Saturday, 27 June 2026

अब प्यास नहीं बनेगी परेशानी : काशी के चौराहों पर बहेगी राहत की ठंडी धार

अब प्यास नहीं बनेगी परेशानी : काशी के चौराहों पर बहेगी राहत की ठंडी धार 

भीषण गर्मी के बीच आमजन को बड़ी सौगातउत्तरी विधानसभा क्षेत्र में आर युक्त 14 वाटर कूलर होंगे संचालितराहगीरों, मजदूरों और व्यापारियों को मिलेगा शुद्ध शीतल पेयजल

सुरेश गांधी

वाराणसी। तपती दोपहर... आग उगलती सड़कें... और आसमान से बरसती धूप। ऐसे मौसम में यदि किसी प्यासे राहगीर को सार्वजनिक स्थान पर ठंडे और शुद्ध पानी का एक घूंट मिल जाए तो वह किसी राहत से कम नहीं होता। धर्म और संस्कृति की नगरी काशी में इसी राहत को जनसेवा का स्वरूप देने की पहल शुरू हुई है। शहर के प्रमुख चौराहों, व्यस्त बाजारों और घनी आबादी वाले क्षेत्रों में अब आरओ तकनीक से युक्त आधुनिक वाटर कूलर लगाए जा रहे हैं, ताकि भीषण गर्मी के बीच लोगों को सहज और नि:शुल्क शुद्ध पेयजल उपलब्ध हो सके।

प्रदेश के स्टाम्प एवं न्यायालय पंजीयन शुल्क राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) रविन्द्र जायसवाल ने शनिवार को गुलाबबाग स्थित अपने कार्यालय से छह नए आरओ युक्त वाटर कूलरों का वितरण किया। इसके साथ ही उत्तरी विधानसभा क्षेत्र में लगाए जा रहे सार्वजनिक वाटर कूलरों की संख्या बढ़कर 14 हो जाएगी। इससे पहले आठ स्थानों पर यह सुविधा शुरू की जा चुकी है। मंत्री ने कहा कि लगातार बढ़ते तापमान और आम नागरिकों की आवश्यकता को देखते हुए यह निर्णय लिया गया है। गर्मी के मौसम में सार्वजनिक स्थानों पर शुद्ध एवं ठंडा पेयजल उपलब्ध कराना केवल सुविधा नहीं, बल्कि सामाजिक दायित्व भी है। उन्होंने बताया कि प्रत्येक वाटर कूलर में आधुनिक रिवर्स ऑस्मोसिस (RO) प्रणाली लगी है, जिससे लोगों को स्वच्छ, सुरक्षित और शीतल पेयजल मिल सकेगा। इसका लाभ प्रतिदिन हजारों राहगीरों, रिक्शा एवं -रिक्शा चालकों, मजदूरों, दुकानदारों, विद्यार्थियों और श्रद्धालुओं को मिलेगा।

काशी देश-विदेश से आने वाले लाखों पर्यटकों और श्रद्धालुओं का शहर है। ऐसे में सार्वजनिक स्थानों पर पेयजल की बेहतर व्यवस्था केवल नागरिक सुविधा को मजबूत करती है, बल्कि शहर की मानवीय संवेदनशीलता और आतिथ्य संस्कृति को भी नई पहचान देती है। गर्मी के दिनों में अक्सर लोग प्यास बुझाने के लिए बोतलबंद पानी खरीदने को मजबूर होते हैं। ऐसे समय में यह पहल आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए भी बड़ी राहत साबित होगी। इस अवसर पर मंत्री रविन्द्र जायसवाल ने जल संरक्षण का संदेश देते हुए कहा कि पानी प्रकृति का अमूल्य उपहार है और इसका विवेकपूर्ण उपयोग समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उन्होंने लोगों से अपील की कि गर्मी में पर्याप्त मात्रा में पानी अवश्य पिएं, लेकिन इसकी एक-एक बूंद का महत्व भी समझें। सड़कों पर अनावश्यक पानी बहाना, वाहनों की धुलाई में अत्यधिक जल खर्च करना तथा जल की बर्बादी भविष्य के लिए गंभीर संकट को जन्म दे सकती है। यदि आज समाज जल संरक्षण के प्रति सजग होगा, तभी आने वाली पीढ़ियों के लिए पर्याप्त जल संसाधन सुरक्षित रह पाएंगे।

