संत रविदास जयंती : बेगमपुरा का स्वप्न और भारत की आत्मा
जब मन निर्मल हो, तभी समाज समरस होता है. किसी भी सभ्यता की पहचान उसके महलों, राजमहलों या युद्धों से नहीं होती; उसकी पहचान उन महापुरुषों से होती है जिन्होंने मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने का साहस किया। भारतीय संत परंपरा में संत शिरोमणि रविदास ऐसा ही उज्ज्वल नाम हैं। उन्होंने न कोई साम्राज्य खड़ा किया, न किसी सत्ता का स्वप्न देखा। उनका स्वप्न था—ऐसा समाज, जहाँ मनुष्य की पहचान उसकी जाति से नहीं, उसके कर्म और चरित्र से हो; जहाँ श्रम पूजा बने, प्रेम धर्म बने और समानता जीवन का स्वभाव। रविदास की वाणी में दर्शन है, लेकिन वह जीवन से अलग नहीं। उसमें अध्यात्म है, पर वह लोकमंगल से जुड़ा है। वे कहते हैं— "मन ही पूजा, मन ही धूप, मन ही सेवौं सहज स्वरूप।" यह केवल भक्ति का पद नहीं, बल्कि भारतीय चिंतन का सार है। मन शुद्ध है तो मंदिर भी भीतर है और ईश्वर भी भीतर। यही कारण है कि रविदास बाहरी आडंबरों से अधिक अंतःकरण की निर्मलता पर बल देते हैं
सुरेश गांधी
जब समाज जाति,
वर्ग, भाषा और विचारों
की संकीर्ण रेखाओं में उलझ जाता
है, तब इतिहास ऐसे
महापुरुषों की ओर लौटने
का संकेत देता है जिन्होंने
मनुष्य को मनुष्य के
रूप में देखने का
साहस दिया। संत रविदास ऐसे
ही युगद्रष्टा थे। उन्होंने राजसत्ता
से नहीं, समाज की आत्मा
से संवाद किया। चमड़े का काम करने
वाले एक साधारण परिवार
में जन्म लेकर उन्होंने
यह सिद्ध किया कि मनुष्य
की पहचान उसके कर्म, विचार
और चरित्र से होती है,
जन्म से नहीं। उनकी
जयंती केवल श्रद्धांजलि का
अवसर नहीं, बल्कि उस भारत को
पुनः स्मरण करने का दिन
है जिसकी कल्पना उन्होंने 'बेगमपुरा' के रूप में
की थी—एक ऐसा
समाज जहाँ किसी के
साथ भेदभाव न हो, किसी
पर अन्याय न हो और
प्रत्येक व्यक्ति सम्मानपूर्वक जीवन जी सके।
पंद्रहवीं शताब्दी का भारत सामाजिक
विषमताओं से जूझ रहा
था। जाति के नाम
पर ऊँच-नीच, छुआछूत
और भेदभाव समाज को भीतर
से खोखला कर रहे थे।
ऐसे समय में काशी
के सीर गोवर्धनपुर से
उठी एक संत वाणी
ने घोषणा की— "रविदास जन्म के कारनै,
होत न कोउ नीच।
नर कूँ नीच करि
डारि है, ओछे करम
की कीच।।" यह केवल दोहा
नहीं था; उस समय
की सामाजिक व्यवस्था को खुली चुनौती
थी। उन्होंने जन्म की श्रेष्ठता
को अस्वीकार कर कर्म की
श्रेष्ठता को स्थापित किया।
पाँच सौ वर्ष पहले
कहा गया यह संदेश
आज भी उतना ही
प्रासंगिक है। रविदास का सबसे बड़ा
स्वप्न था—'बेगमपुरा'।
ऐसा नगर जहाँ किसी
पर अत्याचार न हो, कोई
ऊँचा-नीचा न हो,
कोई भूखा न रहे
और सब समान अधिकार
के साथ जीवन जी
सकें। आज जब संविधान
सामाजिक न्याय, समान अवसर और
गरिमा की बात करता
