कफ-सिरप का ‘ग्लोबल जहर’ : भारत ही नहीं, दुनिया में भरोसे की नींव हिली
यह किस देश की त्रासदी है, जहां एक मां बच्चे को रात की खांसी से राहत दिलाने के लिए सिरप पिलाती है, और सुबह उसका शरीर ठंडा पड़ चुका होता है? यह किस स्वास्थ्य-व्यवस्था का चेहरा है जहां इलाज के नाम पर बाजारों में ऐसा जहर बेचा जा रहा है, जिसकी एक ढक्कन की खुराक गैंबिया, उज्बेकिस्तान, इंडोनेशिया और अब भारत के यूपी, एमपी व छत्तीसगढ़ जैसे भरी-भारकम आबादी वाले तीन राज्यों में बच्चों की सामूहिक मौत का कारण बन चुकी है? कफ-सिरप का यह मामला किसी घरेलू चूक की कहानी नहीं है। यह इंडियन फार्मा की वैश्विक विश्वसनीयता, सरकारी नियमन और दवा-माफिया के खतरनाक गठजोड़ की वह नई परत है, जिसे अब दुनिया नजरअंदाज़ नहीं कर रही, और भारत को भी नहीं करनी चाहिए। भारत को “फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड” कहा जाता है। लेकिन सवाल यह है, क्या दुनिया की फार्मेसी अब मौत की मेडिसिन तो नहीं बनने लगी? क्या दवा-उद्योग के पीछे छिपा यह ‘सफेदपोश सिंडिकेट’ हमारे सबसे मासूम नागरिकों, बच्चों, को अपनी लापरवाही और लालच की कीमत पर प्रयोगशाला का हिस्सा बना चुका है? कफ-सिरप कांड सिर्फ भारत की नहीं, पूरी दुनिया की दवा सुरक्षा को चुनौती देने वाला ‘ब्लैक रियलिटी शो’ बन चुका है। ऐसे में बड़ा सवाल तो यही है दोषी कौन? और सुरक्षित दवा का अधिकार कब मिलेगा?
सुरेश गांधी
फिरहाल, देश के अस्पतालों
में इन दिनों चीख
नहीं, एक खामोशी गूंजती
है, वो खामोशी, जो
माएं अपने मर चुके
बच्चों को गोद में
लेकर टूटते हुए शब्दों में
भी नहीं बयां कर
पा रहीं। कुछ राज्यों में
बच्चों की अचानक हुई
मौतें, प्रशासन की भागदौड़, दवा
दुकानों पर ताले और
लैब रिपोर्टों की हड़बड़ी, ये
सब किसी दुर्घटना की
तस्वीर नहीं, बल्कि उस जहरीले गठजोड़
की पहचान है जिसने दवाइयों
को बाजार नहीं, मौत का माल
बना दिया। कफ-सिरप का
एक ब्रांड, कोल्ड्रिफ। नाम साधारण, उपयोग
आम और भरोसे से
भरा। लेकिन उसके भीतर छुपा
ज़हर ऐसा निकला कि
कई मासूमों की कलाईयां अकड़
गईं, किडनी ने जवाब दे
दिया, और कई बच्चें
कुछ ही घंटों में
हमेशा के लिए सो
गए। देश ने कई
बार मिलावटी शराब के कारण
मौतें देखी हैं, लेकिन
मिलावटी दवाइयों से बच्चों की
लाशें उठना, यह मानवता पर
सबसे बड़ा अपराध है। यह मामला सिर्फ एक कंपनी, एक
थोक व्यापारी या किसी बिचौलिए
का नहीं, बल्कि गहरी धंसी उस
सांठगांठ का दर्पण है,
जिसमें, दवा माफिया, सप्लाई
चेन सिंडिकेट, खुली मिलीभगत वाला
प्रशासन, और सफेदपोश राजनीतिक
संरक्षण मिलकर मासूम ज़िंदगियों को ‘टेस्टिंग लैब’
बना देते हैं।
जहां बच्चे मरते हैं, वहां नेता ‘मुआवज़े’ का ऐलान करते हैं। जहां जहर बिकता है, वहां फाइलें दबती हैं। जहां लाइसेंस रद्द होना चाहिए था, वहां “सैंपल भेजे गए हैं” की औपचारिकता होती है। क्या वजह है कि एक ही कंपनी बार-बार विवादों में आती है? बैच टेस्टिंग केंद्र राज्य दर राज्य अलग-अलग निष्कर्ष क्यों देते हैं? और सबसे बड़ी बात, बिना प्रिज़र्वेटिव कंट्रोल वाली दवाइयां ग्रामीण क्षेत्रों में ही क्यों खपाई जाती हैं? क्योंकि यह मार्केटिंग नहीं, टारगेटिंग है।
गरीब जिलों
में, कम जागरूक उपभोक्ताओं
में, सरकारी अस्पतालों में... मौत सबसे सस्ता
हथियार बन जाती है।
मतलब साफ है भारतीय
कफ-सिरप से दुनिया
में मौतें, और अब देश
में भी वही कहानी?
