Tuesday, 18 August 2026

तड़तड़ाए बादल, झमाझम बरसे मेघ; गंगा चढ़ी, वरुणा भी उफनी

तड़तड़ाए बादल, झमाझम बरसे मेघ; गंगा चढ़ी, वरुणा भी उफनी 

राजघाट पर 67.14 मीटर पहुंची गंगा, चार सेंटीमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से बढ़ रहा पानी

सलारपुर में घरों में घुसा चार फीट पानी, लोग घर छोड़कर किराये के मकानों में पहुंचे

आरती से लेकर शवदाह तक बदली घाटों की व्यवस्था

सुरेश गांधी

वाराणसी। दिनभर उमड़ते-घुमड़ते बादलों ने मंगलवार को काशी और पूरे पूर्वांचल को गरज-चमक के साथ जमकर भिगोया तो दूसरी ओर नदियों की बढ़ती धार ने शहर के निचले इलाकों में चिंता की लकीरें खींच दीं। झमाझम बारिश ने कई दिनों से उमस और चिपचिपाती गर्मी से बेहाल लोगों को बड़ी राहत दी, लेकिन इसी बीच गंगा के साथ वरुणा की बढ़ती धारा ने तटवर्ती और निचले इलाकों में मुश्किलें बढ़ा दीं। काशी में कहीं मेघ बरसे तो कहीं नदी की लहरें घाटों की सीढ़ियां चढ़ती दिखीं।

केंद्रीय जल आयोग के राजघाट गेज स्थल पर मंगलवार शाम छह बजे गंगा का जलस्तर 67.14 मीटर दर्ज किया गया। शाम चार बजे यह 67.06 मीटर था। यानी महज दो घंटे में आठ सेंटीमीटर की बढ़ोतरी हुई। आयोग के मुताबिक जलस्तर चार सेंटीमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से बढ़ रहा है। हालांकि गंगा अभी चेतावनी स्तर से 3.122 मीटर और खतरे के निशान से 4.122 मीटर नीचे है, लेकिन लगातार बढ़ती चाल ने निगरानी बढ़ाने की जरूरत पैदा कर दी है।

राजघाट पर गंगा का चेतावनी स्तर 70.262 मीटर, खतरे का स्तर 71.262 मीटर और उच्चतम बाढ़ स्तर (एचएफएल) 73.901 मीटर है। मौजूदा जलस्तर फिलहाल खतरे की सीमा से काफी नीचे है, लेकिन नदी के बढ़ते रुख के बीच घाटों और निचले इलाकों पर नजर रखी जा रही है।

बादलों की तड़तड़ाहट ने दी उमस से राहत

उधर, मंगलवार को मौसम ने भी करवट बदली। सुबह से आसमान में उमड़ते-घुमड़ते बादलों के बीच उमस ने परेशान किया, लेकिन शाम होते-होते बादलों ने गरज-चमक के साथ अपना रंग दिखाया। काशी समेत पूर्वांचल के कई हिस्सों में तेज बौछारों और झमाझम बारिश का दौर चला। बिजली की तड़तड़ाहट के साथ बरसे मेघों ने वातावरण को ठंडा कर दिया। लंबे समय से उमस झेल रहे लोगों ने राहत की सांस ली। बारिश से खेतों को पानी मिला तो शहर की सड़कों और गलियों में भी जगह-जगह जलभराव की स्थिति बनी। सावन के अंतिम दिनों में हुई इस बारिश ने मौसम में मानसूनी रंग फिर गाढ़ा कर दिया।