है, तब लगता है
कि संत रविदास का
'बेगमपुरा' आधुनिक भारत की संवैधानिक
चेतना में भी जीवित
है।
उनका एक और
संदेश आज के समय
में और अधिक महत्वपूर्ण
हो जाता है— "मन
चंगा तो कठौती में
गंगा।" यह केवल लोकप्रचलित
कहावत नहीं, बल्कि कर्तव्य, ईमानदारी और आंतरिक पवित्रता
का दर्शन है। यदि मन
निर्मल है तो साधारण
कर्म भी साधना बन
जाता है। यही कारण
है कि उन्होंने अपने
पैतृक व्यवसाय को कभी त्यागा
नहीं। उन्होंने श्रम को सम्मान
दिया और बताया कि
कोई काम छोटा नहीं
होता। रविदास केवल संत नहीं
थे; वे लोककवि भी
थे। उनकी भाषा संस्कृत
के शास्त्रों की नहीं, जनता
की बोली थी। इसी
कारण उनकी वाणी सीधे
जनमानस में उतर गई।
उनके पद आज भी
गुरुग्रंथ साहिब में सम्मानपूर्वक संकलित
हैं, मीराबाई ने उन्हें अपना
गुरु माना और देश-विदेश में करोड़ों लोग
उन्हें सामाजिक समरसता के प्रतीक के
रूप में स्मरण करते
हैं।
आज दुनिया विज्ञान,
तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता
के युग में प्रवेश
कर चुकी है, लेकिन
मनुष्य के भीतर विभाजन
की दीवारें अभी भी पूरी
तरह नहीं टूटी हैं।
धर्म, जाति, भाषा और पहचान
के नाम पर तनाव
आज भी दिखाई देते
हैं। ऐसे समय में
संत रविदास का संदेश केवल
धार्मिक नहीं, बल्कि मानवीय और राष्ट्रीय आवश्यकता
बन जाता है। रविदास
ने कभी किसी के
विरुद्ध घृणा का आंदोलन
नहीं चलाया; उन्होंने प्रेम का आंदोलन चलाया।
उन्होंने संघर्ष किया, लेकिन कटुता नहीं बोई। विरोध
किया, लेकिन वैमनस्य नहीं फैलाया। यही
उनकी सबसे बड़ी शक्ति
थी और यही उन्हें
कालजयी बनाती है। उनकी जयंती
पर यदि हम केवल
शोभायात्राएँ निकालें, पुष्प अर्पित करें और उनके
पद गाकर लौट जाएँ,
तो यह अधूरी श्रद्धांजलि
होगी।
सच्ची श्रद्धांजलि तब होगी जब
हम अपने व्यवहार में
भेदभाव कम करें, श्रम
का सम्मान करें, मन को निर्मल
रखें और समाज में
समरसता का वातावरण बनाएँ।
क्योंकि अंततः संत रविदास का
संदेश किसी एक समाज,
एक वर्ग या एक
पंथ का नहीं, बल्कि
संपूर्ण मानवता का संदेश है।
उनका 'बेगमपुरा' किसी कल्पना का
नगर नहीं, बल्कि उस भारत का
स्वप्न है जहाँ हर
व्यक्ति सम्मान के साथ जी
सके। यही संत रविदास
की वाणी का शाश्वत
संदेश है, और यही
उनकी जयंती का वास्तविक अर्थ
भी। काशी की पावन
धरती ने अनेक संत,
दार्शनिक और विचारक दिए
हैं, लेकिन संत रविदास का
स्थान इसलिए विशिष्ट है क्योंकि उन्होंने
अध्यात्म को सीधे सामाजिक
न्याय से जोड़ा। उनकी
भक्ति केवल ईश्वर तक
पहुँचने का मार्ग नहीं
थी, बल्कि मनुष्य को मनुष्य से
जोड़ने का अभियान भी
थी। उन्होंने मंदिरों और महलों से
अधिक महत्व श्रम, सेवा और मानवीय
समानता को दिया।
संत रविदास ने
अपने समय की सबसे
