवस्थी जैसी हस्तियों की उपस्थिति को आप किस रूप में देखते हैं?

डॉ. मधोक : इन विभूतियों की उपस्थिति इस आयोजन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक रही। अनुपम खेर ने अपने संघर्ष और अनुभवों के माध्यम से युवाओं को प्रेरित किया। उन्होंने बताया कि सफलता का आधार आत्मविश्वास और निरंतर प्रयास है। मनोज तिवारी ने भोजपुरी भाषा और लोकसंस्कृति के महत्व पर अपने विचार रखे। उन्होंने यह संदेश दिया कि भारतीय भाषाएं और लोक परंपराएं हमारी सांस्कृतिक पहचान का मूल आधार हैं। मालिनी अवस्थी ने भारतीय लोकसंगीत और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया। उनकी प्रस्तुति ने विद्यार्थियों को अपनी जड़ों से जुड़ने की प्रेरणा दी। इन सभी हस्तियों की उपस्थिति ने इस आयोजन को सांस्कृतिक और वैचारिक रूप से समृद्ध बनाया।

सुरेश गांधी : अस्सी घाट से इस फेस्टिवल की शुरुआत हुई। उस अनुभव को आप कैसे देखते हैं?

डॉ. मधोक : अस्सी घाट काशी की आत्मा है। वहां उद्घाटन समारोह का आयोजन अत्यंत आध्यात्मिक और प्रेरणादायी अनुभव था। गंगा के तट पर साहित्य और संस्कृति का संगम भारतीय सभ्यता की उस परंपरा को दर्शाता है, जहां ज्ञान और आध्यात्मिकता एक-दूसरे के पूरक रहे हैं।

सुरेश गांधी : सनबीम द्वारा संचालित लाइव पॉडकास्ट स्टूडियो भी चर्चा में रहे। इस पहल का महत्व क्या है?

डॉ. मधोक : आज का समय डिजिटल संवाद का है। हमने महसूस किया कि विद्यार्थियों को आधुनिक मीडिया तकनीकों से जोड़ना आवश्यक है। पॉडकास्ट स्टूडियो के माध्यम से विद्यार्थियों ने संवाद, प्रस्तुति और तकनीकी संचालन का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया। यह पहल उन्हें भविष्य के लिए तैयार करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

सुरेश गांधी : आपने प्रशासनिक सेवा छोड़कर शिक्षा क्षेत्र को चुना। इस निर्णय के पीछे क्या सोच रही?

डॉ. मधोक : प्रशासनिक सेवा में कार्य करते हुए मैंने महसूस किया कि समाज में स्थायी परिवर्तन शिक्षा के माध्यम से ही संभव है। प्रशासन व्यवस्था सुधार सकता है, लेकिन शिक्षा समाज की सोच को बदल सकती है। इसी सोच के साथ मैंने शिक्षा क्षेत्र में आने का निर्णय लिया।

सुरेश गांधी : आज सनबीम ग्रुप शिक्षा के क्षेत्र में मजबूत नेटवर्क बन चुका है। इस यात्रा को आप कैसे देखते हैं?

डॉ. मधोक : यह यात्रा संघर्ष और सीख से भरी रही है। हमने हमेशा शिक्षा को नवाचार और मूल्यों के साथ जोड़ने का प्रयास किया है। हमारा लक्ष्य ऐसे संस्थान विकसित करना है जहां विद्यार्थी ज्ञान के साथ संस्कार और नेतृत्व क्षमता भी विकसित कर सकें।

सुरेश गांधी : आपको कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिले हैं। इन सम्मानों को आप किस रूप में देखते हैं?

डॉ. मधोक : ये सम्मान मेरे लिए व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं हैं। यह पूरी टीम और विद्यार्थियों के प्रयासों की पहचान हैं। ये हमें बेहतर कार्य करने की प्रेरणा देते हैं।

सुरेश गांधी : वर्तमान समय में शिक्षा तेजी से बदल रही है। भविष्य की शिक्षा को आप किस दिशा में जाते हुए देखते हैं?

