Tuesday, 15 May 2018

मोदी के संसदीय क्षेत्र में काशी में बड़ा हादसा, 12 लोगों की मौत

मोदी के संसदीय क्षेत्र काशी में बड़ा हादसा, 12 लोगों की मौत  
कैंट रेलवे स्टेशन के सामने निर्माणाधीन ओवरब्रिज गिरा, 50 से अधिक लोग दबे, दर्जनों वाहन क्षतिग्रस्त 
                सुरेश गांधी 
        वाराणसी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में मंगलवार को सायंकाल बड़ा हादसा हो गया है। कैंट रेलवे स्टेशन के पास  निर्माणाधीन ओवरब्रिज का एक बड़ा हिस्सा गिर गया। इसके चलते न सिर्फ पचास से अधिक लोगों के दबने की आशंका है, बल्कि दर्जनों वाहन भी चपेट में आने से क्षतिग्रस्त गए हैं। खबर लिखे जाने तक 12 लोगों की मौत हो चुकी थी। यह संख्या और भी बढ़ सकती है। घटना के बाद पूरे इलाके में भगदड़ मच गयी। चारों तरफ चीख-पुकार की आवाज गूंजने लगे। जो जहां थे वहीं से भागने लगे। घटना की सूचना मिलने पर पुलिस मौके पर पहुंचकर राहत में जुट गयी है। रेलवे स्टेशन होने के चलते यह इलाका काफी व्यस्त रहता है। जिस वक्त ये हादसा हुआ वहां काफी भीड़ थी। सड़क से दर्जनों वाहन गुजर रहे थे। सभी इस हादसे की चपेट में आ गए। प्रधानमंत्री ने घटना पर दुख जताया है। सीएम योगी आदित्यनाथ ने डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य और राज्यमंत्री नीलकंठ तिवारी को मौके पर पहुंचने का आदेश दिया है। 
            बताते है जिस वक्त हादसा हुआ है वहां ट्रैफिक जाम था और भारी भीड़ थी। पुल के गिरते ही चीख-पुकार मच गई। आस पास के लोग मदद के लिए दौड़ पड़े। पुलिस को भी फोन किया गया। पुलिस हादसे के काफी देर बाद पहुंची जिसको लेकर लोगों में गुस्सा देखा गया। हादसे की तस्वीरें बता रही हैं कि यह कितना वीभत्स है। बताया जा रहा है कि ओवरब्रिज का एक हिस्सा वहां से गुजर रही एक रोडवेज बस और कई गाड़ियों के ऊपर गिर गया। स्टेशन आने और जाने का रास्ता बंद हो गया। मौके पर यूपी पुलिस, आर्मी, एनडीआरएफ के जवान घायल लोगों को मलबे में से निकालने में जुटे हैं। घायलों को मंडलीय अस्पताल, कबीरचैरा और बीएचयू अस्पताल भेजा जा रहा है। हादसे से यातायात भी दोनों तरफ का बाधित हो गया तो काफी लंबी दूरी तक जाम की स्थिति भी बन गई। 






Friday, 11 May 2018

वकील की हत्या के विरोध में न्यायिक कार्य से विरत रहे अधिवक्ता

वकील की हत्या के विरोध में न्यायिक कार्य से विरत रहे अधिवक्ता 
शीघ्र ही हत्यारों की गिरफ्तार नहीं किया गया तो होगा उग्र आंदोलन  
                            सुरेश गांधी 
        ज्ञानपुर, भदोही। वकील राजेश श्रीवास्तव की हत्या के विरोध में डिस्ट्रिक्ट बार एसोसिएशन, भदोही-ज्ञानपुर के तत्वावधान में शुक्रवार को अधिवक्ताओं ने न्यायिक कार्य का बहिष्कार किया। इस दौरान अदालतें तो बैठीं लेकिन, वकीलों की गैरमौजूदगी में जज अपने चेंबरों में वापस चले गए। इससे अदालतों में कामकाज पूरी तरह ठप रहा। सुबह बड़ी संख्या में अधिवक्ताओं ने न्यायालय परिसर में जुलूस निकाला। जुलूस में शामिल अधिवक्ता पुलिस प्रशासन मुर्दाबाद, राजेश के हत्यारों को गिरफ्तार करो-गिरफ्तार करो के नारे लगा रहे थे। जुलूस दीवानी न्यायालय से शुरु होकर सीजेएम न्यायालय परिसर में समाप्त हो गया। न्यायिक कार्य ठप होने से दूरदराज से आएं वादकारियों को बैरंग वापस लौटना पड़ा। 
             सभा में वकीलों ने घटना की निंदा की है और हत्यारों की गिरफ्तारी की मांग की है। वकीलों ने हत्यारोपितों की गिरफ्तारी न होने पर बड़े आंदोलन की चेतावनी भी दी। मुख्यमंत्री की ओर से मृतक के परिवारीजन को 20 लाख रुपये की सहायता देने पर आभार जताया। इससे पहले वकीलों की बैठक में न्यायिक कार्य बहिष्कार का प्रस्ताव पारित किया गया। प्रस्ताव मेंमृतक के परिवार के कम से कम एक व्यक्ति को सरकारी नौकरी देने की मांग सरकार से की गई। जिन अधिवक्ताओं के पास माफिया के खिलाफ मुकदमे हैं, उन्हें और उनके परिवार को सुरक्षा दी जानी चाहिए। अफसोस है कि न्याय दिलाने वाला खुद न्याय नहीं पा रहा है। सभा में अधिवक्ताओं ने कहा कि फर्जी एनकाउंटर के जरिए अपराध रोकने में जुटी यूपी पुलिस का दावा हवा-हवाई साबित हो रही है। एक के बाद एक हत्या, लूट, डकैती, बलात्कार की घटनाएं हो रही है। अब तो गरीब से गरीब व्यक्ति को न्याय दिलाने वाले अधिवक्ता भी असुरक्षित हो गए हैं। इलाहाबाद में सीनियर अधिवक्ता राजेश श्रीवास्तव की बदमाशों ने दिनदहाड़े हत्या कर दी। हत्या के बाद अपराधी बड़े ही आराम से भाग निकले और पुलिस देखती ही रह गयी। अधिवक्ताओं ने कहा कि योगीराज में अपराध लगातार बड़ रहा है। यदि शीघ्र ही अधिवक्ता के हत्यारों की गिरफ्तारी नहीं हुई तो बड़े पैमाने पर आंदोलन किया जायेगा। 
      सभा में एसोसिएसन के अध्यक्ष अश्विनी कुमार मिश्र, सचिव विमलेश कुमार यादव, सीनियर अधिवक्ता तेज बहादुर यादव, स्वामी प्रसाद मिश्रा, ओमप्रकाश मौर्य, मजहर शकील, राकेश पांडेय, पंकज तिवारी, मुन्नर राम यादव, आलोक दुबे, वीरेन्द्र कुमार चैहान, राजधर बिन्द, श्याम शंकर यादव, गिरजाशुकर यादव, ओमप्रकाश सरोज, ब्रह्मकिशोर श्रीवास्तव, शशि पांडेय, संतोष दुबे, श्रीमती स्नेहलता, सुषमा मिश्रा, अशोक त्रिपाठी, विजय नारायण पांडेय, शिवकुमार आदि ने अपने विचार व्यक्त किया। सभा के अंत में अधिवक्ताओं ने दो मिनट का मौन रखकर ईश्वर से मृतक आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की। 

