Saturday, 18 April 2026

28 को काशी में ‘विकास पर्व’, पीएम मोदी का दो दिवसीय दौरा प्रस्तावित

28 को काशी मेंविकास पर्व’, पीएम मोदी का दो दिवसीय दौरा प्रस्तावित 

7000 करोड़ की सौगात, सिग्नेचर ब्रिज लोकार्पण से लाट भैरव सेतु शिलान्यास तक, प्रशासन हाई अलर्ट

महिला सशक्तिकरण पर बड़ा संदेश, जनसभा की भव्य तैयारी

सुरेश गांधी

वाराणसी। देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एक बार फिर अपने संसदीय क्षेत्र काशी को विकास की नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए तैयार हैं। 28 से 29 अप्रैल तक प्रस्तावित दो दिवसीय दौरे को लेकर जिला प्रशासन से लेकर केंद्र और राज्य की एजेंसियां पूरी तरह सक्रिय हो गई हैं। हालांकि कार्यक्रम की अंतिम तिथि का औपचारिक ऐलान अभी शेष है, लेकिन तैयारियों की रफ्तार इस बात का संकेत दे रही है कि काशी में जल्द ही एक बड़ा राजनीतिक और विकासात्मक आयोजन होने जा रहा है।

बता दें, संभावित इस दौरे कोविकास पर्वके रूप में तैयार किया जा रहा है, जिसमें करीब 7000 करोड़ की 100 से अधिक परियोजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास प्रस्तावित है। भाजपा संगठन और प्रशासनिक सूत्रों के मुताबिक, कार्यक्रम की टाइमिंग पश्चिम बंगाल चुनाव के प्रचार थमने और मतगणना के बीच तय किए जाने की रणनीति पर काम चल रहा है।

सिग्नेचर ब्रिज से लाट भैरव सेतु तक, इन्फ्रास्ट्रक्चर को रफ्तार

इस दौरे की सबसे बड़ी झलक काशी के बुनियादी ढांचे में बड़ा बदलाव होगी, सिग्नेचर ब्रिज का लोकार्पण, बाबा लाट भैरव सेतु का शिलान्यास, सड़क, रेल और खेल से जुड़ी परियोजनाओं का विस्तार, गंगा पार रामनगर क्षेत्र में सेंटर ऑफ एक्सीलेंस सहित कई योजनाएं भी प्रस्तावित हैं, जो काशी को आधुनिकता और परंपरा के संगम के रूप में स्थापित करेंगी.

अमृत 2.0 से बदलेगी पानी की तस्वीर

अमृत 2.0 के तहत पेयजल व्यवस्था को मजबूत करने के लिए बड़े पैमाने पर काम प्रस्तावित है, 814 करोड़ की पेयजल परियोजनाओं का शिलान्यास, वरुणा पार, रामनगर, सूजाबाद सहित 18 वार्डों में विस्तार, 651 किमी नई पाइपलाइन बिछेगी. करीब 3 लाख लोगों को सीधा लाभ, 67,886 घरों को शुद्ध जल आपूर्ति से जोड़ा जाएगा, इसके अलावा 98 करोड़ की लागत से नगर निगम के नए सदन भवन का शिलान्यास भी कार्यक्रम का हिस्सा होगा।

बरेका में ठहराव, जनसभा से राजनीतिक संदेश

दौरे के दौरान प्रधानमंत्री का ठहराव बरेका में प्रस्तावित है। यहीं से कार्यक्रमों का संचालन होगा। इस दौरान एक भव्य जनसभा की भी तैयारी, पूर्वांचल को साधने और विकास एजेंडा को धार देने की रणनीति, संगठन और प्रशासन के बीच समन्वय तेज हो गया है.

बाबा विश्वनाथ और कालभैरव दर्शन

अपने पारंपरिक काशी दौरे की तरह प्रधानमंत्री काशी विश्वनाथ मंदिर और काल भैरव मंदिर में दर्शन-पूजन भी करेंगे। इससे विकास और आस्था, दोनों संदेश एक साथ जाएंगे।

सुरक्षा और व्यवस्थाओं पर कड़ी नजर

प्रस्तावित दौरे को लेकर सुरक्षा व्यवस्था अभूतपूर्व स्तर पर तैयार की जा रही है। पुलिस आयुक्त मोहित अग्रवाल और जिलाधिकारी सत्येंद्र कुमार ने बरेका से लेकर सड़क मार्ग की स्थिति कार्यक्रम स्थल का निरीक्षण, प्रवेश/निकास द्वारों की व्यवस्था, भीड़ नियंत्रण और बैरिकेडिंग, हेलीपैड, वीवीआईपी एंट्री और ड्रॉपिंग जोन, पार्किंग और आपातकालीन मार्ग, सभी पहलुओं पर अपनी पैनी निगाह लगाएं हुए है. संवेदनशील स्थानों पर सीसीटीवी कवरेज बढ़ाने और सुरक्षा बलों की तैनाती के निर्देश दिए गए हैं। यातायात व्यवस्था के लिए शहर में व्यापक डायवर्जन प्लान लागू किया जाएगा, ताकि आम जनजीवन प्रभावित हो और वीवीआईपी मूवमेंट निर्बाध रहे।

