Monday, 12 January 2026

जहां काशी में प्रकट हुए हारे के सहारे श्याम बाबा

जहां काशी में प्रकट हुए हारे के सहारे श्याम बाबा 

भारत की आध्यात्मिक चेतना दो पवित्र ध्रुवों के बीच निरंतर प्रवाहित होती रही है, सीकर का खाटू, जहां बर्बरीक से श्याम बने हारे के सहारे विराजते हैं, और काशी, जहां कण-कण में मोक्ष का नाद बसता है। राजस्थान के सीकर जिले में स्थित खाटू श्याम जी का मुख्य मंदिर वह पावन धाम है, जहां महाभारत काल के वीर बर्बरीक आज भी भक्तों की पीड़ा हरते हैं। वहीं दूसरी ओर, शिव की नगरी काशी में, लक्सा क्षेत्र में स्थापित श्री श्याम मंदिर यह प्रमाण देता है कि श्याम की कृपा किसी एक भूगोल तक सीमित नहीं, बल्कि जहां सच्ची श्रद्धा है, वहीं उनका वास है। कहा जाता है कि काशी में सभी देवी-देवता विराजमान हैं, पर जब श्याम बाबा ने स्वप्न के माध्यम से अपनी उपस्थिति का प्रश्न उठाया, तब भक्तों की आस्था ने काशी में भी श्याम धाम की नींव रख दी। खाटू से चली यह भक्ति-धारा काशी में आकर और गहरी हो गई। आज खाटू और काशी, दोनों धाम एक ही भाव को प्रकट करते हैं, जो हार गया है, वही श्याम का सबसे बड़ा अधिकारी है। इसी विश्वास ने श्याम बाबा को युगों-युगों तकहारे का सहाराबनाए रखा है

सुरेश गांधी

काशी... जहां गंगा बहती नहीं, बल्कि मोक्ष का मार्ग रचती है। जहां हर गली में शिव का वास है, हर कण में नारायण की चेतना है, हर श्वास में राम और हर नाद में कृष्ण की अनुभूति है। कहा जाता है, “काशी में जो आया, वह अकेला नहीं लौटा।लेकिन इसी काशी ने एक बार स्वयं से प्रश्न किया, “जब यहां सब देवता विराजमान हैं, तो श्याम बाबा कहां हैं?” यही प्रश्न आगे चलकर आस्था का उत्तर बना, और उत्तर ने एक मंदिर नहीं, बल्कि विश्वास का जीवंत तीर्थ रच दिया, काशी का श्री श्याम मंदिर। स्वप्न, जो इतिहास बन गया. इस कथा की शुरुआत किसी शिलालेख से नहीं, किसी राजाज्ञा से नहीं, बल्कि भक्तों के स्वप्न से हुई।

वर्ष 1972... कुछ रामभक्त और श्यामभक्त, जिनके कुलदेवता खाटू श्याम जी थे, काशी में नियमित रूप से कीर्तन-भजन किया करते थे। उन्होंने एक छोटा-सा संगठन बनाया, “पाड़ा श्री श्याम मंडल।प्रारंभिक भजन-कीर्तन काशी विश्वनाथ के वाहन दंडी राज गणेश के भवन में होते थे। वहीं, एक रात भक्तों को एक अद्भुत स्वप्न आया। स्वप्न में स्वयं श्याम बाबा प्रकट हुए और शांत किंतु गूंजती वाणी में बोले, “काशी में सब देवता विराजमान हैं.. पर मेरा कोई स्थान क्यों नहीं?” स्वप्न टूटा, लेकिन प्रश्न जागता रह गया। भक्त चकित थे। सोचने लगे, बात तो सत्य है। काशी में शिव हैं, शक्ति हैं, राम हैं, कृष्ण हैं... पर खाटू के श्याम नहीं। यही वह क्षण था, जब आस्था ने दिशा ली। धीरे-धीरे खुलते कृपा के द्वार प्रभु की प्रेरणा मिलते ही कार्य आरंभ हुआ। एक छोटा-सा भवन मिला। वहीं से फिर भजन-कीर्तन गूंजने लगे। यह कोई भव्य शुरुआत नहीं थी, धन था, साधन, बस था तो विश्वास। और विश्वास जब सच्चा होता है, तो प्रभु स्वयं राह बनाते हैं।