गैंबिया में 2022 में 70 से अधिक बच्चों
की मौत। उज़्बेकिस्तान में
65 बच्चे। इंडोनेशिया में 200 से अधिक। इन
सभी मौतों में एक समानता
थी, खराब कफ-सिरप।
और इन सभी मामलों
में कच्चे माल में पाया
गया डाइएथिलीन ग्लाइकोल (डीईजी) और एथिलीन ग्लाइकोल
(ईजी) नामक जहरीला पदार्थ,
जो कार-कूलेंट में
मिलता है, दवाओं में
नहीं।
भारत ने हर बार कहा, “हमारी दवा सुरक्षित थी, विदेशी गलत तरीके से स्टोर की गई।” या “जांच में कारण स्पष्ट नहीं हुआ।” लेकिन अब जबकि मध्य प्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु के जिलों में एक ही बैच से बच्चों की मौत का पैटर्न सामने आया है, भारत का वही तर्क भारत के अंदर ही धराशायी हो गया है। अब दुनिया सवाल पूछ रही है, जब तीन देशों में मौतें भारत की दवा से जुड़ी बताई गईं, उस समय भारत ने जो इंकार किया, क्या अब भारत खुद अपने ही तर्कों पर विश्वास कर सकता है? भारत में जो हुआ वह किसी सामान्य दवा त्रुटि का मामला बिल्कुल नहीं।
एक ही कंपनी,
एक ही बैच, तीन
अलग-अलग राज्य, एक
जैसा कारण, कफ-सिरप के
सेवन के तुरंत बाद
किडनी फेलियर. ये पैटर्न दिखाते
हैं कि मामला केवल
एक असावधानी नहीं, बल्कि संरचना-स्तर की खामी
और संभावित आपराधिक लापरवाही है। अब जांच
एजेंसियां खुद यह कह
रही हैं कि इसमें
स्थानीय नहीं, कौमी स्तर पर
फैला सप्लाई-नेटवर्क शामिल है, जो छोटे
जिलों और गरीब क्षेत्रों
को निशाना बनाकर सस्ती या अनटेस्टेड दवाएं
खपाता है। हमारी स्वास्थ्य
व्यवस्था का सबसे बड़ा
अपराध यही है, जहर
हमेशा गरीबों को मिलता है,
दवा हमेशा अमीरों को।
भारत में दवाइयों
का लाइसेंस सिर्फ योग्यता से नहीं मिलता,
यह एक बाजार है,
जिसके पीछे, ड्रग-इंस्पेक्टर, सप्लाई
चेन के फ्रेंचाइजी, बड़े
दवा व्यापारी, और स्थानीय सियासत,
मिलकर एक अघोषित उद्योग
चलाते हैं। जिन जिलों
में मौतें हुईं, वहां दवा दुकानों
को बिना फार्मासिस्ट चलने
दिया गया. स्टॉक की
निगरानी कागजों तक सीमित रही.