Saturday, 5 May 2018

रोज ठहाका मन से लगाओ, बीपी-शुगर दूर भगाओ

रोज ठहाका मन से लगाओ, बीपी-शुगर दूर भगाओ  
             जब हम हंसते हैं तो खुद ही नहीं आस-पास का माहौल भी खुशनुमा हो जाता है। इसीलिए तो आज के भागमभाग भरी जिंदगी में कुछ पल निकालकर ठहाके लगाने की दरख्वाश डाक्टर से लेकर शिक्षक, योगगुरु सहित घर के बड़े-बुजुर्ग तक कह रहे है, ‘‘अगर अपनी जवानी और जिंदादिली बरकरार रखनी है तो हंसते रहिए। स्वस्थ रहना है तो हंसते रहिए और जिंदगी का पूरा मजा लेना है तो हंसते रहिए  
           सुरेश गांधी 
            हास्य के अंतर्राष्ट्रीय ख्याति एवं राष्ट्रपति के द्वारा साहित्य श्री पुरस्कार से सम्मानित कृष्णा अवतार राही का कहना है कि हंसी के बिताया हुआ दिन, बर्बाद किया हुआ दिन है। अगर कोई दिन में आठ घंटे तक हंसकर बिताएं तो न केवल गंभीर रोगों से बल्कि मानसिक रोगों से भी छुटकारा पा सकता हैं। या यूं कहे हंसी सेहत के लिए सबसे अच्छा टाॅनिक और और हमेसा सुन्दर दिखने के लिए सबसे बेहतर औषधि भी है। जब मनुष्य हंसता है तो वह कुछ पलों के लिए सबसे अलग हो जाता है। उसके विचारों की श्रृंखला टूट जाती है। एकाग्रता आती है। मन-मस्तिष्क खाली व हल्के होने लगते हैं। वे कहते है कि ‘स्वस्थ हास्य समाज को जगाने का भी काम करता है‘। मैंने अपनी कविताओं के माध्यम से रिश्तो से राजनीति तक हर विषय को छुआ हैं। शब्दों को घुमा-फिराकर उनके अर्थ भी बदलें हैं। ताकि हास्य के पुट के साथ-साथ तमाम पहलुओं को एक ही जगह पर समाहित किया जा सके। हास्य कवि सम्मेलन स्वस्थ मनोरंजन का माध्यम है। सिर्फ मनोरंजन ही नहीं, बल्कि देश की वर्तमान स्थिति का चित्रण और समाज की जवाबदेही बताने की बखूबी काम हमारे कवि कर रहे हैं। 
हंसने की फुर्सत ही नहीं 
         चिकित्सक की भाषा में कहें तो हंसने से पिट्युटरी ग्लैंड्स प्रभावित होती है, जिससे भय, अवसाद और तनाव दूर होता है। जहां तक हास्य कवि होने का सवाल है तो सच्चा कवि वहीं है जो रोते को हंसा दें। यदि कोई काम बिना बोझ के खुशी-खुशी कर लिया जाएं तो तनाव काफी हद तक कम हो जाता है। इसके बावजूद शायद ही किसी को याद हो कि वह आखिरी बार दिल खोलकर कब हंसा था। या कोई ऐसी बात जिसको सुनकर लोटपोट हो गये हों। क्योंकि आजकल लाइफ में काम ही इतने है कि हंसने की फुर्सत ही नहीं। आज की भागमभाग भरी जिंदगी में जैसे लोग हंसना-मुस्कराना भूल चुके हैं। जबकि अत्यधिक गंभीरता जीवन को जटिल व असहज बना देती है। खासकर भौतिकता के इस वर्तमान युग में इसका सबसे अधिक प्रतिकूल असर बच्चों पर पड़ा है। 
हंसी-मजाक के रिश्तें 
         हास-परिहास की जरुरत का इससे बड़ा और क्या उदाहरण होगा कि इसके लिए बाकायदा रिश्ते गढ़े गए हैं। देवर-भाभी, जीजा-साली जैसे चुहल भरे रिश्ते इसलिए बनाएं गए हैं ताकि रिश्तों पर समस्याएं हावी न हों और उनमें एक सेंस आॅफ ह्यूमर बना रहें। बीएचयू के न्यूरोलाॅजिस्ट डा विजय मिश्रा की मानें तो एक मिनट की मुस्कान व्यक्ति को जितना सहज बनाती है, उसके लिए उसे 45 मिनट तक कोशिशें करनी पड़ सकती है। हंसने से चेहरे के मांसपेशियों का व्यायाम हो जाता है। हंसी पेनकिलर का काम करती है। फैट कम करने में भी इसका बड़ा योगदान होता है। शोध बताते है कि हर बार जब हम मुस्कराते हैं, मस्तिष्क में फीलगुड पार्टी होने लगती है। मुस्कराने से कुछ ऐसे हार्मोंस रिलीज होते है, जो तनाव या किसी भी तरह के दबाव से लड़ने में कारगर होते हैं। ये फीलगुड न्यूरोट्रांसमीटर्स, डोपामाइन, एंड्रोफिंस व सेरोटोनिन आदि है। इनका स्तर बढ़ता है तो शरीर को सुकून मिलता है और ब्लड प्रेशर संतुलित होता है। एंड्रोफिंस एक तरह से दर्द निवारक दवा का काम करता है। जबकि सेरोटोनिन एंटीडिप्रेसेंट्स का यानी एक जरा सी हंसी कितना कुछ छिपा हुआ हैं। 
हार्ट के साथ दूर भागता है ब्लड प्रेशर 
          इसके अलावा हंसने से न सिर्फ थकावट दूर होती है बल्कि ब्लड प्रेसर ठीक रहता है और नींद भी अच्छी आती है। यह अलग बात है चिकित्सकों व योग गुरुओं की अपील कुछ लोगों पर जरुर पड़ी है। इसके ताजा उदाहरण ‘द कपिल शर्मा शो और ऐसे ही कुछ और हास्य से ओत-प्रोत कार्यक्रम टीवी चैनलों पर होने वाले प्रसारण की बढ़ती लोकप्रियता से अंदाज लगाया जा सकता है कि समाज में कितनी हंसी की उपयोगिता हैं। लेकिन यह भी सच है कि इन हास्य धारावाहिकों के चंद मिनटों के प्रसारण से कुछ लोगों के चेहरा मुस्कुराता जरूर है, परंतु दिल खोलकर हंसने का मन इसलिये नहीं करता है, क्योंकि थकान आपको हंसने का मौका ही नहीं देती। इसलिए अपनी जवानी और जिंदादिली बरकरार रखनी है तो हंसते रहिए। स्वस्थ्य रहना है तो हंसते रहिए और जिंदगी का पूरा मजा लेना है तो हंसते रहिए। कहा जा सकता है हंसी जीवन का प्रभात है। यह शीतकाल की मधुर धूप है तो ग्रीष्म की तपती दुपहरी में सघन छाया। हंसने से आत्मा खिल उठती है। इससे आप तो आनंद पाते ही हैं दूसरों को भी आनंदित करते हैं। हंसने के लिए लोग क्या-क्या नहीं करते। कोई अपनी पसंद के चुटकुले सुनता, सुनाता है तो कोई दुसरों से तरह-तरह की गप्प करके हंसाता है। जो नहीं कर पाते वे आजकल लाफ्टर क्लबों का सहारा लेते हैं ताकि ठहाकों से तनाव को छूमंतर किया जा सके। यही वजह है कि आज के दौर में काॅमेडी वाले कार्यक्रमों को सबसे ज्यादा पसंद किया जा रहा है। लतीफे कोई भी हो उन्हें हर कोई पसंद करता ही है और हंसी भी आती है यानी किसी न किसी तरह खुशी मिलती ही है। 
फिक्र से रहे बेफिक्र 
            दुख की रात चाहे जितनी लंबी हो, गुजर ही जाती है। कहते है दर्द जब हद से गुजर जाता है तो दवा बन जाता है। कई बार तो छोटी-छोटी तकलीफें इंसान को परेशान करती है जबकि बड़ी मुश्किलों में वह सब्र कर लेता है। दुखों-समस्याओं को स्वीकार करते हुए उनमें धैर्य बनाएं रखने का हुनर तभी आता है जब मुश्कराने की आदत हों। वैसे इंसानी फितरत यही है कि वह अपनी तकलीफों, मुर्खताओं और विफलताओं पर भी हंस लेता है। यह एक तरह का डिफेंस मैकेनिज्म भी हैै। मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि सक्रिय व व्यस्त रहने वाले लोग सुखी रहते हैं। हंसने के लिए बेफिक्री, फाकामस्ती और जिंदगी को समग्रता में देखने का साहस जरुरी है। हर पल को कैसे बिताना हैं, यह इंसान स्वयं ही तय कर सकता हैं। ‘यूज इट आॅर लूज इट‘ - यानी इसे जीएं या गवां दें, यह अपने ही हाथ में हैं। खुश रहने वाले जानते है कि हंसने से जीवन में कुछ साल और जोड़े जा सकते है और हां, उन सालों में जिंदगी का जज्बा बनाएं रखा जा सकता है।  
मात्र 6 मिनट का हंसना बेहद लाभकारी 
एक रिसर्च के अनुसार पहले लोग रोजाना करीब 18 मिनट हंसते थे और अब 6 मिनट ही हंसते हैं जबकि हंसना बेहद फायदेमंद है। दिल खोलकर हंसनेवाले लोग बीमारी से दूर रहते हैं और जो बीमार हैं वे जल्दी ठीक होते हैं। हंसी न सिर्फ हंसने वाले बल्कि उसके आसपास के लोगों पर भी पॉजिटिव असर डालती है। इसलिए रोजाना हंसें खूब हंसें जोरदार हंसें दिल खोलकर हंसें। तनाव व व्यस्तता से परिपूर्ण जीवन में हंसना जरूरी है। कुछ लोगों ने तो पार्कों में योग के दौरान हंसना अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना लिएं हैं। क्योंकि हास्य सकारात्मक और शक्तिशाली भावना है, जिसमें व्यक्ति को ऊर्जावान और शांतिपूर्ण बनाने के सभी तत्व उपस्थित रहते हैं। हंसने से बीमारियां भी दूर भागती हैं। हंसना सभी के शारीरिक व मानसिक विकास में अत्यंत सहायक है। जापान के लोग अपने बच्चों को प्रारंभ से ही हंसते रहने की शिक्षा देते हैं। 
ठहाके से जीती जा सकती है हर मुश्किलें 
