महाशिवरात्रि : जब रात्रि के गर्भ में सृष्टि स्वयं को सुनती है...
महाशिवरात्रि केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि भारतीय चेतना का वह क्षण है जहां मनुष्य स्वयं से साक्षात्कार करता है। शिवपुराण के अनुसार, फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को भगवान शिव ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए और ब्रह्मा-विष्णु के अहंकार का क्षय हुआ। इसी स्मृति में महाशिवरात्रि मनाई जाती है। इस वर्ष यह पर्व 15 फरवरी को त्रियोदशी युक्त चतुर्दशी में मनाया जाएगा, जब सर्वार्थ सिद्धि योग, शुभ नक्षत्र और चतुर्ग्रही योग का दुर्लभ संयोग बन रहा है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव पृथ्वी के सभी शिवलिंगों में विराजमान होते हैं, इसलिए की गई उपासना कई गुना फल देती है। महाशिवरात्रि का व्रत शरीर नहीं, बल्कि मन और विकारों के अनुशासन का प्रतीक है। शिव का दर्शन त्याग, संतुलन और वैराग्य का संदेश देता है, वे श्मशानवासी होकर भी त्रिलोकीनाथ हैं। आज के भौतिक और तनावग्रस्त जीवन में महाशिवरात्रि आत्मसंयम, मौन और चेतना के पुनर्जागरण का अवसर प्रदान करती है। यह पर्व बताता है कि सत्य ही शिव है और शिवत्व की प्राप्ति ही जीवन की पूर्णता है
सुरेश गांधी
महाशिवरात्रि केवल एक तिथि
नहीं है। यह केवल
व्रत, उपवास या पूजा की
विधि भी नहीं है।
यह वह क्षण है,
जब सृष्टि स्वयं से प्रश्न करती
है, और उत्तर शिव
के रूप में प्रकट
होता है। भारतीय चेतना
में ‘रात्रि’ अज्ञान का प्रतीक नहीं,
बल्कि सृजन का गर्भ
है। और जब उस
रात्रि में शिव अवतरित
होते हैं, तब वह
साधारण रात्रि नहीं रहती, वह
बन जाती है महाशिवरात्रि।
मतलब साफ है शिव
: आदि भी, अंत भी,
और उन दोनों के
बीच की मौन कड़ी
है. अर्थात शिव न जन्म
लेते हैं, न मरते
हैं। वे सृष्टि के
पहले मौन हैं और
प्रलय के बाद की
निश्चलता। वैसे भी भारतीय
संस्कृति में कुछ पर्व
ऐसे हैं जो केवल
तिथि नहीं होते, वे
चेतना की यात्रा होते
हैं। महाशिवरात्रि उन्हीं में से एक
है। यह पर्व शोर,
प्रदर्शन और उत्सवधर्मिता से
अधिक मौन, साधना और
आत्मबोध का पर्व है।
यह वह रात्रि है
जब सृष्टि के आरंभ, संतुलन
और संहार, तीनों के सूत्रधार भगवान
शिव अपने निराकार से
साकार भाव में प्रकट
हुए माने जाते हैं।
महाशिवरात्रि केवल उपवास या
रात्रि जागरण का नाम नहीं,
बल्कि यह मनुष्य और
ब्रह्म के बीच संवाद
की रात्रि है। यही कारण
है कि इसे ‘जागरण
की नहीं, जागृति की रात्रि’ कहा
गया है। शिवपुराण के
अनुसार, एक समय ब्रह्मा
और विष्णु के बीच श्रेष्ठता
का विवाद हुआ। दोनों स्वयं
को सृष्टि का सर्वोच्च कर्ता
मानने लगे। तभी आकाश
से पृथ्वी तक एक अनंत
ज्योति स्तंभ प्रकट हुआ। ब्रह्मा हंस
बनकर ऊपर की ओर
गए, विष्णु वराह बनकर नीचे
की ओर। किंतु न
किसी को उसका अंत
मिला, न आरंभ। तब
उन्हें बोध हुआ कि
शिव ही परम सत्य
हैं, न आरंभ, न
अंत। वही ज्योतिर्लिंग है,
वही शिव का निराकार
स्वरूप। मानव शरीर पंचभूतों
से बना है, भूमि,
गगन, वायु, अग्नि और जल। यही
पंचतत्व रुद्र हैं। जन्म से
मोक्ष तक जो साथ
चलता है, वही शिव
है। ‘भगवान’ शब्द भी पंचभूतों
का संकेत है, भ-भूमि,
ग-गगन, व-वायु,
अ-अग्नि, न-नीर। अर्थात
यही वह क्षण था,
जब सृष्टि ने पहली बार
स्वीकार किया कि सत्ता
का स्रोत अहंकार नहीं, चेतना है। यही ज्योति
आगे चलकर शिवलिंग के
