Sunday, 25 January 2026

गणतंत्र भारत : संविधान, संकल्प और संप्रभुता की 75 वर्षों की यात्रा

गणतंत्र भारत : संविधान, संकल्प और संप्रभुता की 75 वर्षों की यात्रा 

26 जनवरी केवल उत्सव नहीं, बल्कि एक चेतावनी भी है। यह दिन याद दिलाता है कि भारत में सत्ता किसी व्यक्ति, दल या भीड़ की नहीं, बल्कि संविधान की है। गणतंत्र का अर्थ तिरंगा फहराना भर नहीं, बल्कि कानून, संस्थाओं और मर्यादाओं का सम्मान है। आज भारत प्रगति कर रहा है, लेकिन साथ ही यह सवाल भी खड़ा है कि क्या हम लोकतंत्र की आत्मा को उतनी ही गंभीरता से लेते हैं? अधिकारों की होड़ बढ़ी है, पर कर्तव्यों की याद कमजोर हुई है। असहमति को देशद्रोह और बहुमत को सत्य मानने की प्रवृत्ति गणतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। डॉ. आंबेडकर ने स्पष्ट कहा थासंविधान का दुरुपयोग उसे नष्ट कर सकता है। गणतंत्र तभी बचेगा, जब नागरिक जागरूक रहेंगे, संस्थाएं स्वतंत्र रहेंगी और संविधान सर्वोपरि रहेगा। गणतंत्र सरकारों से नहीं, नागरिक चरित्र से चलता है। यही इस दिवस का असली संदेश है 

सुरेश गांधी

26 जनवरी भारत के लिए महज़ एक कैलेंडर तिथि नहीं, बल्कि वह दिन है जब भारत ने औपनिवेशिक मानसिकता से पूर्णतः मुक्त होकर स्वयं को एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया। यह वही दिन है जब 1950 में भारतीय संविधान लागू हुआ और जनता सर्वोच्च सत्ता का स्रोत बनी। गणतंत्र दिवस दरअसल उस ऐतिहासिक क्षण की पुनः स्मृति है जब भारत ने कहाअब इस देश का शासन किसी राजा, किसी विदेशी सत्ता या किसी कुलीन वर्ग द्वारा नहीं, बल्कि भारत के नागरिकों द्वारा और भारत के नागरिकों के लिए चलेगा। आज, जब भारत विश्व की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है, अंतरिक्ष से लेकर डिजिटल क्रांति तक अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है, तब गणतंत्र दिवस हमें याद दिलाता है कि यह प्रगति संविधान की उसी बुनियाद पर खड़ी है, जिसे डॉ. भीमराव आंबेडकर के नेतृत्व में संविधान सभा ने तैयार किया था।

संविधान: काग़ज़ नहीं, राष्ट्र की आत्मा

भारतीय संविधान केवल शासन संचालन की एक विधिक पुस्तक नहीं, बल्कि करोड़ों नागरिकों की आकांक्षाओं, संघर्षों और सपनों का दस्तावेज़ है। यह संविधान हमें मौलिक अधिकार देता है, साथ ही मौलिक कर्तव्यों की याद भी दिलाता है। स्वतंत्रता के अधिकार के साथ समानता, धर्म की स्वतंत्रता के साथ सामाजिक समरसता और अभिव्यक्ति की आज़ादी के साथ राष्ट्रीय एकतायही भारतीय संविधान का संतुलन है। संविधान निर्माताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती थीविविधताओं से भरे इस देश को एक सूत्र में बाँधना। भाषा, जाति, धर्म, क्षेत्र और संस्कृति की असंख्य परतों वाले भारत को एक गणराज्य बनाना आसान नहीं था। लेकिन संविधान ने यह सिद्ध कर दिया कि विविधता भारत की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी शक्ति है।

