Thursday, 2 April 2026

काशी में उतरेगा विक्रम युग : हाथी-घोड़े, रथ और 200 कलाकारों संग जीवंत होगी सम्राट विक्रमादित्य की गाथा

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और डॉ. मोहन यादव की उपस्थिति में आज से होगा इस महानाट्य का शुभारंभ  

काशी में उतरेगा विक्रम युग : हाथी-घोड़े, रथ और 200 कलाकारों संग जीवंत होगी सम्राट विक्रमादित्य की गाथा

विक्रमोत्सव-2026 में बीएलडब्ल्यू मैदान बनेगा प्राचीन भारत का मंच, आतिशबाजी के बीच सजेगा इतिहास,

तीन दिन चलेगा भव्य महानाट्य,  दिखेगा शौर्य, धर्म और सुशासन

सुरेश गांधी

वाराणसी। शिव की नगरी काशी एक बार फिर इतिहास के स्वर्णिम अध्यायों को सजीव होते देखने जा रही है। विक्रमोत्सव-2026 के अंतर्गत 3 अप्रैल से बीएलडब्ल्यू मैदान मेंसम्राट विक्रमादित्यमहानाट्य का भव्य मंचन शुरू होगा। यह आयोजन केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि भारतीय अस्मिता, परंपरा और गौरव के पुनर्जागरण का महायज्ञ बनकर उभर रहा है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की उपस्थिति में इस महानाट्य का शुभारंभ होगा। उज्जैन की ऐतिहासिक धरती से उठी विक्रमादित्य की गाथा अब काशी के मंच पर अपने समूचे वैभव और जीवंतता के साथ प्रकट होगी।

जब मंच पर जीवित होगा इतिहास

बीएलडब्ल्यू मैदान में तैयार किए जा रहे तीन भव्य मंच इस आयोजन की विराटता के साक्षी बनेंगे। केंद्र में विशाल मुख्य मंच और दोनों ओर सहायक मंचों पर सिंहासन बत्तीसी, बेताल पच्चीसी और भविष्य पुराण के प्रसंगों के माध्यम से सम्राट विक्रमादित्य के अद्वितीय व्यक्तित्व को उकेरा जाएगा। यह प्रस्तुति केवल कथा नहीं, बल्कि एक युग का पुनर्सृजन हैजहाँ न्याय केवल शब्द नहीं, शासन का आधार था; जहाँ ज्ञान, विज्ञान और संस्कृति अपने उत्कर्ष पर थे। नवरत्नों की विद्वता, दरबार की गरिमा और राजा के निर्णयों की निष्पक्षतासब कुछ दर्शकों के सामने सजीव होगा।

हाथी-घोड़े, रथ और रोशनी में सजेगा वैभव

इस महानाट्य की सबसे बड़ी विशेषता इसकी जीवंतता है। 200 से अधिक कलाकारों के साथ 18 घोड़े, 2 रथ, 4 ऊँट, 1 पालकी और 1 हाथी मंच पर उतरेंगे। युद्ध दृश्य, राजदरबार, धार्मिक अनुष्ठान और लोकजीवनहर दृश्य वास्तविकता का आभास कराएगा। 400 से अधिक आधुनिक लाइट्स, विशाल एलईडी स्क्रीन और भव्य आतिशबाजी इस आयोजन को दृश्यात्मक रूप से अद्वितीय बनाएगी। दर्शक केवल नाटक नहीं देखेंगे, बल्कि एक युग को जीएंगे।

महाकाल से काशी तकआस्था का सेतु

लेफ्ट मंच पर उज्जैन के महाकाल मंदिर की भव्य प्रतिकृति और शिवलिंग पर भस्म आरती का दृश्य आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार करेगा। यह आयोजन केवल ऐतिहासिक नहीं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक चेतना का संगम भी है। इसी क्रम में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा बाबा विश्वनाथ कोविक्रमादित्य वैदिक घड़ीका अर्पण किया जाएगा। यह घड़ी भारतीय कालगणना की प्राचीन परंपरा और आधुनिक तकनीक का अद्भुत संगम है, जो समय को सूर्योदय आधारित वैदिक प्रणाली से जोड़ती है।

