Saturday, 2 May 2026

विकास की रफ्तार, कानून का भरोसा : 2027 में फिर बनेगी योगी सरकार

विकास की रफ्तार, कानून का भरोसा : 2027 में फिर बनेगी योगी सरकार 

तुष्टिकरण नहीं विकास है असली मुद्दा…सुरक्षा और सबका साथ ही बनेगा जीत का आधार : सरवर सिद्दीकी  सौहार्द

सुरेश गांधी

वाराणसी। उत्तर प्रदेश की सियासत जैसे-जैसे 2027 के विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ रही है, राजनीतिक बयानबाज़ी भी तेज़ होती जा रही है। इसी क्रम में भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य सरवर सिद्दीकी ने बड़ा दावा करते हुए कहा है कि प्रदेश में एक बार फिर योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में सरकार बनना तय है। उन्होंने कहा कि यह जीत किसी एक वर्ग या मुद्दे की नहीं, बल्कि विकास, सामाजिक सौहार्द और अपराध मुक्त शासन की त्रिवेणी पर आधारित होगी। 

सिद्दीकी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि बीते वर्षों में उत्तर प्रदेश ने जिस तरह कानून-व्यवस्था के क्षेत्र में सुधार देखा है, वह अभूतपूर्व है। आज प्रदेश में अपराधियों के मन में भय है और आम नागरिक के भीतर विश्वास। यही भरोसा 2027 में जनादेश में बदलेगा.  उन्होंने कहा भाजपा सरकार ने विकास को जाति और धर्म से ऊपर उठाकर देखा है। सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में हुए कार्यों का लाभ हर वर्ग को मिला है। पहले योजनाएं कागजों में सिमट जाती थीं, अब ज़मीन पर उतरती हैं और लोगों के जीवन में बदलाव लाती हैं.

अल्पसंख्यकों के बीच बढ़ा विश्वास

सरवर सिद्दीकी ने दावा किया कि प्रदेश में अल्पसंख्यक समाज के बीच भी सरकार के प्रति विश्वास बढ़ा है। उन्होंने कहा कि अब राजनीति तुष्टिकरण के बजाय सशक्तिकरण की ओर बढ़ी है। सरकार की योजनाओं का लाभ बिना भेदभाव के हर जरूरतमंद तक पहुंचा है। यही कारण है कि अल्पसंख्यक वर्ग भी विकास की इस धारा से खुद को जुड़ा महसूस कर रहा है.

सौहार्द बना सबसे बड़ा आधार

उन्होंने प्रदेश में सामाजिक सौहार्द को सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिनाया। बीते वर्षों में उत्तर प्रदेश ने कई संवेदनशील मौकों को शांति और समन्वय के साथ पार किया है। त्योहारों के दौरान जिस तरह प्रशासन और समाज ने मिलकर काम किया, वह पूरे देश के लिए उदाहरण है.

विपक्ष पर साधा निशाना

सिद्दीकी ने विपक्षी दलों पर निशाना साधते हुए कहा कि उनके पास न तो कोई ठोस एजेंडा है और न ही विकास का विज़न। “विपक्ष आज भी जातीय समीकरणों और धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति में उलझा है, जबकि जनता अब काम और परिणाम देखना चाहती है.

2027 का चुनाव—काम बनाम भ्रम

उन्होंने 2027 के चुनाव को “काम बनाम भ्रम” की लड़ाई करार दिया। उनके अनुसार, एक तरफ योगी सरकार का रिपोर्ट कार्ड है, तो दूसरी तरफ विपक्ष के वादों का इतिहास। “जनता अब समझ चुकी है कि स्थिरता, सुरक्षा और विकास किसके साथ है. सिद्दीकी ने विश्वास जताया कि 2027 में उत्तर प्रदेश की जनता एक बार फिर विकास और सुशासन के पक्ष में मतदान करेगी और योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में प्रदेश नई ऊंचाइयों को छुएगा।

चुनावी रण में ‘विकास’ क्यों हो जाता है बेआवाज़?

जाति–धर्म के शोर में दबते असली मुद्दों की पड़ताल

चुनावी रण में ‘विकास’ क्यों हो जाता है बेआवाज़? 

लोकतंत्र के उत्सव में एजेंडा बदलने की जंग : क्या मतदाता की प्राथमिकता ही तय करती है राजनीति की दिशा?