क्षेत्र में सार्वजनिक वाटर कूलर लगाए जाने की इस पहल का स्थानीय नागरिकों ने स्वागत किया है। लोगों का कहना है कि चिलचिलाती धूप में बाजार आने वाले ग्राहक, रोजाना मेहनत करने वाले श्रमिक, रिक्शा चालक, दुकानदार, विद्यार्थी और राहगीरों को इससे बड़ी राहत मिलेगी। कई नागरिकों ने इसे जनसहभागिता और जनसेवा का सकारात्मक उदाहरण बताया। नागरिकों का कहना हैं कि बढ़ते तापमान और लगातार पड़ रही लू के बीच सार्वजनिक पेयजल केंद्र किसी भी शहर की बुनियादी नागरिक सुविधाओं का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं। यदि ऐसे प्रयासों का विस्तार अन्य क्षेत्रों में भी किया जाए तो गर्मी से होने वाली स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को काफी हद तक कम किया जा सकता है। कार्यक्रम में अरविंद सिंह, पूर्व मंडल अध्यक्ष वी.सी. जायसवाल, रतन मौर्य, कमलेश सोनकर, पार्षद रोहित मिश्रा, पार्षद प्रत्याशी महेंद्र सिंह गौतम, जितेंद्र मिश्रा, विकास सिंह, सौरभ सिंह, सत्यप्रकाश जायसवाल, सुमित जायसवाल तथा पूर्व पार्षद रोहित मौर्या सहित अनेक जनप्रतिनिधि और स्थानीय नागरिक उपस्थित रहे।

प्यास बुझाने के साथ जल बचाने का भी संदेश

भीषण गर्मी केवल मौसम की चुनौती नहीं, बल्कि जल संकट की चेतावनी भी है। ऐसे समय में सार्वजनिक स्थानों पर आरओ युक्त वाटर कूलर लगाना मानवीय संवेदना और सुशासन का सराहनीय उदाहरण है। लेकिन इसके साथ यह भी उतना ही आवश्यक है कि समाज जल संरक्षण को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाए। यदि नागरिक सुविधाओं का विस्तार जल बचाने की सामूहिक जिम्मेदारी के साथ हो, तो यह पहल केवल राहत नहीं, बल्कि भविष्य की सुरक्षा का भी आधार बनेगी। काशी की यह शुरुआत अन्य शहरों के लिए भी अनुकरणीय मॉडल बन सकती है।

Friday, 26 June 2026

सिर्फ प्रशासन ही नहीं, अभिभावकों की चूक भी बढ़ा रही हादसों का खतरा

सिर्फ प्रशासन ही नहीं, अभिभावकों की चूक भी बढ़ा रही हादसों का खतरा

हादसे के बाद प्रशासन कार्रवाई करता है, संस्थानों पर कहीं बुलडोजर चलता है तो कहीं सील जैसी कार्रवाई होती है. और एफआईआर दर्ज होती है। लेकिन जिन परिवारों ने अपना बेटा या बेटी खो दिया, उनके लिए यह कार्रवाई बहुत देर से आती है। इसलिए जरूरत केवल सरकारी जांच की नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता की भी है। जब तक अभिभावक प्रवेश से पहले सुरक्षा को उतनी ही प्राथमिकता नहीं देंगे जितनी सफलता और परिणाम को देते हैं, तब तक ऐसे हादसों की आशंका बनी रहेगी। मतलब साफ है कोचिंग संस्थानों की चमक, ऊंचे रिजल्ट और मोटी फीस देकर परिजन निश्चिंत हो जाते है, लेकिन यह नहीं देखते कि जिस इमारत में बच्चा पढ़ रहा है, वहां सुरक्षा के इंतजाम हैं भी या नहीं. ऐसे में हादसों के बाद उठ रहा बड़ा सवाल तो यही है दाखिले से पहले सुरक्षा मानकों की पड़ताल क्यों नहीं करते अभिभावक

