Thursday, 5 November 2026

जहां अमृत की बूंदों से कालजयी हुई काशी, वहां आज भी पूजे जाते हैं आरोग्य के देवता धन्वंतरि

जहां अमृत की बूंदों से कालजयी हुई काशी, वहां आज भी पूजे जाते हैं आरोग्य के देवता धन्वंतरि 

सोने-चांदी की चमक और बाजारों की रौनक के बीच काशी धनतेरस पर एक ऐसा रहस्य सहेजती है, जिसका मोल दुनिया की किसी दौलत से नहीं आंका जा सकता। मान्यता है कि समुद्र मंथन से निकले अमृत की कुछ बूंदें काशी में भी छलकी थीं। इसी अमृत परंपरा की स्मृतियां महामृत्युंजय मंदिर परिसर के प्राचीन धन्वंतरि कूप से जुड़ी हैं। कहते हैं, सात घाटों वाले इस कूप के हर घाट के जल की तासीर अलग है। राजा परीक्षित, नागराज तक्षक और आयुर्वेद के देवता धन्वंतरि की भेंट का पौराणिक प्रसंग भी इसी कूप से जुड़ा है। काशी में भगवान धन्वंतरि का दूसरा अनूठा धाम बुलानाला स्थित धन्वंतरि निवास है, जहां लगभग 300 साल पुरानी अष्टधातु की प्रतिमा के सार्वजनिक दर्शन साल में सिर्फ धनतेरस पर होते हैं। चार हाथों में अमृत कलश, शंख, चक्र और जोंक धारण किए भगवान के दर्शन को श्रद्धालु उमड़ते हैं। उनकी कामना होती है—परिवार निरोग रहे, आयु दीर्घ हो। काशी का यह पर्व संदेश देता है कि सोना-चांदी संपन्नता के प्रतीक हो सकते हैं, लेकिन स्वस्थ शरीर ही जीवन का सबसे अनमोल धन है

सुरेश गांधी

दुनिया जहां धन की चमक में समृद्धि का चेहरा तलाशती है, वहीं काशी धनतेरस पर एक ऐसा संदेश देती है, जो सोने-चांदी की चमक से कहीं अधिक मूल्यवान है। यहां धनतेरस का अर्थ केवल तिजोरी भरना नहीं, बल्कि जीवन को आरोग्य, दीर्घायु और निर्भयता के अमृत से सींचना भी है। यह वही नगरी है, जिसके बारे में लोकमान्यता है कि समुद्र मंथन से निकले अमृत की कुछ बूंदें यहां भी छलकी थीं। शायद इसीलिए काशी की आध्यात्मिक चेतना में भगवान धन्वंतरि का स्थान केवल आयुर्वेद के प्रवर्तक या देव वैद्य का नहीं, बल्कि जीवन की निरंतरता और काल पर विजय की कामना से भी जुड़ा है। महामृत्युंजय मंदिर परिसर में स्थित प्राचीन धन्वंतरि कूप इस मान्यता को आज भी अपने भीतर समेटे हुए है। वहीं बुलानाला स्थित धन्वंतरि निवास में भगवान की लगभग तीन सौ वर्ष पुरानी अष्टधातु प्रतिमा साल में केवल धनतेरस के दिन सार्वजनिक दर्शन देती है। एक ओर धरती की गहराई में समाई अमृत की लोककथा और दूसरी ओर भक्तों को साल में एक दिन दर्शन देने वाले आरोग्य के देवता। काशी में धनतेरस की यह विशिष्टता इसे देश के दूसरे हिस्सों में मनाए जाने वाले धनतेरस से अलग पहचान देती है।