सांस्कृतिक एकता और जागरण का संदेश

काशी में मध्य प्रदेश के कलाकारों द्वारा इस महानाट्य का मंचन केवल एक प्रस्तुति नहीं, बल्कि उत्तर और मध्य भारत के सांस्कृतिक सेतु का प्रतीक है। यह आयोजन उस भारत की झलक दिखाता है, जहाँ विविधता में एकता केवल विचार नहीं, जीवन शैली थी। सम्राट विक्रमादित्य का चरित्र आज भी उतना ही प्रासंगिक हैन्यायप्रियता, प्रजा के प्रति समर्पण और राष्ट्र के प्रति अटूट निष्ठा का प्रतीक। यह महानाट्य नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने और गौरव का बोध कराने का माध्यम बन रहा है।

शहर में उत्साह, उमड़ रही भीड़

बीएलडब्ल्यू मैदान में चल रही तैयारियों और रिहर्सल को देखने के लिए भी बड़ी संख्या में लोग पहुंच रहे हैं। वाराणसी के नागरिकों में इस आयोजन को लेकर खासा उत्साह है और 3 से 5 अप्रैल तक चलने वाले इस महानाट्य को देखने के लिए लोग बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। काशी की पावन धरती परसम्राट विक्रमादित्यमहानाट्य केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास, संस्कृति और आत्मगौरव का पुनर्पाठ है। यह वह क्षण है, जब अतीत वर्तमान के मंच पर उतरकर भविष्य को दिशा देता हैऔर काशी, एक बार फिर उस गौरवगाथा की साक्षी बनने को तैयार है।

काशी हुई ‘राममय’ : हर तरफ ध्वजों का समंदर व डमरू की रही गूंज

काशी हुईराममय : हर तरफ ध्वजों का समंदर डमरू की रही गूंज 

सुंदरपुर से निकली संकटमोचन तक 5.25 किमी लंबी ऐतिहासिक ध्वज यात्रा, एक लाख पताकाएं, 1100 गदाधारी भक्त

रथ पर सजी श्रीराम झांकी, 30 हजार श्रद्धालुओं के जनसैलाब में डूबी शिवनगरी  

सुरेश गांधी

वाराणसी. भगवान शिव की नगरी काशी में हनुमान जयंती का पर्व इस बार केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक विराटता का ऐसा अद्भुत दृश्य बनकर सामने आया, जिसने पूरे शहर कोराममयऔरहनुमंतमयकर दिया। 

बृहस्पतिवार की सुबह जैसे ही सूरज की किरणें गंगा तट पर पड़ीं, वैसे ही काशी की गलियांजय श्रीरामऔरजय हनुमानके उद्घोष से गूंज उठीं। 

ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो पूरा शहर एक साथ भक्ति के महासागर में डुबकी लगा रहा हो।

हर ओर भगवा ध्वज लहरा रहे थे, मंदिरों में घंटियों की अनुगूंज थी और सड़कों पर उमड़ी भीड़ में एक अद्भुत उत्साह दिखाई दे रहा था। 

काशी ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि यहां पर्व केवल मनाए नहीं जाते, बल्कि पूरी आत्मा से जिए जाते हैं। 

इस भव्य आयोजन का केंद्र रही सुंदरपुर से संकटमोचन मंदिर तक निकली काशी की सबसे विशाल ध्वज यात्रा, जिसने आस्था के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया। 

करीब 5.25 किलोमीटर लंबी इस यात्रा में एक लाख से अधिक ध्वजों का समुद्र लहराता नजर आया, जिसने सड़कों को भगवामय कर दिया।

यात्रा में शामिल श्रद्धालुओं का उत्साह देखते ही बन रहा था। 1100 गदाधारी भक्तों की टोली, हाथों में गदा और डमरू लिए जब आगे बढ़ी, तो हर कदम के साथहर-हर महादेवऔरजय बजरंगबलीका गगनभेदी उद्घोष वातावरण को रोमांचित कर रहा था। 

