Monday, 9 March 2026

टी-20 विश्व कप जीत पर काशी में जश्न की लहर, सिगरा चौराहे पर जलेबी बांटकर मनाई खुशी

टी-20 विश्व कप जीत पर काशी में जश्न की लहर,

सिगरा चौराहे पर जलेबी बांटकर मनाई खुशी 

व्यापार मंडल के नेतृत्व में व्यापारियों ने मनाया विजय उत्सव, “भारत माता की जयऔरटीम इंडिया जिंदाबादके नारों से गूंजा इलाका

सुरेश गांधी

वाराणसी। भारतीय क्रिकेट टीम द्वारा टी-20 विश्व कप जीतने की ऐतिहासिक उपलब्धि पर काशी में उल्लास और उत्साह का माहौल देखने को मिला। शहर के प्रमुख चौराहों और बाजारों में देर रात तक जश्न का माहौल बना रहा। सिगरा चौराहे पर वाराणसी व्यापार मंडल के अध्यक्ष अजीत सिंह बग्गा के नेतृत्व में व्यापारियों ने मिठाइयां और गर्मागर्म जलेबी वितरित कर टीम इंडिया की जीत का जश्न मनाया।

जैसे ही भारत की जीत की खबर पूरे देश में फैली, वैसे ही काशी में भी खुशी की लहर दौड़ पड़ी। सिगरा चौराहे पर बड़ी संख्या में व्यापारी और स्थानीय लोग एकत्रित हुए। यहां मिठाई और जलेबी बांटकर लोगों ने अपनी खुशी का इजहार किया। कई जगहों पर छोटे पटाखे छोड़े गए और युवाओं ने तिरंगा लहराते हुएवंदे मातरम्”, “भारत माता की जयऔरटीम इंडिया जिंदाबादके जोशीले नारे लगाए।

व्यापार मंडल के अध्यक्ष अजीत सिंह बग्गा ने कहा कि यह जीत पूरे देश के लिए गर्व का क्षण है। पहली बार भारत ने अपने ही घर में विश्व कप जीतकर नया इतिहास रचा है। उन्होंने कहा कि भारतीय टीम के खिलाड़ियों ने जिस जज्बे और उत्कृष्ट प्रदर्शन का परिचय दिया है, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनेगा। टीम के कप्तान और खिलाड़ियों की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि पूरी टीम ने एकजुट होकर खेल का बेहतरीन प्रदर्शन किया और भारत का नाम विश्व पटल पर और ऊंचा किया।

जश्न के दौरान लोगों में जबरदस्त उत्साह देखने को मिला। शहर के विभिन्न हिस्सों में युवाओं ने ढोल-नगाड़ों के साथ खुशी का इजहार किया। देर रात तक लोग एक-दूसरे को मिठाई खिलाते रहे और देश की इस ऐतिहासिक जीत पर गर्व महसूस करते रहे। कई जगहों पर लोग सड़कों पर निकलकर एक-दूसरे को बधाई देते नजर आए।

इस अवसर पर संजय गुप्ता, शरद गुप्ता, खुर्शीद बानो, आरती शर्मा, अंबे सिंह, रामबाबू शिवा, विकास, प्रभाकर सिंह, गौरव, मन्नू यादव और सुनील गुप्ता सहित बड़ी संख्या में व्यापारी और स्थानीय नागरिक उपस्थित रहे। सभी ने मिलकर टीम इंडिया की इस ऐतिहासिक जीत का जश्न मनाया और देश के उज्ज्वल भविष्य की कामना की। भारत की इस गौरवपूर्ण जीत ने काशीवासियों के दिलों में उत्साह और देशभक्ति की नई ऊर्जा भर दी। पूरी रात शहर में जश्न का माहौल बना रहा और काशी की गलियों में जीत की खुशी देर तक गूंजती रही।


सारनाथ के इतिहास में संशोधन : बाबू जगत सिंह को मिला उत्खनन का श्रेय

सारनाथ के इतिहास में संशोधन : बाबू जगत सिंह को मिला उत्खनन का श्रेय 

एएसआई ने बदला शिलापट्ट, औपनिवेशिक दौर की पुरानी मान्यता समाप्त

सुरेश गांधी

वाराणसी। विश्वप्रसिद्ध ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल सारनाथ के इतिहास में एक महत्वपूर्ण संशोधन किया गया है। प्रमाणिक दस्तावेजों और प्राथमिक ऐतिहासिक साक्ष्यों के विस्तृत अध्ययन के बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने स्वीकार किया है कि सारनाथ स्थल सर्वप्रथम बाबू जगत सिंह द्वारा कराए गए उत्खनन से प्रकाश में आया था। इस निर्णय के बाद सारनाथ परिसर में नया संशोधित शिलापट्ट स्थापित किया गया है, जिसमें बाबू जगत सिंह के योगदान को औपचारिक रूप से दर्ज किया गया है।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, नई दिल्ली द्वारा जारी पत्रांक एफ. . टी. -17/10/2024-ईई (35099) दिनांक 10 फरवरी 2026 के अनुसार सारनाथ परिसर में संशोधित शिलापट्ट लगाया गया है। इससे पूर्व भी एएसआई के पत्रांक एफ. . टी-17/10/2024-ईई दिनांक 26 दिसंबर 2024 के आधार पर धर्मराजिका स्तूप से संबंधित शिलापट्ट को संशोधित कर नया पट्ट स्थापित किया गया था। इतिहासकारों और शोधकर्ताओं का मानना है कि यह निर्णय भारतीय इतिहास लेखन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है और इससे लंबे समय से उपेक्षित एक ऐतिहासिक तथ्य को उचित स्थान मिला है।