समुद्र मंथन से काशी तक पहुंची अमृत की दास्तां

पौराणिक आख्यानों के अनुसार देवताओं और असुरों के बीच हुए समुद्र मंथन से जब चौदह रत्न निकले तो उनमें भगवान धन्वंतरि भी अमृत कलश लेकर प्रकट हुए। उनके एक हाथ में अमृत कलश, दूसरे में औषधि, शंख और चक्र विराजमान थे। आयुर्वेद के देवता के रूप में उनकी प्रतिष्ठा हुई और उन्हें देव वैद्य कहा गया। मान्यता है कि भगवान विष्णु के वरदान के अनुसार धन्वंतरि ने द्वापर युग में काशी के राजपरिवार में पुनर्जन्म लिया। काशीराज के वंश में जन्म लेकर उन्होंने आयुर्वेद को पुनः व्यवस्थित किया और उसके आठ अंगों में विभाजन की परंपरा से उनका नाम जुड़ा। काशी की लोकआस्था में इससे भी आगे एक प्रसंग मिलता है। कहा जाता है कि भगवान शिव द्वारा समुद्र मंथन से निकला हलाहल विष ग्रहण करने के बाद धन्वंतरि ने उन्हें अमृत प्रदान किया था। इसी क्रम में अमृत की कुछ बूंदें काशी में भी छलकीं। यह पौराणिक मान्यता काशी को कालजयी और अविनाशी मानने वाली धार्मिक चेतना से जुड़ती है। इसीलिए यहां भगवान धन्वंतरि की आराधना केवल रोगों से मुक्ति की प्रार्थना नहीं, बल्कि जीवन की रक्षा और दीर्घायु की कामना का भी प्रतीक है।

धन्वंतरि कूप में सिमटी है अमृत और अमरता की मान्यता

काशी के महामृत्युंजय मंदिर परिसर में स्थित प्राचीन धन्वंतरि कूप इस पूरे आख्यान का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव है। मंदिर के तीसरे खंड परिसर में स्थित इस कूप को स्थानीय धार्मिक परंपरा में भगवान धन्वंतरि से जोड़कर देखा जाता है। सदियों से यह स्थान श्रद्धालुओं के लिए कौतूहल, आस्था और आरोग्य की कामना का केंद्र बना हुआ है। इसके बारे में प्रचलित मान्यता है कि इसके सात घाट हैं और प्रत्येक घाट के जल की तासीर अलग-अलग है। जल के इन अलग-अलग स्वरूपों को लेकर अनेक धार्मिक धारणाएं प्रचलित हैं। श्रद्धालु इसे सामान्य जलस्रोत भर नहीं मानते, बल्कि आयुर्वेद के अधिष्ठाता देवता की स्मृति और उनकी कृपा से जुड़ा पवित्र स्थल मानते हैं। धन्वंतरि कूप से जुड़ा एक अन्य पौराणिक प्रसंग महाभारत काल के राजा परीक्षित और नागराज तक्षक का है। कथा के अनुसार राजा परीक्षित को ऋषि के शाप के कारण सर्पदंश से मृत्यु का विधान प्राप्त हुआ था। उन्हें बचाने के लिए आयुर्वेद के ज्ञाता धन्वंतरि चले थे, जबकि नागराज तक्षक भी अपने निर्धारित विधान के अनुसार उन्हें डसने जा रहे थे। रास्ते में दोनों की भेंट इसी स्थान पर हुई। कहा जाता है कि तक्षक ने अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हुए एक वृक्ष को भस्म कर दिया। धन्वंतरि ने अपनी विद्या और संजीवनी शक्ति से उसे फिर हरा-भरा कर दिया। इसके बाद दोनों के प्रभाव और सामर्थ्य का परीक्षण हुआ। यह प्रसंग धन्वंतरि की चिकित्सा विद्या और जीवन को पुनः संबल देने वाली शक्ति का प्रतीक माना जाता है। यह कथा इतिहास की प्रमाणित घटना से अधिक पौराणिक आख्यान और स्थानीय धार्मिक विश्वास का हिस्सा है, लेकिन काशी की सांस्कृतिक स्मृति में इसकी जगह महत्वपूर्ण है। धन्वंतरि कूप इसी स्मृति का साक्षी बना हुआ है। मृत्यु और जीवन, विष और अमृत तथा रोग और उपचार के बीच चलने वाले शाश्वत संघर्ष का यह स्थल धनतेरस पर विशेष अर्थ ग्रहण करता है। जिस पर्व पर लोग धन-संपदा की कामना करते हैं, उसी दिन यहां आरोग्य और दीर्घायु की प्रार्थना का भाव भी गहरा हो उठता है।

