Saturday, 1 August 2026

बेटी नहीं, इंसानियत मर रही है… जबकि बेटियां बच गईं तो भारत बचेगा

बेटी नहीं, इंसानियत मर रही है… जबकि बेटियां बच गईं तो भारत बचेगा 

राजस्थान की हालिया घटनाओं ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या भारत सचमुच बेटी को बराबरी से स्वीकार कर पाया है? एक ओर नवजात बच्ची की हत्या, दूसरी ओर तीसरी बेटी के जन्म के बाद पिता की आत्महत्याये घटनाएं केवल अपराध नहीं, बल्कि उस गहरे सामाजिक दबाव का संकेत हैं जो आज भी लाखों परिवारों के भीतर मौजूद है। सरकार बेटियों की शिक्षा, सुरक्षा और आर्थिक भविष्य के लिए अनेक योजनाएं चला रही है; लोग उनका लाभ भी ले रहे हैं। फिर भी तीसरी बेटी पर मातम, अवसाद, शराब और सामाजिक शर्म का माहौल बताता है कि आर्थिक सहायता से ज्यादा जरूरी मानसिक बदलाव है। यह समस्या किसी एक राज्य तक सीमित नहीं। गांवों से महानगरों तक, पढ़े-लिखे परिवारों से लेकर गरीब बस्तियों तक, बेटा-बेटी को लेकर दोहरे मानदंड अब भी जिंदा हैं। जबकि सच यह है कि बेटियों के बिना परिवार, रिश्ते, वंश और समाजकुछ भी संभव नहीं। सवाल अब सिर्फ कानून का नहीं, सामाजिक चेतना का है। जब तक बेटी को अधिकार, सम्मान और बराबरी व्यवहार में नहीं मिलेगी, तब तक विकास के सारे दावे अधूरे रहेंगे  

सुरेश गांधी

राजस्थान से आई दो खबरों ने मेरे भीतर ऐसा सन्नाटा भर दिया कि शब्द भी शर्मिंदा हो उठे। एक अस्पताल में जन्म के महज 13 घंटे बाद एक नवजात बच्ची का गला उसके अपने पिता ने दबा दिया, क्योंकि वह उसकी तीसरी बेटी थी। दूसरी ओर, तीसरी बेटी के जन्म के बाद समाज के तानों और मानसिक दबाव से टूटकर एक पिता ने अपनी जीवन-लीला समाप्त कर ली। एक ने बेटी को मार दिया, दूसरा खुद मर गया। इन दोनों घटनाओं के बीच जो सबसे बड़ी मौत हुई, वह इंसानियत की थी। यह केवल राजस्थान की कहानी नहीं है। यह भारत के गांव-गांव, शहर-शहर और घर-घर में पसरी हुई उस मानसिकता की कहानी है, जहां बेटी का जन्म आज भी कई चेहरों पर मुस्कान नहीं, चिंता लिख देता है। फर्क बस इतना है कि कहीं यह चिंता हत्या बन जाती है, कहीं आत्महत्या, कहीं शराब में डूबा हुआ मौन, और कहीं उम्र भर की घुटन।

सरकारें बेटियों के लिए योजनाएं चला रही हैंबेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ; सुकन्या समृद्धि योजना; छात्रवृत्तियां; मुफ्त शिक्षा; पोषण योजनाएं; आर्थिक सहायता। करोड़ों परिवार इन योजनाओं का लाभ भी ले रहे हैं। मेरे ही पड़ोस का एक युवक हैदीपक। जब उसकी पहली बेटी हुई थी तो घर में ढोल बजे थे, मिठाइयां बंटी थीं। उसने गर्व से कहा था—“अब बेटियां भी पढ़ेंगी, सरकार मदद कर रही है, चिंता की कोई बात नहीं।लेकिन कुछ वर्ष बाद जब तीसरी बेटी हुई तो वही दीपक फूट-फूटकर रो रहा था। वह लगातार शराब पी रहा था। उससे पूछा गया तो बोला—“तीन-तीन बेटियां हो गईं, अब क्या होगा?” उसी क्षण मुझे लगा कि योजनाएं दिमाग तक पहुंची हैं, दिल तक नहीं पहुंचीं। यही हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी है। हम देवी की पूजा करते हैं, कन्या के पैर धोते हैं, नवरात्र में उन्हें घर बुलाकर भोजन कराते हैं; लेकिन घर में बेटी पैदा होते ही चेहरों की रोशनी बुझ जाती है। मंदिर में देवी की आरती और घर में बेटी पर मातमइस दोहरे चरित्र से बड़ा पाखंड शायद ही कोई हो।

