Tuesday, 1 September 2026

गंगा चेतावनी रेखा पार, ठहरी रफ्तार ने बढ़ाई मुश्किलें

गंगा चेतावनी रेखा पार, ठहरी रफ्तार ने बढ़ाई मुश्किलें 

राजघाट पर 70.29 मीटर पहुंचा जलस्तर, गरज-चमक के साथ बारिश जारी; बाढ़ क्षेत्रों में अफसरों का नाव से तूफानी निरीक्षण

सुरेश गांधी

वाराणसी। गंगा का मिजाज मंगलवार को भी तल्ख रहा। लगातार बारिश और ऊपर से रहे पानी के बीच राजघाट स्थित केंद्रीय जल आयोग के गेज पर शाम चार बजे गंगा का जलस्तर 70.29 मीटर दर्ज किया गया। यह 70.262 मीटर की चेतावनी रेखा से 2.8 सेंटीमीटर ऊपर है, जबकि खतरे के निशान 71.262 मीटर से अभी 97.2 सेंटीमीटर नीचे है। हालांकि शाम चार बजे जलस्तर की रफ्तार स्थिर (स्टीडी) रही। दिनभर तड़तड़ाती गरज-चमक के साथ बारिश ने तटवर्ती इलाकों की चिंता बढ़ाए रखी।

इसी बीच पुलिस कमिश्नर मोहित अग्रवाल और जिलाधिकारी सत्येंद्र कुमार ने बाढ़ की जमीनी तस्वीर देखने के लिए एनडीआरएफ की नाव से गंगा-वरुणा के बाढ़ प्रभावित इलाकों का तूफानी दौरा किया। नमो घाट से निकले अधिकारी गंगा-वरुणा के संगम आदि केशव घाट से आगे बढ़े और सलारपुर, सरैया, कोनिया, पुल कोहना, ढेलवरिया, सराय मोहना समेत प्रभावित क्षेत्रों का जायजा लिया। जलभराव, तटवर्ती आबादी और राहत-बचाव की तैयारियों को परखा तथा स्थानीय लोगों से सीधे संवाद कर सुविधाओं की जानकारी ली।

अधिकारियों ने प्रभावित लोगों को भरोसा दिलाया कि दैवी आपदा की इस घड़ी में प्रशासन उनके साथ खड़ा है। जिलाधिकारी ने सभी विभागों को अलर्ट मोड में रखते हुए प्रभावित क्षेत्रों में निरंतर निगरानी और जरूरत पड़ने पर लोगों को तत्काल सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने के निर्देश दिए। राहत एवं बचाव के लिए नाव और अन्य संसाधन पर्याप्त रखने को कहा गया।

इसके बाद दोनों अधिकारियों ने प्राथमिक विद्यालय सलारपुर और विद्या विहार इंटर कॉलेज सलारपुर, रसूलगढ़ स्थित राहत शिविरों का निरीक्षण किया। शिविरों में भोजन, पेयजल, बिजली, प्रकाश, शौचालय, स्वच्छता और स्वास्थ्य सुविधाओं की पड़ताल की। बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों की जरूरतों पर विशेष ध्यान देने तथा नियमित स्वास्थ्य जांच और दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने को कहा गया। सुरक्षा के मद्देनजर राहत शिविरों में सीसीटीवी कैमरे लगाने का निर्देश भी दिया गया।

प्रशासन के निर्देश

अलर्ट मोड : सभी संबंधित विभाग पूरी तरह सतर्क रहें।

निरंतर निगरानी : बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में लगातार नजर रखी जाए।

तत्काल निकासी : खतरा बढ़ने पर प्रभावितों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जाए।

नाव तैयार रहें : राहत-बचाव के लिए पर्याप्त नाव और संसाधन उपलब्ध रहें।

शिविरों में सुविधा : भोजन, पानी, बिजली, शौचालय, सफाई और स्वास्थ्य सेवाएं निर्बाध रहें।