काशी का यह दिव्य श्री श्याम मंदिर लक्सा क्षेत्र में स्थित है, जहाँ तक श्रद्धालु गोदौलिया, नई सड़क रोड से सहजता से पहुँच सकते हैं। शहर के हृदयस्थल में स्थित यह मंदिर केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि अपनी सुलभता के कारण भी भक्तों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। गोदौलिया की चहल-पहल से होते हुए जब भक्त नई सड़क की ओर बढ़ते हैं, तो बाजारों, गलियों और जनजीवन के बीच अचानक श्याम नाम की गूंज सुनाई देने लगती है। यही वह मार्ग है, जहाँ सांसारिक कोलाहल से निकलकर भक्त धीरे-धीरे श्याममय शांति की ओर प्रवेश करता है। लक्सा स्थित यह श्याम धाम आज केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि काशी के मध्य में हारे हुए मनुष्य के लिए आशा का द्वार बन चुका है, जहाँ दूर-दराज से आए श्रद्धालु भी बिना कठिनाई प्रभु के दर्शन कर पाते है.

1995 : जब काशी में विराजे खाटू के श्याम

वर्ष 1995... वह दिन आज भी भक्तों के हृदय में दीप की तरह जलता है। राजस्थान के खाटू धाम से श्याम प्रभु की दिव्य प्रतिमा लाई गई। पूरे नगर में भव्य भ्रमण हुआ, ढोल-नगाड़े, निशान, जयकारे, और आँखों में अश्रु लिए भक्त। फिर वैदिक विधि-विधान से काशी की पावन भूमि पर श्याम प्रभु की स्थापना हुई। उस दिन के बाद, यह मंदिर केवल मंदिर नहीं रहा, यह आस्था का आश्रय बन गया।

जहां चमत्कार बोलते नहीं, घटित होते हैं

श्याम मंदिर के चमत्कार किसी प्रचार में नहीं, भक्तों की आँखों में देखे जा सकते हैं। मंदिर के सेवका संजय शास्त्री, जो 25 वर्षों से सेवा में हैं, कहते हैं, मैंने अपनी आँखों से देखा है, यहाँ जो सच्चे मन से आया, वह खाली नहीं लौटा।

संतान की कामना और एक वर्ष का चमत्कार

स्थापना के कुछ वर्ष बाद एक महिला आई। दस वर्षों से संतानहीन थी। वह प्रभु के चरणों में बैठ गई और बोली, “अगर मेरे आँगन में किलकारी गूंजी, तो मेरा जीवन आपका होगा।और एक ही वर्ष में, उसके जीवन में मातृत्व उतर आया। आज उसका घर बच्चों की हँसी से भरा है।

अधिकारियों की उलझन और दो दिन की कृपा

एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी पदोन्नति को लेकर परेशान थे। नाम लेना उचित नहीं, पर इतना कहना पर्याप्त है कि दो दिनों में उनका कार्य सिद्ध हो गया। चेतगंज फायर विभाग के एक अधिकारी जिनका तबादला सोनभद्र हो गया था, दो दिन मंदिर आए, चरणों में अर्जी लगाई, और आदेश बदल गया। मतलब साफ है यहाँ ऐसे छोटे-छोटे चमत्कार, रोज घटते हैं। पर भक्त कहते हैं, “यहाँ चमत्कार नहीं, कृपा होती है।

स्वर्णिम गर्भगृह : जहाँ तेज बोलता है

आज श्याम मंदिर का गर्भगृह पूर्णतः स्वर्णाभूषित है। पहले यह रजत था, फिर भक्तों और ट्रस्ट के सहयोग से लगभग तीन किलोग्राम शुद्ध स्वर्ण से इसका अलंकरण हुआ। धार्मिक मान्यता कहती है, “धातुओं में मैं स्वर्ण हूँ।स्वर्ण : तेज का प्रतीक, पवित्रता का प्रतीक, और प्रभु की दिव्यता का संकेत।

उत्सव, जो काशी को श्याममयी बना देते हैं

यह मंदिर अपने उत्सवों के लिए पूरे देश में जाना जाता है। बसंत पंचमी : अंतःवस्त्र का दिव्य रहस्य, बसंत पंचमी को प्रभु का अंतःवस्त्र परिवर्तन होता है। मान्यता है उस वस्त्र का एक इंच भी यदि किसी को मिल जाए, तो असाध्य रोग शांत हो जाते हैं। फाल्गुन शुक्ल एकादशी : सबसे बड़ा उत्सव, इस दिन हजारों निशान यात्राएं आती हैं। पूरी काशी श्याम नाम में डूब जाती है। 22 फरवरी : महमूरगंज की ऐतिहासिक शोभायात्रा : 3 से 4 हजार निशान, भक्तों का सैलाब, नृत्य, भजन, जयकारे, जैसे काशी ही खाटू बन गई हो।