हम बराबरी की बातें करते हैं, पर भीतर कहीं कहीं बेटे की चाह पालकर रखते हैं। गर्भवती महिला से लोग पूछते हैं—“इस बार क्या चाहिए?” और जवाब प्रायःबेटाहोता है। यदि कोई पूरे मन से कह दे—“ईश्वर तुम्हें बेटी दे”—तो वातावरण असहज हो उठता है। यह असहजता बताती है कि हमारे संस्कार अभी बराबरी तक नहीं पहुंचे हैं। हमारी भाषा तक बेटे के पक्ष में खड़ी है—“पुत्रवती भव”, “पूतों फलो”, “वंश का चिराग”, “कुलदीपक बेटी के लिए ऐसे गौरवसूचक शब्द हमने बनाए ही नहीं। समस्या केवल अशिक्षा की नहीं है। बड़े शहरों के पढ़े-लिखे, नौकरीपेशा, आधुनिक दिखने वाले परिवार भी भीतर से बेटे की इच्छा पाले रहते हैं। मेडिकल जांच पर रोक के बावजूद भ्रूण हत्या के मामले सामने आते हैं। कहीं नारियल का बीज खिलाया जाता है, कहीं ताबीज बांधा जाता है, कहीं जड़ी-बूटी दी जाती है कि लड़की लड़का बन जाए। विज्ञान अंतरिक्ष तक पहुंच चुका है, लेकिन हमारे घरों में अब भी बेटा पैदा करने के टोटके पल रहे हैं। यह अंधविश्वास नहीं, बेटी के अस्तित्व के प्रति अविश्वास है।

हम भूल जाते हैं कि बेटियों से ही परिवार बनते हैं। मां, बहन, पत्नी, बुआ, मौसी, मामी, चाची, नानी, दादीइन रिश्तों के बिना समाज की कल्पना ही नहीं की जा सकती। बेटी नहीं होगी तो आने वाली पीढ़ियां भी नहीं होंगी। फिर भी हम उसी आधार को कमजोर कर रहे हैं जिस पर परिवार और समाज खड़ा है। लिंगानुपात का संकट केवल सरकारी आंकड़ों का विषय नहीं है। जिन क्षेत्रों में बेटियों की संख्या घटती है, वहां विवाह, सामाजिक सुरक्षा, मानव तस्करी और महिलाओं के खिलाफ हिंसा जैसी समस्याएं बढ़ती हैं। प्रकृति का संतुलन बिगाड़ने की कीमत समाज को पीढ़ियों तक चुकानी पड़ती है। बेटी के जन्म पर मातम मनाने वाला समाज दरअसल अपने ही भविष्य पर मातम मना रहा होता है। समस्या की जड़ हमारे पारिवारिक और आर्थिक ढांचे में भी छिपी है। हमने मान लिया कि बेटानिवेशहै और बेटीखर्च बेटा घर में रहेगा, माता-पिता का सहारा बनेगा, संपत्ति संभालेगा; बेटी शादी करके चली जाएगी। यही सोच पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती रही है। जबकि आज वास्तविकता बदल चुकी है। देश के लाखों परिवारों में बेटियां माता-पिता का सहारा बन रही हैं, उनका इलाज करा रही हैं, घर चला रही हैं, बुजुर्गों की सेवा कर रही हैं। फिर भी सामाजिक धारणा बदलने को तैयार नहीं।

सबसे बड़ा विरोधाभास संपत्ति को लेकर दिखाई देता है। कानून बेटियों को बराबरी का अधिकार देता है, लेकिन व्यवहार में कितने पिता अपनी बेटियों को स्वेच्छा से हिस्सा देते हैं? अधिकतर मामलों में हिस्सा मांगना रिश्तों में तनाव, मुकदमेबाजी और सामाजिक दबाव का कारण बन जाता है। लोग अदालतों में वर्षों लड़ते रहते हैं, लाखों रुपये खर्च कर देते हैं, लेकिन बेटी को अधिकार देने में संकोच करते हैं। यह केवल कानूनी नहीं, नैतिक प्रश्न है। हम बेटी को आशीर्वाद देते हैं, लेकिन अधिकार देने से डरते हैं। जब तक परिवार की परिभाषा नहीं बदलेगी, सोच नहीं बदलेगी। विवाह का अर्थ बेटी काघर छोड़नानहीं होना चाहिए। बेटा और बेटी दोनों समान रूप से अपने माता-पिता के प्रति उत्तरदायी हों। संपत्ति, संस्कार, जिम्मेदारी और देखभालसबमें समानता हो। विकसित समाजों में संतान का मूल्य उसके लिंग से नहीं, उसके व्यक्तित्व और उत्तरदायित्व से तय होता है। हमें भी उसी दिशा में बढ़ना होगा।

