Tuesday, 3 February 2026

टैरिफ की दीवार टूटी, कारपेट इंडस्ट्री में लौटी रौनक

50 फीसदी टैरिफ़ के संकट से उबरा हस्तनिर्मित कालीन उद्योग

टैरिफ की दीवार टूटी, कारपेट इंडस्ट्री में लौटी रौनक 

मोदी सरकार के समझौते से अमेरिकी बाज़ार फिर भारत के नाम

इंडिया यूएस बीटीए से 18 फीसदी शुल्क पर मिली नई सांस

25 लाख कारीगरों के चेहरे खिले

सुरेश गांधी

वाराणसी. वर्षों से ऊंचे टैरिफ की मार झेल रहे भारतीय हस्तनिर्मित कालीन उद्योग के लिए भारत - अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौता (इंडिया - यूएस बीटीए) किसी संजीवनी से कम नहीं साबित हुआ है। कालीन निर्यात संवर्धन परिषद (सीईपीसी) ने इस समझौते का स्वागत करते हुए इसे उस लंबे टैरिफ संकट से निर्णायक मुक्ति बताया है, जिसने बीते कुछ वर्षों में उद्योग की कमर तोड़ दी थी। कारोबारियों का कहना है कि अमेरिकी टैरिफ 50 प्रतिशत से घटकर 18 प्रतिशत किए जाने की घोषणा ने वर्षों से संकट झेल रहे भारतीय कालीन उद्योग में नई जान फूंक दी है। इस फैसले के बाद देश की प्रमुख कालीन पट्टी भदोही, मिर्ज़ापुर और वाराणसीउ में उत्साह का माहौल है। कालीन निर्यात संवर्धन परिषद सहित उद्योग से जुड़े संगठनों, निर्यातकों और कारीगर प्रतिनिधियों ने इसे ऐतिहासिक राहत बताते हुए मोदी सरकार की मुक्त कंठ से सराहना की है।

सीईपीसी के अनुसार, अमेरिकी बाजार भारतीय हस्तनिर्मित कालीनों का सबसे बड़ा खरीदार रहा है। भारत के कुल हस्तनिर्मित कालीन निर्यात का करीब 60 प्रतिशत हिस्सा अमेरिका को जाता है। लेकिन बीते वर्षों में अमेरिका द्वारा 50 फीसदी तक लगाए गए भारी टैरिफ ने भारतीय कालीनों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में सिर्फ पीछे ढकेल दिया, बल्कि इस परंपरागत उद्योग को गहरे संकट में डाल दिया था। नतीजा यह हुआ कि निर्यात घटा, ऑर्डर रुके, और भदोही, मिर्ज़ापुर, बनारस, कश्मीर और राजस्थान जैसे कालीन केंद्रों में लाखों कारीगरों की आजीविका पर संकट मंडराने लगा। वाराणसी, जो डिज़ाइन, फिनिशिंग और निर्यात प्रबंधन का अहम केंद्र है, वहां भी कारोबार ठहराव की स्थिति में पहुंच गया था। सीईपीसी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल और वस्त्र मंत्री गिरिराज सिंह के नेतृत्व में सरकार द्वारा की गई सतत और सशक्त व्यापार कूटनीति की सराहना की है। परिषद का कहना है कि सरकार ने वैश्विक मंचों पर भारतीय उद्योग की पीड़ा को मजबूती से रखा और उसी का परिणाम है कि अब भारतीय कालीनों के लिए अमेरिकी बाजार के दरवाज़े दोबारा खुल गए हैं।

इस ऐतिहासिक फैसले का स्वागत करते हुए सीईपीसी के पूर्व चेयरमैन सिद्धनाथ सिंह, परिषद के पूर्व प्रशासनिक सदस्य उमेश गुप्तामुन्ना’, योगेंद्र रायकाका’, संजय मेहरोत्रा, रवि पाटोदिया, ओपी गुप्ता, धरम प्रकाश गुप्ता, प्रहलाददास गुप्ता, संजय गुप्ता, बृजेश गुप्ता, राजेंद्र मिश्रा, घनश्याम शुक्ला, ओमकारनाथ मिश्रा, पूर्व मंत्री रंगनाथ मिश्रा, बच्चा मिश्रा सहित कई वरिष्ठ उद्योग प्रतिनिधियों ने इसे कालीन उद्योग के लिए टर्निंग पॉइंट बताया। एकमा के पूर्व अध्यक्ष हाजी शौकत अली अंसारी, वर्तमान अध्यक्ष रज़ा खान, अहसन रऊफ खान, असलम महबूब अंसारी, रोहित गुप्ता, कुलदीप राज बॉटल, कुंवर शमीम अंसारी, पंकज बरनवाल, रूपेश बरनवाल, डॉ. .के. गुप्ता, श्यानारायण यादव, छविराज पटेल, रवि बरनवाल, दीपक खन्ना, शारीक अंसारी, वासिफ अंसारी और रियाज़ुल हसनैन अंसारी ने भी सरकार के फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि इससे पूर्वांचल के गांव-गांव में फिर से काम और आत्मविश्वास लौटेगा।