डॉ. मधोक : भविष्य की शिक्षा बहुआयामी होगी। इसमें तकनीक, अनुभवात्मक अधिगम और वैश्विक दृष्टिकोण का विशेष महत्व होगा। विद्यार्थियों को केवल ज्ञान ही नहीं, बल्कि सामाजिक समझ और संवाद कौशल भी विकसित करना होगा।

सुरेश गांधी : युवा पीढ़ी के लिए आपका क्या संदेश है?

डॉ. मधोक : युवाओं को सीखने की जिज्ञासा बनाए रखनी चाहिए। साहित्य पढ़ें, संस्कृति से जुड़ें और समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाएं। यदि युवा ज्ञान और संवेदनशीलता को अपनाते हैं तो वे देश और समाज को नई दिशा दे सकते हैं।

सुरेश गांधी : अंत में, आप बनारस लिटरेचर फेस्टिवल को किस रूप में याद करेंगे?

डॉ. मधोक : यह आयोजन मेरे लिए एक सांस्कृतिक और शैक्षिक आंदोलन के रूप में याद रहेगा। इसने यह सिद्ध किया कि जब साहित्य, शिक्षा और युवा शक्ति एक साथ आते हैं तो समाज में सकारात्मक परिवर्तन संभव होता है।

शिक्षा, संस्कृति और युवा शक्ति का नया युग

बनारस लिटरेचर फेस्टिवल केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि विचारों और संस्कृति का ऐसा संगम बनकर सामने आया, जिसने शिक्षा के नए आयाम प्रस्तुत किए। डॉ. दीपक मधोक के नेतृत्व में सनबीम संस्थानों की सहभागिता इस बात का प्रमाण है कि जब शिक्षा को संस्कृति और अनुभव से जोड़ा जाता है, तब वह समाज में सकारात्मक परिवर्तन का माध्यम बनती है। काशी की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक धारा में प्रवाहित यह साहित्यिक महोत्सव आने वाले समय में शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में नई संभावनाओं का मार्ग प्रशस्त करता दिखाई देता है।

Tuesday, 3 February 2026

टैरिफ की दीवार टूटी, कारपेट इंडस्ट्री में लौटी रौनक

50 फीसदी टैरिफ़ के संकट से उबरा हस्तनिर्मित कालीन उद्योग

टैरिफ की दीवार टूटी, कारपेट इंडस्ट्री में लौटी रौनक 

मोदी सरकार के समझौते से अमेरिकी बाज़ार फिर भारत के नाम

इंडिया यूएस बीटीए से 18 फीसदी शुल्क पर मिली नई सांस

25 लाख कारीगरों के चेहरे खिले

सुरेश गांधी

वाराणसी. वर्षों से ऊंचे टैरिफ की मार झेल रहे भारतीय हस्तनिर्मित कालीन उद्योग के लिए भारत - अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौता (इंडिया - यूएस बीटीए) किसी संजीवनी से कम नहीं साबित हुआ है। कालीन निर्यात संवर्धन परिषद (सीईपीसी) ने इस समझौते का स्वागत करते हुए इसे उस लंबे टैरिफ संकट से निर्णायक मुक्ति बताया है, जिसने बीते कुछ वर्षों में उद्योग की कमर तोड़ दी थी। कारोबारियों का कहना है कि अमेरिकी टैरिफ 50 प्रतिशत से घटकर 18 प्रतिशत किए जाने की घोषणा ने वर्षों से संकट झेल रहे भारतीय कालीन उद्योग में नई जान फूंक दी है। इस फैसले के बाद देश की प्रमुख कालीन पट्टी भदोही, मिर्ज़ापुर और वाराणसीउ में उत्साह का माहौल है। कालीन निर्यात संवर्धन परिषद सहित उद्योग से जुड़े संगठनों, निर्यातकों और कारीगर प्रतिनिधियों ने इसे ऐतिहासिक राहत बताते हुए मोदी सरकार की मुक्त कंठ से सराहना की है। 