डमरू की लय और श्रद्धा की ऊर्जा ने इस यात्रा को एक अलौकिक अनुभव में बदल दिया। यात्रा का सबसे आकर्षक केंद्र रहा लंबा भव्य रथ, जिस पर भगवान श्रीराम की सजीव झांकी सजाई गई थी। 

रथ के साथ चल रही श्रीराम दरबार, शिव दरबार और बाबा के गणों की झांकियों ने श्रद्धालुओं को भक्ति में सराबोर कर दिया। 

वहीं मसाननाथ की झांकियां काशी की अद्वितीय आध्यात्मिक और तांत्रिक परंपरा का जीवंत चित्र प्रस्तुत कर रही थीं।

इस विराट आयोजन में 30 हजार से अधिक श्रद्धालु शामिल हुए, जिनमें लगभग 15 हजार महिलाओं की भागीदारी ने इस आयोजन को और अधिक गरिमा प्रदान की। 

51 महिलाओं द्वारा सामूहिक आरती का दृश्य श्रद्धा, शक्ति और समर्पण का अद्भुत संगम बन गया। 

वहीं करीब 1200 भक्त गदा लिए यात्रा में शामिल हुए, जो बजरंगबली की वीरता और भक्तिभाव का प्रतीक थे। पूरे शहर में इस अवसर पर धार्मिक अनुष्ठानों की धूम रही। मंदिरों में सुंदरकांड और हनुमान चालीसा का अखंड पाठ हुआ, तो वहीं प्रभात फेरियों ने भक्ति की अलख जगाई। धर्मसंघ द्वारा आयोजित 15 दिवसीय प्रभातफेरी का समापन भी इसी दिन हुआ, जिसमें जगह-जगह रामचरितमानस और सुंदरकांड का पाठ कर भक्तों को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया गया।

यात्रा के समापन पर संकटमोचन मंदिर में भगवान हनुमान और श्रीराम को रजत ध्वज अर्पित किया गया। 

यह क्षण अत्यंत भावुक और दिव्य था, जब हजारों श्रद्धालु एक साथ प्रभु के चरणों में नतमस्तक होकर अपनी आस्था अर्पित कर रहे थे। 

इधर, शहर के प्रमुख मंदिरों, श्री काशी विश्वनाथ मंदिर, बड़े महाबीर मंदिर अर्डलीबाजार, प्राचीन हनुमान मंदिर, पांडेयपुर समेत सभी हनुमान मंदिरों, में सुबह से ही श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगी रहीं। 

दर्शन-पूजन के लिए उमड़ी भीड़ ने यह स्पष्ट कर दिया कि काशी में हनुमान जयंती केवल एक पर्व नहीं, बल्कि जन-जन की आस्था का उत्सव है। 

शहर के विभिन्न हिस्सों में शोभायात्राएं निकाली गईं, भंडारों का आयोजन हुआ और जगह-जगह प्रसाद वितरण किया गया। 

डीजे पर बजते बजरंगबली के भजनों पर श्रद्धालु नाचते-गाते नजर आए, जिससे पूरे शहर में उत्सव का वातावरण और भी जीवंत हो उठा। 

हनुमान जयंती के इस भव्य आयोजन ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया कि काशी की पहचान केवल उसके घाटों और मंदिरों से नहीं, बल्कि उस अदृश्य आस्था से है, जो हर पर्व पर जनसैलाब बनकर उमड़ पड़ती है। 

यहां हर ध्वज केवल एक प्रतीक नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति की उस निरंतर प्रवाहित होती धारा का प्रतीक है, जो युगों से लोगों को जोड़ती आई है। 

काशी ने इस बार भी दिखा दियाकृयह केवल एक शहर नहीं, बल्कि भक्ति का वह अनंत आकाश है, जहां हर जयघोष सीधे ईश्वर तक पहुंचता है।

काशी में उतरेगा विक्रम युग : हाथी-घोड़े, रथ और 200 कलाकारों संग जीवंत होगी सम्राट विक्रमादित्य की गाथा

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