राजनीतिक टाइमिंग और रणनीति

यह दौरा केवल विकास परियोजनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी राजनीतिक टाइमिंग भी अहम मानी जा रही है, बंगाल चुनाव प्रचार के बाद काशी से संदेश. मतगणना के बीच राष्ट्रीय फोकस को साधने की कोशिश, “काशी मॉडलको फिर राष्ट्रीय विमर्श में लाने की रणनीति. मतलब साफ है काशी एक बार फिर इतिहास रचने को तैयार है। 7000 करोड़ की परियोजनाएं, आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर, सुदृढ़ पेयजल व्यवस्था और आस्था के केंद्रों से जुड़ा यह दौरा काशी को नए युग में ले जाने का संकेत देता है। विकास, राजनीति और आध्यात्मिकता, तीनों के संगम से यह दौरा केवल वाराणसी, बल्कि पूरे देश के लिए एक बड़ा संदेश साबित हो सकता है।  

डिजिटल दानव का शिकंजा : “फेसबुकिया जाल” में फंसती बेटियां, बिखरते परिवार और बेबस कानून!

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लखनऊ से लेकर वाराणसी तक, ग्राउंड रिपोर्ट में सामने आई सच्चाई, सोशल मीडिया की आड़ में छल, शोषण और टूटते जीवन

फर्जी पहचान, भ्रामक रिश्ते, अश्लील और अनियंत्रित कंटेंट, तकनीक के नाम पर समाज को निगलता एक खतरनाक ट्रेंड

ऑनलाइन रिश्तों के नाम पर बढ़ता अपराध; सवालों के घेरे में सिस्टम, प्लेटफॉर्म और समाज

नियंत्रण की लड़ाई, मुनाफे की दौड़ और समाज पर असर, क्या सिस्टम फेल हो रहा है या सवाल गलत जगह उठ रहे हैं?

सुरेश गांधी

वाराणसी. डिजिटल क्रांति के जिस दौर को कभी संवाद, अभिव्यक्ति और अवसरों की नई सुबह माना गया था, वही आज एक खतरनाक मोड़ पर खड़ा दिखाई दे रहा है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, खासतौर पर मेटा के स्वामित्व वाला फेसबुक, अब केवल कनेक्टिविटी का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक असंतुलन, अपराध और नैतिक गिरावट का एक बड़ा कारण बनता जा रहा है। ऐसे में बड़ा सवाल तो यही है, क्या हम तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं, या तकनीक हमें इस्तेमाल कर रही है?

देश के अलग-अलग हिस्सों, उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, से रही घटनाएं यह बताने के लिए काफी हैं किफेसबुकिया जालअब केवल एक वर्चुअल खतरा नहीं रहा, बल्कि यह वास्तविक जीवन को निगलने लगा है। फर्जी प्रोफाइल, अश्लील कंटेंट, ऑनलाइन रिश्तों के नाम पर शोषण और ब्लैकमेल, यह सब मिलकर एक ऐसा खतरनाक इकोसिस्टम बना चुके हैं, जिसमें सबसे ज्यादा शिकार हो रही हैं महिलाएं और युवतियां।

फर्जी पहचान : डिजिटल अपराध का सबसे बड़ा हथियार

आज सोशल मीडिया की सबसे बड़ी कमजोरी है, “पहचान की अस्थिरता साइबर अपराध के आंकड़े बताते हैं कि आधे से ज्यादा मामलों में फर्जी प्रोफाइल का इस्तेमाल होता है। अपराधी खुद कोआर्मी अफसर”, “सरकारी कर्मचारीयाडॉक्टरबताकर भरोसा जीतते हैं, फिर भावनात्मक जाल बिछाते हैं और अंत में ब्लैकमेल, आर्थिक ठगी या मानसिक उत्पीड़न शुरू हो जाता है। लखनऊ, वाराणसी और भदोही जैसे शहरों से सामने आए मामलों में एक ही पैटर्न दिखता है, पहले दोस्ती, फिर भरोसा, फिर निजी जानकारी और अंत में शोषण। कई मामलों में पीड़िताएं सामाजिक बदनामी के डर से शिकायत तक नहीं करतीं, जिससे अपराधियों के हौसले और बुलंद हो जाते हैं।

कानून हैं, लेकिन पकड़ क्यों नहीं?

भारत में इन फारमेशन टेक्नोलॉजी एक्ट 2000 और भारतीय दंड संहिता की धाराएं (420, 354डी, 506) स्पष्ट रूप से ऐसे अपराधों पर कार्रवाई का प्रावधान देती हैं। बावजूद इसके, सवाल वही, आरोपी पकड़े क्यों नहीं जाते? जवाब साफ है, कानून मजबूत हैं, लेकिन क्रियान्वयन कमजोर। साइबर अपराधी वीपीएन, अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क और फर्जी डिजिटल पहचान का इस्तेमाल कर जांच एजेंसियों को चुनौती दे रहे हैं। साइबर पुलिस के पास संसाधनों और तकनीकी दक्षता की कमी भी एक बड़ी बाधा है।