सीईपीसी के अनुसार, अमेरिकी बाजार भारतीय हस्तनिर्मित कालीनों का सबसे बड़ा खरीदार रहा है। भारत के कुल हस्तनिर्मित कालीन निर्यात का करीब 60 प्रतिशत हिस्सा अमेरिका को जाता है। लेकिन बीते वर्षों में अमेरिका द्वारा 50 फीसदी तक लगाए गए भारी टैरिफ ने भारतीय कालीनों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में सिर्फ पीछे ढकेल दिया, बल्कि इस परंपरागत उद्योग को गहरे संकट में डाल दिया था। नतीजा यह हुआ कि निर्यात घटा, ऑर्डर रुके, और भदोही, मिर्ज़ापुर, बनारस, कश्मीर और राजस्थान जैसे कालीन केंद्रों में लाखों कारीगरों की आजीविका पर संकट मंडराने लगा। वाराणसी, जो डिज़ाइन, फिनिशिंग और निर्यात प्रबंधन का अहम केंद्र है, वहां भी कारोबार ठहराव की स्थिति में पहुंच गया था। सीईपीसी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल और वस्त्र मंत्री गिरिराज सिंह के नेतृत्व में सरकार द्वारा की गई सतत और सशक्त व्यापार कूटनीति की सराहना की है। परिषद का कहना है कि सरकार ने वैश्विक मंचों पर भारतीय उद्योग की पीड़ा को मजबूती से रखा और उसी का परिणाम है कि अब भारतीय कालीनों के लिए अमेरिकी बाजार के दरवाज़े दोबारा खुल गए हैं। 

इस ऐतिहासिक फैसले का स्वागत करते हुए सीईपीसी के पूर्व चेयरमैन सिद्धनाथ सिंह, परिषद के पूर्व प्रशासनिक सदस्य उमेश गुप्तामुन्ना’, योगेंद्र रायकाका’, संजय मेहरोत्रा, रवि पाटोदिया, ओपी गुप्ता, धरम प्रकाश गुप्ता, प्रहलाददास गुप्ता, संजय गुप्ता, बृजेश गुप्ता, राजेंद्र मिश्रा, घनश्याम शुक्ला, ओमकारनाथ मिश्रा, पूर्व मंत्री रंगनाथ मिश्रा, बच्चा मिश्रा सहित कई वरिष्ठ उद्योग प्रतिनिधियों ने इसे कालीन उद्योग के लिए टर्निंग पॉइंट बताया। एकमा के पूर्व अध्यक्ष हाजी शौकत अली अंसारी, वर्तमान अध्यक्ष रज़ा खान, अहसन रऊफ खान, असलम महबूब अंसारी, रोहित गुप्ता, कुलदीप राज बॉटल, कुंवर शमीम अंसारी, पंकज बरनवाल, रूपेश बरनवाल, डॉ. .के. गुप्ता, श्यानारायण यादव, छविराज पटेल, रवि बरनवाल, दीपक खन्ना, शारीक अंसारी, वासिफ अंसारी और रियाज़ुल हसनैन अंसारी ने भी सरकार के फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि इससे पूर्वांचल के गांव-गांव में फिर से काम और आत्मविश्वास लौटेगा।