          सच मानिए कि हंसी सबसे सस्ती है। इसलिए हर किसी को हंसते-हंसते जीना चाहिए। खुशनुमा रहने में ही असल जिन्दगी का मजा है। वैसे भी हंसी और खुशी का चोली-दामन का साथ होता हैं। दोनों का साथ रहना न सिर्फ हमारे लिए सुकूनदायक होता है बल्कि यह वह अहसास है जो हमें आत्मिक आनंद देता है। संतुष्टि देता है कि हम हंसी-खुशी जी रहे हैं और दुसरों के लिए भी यही कामना करते हैं। वाकई हंसी सेहत के लिए टाॅनिक या यूं कहे संजीवनी का ही काम करती हैं। हंसना-मुस्कराना कुदरत का वो अनमोल तोहफा और इंसानी व्यवहार का सबसे पाॅजिटिव इमोशन है। मन की उलझन हो या शारीरिक परेशानी, यह हर मर्ज का इलाज है। कहा भी जाता है हंसी की एक खुराक सौ दवाओं के बराबर होती है। यही वजह है कि इसे योग का दर्जा मिल चुका है। लाफ्टर मेडिटेशन और लाफ्टर योग अब हमारी जीवनशैली का हिस्सा बन रहे हैं। योग के दुसरे तरीकों से अलग इसमें इंसान को खुश रहना और जी खोलकर हंसना सिखाया जाता है। तभी तो हंसी को प्रकृति की सबसे बड़ी नियामत कहा जाता है। लेकिन साधारण से चलते अपने जीवन को हमने खुद ही लग्जरी चीजों को पाने की लालसा में इतना व्यस्त बना लिया है कि हमकों हंसने का समय ही नहीं मिलता है। दूसरों की चीजों को देखकर ईष्र्या करके हम सिर्फ कुढ़ना जाने हैं। जबकि जिस तरह खाने में स्वाद के लिए समय-समय पर तड़के की आवश्यकता होती है उसी तरह जिन्दगी को भी नीरसता से बचाएं रखने के लिए हंसी के तड़के की जरुरत पड़ती है। ताकि जीवन न सिर्फ सुचारु रुप स ेचल सके बल्कि उसे आनंदमय सुकून की प्राप्ति भी हो सके। 
जीवन की दिनचर्या है हंसी 
         वास्तव में यदि पूछा जाय कि यह हंसी आती कहां से है तो मैं कहूंगा कि यह हंसी जिन्दगी से आती है, आपसी संवाद से आती है जहां चार लोग बैठ जाते हैं वहीं हंसी का माहौल बन जाता है। संवेदना के आईने से देखेंगे तो विडम्बनाओं और विसंगतियों में भी हास्य छुपा रहता है। हंसी ऐसी चीज है जो हर जगह मौजूद हैं। जहां जीवंत माहौल होगा, वहीं हंसी का झरना फूट पडेगा। हंसी, मुस्कराहटे साथ जीने और रहने की दिनचर्या में भी आनंद भरती है जो कम्पलीट वेलनेस का मंत्र हैं। मतलब साफ है हंसी जिन्दगी का वो अनमोल उपहार है जो बेरंग जिन्दगी को खुशियों से भर देती हैं। जिसे महंगा मोल चुकाकर भी नहीं पाया जा सकता। सच मानिएं हंसी सबसे सस्ती है, इसलिए हर किसी को हंसते-हंसते जीना चाहिए। खुशनुमा रहने में ही असल जिन्दगी का मजा है। किसी ने सही कहा है हंसने में कुछ नहीं जाता बल्कि यह आपके स्वास्थ्य के लिए अच्छा है। इसलिए खूब हंसना चाहिए, क्योंकि हंसी मुफ्त में मिलती है, मिलावट का कोई डर नहीं और ना ही किसी साइड इफेक्ट का ही डर और ना ही समय की पाबंदी ही होती है। 
हास्य योग की डिमांड 
          माना कि हास्य योग करने के बाद हो सकता है आपका वजन कम न हो लेकिन आपके दिमाग से ये खयाल जरुर निकल जायेगा कि आप मोटे हैं। लोग इसलिए इसकी क्लास में आते हैं क्योंकि ये एक तरह की कसरत है। लोग इसे करते हैं और खुद को खुश रखते हैं। गहरी सांस लेना, शरीर को खींचने के साथ-साथ हंसी का मेल हास्य योग में सिखाया जाता है। हास्य योग का मूल विचार यह है कि शरीर असली और कृत्रिम हंसी में फर्क नहीं कर सकता। हम हंसी का रसायन पैदा करने के लिए हंसी की चाल पकड़ते हैं। हास्य योग का मकसद मांसपेशियों को मजबूत करना नहीं है, बल्कि कठिन सोच से छुटकारा पाना हैं। हास्य योग की एक घंटे की कक्षा में 20-40 सेकेन्ड तक के छोटे-छोटे सेशन होते हैं। इसमें एक बार हो-हो करना सिखाया जाता है तो दुसरी बार हा-हा करने के लिए कहा जाता है। हर दिन 10 से 15 मिनट तक हंसने में 10 से 40 कैलोरी ऊर्जा खर्च होती हैं। इससे काफी तनाव निकल जाता हैं। शुरुवात में थोड़ा असहज लगता है लेकिन बाद में हंसी को रोकना कठिन हो जाता हैं। यू ंतो हंसी लाने के लिए कोई बहाने नहीं ढूढ़े जाते बल्कि यह अचानक ही हमारी जिन्दगी में ऐसी जगह बना लेती है जिसके बिना कभी-कभी रहना मुश्किल हो जाता है। वाकई यह वो झरना है जो स्वतः ही हमारे से निकलता है। ईश्वर ने सिर्फ इंसानो को इस सौगात से नवाजा है। जरुरी है इस अनमोल का उपहार का मोल समझें और हंसी को खोने ना दें। हंसी-हंसाने का सबसे सुखद पहलू यही है कि यह हर हालत में जीवन को नया रंग, नया उत्साह देता है। हंसी बांटने का भाव खुशियों को और विस्तार देता हैं। हंसने से चेहरा ही नहीं मन भी खिल उठता हैं। निराशा और पीड़ा के साये दूर होते हैं। 
दिमागी टशन होगा छूमंतर 
          इसके बावजूद रोजमर्रा के कामों की व्यस्तता में हम ठहाके लगाना भूल जाते हैं। जरा याद कीजिए पिछली बार आप खुलकर कब हंसे थे? यह सवाल केल इसलिए क्योंकि आज की भाग दौड़ भरी जिंदगी में लोग अतने व्यस्त और तनावग्रस्त है कि हंसना भूलता जा रहे हैं। किसी मामलूी सी बात पर क्राधित होकर दुसरों पर चिल्लाना या नाराजगी में बातचीत बंद कर देना लोगों की आदत में शुमार होता जा रहा है। ऐसी मनोदशा का व्यक्ति के निजी ओर प्रोफेसनल रिश्तों पर नकारात्मक असर पड़ता है। जबकि हंसिए कि हंसने से सारे रंज मिट जाते हैं, सेहत ठीक रहती है, अपनों का साथ और मजबूती पाता हैं, निर्णय लेने की क्षमता बढ़ जाती है और दिमागी टशन भी छूमंतर हो जाता है। कहा भी गया है कि विवेक की सबसे प्रत्यक्ष पहचान सतत प्रसंनता है। हंसी और ठहाके उम्र और समय के साथ बदलते हमारे व्यवहार को भी जिंदादिल रखते हैं। हमारा बचपना बनाएं रखती है हंसी। आमतौर पर देखने में आता है कि इंसान जैसे-जैसे उम्रदराज होता है । समझदारी व परिपक्वता उसके व्यवहार की हिस्सा बन जाती है। लेकिन जिन्दगी को बोझिल बनाने के बजाय हंसने-हंसाने के मौके तलाशते रहना चाहिए। यही इंसान के जीवंत व्यक्तित्व की पहचान हैं। 
टशन से शरीर पर पड़ता है कुप्रभाव 
         चिकित्सकों की मानें तो जब हंसी नहीं रहती तब सिर्फ तनाव रहता है और तनावग्रस्त इंसान का सबसे पहले खाना-पीना, सोना खराब हो जाता है। पेट और दिल संबंधी कई बीमारियों का वह शिकार हो जाता है। ऐसी स्थिति में एकमात्र हंसी-खुशी ही संजीवनी बूंटी का काम करती हैं। यह सच है कि अत्यधिक विनोदप्रिय व्यक्ति अक्सर हंसी के पात्र बन जाते हैं। उनकी किसी बात को समाज में गंभीरता से नहीं लिया जाता। जबकि हंसी जीवन में तनाव या अवसाद को हिलाकर उसकी तारतम्यता को तोड़ता है। हंसते समय इंसान अपनी सब परेशानियां और तनाव भूल जाता है। वह तनाव की तारतम्यता को बाधित करके जीवन को अवसाद मुक्त करता है। फिरहाल, जीवन में हास्य के हा्रस की मुख्य वजह परिवारों का विघटन है। एकाकी परिवारों ने दादी-नाना-नानी के किस्से-कहानियों, हंसी-ठिठोली को लगभग समाप्त ही कर दिया है। हास्य की सबसे अधिक कमी बुजुर्गो को ही खलती है। खासकर उस वक्त जब बच्चों को बोर्डिंग में दाखिला करा दिया जाता है या पढ़-लिखकर नौकरी के लिए दूर चले जाते हैं। इससे वह पोते-पोतियों के प्यार से वंचित हो जाते हैं। इसलिए बुजुर्गो का खयाल रखा जाना बेहद जरुरी है। 
हंसी मजाक में भड़ास निकालने का मौका 
          जीवन दीप हास्पिटल के डा एके गुप्ता कहते है जब आप हंसते है तो दिमाग में बीटा एंडार्फिंस नामक केमिकल का स्राव बढ़ जाता हैं। यही नहीं हंसने से इम्यून सिस्टम भी मजबूत होता है। हंसने से रात में नींद भी अच्छी आती है। हंसने-हंसाने की आदत ब्रेन की सेहत के लिए भी बहुत फायदेमंद है। क्योंकि हंसने ब्रेन से सेरोटोनिन हार्मोंस का सिक्रीसन तेजी से होने लगता है। जो दर्द, तनाव ओर उदासी को दूर करने में साबित होता है। हंसने से स्ट्रेस पैदा करने वाले हार्मोंस का स्राव भी कम हो जाता है। इंसान के मन में कई ऐसी बाते दबी होती है जिन्हें वह सामाजिक दबाव या वर्जनाओं के कारण अभिव्यक्त नहीं कर पाता। अनजाने में ही सही ऐसी भावनाओं का प्रकटीकरण हंसी-मजाक के रुप में होता हैं। इससे अंर्तमन की ग्रंथ्यिां ठीक होती है। स्वस्थ हास्य कई तरह की कुंठाओं से निजात दिलाता है। हंसी-ठहाका एक तरह का डिफेंस मेकेनिज्म भी है। जब व्यक्ति निराश होता है तो अपनी खिसियाहट को मिटाने के लिए हंसता है, व्यंग करता है और खुद का मजाक उड़ता है। इसलिए इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप क्यों हंसते है। आप दिन भर में छोटे-छोटे टुकड़ों में भी हंस लेते हैं तो आपके जीवन की गुणवत्ता में सुधार आ जाता है। आप हंसी के माध्यम से लोगों के मन में पाॅजिटिव फिलिंग ला सकते हैं। हंसी दिमाग को खोलती है और सृजनात्मकता को बढ़ावा देती हैं। हंसने के लिए जरुरी है कि दिमाग को प्रसंन करने वाली फिल्में और आॅनलाइन वीडियो क्लीप देखें। बच्चों वाली कार्टून फिल्में हमारे आपके मन को प्रसंन रखने में सहायक होती हैं। इसके साथ ही खुश रहने वाले लोगों के साथ अधिक से अधिक समय बिताएं। ऐसे लोगों से फोन पर बात करें, जिनसे बात करने में आपको खुशी महसूस होती हो। 