वरुणा उफनी, सलारपुर में घरों में चार फीट पानी

गंगा के साथ वरुणा नदी के उफान ने सारनाथ क्षेत्र के सलारपुर में हालात मुश्किल कर दिए हैं। सोमवार को वरुणा से जुड़े कई मकानों में करीब चार फीट तक पानी घुस गया। रेलवे लाइन के पास बसे परिवारों को घर खाली कर सुरक्षित स्थानों पर जाना पड़ा। कई लोग पड़ोस में किराये के मकान लेकर रहने लगे हैं। पुराना पुल-पुलकोहना के पास नाले से सटे मकानों की चौखट तक पानी पहुंच गया है। इससे स्थानीय लोगों में चिंता बढ़ गई है। प्रभावित इलाकों में राहत और बचाव व्यवस्था की जरूरत महसूस की जा रही है। घरों में पानी घुसने से लोगों के सामने सुरक्षित आवागमन, जरूरी सामान और रहने की व्यवस्था की चुनौती खड़ी हो गई है। प्रशासन भी स्थिति पर नजर रखते हुए आवश्यक कार्रवाई की तैयारी में जुटा है।

घाटों पर बदली आरती की जगह

गंगा का पानी बढ़ने का असर काशी की धार्मिक गतिविधियों पर भी पड़ने लगा है। अस्सी घाट की आरती अबसुबह--बनारसके मंच के पास हो रही है। दशाश्वमेध और राजेंद्र प्रसाद घाट पर भी पानी बढ़ने के कारण आरती स्थल बदल दिया गया है। जिन घाटों की सीढ़ियों पर शाम ढलते ही दीपों की कतारें जगमगाती थीं, वहां अब बढ़ता पानी अपनी सीमा रेखा खींच रहा है। आस्था की लौ जरूर जल रही है, लेकिन उसकी जगह बदल गई है।

मणिकर्णिका में छत पर अंतिम संस्कार

गंगा के बढ़ते पानी ने काशी की सबसे निरंतर चलने वाली परंपराअंतिम संस्कारकी व्यवस्था को भी प्रभावित किया है। हरिश्चंद्र और मणिकर्णिका घाट पर शवदाह स्थल बदलना पड़ा है। मणिकर्णिका घाट पर पानी काफी ऊपर आने के बाद शवदाह स्थल को छत पर कर दिया गया है। यह दृश्य गंगा के बढ़ते प्रभाव का गंभीर संकेत है। जिस नदी के किनारे जीवन और मृत्यु दोनों की परंपराएं सदियों से साथ-साथ चलती रही हैं, उसकी बढ़ती धारा अब उन व्यवस्थाओं को भी ऊपर खिसकाने पर मजबूर कर रही है।  

गंगा-वरुणा की बढ़ती धार पर निगाह

एक ओर आसमान से मेघ बरस रहे हैं, दूसरी ओर गंगा और वरुणा की धार बढ़ रही है। फिलहाल गंगा खतरे के निशान से नीचे है और तत्काल किसी बड़े खतरे का संकेत नहीं है, लेकिन वरुणा के उफान से निचले इलाकों में पैदा हुई स्थिति ने प्रशासनिक सतर्कता बढ़ा दी है। काशी में मंगलवार का दिन मौसम और नदियों के दोहरे मिजाज का गवाह बनाआसमान से बरसे मेघों ने उमस धोई, मगर धरती पर चढ़ती गंगा और उफनती वरुणा ने तटवर्ती जीवन की चिंता बढ़ा दी। अब निगाहें अगले कुछ घंटों में बारिश और नदियों की चाल पर टिकी हैं।

बिहार की तर्ज पर यूपी में तावड़े बनेंगे भाजपा के खेवनहार

बिहार की तर्ज पर यूपी में तावड़े बनेंगे भाजपा के खेवनहार 

बिहार की चुनावी बाजी के बाद अब सबसे बड़े सियासी रण की कमान, 2027 में संगठन और सामाजिक समीकरण साधने की चुनौती

सुरेश गांधी

वाराणसी। बिहार में चुनावी रणनीति को धार देकर भाजपा-एनडीए को सफलता की राह दिखाने वाले विनोद तावड़े अब उत्तर प्रदेश की सियासी पतवार संभालेंगे। भाजपा ने उन्हें 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए प्रदेश का चुनाव प्रभारी नियुक्त किया है। तावड़े के साथ जगदीश पटेल को सह-प्रभारी की जिम्मेदारी दी गई है।