सीईपीसी के चेयरमैन कैप्टन मुकेश गोम्बर ने कहा कि भारत - ईयू और भारत - यूके मुक्त व्यापार समझौतों से उद्योग को पहले ही कुछ राहत मिली थी, लेकिन भारत - अमेरिका समझौते ने वर्षों पुराने टैरिफ संकट पर निर्णायक प्रहार किया है। उन्होंने बताया कि अमेरिकी बाजार में कालीनों पर शुल्क 50 प्रतिशत से घटकर 18 प्रतिशत हो जाना भारतीय हस्तनिर्मित कालीनों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को पूरी तरह बहाल करता है। इससे सिर्फ निर्यातकों का आत्मविश्वास लौटा है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय खरीदार भी दोबारा भारत की ओर आकर्षित हो रहे हैं। सीईपीसी के उपाध्यक्ष असलम महबूब ने कहा कि ऊंचे टैरिफ के कारण जो उद्योग ठहराव और अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा था, वह अब नए वित्तीय वर्ष में उम्मीद और स्थिरता के साथ प्रवेश कर रहा है। उन्होंने कहा कि ये व्यापार समझौते 2 अरब डॉलर के भारतीय हस्तनिर्मित कालीन उद्योग को नई गति देंगे और देशभर में इससे जुड़े लगभग 25 लाख कारीगरों की आजीविका को मजबूती प्रदान करेंगे।

सीईपीसी की कार्यकारी निदेशक (प्रभारी) डॉ. स्मिता नागरकोटी ने बताया कि परिषद निर्यातकों और हितधारकों के लिए जागरूकता प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाएगी, ताकि इंडिया - यूएस, इंडिया - यूके और इंडिया ईयू व्यापार समझौतों से जुड़ी प्रक्रियाओं, नियमों और अवसरों की जानकारी जमीनी स्तर तक पहुंचे और कारीगर छोटे निर्यातक भी इनका पूरा लाभ उठा सकें। सीईपीसी ने स्पष्ट किया कि परिषद सरकार के साथ मिलकर काम करती रहेगी, ताकि टैरिफ संकट के अंधेरे से निकलकर भारतीय हस्तनिर्मित कालीन उद्योग एक बार फिर वैश्विक नेतृत्व की भूमिका निभा सके, औरमेड इन इंडियाकालीन दुनिया भर के बाज़ारों में अपनी चमक बिखेरते रहें।

रेडिएशन थेरेपी में कैंसर अस्पताल बना भरोसे का केंद्र

रेडिएशन थेरेपी में कैंसर अस्पताल बना भरोसे का केंद्र 

एमपीएमएमसीसी एचबीसीएच में 30% अधिक मरीजों को मिला उपचार,

छह आधुनिक मशीनों से रोजाना 350 कैंसर मरीजों की थैरेपी

सुरेश गांधी

वाराणसी। पूर्वांचल ही नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश और आसपास के पड़ोसी राज्यों के कैंसर मरीजों के लिए काशी अब उम्मीद और आधुनिक चिकित्सा का बड़ा केंद्र बनकर उभर रही है। महामना पंडित मदन मोहन मालवीय कैंसर केंद्र (एमपीएमएमसीसी) और होमी भाभा कैंसर अस्पताल (एचबीसीएच), वाराणसी में रेडिएशन थेरेपी की सुविधाओं में निरंतर विस्तार का सीधा लाभ मरीजों को मिल रहा है। यही वजह है कि वर्ष 2025 में इन दोनों संस्थानों में 2024 की तुलना में लगभग 30 प्रतिशत अधिक मरीजों को रेडिएशन थेरेपी दी गई। 

विश्व कैंसर दिवस (4 फरवरी) के अवसर पर जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, दोनों अस्पतालों में वर्तमान में कुल छह अत्याधुनिक रेडिएशन मशीनें कार्यरत हैं, जिनकी मदद से प्रतिदिन औसतन 350 मरीजों को रेडिएशन उपचार उपलब्ध कराया जा रहा है। बीते वर्ष तीन नई मशीनों की स्थापना के बाद उपचार क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है, जिससे मरीजों को लंबा इंतजार नहीं करना पड़ रहा और इलाज समय पर संभव हो पा रहा है।

महामना पंडित मदन मोहन मालवीय कैंसर केंद्र के रेडिएशन ऑन्कोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. आशुतोष मुखर्जी के अनुसार, अस्पताल आने वाले करीब 60 से 65 प्रतिशत मरीजों को इलाज के किसी किसी चरण में रेडियोथेरेपी की आवश्यकता होती है। उन्होंने बताया कि जब वर्ष 2018 में अस्पताल की शुरुआत हुई थी, तब केवल 532 मरीजों को रेडिएशन थेरेपी दी जा सकी थी। वहीं, वर्ष 2025 में यह संख्या बढ़कर 4,735 तक पहुंच गई, जो सुविधाओं के विस्तार और मरीजों के बढ़ते भरोसे को दर्शाता है।