बुलानाला में साल में एक दिन होते हैं भगवान के दर्शन

काशी में भगवान धन्वंतरि की उपस्थिति का दूसरा विशिष्ट केंद्र बुलानाला स्थित धन्वंतरि निवास है। यहां भगवान की अष्टधातु की लगभग तीन सौ 28 वर्ष पुरानी प्रतिमा स्थापित है। वर्ष भर श्रद्धालुओं की प्रतीक्षा के बाद धनतेरस के दिन प्रतिमा के सार्वजनिक दर्शन का अवसर मिलता है। यही इस स्थान की सबसे बड़ी विशेषता है। रजत सिंहासन पर विराजमान लगभग ढाई फुट ऊंची रत्नजड़ित प्रतिमा के दर्शन भक्तों को दिव्य अनुभूति कराते हैं। भगवान के चार हाथों में अमृत कलश, शंख, चक्र और जोंक विराजमान हैं। प्रतिमा के दोनों ओर सेविकाएं चंवर डुलाती दिखाई देती हैं। पूरा स्वरूप आयुर्वेद, औषधि और आरोग्य की देव परंपरा का सजीव प्रतीक लगता है। धनतेरस के दिन यहां देश-विदेश से श्रद्धालु पहुंचते हैं। उनकी प्रार्थना में एक ही भाव प्रमुख रहता है—परिवार निरोग रहे, जीवन में व्याधियों का प्रवेश न हो और आरोग्य की कृपा बनी रहे। ऐसी लोकमान्यता है कि भगवान धन्वंतरि के दर्शन मात्र से वर्ष भर निरोग एवं व्याधिमुक्त रहने का आशीर्वाद मिलता है। इस तरह काशी में धनतेरस के दो अलग-अलग केंद्र एक ही भाव को विस्तार देते हैं। महामृत्युंजय मंदिर का धन्वंतरि कूप जहां अमृत और जीवन रक्षा की पौराणिक स्मृतियों को संजोए है, वहीं बुलानाला का धन्वंतरि निवास भगवान के साक्षात दर्शन और आरोग्य की कामना का केंद्र है।

धनतेरस : धन से पहले आरोग्य का स्मरण

कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को मनाया जाने वाला धनतेरस धनत्रयोदशी और धन्वंतरि जयंती के नाम से भी जाना जाता है। पांच दिवसीय दीपोत्सव का शुभारंभ इसी दिन से होता है। सामान्य तौर पर धनतेरस का नाम आते ही बाजार, सोना-चांदी, नए बर्तन, आभूषण और खरीदारी की तस्वीर उभरती है। दुकानों पर ग्राहकों की भीड़, सजे बाजार और नए सामान के साथ घर लौटते परिवार इस पर्व की बाहरी रौनक हैं। लेकिन इसके भीतर छिपा जीवन दर्शन इससे कहीं व्यापक है। धनतेरस का संबंध भगवान धन्वंतरि से है, इसलिए यह दिन स्वास्थ्य और आरोग्य के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का भी अवसर है। धन की सार्थकता तभी है, जब उसका उपभोग करने वाला शरीर स्वस्थ हो और मन प्रसन्न रहे। रोगों से घिरा जीवन संपन्नता के बावजूद अधूरा रह जाता है। इसीलिए भारतीय परंपरा ने धनतेरस को केवल आर्थिक समृद्धि का उत्सव नहीं बनाया, बल्कि आरोग्य को भी धन का सर्वोच्च स्वरूप माना। आयुर्वेद की दृष्टि से भी भगवान धन्वंतरि का स्मरण महत्वपूर्ण है। आयुर्वेद केवल रोग होने पर उपचार की पद्धति नहीं, बल्कि शरीर, मन, आहार, दिनचर्या और प्रकृति के बीच संतुलन बनाए रखने की जीवनशैली है। धनतेरस इसी संतुलन को याद करने का अवसर है। यह दिन हमें बताता है कि शरीर की देखभाल, स्वच्छता, संतुलित भोजन और संयमित दिनचर्या भी किसी बड़ी संपत्ति से कम नहीं।

कुबेर पूजन और यमदीप : समृद्धि के साथ जीवन रक्षा की कामना

धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि के साथ धन के अधिष्ठाता कुबेर और मृत्यु के देवता यमराज की पूजा की भी परंपरा है। कुबेर को धन-संपदा का रक्षक और उत्तर दिशा का लोकपाल माना जाता है। इस दिन घर और प्रतिष्ठानों में दीप जलाकर लक्ष्मी-कुबेर का पूजन किया जाता है। व्यापारी वर्ग के लिए नए बही-खाते, लेखा-जोखा और कारोबारी शुभारंभ का भी विशेष महत्व रहता है। इसी दिन संध्या में दक्षिण दिशा की ओर यमदीप जलाने की परंपरा है। आटे या मिट्टी के दीपक में तेल और बाती रखकर उसे यमराज को समर्पित किया जाता है। इसके पीछे मान्यता है कि दीपदान से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है। यह परंपरा मृत्यु से भयभीत होने के बजाय जीवन के महत्व को समझने का संदेश देती है। दीपक की छोटी-सी लौ मनुष्य को याद दिलाती है कि जीवन अनमोल है और उसकी रक्षा के लिए स्वास्थ्य, सदाचार और सत्कर्म आवश्यक हैं। काशी में इस भाव का विस्तार गंगा के घाटों तक दिखाई देता है। दीपदान की परंपरा में श्रद्धालु अपने परिवार की सुख-समृद्धि और दीर्घायु की कामना करते हैं। गंगा की धारा पर तैरते दीप मानो जीवन की उस ज्योति के प्रतीक बन जाते हैं, जिसे हर परिस्थिति में जलाए रखना है।