और लाइसेंस जांच सालों तक
नहीं हुई, यह त्रुटियां
नहीं, संस्थागत अपराध हैं। दवा उद्योग
में राजनीतिक दखल ऐसा है
कि किसी भी जिले
में बड़ी कंपनी के
खिलाफ कार्रवाई सिर्फ “ऊपर से अनुमति
मिलने के बाद” ही
होती है। क्या दवाइयों
की सुरक्षा भी अब राजनीतिक
मंजूरी की मोहताज है?
आज डब्ल्यूएचओ, यूएन, स्वास्थ्य सुरक्षा पैनल और कई
अंतरराष्ट्रीय हेल्थ वॉचडॉग्स पूछ रहे हैं,
क्या भारत में दवाओं
का अंतरराष्ट्रीय मानक टूट चुका
है? क्या भारत में
बैच टेस्टिंग सिर्फ कागजी औपचारिकता है? क्या भारत
में छोटी फार्मा कंपनियों
पर कोई नियंत्रण नहीं?
और सबसे महत्वपूर्ण, क्या
भारत दुनिया को सुरक्षित दवा
देने की क्षमता खो
रहा है? यह सवाल
भारत की अर्थव्यवस्था से
भी जुड़ा है। भारत
की दवा-निर्यात अर्थव्यवस्था
2.2 लाख करोड़ से अधिक
है। लेकिन यदि कफ-सिरप
जैसा एक मामला भी
साबित हो जाता है,
तो निर्यात रोके जा सकते
हैं, लाइसेंस निलंबित हो सकता है
और भारत की “फार्मेसी
ऑफ द वर्ल्ड” की
पहचान मिट सकती है.
यह मुद्दा सिर्फ
बच्चों की मौत का
नहीं, देश की वैश्विक
प्रतिष्ठा का है। किसी
भी दवा के बाजार
तक पहुंचने से पहले, कच्चा
माल परीक्षण, उत्पादन निगरानी, बैच सैंपल, स्टोरेज
मॉनिटरिंग, डिस्ट्रीब्यूशन चेन, और स्टॉक
ऑडिट, छह स्तरों पर
जांच होती है. लेकिन
कफ-सिरप मामले में
छह में से पांच
स्तर पूरी तरह फेल
साबित हुए। कैसे, जहरीला
कच्चा माल बिना पकड़
में आए उत्पादन तक
पहुंच गया? बैच टेस्टिंग
रिपोर्टों में कोई चेतावनी
क्यों नहीं आई? ग्रामीण
मार्केट में संदिग्ध बैच
सबसे पहले क्यों पहुंचता
है? राज्यों की लैब रिपोर्टें
आपस में टकराती क्यों
हैं? यह स्पष्ट करता
है कि भारत में
दवा नियंत्रण कागजों में मजबूत, ज़मीन
पर खोखला है। इसका मतलब
यह नहीं कि भारत
के पास मजबूत प्रयोगशालाएं
नहीं, समस्या यह है कि
वही प्रयोगशालाएं इस्तेमाल करने की राजनीतिक
इच्छा नहीं। जब पानी प्रदूषित
होता है, मीडिया में
बहस होती है। जब
शराब में जहर मिलता
है, राजनीति गरमाती है। लेकिन जब
बच्चों की मौत दवा
से होती है तो
सत्ताएं मौन क्यों हो
जाती हैं? क्योंकि दवा-उद्योग चुनाव चंदे का सबसे
बड़ा स्रोत है। दवा उद्योग
नेताओं के सबसे विश्वसनीय
फंडर हैं। और दवा
कंपनियों की लॉबी किसी
भी सियासी दल से अधिक
प्रभावशाली है। इसलिए यह
मौन स्वाभाविक नहीं, संदिग्ध है। राष्ट्रीय कफ-सिरप सुरक्षा आयोग
(नेशनल सिरप सेफ्टी कमीशन),
डब्ल्यूएचओ लेवल की केंद्रीकृत
बैच-टेस्टिंग प्रोटोकॉल, कच्चे माल के लिए
ग्लोबल सर्टिफिकेशन, सभी दवा कंपनियों
की साल में दो
बार ऑडिट, ग्रामीण क्षेत्रों में दवाओं की
डिजिटल ट्रैकिंग $ क्यूआर कोड अनिवार्य, दोषी
कंपनियों पर मुआवज़ा $ क्रिमिनल
चार्ज, दवा नियामक अधिकारियों
की जवाबदेही तय होने के
साथ ही बच्चों की
मौतों की सीबीआई-स्तरीय
जांच व दवा-उद्योग
और राजनीति के गठजोड़ की
विशेष जांच समिति (एसआईटी),
भारत को डब्ल्यूएचओ के
साथ मिलकर साउथ एशिया ड्रग
सेफ्टी टास्क फोर्स बनानी चाहिए.