Monday, 30 April 2018

बुद्धं शरणं गच्छामि, धम्म शरणं गच्छामि... की गूंज

बुद्धं शरणं गच्छामि, धम्म शरणं गच्छामि... की गूंज
सुबह श्रद्धालुओं ने लगाई आस्था की डुबकी, शाम को बुद्ध मंदिरों में जगमगाएं दीपों की श्रृंखला 
सुरेश गांधी 
शहर हो देहात, सारनाथ हो या बोधगया या कुशीनगर से लेकर सोमवार को दुनियाभर में भगवान गौतम बुद्ध की जयंती धूमधाम से मनाई जा रही
है। हर जगह बुद्धं शरण गच्छामि, धम्म शरणं गच्छामि... की गूंज सुनाई दे रही है। वैदिक ग्रंथों के अनुसार भगवान बुद्ध नारायण के अवतार हैं, उन्होंने 2500 साल पहले धरती पर लोगों को अहिंसा और दया का ज्ञान दिया था। बौद्ध धर्म को मानने वाले विश्व में 50 करोड़ से अधिक लोग इस दिन को बड़ी धूमधाम से मनाते हैं। हिन्दू धर्मावलंबियों के लिए बुद्ध विष्णु के नौवें अवतार हैं। इसी वजह से हिन्दुओं के लिए भी यह दिन पवित्र माना जाता है।सुबह से लेकर देर शाम तक जगह-जगह बुद्ध पूजा व वंदना, संगोष्ठी, भंडारा, दीक्षा समारोह, धम्म सभा व सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। धम्म यात्रा निकाली गयी। इसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने शिरकत की। बुद्ध मंदिरों में सुबह से लेकर देर रात तक रौनक रही। श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा। समारोह का मुख्य आकर्षण बुद्ध चित्र प्रदर्शनी, बौद्ध विद्वान व भिक्खुओं का अभिभाषण, सांस्कृतिक कार्यक्रम (बुद्ध एकांकी, नृत्य, कविता, संगीत का भव्य प्रदर्शन) सामूहिक भंडारा रहा। शाम में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम के तहत बुद्ध एकांकी, नृत्य, कविता, संगीत का प्रदर्शन किया गया। 
भगवान बुद्ध ने चार आर्यसत्य बताए हैं जिसके माध्यम से मनुष्य को जीवन जीने की प्रेरणा दी है। दुख है। दुख का कारण है। दुख का निवारण है। दुख निवारण का उपाय है। महात्मा बुद्ध ने 29 वर्ष की आयु में घर छोड़ दिया और संन्यास ले लिया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुद्ध जयंती के मौके पर दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम का उद्घाटन किया। इसके बाद कार्यक्रम में अपने संबोधन के दौरान पीएम मोदी ने कहा कि मौजूदा वक्त में विश्व को बचाने के लिए बुद्ध का करुणा प्रेम का संदेश काम आ सकता है और इसके लिए बुद्ध को मानने वाली शक्तियों के सक्रिय भूमिका निभानी होगी। पीएम मोदी ने कहा कि भगवान बुद्ध कहते थे कि किसी के दुख को देखकर दुखी होने से ज्यादा बेहतर है कि उस व्यक्ति को उसके दुख को दूर करने के लिए तैयार करो, उसे सशक्त करो। उन्होंने कहा कि इस बात की खुशी है कि हमारी सरकार करुणा और सेवाभाव के उसी रास्ते पर चल रही हैं जिस रास्ते को भगवान बुद्ध ने हमें दिखाया था। सारनाथ और बोधगया में बुद्ध की धरोहर संरक्षित करने वाली संस्थाओं को वैशाख सम्मान मिलने पर पीएम मोदी ने बधाई दी। उन्होंने कहा हम गर्व से कह सकते है कि भारत से निकली हर विचारधारा ने मानवहित को सर्वोपरि रखा। उन्होंने कहा कि बुद्ध के विचारों ने नवचेतना जगाने के साथ-साथ एशिया के कई देशों के राष्ट्रीय चरित्र को बुद्ध के विचार ही परिभाषित कर रहे हैं। बुद्ध का अर्थ बताते हुए पीएम मोदी ने कहा कि हिंसा के लिए प्रेरित मन को शुद्ध स्थिति में लाना ही बुद्ध है। उन्होंने कहा कि जाति, धर्म, भाषा और लिंग के आधार पर मनुष्य और मनुष्य के भीतर भेद करने का संदेश न भारत का हो सकता है, न बुद्ध का हो सकता है, धरती पर इस विचार के लिए जगह नहीं हो सकती। 