गणतंत्र बनाम स्वतंत्रता: एक अधूरी आज़ादी का पूर्ण रूप

भारत को 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता मिली, लेकिन वह स्वतंत्रता तब तक अधूरी थी, जब तक देश के पास अपना संविधान नहीं था। 26 जनवरी 1950 को भारत ने स्वयं को एक गणतंत्र घोषित कर यह स्पष्ट किया कि अब शासन की अंतिम सत्ता जनता के हाथों में है। यह संयोग नहीं था कि संविधान लागू करने के लिए 26 जनवरी की तिथि चुनी गई। यही वह दिन था जब 1930 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज का संकल्प लिया था। इस तरह 26 जनवरी स्वतंत्रता आंदोलन और आधुनिक भारत के बीच सेतु बन गया।

लोकतंत्र की कसौटी पर भारत

आज भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहाँ हर पाँच साल में सत्ता परिवर्तन होता है, मतदाता सरकारों को चुनते और बदलते हैं। ग्राम पंचायत से लेकर संसद तक जनता की भागीदारी लोकतंत्र को जीवंत बनाती है। हालाँकि, लोकतंत्र केवल चुनावों तक सीमित नहीं है। यह संस्थाओं की मजबूती, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, मीडिया की भूमिका और नागरिक चेतना से चलता है। गणतंत्र दिवस हमें आत्ममंथन का अवसर देता हैक्या हम केवल अधिकारों की बात करते हैं या कर्तव्यों को भी उतनी ही गंभीरता से निभाते हैं?

गणतंत्र और सामाजिक न्याय

भारतीय गणतंत्र की आत्मा सामाजिक न्याय में निहित है। संविधान ने सदियों से वंचित वर्गों को मुख्यधारा में लाने के लिए विशेष प्रावधान किए। अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ा वर्ग, महिलाएँ और अल्पसंख्यकसभी के लिए समान अवसर सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया। हाल के दशकों में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और राजनीतिक भागीदारी में इन वर्गों की बढ़ती हिस्सेदारी यह दर्शाती है कि गणतंत्र का मार्ग आसान नहीं, लेकिन सही दिशा में है। फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि सामाजिक विषमता, क्षेत्रीय असंतुलन और आर्थिक असमानता आज भी बड़ी चुनौतियाँ हैं।

राष्ट्रीय एकता: गणतंत्र की रीढ़

कश्मीर से कन्याकुमारी और कच्छ से कोहिमा तक फैला भारत, तभी गणतंत्र रह सकता है जब राष्ट्रीय एकता अक्षुण्ण रहे। संविधान ने राज्यों को अधिकार दिए, संघीय ढाँचा दिया, लेकिन राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखा। आज जब दुनिया भर में राष्ट्रवाद की नई परिभाषाएँ गढ़ी जा रही हैं, भारत का गणतंत्र यह सिखाता है कि राष्ट्रप्रेम का अर्थ किसी को बाहर करना नहीं, बल्कि सभी को साथ लेकर चलना है।

सुरक्षा, संप्रभुता और सशक्त भारत

गणतंत्र दिवस की परेड केवल सैन्य शक्ति का प्रदर्शन नहीं, बल्कि यह संदेश है कि भारत अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए सक्षम और संकल्पित है। सीमा पर तैनात सैनिक, समुद्र में नौसेना और आकाश में वायुसेनाये सभी लोकतंत्र की रक्षा में प्रहरी हैं। आत्मनिर्भर भारत, स्वदेशी रक्षा उत्पादन और तकनीकी आत्मनिर्भरता आज के गणतंत्र की नई पहचान बन रही है।

युवा, विज्ञान और भविष्य का गणतंत्र

भारत का सबसे बड़ा बल उसकी युवा आबादी है। यह वही पीढ़ी है जो संविधान को किताब में नहीं, बल्कि व्यवहार में देखना चाहती है। डिजिटल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, अंतरिक्ष मिशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंसये सभी भविष्य के गणतंत्र की झलक हैं। लेकिन तकनीकी प्रगति के साथ नैतिक मूल्यों और संवैधानिक चेतना को बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है।