यह सिर्फ सुधार
नहीं, एक राष्ट्रीय अनिवार्यता
है। हमारे समाज में बच्चों
की मौतों को अक्सर आंकड़ों
में बदल दिया जाता
है, “5 मौतें”, “10 मौतें”, “24 मौतें”, लेकिन प्रत्येक आंकड़े के पीछे, एक
घर उजड़ा है, एक
माँ टूट गई है,
एक पिता जीवन भर
अपराधबोध में जीने वाला
है। जब एक बच्चे
को दवा से मौत
मिलती है, तो वह
सिर्फ बच्चों की मौत नहीं,
एक सभ्यता की हार है।
और भारत जैसी संवेदनशील,
पारिवारिक संस्कृति वाले देश में
यह हार असहनीय है।
मतलब साफ है विश्व
का फार्मेसी केंद्र होने का दावा
तभी सार्थक है, जब दुनिया
को दी जाने वाली
दवा जीवन दे, मौत
नहीं। आज भारत किसी
और मोड़ पर खड़ा
नहीं, बल्कि उसी मोड़ पर
वापस आ चुका है
जहाँ वह 2022 में गैंबिया के
मामले में खड़ा था।
अब दुनिया की निगाहें भारत
पर हैं। अब भारत
की जनता भी सवाल
पूछ रही है। और
अब सरकारों के पास बहाने
नहीं, जवाब चाहिए। कफ-सिरप का यह
कांड हमें तीन बातें
सिखाता है, दवा उद्योग
में लालच छोटी गलती
नहीं, महाअपराध है. बच्चों की
मौतों पर राजनीति का
मौन मानवता का सबसे बड़ा
कलंक है. और दवा
का बाजार उतना ही पवित्र
होना चाहिए जितना मंदिर का प्रसाद. क्योंकि
दवा और मौत के
बीच की दूरी सिर्फ
एक बूंद की है,
और इस दूरी को
सुरक्षित रखना सरकार नहीं,
राष्ट्र का धर्म है।
मौत परोसने वाली ‘सिस्टम की साज़िश’
प्रशासन की लापरवाही, या
संरक्षित अपराध? लापरवाही तब होती है
जब गलती अनजाने में
हो। लेकिन यहां दवाइयां बिना
मानक के बन रही
थीं, शेल्फ-लाइफ से पहले
ही खराब हो रहीं
थीं, वितरण चेन के पास
कोई ऑडिट नहीं था,
और सरकारी निरीक्षणों की रिपोर्टें महीनों
तक अपडेट ही नहीं हुईं।
यह सिर्फ लापरवाही नहीं, सिस्टमेटिक क्राइम है। अजीब विडंबना
है, चंद दिन पहले
तक दवा कंपनी के
मालिकों की फोटो बड़े
नेताओं के साथ घूम
रही थी। अब वही
नेता अचानक इस मुद्दे पर
मौन हैं। क्यों? किसकी
सुरक्षा की जा रही
है? किसकी राजनीति बचाई जा रही
है? इस देश में
दवाइयों के लाइसेंस वैसे
ही नहीं मिलते, वे
दिए भी जाते हैं,
और दिलाए भी जाते हैं।
जनता पूछ रही है,
किसे बचाया जा रहा है?