बड़ी सामाजिक चुनौती—जातिगत ऊँच-नीच—को
खुली चुनौती दी। उन्होंने कभी
कटुता का सहारा नहीं
लिया, बल्कि प्रेम, तर्क और भक्ति
के माध्यम से समाज को
आईना दिखाया। उनकी वाणी में
विरोध भी था और
समाधान भी। यही कारण
है कि उनके पद
आज भी उतने ही
प्रासंगिक हैं जितने पाँच
सौ वर्ष पहले थे।
उनकी कल्पना का 'बेगमपुरा' केवल
एक आध्यात्मिक नगर नहीं, बल्कि
आदर्श लोकतांत्रिक समाज का दर्शन
है। वहाँ न कोई
कर का बोझ है,
न भय, न भेदभाव,
न ऊँच-नीच। आज
जब विकास की चर्चा ऊँची
इमारतों, चौड़ी सड़कों और डिजिटल क्रांति
तक सीमित हो जाती है,
तब संत रविदास याद
दिलाते हैं कि वास्तविक
विकास तभी है जब
समाज के अंतिम व्यक्ति
तक सम्मान और अवसर पहुँचे।
उनका जीवन यह
भी सिखाता है कि श्रम
कभी छोटा नहीं होता।
उन्होंने अपने पैतृक व्यवसाय
को त्यागा नहीं, बल्कि उसी के साथ
आध्यात्मिक ऊँचाइयाँ प्राप्त कीं। यह संदेश
आज के युवाओं के
लिए अत्यंत प्रेरक है। आत्मनिर्भरता, कौशल
और श्रम के सम्मान
की जो बातें आज
नीति निर्माण का हिस्सा हैं,
उनकी जड़ें संत रविदास की
जीवन-दृष्टि में स्पष्ट दिखाई
देती हैं। आज का
भारत सामाजिक समरसता, समावेशी विकास और आत्मनिर्भरता की
दिशा में आगे बढ़
रहा है। ऐसे समय
में संत रविदास का
चिंतन केवल धार्मिक विरासत
नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना का आधार बन
सकता है। यदि समाज
उनके विचारों को व्यवहार में
उतार सके तो अनेक
सामाजिक तनाव स्वतः समाप्त
हो सकते हैं।
काशी के सीर
गोवर्धनपुर से उठी उनकी
वाणी आज विश्व के
अनेक देशों तक पहुँच चुकी
है। उनके अनुयायी केवल
भारत में ही नहीं,
बल्कि विदेशों में भी उनके
संदेश को मानवता की
धरोहर के रूप में
आगे बढ़ा रहे हैं।
यह इस बात का
प्रमाण है कि सत्य,
समानता और प्रेम की
भाषा कभी सीमाओं में
कैद नहीं होती। संत
रविदास जयंती पर सबसे बड़ी
श्रद्धांजलि यही होगी कि
हम केवल उनके भजनों
का गायन न करें,
बल्कि उनके विचारों को
अपने व्यवहार का हिस्सा बनाएँ।
समाज में सम्मान, सद्भाव,
करुणा और श्रम के
प्रति आदर की भावना
विकसित करें। यदि ऐसा हो
सका तो 'बेगमपुरा' कोई
कल्पना नहीं, बल्कि भारत की सामाजिक
वास्तविकता बन सकती है।
संत रविदास ने कहा था
कि मनुष्य का मूल्य उसके
जन्म से नहीं, उसके
कर्म और उसके अंतःकरण
की पवित्रता से तय होता
है। आज, जब दुनिया
पहचान की अनेक दीवारों
से जूझ रही है,
तब उनकी वाणी पहले
से कहीं अधिक प्रासंगिक
प्रतीत होती है। उनकी
जयंती केवल एक संत
का स्मरण नहीं, बल्कि उस मानवीय चेतना
का उत्सव है जो हमें
विभाजन नहीं, एकता; अहंकार नहीं, विनम्रता; और भेदभाव नहीं,
समरसता का मार्ग दिखाती
है। यही संत रविदास
के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

