Sunday, 4 January 2026

मोक्ष की भूमि पर गूंजा ‘खेलो और आगे बढ़ो’

मोक्ष की भूमि पर गूंजाखेलो और आगे बढ़ो’ 

जिस काशी को सदियों से मोक्ष, मंत्र, मणिकर्णिका और महाश्मशान की नगरी के रूप में जाना जाता रहा, उसी काशी ने अब एक नए युग का उद्घोष किया है, ‘खेलो और आगे बढ़ो गंगा के अविरल प्रवाह, बाबा विश्वनाथ के सान्निध्य और संत - साधना की परंपरा के बीच अब खेलों की गूंज सुनाई दे रही है। सिगरा स्थित डॉ. संपूर्णानंद स्पोर्ट्स स्टेडियम में आयोजित 72वीं सीनियर नेशनल वॉलीबॉल चैंपियनशिप ने यह स्पष्ट कर दिया कि काशी अब केवल आत्मा की मुक्ति नहीं, बल्कि युवाओं के भविष्य की दिशा भी तय कर रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी काटीम फर्स्टका मंत्र और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की स्पष्ट खेल दृष्टि ने इस आयोजन को एक साधारण खेल प्रतियोगिता से आगे बढ़ाकर युवाशक्ति के आत्मविश्वास, अनुशासन और राष्ट्रनिर्माण के प्रतीक में बदल दिया है 

सुरेश गांधी

धर्म, दर्शन और संस्कृति की अक्षय धरोहर काशी एक बार फिर समय की धड़कनों के साथ कदमताल करती दिख रही है। जिस नगरी को सदियों से मोक्ष, संगीत, साहित्य और साधना का केंद्र माना जाता रहा, वही काशी अब खेलों की राष्ट्रीय पहचान गढ़ने की ओर निर्णायक रूप से अग्रसर है। सिगरा स्थित डॉ. संपूर्णानंद स्पोर्ट्स स्टेडियम में आयोजित 72वीं सीनियर नेशनल वॉलीबॉल चैंपियनशिप केवल एक प्रतियोगिता नहीं, बल्कि काशी, उत्तर प्रदेश और देश के युवाओं के भविष्य से जुड़ा एक दूरगामी संदेश बनकर उभरा है। देखा जाएं तो काशी की पहचान सदैव अध्यात्म से रही है। गंगा की अविरल धारा, बाबा विश्वनाथ का आशीर्वाद और संतों - साधकों की परंपरा इस नगर की आत्मा रही है। लेकिन समय के साथ काशी ने स्वयं को बदला भी हैकृबिना अपनी आत्मा खोए। 

आज काशी उस दौर में प्रवेश कर चुकी है, जहां संस्कृति और आधुनिकता, आस्था और आत्मनिर्भरता, तथा परंपरा और प्रगति एक-दूसरे के पूरक बन रहे हैं। राष्ट्रीय वॉलीबॉल चैंपियनशिप का आयोजन इस बदलाव का सबसे सशक्त उदाहरण है। यह बताता है कि काशी अब केवल आध्यात्मिक पर्यटन का केंद्र नहीं, बल्कि युवा भारत के सपनों और खेल आकांक्षाओं का मंच भी बन चुकी है। देश के 28 से अधिक राज्यों की 58 टीमें, सैकड़ों खिलाड़ी, कोच, तकनीकी अधिकारी और हजारों दर्शक, यह दृश्य अपने आप मेंएक भारत - श्रेष्ठ भारतकी जीवंत तस्वीर है। वॉलीबॉल जैसे टीम गेम का चयन भी प्रतीकात्मक है। यह खेल सिखाता है कि कोई खिलाड़ी अकेले मैच नहीं जीत सकता

हर भूमिका महत्वपूर्ण होती है, जीत का श्रेय पूरी टीम को जाता है. यही दर्शन प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में रेखांकित किया, टीम फर्स्ट, फिर व्यक्तिगत उपलब्धि। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने काशी की धरती से खेलों को राष्ट्र निर्माण से जोड़ते हुए जो दृष्टि प्रस्तुत की, वह केवल खिलाड़ियों के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरक है. उन्होंने स्पष्ट कहा कि खेल केवल पदक या ट्रॉफी तक सीमित नहीं, बल्कि अनुशासन सिखाते हैं, सामूहिकता का भाव जगाते हैं, आत्मविश्वास और नेतृत्व विकसित करते हैं