रूप में प्रतिष्ठित हुई।
यही वह क्षण था
जब शिव निराकार से
साकार हुए। इसी स्मृति
में महाशिवरात्रि मनाई जाती है।
फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी, वही तिथि, वही
रात्रि, आज भी उस
ज्योति के अवतरण की
स्मृति है।
शुभ मुहूर्त व अद्भूद योग संयोग
नक्षत्र और ग्रहों का दुर्लभ संयोग
इस दिन उत्तराषाढ़ा
और श्रवण नक्षत्र का शुभ संयोग
बन रहा है. व्यतीपात
योग पूरे दिन प्रभावी
रहेगा, कुंभ राशि में
सूर्य, बुध, राहु और
शुक्र की युति से
चतुर्ग्रही योग बन रहा
है. यह सब मिलकर
न सिर्फ इस महाशिवरात्रि को
साधारण से असाधारण बना
रहे हैं, बल्कि यह
संयोग आत्मचिंतन, वैराग्य, नई दिशा और
कर्मशुद्धि का संकेत देता
है। ज्योतिषीय दृष्टि से यह समय
केवल पूजा का नहीं,
बल्कि आत्मिक निर्णय और जीवन-पथ
के पुनर्मूल्यांकन का भी है।
‘शिवद्रोही मम दास कहावा...’
गोस्वामी तुलसीदास ने श्रीराम के
मुख से कहलवाया, “शिवद्रोही
मम दास कहावा, सो
नर सपनेहुँ मोहि नहिं भावा।”
अर्थात जो शिव का
द्रोह कर राम को
पाना चाहता है, वह उन्हें
स्वप्न में भी प्राप्त
नहीं कर सकता। यह
पंक्ति स्पष्ट करती है कि
राम और शिव विरोध
नहीं, पूर्णता हैं। इसीलिए महाशिवरात्रि
पर शिव आराधना के
साथ रामचरितमानस पाठ अत्यंत पुण्यदायी
माना गया है। शिव
और राम एक-दूसरे
के पूरक हैं, एक
शक्ति का स्रोत हैं,
दूसरे मर्यादा का प्रतीक। शिव
आदि-अनादि हैं। वे सृष्टि
के विनाश और पुनर्स्थापन के
बीच की वह शाश्वत
कड़ी हैं, जो काल
के प्रवाह को अर्थ देती
है। महाशिवरात्रि का पर्व वास्तव
में उसी क्षण की
स्मृति है, जब परमात्मा
स्वयं सृष्टि के लिए प्रकट
हुए।
काशी : जहां शिव आज भी जीवित हैं
महाशिवरात्रि और काशी, एक-दूसरे के बिना अधूरे
हैं। काशी विश्वनाथ धाम
में इस दिन लाखों
श्रद्धालु गंगा स्नान कर
बाबा के दर्शन करते
हैं। मान्यता है कि महाशिवरात्रि
की रात्रि महादेव स्वयं काशी में विचरण
करते हैं। शिव वंचितों
के देवता हैं। वे श्मशानवासी
हैं, फिर भी कैलाश
के स्वामी हैं। वे भस्म
धारण करते हैं, फिर
भी त्रिलोकीनाथ हैं। उनका संदेश
स्पष्ट है, त्याग में
ही सर्वोच्च शक्ति है। आज जब
मनुष्य तनाव, भोग और प्रतिस्पर्धा
में उलझा है, महाशिवरात्रि
उसे रुकने, ठहरने और स्वयं को
देखने का अवसर देती
है। शिव कहते हैं
: कम में संतोष, मौन
में समाधान, और संतुलन में
ही जीवन है।
शिव-पार्वती विवाह : जब तीनों लोक बने बाराती
महाशिवरात्रि वह रात्रि भी
है, जब शिव और
शक्ति का मिलन हुआ।
एक ओर हिमालय की
राजकुमारी पार्वती, वंश, वैभव और
मर्यादा से परिपूर्ण। दूसरी
ओर शिव, न गोत्र,
न वंश, न राज्य,
न कुल। उनकी बारात
में देव, दानव, भूत,
प्रेत, पिशाच, पशु-पक्षी, सब
शामिल थे। यह विवाह
एक सामाजिक क्रांति भी था, जहाँ
वंश नहीं, चेतना का वरण हुआ।
यह संदेश था, शिव किसी
एक वर्ग, जाति या लोक
के नहीं, वे समस्त सृष्टि
के हैं। नारद का
वीणा की एक तार
छेड़ना, उस आदि ध्वनि
का स्मरण था, जिससे सृष्टि
का जन्म हुआ, ‘ॐ’।
सत्यम्, शिवम्, सुंदरम् : जीवन का त्रिसूत्र
शिव केवल देवता
नहीं, वे आचरण हैं,
अनुभव हैं, और अर्थ
हैं। सत्यम् : जो असत्य से
परे है, शिवम् : जो
कल्याणकारी है, सुंदरम् : जो
समरस है, शिव हमारे
कर्म में हैं, भोग
में हैं, जन्म में
हैं, और मृत्यु में
भी। शिव के बिना
न पूजा है, न
प्रकृति, न प्रलय।
महाशिवरात्रि : निश्चलता का उत्सव
योग परंपरा में