मीडिया, अभिव्यक्ति और जिम्मेदारी

गणतंत्र में मीडिया को चौथे स्तंभ की संज्ञा दी गई है। स्वतंत्र अभिव्यक्ति लोकतंत्र की जान है, लेकिन इसके साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी है। अफ़वाह, नफ़रत और असंयमित विमर्श गणतंत्र को कमजोर करते हैं। आज आवश्यकता है तथ्यपरक, संतुलित और राष्ट्रहित में पत्रकारिता कीजो सवाल भी पूछे और समाधान का मार्ग भी दिखाए।

गणतंत्र दिवसएक उत्सव, एक दायित्व

गणतंत्र दिवस केवल झंडा फहराने, परेड देखने या अवकाश मनाने का दिन नहीं है। यह संविधान के प्रति निष्ठा दोहराने, लोकतांत्रिक मूल्यों को आत्मसात करने और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों को समझने का अवसर है। भारत का गणतंत्र तभी सशक्त रहेगा जब हर नागरिक यह माने कि लोकतंत्र सरकार से नहीं, हमसे चलता है। 26 जनवरी हमें यह याद दिलाता है कि भारत केवल भूगोल नहीं, एक विचार हैऔर उस विचार का नाम है गणतंत्र।

गणतंत्र का अर्थ : सत्ता नहीं, संविधान सर्वोच्च

भारत ने 26 जनवरी 1950 को केवल एक शासन व्यवस्था नहीं अपनाई थी, बल्कि एक ऐसी चेतना को स्वीकार किया था, जिसमें राजा नहीं, जनता सर्वोच्च है; ताक़त नहीं, संविधान सर्वोच्च है; और भीड़ नहीं, कानून का राज सर्वोपरि है। गणतंत्र दिवस इसी चेतना का उत्सव है। आज, जब भारत वैश्विक मंच पर अपनी आर्थिक, सैन्य और तकनीकी ताक़त का विस्तार कर रहा है, तब यह प्रश्न और भी प्रासंगिक हो जाता है कि क्या हम गणतंत्र की आत्मा को उतनी ही गंभीरता से जी रहे हैं, जितना उसके उत्सव को मनाते हैं? संविधान ने हमें अधिकार दिए, लेकिन साथ ही कर्तव्यों का बोझ भी सौंपा। दुर्भाग्यवश, अधिकारों की आवाज़ तो बुलंद होती गई, पर कर्तव्यों की चर्चा धीमी पड़ती चली गई। भारतीय गणतंत्र की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि उसने एक अत्यंत विविध समाज को लोकतांत्रिक ढाँचे में बाँध कर रखा। भाषा, धर्म, जाति और क्षेत्र की भिन्नताओं के बावजूद भारत आज भी एक राष्ट्र हैयह कोई संयोग नहीं, बल्कि संविधान की शक्ति है। गणतंत्र दिवस की परेड केवल सैन्य शक्ति का प्रदर्शन नहीं, बल्कि यह संदेश है कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए यह देश सजग है। सीमा पर खड़ा सैनिक, अदालत में न्याय देता न्यायाधीश, कलम से सच लिखता पत्रकार और मतदान केंद्र पर खड़ा मतदाताये सभी गणतंत्र के सच्चे रक्षक हैं। आज आवश्यकता है इस बात की कि गणतंत्र को केवल सरकार की जिम्मेदारी माना जाए। लोकतंत्र सरकारों से नहीं, नागरिकों से चलता है। जब नागरिक जागरूक होते हैं, तब गणतंत्र मजबूत होता है; और जब वे उदासीन हो जाते हैं, तब संविधान केवल किताब बनकर रह जाता है। गणतंत्र दिवस हमें यह याद दिलाने आया है कि भारत की असली ताक़त उसकी संसद, सेना या अर्थव्यवस्था नहींबल्कि उसका संविधान है।