मोदी-जिनपिंग के बीच जुगलबंदी तो ठीक सजगता भी जरुरी

मोदी-जिनपिंग के बीच जुगलबंदी तो ठीक सजगता भी जरुरी 
              इसमें कोई दो राय नहीं कि अगर चीन भारत साथ साथ चले तो न सिर्फ वैश्विक नेतृत्व इनके हाथ में होगा, बल्कि आतंक की फैक्ट्री पाकिस्तान पर नकेल कसी जा सकती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दो दिवसीय अनौपचारिक वुहान दौरे के बाद से कुछ इसी तरह के कयास लगाएं जा रहे है। माना जा रहा है कि मोदी और जिनपिंग की जुगलबंदी दोनों देशों के बीच नए युग की शुरुआत होती दिख रही है। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि चीन एक ऐसा पड़ोसी है जो पाकिस्तान की तरह घिनौनी हरकत तो नहीं करता लेकिन पीठ में छुरा भोकने से भी बाज नहीं आता। ऐसे में यह कहा जा सकता है कि मोदी जिनपिंग की जुगजबंदी भारत-चीन की जनता के साथ पूरी दुनिया के लिए हितकारी तो हैं। पर भरोसा भी आंख मूंद कर नहीं बल्कि सावधानी के बीच तरेरे रहने क जरुरत है  
             सुरेश गांधी 
            बेशक, डोकलाम विवाद के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग को बता दिया अब 1962 वाला भारत नहीं है। भारत किसी भी संकट या उसे आंखे दिखाने वाले को सबक सिखा सकता है। यही वजह भी है कि चीन ने डोकलाम विवाद को खत्म करने में ही अपनी भलाई समझा और अब भारत से दोश्ताना के लिए दो दो हाथ करने को तैयार है। इसकी झलक दो दिवसीय दौरे के दौरान वुहान में भी देखने को मिला। वुमान में दोनों नेताओं के बीच हुई बातचीत को भी इसी कड़ी से जोड़क देखा जा रहा है। कहा जा सकता है विश्व की सबसे ज्यादा आबादी वाले देश चीन और भारत आपसी मतभेदों को दूर करने और सहयोग को बढ़ाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। मोदी और जिनपिंग दोनों का ही यह मानना है कि अगर वे आपसी मतभेद को दूर करने और सहयोग को बढ़ाने में कामयाब होते हैं, तो वे दुनिया में अपना प्रभाव स्थापित कर सकते हैं। चीनी राष्ट्रपति का संकेत साफ है कि अब चीन और भारत एशिया में बादशाहत कायम करने की प्रतिद्वंदिता से ऊपर उठकर वैश्विक नेतृत्व करने की दिशा में आगे बढ़ेंगे। वहीं, पीएम मोदी भी मानते हैं कि दुनिया की 40 फीसदी जनसंख्या का भला करने का दायित्व चीन और भारत के ऊपर है। 40 प्रतिशत जनसंख्या का भला करने का मतलब विश्व को अनेक समस्याओं से मुक्ति दिलाने का एक सफल प्रयास है। इस महान उद्देश्य को लेकर दोनों देशों का मिलना, साथ चलना और संकल्पों को पूरा करना अपने आप में एक बहुत बड़ा अवसर है। 
                 मोदी जिनपिंग की यह सोच दोनों देशों एवं उसके जनता के लिए सही भी है। लेकिन बड़ा सवाल है कि क्या प्रधानमंत्री मोदी चीन की धोखे और अविश्वास वाली उस मानसिकता को खत्म करने में कामयाब हो पाएंगे जिसके चलते दोनों देशों के संबंध एक कदम आगे बढ़ते हैं तो दो कदम पीछे हट जाते हैं। चीन की इसी मानसिकता के चलते तीस साल के फासले पर भारत और चीन का रिश्ता जस का तस खड़ा है। बातों में भरोसे की कोशिश लेकिन जमीन पर अविश्वास का माहौल हमेशा बना रहता है। हमें हिन्दी चीनी भाई भाई के नारे को भी नहीं भूलना चाहिए। इस नारे का ही तकाजा था कि साल 2017 के अंत तक भारत में चीन का निवेश 532 अरब रुपये का आंकड़ा पार कर गया है। या यू कहें  चीन ने भारत के बाजार पर काफी हद तक कब्जा कर रखा है। या यू कहे चीन के लिए भारत कमाऊ पुत है। इसके बावजूद डोकलाम को लेकर तीन महीने तक दोनों देशों के बीच खींचतान जारी रही। पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर में चीन के दखल को लेकर विवाद अभी भी जस का तस है। मसूद अजहर को अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी घोषित करने की फाइल अभी चीन के चलते ही अटका पड़ा है। ऐसे में बड़ा सवाल तो यही है क्या भारत से रिश्तों की कीमत पर वो यहां सड़क और दूसरे इंफ्रास्ट्रक्चर बनाता रहेगा? आतंकी अजहर को अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी घोषित कराने में भारत की कोशिशों का समर्थन करेगा या आगे भी अड़ंगा ही लगाएगा? क्या न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप यानी एनएसजी में भारत की एंट्री को चीन समर्थन के लिए तैयार होगा? क्या उस कारोबारी असंतुलन को मिटाने की है, जिसमें चीन ने तो भारत पर कब्जा रखा है लेकिन भारत का चीन में उसके कारोबार का एक चैथाई भी नहीं हैं? ये ऐसे सवाल है जिसके उत्तर का इंतजार हमेशा रहेगा। 
             फिरहाल, इन सवालों के बीच अगर मोदी जिनपिंग के बीच दोस्ती आगे बढ़ती है तो स्वागतयोग्य है। क्योंकि पिछले साल डोकलाम में 72 दिन तक चले गतिरोध के बाद विश्वास बहाल करने और संबंध सुधारने के भारत और चीन के प्रयासों के तौर पर देखा जा रहा है। वैसे भी पड़ोसी और बड़ी ताकतें होने के नाते यह लाजमी है कि दोनों देशों में मतभेद होंगे। लेकिन समय पर विवाद सलट जाएं तो सोने पर सुहागा से भी कम नहीं। ऐसी स्थिति में शांतिपूर्वक और आपसी सम्मान को बनाए रखते हुए उसका निपटारा हो ही जाना चाहिए और इसके लिए कोशिश की जानी चाहिए। सौहार्दपूर्ण रिश्तों के लिए जरूरी है कि दोनों देशों की सीमाओं पर शांति बनी रहे। ऐसे में दोनों देशों को आपसी भरोसे को और मजबूत बनाने की दिशा में काम करना होगा। यह कोशिश उस वक् देखने को मिली जब चीन जैसी महाशक्ति का राष्ट्रपति प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आगवनी के लिए एअरपोर्ट पर 52 सेकेंड तक इंतजार किया। फिर 28 सेकेंड तक मोदी से हाथ मिलाए रखा। दोनों शीर्ष नेता कई बार बहुत अच्छे मूड में दिखाई दिए। डोकलाम सीमा विवाद के बाद श्रीलंका, नेपाल और मालदीव में चीन के बढ़ते हस्तक्षेप के मद्देनजर मोदी और शी की यह अनौपचारिक वार्ता महत्वपूर्ण है। इस दौरान दोनों नेताओं के बीच सीमा विवाद सुलझाने समेत कई अहम मुद्दों पर चर्चा हुई। मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच भारत-चीन सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति और संयम बनाए रखने को लेकर सहमति बनी है। दोनों नेता अपनी-अपनी सेनाओं को सामरिक दिशानिर्देश देने और शांति बनाए रखने के लिए जरूरी स्ट्रैटेजिक मेकेनिज्म मजबूत करने पर राजी हुए हैं। जो अच्छे संकेत है। 
              हो सकता है जिनपिंग मोदी से गहरी दोस्ती करके दुनिया का सबसे बड़ा खिलाड़ी बनना चाहते हो। हो सकता है अब वह एशिया में भारत से प्रतिद्वंदिता की बजाय वैश्विक दबदबा बनाने की कोशिश में हो। लेकिन इसमें भारत का भी हित निहित है। क्योंकि पड़ोसी से दुश्मनी किसी भी दशा में ठीक नहीं है। भारत और चीन के बीच 3,488 किमी लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा है। दोनों देशों को जल्द ही हॉटलाइन से भी जोड़ा जा सकता है। दोनों देशों को हॉटलाइन से कनेक्ट करने का सीनियर सैन्य नेतृत्व बेसब्री से इंतजार कर रहा है। हालांकि दोनों देश हॉटलाइन से कब जुड़ेंगे, इसको लेकर अभी विस्तार से जानकारी नहीं मिल पाई है। पीएम मोदी का यह दौरा औपचारिक नहीं था, जिसके मद्देनजर दोनों देशों के बीच कोई आधिकारिक समझौता नहीं हुआ। लेकिन दोनों राष्ट्राध्यक्षों के बीच जो बातचीत हुई, उसका भविष्य में कई मसलों पर असर दिखने की संभावना है। इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है, जब दोनों देशों के राष्ट्राध्यक्षों के बीच इस तरह अनौपचारिक वार्ता हुई  हो। पीएम मोदी ने खुद दुनिया के नेताओं से इस परंपरा को आगे बढ़ाने का आह्वान किया है। हालांकि, इस वार्ता में कोई आधिकारिक समझौता नहीं हुआ, लेकिन सीमा विवाद और आतंकवाद जैसे तमाम मुद्दों पर दोनों नेताओं के बीच सकारात्मक बातचीत हुई। भारत और चीन के बीच अफगानिस्तान मसले को लेकर अहम बातचीत हुई। दोनों देश अफगानिस्तान में साथ मिलकर काम करेंगे। अफगान प्रोजेक्ट में दोनों देशों की आर्थिक भागीदारी होगी। दोनों देशों ने अफगानिस्तान में शांति कायम करने और आर्थिक मोर्चे पर मिलकर काम करने पर सहमति जताई है, ताकि यहां से आतंकवाद को जड़ से खत्म किया जा सके। 
           दोनों नेताओं ने विशेष प्रतिनिधियों द्वारा विवाद का बेहतर हल तलाशने का समर्थन किया। 2005 में जो पैरामीटर थे, उन्हीं के आधार पर सेकेंड स्टेज में बात होगी। साथ ही इस बाबत दोनों नेताओं ने फैसला किया कि वे अपनी-अपनी सेनाओं को सामरिक दिशानिर्देश जारी करेंगे ताकि हालात बेहतर हो सकें और डोकलाम जैसी स्थिति न पैदा हो। इस बात भी सहमति बनी कि दोनों देशों की सेनाओं के बीच संचार बढ़े और परस्पर विश्वास पैदा हो। कृषि, प्रौद्योगिकी, ऊर्जा और पर्यटन क्षेत्र पर भी बात की। साथ ही मौजूदा संस्थागत तंत्र को भी मजबूत किया जाएगा ताकि सीमाई इलाकों में हालात संभाले जा सकें। दोनों ही देश तेजी से विकसति हो रही अर्थव्यवस्था हैं। चीन और भारत, दोनों का काफी बड़ा घरेलू बाजार है। दोनों देशों की अर्थव्यवस्था दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ाने के लिए सबसे बेहतर माध्यम है। 1980 में भारत-चीन की अर्थव्यवस्था समान थी, चीन ने लगातार औद्योगिकीकरण पर काम किया, आज उसकी अर्थव्यवस्था भारत से पांच गुना अधिक है। अगर भारत अपने रवैए में सुधार करता है, तो चीन से उसे अधिक उत्पाद, क्षमता और इंफ्रास्ट्रक्चर मिल सकता है जो भारतीयों की जरूरत है। ये सवाल इसलिए खड़े हैं कि प्रधानमंत्री बनने के तुरंत बाद ही पीएम मोदी ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग को भारत बुलाया था लेकिन जिस वक्त शी जिनपिंग साबरमती नदी के किनारे झूला झूल रहे थे, उसी वक्त चीनी सैनिक जम्मू और कश्मीर के चुमार में घुस आए थे। 1988 में जिस वक्त राजीव गांधी चीनी राष्ट्रपति डेंग जिओपिंग से मुलाकात कर रहे थे, उस वक्त समडोरोंग में चीन का अतिक्रमण था। दरअसल 1954 में तब के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने चीन के साथ नए रिश्तों की बुनियाद रखने के मकसद से वहां की यात्रा की थी। लेकिन वो बुनियाद कमजोर निकला क्योंकि भारत के भरोसे के सीमेंट में उसने धोखे की रेत मिला दी.। तब से कोशिशें बहुत हुईं लेकिन कामयाबी नहीं मिली। अब फिर से प्रयास हो रहा है तो उम्मीद रखने में हर्ज क्या है। 