सुरेश गांधी

वाराणसी. हर चुनाव से पहले देश में एक उम्मीद जन्म लेती है :  इस बार बात होगी रोजगार की, शिक्षा की, स्वास्थ्य की, सड़कों और विकास की। लेकिन जैसे-जैसे चुनावी तापमान बढ़ता है, यह उम्मीद धीरे-धीरे धुंध में खो जाती है। मंचों से उठती आवाजें बदल जाती हैं, बहस का केंद्र खिसक जाता है, और अंततः चुनाव उस मोड़ पर पहुंच जाता है जहां जाति और धर्म की गूंज विकास के हर सवाल को ढक देती है। सवाल यह है कि आखिर क्यों लोकतंत्र का यह सबसे अहम पर्व अपने मूल मुद्दों से भटक जाता है? क्या यह केवल राजनीतिक दलों की रणनीति है, या इसके पीछे समाज और मतदाता की भी कोई भूमिका है? 

भारतीय समाज की संरचना को समझे बिना इस सवाल का जवाब अधूरा रहेगा। यहां जाति और धर्म सिर्फ सामाजिक पहचान नहीं, बल्कि एक गहरी जड़ें जमाए हुई व्यवस्था है। यह पहचान व्यक्ति के जन्म से लेकर उसके सामाजिक संबंधों, अवसरों और सुरक्षा तक को प्रभावित करती है। चुनाव के समय यही पहचान राजनीति का सबसे मजबूत औजार बन जाती है। राजनीतिक दल जानते हैं कि विकास की बात दिमाग से जुड़ती है, लेकिन जाति और धर्म दिल से जुड़ते हैं। और लोकतंत्र में वोट अक्सर दिल के फैसले से निकलता है, न कि आंकड़ों के विश्लेषण से। यही कारण है कि जब चुनावी भाषणों में ‘हम’ और ‘वे’ की रेखा खींची जाती है, तो वह मतदाता के भीतर एक भावनात्मक प्रतिक्रिया पैदा करती है। यह प्रतिक्रिया इतनी तीव्र होती है कि विकास जैसे ठोस और जरूरी मुद्दे भी पीछे छूट जाते हैं। 

वोट बैंक की गणित : जीत का शॉर्टकट

राजनीति में जीत ही अंतिम लक्ष्य होती है। और जीत के लिए सबसे आसान रास्ता है : संगठित वोट। विकास का मुद्दा व्यापक होता है, वह सभी को प्रभावित करता है, लेकिन वह किसी एक समूह को “एकजुट” नहीं करता। इसके विपरीत, जाति और धर्म एक संगठित वोट बैंक तैयार करते हैं। हर चुनाव से पहले उम्मीदवारों का चयन, रैलियों का स्वर, यहां तक कि घोषणाएं भी इसी गणित के आधार पर तय होती हैं। कौन-सी जाति किस क्षेत्र में प्रभावी है, किस समुदाय का झुकाव किस पार्टी की ओर है : इन सभी आंकड़ों का गहन विश्लेषण किया जाता है। इस गणित में विकास एक “सामान्य” मुद्दा बनकर रह जाता है, जबकि जाति–धर्म “निर्णायक” बन जाते हैं।

तात्कालिक प्रभाव बनाम दीर्घकालिक लाभ 

विकास एक लंबी प्रक्रिया है। सड़क बनेगी, स्कूल खुलेगा, अस्पताल सुधरेगा : इन सबका असर समय के साथ दिखता है। लेकिन चुनाव एक सीमित समय का खेल है, जहां परिणाम तुरंत चाहिए। जाति और धर्म की राजनीति तुरंत असर डालती है। एक बयान, एक विवाद, एक भावनात्मक अपील. और पूरा चुनावी माहौल बदल जाता है। यह तात्कालिक प्रभाव नेताओं के लिए ज्यादा आकर्षक होता है, क्योंकि वह सीधे वोट में तब्दील हो सकता है।

मीडिया और सोशल मीडिया : एजेंडा सेट करने की ताकत

आज के दौर में मीडिया सिर्फ सूचना का माध्यम नहीं, बल्कि एजेंडा तय करने वाला शक्तिशाली उपकरण बन चुका है। चुनाव के समय यह भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। विकास की खबरें अक्सर आंकड़ों और तथ्यों पर आधारित होती हैं, जिन्हें समझना और प्रस्तुत करना अपेक्षाकृत जटिल होता है। इसके विपरीत, जाति या धर्म से जुड़े मुद्दे सरल, उत्तेजक और तुरंत ध्यान खींचने वाले होते हैं। सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और तेज कर दिया है। यहां वही सामग्री तेजी से फैलती है जो भावनाओं को भड़काए, बहस को उग्र बनाए और लोगों को बांटे। नतीजा यह होता है कि विकास की गंभीर चर्चा शोर में दब जाती है।