अश्लीलता का खेलःवायरलकी अंधी दौड़

सोशल मीडिया की सबसे बड़ी ताकत, “वायरल होने की क्षमता”, आज उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन चुकी है। प्लेटफॉर्म परबॉर्डरलाइन कंटेंटऔरसजेस्टिव वीडियोकी बाढ़ है। भले ही कंपनी नग्नता पर प्रतिबंध की बात करती हो, लेकिन एल्गोरिदम ऐसे कंटेंट को बढ़ावा देता है जो ज्यादा एंगेजमेंट लाए। यहां असली सवाल उठता है, क्या प्राथमिकतानैतिकताहै यामुनाफा”? क्योंकि जितना ज्यादा यूजर स्क्रीन पर रुकेगा, उतना ज्यादा विज्ञापन और उतनी ज्यादा कमाई।

एल्गोरिदम : अदृश्य लेकिन सबसे ताकतवर खिलाड़ी

सोशल मीडिया का असली नियंत्रण किसी इंसान के हाथ में नहीं, बल्कि एल्गोरिदम के हाथ में है। यह तय करता है कि आपको क्या दिखेगा, कितना दिखेगा और कितनी बार दिखेगा। समस्या यह है कि यहसंवेदनशीलतानहीं, बल्किएंगेजमेंटको प्राथमिकता देता है। नतीजा : उत्तेजक, विवादास्पद और अश्लील कंटेंट तेजी से फैलता है, जबकि संतुलित और सकारात्मक सामग्री पीछे छूट जाती है। यानी प्लेटफॉर्म सीधे तौर पर गलत कंटेंट भी दिखाए, तो भी उसका सिस्टम उसे बढ़ावा जरूर देता है।

सरकार बनाम सोशल मीडिया : सख्ती या समझौता?

जब पीएम मोदी और मार्क जुकरबर्ग एक मंच साझा करते हैं, डिजिटल इंडिया की बात होती है, तो यह स्वाभाविक है कि लोगों के मन में सवाल उठते हैं। क्या सरकार कंपनियों पर सख्ती नहीं कर रही? या यह पूरा सिस्टम ही नियंत्रण से बाहर हो चुका है? हकीकत यह है कि सरकार ने आईटी नियम 2021 लागू किए हैं, जिनमें सोशल मीडिया कंपनियों को जवाबदेह बनाया गया है, ग्रिवांस ऑफिसर, समयबद्ध कार्रवाई और डेटा साझा करने के प्रावधान। कई बार सरकार और कंपनियों के बीच टकराव भी सामने आया है। लेकिन जमीनी स्तर पर सुधार की गति बेहद धीमी है।

सबसे बड़ा नुकसानः महिलाएं और युवा

ऑनलाइन उत्पीड़न, मॉर्फ्ड फोटो, ट्रोलिंग और ब्लैकमेल, यह सब अबडिजिटल हिंसाका रूप ले चुका है। नेशनल और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स बताती हैं कि महिलाएं इस डिजिटल अराजकता की सबसे बड़ी शिकार हैं। कई मामलों में मानसिक दबाव इतना बढ़ जाता है कि पीड़ित आत्मघाती कदम तक उठा लेते हैं।  युवा वर्ग भी भ्रमित हो रहा है, ऑनलाइन रिश्तों में तेजी से विश्वास, फिर धोखा, फिर मानसिक आघात। यह केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक संकट है।  

समाज पर असरः टूटते रिश्ते, बढ़ता तनाव

यह समस्या अब केवल मोबाइल स्क्रीन तक सीमित नहीं रही। इसके प्रभाव घरों तक पहुंच चुके हैं, परिवारों में अविश्वास बढ़ रहा है. रिश्ते टूट रहे हैं. युवाओं में मानसिक तनाव बढ़ रहा है. अपराध का दायरा फैल रहा है. सोशल मीडिया अब समाज का दर्पण नहीं, बल्कि उसकाविकृत प्रतिबिंबबनता जा रहा है।

जिम्मेदारी तय करनी होगी

अब सबसे बड़ा सवाल, दोषी कौन? प्लेटफॉर्म, सरकार या समाज? सच्चाई यह है, तीनों जिम्मेदार हैं। सरकार को कानून का सख्ती से पालन कराना होगा. सोशल मीडिया कंपनियों को एल्गोरिदम पारदर्शी बनाना होगा, और फर्जी अकाउंट्स पर तुरंत कार्रवाई करनी होगी. समाज को डिजिटल साक्षरता बढ़ानी होगी और सतर्क रहना होगा.

अब नहीं चेते तो देर हो जाएगी

यह केवल तकनीक का मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा और नैतिक संतुलन का सवाल है। अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तोडिजिटल इंडियाका सपनाडिजिटल अराजकतामें बदल सकता है। आज जरूरत है, नियंत्रण की, जवाबदेही की और जागरूकता की। क्योंकि अगर अभी भी हम नहीं जागे, तो आने वाला समय सिर्फ डिजिटल नहीं, बल्कि सामाजिक आपदा का समय होगा, जहां डेटा नहीं, बल्कि इंसान सबसे बड़ा नुकसान उठाएगा।  

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