सुरेश गांधी

लखनऊ समेत देश के कई शहरों में कोचिंग संस्थानों और व्यावसायिक भवनों में हुई दुर्घटनाओं ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। क्या सिर्फ प्रशासन और संस्थान ही जिम्मेदार हैं, या फिर अभिभावकों की भी कोई जवाबदेही बनती है? अधिकांश अभिभावक नाम, रिजल्ट और चमक-दमक देखकर बच्चों का दाखिला करा देते हैं। लाखों रुपये फीस भरते हैं, लेकिन यह जानने की कोशिश नहीं करते कि भवन सुरक्षित है या नहीं, अग्निशमन व्यवस्था मौजूद है या नहीं, आपातकालीन निकास है या नहीं और संस्थान के पास आवश्यक अनुमति है या नहीं। जबकि किसी भी बच्चे की सुरक्षा की पहली जिम्मेदारी उसके अभिभावकों की होती है। यदि दाखिले से पहले वे कुछ बुनियादी बातें पूछें और सुरक्षा व्यवस्था की जानकारी लें, तो कई संभावित हादसों को रोका जा सकता है। जिस तरह स्कूल चुनते समय पढ़ाई के स्तर पर ध्यान दिया जाता है, उसी तरह सुरक्षा मानकों की जांच भी उतनी ही जरूरी है।

फिरहाल, लखनऊ में हाल के दर्दनाक अग्निकांड ने एक बार फिर पूरे देश को झकझोर दिया है। यह कोई पहली घटना नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में देश के अलग-अलग शहरों में कोचिंग संस्थानों, स्कूलों, अस्पतालों, होटलों और व्यावसायिक भवनों में आग, भवन ध्वस्त होने और दम घुटने जैसी घटनाओं में अनेक लोगों की जान जा चुकी है। हर हादसे के बाद एक जैसा घटनाक्रम सामने आता हैप्रशासन कार्रवाई करता है, अधिकारियों को निलंबित किया जाता है, संस्थानों पर मुकदमे दर्ज होते हैं और कुछ दिनों तक सख्ती दिखाई देती है। लेकिन कुछ समय बाद सब कुछ फिर पहले जैसा हो जाता है। इस पूरी तस्वीर में एक ऐसा पक्ष भी है, जिस पर चर्चा बहुत कम होती है। वह है अभिभावकों की भूमिका। यह कहना बिल्कुल उचित नहीं होगा कि हादसों के लिए अभिभावक कानूनी रूप से जिम्मेदार हैं। कानूनी और प्रशासनिक जिम्मेदारी संस्थानों और संबंधित विभागों की ही होती है। लेकिन सामाजिक दृष्टि से यह प्रश्न जरूर उठता है कि क्या बच्चों का दाखिला कराते समय अभिभावकों को सुरक्षा संबंधी बुनियादी बातों की जानकारी लेने का प्रयास नहीं करना चाहिए?

आज अधिकांश अभिभावक अपने बच्चों के भविष्य को लेकर बेहद चिंतित हैं। बेहतर शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता और उज्ज्वल करियर के लिए वे लाखों रुपये तक की फीस देने को तैयार रहते हैं। कोचिंग संस्थानों के आकर्षक विज्ञापन, टॉपरों की तस्वीरें, आधुनिक भवन और शानदार दावे उन्हें प्रभावित करते हैं। लेकिन शायद ही कोई अभिभावक यह पूछता हो कि जिस भवन में उसका बच्चा प्रतिदिन कई घंटे बिताएगा, वहां अग्निशमन के उपकरण काम कर रहे हैं या नहीं, आपातकालीन निकास का रास्ता है या नहीं, भवन मानकों के अनुरूप बना है या नहीं और संबंधित विभागों की अनुमति प्राप्त है या नहीं। विडंबना यह है कि घर खरीदते समय लोग हर दस्तावेज जांचते हैं, वाहन खरीदते समय उसकी सुरक्षा सुविधाएं देखते हैं, लेकिन बच्चों के जीवन से जुड़े संस्थान का चयन करते समय सुरक्षा अक्सर प्राथमिकता नहीं बन पाती। आज शिक्षा भी एक बड़े व्यावसायिक उद्योग का रूप ले चुकी है। कई कोचिंग संस्थान सीमित स्थान में हजारों विद्यार्थियों को बैठाकर पढ़ा रहे हैं। संकरी गलियां, एक ही सीढ़ी, बंद खिड़कियां, अवैध निर्माण, बिजली के उलझे तार और अग्निशमन व्यवस्था का अभाव आम बात बन चुकी है। ऐसे संस्थान वर्षों तक संचालित होते रहते हैं। यह निश्चित रूप से प्रशासनिक विफलता है, लेकिन समाज की चुप्पी भी इन व्यवस्थाओं को बढ़ावा देती है।