शिक्षा यहां निर्णायक भूमिका निभा सकती है। स्कूलों में लैंगिक समानता केवल पाठ्यपुस्तक का अध्याय बनकर रह जाए। बच्चों को बचपन से सिखाया जाए कि बहन का अधिकार दया नहीं, न्याय है; बेटी बोझ नहीं, बराबर की नागरिक है। बेटों को घर के काम, देखभाल और संवेदनशीलता का संस्कार दिया जाए। परिवार में सम्मान की शुरुआत बचपन से होती है। मीडिया और संस्कृति की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। फिल्मों, धारावाहिकों और लोकगीतों में बेटा-केंद्रित गौरवगाथाएं अब भी प्रचुर हैं। बेटी के जन्म को सामान्य, सम्मानजनक और आनंददायक सामाजिक घटना के रूप में प्रस्तुत करना सांस्कृतिक परिवर्तन की दिशा में बड़ा कदम हो सकता है। समाज वही सीखता है जिसे बार-बार सम्मान दिया जाता है। धार्मिक और सामाजिक नेतृत्व को भी आगे आना होगा। मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च, आश्रम और पंचायतें यदि बेटी के सम्मान का सार्वजनिक संदेश दें, बेटी के जन्म पर सामूहिक अभिनंदन की परंपरा शुरू करें, तो उसका प्रभाव गहरा होगा। सामाजिक परिवर्तन केवल कानून से नहीं, सामूहिक नैतिक दबाव से आता है।

और एक बात बहुत जरूरी है। बेटियों के साथ होने वाले अपराधों कोइज्जतसे जोड़ना बंद करना होगा। इज्जत किसी शरीर में नहीं, इंसान की गरिमा में होती है। बेटियों को दया और डर नहीं, आत्मविश्वास और आत्मरक्षा सिखाइए। उन्हें यह भरोसा दीजिए कि वे परिवार की बराबर की सदस्य हैं, किसी की अमानत नहीं। आज आवश्यकता केवलबेटी बचाओकी नहीं, “सोच बचाओकी है। सरकारें योजनाएं बना सकती हैं, कानून लिख सकती हैं, बजट बढ़ा सकती हैं; लेकिन घर के भीतर बैठी मानसिकता को बदलना समाज को ही होगा। जब किसी घर में तीसरी बेटी पैदा होने पर वही खुशी होगी जो तीसरे बेटे पर होती है, तब समझिए कि भारत सचमुच विकसित होने की दिशा में बढ़ चला है। 13 घंटे की बच्ची की हत्या केवल एक मासूम की हत्या नहीं थी; वह हमारी संवेदना, हमारी सभ्यता और हमारे संविधान की आत्मा पर हमला था। धौलपुर के पिता की आत्महत्या केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं थी; वह समाज के निर्मम दबाव की चार्जशीट थी। इन दोनों घटनाओं के बीच खड़ा भारत स्वयं से प्रश्न पूछ रहा हैक्या हम सचमुच आधुनिक हो गए हैं, या केवल मोबाइल और इंटरनेट वाले पुराने लोग हैं?

यदि गला घोंटना ही है तो उस सोच का घोंटिए जो बेटी के जन्म पर मातम मनाती है। उस व्यवस्था का घोंटिए जो औरत को केवल बेटा पैदा करने की मशीन समझती है। बेटियों को सांस लेने दीजिए, निर्णय लेने दीजिए, संपत्ति में हिस्सा दीजिए, परिवार में समान स्थान दीजिए। विश्वास मानिए, जिस घर में बेटी सम्मान से जीती है, वहां उजाला केवल एक कमरे में नहीं, पूरे समाज में फैलता है। और शायद उसी दिन हम यह कहने का नैतिक अधिकार पा सकेंगे कि भारत केवल आर्थिक रूप से नहीं, मानवीय रूप से भी सचमुच विकसित हो रहा है। राजस्थान की दो घटनाएं केवल अपराध नहीं, उस राष्ट्रीय मानसिकता का आईना हैं जो आज भी बेटी के जन्म को बोझ, संकट और सामाजिक शर्म से जोड़कर देखती है। राजस्थान की दो घटनाएं केवल अपराध नहीं, उस सड़ चुकी सामाजिक मानसिकता का आईना हैं जो बेटी के जन्म को आज भी बोझ, भय और अपमान से जोड़कर देखती है.

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