अमृत की खोज बाहर नहीं, जीवन के भीतर भी

समुद्र मंथन का प्रसंग केवल देवताओं और असुरों के संघर्ष की कथा नहीं, बल्कि भारतीय दर्शन में निरंतर प्रयास, धैर्य और आत्ममंथन का भी प्रतीक है। मंथन से विष भी निकला और अमृत भी। इसका संकेत है कि किसी भी बड़ी उपलब्धि के लिए कठिनाइयों और चुनौतियों से गुजरना पड़ता है। मनुष्य के जीवन में भी जब विचारों, कर्मों और दृष्टिकोण का निष्पक्ष मंथन होता है, तभी वास्तविक समृद्धि का मार्ग खुलता है। धनतेरस इसी आत्ममंथन का अवसर है। हम कितना धन अर्जित कर रहे हैं, इससे बड़ा प्रश्न यह है कि हमारा स्वास्थ्य कैसा है, हमारा मन कितना शांत है और हमारी समृद्धि से समाज को कितना लाभ मिल रहा है। प्रकृति की रक्षा, दूसरों के प्रति संवेदना, स्वच्छता और संयम भी आरोग्यपूर्ण जीवन के आधार हैं। धनतेरस पर जब बाजारों में सोने-चांदी की चमक होगी, घरों में नए बर्तन आएंगे और दीपों से आंगन जगमगाएंगे, तब काशी अपने धन्वंतरि कूप के जरिए एक पुराना लेकिन सबसे जरूरी संदेश दोहराएगी—धन जीवन को सुविधा दे सकता है, लेकिन जीवन को सार्थक बनाने के लिए आरोग्य जरूरी है। तिजोरी का धन घट-बढ़ सकता है, लेकिन स्वस्थ शरीर और शांत मन ही वास्तविक संपदा हैं। शायद इसीलिए काशी में धनतेरस केवल धन की आराधना का दिन नहीं, अमृत की कामना का पर्व भी है। यहां दीप केवल घरों में नहीं जलते, वे जीवन के प्रति आस्था और निरोग रहने की आकांक्षा को भी प्रकाशित करते हैं।

धन्वंतरि कूप की खासियत

महामृत्युंजय मंदिर परिसर के तीसरे खंड में स्थित प्राचीन कूप। स्थानीय मान्यता के अनुसार सात घाटों वाले इस कूप के जल की तासीर अलग-अलग है। राजा परीक्षित, नागराज तक्षक और धन्वंतरि से जुड़ा पौराणिक प्रसंग। आरोग्य, आयुर्वेद और जीवन रक्षा की आस्था का प्रमुख केंद्र।

बुलानाला में धन्वंतरि के दर्शन

लगभग 300 वर्ष पुरानी अष्टधातु की प्रतिमा। रजत सिंहासन पर विराजमान लगभग ढाई फुट ऊंचा विग्रह। चार हाथों में अमृत कलश, शंख, चक्र और जोंक। साल में केवल धनतेरस पर सार्वजनिक दर्शन की परंपरा। श्रद्धालु निरोगी जीवन और दीर्घायु की कामना लेकर पहुंचते हैं।

धनतेरस के पांच प्रमुख संदेश

धन से पहले स्वास्थ्य को महत्व दें। भगवान धन्वंतरि से आरोग्य की कामना करें। लक्ष्मी-कुबेर पूजन के साथ सदाचार से धन अर्जित करने का संकल्प लें। यमदीप जलाकर जीवन की रक्षा और दीर्घायु की प्रार्थना करें। मां अन्नपूर्णा की परंपरा से अन्नदान और लोककल्याण का संदेश ग्रहण करें।

जहां अमृत की बूंदों से कालजयी हुई काशी, वहां आज भी पूजे जाते हैं आरोग्य के देवता धन्वंतरि

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