स्वास्थ्य पर नजर : शिविरों में नियमित स्वास्थ्य परीक्षण और जरूरी दवाएं उपलब्ध हों।

सुरक्षा मजबूत : राहत शिविरों में सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं।

एनडीआरएफ-पुलिस सतर्क : आपात स्थिति में त्वरित कार्रवाई और लगातार पेट्रोलिंग सुनिश्चित हो। 



मुरली से महाभारत तक... कृष्ण में बसता है जीवन का पूरा दर्शन

मुरली से महाभारत तक... कृष्ण में बसता है जीवन का पूरा दर्शन 

कृष्ण को समझना हो तो वृंदावन की मुरली के साथ कुरुक्षेत्र का शंखनाद भी सुनना होगा। नंदलाल की बाललीलाओं में जीवन का उल्लास है तो सुदामा की मित्रता में रिश्तों की निर्मलता। रास में प्रेम की पराकाष्ठा है तो द्वारका में राजनीति की दूरदृष्टि और कुरुक्षेत्र में कर्म का विराट दर्शन। यही बहुआयामी व्यक्तित्व कृष्ण को केवल आराध्य नहीं, बल्कि जीवन का मार्गदर्शक बनाता है। भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी की मध्यरात्रि जन्मे कृष्ण का जीवन अंधकार में प्रकाश की उस शाश्वत उम्मीद का प्रतीक है, जो अन्याय के सामने झुकना नहीं सिखाती। उन्होंने सत्ता को लक्ष्य नहीं, लोकमंगल का साधन माना। स्वयं सिंहासन से दूर रहे, लेकिन राजसत्ताओं और इतिहास की दिशा तय करते रहे। अर्जुन के सारथी बनकर उन्होंने गीता में कर्म का ऐसा मंत्र दिया, जिसकी प्रासंगिकता युगों बाद भी कम नहीं हुई। उनका संदेश हैपरिस्थितियों से पलायन नहीं, विवेक और धैर्य के साथ उनका सामना करो। आज शोर, तनाव और स्वार्थ से घिरे समाज में कृष्ण की बांसुरी भीतर की शांति, संतुलन और प्रेम की पुकार है। इसलिए जन्माष्टमी केवल जन्मोत्सव नहीं, अपने भीतर धर्म, कर्म और सत्य के कृष्ण को जगाने का पर्व है 

सुरेश गांधी

कृष्ण को समझना हो तो केवल उनकी मुरली की धुन मत सुनिए, कुरुक्षेत्र के शंखनाद को भी सुनना होगा। केवल वृंदावन की गलियों में उनके पीछे दौड़ते ग्वाल-बालों को मत देखिए, हस्तिनापुर की राजनीति के बीच धर्म और न्याय के लिए खड़े उस सारथी को भी देखिए, जिसने स्वयं हथियार उठाने का संकल्प लेकर भी पूरी युद्धनीति की दिशा बदल दी। कृष्ण इसलिए केवल आराध्य नहीं हैं, वे जीवन को समझने की एक दृष्टि हैं। योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण को भगवान विष्णु का आठवां अवतार माना जाता है। द्वापर युग में उनका अवतरण केवल कंस के अत्याचार का अंत करने के लिए नहीं हुआ था, बल्कि धर्म, सत्य और न्याय की पुनर्स्थापना के लिए हुआ था। उनका जीवन जितना अलौकिक है, उतना ही मानवीय भी। बालक कृष्ण की शरारतों में जीवन का उल्लास है, रासलीला में प्रेम की पराकाष्ठा है, सुदामा की मित्रता में आत्मीयता है, द्वारका में शासन और कूटनीति है और कुरुक्षेत्र में कर्म, धर्म तथा कर्तव्य का विराट दर्शन। शायद यही वजह है कि सदियां गुजर गईं, राजवंश बदल गए, सभ्यताएं बदलीं, लेकिन कृष्ण की प्रासंगिकता कम नहीं हुई। बल्कि हर बदलते दौर में मनुष्य को अपने सवालों के उत्तर कृष्ण के जीवन और गीता के संदेश में दिखाई देते रहे। 