Sunday, 29 April 2018

वैशाख व बुद्ध पूर्णिमा: आज पूरे होंगे हर बिगड़े काम

वैशाख व बुद्ध पूर्णिमा: आज पूरे होंगे हर बिगड़े काम 
          वैशाख मास की एकादशी हो या अमावस्या, सभी तिथियां खास है। लेकिन इनमें वैशाख पूर्णिमा का विशेष महत्व है। क्योंकि इस दिन ही भगवान बुद्ध का जन्म हुआ था। इसी दिन बोध गया में पीपल के वृक्ष के नीचे उन्हें बुद्धत्व की प्राप्ति हुई थी। वैशाख पूर्णिमा के दिन ही भगवान बुद्ध ने गोरखपुर से 50 किलोमीटर दूर स्थित कुशीनगर में महानिर्वाण की ओर प्रस्थान किया था। दुनियाभर के बौद्ध गौतम बुद्ध की जयंती को धूमधाम से मनाते हैं...
            सुरेश गांधी 
            इस बार वैशाख पूर्णिमा 30 अप्रैल सोमवार को है। सोमवार को पूर्णिमा का योग होने से सोमवती पूर्णिमा का योग बन रहा है। खास यह है कि इस बार वैशाख पूर्णिमा पर 3 साल बाद सिद्धि योग का शुभ संयोग बन रहा है। अब यह संयोग वर्ष 2022 में बनेगा। इस दिन स्वाति नक्षत्र और तुला राशि का चंद्रमा समृद्धि व वैभव प्रदान करेगा। यह योग कैरियर और कारोबार में सफलता के साथ साथ दान से लेकर खरीदारी तक के लिए शुभ माना जाता है। इस दिन सत्य विनायक व्रत रखने का विशेष विधान है। मान्यता है कि इस दिन यह व्रत रखने से व्रती की दरिद्रता दूर होती है। उसके बिगड़े काम बनते हैं। इस शुभ योग में शिवलिंग पर दूध चढ़ाने से धन की प्राप्ति होती है। वैशाख पूर्णिमा को ‘सत्य विनायक पूर्णिमा‘ के तौर पर भी मनाया जाता है। मान्यता है कि इसी दिन श्रीकृष्ण ने उनसे मिलने पहुंचे उनके मित्र सुदामा को सत्य विनायक व्रत करने की सलाह दी थी, जिसके प्रभाव से उनकी दरिद्रता समाप्त हो सकी। इसके अलावा इस दिन ‘धर्मराज‘ की पूजा का भी विधान है। धर्मराज की इस दिन पूजा-उपासना से साधक को अकाल मृत्यु का भय नहीं सताता है। इसे सोमवती पूर्णिमा भी कहा जाता है। इस दिन गुरू का विशाखा नक्षत्र भी है। इस दिन भगवान बुद्ध की जयंती भी है जिसे बुद्ध पूर्णिमा कहते हैं। इसी दिन भगवान बुद्ध को ज्ञान भी मिला था इसी दिन भगवान बुद्ध ने अपनी देह का त्याग भी किया था। 
          वैशाख पूर्णिमा भगवान बुद्ध के जीवन से बहुत गहराई से जुड़ी हुई है। इस दिन भगवान बुद्ध का ध्यान करना विशेष लाभदायक होता है। दुनिया भर में इस दिन भगवान बुद्ध की याद में कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। भगवान बुद्ध को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। इस दिन को दैवीयता का दिन भी माना जाता है। इस दिन ब्रह्म देव ने काले और सफेद तिलों का निर्माण भी किया था। अतः इस दिन तिलों का प्रयोग जरूर करना चाहिए। इस दिन बृहस्पति चंद्र का अद्भुत योग भी होगा। स्वास्थ्य और जीवन का कारक सूर्य अपनी उच्च राशि में होगा। इसके अलावा सुख को बढ़ाने वाला ग्रह शुक्र भी स्वगृही होगा। इस पूर्णिमा को स्नान और दान करने से चन्द्रमा की पीड़ा से मुक्ति मिलेगी। साथ ही साथ आर्थिक स्थिति भी अच्छी होती जाएगी। मान्यता है कि इस दिन स्नान करने से व्यक्ति के पिछले कई जन्मों के पापों से मुक्ति मिल जाती है। यह स्नान लाभ की दृष्टि से अंतिम पर्व माना जाता है। बुद्ध पूर्णिमा पर बौद्ध मतावलंबी बौद्ध विहारों और मठों में इकट्ठा होकर एक साथ उपासना करते हैं। दीप जलाते हैं। रंगीन पताकाओं से सजावट की जाती है और बुद्ध की शिक्षाओं का अनुसरण करने का संकल्प लेते हैं। इस दिन भक्त भगवान महावीर पर फूल चढ़ाते हैं, अगरबत्ती और मोमबत्तियां जलाते हैं तथा भगवान बुद्ध के पैर छूकर शांति के लिए प्रार्थना करते हैं। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, महात्मा बुद्ध को भगवान विष्णु का अवतार माना गया है। इस दिन लोग व्रत-उपवास करते हैं। बौद्ध और हिंदू दोनों ही धर्मों के लोग बुद्ध पूर्णिमा को बहुत श्रद्धा के साथ मनाते हैं। बुद्ध पूर्णिमा का पर्व बुद्ध के आदर्शों और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। 
चंद्रमा करेगा धन की अमृत वर्षा  
            शास्त्रों के अनुसार पूर्णिमा के दिन चंद्रमा, विष्णु भगवान और माता लक्ष्मी की पूजा करने से चारो तरफ से सुख-समृद्धि और वैभव की प्राप्ति होती है। सिद्धि योग और सोमवार के चलते यह तिथि बहुत महत्वपूर्ण हो गई है। कहते है पूर्णिमा पर ज्योतिष में बताए उपायों को विधि विधान से करने से जीवन में तमाम तरह की परेशानियों का अंत हो जाता है। चंद्रमा को सफेद रंग और शीतलता का प्रतीक माना गया है। इसलिए इस योग में दूध और शहद के उपाय से धन, मान-सम्मान में बढ़ोत्तरी होती है। पूर्णिमा की तिथि पर सुबह स्नान के बाद माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु की पूजन करने के बाद दिनभर अपने मन में ऊं सोम सोमाय नमः के मंत्र का जप करना चाहिए। पूर्णिमा की रात को कच्चे दूध में पूजा के उपयोग में लाने वाले शहद और चंदन को मिलाकर उसमें अपनी छाया देखें फिर चंद्रमा को अघ्र्य दें। इस तिथि को चन्द्रमा सम्पूर्ण होता है। या यूं कहें सूर्य और चन्द्रमा समसप्तक होते हैं। इस तिथि पर जल और वातावरण में विशेष ऊर्जा आ जाती है। चन्द्रमा इस तिथि के स्वामी होते हैं। अतः इस दिन हर तरह की मानसिक समस्याओं से मुक्ति मिल सकती है। इस दिन स्नान, दान और ध्यान विशेष फलदायी होता है। इस दिन सत्यनारायण देव या शिव जी की उपासना अवश्य करनी चाहिए। भविष्य पुराण और आदित्य पुराण के अनुसार बैशाख पूर्णिमा अत्यन्त पवित्र और फलदायिनी बताई गयी है। इस दिन महीने भर से चले आ रहे बैशाख स्नान और महीने भर से चले आ रहे धार्मिक अनुष्ठान आदि की पूर्णाहुति होती है। स्वाति नक्षत्र 27 नक्षत्रों में दान में पुण्य प्रदान करने वाला है। इसके अधिपति वायुदेव हैं। इसी तरह सिद्धि योग के अधिपति गणेश है जो कि हर प्रकार के कार्य में सिद्धि प्रदान करने वाले हैं। तुला के चंद्रमा से वैभव में वृद्धि होगी। कहते है नक्षत्रों में स्वाति ऐसा नक्षत्र है जिसमें दान करने से पुण्य होता है जिसपर वायुदेव का आधिपत्य है। बता दें कि सिद्धी योग के स्वामी गणपति हैं जो अपने भक्तों को हर तरह की सिद्धी प्रदान करते हैं। तुला का चंद्रमा राज प्रताप देने वाला है। इसलिए भी इस दिन का खास महत्व है। इस दिन लक्ष्मी मां की भी खासकर पूजा की जाती है।  
पूजन विधि 
        प्रातः काल स्नान के पूर्व संकल्प लें। पहले जल को सर पर लगाकर प्रणाम करें। फिर स्नान करना आरम्भ करें। स्नान करने के बाद सूर्य को अघ्र्य दें। साफ वस्त्र या सफेद वस्त्र धारण करें, फिर मंत्र जाप करें। मंत्र जाप के पश्चात सफेद वस्तुओं और जल का दान करें। चाहें तो इस दिन जल और फल ग्रहण करके उपवास रख सकते हैं। इस दिन खासकर अगर लक्ष्मी मां को प्रसन्न
करना चाहते हैं तो पीपल के पेड़ के नीचे घी का दीया जलाएं। पीपल के पेड़ पर इस दिन जल चढ़ाने से आपकी शनि की साढ़ेसाती कम हो सकती है। कुंवारी कन्याओं को खाना खिलाएं और उपहार दें। इससे कुछ अच्छा होगा। इस दिन हनुमान जी को प्रसन्न करने के लिए सिंदूर और चमेली का तेल चढ़ाएं। इस व्रत को विधिपूर्वक करने से व्रती को अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता। इस दिन विशेष तौर से सूर्योदय से पूर्व उठकर घर में साफ-सफाई जरूर करें। पूजा के दौरान गाय के घी का दीपक जलाएं। धूप करें और कपूर जलाएं। मां लक्ष्मी को मखाने की खीर, साबू दाने की खीर या किसी सफेद मिठाई का भोग लगाएं। पूजा के बाद सभी में प्रसाद बाटें. ध्यान रखें कि इस दिन घर में कलह का माहौल बिल्कुल न हो। इस दिन व्रती को जल से भरे घड़े सहित पकवान आदि भी किसी जरूरतमंद को दान करने चाहिये। स्वर्णदान का भी इस दिन काफी महत्व माना जाता है।