सीईपीसी के चेयरमैन कैप्टन मुकेश गोम्बर ने कहा कि भारत - ईयू और भारत - यूके मुक्त व्यापार समझौतों से उद्योग को पहले ही कुछ राहत मिली थी, लेकिन भारत - अमेरिका समझौते ने वर्षों पुराने टैरिफ संकट पर निर्णायक प्रहार किया है। उन्होंने बताया कि अमेरिकी बाजार में कालीनों पर शुल्क 50 प्रतिशत से घटकर 18 प्रतिशत हो जाना भारतीय हस्तनिर्मित कालीनों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को पूरी तरह बहाल करता है। इससे सिर्फ निर्यातकों का आत्मविश्वास लौटा है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय खरीदार भी दोबारा भारत की ओर आकर्षित हो रहे हैं। सीईपीसी के उपाध्यक्ष असलम महबूब ने कहा कि ऊंचे टैरिफ के कारण जो उद्योग ठहराव और अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा था, वह अब नए वित्तीय वर्ष में उम्मीद और स्थिरता के साथ प्रवेश कर रहा है। उन्होंने कहा कि ये व्यापार समझौते 2 अरब डॉलर के भारतीय हस्तनिर्मित कालीन उद्योग को नई गति देंगे और देशभर में इससे जुड़े लगभग 25 लाख कारीगरों की आजीविका को मजबूती प्रदान करेंगे।

सीईपीसी की कार्यकारी निदेशक (प्रभारी) डॉ. स्मिता नागरकोटी ने बताया कि परिषद निर्यातकों और हितधारकों के लिए जागरूकता प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाएगी, ताकि इंडिया - यूएस, इंडिया - यूके और इंडिया ईयू व्यापार समझौतों से जुड़ी प्रक्रियाओं, नियमों और अवसरों की जानकारी जमीनी स्तर तक पहुंचे और कारीगर छोटे निर्यातक भी इनका पूरा लाभ उठा सकें। सीईपीसी ने स्पष्ट किया कि परिषद सरकार के साथ मिलकर काम करती रहेगी, ताकि टैरिफ संकट के अंधेरे से निकलकर भारतीय हस्तनिर्मित कालीन उद्योग एक बार फिर वैश्विक नेतृत्व की भूमिका निभा सके, औरमेड इन इंडियाकालीन दुनिया भर के बाज़ारों में अपनी चमक बिखेरते रहें।

रेडिएशन थेरेपी में कैंसर अस्पताल बना भरोसे का केंद्र

रेडिएशन थेरेपी में कैंसर अस्पताल बना भरोसे का केंद्र 

एमपीएमएमसीसी एचबीसीएच में 30% अधिक मरीजों को मिला उपचार,

छह आधुनिक मशीनों से रोजाना 350 कैंसर मरीजों की थैरेपी

सुरेश गांधी

वाराणसी। पूर्वांचल ही नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश और आसपास के पड़ोसी राज्यों के कैंसर मरीजों के लिए काशी अब उम्मीद और आधुनिक चिकित्सा का बड़ा केंद्र बनकर उभर रही है। महामना पंडित मदन मोहन मालवीय कैंसर केंद्र (एमपीएमएमसीसी) और होमी भाभा कैंसर अस्पताल (एचबीसीएच), वाराणसी में रेडिएशन थेरेपी की सुविधाओं में निरंतर विस्तार का सीधा लाभ मरीजों को मिल रहा है। यही वजह है कि वर्ष 2025 में इन दोनों संस्थानों में 2024 की तुलना में लगभग 30 प्रतिशत अधिक मरीजों को रेडिएशन थेरेपी दी गई।