जन्म की वह मध्यरात्रि, जिसने युग की दिशा बदल दी

भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी की मध्यरात्रि। चारों ओर अंधकार, मथुरा का कारागार और अत्याचारी कंस का भय। इसी अंधेरी रात में कृष्ण का जन्म होता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार उनका जन्म रोहिणी नक्षत्र में हुआ। यही वह क्षण था जब एक बंदीगृह से आशा का ऐसा प्रकाश निकला, जिसने आगे चलकर अधर्म की सत्ता को चुनौती दी। कृष्ण का जन्म स्वयं एक संदेश बन गयाअंधकार कितना भी गहरा क्यों हो, प्रकाश का जन्म निश्चित है। उनका बालरूप तो जैसे आनंद का पर्याय है। नंद के आंगन में माखन चुराता कान्हा, यशोदा की डांट से बचता नटखट बालक, ग्वाल-बालों के साथ खेलता कृष्ण और बांसुरी की धुन से वृंदावन को मोह लेने वाला मुरलीधर। उनके व्यक्तित्व का यह पक्ष बताता है कि जीवन केवल संघर्ष का नाम नहीं है। उसमें हंसी, संगीत, प्रेम और उत्सव भी उतने ही जरूरी हैं।

रास में प्रेम, मित्रता में समानता

कृष्ण की रासलीला को केवल नृत्य के रूप में देखना उनके विराट व्यक्तित्व को सीमित करना होगा। भक्ति परंपरा में रास आत्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक है। यह वह भावभूमि है, जहां अहंकार पीछे छूट जाता है और समर्पण आगे जाता है। कृष्ण की मित्रता भी अपने आप में एक पाठ है। सुदामा के साथ उनका संबंध बताता है कि सच्ची मित्रता पद, प्रतिष्ठा और संपन्नता की मोहताज नहीं होती। द्वारका का राजा अपने निर्धन बालसखा को उसी आत्मीयता से गले लगाता है, जैसे वर्षों पहले गुरुकुल में लगाया था। आज जब रिश्तों का मूल्य अक्सर हैसियत से तय होने लगा है, कृष्ण-सुदामा की मित्रता बताती है कि मनुष्य की असली पहचान उसके पद से नहीं, उसके हृदय से होती है।

सत्ता मिली, लेकिन सत्ता के मोह से दूर रहे

कृष्ण का राजनीतिक व्यक्तित्व उनके आध्यात्मिक व्यक्तित्व जितना ही विराट है। मथुरा से लेकर द्वारका और हस्तिनापुर से कुरुक्षेत्र तक उनकी राजनीतिक दृष्टि असाधारण दिखाई देती है। उन्होंने परिस्थितियों को केवल स्वीकार नहीं किया, उन्हें बदला। कंस का अंत हो या जरासंध जैसी शक्तियों से निपटने की रणनीति, पांडवों के पक्ष में खड़े होने का निर्णय हो या महाभारत की जटिल राजनीतिहर जगह कृष्ण की दूरदृष्टि दिखाई देती है। सबसे बड़ी बात यह कि उन्होंने सत्ता को साध्य नहीं, साधन माना। वे स्वयं राजा बनने की लालसा से दूर रहे, लेकिन राजाओं और राजसत्ताओं की दिशा प्रभावित करते रहे। यही कृष्ण की राजनीति का सबसे बड़ा पाठ हैनेतृत्व हमेशा सिंहासन पर बैठकर नहीं किया जाता। कई बार सिंहासन से दूर खड़ा व्यक्ति ही पूरे युग की दिशा तय करता है। आज की राजनीति में जहां पद की दौड़ अक्सर उद्देश्य पर भारी पड़ जाती है, वहां कृष्ण का जीवन सवाल करता हैसत्ता बड़ी है या समाज? पद बड़ा है या जिम्मेदारी?