भारत का अनूठा मंदिर

यह शायद भारत का एकमात्र श्याम मंदिर है, जहाँ हर महीने दोनों एकादशियों पर रात्रि जागरण और अखंड दर्शन होते हैं।

झूलन उत्सव और हारे का सहारा

श्रावण मास में श्याम झूलन उत्सव, जिस दिन प्रभु खाटू में विराजे थे। यह जन्म नहीं, पाटोत्सव है। यहाँ मान्यता है, “जो हारा हुआ यहाँ, वह श्याम के दरबार में कभी हारा नहीं रहता।

मंदिर की महत्ता

यह मंदिर, ईंट-पत्थर नहीं, यह भक्तों के विश्वास की देह है। यहाँ आकर कोई अमीर-गरीब नहीं, कोई बड़ा-छोटा नहीं। यहाँ बस एक पहचान है, “श्याम का भक्त।मतलब साफ है काशी में शिव मोक्ष देते हैं, राम मर्यादा सिखाते हैं, कृष्ण कर्म का रहस्य बताते हैं और श्याम बाबा हारने वाले को उठाकर गले लगाते हैं। इसीलिए काशी कहती है, “अगर सब कुछ हार गए हो, तो श्याम के पास आओ।

मन की पीड़ा को समझते है खाटूश्याम

श्री खाटू श्याम मंदिर, लक्सा संजय शास्त्री, कहते है यह मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं, यह प्रभु की जीवंत कृपा का प्रमाण है. “मैं पिछले पच्चीस वर्षों से श्री श्याम प्रभु की सेवा कर रहा हूँ। मैंने अपनी आँखों से देखा है कि जो भी सच्चे मन से यहाँ आया, वह कभी खाली नहीं लौटा। यहाँ किसी को संतान का सुख मिला, किसी को नौकरी, किसी की बीमारी शांत हुई, तो किसी का रुका हुआ काम बन गया। प्रभु कोई दिखावटी चमत्कार नहीं करते, वह भक्त के मन की पीड़ा को समझते हैं। जितनी गहराई से कोई श्याम को पुकारता है, उतनी ही गहराई से उसे कृपा मिलती है। काशी में सभी देवता विराजमान हैं, लेकिन हारे हुए के लिए जो सहारा है, वह श्याम बाबा ही हैं।

श्रद्धालुओं की जुबानी : श्याम कृपा के अनुभव

संगीता देवी, कहती है दस साल बाद मेरे घर किलकारी गूंजी. मैं दस वर्षों से संतान के लिए भटक रही थी। यहां आकर मैंने केवल प्रभु के चरणों में बैठकर रोना सीखा। एक साल के भीतर भगवान ने मेरी झोली भर दी। आज मेरा बच्चा ही मेरी सबसे बड़ी पूजा है। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी लंबे समय से पदोन्नति अटकी थी। किसी ने नाम लेने को कहा, किसी ने सिफारिश। मैं यहाँ आया और केवल मन से प्रार्थना की। दो दिन के भीतर आदेश गया। अब मैं इसे संयोग नहीं, श्याम कृपा मानता हूँ। ट्रांसफर रुक गया, विश्वास और मजबूत हो गया. फायर विभाग अधिकारी, चेतगंज कहते हैमेरा तबादला दूरस्थ जिले में हो गया था। दो दिन मंदिर आया, चरणों में अर्जी लगाई। तीसरे दिन ही आदेश बदल गया। तब से हर एकादशी को यहाँ आता हूँ।

यहाँ आकर लगता है, कोई अपना सुन रहा है

मिर्जापुर के रमेश कुमार एवं खमरिया के शिवांश जायसवाल कहते है काशी में कई मंदिर हैं, लेकिन यहाँ आकर मन हल्का हो जाता है। लगता है जैसे श्याम बाबा सामने बैठकर सुन रहे हों। शायद इसलिए लोग इन्हेंहारे का सहाराकहते हैं।

संक्षिप्त सूचना

स्थानः लक्सा, वाराणसी

पहुँच मार्गः गोदौलिया - नई सड़क रोड से सीधी पहुँच

विशेषता : दोनों एकादशियों पर रात्रि जागरण और अखंड दर्शन

प्रमुख उत्सवः फाल्गुन एकादशी, बसंत पंचमी, झूलन उत्सव, शोभा यात्रा

खाटू श्याम का मुख्य मंदिर  सीकर (राजस्थान) में है

खाटू श्याम जी का मुख्य मंदिर राजस्थान के सीकर जिले के खाटू नामक स्थान पर स्थित है। यह पवित्र धाम श्याम भक्तों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, जहाँ बर्बरीक (खाटू श्याम) की पूजा-आराधना बड़े श्रद्धा एवं विश्वास के साथ होती है। यह मंदिर राजस्थान के प्रमुख तीर्थस्थलों में गिना जाता है और देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु यहाँ वरदनीय श्याम बाबा के दर्शन एवं आशीर्वाद के लिए आते हैं।