18वीं सदी में शुरू हुआ था उत्खनन

इतिहास के अनुसार बाबू जगत सिंह ने 18वीं सदी के उत्तरार्ध में सारनाथ क्षेत्र में उत्खनन कार्य आरंभ कराया था। उस समय यह क्षेत्र काफी हद तक उपेक्षित और जंगलों से घिरा हुआ था। निर्माण कार्य और खुदाई के दौरान यहां प्राचीन अवशेषों और संरचनाओं के संकेत मिले, जिससे इस स्थान के ऐतिहासिक महत्व का पता चला। हालांकि यह तथ्य लंबे समय तक इतिहास के दस्तावेजों में प्रमुखता से दर्ज नहीं हो पाया। औपनिवेशिक काल के इतिहास लेखन में स्थानीय योगदानों को पर्याप्त स्थान नहीं मिलने के कारण बाबू जगत सिंह की भूमिका भी व्यापक रूप से सामने नहीं सकी।

सात वर्षों के शोध से सामने आया सत्य

पिछले कुछ वर्षों मेंबाबू जगत सिंह रॉयल फैमिली शोध समितिने इस विषय पर व्यापक शोध किया। समिति ने देश-विदेश के अभिलेखों, दस्तावेजों और प्राथमिक स्रोतों का अध्ययन कर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के समक्ष प्रमाण प्रस्तुत किए। समिति के अथक प्रयासों और प्रामाणिक साक्ष्यों के आधार पर एएसआई ने इस ऐतिहासिक तथ्य को स्वीकार किया और सारनाथ परिसर में शिलापट्ट को संशोधित करने का निर्णय लिया।

विद्वानों और संस्थाओं का मिला सहयोग

इस शोध कार्य में काशी के विद्वानों के साथ-साथ देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों के विशेषज्ञों का भी सहयोग मिला। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, कोलकाता विश्वविद्यालय, लखनऊ विश्वविद्यालय और पटना विश्वविद्यालय से जुड़े वर्तमान और सेवानिवृत्त शिक्षकों ने शोध सामग्री के अध्ययन में योगदान दिया। इसके अतिरिक्त वाराणसी गाइड एसोसिएशन, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण तथा काशी के विभिन्न धार्मिक और सामाजिक संगठनों ने भी इस प्रयास का समर्थन किया। इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया के साथ-साथ डिजिटल मीडिया और आकाशवाणी की भूमिका को भी शोध समिति ने महत्वपूर्ण बताया है।

विदेशों में मौजूद अवशेषों की होगी तलाश : प्रदीप नारायण सिंह

बाबू जगत सिंह की छठी पीढ़ी के वंशज और शोध समिति के संरक्षक प्रदीप नारायण सिंह ने कहा कि यह उपलब्धि पूर्वजों के आशीर्वाद और समाज के सहयोग का परिणाम है। उन्होंने कहा कि यह केवल उनके परिवार के लिए ही नहीं, बल्कि वाराणसी और पूरे देश की ऐतिहासिक विरासत के लिए गर्व का विषय है। उनके अनुसार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रेरणा से यह कार्य संभव हो पाया है। उन्होंने बताया कि शोध कार्य अभी जारी है और आने वाले समय में कई नए ऐतिहासिक तथ्य सामने लाए जाएंगे, जिन्हें देश के सामने रखा जाएगा।

अन्य ऐतिहासिक स्थलों पर भी शोध की जरूरत

प्रदीप नारायण सिंह ने इतिहासकारों और शोधकर्ताओं से अपील की कि नालंदा, भरूच और अमरावती जैसे ऐतिहासिक स्थलों पर भी प्राथमिक ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर नए शोध किए जाएं। उनका कहना है कि इससे भारतीय इतिहास के कई महत्वपूर्ण पहलू सामने सकते हैं। पत्रकार वार्ता के दौरान अधिवक्ता त्रिपुरारी शंकर, प्रो. राणा पी.बी. सिंह, अरविंद कुमार सिंह (एडवोकेट), अशोक आनंद, डॉ. (मेजर) अरविंद कुमार सिंह, वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र कुमार दुबे, मनीष खत्री, अवनीधर, एहसन अहमद, विकास और शमीम सहित कई लोग उपस्थित रहे। सभी वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि प्रमाणों और शोध पर आधारित इतिहास अंततः अपना स्थान बना ही लेता है। इतिहासकारों के अनुसार यह निर्णय केवल सारनाथ के इतिहास को नया आयाम देता है, बल्कि स्थानीय नायकों के योगदान को राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में पुनर्स्थापित करने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है।

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