कुरुक्षेत्र में सारथी, लेकिन वास्तव में युग के मार्गदर्शक

महाभारत का युद्ध केवल दो सेनाओं के बीच युद्ध नहीं था। वह धर्म और अधर्म, न्याय और अन्याय, कर्तव्य और मोह के बीच संघर्ष था। कुरुक्षेत्र में अर्जुन जब अपने ही स्वजनों को सामने देखकर विचलित हो गए, तब कृष्ण ने उन्हें केवल युद्ध के लिए प्रेरित नहीं किया। उन्होंने मनुष्य को उसके कर्तव्य का बोध कराया। यहीं से जन्म लेती है गीता की वह अमर दृष्टि, जो हजारों वर्षों बाद भी मनुष्य के भीतर के संशय से संवाद करती है।

कर्मण्येवाधिकारस्ते...”

कृष्ण का संदेश स्पष्ट हैमनुष्य का अधिकार कर्म पर है, परिणाम पर नहीं। कर्म से पलायन समाधान नहीं है। परिस्थितियां कैसी भी हों, कर्तव्य से विमुख होना जीवन की सबसे बड़ी पराजय है। इसीलिए कृष्ण निराशा के देवता नहीं, आशा और कर्म के देवता हैं। वे बताते हैं कि समस्या से भागो मत, उसका सामना करो। भय से दबो मत, विवेक से निर्णय लो। परिणाम की चिंता में वर्तमान कर्म को मत खोओ।

चेहरे पर मुस्कान और मस्तिष्क में रणनीति

कृष्ण का सबसे आकर्षक पक्ष शायद यही है कि उनके चेहरे पर मुस्कान है, लेकिन उनके मस्तिष्क में पूरे युग की रणनीति चल रही है। वे बालक हैं तो नटखट हैं। मित्र हैं तो आत्मीय हैं। प्रेमी हैं तो समर्पित हैं। राजा हैं तो दूरदर्शी हैं। कूटनीतिज्ञ हैं तो असाधारण हैं। सारथी हैं तो मार्गदर्शक हैं और योगेश्वर हैं तो समूचे जीवन-दर्शन के शिक्षक। उनके व्यक्तित्व में विरोधाभास नहीं, बल्कि अद्भुत समन्वय है। कृष्ण हमें सिखाते हैं कि गंभीर होना और उदास होना एक बात नहीं है। कठिन परिस्थितियों में भी मुस्कुराते हुए सही निर्णय लेना ही वास्तविक जीवन-कौशल है।

बांसुरी की धुन से जीवन की लय तक

कृष्ण की बांसुरी भारतीय सांस्कृतिक चेतना का अमर प्रतीक है। बांसुरी में अपना कोई स्वर नहीं होता। वह भीतर से खाली होती है, तभी कृष्ण की सांस उसमें संगीत पैदा करती है। यह अपने आप में एक गहरा आध्यात्मिक संदेश हैजब मनुष्य अपने अहंकार को खाली करता है, तभी उसके भीतर ईश्वर की धुन उतरती है। आज की दुनिया में शोर बढ़ता जा रहा है। तनाव, प्रतिस्पर्धा, भागदौड़ और महत्वाकांक्षा के बीच मनुष्य अपने भीतर की शांति खोता जा रहा है। ऐसे समय में कृष्ण की बांसुरी हमें भीतर लौटने का निमंत्रण देती है। कृष्ण का संगीत केवल सुनने की चीज नहीं, जीवन को संतुलित करने की प्रेरणा है।