2014 के बाद भारत में खेलों के प्रति बदले दृष्टिकोण को रेखांकित करते हुए प्रधानमंत्री ने बताया कि अब खिलाड़ी केंद्र में हैं, टैलेंट की वैज्ञानिक पहचान, पारदर्शी चयन, पोषण, आधुनिक प्रशिक्षण और अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाएं, इन सबने मिलकर भारत के खेल आत्मविश्वास को नई ऊंचाई दी है। एक समय था जब उत्तर प्रदेश को खेलों के क्षेत्र में पिछड़ा माना जाता था। सीमित संसाधन, बुनियादी ढांचे की कमी और अवसरों का अभाव, ये बड़ी बाधाएं थीं। लेकिन बीते कुछ वर्षों में यह तस्वीर तेजी से बदली है। 

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में प्रदेश में गांव-गांव खेल मैदान, ब्लॉक स्तर पर मिनी स्टेडियम, नगर निकायों में खेल सुविधाएं, राज्य स्तरीय खेल प्रतियोगिताएं, जैसे प्रयासों ने खेल संस्कृति को नई ऊर्जा दी है। काशी में 45 वर्षों बाद सीनियर नेशनल वॉलीबॉल चैंपियनशिप का आयोजन इस बदलाव का ठोस प्रमाण है। सिगरा का डॉ. संपूर्णानंद स्पोर्ट्स स्टेडियम अब केवल एक खेल परिसर नहीं रहा। यह आधुनिक खेल अवसंरचना, स्मार्ट सिटी मिशन का परिणाम, युवाओं के सपनों का केंद्र बन चुका है। यहां राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता का आयोजन यह संकेत देता है कि काशी अब खेल आयोजनों की मेजबानी में सक्षम और विश्वसनीय शहर बन चुकी है।

चैंपियनशिप के दौरान स्टेडियम में उमड़ा जनसैलाब यह बताता है कि काशी का युवा वर्ग खेलों को लेकर कितना उत्साहित है।हर-हर महादेवऔरमोदी-योगीके नारों के बीच खिलाड़ियों का उत्साह, दर्शकों की तालियां और बच्चों की चमकती आंखें, यह सब मिलकर एक नई खेल चेतना का निर्माण कर रहा है। यह उत्साह केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि प्रेरणा है, काशी का हर बच्चा अब खुद को राष्ट्रीय खिलाड़ी के रूप में देखने का साहस कर रहा है। वॉलीबॉल भारत का वह खेल है, जिसकी जड़ें गांवों तक फैली हैं। खेतों के बीच, स्कूल के मैदानों में, पंचायत स्तर परकृयह खेल हमेशा से युवाओं का प्रिय रहा है। ऐसे में नेशनल वॉलीबॉल चैंपियनशिप का आयोजन ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले खिलाड़ियों के लिए आत्मविश्वास का मंच बनता है। यह संदेश देता है किप्रतिभा शहर या संसाधनों की मोहताज नहीं होती, उसे केवल अवसर चाहिए।खेल अब केवल शौक नहीं, बल्कि करियर और रोजगार का मजबूत माध्यम बन रहा है। कोचिंग, फिटनेस ट्रेनिंग, स्पोर्ट्स मैनेजमेंट, फिजियोथेरेपी, मीडिया, इवेंट मैनेजमेंटकृखेल से जुड़े अनेक क्षेत्रों में युवाओं के लिए अवसर खुल रहे हैं।