युवा और गणतंत्र: विरासत नहीं, जिम्मेदारी

भारत का गणतंत्र अब युवाओं के कंधों पर है। देश की आधी से अधिक आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। यह वही पीढ़ी है, जो डिजिटल है, सवाल पूछती है और त्वरित बदलाव चाहती है। लेकिन गणतंत्र केवल अधिकार माँगने का नाम नहीं। यह संवैधानिक मर्यादाओं को समझने, असहमति को लोकतांत्रिक ढंग से व्यक्त करने और राष्ट्रहित को प्राथमिकता देने की भी सीख देता है। यदि युवा पीढ़ी संविधान को केवल परीक्षा की किताब समझेगी, तो गणतंत्र खोखला होगा; और यदि उसे जीवन मूल्य बनाएगी, तो भारत विश्व का आदर्श लोकतंत्र बनेगा।

डॉ. आंबेडकर और संविधान : भारत का सबसे शांत क्रांतिकारी दस्तावेज़

डॉ. भीमराव आंबेडकर ने भारतीय संविधान को केवल कानून की किताब नहीं, बल्कि सामाजिक क्रांति का माध्यम बनाया। उन्होंने स्पष्ट कहा था—“संविधान कितना भी अच्छा क्यों हो, यदि उसे लागू करने वाले अच्छे नहीं होंगे, तो वह असफल हो जाएगा।आज जब संविधान पर बहस होती है, तब यह याद रखना ज़रूरी है कि आंबेडकर का संविधान समता, न्याय और बंधुत्व पर आधारित था। उन्होंने सत्ता के केंद्रीकरण के बजाय संस्थाओं की मजबूती पर ज़ोर दिया। गणतंत्र दिवस पर डॉ. आंबेडकर को याद करना केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि यह संकल्प लेने का दिन है कि संविधान की आत्मा को कमजोर नहीं पड़ने दिया जाएगा। 26 जनवरी भारत के लिए केवल राष्ट्रीय पर्व नहीं, बल्कि यह आत्मचिंतन का दिन है। यही वह तिथि है जब भारत ने स्वयं को एक संप्रभु गणतंत्र घोषित किया और यह तय किया कि इस देश में सत्ता का स्रोत कोई व्यक्ति या संस्था नहीं, बल्कि संविधान और जनता होगी। गणतंत्र का मूल भाव यही हैकानून का राज, समानता का अधिकार और नागरिक कर्तव्यों की अनिवार्यता। आज, जब भारत वैश्विक मंच पर आर्थिक, सामरिक और तकनीकी रूप से सशक्त हो रहा है, तब यह प्रश्न और अधिक प्रासंगिक हो जाता है कि क्या हम संविधान की भावना के अनुरूप आचरण भी कर रहे हैं? लोकतंत्र केवल चुनावों तक सीमित नहीं होता। यह संस्थाओं की मर्यादा, असहमति के सम्मान और कानून के पालन से जीवित रहता है. भारतीय संविधान ने अधिकारों के साथ कर्तव्यों का संतुलन रखा है। दुर्भाग्यवश, हम अधिकारों की चर्चा तो मुखरता से करते हैं, लेकिन कर्तव्यों को अक्सर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। जब नागरिक सजग होते हैं, तो गणतंत्र मजबूत होता है; और जब उदासीनता बढ़ती है, तो लोकतंत्र कमजोर पड़ने लगता है। गणतंत्र दिवस की परेड हमें सुरक्षा का भरोसा देती है, लेकिन गणतंत्र की असली सुरक्षा अदालतों, विधानसभाओं, मीडिया और नागरिक आचरण में निहित है। डॉ. आंबेडकर ने चेताया था कि संविधान का भविष्य उसे लागू करने वालों पर निर्भर करता है। आज गणतंत्र दिवस पर संकल्प यही होना चाहिए कि संविधान केवल पुस्तकों में नहीं, बल्कि व्यवहार में जीवित रहे। क्योंकि लोकतंत्र सरकार से नहीं, हमसे चलता है।

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