क्या यह सामान्य है
कि दवा के बैच
कई राज्यों में एक साथ
फेल हों? बच्चों की
मौतों का कारण एक
सिरप मानने में सरकार को
हफ्ते लग जाएं? पीड़ित
परिवारों को अंधेरे में
रखा जाए? और मीडिया
में चंद धाराएं चलाकर
मामला ठंडा करने का
प्रयास हो? यह समय
है जब जनता को
समझना होगा, हमारा सबसे बड़ा दुश्मन
सीमा पर नहीं, बल्कि
उसी बोतल में छुपा
है जिसे हम इलाज
समझकर बच्चों को पिला रहे
थे। अब सबसे बड़ा
सवाल, दोषी कौन? उत्पादक
कंपनी? कच्चा माल सप्लायर? थोक
व्यापारी? ड्रग-नियामक? या
वे सफेदपोश जिनके संरक्षण में यह कारोबार
फल-फूल रहा था?
असली अपराधी वे हैं जिनकी
वजह से दवाओं को
व्यापार नहीं, मौत की मुद्रा
बना दिया गया।
अब होना क्या चाहिए?
1. पूरे देश में
एक साथ इस बैच
की सीबीआई/एसआईटी जांच, 2. दवा कारोबार से
जुड़े हर स्तर के
लाइसेंसिंग ऑफिसर पर एफआईआर, 3. फार्मा
उत्पादन इकाइयों का लाइव डिजिटल
ऑडिट, 4. ग्रामीण क्षेत्रों में सप्लाई होने
वाली दवाओं पर केंद्रीय निगरानी,
5. पीड़ित परिवारों के लिए सरकारी
माफीनामा $ सख्त दंड नीति,
6. दोषी कंपनियों की संपत्ति कुर्क
कर मुआवज़े में दी जाएं,
7. सफेदपोशों की पहचान सार्वजनिक
हो, क्योंकि यह अपराध सिर्फ
बच्चों की हत्या नहीं,
लाखों परिवारों के विश्वास का
सामूहिक नरसंहार है।
मौतों का आंकड़ा : मासूमों की बढ़ती दहशत
छिंदवाड़ा (एमपी) में सिरप पीने
से अब तक 25 बच्चों
की मौत हुई है।
ताज़ा मामला मोरडोगरी परासिया गांव का है,
जहां मात्र 1 साल के गर्विक
पवार की नागपुर मेडिकल
कॉलेज में इलाज के
दौरान मौत हुई। शुरुआती
कुछ रिपोर्ट्स में 11, 12, 14 या 20 मौतों का जिक्र था।
उदाहरण के लिए, 14 मौतों
को देखते हुए एमपी सरकार
ने एसआईटी गठित की थी।
मुख्यमंत्री समेत अन्य अधिकारियों
ने फेल हुए सिरप
के खिलाफ बिक्री प्रतिबंध लगाने और जांच का
अनुरोध किया। हालांकि, बढ़ते हुए मौतों
और मामले की गंभीरता के
बीच, परिजनों का रो-रोकर
बुरा हाल है, मासूमों
का दर्द, अनाथ हुए बच्चे
और अधजली उम्मीदें, जिस पर अभी
तक सरकार की संवेदना और
ठोस कार्रवाई का विकल्प नजर
नहीं आया।
सिंडिकेट, गुटबंदी और सफेदपोश पॉलिटिक्स, पेच दर पेच
यूपी एसटीएफ ने
हाल ही में सिरप
रैकेट का करीबी सहयोगी
अमित कुमार सिंह उर्फ टाटा
को लखनऊ से गिरफ्तार
किया है। वह अपने
मास्टरमाइंड सहयोगी शुभम जायसवाल का
नज़दीकी बताया जा रहा है।
इससे पहले, कई औषधि कंपनियों,
स्टॉकिस्टों, आपूर्तिकर्ताओं और मेडिकल स्टोर्स
के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई
है, कुल मिलाकर 90 से
अधिक एफआईआर अब तक। इसके
अलावा, कई ड्रग-इंस्पेक्टर
व लाइसेंस देने वाले अधिकारियों
को भी जांच के
दायरे में लाया गया
है। आरोप है कि