कृष्ण की राजनीतिपद नहीं, परिणाम की राजनीति

कृष्ण ने कभी राजनीति को केवल सत्ता प्राप्ति का माध्यम नहीं बनाया। उनकी राजनीति का केंद्र समाज और धर्म की रक्षा था। उन्होंने परिस्थिति के अनुसार रणनीति बदली, लेकिन लक्ष्य नहीं बदला। यही कारण है कि कहीं वे शांति-दूत दिखाई देते हैं, कहीं कूटनीतिज्ञ, कहीं रणनीतिकार और कहीं युद्धभूमि में सारथी। उन्होंने अर्जुन का रथ चलाया, लेकिन वास्तव में वे इतिहास का रथ चला रहे थे। महाभारत में कृष्ण स्वयं शस्त्र नहीं उठाते, फिर भी युद्ध की दिशा उन्हीं की रणनीति तय करती है। यह नेतृत्व की अद्भुत परिभाषा हैसच्चा नेतृत्व हर काम स्वयं करने में नहीं, सही व्यक्ति से सही काम कराने में है। आज जब नेतृत्व को अक्सर पद और अधिकार से जोड़कर देखा जाता है, कृष्ण का जीवन बताता है कि प्रभाव पद से नहीं, व्यक्तित्व और दृष्टि से पैदा होता है।

चार पुरुषार्थ और संतुलित जीवन का संदेश

कृष्ण का दर्शन केवल युद्ध और कर्म तक सीमित नहीं है। भारतीय चिंतन में जीवन के चार पुरुषार्थ बताए गए हैंधर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इन चारों के बीच संतुलन ही जीवन को पूर्णता देता है। कृष्ण का जीवन भी इसी संतुलन का प्रतीक है। उनमें प्रेम है, लेकिन आसक्ति नहीं। राजनीति है, लेकिन पदलिप्सा नहीं। युद्ध है, लेकिन हिंसा का उत्सव नहीं। वैराग्य है, लेकिन जीवन से पलायन नहीं। वे संसार के बीच रहकर भी संसार के मोह से ऊपर उठने की प्रेरणा देते हैं। यही वजह है कि कृष्ण का दर्शन आज भी मनुष्य को यह समझने में मदद करता है कि जीवन से भागना नहीं है, बल्कि जीवन को सही दृष्टि से जीना है।

यदा यदा हि धर्मस्य...” का शाश्वत उद्घोष

कृष्ण के जीवन का मूल संदेश धर्म की स्थापना है। गीता में उनका उद्घोषयदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत...” आज भी उतना ही प्रासंगिक लगता है। धर्म का अर्थ यहां केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि न्याय, सत्य, कर्तव्य और मानवीय मर्यादा से है। जब समाज में अन्याय बढ़ता है, जब शक्तिशाली कमजोर का अधिकार छीनता है, जब सत्य दबने लगता है, तब किसी किसी रूप में कृष्ण का संदेश सामने आता हैअन्याय को स्वीकार मत करो। यही कारण है कि कृष्ण केवल मंदिरों में नहीं हैं। वे उस हर मनुष्य में हैं, जो अन्याय के सामने खड़ा होने का साहस करता है।

लोकनायक से राष्ट्रनायक तक

कृष्ण का व्यक्तित्व नेतृत्व की लगभग हर कसौटी को छूता है। उन्होंने लोकशक्ति को संगठित किया, समाज को दिशा दी, संकट में निर्णय लिया, मित्रता निभाई, शत्रु को पहचाना, कूटनीति की, युद्धनीति बनाई और अंततः धर्म की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया। उन्होंने सत्ता को अपने लिए नहीं मांगा। दूसरों को सत्ता दिलाई, लेकिन स्वयं सत्ता के मोह से बचे रहे। यही उन्हें सामान्य नायक से अलग करके राष्ट्रनायक बनाता है। राष्ट्रनायक वह नहीं जो सबसे ऊंचे सिंहासन पर बैठे। राष्ट्रनायक वह है जिसकी दृष्टि सबसे व्यापक हो, जिसकी चिंता सबसे अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे और जिसका जीवन स्वयं से पहले समाज के लिए समर्पित हो। कृष्ण का जीवन इसी आदर्श का प्रतीक है।

आज भी क्यों जरूरी हैं कृष्ण?