महात्मा बुद्ध का ज्ञान
         महात्मा बुद्ध ने हमेशा मनुष्य को भविष्य की चिंता से निकलकर वर्तमान में खड़े रहने की शिक्षा दी। उन्होंने दुनिया को बताया आप अभी अपनी जिंदगी को जिएं, भविष्य के बारे में सोचकर समय बर्बाद ना करें। बिहार के बोधगया में बोधिवृक्ष के नीचे महात्मा बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई और उनके ज्ञान की रौशनी पूरी दुनिया में फैली। महात्मा बुद्ध का एक मूल सवाल है। जीवन का सत्य क्या है? भविष्य को हम जानते नहीं है। अतीत पर या तो हम गर्व करते हैं या उसे याद करके पछताते हैं। भविष्य की चिंता में डूबे रहते हैं। दोनों दुखदायी हैं। बुद्ध के जीवन में दो स्त्रियां बहुत अहम स्थान रखती हैं। एक तो उनकी मौसी महापजापति गौतमी और दूसरी सुजाता जो उनके आत्मिक जन्म का निमित्त बनी। बुद्ध की जन्मदात्री मां उनके जन्म के बाद मर गईं लेकिन उनकी मौसी ने अपना दूध पिलाकर उनका पोषण किया। उसके लिए गौतमी ने अपने नवजात पुत्र को किसी और दाई को सौंपा और वह खुद बालक सिद्धार्थ का पालन करने लगी। गौतमी ने आगे चलकर बुद्ध से दीक्षा लेने की जिद की, उसके कारण संघ में स्त्री का प्रवेश हुआ, और वह बुद्धत्व को उपलब्ध हुई। दूसरी घटना है कि बुद्ध दिन रात बिना रुके ध्यान करते थे, इस वजह से उनका शरीर उपवास और तपस्या से क्षीण, अस्थिपंजर हो गया था। लेकिन एक पूर्णिमा के दिन उन्होंने सारे नियम तोड़ने का निश्चय किया और सहज स्वीकार भाव में बैठ गए। भोर के समय सुजाता नाम की स्त्री अपनी मन्नत पूरी करने के लिए खीर बनाकर ले आई। बुद्ध को देख कर उसे लगा, वृक्ष देवता प्रगट हुए हैं। उसने उन्हीं को भोग लगाया और खीर खाने की बिनती करने लगी। बुद्ध ने उसकी बिनती स्वीकार की और सुजाता के हाथ की खीर खाई। उसी दिन उन्हें बुद्धत्व की उपलब्धि हुई। उस दिन सुजाता उन्हें खीर नहीं खिलाती तो उनका शरीर नष्ट हो सकता था। बुद्ध की मां उनके जन्म के बाद नहीं रहीं थीं लेकिन उनकी मौसी ने अपना दूध पिलाकर उनका पोषण किया। महामानव वो होते हैं, जिन्होंने अपनी जिंदगी में ताउम्र कुछ ऐसी मिसाल कायम की, जिसके कारण उनको भगवान का दर्जा दिया गया। और वह अंत में देवत्व को प्राप्त होकर लोगों के पूज्य हो जाते हैं। उनके नाम पर एक विशेष धर्म जन्म लेता है। जो उस व्यक्ति के विचारों को आगे ले जाने के लिए अपने अनुयायियों को बढ़ाते हुए लोगों के अंदर नई शक्ति और नई चेतना का संचार करता है। इन्हीं में से एक थे भगवान बुद्ध, जिन्हें बौद्ध धर्म का निर्माता भी कहा जाता है। भगवान बुद्ध समय की महत्ता को बेहद अच्छी तरह से जानते थे। वह अपना हर क्षण कभी भी व्यर्थ नहीं जाने देते थे। एक बार उनके पास एक व्यक्ति आया और बोला, तथागत आप हर बार विमुक्ति की बात करते हैं। आखिर यह दुःख होता किसे है? और दुःख को कैसे दूर किया जा सकता है? प्रश्नकर्ता का प्रश्न निरर्थक था। तथागत बेतुकी चर्चा में नहीं उलझना चाहते थे। उन्होंने कहा, ‘अरे भाई! तुम्हें प्रश्न करना ही नहीं आया। प्रश्न यह नहीं था कि दुःख किसे होता है बल्कि यह कि दुख क्यों होता है?‘ और इसका उत्तर है कि आप निरर्थक चर्चाओं में समय न गवाएं ऐसा करने पर आपको दुःख नहीं आएगा। यह बात ठीक उसी तरह है कि किसी विष बुझे तीर से किसी को घायल कर देना और फिर बाद में उससे पूछना कि यह तीर किसने बनाया है? भाई उस तीर से लगने पर उसका उपचार जरूरी है न की निरर्थक की बातों में समय गंवाना। कई लोग, कई तरह की बेतुकी बातों में समय को पानी की तरह बहा देते हैं बहते पानी को तो फिर भी सुरक्षित किया जा सकता है लेकिन एक बार जो समय चला गया उसे वापिस कभी नहीं लाया जा सकता। इसलिए समय को सोच समझ कर खर्च करें। यह प्रकृति की दी हुई आपके पास अनमोल धरोहर है।
बुरे समय को ऐसे टालिए 
       शाम का समय था। महात्मा बुद्ध एक शिला पर बैठे हुए थे। वह डूबते सूर्य को एकटक देख रहे थे। तभी उनका शिष्य आया और आया और गुस्से में बोला, गुरुजी ‘रामजी‘ नाम के जमींदार ने मेरा अपमान किया है। आप तुरंत चलें, उसे उसकी मूर्खता का सबक सिखाना होगा। महात्मा बुद्ध मुस्कुराकर बोले, ‘प्रिय तुम बौद्ध हो, सच्चे बौद्ध का अपमान करने की शक्ति किसी में नहीं होती। तुम इस प्रसंग को भुलाने की कोशिश करो। जब प्रसंग को भुला दोगे, तो अपमान कहां बचेगा?‘। लेकिन तथागत, उस धूर्त ने आपके प्रति भी अपशब्दों का प्रयोग किया है। आपको चलना ही होगा। आपको देखते ही वह अवश्य शर्मिंदा हो जाएगा और अपने किए की क्षमा मांगेगा। बस, मैं संतुष्ट हो जाउंगा। महात्मा बुद्ध समझ गए कि शिष्य में प्रतिकार की भावना प्रबल हो उठी है। इस पर सदुपदेश का प्रभाव नहीं पड़ेगा। कुछ विचार करते हुए वह बोले, अच्छा वत्स! यदि ऐसी बात है तो मैं अवश्य ही रामजी के पास चलूंगा, और उसे समझाने की पूरी कोशिश करूंगा। बुद्ध ने कहा, हम सुबह चलेंगे। सुबह हुई, बात आई-गई हो गई। शिष्य अपने काम में लग गया और महात्मा बुद्ध अपनी साधना में। दूसरे दिन जब दोपहर होने पर भी शिष्य ने बुद्ध से कुछ न कहा तो बुद्ध ने स्वयं ही शिष्य से पूछा- प्रियवर! आज रामजी के पास चलोगे न?‘ नहीं गुरुवर! मैंने जब घटना पर फिर से विचार किया तो मुझे इस बात का आभास हुआ कि भूल मेरी ही थी। मुझे अपने कृत्य पर भारी पश्चाताप है। अब रामजी के पास चलने की कोई जरूरत नहीं। तथागत ने हंसते हुए कहा, ‘यदि ऐसी बात है तो अब अवश्य ही हमें रामजी महोदय के पास चलना होगा। अपनी भूल की क्षमा याचना नहीं करोगे।‘ 
गौतम बुद्ध के कुछ प्रमुख सूत्र
         गौतम बुद्ध प्रज्ञा पुरुष थे। उन्होंने धर्म को पारंपरिक स्वरूप से मुक्त कराकर उसे ज्ञान की तलाश से जोड़ा। उन्होंने विवेक को धर्म के मूल में रखा और तमाम रुढ़ियों को खारिज किया। उन्होंने ज्ञान को सर्वोच्च महत्व दिया और उनके इन विचारों की प्रासंगिकता आज भी है।पुष्प की सुगंध वायु के विपरीत कभी नहीं जाती लेकिन मानव के सदगुण की महक सब ओर फैलती है। तीन चीजों को लम्बी अवधि तक छुपाया नहीं जा सकता, सूर्य, चन्द्रमा और सत्य। हजार योद्धाओं पर विजय पाना आसान है, लेकिन जो अपने ऊपर विजय पाता है वही सच्चा विजयी है। हमारा कर्तव्य है कि हम अपने शरीर को स्वस्थ रखें, अन्यथा हम अपने मन को सक्षम और शुद्ध नहीं रख पाएंगे। हम आपने विचारों से ही अच्छी तरह ढलते हैं, हम वही बनते हैं जो हम सोचते हैं। जब मन पवित्र होता है तो खुशी परछाई की तरह हमेशा हमारे साथ चलती है। हजारों दीपों को एक ही दिए से, बिना उसके प्रकाश को कम किए जलाया जा सकता है। खुशी बांटने से कभी कम नहीं होती। अप्रिय शब्द पशुओं को भी नहीं सुहाते हैं। अराजकता सभी जटिल बातों में निहित है। परिश्रम के साथ प्रयास करते रहो। आप को जो भी मिला है उसका अधिक मूल्यांकन न करें और न ही दूसरों से ईष्र्या करें। वे लोग जो दूसरों से ईष्र्या करते हैं, उन्हें मन को शांति कभी प्राप्त नहीं होती। अतीत पर ध्यान केंद्रित मत करो, भविष्य का सपना भी मत देखो, वर्तमान क्षण पर ध्यान केंद्रित करो। आप चाहे कितने भी पवित्र शब्दों को पढ़ लें या बोल लें, लेकिन जब तक उन पर अमल नहीं करते उसका कोई फायदा नहीं है। इच्छा ही सब दुःखों का मूल है। जिस तरह उबलते हुए पानी में हम अपना, प्रतिबिम्ब नहीं देख सकते उसी तरह क्रोध की अवस्था में यह नहीं समझ पाते कि हमारी भलाई किस बात में है। चतुराई से जीने वाले लोगों को मौत से भी डरने की जरुरत नहीं है। वह व्यक्ति जो 50 लोगों को प्यार करता है, 50 दुखों से घिरा होता है, जो किसी से भी प्यार नहीं करता है उसे कोई संकट नहीं है।