रैकेट ने बड़े पैमाने
पर कोडीन युक्त सिरप की खरीद-फरोख्त को “कागजी खेपें”,
“फर्जी नामों” व “स्टॉक ट्रांसफर”
के जरिये बिहार, बंगाल, झारखंड तक पहुंचाया। इस
पूरे नेटवर्क में बूते बटोरने
में शामिल लोग, कंपनियों के
मालिक, स्टॉकिस्ट, मेडिकल स्टोर, ड्रग लाइसेंसिंग अधिकारी,
एक सिस्टमेटिक गिरोह के रूप में
कार्य कर रहे थे।
व्यावसायिक स्वार्थ और कमाई के
लालच ने मासूमों की
जानों को तार-तार
कर दिया।
डॉक्टर या स्टॉकिस्ट नहीं, सिस्टम सवालों के घेरे में
विवादित दवा कंपनी के
खिलाफ कार्रवाई न होने, समय
पर लाइसेंस न रद्द करने,
और तमिलनाडु की औषधि नियंत्रण
प्रणाली की लापरवाही, इस
घटना का मूल आधार
बनी। ऐसी रिपोर्ट सामने
आई कि सिरप में
उपयोग किए जाने वाले
रसायन जैसे डीईथलीन ग्लाइकोल
(डीईजी) : स्वास्थ्य के लिए बेहद
खतरनाक थे। दरअसल, केंद्र
की सिफारिशों (2023, 2025) के बावजूद, राज्य
स्तर पर नियमों का
पालन नहीं हुआ। जिसके
चलते बिना डब्ल्यूएचओ जीएमपी
प्रमाणपत्र के सिरप के
उत्पादन, लाइसेंस व वितरण पर
नियंत्रण न होने के
कारण जहरीली दवा बाजार में
आ गई। मामले की
गंभीरता देखते हुए अब तक
26 फर्मों के लाइसेंस रद्द
किए जाने की प्रक्रिया
में हैं। इस
सबके बीच, क्या सिर्फ
इच्छाशक्ति की कमी थी?
या दवाइयों पर निगरानी के
नाम पर बनी व्यवस्था
में ही भ्रष्टाचार और
जवाबदेही की कमी थी?
परिणाम, मासूम परिवारों की जिंदगी उजड़ित,
सरकार और प्रशासन के
लिए शर्म की बात
है। सवाल उठता हैः
क्या यह सिरप-कांड
सिर्फ एक स्वास्थ्य त्रासदी
है, या हमारे लोकतंत्र
और शासन की नैतिकता
पर हमला?
हर मृत बच्चे के लिए न्याय, नहीं तो जवाबदेही
देश ने कई
बार देखा है कि
पोषण, शिक्षा, स्वास्थ्य कृ तीनों मामलों
में कितने बच्चों का बचपन बर्बाद
हुआ। लेकिन यह कफ-सिरप
कांड एक नया प्रकार
का जघन्य अपराध है, जहां न
सिर्फ दवाई, बल्कि सामाजिक विश्वास, नियामक जवाबदेही और मानव जीवन
की अहमियत से खिलवाड़ हुआ
है। इसीलिए, अब जनता, सरकार,
अदालत, तीनों को इस ख़ून-खिलाड़ियों को छोड़ना नहीं
चाहिए। अगर न्याय नहीं
मिले, तो दवाई पीछे
हटे, लेकिन सवाल पुल पर
खड़े उन संघर्षरत परिवारों
के साथ खड़ा रहे,
जिनकी आंखों में न्याय की
चमक अब भी बुझी
नहीं है। इसलिए, हम
मांग करते हैं निष्पक्ष
न्याय, पुनर्वास, जवाबदेही, और वे सभी
कदम जिनसे यह सुनिश्चित हो
कि अगली पीढ़ी पहलू
फिर से इस रैकेट
का शिकार न बने। अगर
दवाई, सिरप, बच्चों की जान बचाने
के लिए है, तो
इसे मौत का कारण
नहीं बनने देना चाहिए।
इसलिए अब वक्त है,
दवाई पर नहीं, दवाई
बनाने वालों पर विश्वास टूटा;
अब भरोसा चाहिए, सिस्टम पर, कठोर नियंत्रण
पर, इंसाफ पर।






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