यदि अभिभावक प्रवेश के समय ही सुरक्षा मानकों की जानकारी मांगने लगें, फायर एनओसी, भवन स्वीकृति और आपातकालीन व्यवस्था के बारे में सवाल पूछें, तो संस्थानों पर स्वाभाविक दबाव बनेगा। जिस तरह आज अभिभावक शिक्षकों की गुणवत्ता, परिणाम और फीस की जानकारी लेते हैं, उसी तरह सुरक्षा को भी अनिवार्य प्रश्न बना दें तो स्थिति बदल सकती है। यह भी सच है कि हर अभिभावक तकनीकी विशेषज्ञ नहीं होता। वह भवन की मजबूती या अग्निशमन प्रणाली की तकनीकी जांच नहीं कर सकता। इसलिए उसकी भूमिका प्रशासन का स्थान लेना नहीं है। लेकिन वह इतना तो कर ही सकता है कि संस्थान से आवश्यक प्रमाणपत्रों और सुरक्षा व्यवस्था की जानकारी मांगे। यदि कोई संस्थान जानकारी देने से बचता है या सुरक्षा के प्रति लापरवाह दिखाई देता है, तो वहां अपने बच्चे का दाखिला कराने का निर्णय भी एक सामाजिक संदेश बन सकता है।

प्रशासन की जिम्मेदारी इससे कम नहीं हो जाती। नगर विकास प्राधिकरण, अग्निशमन विभाग, स्थानीय प्रशासन और शिक्षा विभाग की यह प्राथमिक जिम्मेदारी है कि बिना मानकों के कोई संस्थान संचालित ही हो। यदि अवैध निर्माण वर्षों तक चलता रहा, फायर एनओसी के बिना संस्थान खुलते रहे और निरीक्षण केवल कागजों तक सीमित रहे, तो इसकी जवाबदेही निश्चित रूप से संबंधित अधिकारियों पर तय होनी चाहिए। हादसे के बाद कार्रवाई करने से अधिक महत्वपूर्ण है कि हादसे की नौबत ही आने दी जाए। समाज को भी अपनी प्राथमिकताओं पर विचार करना होगा। आज कई अभिभावक संस्थान की वातानुकूलित कक्षाएं, डिजिटल बोर्ड और आकर्षक परिसर देखकर प्रभावित हो जाते हैं। लेकिन उन्हें यह भी देखना चाहिए कि यदि किसी आपात स्थिति में सैकड़ों बच्चे कुछ ही मिनटों में सुरक्षित बाहर निकल पाएंगे या नहीं। सुरक्षा कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं, बल्कि शिक्षा का अनिवार्य हिस्सा है।

देश के अनेक विकसित देशों में स्कूलों और शिक्षण संस्थानों में नियमित रूप से मॉक ड्रिल कराई जाती है। बच्चों को आग, भूकंप और अन्य आपदाओं से बचाव का प्रशिक्षण दिया जाता है। अभिभावकों को भी सुरक्षा संबंधी जानकारी उपलब्ध कराई जाती है। भारत में भी इस संस्कृति को विकसित करने की आवश्यकता है। सुरक्षा केवल सरकारी आदेशों से नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता से भी मजबूत होती है। हर बड़ा हादसा हमें कुछ सीख देकर जाता है। दुर्भाग्य यह है कि हम कुछ दिनों तक दुख व्यक्त करते हैं, मोमबत्तियां जलाते हैं, जांच आयोग गठित होते हैं और फिर सब कुछ सामान्य हो जाता है। यदि इस बार भी केवल दोष तय करने तक बात सीमित रही, तो आने वाले समय में फिर किसी शहर से ऐसी ही दुखद खबर सकती है। बच्चों का भविष्य केवल अच्छी शिक्षा से सुरक्षित नहीं होता, बल्कि सुरक्षित वातावरण से भी होता है। इसलिए अब समय गया है कि प्रशासन अपनी जवाबदेही निभाए, संस्थान नियमों का अक्षरशः पालन करें और अभिभावक भी दाखिले से पहले सुरक्षा को उतनी ही गंभीरता से लें जितनी वे परीक्षा परिणाम और सफलता को देते हैं। क्योंकि बच्चे की फीस दोबारा जमा की जा सकती है, लेकिन उसकी जिंदगी कभी वापस नहीं लाई जा सकती। यही संदेश इस पूरे विमर्श का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष होना चाहिए।