डॉ. मुखर्जी ने बताया कि शुरुआती वर्षों में अस्पताल में सिर्फ एक रेडिएशन मशीन उपलब्ध थी, जबकि आज एमपीएमएमसीसी और एचबीसीएच को मिलाकर कुल छह आधुनिक मशीनें मरीजों की सेवा में लगी हैं। इससे केवल इलाज की गति बढ़ी है, बल्कि गुणवत्ता में भी सुधार हुआ है। रेडिएशन थेरेपी लेने वाले मरीजों में लगभग 25 प्रतिशत मरीज मुख कैंसर से पीड़ित हैं, जिसका मुख्य कारण तंबाकू और इससे जुड़े उत्पादों का सेवन है। इसके बाद स्तन कैंसर के मरीजों की संख्या दूसरे स्थान पर है। एक मरीज को रेडिएशन थेरेपी का पूरा कोर्स करने में औसतन 35 दिन का समय लगता है, हालांकि मरीज की स्थिति और बीमारी की गंभीरता के अनुसार यह अवधि घट-बढ़ सकती है।

रेडिएशन विभाग के चिकित्सक डॉ. संबित स्वरूप नंदा ने बताया कि अस्पताल में अत्याधुनिक तकनीक से लैस मशीनें उपलब्ध हैं। सांस के साथ समन्वय कर रेडिएशन देना, त्वचा संबंधी कैंसर में विशेष तकनीक का उपयोग जैसी सुविधाएं यहां मौजूद हैं। हर मरीज की स्थिति के अनुसार उपचार योजना तैयार की जाती है, जिससे इलाज अधिक प्रभावी बन सके।

अस्पताल के निदेशक डॉ. सत्यजीत प्रधान ने बताया कि पिछले वर्ष शुरू की गई तीन नई रेडिएशन मशीनों में से दो का उद्घाटन माननीय प्रधानमंत्री द्वारा किया गया था। उन्होंने कहा कि संस्थान का लक्ष्य है कि प्रत्येक कैंसर मरीज को समय पर, निर्बाध और गुणवत्तापूर्ण उपचार उपलब्ध कराया जाए। इसके लिए भविष्य में भी सुविधाओं के विस्तार पर लगातार काम किया जा रहा है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, वर्ष 2022 में दुनियाभर में लगभग 20 मिलियन कैंसर के नए मामले सामने आए, जबकि 9.7 मिलियन लोगों की मौत इस बीमारी से हुई। ऐसे में समय पर जांच, प्रारंभिक अवस्था में पहचान और आधुनिक उपचार सुविधाएं ही कैंसर से लड़ने का सबसे बड़ा हथियार हैं। काशी के ये दोनों संस्थान इसी दिशा में एक मजबूत कदम बनकर उभरे हैं।

रेडिएशन थेरेपी पाने वाले मरीजों की संख्या

2018 : 532

2019 : 1153

2020 : 2090

2021 : 3050

2022 : 3264

2023 : 3307

2024 : 3641

2025 : 4735

यह आंकड़े साफ बताते हैं कि वाराणसी कैंसर उपचार के क्षेत्र में तेजी से एक भरोसेमंद चिकित्सा केंद्र के रूप में अपनी पहचान मजबूत कर रहा है।

विचारों का वैश्विक महाकुंभ : बीएलएफ की सफलता में शिक्षा, संस्कृति और नेतृत्व का स्वर्णिम समागम

काशी की सांस्कृतिक धारा में साहित्य और शिक्षा का नवजागरण विचारों का वैश्विक महाकुंभ : बीएलएफ की सफलता में शिक्षा, संस्कृति और नेतृत्व का स...