आज मनुष्य के पास साधन पहले से अधिक हैं, लेकिन संतोष कम है। सूचना अधिक है, लेकिन विवेक कम। संपर्क अधिक हैं, लेकिन संबंध कम। आवाजें अधिक हैं, लेकिन संवाद कम। ऐसे समय में कृष्ण की जरूरत और बढ़ जाती है। वे हमें सिखाते हैं

मुस्कुराना है, लेकिन वास्तविकता से आंख नहीं मूंदनी।

प्रेम करना है, लेकिन आसक्ति में नहीं डूबना।

राजनीति करनी है, लेकिन समाज को भूलकर नहीं। सत्ता में रहना है, लेकिन सत्ता के मोह में नहीं। संघर्ष करना है, लेकिन विवेक खोकर नहीं। कर्म करना है, लेकिन अहंकार के साथ नहीं। कृष्ण का यही समग्र दर्शन उन्हें केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं रहने देता। वे भारतीय जीवन-दृष्टि के सबसे विराट प्रतीकों में एक बन जाते हैं।

कृष्ण जन्माष्टमीएक जन्मोत्सव से कहीं अधिक

जन्माष्टमी इसलिए केवल भगवान कृष्ण के जन्म का उत्सव नहीं है। यह उस चेतना का उत्सव है, जो अंधकार में प्रकाश खोजती है। यह उस विश्वास का पर्व है कि अन्याय कितना भी शक्तिशाली क्यों हो, अंततः धर्म की विजय होती है। मध्यरात्रि में मंदिरों में जब शंख बजते हैं, घंटियां गूंजती हैं औरनंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल कीका स्वर उठता है, तब केवल एक बालक के जन्म की खुशी नहीं मनाई जाती। उस क्षण मनुष्य अपने भीतर भी एक नए कृष्ण के जन्म की कामना करता हैऐसे कृष्ण का, जो संकट में धैर्य दे, मोह में विवेक दे, संघर्ष में साहस दे और कर्म के रास्ते पर आगे बढ़ने की शक्ति दे। कृष्ण की सबसे बड़ी विशेषता शायद यही है कि वे हर व्यक्ति को अपने लगते हैं। किसी के लिए वे लड्डू गोपाल हैं, किसी के लिए मुरलीधर, किसी के लिए द्वारकाधीश, किसी के लिए योगेश्वर और किसी के लिए गीता के सारथी। लेकिन इन सभी रूपों के भीतर एक ही कृष्ण हैंप्रेम, नीति, कर्म, सत्य, साहस और लोकमंगल का विराट समन्वय। इसलिए कृष्ण को केवल जन्माष्टमी पर याद करना पर्याप्त नहीं। उनके संदेश को जीवन में उतारना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धा है। क्योंकि कृष्ण का जन्म केवल द्वापर में नहीं हुआ थाजब-जब मनुष्य निराशा से उठकर कर्म का रास्ता चुनता है, जब-जब अन्याय के सामने सत्य खड़ा होता है, जब-जब सत्ता से ऊपर समाज और स्वार्थ से ऊपर लोकमंगल को रखा जाता है, तब-तब कृष्ण हमारे भीतर जन्म लेते हैं। और शायद इसीलिए युग बदलते रहे, लेकिन कृष्ण नहीं बदले। मुरली की धुन आज भी वही हैबस उसे सुनने के लिए मनुष्य को अपने भीतर का शोर थोड़ा कम करना होगा।

जनसेवा के सफर में रविंद्र का जन्मदिन, उमड़ा अपनापन

जनसेवा के सफर में रविंद्र का जन्मदिन , उमड़ा अपनापन  गुलाब बाग कार्यालय में कार्यकर्ताओं ने काटा केक , पुष्पगुच्छ और मिठाई...