Friday, 27 April 2018

आरबीआई द्वारा ओवरड्यूज चार्ज वसूले जाने पर भड़के निर्यातक

आरबीआई द्वारा ओवरड्यूज चार्ज वसूले जाने पर भड़के निर्यातक 
भेजे गए शिपमेंट का भुगतान तीन माह की अवधि में न मिलने पर बैंके दो प्रतिशत अधिक वसूल रही है बिलंब ब्याज 
बैंकों के इस रवैये से निर्यातकों की नींद हराम 
वित्त मंत्री, कपड़ा मंत्री, सीइपीसी एवं एकमा को पत्र भेंजकर निर्यातकों के हित में आवश्वयक कार्रवाई करने की मांग 
           सुरेश गांधी 
          भदोही। जीएसटी रिफंड व जीएसटी ई वे बिल की समस्या से कालीन निर्यातक अभी उबर भी नहीं पाएं कि अब आरबीआई ने नई गाइडलाइन जारी कर मुश्किलें और बढ़ा दी है। निर्यातकों के मुताबिक आरबीआई के नए गाइडलाइन के तहत अब बैंके भेजे गए शिपमेंट का भुगतान तीन माह की अवधि में न मिलने पर दो प्रतिशत अधिक विलंब ब्याज वसूल रही है। बैंकों के इस रवैये से निर्यातकों की नींद हराम हो गयी है। काजीपुर के कालीन निर्यातक मुश्ताक अंसारी ने वित्त मंत्री अरुण जेटली, कपड़ा मंत्री स्मृति ईरानी समेत कालीन निर्यात संवर्धन परिषद एवं अखिल भारतीय कालीन निर्माता संघ के पदाधिकारियों को पत्र भेंजकर निर्यातकों के हित में आवश्वयक कार्रवाई करने की मांग की है। साथ में चेतावनी भी दी है कि यदि इसे तत्काल नहीं रोका गया तो निर्यातक सड़क पर उतरने के लिए बाध्य होंगे। 
           

श्री मुश्ताक अंसारी ने बताया कि कारपेट विदेशों में इक्स्पोर्ट होता है। अधिकांश आयातक अनुबंध के दौरान 6 से 12 महीने तक की उधारी की शर्त पर आर्डर देते हैं। इससे भेजे गए शिपमेंट का भुगतान कभी तीन चार माह में हो जाता है तो कभी कभी सालभर तक लटका देते हैं। ऐसे में भुगतान आने में अक्सर बिलंब हो जाता है। लेकिन अब बैंकों का फरमान है कि अगर भुगतान मिलने में तीन माह से अधिक बिलंब होगा तो दो प्रतिशत अतिरिक्त ब्याज लेंगे। बता दें, हाल के दिनों में भदोही समेत पूर्वांचल के कालीन निर्यातकों के तकरीबन पांच सौ करोड़ रुपये से अधिक जीएसटी रिफंड में फंसा पड़ा है। तमाम प्रयास के बाद भी उन्हें रिफंड नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में कुल लागत का बड़ी पूंजी रिफंड के रूप में फंसने से निर्यातकों का काम प्रभावित हो रहा है। छोटे निर्यातकों की कमर ही टूट ही गई हैं। ऐसे में आरबीआई का यह नया फरमान निर्यातकों के लिए काल बन गया है। श्री मुश्ताक अंसारी ने बताया कि सभी दस्तावेज पूरे होने के बाद भी हमें जीएसटी रिफंड के तहत अपना पैसा लेने में दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। सालभर से रिफंड न मिलने से कारोबार प्रभावित हो रहा है। वित्त मंत्रालय में शिकायत के बाद भी सुनवाई नहीं हो रही है। गौरतलब है कि भदोही से हर साल करीब पांच हजार करोड़ रुपये की कालीन निर्यात होती है। कालीन निर्यातकों का कहना है कि 12 फीसदी जीएसटी अदा करने के बाद कालीन निर्यात किया जाता है। इस लिहाज से अब तक करीब 500 करोड़ रुपये रिफंड मद में जमा हो चुका है। 


स्वराज के अमर पुजारी को काशी का नमन

स्वराज के अमर पुजारी को काशी का नमन  लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की पुण्यतिथि पर सिगरा तिराहे पर उमड़ा मराठी समाज , प्रतिम...