विश्व कैंसर दिवस (4 फरवरी) के अवसर पर जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, दोनों अस्पतालों में वर्तमान में कुल छह अत्याधुनिक रेडिएशन मशीनें कार्यरत हैं, जिनकी मदद से प्रतिदिन औसतन 350 मरीजों को रेडिएशन उपचार उपलब्ध कराया जा रहा है। बीते वर्ष तीन नई मशीनों की स्थापना के बाद उपचार क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है, जिससे मरीजों को लंबा इंतजार नहीं करना पड़ रहा और इलाज समय पर संभव हो पा रहा है।

महामना पंडित मदन मोहन मालवीय कैंसर केंद्र के रेडिएशन ऑन्कोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. आशुतोष मुखर्जी के अनुसार, अस्पताल आने वाले करीब 60 से 65 प्रतिशत मरीजों को इलाज के किसी किसी चरण में रेडियोथेरेपी की आवश्यकता होती है। उन्होंने बताया कि जब वर्ष 2018 में अस्पताल की शुरुआत हुई थी, तब केवल 532 मरीजों को रेडिएशन थेरेपी दी जा सकी थी। वहीं, वर्ष 2025 में यह संख्या बढ़कर 4,735 तक पहुंच गई, जो सुविधाओं के विस्तार और मरीजों के बढ़ते भरोसे को दर्शाता है।

डॉ. मुखर्जी ने बताया कि शुरुआती वर्षों में अस्पताल में सिर्फ एक रेडिएशन मशीन उपलब्ध थी, जबकि आज एमपीएमएमसीसी और एचबीसीएच को मिलाकर कुल छह आधुनिक मशीनें मरीजों की सेवा में लगी हैं। इससे केवल इलाज की गति बढ़ी है, बल्कि गुणवत्ता में भी सुधार हुआ है। रेडिएशन थेरेपी लेने वाले मरीजों में लगभग 25 प्रतिशत मरीज मुख कैंसर से पीड़ित हैं, जिसका मुख्य कारण तंबाकू और इससे जुड़े उत्पादों का सेवन है। इसके बाद स्तन कैंसर के मरीजों की संख्या दूसरे स्थान पर है। एक मरीज को रेडिएशन थेरेपी का पूरा कोर्स करने में औसतन 35 दिन का समय लगता है, हालांकि मरीज की स्थिति और बीमारी की गंभीरता के अनुसार यह अवधि घट-बढ़ सकती है।

रेडिएशन विभाग के चिकित्सक डॉ. संबित स्वरूप नंदा ने बताया कि अस्पताल में अत्याधुनिक तकनीक से लैस मशीनें उपलब्ध हैं। सांस के साथ समन्वय कर रेडिएशन देना, त्वचा संबंधी कैंसर में विशेष तकनीक का उपयोग जैसी सुविधाएं यहां मौजूद हैं। हर मरीज की स्थिति के अनुसार उपचार योजना तैयार की जाती है, जिससे इलाज अधिक प्रभावी बन सके।

अस्पताल के निदेशक डॉ. सत्यजीत प्रधान ने बताया कि पिछले वर्ष शुरू की गई तीन नई रेडिएशन मशीनों में से दो का उद्घाटन माननीय प्रधानमंत्री द्वारा किया गया था। उन्होंने कहा कि संस्थान का लक्ष्य है कि प्रत्येक कैंसर मरीज को समय पर, निर्बाध और गुणवत्तापूर्ण उपचार उपलब्ध कराया जाए। इसके लिए भविष्य में भी सुविधाओं के विस्तार पर लगातार काम किया जा रहा है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, वर्ष 2022 में दुनियाभर में लगभग 20 मिलियन कैंसर के नए मामले सामने आए, जबकि 9.7 मिलियन लोगों की मौत इस बीमारी से हुई। ऐसे में समय पर जांच, प्रारंभिक अवस्था में पहचान और आधुनिक उपचार सुविधाएं ही कैंसर से लड़ने का सबसे बड़ा हथियार हैं। काशी के ये दोनों संस्थान इसी दिशा में एक मजबूत कदम बनकर उभरे हैं।

रेडिएशन थेरेपी पाने वाले मरीजों की संख्या

2018 : 532

2019 : 1153

2020 : 2090

2021 : 3050

2022 : 3264

2023 : 3307

2024 : 3641

2025 : 4735

यह आंकड़े साफ बताते हैं कि वाराणसी कैंसर उपचार के क्षेत्र में तेजी से एक भरोसेमंद चिकित्सा केंद्र के रूप में अपनी पहचान मजबूत कर रहा है।

टैरिफ की दीवार टूटी, कारपेट इंडस्ट्री में लौटी रौनक

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