दाखिले से पहले बस पांच सवाल पूछ लीजिए,

शायद बच जाए आपके बच्चे की जिंदगी

कोचिंग संस्थानों और व्यावसायिक इमारतों में लगातार सामने रहे हादसों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अभिभावक अपने बच्चे का दाखिला कराने से पहले उसकी सुरक्षा को लेकर कोई पड़ताल करते हैं? जमीनी हकीकत बताती है कि अधिकांश मामलों में जवाब "नहीं" है। वाराणसी, लखनऊ, प्रयागराज, कानपुर और अन्य शहरों में कई कोचिंग संस्थानों के बाहर अभिभावकों से बातचीत में सामने आया कि उनकी पहली प्राथमिकता संस्थान का रिजल्ट, फैकल्टी, फीस और घर से दूरी होती है। बहुत कम लोग यह पूछते हैं कि भवन के पास फायर एनओसी है या नहीं, आपातकालीन निकास कितने हैं, आग लगने पर बच्चों को बाहर निकालने की क्या व्यवस्था है या भवन स्वीकृत मानकों के अनुरूप बना भी है या नहीं।

हादसा बाद पता चलता है भवन में आपातकालीन निकास बंद पड़ा था

कानून के अनुसार सुरक्षा सुनिश्चित करना संस्थान और प्रशासन की जिम्मेदारी है, लेकिन अभिभावकों की सतर्कता भी दुर्घटनाओं को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। यदि दाखिले के समय बड़ी संख्या में अभिभावक सुरक्षा प्रमाणपत्र देखने की मांग करने लगें तो संस्थानों पर नियमों का पालन करने का स्वाभाविक दबाव बनेगा। दुर्भाग्य से आज शिक्षा का बाजार इतना प्रतिस्पर्धी हो चुका है कि चमकदार विज्ञापन, एयर कंडीशनर कक्षाएं और टॉपरों के बड़े-बड़े पोस्टर अभिभावकों को आकर्षित कर लेते हैं, जबकि सुरक्षा संबंधी मूलभूत प्रश्न पीछे छूट जाते हैं। हादसा होने के बाद ही पता चलता है कि भवन में एक ही सीढ़ी थी, अग्निशमन यंत्र निष्क्रिय थे या आपातकालीन निकास बंद पड़ा था।

अनुमतियां हैं या नहीं

किसी भी अभिभावक को इंजीनियर या अग्निशमन विशेषज्ञ बनने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन कम से कम यह अवश्य पूछना चाहिए कि संस्थान के पास आवश्यक अनुमतियां हैं या नहीं। बच्चों का भविष्य केवल अच्छी पढ़ाई से नहीं, बल्कि सुरक्षित वातावरण से भी जुड़ा होता है।

दाखिले से पहले ये 5 सवाल जरूर पूछें

क्या भवन के पास वैध फायर एनओसी है?

आपातकालीन निकास (Emergency Exit) कितने हैं?

अग्निशमन यंत्र और अलार्म कार्यशील हैं या नहीं?

भवन स्वीकृत मानचित्र के अनुरूप बना है?

क्या संस्थान में नियमित सुरक्षा अभ्यास (मॉक ड्रिल) कराया जाता है?

याद रखेंअच्छी कोचिंग बच्चे का भविष्य बना सकती है, लेकिन सुरक्षित कोचिंग ही उसके जीवन की गारंटी बन सकती है।

अब प्यास नहीं बनेगी परेशानी : काशी के चौराहों पर बहेगी राहत की ठंडी धार

अब प्यास नहीं बनेगी परेशानी : काशी के चौराहों पर बहेगी राहत की ठंडी धार  भीषण गर्मी के बीच आमजन को बड़ी सौगात • उत्तरी...