शिव को ईश्वर नहीं,
आदि गुरु माना गया
है। हजारों वर्षों के ध्यान के
बाद जिस दिन वे
पूर्णतः निश्चल हुए, वही दिन
था महाशिवरात्रि। इस रात पृथ्वी
के उत्तरी गोलार्ध में ऊर्जा का
प्रवाह स्वाभाविक रूप से ऊपर
की ओर होता है।
इसीलिए रात्रि जागरण, ध्यान और मौन इस
दिन विशेष महत्व रखते हैं।
शिव पूजा : भारत से विश्व तक
हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की
खुदाई से शिव-पूजा
के प्रमाण मिलते हैं। दक्षिण भारत
का नटराज तांडव, काशी का विश्वनाथ,
केदार, कैलाश, सोमनाथ, शिव सर्वत्र हैं।
शिव देवाधिदेव इसलिए हैं क्योंकि वे
देव, दानव, मनुष्य, पशु, वनस्पति, सबके
स्वामी हैं।
व्रत, भोजन और संयम
महाशिवरात्रि का व्रत केवल
भूखा रहना नहीं, यह
इंद्रिय संयम है। सेंधा
नमक, साबूदाना, सिंघाड़ा, कुट्टू, दही, यह भोजन
शरीर को हल्का और
मन को स्थिर करता
है।
कालरात्रि : अज्ञान से ज्ञान की यात्रा
‘रात्रि’ यहाँ अंधकार नहीं,
बल्कि अज्ञान का अंत है।
जब पाँच विकार : काम,
क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार,
चरम पर होते हैं,
तब शिव अवतरित होते
हैं। इसीलिए महाशिवरात्रि कालरात्रि भी कहलाती है।
विज्ञान भी खोज रहा है शिव
आधुनिक विज्ञान आज कह रहा
है, सब कुछ ऊर्जा
है। योग पहले ही
कह चुका है, जब
शून्य भी विलीन हो
जाए, तब जो शेष
रहे, वही शिव है।
भोलेनाथ : कृपा का दूसरा नाम
शिव अपने भक्तों
से कारण नहीं पूछते।
वे आशुतोष हैं, शीघ्र प्रसन्न
होने वाले। इसीलिए कहा गया है
जब तक शिव की
कृपा न हो, ईश्वरीय
साक्षात्कार संभव नहीं।
कर्म से चेतना तक की यात्रा
महाशिवरात्रि हमें सिखाती है,
जीवन का उद्देश्य केवल
भोग नहीं, बल्कि बोध है। यह
पर्व बताता है कि जब
मनुष्य अपने भीतर के
शोर को शांत करता
है, तभी वह उस
ध्वनि को सुन पाता
है, जो सृष्टि की
पहली ध्वनि थी। और वही
ध्वनि कहती है ॐ
नमः शिवाय। महाशिवरात्रि अंधकार को कोसने का
नहीं, अंधकार को समझकर प्रकाश
बनने का पर्व है।
यह आत्मा को शिवत्व से
जोड़ने की रात्रि है।
शिवोऽहम्, मैं ही शिव
हूं।
शिवलिंग : प्रतीक नहीं, दर्शन
शिवलिंग केवल पूजन की
वस्तु नहीं, बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रतीक है।
यह आकार नहीं, ऊर्जा
है। यह मूर्ति नहीं,
चेतना है। शिवलिंग हमें
सिखाता है कि ईश्वर
का कोई एक रूप
नहीं, वह निराकार भी
है, साकार भी।
जब शिव सभी शिवलिंगों में विराजते हैं
धार्मिक मान्यता के अनुसार, महाशिवरात्रि
के दिन भगवान भोलेनाथ
पृथ्वी पर स्थित सभी
शिवलिंगों में स्वयं विराजमान
होते हैं। इसी कारण
इस दिन की गई
शिव उपासना सामान्य दिनों की अपेक्षा अनेक
गुना अधिक फलदायी मानी
जाती है। यही कारण
है कि इस दिन
शिवालयों में विशेष पूजा,
रुद्राभिषेक, महामृत्युंजय जाप और रात्रि
जागरण का विशेष महत्व
है।
शिव : जीवन, मृत्यु और चेतना का आधार
शिव हमारे चारों
ओर हैं। हमारा आचरण,
व्यवहार, कर्म, भोग, जीवन और
मृत्युकृसबका मूल शिव हैं।
शिव के बिना पूजा
नहीं, प्रकृति नहीं, प्रवृत्ति नहीं, जीवन नहीं और
मृत्यु भी नहीं। शिव
दैहिक, दैविक और भौतिक, तीनों
शक्तियों के आधार हैं।
वे हमें जीना भी
सिखाते हैं और मरना
भी। भगवान शंकर बहुदेववाद की
सीमाओं से ऊपर उठाकर
यह उद्घोष करते हैं, ईश्वर
एक है, निराकार है।
‘एको हि रुद्रो’ - एक
ही रुद्र है, दूसरा कोई
नहीं। उनका महामंत्र ॐ
है, अकार : मस्तिष्क, उकार : उदर, मकार : मोक्ष.