जवाबदेही का संकट : जब काम से ज्यादा पहचान मायने रखे

लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है : जवाबदेही। जनता अपने प्रतिनिधि से सवाल पूछ सकती है, उसके काम का हिसाब मांग सकती है। लेकिन जब चुनाव जाति और धर्म के आधार पर लड़े जाते हैं, तो यह जवाबदेही कमजोर पड़ जाती है। अगर कोई नेता यह जानता है कि उसे वोट उसके काम के आधार पर नहीं, बल्कि उसकी पहचान के आधार पर मिलेगा, तो उसके लिए विकास पर ध्यान देना प्राथमिकता नहीं रह जाता। यह स्थिति लोकतंत्र के लिए खतरनाक है, क्योंकि यह धीरे-धीरे उसे जवाबदेही से दूर ले जाती है।

ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भ : एक जटिल सच्चाई

यह भी समझना जरूरी है कि जाति और धर्म की राजनीति केवल नकारात्मक पहलू नहीं है। कई समुदायों के लिए यह उनके अधिकार, प्रतिनिधित्व और सुरक्षा का सवाल भी है। भारत में लंबे समय तक कई वर्ग सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित रहे हैं। उनके लिए चुनाव एक अवसर होता है अपनी आवाज को मजबूत करने का। ऐसे में उनकी प्राथमिकताएं विकास के साथ-साथ पहचान से भी जुड़ी होती हैं। इसलिए इस मुद्दे को केवल “गलत” या “सही” के नजरिए से देखना पर्याप्त नहीं है। यह एक जटिल सामाजिक वास्तविकता है, जिसे समझना जरूरी है। क्या मतदाता भी जिम्मेदार है? यह सवाल असहज जरूर है, लेकिन जरूरी भी—क्या केवल राजनीतिक दल ही इसके लिए जिम्मेदार हैं? या मतदाता की भी इसमें भूमिका है?  राजनीति अक्सर वही दिखाती है, जो जनता देखना चाहती है। अगर मतदाता विकास के मुद्दों पर वोट दे, सवाल पूछे, अपने प्रतिनिधि से जवाब मांगे, तो राजनीतिक दल भी अपने एजेंडे को बदलने के लिए मजबूर होंगे। लेकिन अगर चुनाव के समय भावनात्मक मुद्दे ही प्राथमिकता बन जाएं, तो राजनीति भी उसी दिशा में जाएगी।

बदलाव की राह: क्या संभव है? 

परिस्थिति चाहे जितनी जटिल हो, बदलाव असंभव नहीं है। इसके लिए कुछ ठोस कदम जरूरी हैं :-

1. जागरूक मतदाता : जब मतदाता अपने वोट की ताकत को समझेगा और उसे सोच-समझकर इस्तेमाल करेगा, तभी बदलाव आएगा।

2. स्थानीय मुद्दों पर फोकस : राष्ट्रीय मुद्दों के साथ-साथ स्थानीय समस्याओं : जैसे पानी, सड़क, बिजली, शिक्षा पर भी ध्यान देना जरूरी है।

3. मीडिया की जिम्मेदारी : मीडिया को भी अपनी भूमिका को समझना होगा और विकास के मुद्दों को प्राथमिकता देनी होगी।

4. शिक्षा और संवाद :  एक शिक्षित और जागरूक समाज ही सही सवाल पूछ सकता है और सही फैसले ले सकता है।

लोकतंत्र का आईना

चुनाव केवल नेताओं का परीक्षण नहीं होता, यह समाज का भी आईना होता है। इसमें वही प्रतिबिंब दिखता है, जो हम बनाते हैं। अगर हम चाहते हैं कि चुनाव विकास के मुद्दों पर लड़े जाएं, तो हमें खुद अपनी प्राथमिकताएं बदलनी होंगी। हमें यह तय करना होगा कि हम किस तरह की राजनीति चाहते हैं : भावनाओं की या विकास की। क्योंकि अंततः लोकतंत्र में सबसे बड़ा नेता जनता होती है। और जब जनता बदलती है, तो राजनीति अपने आप बदल जाती है। जब तक वोट पहचान पर पड़ेगा, तब तक राजनीति उसी पहचान के इर्द-गिर्द घूमेगी : जिस दिन वोट विकास पर पड़ेगा, उसी दिन लोकतंत्र अपनी असली दिशा पकड़ लेगा।

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