कैसे पड़ेहारे के सहारेखाटू वाले श्याम के नाम

खाटू श्याम जी का इतिहास कोई साधारण लोककथा नहीं, बल्कि लगभग पाँच हजार वर्ष पूर्व की उस पौराणिक गाथा से जुड़ा है, जिसकी जड़ें महाभारत जैसे महाकाव्य में समाहित हैं। खाटू वाले श्याम, जिन्हें आज संसारहारे का सहाराकहकर पूजता है, अपने पूर्वजन्म में बर्बरीक के नाम से जाने जाते थे। वे महाबली भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र थे। उनकी माता का नाम मौरवी था, जो स्वयं एक वीर योद्धा और बर्बरीक की गुरु भी थीं, जबकि उनकी दादी थीं हिडिंबा। महाभारत का युद्ध आरंभ होने से पहले बर्बरीक ने अपनी माता से युद्ध में भाग लेने की अनुमति मांगी। माता ने उन्हें आज्ञा तो दी, लेकिन एक विशेष वचन भी लिया, “युद्ध में तुम सदैव हारने वाले का सहारा बनोगे।माता की आज्ञा को गुरु-वाक्य मानकर बर्बरीक ने इस वचन को सहर्ष स्वीकार कर लिया। यही वचन आगे चलकर उन्हें संसार भर मेंहारे का सहाराबना गया। उस समय कौरव और पांडव, दोनों ओर से विशाल सेनाएं युद्धभूमि में उतर चुकी थीं। द्वारिका की सेना दुर्योधन को मिल चुकी थी और पांडव निहत्थे श्रीकृष्ण के नेतृत्व में खड़े थे। बर्बरीक की माता को आशंका थी कि कहीं पांडवों की सेना कमजोर पड़ जाए, इसलिए उन्होंने अपने पुत्र से यह वचन लिया। लेकिन उन्हें यह ज्ञात नहीं था कि यही वचन महाभारत के युद्ध में एक बड़ी उलझन खड़ी कर देगा। जब बर्बरीक युद्धभूमि की ओर जा रहे थे, तभी मार्ग में एक ब्राह्मण ने उन्हें रोक लिया। वह ब्राह्मण स्वयं श्रीकृष्ण थे। उन्होंने बर्बरीक से उसके अस्त्र-शस्त्र और युद्ध क्षमता के बारे में प्रश्न किए। बर्बरीक ने बताया कि उसके पास केवल तीन दिव्य बाण हैं, जिन्हें स्वयं महादेव का वरदान प्राप्त है। इनमें से एक बाण से ही संपूर्ण शत्रु सेना का नाश संभव है। श्रीकृष्ण ने परीक्षा लेने के लिए पीपल के पेड़ के पत्तों को भेदने की चुनौती दी। जैसे ही बर्बरीक ने बाण संधान किया, सारे पत्ते एक साथ बिंध गए। जब एक पत्ता ब्राह्मण ने अपने पैर के नीचे छिपा लिया, तो बाण ने उसके चरणों को वेधना चाहा। तब श्रीकृष्ण ने अपनी पहचान प्रकट की। प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण ने बर्बरीक से दान मांगने को कहा। बर्बरीक ने वचन दिया कि जो मांगा जाएगा, वह अवश्य देंगे। तब श्रीकृष्ण ने उनसे शीशदान मांग लिया। वचनबद्ध बर्बरीक ने शीशदान स्वीकार किया, लेकिन महाभारत का युद्ध देखने की इच्छा जताई। श्रीकृष्ण ने उनके शीश को अमृत से सींचकर कुरुक्षेत्र के पास एक ऊंचे स्थान पर स्थापित कराया, जिससे वे पूरा युद्ध देख सकें। शीश को खाट (त्रिपोद) पर स्थापित किए जाने के कारण वेखाटू वाले श्यामकहलाए। श्रीकृष्ण ने उन्हें वरदान दिया कि कलियुग में वे उनके ही नाम से पूजे जाएंगे और जब-जब संसार में धर्म संकट में होगा, वे हारे हुए का सहारा बनकर भक्तों की रक्षा करेंगे। इसी कारण आज भी श्याम बाबा को पुकारते ही श्रद्धालुओं के मन में यही विश्वास जाग उठता हैजो हारा है, वही श्याम का प्यारा है।

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