यही प्रणवाक्षर जीवनदायी और सर्वव्यापक है।
महाशिवरात्रि केवल उपवास, पूजा
और जागरण का पर्व नहींकृयह
शिवत्व को समझने और
आत्मा को मुक्त करने
का अवसर है। जब
तक मनुष्य शिव की कृपा
का पात्र नहीं बनता, तब
तक ईश्वरीय साक्षात्कार संभव नहीं। शिव
सहज हैं, शिव सुंदर
हैं, शिव सत्य हैं,
शिव कल्याणकारी हैं, और यही
उनका शाश्वत हस्ताक्षर है सत्यम्, शिवम्,
सुंदरम्।
बंधनमुक्त मनुष्य ही शिवत्व को प्राप्त करता है
शास्त्र कहते हैं कि
जब मनुष्य सभी प्रकार के
भौतिक बंधनों और सम्मोहनों से
मुक्त हो जाता है,
तब वह स्वयं शिव
के समान हो जाता
है। शिवत्व कोई बाहर से
मिलने वाली वस्तु नहीं,
बल्कि भीतर जाग्रत होने
वाली अवस्था है। समस्त बंधनों
से मुक्ति ही शिवत्व की
प्राप्ति का मार्ग है।
चंद्रमा, मन और शिव की आराधना
ज्योतिषीय दृष्टि से महाशिवरात्रि का
विशेष महत्व है। चतुर्दशी तिथि
को चंद्रमा अपनी क्षीण अवस्था
में पहुंच जाते हैं। चंद्रमा
का सीधा संबंध मन
से माना गया है।
जब चंद्र कमजोर होता है, तो
मन भी दुर्बल हो
जाता है और भौतिक
संताप, विषाद तथा कष्ट प्राणी
को घेर लेते हैं।
चंद्रमा भगवान शिव के मस्तक
पर विराजमान हैं। ऐसे में
महाशिवरात्रि के दिन शिव
की आराधना मात्र से ही मानसिक,
दैहिक और आध्यात्मिक कष्टों
का निवारण संभव होता है।
शिव के अनेक नाम और ब्रह्मांडीय कथाएं
देवों के देव महादेव
को भोलेनाथ, शिवशंभू, पशुपति और रुद्र जैसे
अनेक नामों से जाना जाता
है। विष्णु पुराण और शिवपुराण में
वर्णित कथाओं के अनुसार, ब्रह्मा
जी की तपस्या से
शिव बालक रूप में
प्रकट हुए थे। नाम
न होने के कारण
रोते बालक को ब्रह्मा
जी ने ‘रुद्र’ नाम
दिया, जिसका अर्थ है, रोने
वाला। शिव के शांत
न होने पर उन्हें
क्रमशः आठ नाम प्रदान
किए गए, रुद्र, शर्व,
भाव, उग्र, भीम, पशुपति, ईशान
और महादेव। इन नामों के
माध्यम से शिव के
विभिन्न स्वरूपों का दर्शन होता
है। इस प्रसंग का
उल्लेख सत्यार्थ नायक की पुस्तक
‘महागाथा’ में भी मिलता
है।
व्रत : शरीर नहीं, मन का अनुशासन
महाशिवरात्रि का व्रत केवल अन्न त्याग नहीं है। यह विकारों के त्याग का व्रत है। यह क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार से उपवास का दिन है। बेलपत्र के तीन पत्ते : सत्व, रज और तम, तीनों गुणों के संतुलन का प्रतीक हैं।







No comments:
Post a Comment