यूपी की 403 विधानसभा सीटों का चुनाव बिहार से कहीं बड़ा और राजनीतिक रूप से अधिक निर्णायक है। यही वजह है कि भाजपा नेतृत्व ने संगठन के शांत लेकिन चुनावी रणनीति के माहिर माने जाने वाले तावड़े पर दांव लगाया है। उनकी चुनौती केवल सीटों का गणित साधना नहीं, बल्कि बूथ से लेकर प्रदेश संगठन तक चुनावी मशीनरी को एक सूत्र में पिरोने की होगी।

तावड़े की नियुक्ति को भाजपा के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की संगठनात्मक रणनीति के अगले चरण के रूप में भी देखा जा रहा है। एक दिन पहले ही नवीन की नई राष्ट्रीय टीम में तावड़े को महत्वपूर्ण स्थान मिला और अगले ही दिन उन्हें देश के सबसे बड़े राजनीतिक राज्य की चुनावी कमान सौंप दी गई।

बिहार की सफलता, यूपी की अग्निपरीक्षा

बिहार में मिली कामयाबी ने तावड़े की रणनीतिक क्षमता पर पार्टी का भरोसा बढ़ाया है। अब वही अनुभव यूपी में आजमाया जाएगा। हालांकि उत्तर प्रदेश का चुनावी भूगोल, जातीय समीकरण और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा बिहार से अलग है। यहां भाजपा के सामने सत्ता की निरंतरता बनाए रखने के साथ 2024 लोकसभा चुनाव के बाद बदले राजनीतिक समीकरणों को साधने की भी चुनौती होगी। ऐसे में तावड़े के सामने सबसे बड़ा सवाल यही होगाक्या बिहार में चली चुनावी रणनीति यूपी में भी जीत की पटकथा लिख पाएगी? भाजपा ने उन्हें सिर्फ प्रभारी नहीं बनाया है, बल्कि 2027 के सबसे बड़े सियासी इम्तिहान का रणनीतिकार बनाकर मैदान में उतारा है।

संघ की पाठशाला से सियासत के शिखर तक

विनोद तावड़े की राजनीतिक यात्रा छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से शुरू हुई। 1984 में एबीवीपी से जुड़े, 1989 में महाराष्ट्र के प्रदेश सचिव और 1993-94 में राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) बने। 1994 में सक्रिय भाजपा राजनीति में आए। 1995 में पहली बार भाजपा महाराष्ट्र के महासचिव बने। यानी चुनावी राजनीति में उतरने से पहले ही संगठन खड़ा करने का लंबा अनुभव हासिल कर चुके थे।

पद नहीं, संगठन साधने की कार्यशैली

तावड़े की पहचान ऐसे संगठनकर्ता की रही है जो चुनाव को केवल प्रत्याशी और प्रचार तक सीमित नहीं रखते। बूथ, विधानसभा, लोकसभा और सामाजिक समूहों के स्तर पर अलग-अलग रणनीति बनाना उनकी कार्यशैली का हिस्सा माना जाता है। 2023 में वाराणसी में उन्होंने स्पष्ट तौर पर लोकसभा और विधानसभा कोर कमेटियों की नियमित बैठक, सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषण और भाजपा से दूर रहे सामाजिक वर्गों तक पहुंच बढ़ाने पर जोर दिया था।