काशी जैसे शहर में राष्ट्रीय प्रतियोगिता का आयोजन स्थानीय युवाओं को यह दिखाता है कि खेल भी सम्मानजनक भविष्य दे सकता है। यह आयोजन सिर्फ एक खेल प्रतियोगिता नहीं है। यह उस बदलते भारत की तस्वीर है, जहां परंपरा और प्रगति आमने - सामने नहीं, बल्कि साथ - साथ चल रही हैं। जहां शंखनाद के साथ अब खेल सीटी भी गूंजती है। जहां साधना के साथ संकल्प और श्रम का उत्सव मनाया जा रहा है। मतलब साफ है जो काशी हमेशा से भारत की आत्मा रही है। जहां जीवन और मृत्यु दोनों को समान श्रद्धा से देखा जाता है। वह अब वैश्विक आयोजनों का केंद्र है बन रहा है. और अब राष्ट्रीय खेल आयोजनों की मेजबान भी है. राष्ट्रीय वॉलीबॉल चैंपियनशिप का आयोजन इस बदलाव की सबसे ठोस मिसाल है। यह संकेत देता है कि काशी अब केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि भविष्य की प्रयोगशाला बन रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संबोधन खेल से कहीं आगे जाकर राष्ट्र चरित्र की बात करता है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि खेल केवल पदक नहीं, बल्कि अनुशासन, आत्मविश्वास और नेतृत्व गढ़ते हैं। काशी में 45 वर्षों बाद सीनियर नेशनल वॉलीबॉल चैंपियनशिप का आयोजन इसी बदले हुए दृष्टिकोण का परिणाम है। सिगरा स्थित डॉ. संपूर्णानंद स्पोर्ट्स स्टेडियम अब सिर्फ एक संरचना नहीं, बल्कि युवा आकांक्षाओं का केंद्र बन चुका है। आधुनिक सुविधाएं, अंतरराष्ट्रीय मानकों के कोर्ट, दर्शक दीर्घा और प्रशिक्षण संसाधनकृयह सब दर्शाता है कि काशी अब बड़े खेल आयोजनों के लिए तैयार है। यह स्टेडियम उस बदलाव का प्रतीक है, जहां शहर की पहचान अब केवल घाटों और मंदिरों तक सीमित नहीं, बल्कि खेल अवसंरचना तक विस्तारित हो चुकी है।

खेलो इंडियाऔर जमीनी बदलाव

प्रधानमंत्री कीखेलो इंडियापहल ने खेलों को अभिजात्य दायरे से निकालकर आम युवाओं तक पहुंचाया है। स्कूल - कॉलेज स्तर पर प्रतियोगिताएं, छात्रवृत्तियां, प्रशिक्षण और पहचान, इन सबने खेलों को भविष्य से जोड़ा है। काशी में यह चैंपियनशिप उसी नीति का प्रतिफल है, जहां खेल अब केवल महानगरों तक सीमित नहीं। खेल, समाज और अनुशासन, खेल समाज को भी बदलते हैं। नशे से दूर रहने की प्रेरणा, अनुशासन और समयबद्धता, टीम भावना और नेतृत्व, ये सब गुण खेल मैदान से निकलकर समाज में फैलते हैं। काशी जैसे सांस्कृतिक शहर में खेलों का उभार सामाजिक संतुलन को भी मजबूत करता है। राष्ट्रीय स्तर के आयोजन का असर केवल स्टेडियम तक सीमित नहीं रहता। होटल, परिवहन, स्थानीय व्यापार, पर्यटन, सबको गति मिलती है। खिलाड़ियों और दर्शकों के साथ काशी की संस्कृति, खानदृपान और परंपराएं देशभर तक पहुंचती हैं. यह आयोजन यह भी बताता है कि खेल आर्थिक गतिविधि का भी सशक्त माध्यम हैं।

भविष्य की दिशा : काशी एक मॉडल

72वीं सीनियर नेशनल वॉलीबॉल चैंपियनशिप ने काशी को एक मॉडल शहर के रूप में प्रस्तुत किया है जहां संस्कृति और खेल विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। जहां मोक्ष की बात करने वाली नगरी अब मंज़िल की राह भी दिखा रही है। मतलब साफ है काशी की धरती ने सदियों से जीवन का अर्थ समझाया है। अब वही धरती युवाओं से कह रही है खेलो, मेहनत करो और आगे बढ़ो। यह वॉलीबॉल चैंपियनशिप एक आयोजन भर नहीं, बल्कि एक संदेश है, भारत का भविष्य केवल किताबों या भाषणों में नहीं, बल्कि मैदानों में पसीना बहाते युवाओं के हाथों में है। और जब यह संदेश मोक्ष की भूमि से निकलता है, तो उसका प्रभाव पूरे देश तक जाता है।

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