मंत्री से संगठन के राष्ट्रीय रणनीतिकार तक

2014 में महाराष्ट्र विधानसभा पहुंचने के बाद तावड़े को देवेंद्र फडणवीस सरकार में स्कूली शिक्षा, उच्च एवं तकनीकी शिक्षा, चिकित्सा शिक्षा, खेल एवं युवा कल्याण, संस्कृति और मराठी भाषा समेत कई महत्वपूर्ण विभाग मिले। इससे पहले वे महाराष्ट्र विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष भी रह चुके थे। 2019 के बाद प्रदेश की सक्रिय राजनीति से बाहर होने के बावजूद संगठन में उनकी भूमिका खत्म नहीं हुई; 2020 में राष्ट्रीय सचिव और नवंबर 2021 में राष्ट्रीय महासचिव बनाए गए। 2026 में वे राज्यसभा पहुंचे।

बिहार में बनागेम चेंजरका प्रोफाइल

तावड़े के राजनीतिक पुनरुत्थान में बिहार अहम पड़ाव बना। 2022 से बिहार में संगठन और चुनावी रणनीति पर उनकी सक्रियता बढ़ी। 2025 के विधानसभा चुनाव में भाजपा-एनडीए की रणनीति, जमीनी संगठन और सामाजिक समीकरण साधने में उनकी भूमिका को पार्टी की बड़ी सफलता से जोड़कर देखा गया। यही बिहार का अनुभव अब उन्हें यूपी के मिशन-2027 में सबसे बड़ी जिम्मेदारी तक ले आया है।

रणनीति की खासियतसामाजिक गणित + संगठन

तावड़े की चुनावी कार्यप्रणाली का एक प्रमुख पक्ष सामाजिक समीकरणों को संगठनात्मक गतिविधियों से जोड़ना है। वाराणसी में 2023 की बैठक में उन्होंने कमजोर प्रभाव वाले सामाजिक समूहों में पहुंच बढ़ाने, युवा मतदाताओं से संवाद और महिला-किसान मोर्चों को सक्रिय करने की रणनीति पर जोर दिया था। यूपी जैसे जातीय और क्षेत्रीय विविधता वाले राज्य में यही क्षमता उनकी सबसे बड़ी परीक्षा होगी।

काशी से भी रहा है चुनावी नाता

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी से तावड़े का चुनावी जुड़ाव नया नहीं है। अगस्त 2023 में वे भाजपा की लोकसभा प्रवास योजना के तहत वाराणसी पहुंचे और जौनपुर, गाजीपुर घोसी लोकसभा क्षेत्रों की क्लस्टर बैठक को संबोधित किया। 2024 में भी भाजपा की पहली लोकसभा सूची जारी करते समय तावड़े ने ही नरेंद्र मोदी के वाराणसी से चुनाव लड़ने की घोषणा की थी। हालांकि उपलब्ध रिकॉर्ड उन्हें वाराणसी का औपचारिक चुनाव प्रभारी नहीं बताता।

यूपी : अब सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा

बिहार की सफलता के बाद अब तावड़े के सामने 403 विधानसभा सीटों वाला उत्तर प्रदेश है। भाजपा ने 18 अगस्त 2026 को उन्हें 2027 विधानसभा चुनाव के लिए प्रदेश का चुनाव प्रभारी बनाया है, जबकि गुजरात के जगदीश पटेल सह-प्रभारी होंगे। यूपी में उन्हें संगठन, सामाजिक समीकरण, टिकट वितरण और सत्ता-विरोधी संभावनाओं के बीच तालमेल बैठाने की चुनौती होगी।

 गेम चेंजरक्यों?

तावड़े की सबसे बड़ी ताकत किसी एक चुनावी नारे में नहीं, बल्कि लंबे संगठनात्मक अनुभव, दबाव में शांत रहने, विभिन्न सामाजिक वर्गों से संवाद और चुनावी मशीनरी को बूथ स्तर तक सक्रिय करने की क्षमता में बताई जाती है। बिहार के बाद यूपी की जिम्मेदारी मिलना इस बात का संकेत है कि भाजपा नेतृत्व उन्हें अब केवल महाराष्ट्र के नेता के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर के चुनावी रणनीतिकार के रूप में देख रहा है।

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