मौनी अमावस्या : मौन में मोक्ष, संगम में सिद्धि
इस बार मौनी अमावस्या, 18 जनवरी को है. और यह माघ मास का सबसे पवित्र व प्रभावशाली पर्व है। यह तिथि आत्मसंयम, मौन, स्नान, दान और ध्यान का अद्भुत संगम है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन त्रिवेणी संगम में स्नान करने से सौ अश्वमेघ और हजार राजसूय यज्ञ के समान पुण्य प्राप्त होता है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान ऋषभदेव ने मौन व्रत का पारण किया था और द्वापर युग का आरंभ भी इसी तिथि से हुआ। मौन व्रत केवल वाणी का संयम नहीं, बल्कि मन और कर्म की शुद्धि का मार्ग है। अमावस्या पितरों को समर्पित होने के कारण तर्पण व दान विशेष फलदायी माने गए हैं। सूर्योपासना से शनि पीड़ा व दरिद्रता से मुक्ति मिलती है। मौनी अमावस्या आत्मिक शांति, सामाजिक संतुलन और मोक्ष की ओर ले जाने वाला दिव्य अवसर है। मतलब साफ है मौनी अमावस्या केवल एक धार्मिक तिथि नहीं, बल्कि आत्मा के शुद्धिकरण का महापर्व है। यह दिन मनुष्य को बाहरी कोलाहल से निकालकर भीतर के मौन से जोड़ता है। संगम की डुबकी, मौन व्रत, दान, तर्पण और ध्यान, इन सबके माध्यम से यह पर्व जीवन को संतुलन, शांति और मोक्ष की ओर ले जाने वाला सेतु बन जाता है। यही मौनी अमावस्या का शाश्वत संदेश है :- मौन में ही सत्य है, मौन में ही शक्ति है, और मौन में ही मोक्ष का मार्ग है
सुरेश गांधी
भारतीय सनातन परंपरा में कुछ तिथियां केवल पंचांग की गणना नहीं होतीं, वे आत्मा की यात्रा के पड़ाव होती हैं। माघ मास की पहली अमावस्या, मौनी अमावस्या, ऐसी ही एक तिथि है, जो मनुष्य को शब्दों के शोर से निकालकर आत्मा के मौन में प्रवेश कराती है। 18 जनवरी, रविवार को पड़ रही मौनी अमावस्या केवल एक व्रत-दिन नहीं, बल्कि तप, त्याग, ध्यान, स्नान और दान से जुड़ा वह महापर्व है, जिसमें व्यक्ति स्वयं को प्रकृति, ब्रह्मांड और ईश्वर के साथ एकाकार करने का अवसर पाता है। मौनी अमावस्या की तिथि का आरंभ 18 जनवरी को रात 12ः03 बजे से होगा और समापन 19 जनवरी को रात 1ः21 बजे पर। इस दिन का ब्रह्म मुहूर्त प्रातः 5ः27 से 6ः21 बजे, प्रातः संध्या 5ः54 से 7ः15 बजे, अभिजित मुहूर्त 12ः10 से 12ः53 बजे तथा सर्वार्थ सिद्धि योग सुबह 10ः14 बजे से अगले दिन 19 जनवरी सुबह 7ः14 बजे तक रहेगा। गोधूलि और सायाह्न संध्या के शुभ संयोग इस तिथि को और भी आध्यात्मिक ऊंचाई प्रदान करते हैं।
ज्योतिषीय दृष्टि से यह दिन
अत्यंत प्रभावशाली है। सूर्य की
उत्तरायण गति, मकर राशि
में उसका गोचर और
अमावस्या तिथि का संयोग
इस पर्व को विशेष
पुण्यदायक बनाता है। शास्त्रों में
कहा गया है कि
ऐसे योग दुर्लभ होते
हैं, जब मानव की
साधना को ब्रह्मांड स्वयं
स्वीकार करता है। ‘मौनी’
शब्द मौन से उत्पन्न
है। मौन अर्थात केवल
बोलना बंद कर देना
नहीं, बल्कि मन, वाणी और
कर्मकृतीनों स्तरों पर संयम। यही
कारण है कि यह
व्रत केवल उपवास नहीं,
बल्कि आत्मसंयम का महाव्रत कहा
गया है। शास्त्र के
अनुसार, मौन व्रत के
तीन आधार हैं, वाणी
का मौन : कटु, असत्य और
अहंकारयुक्त शब्दों से दूरी। कर्म
का मौन : बिना दिखावे के
सेवा, दान और परोपकार।
मन का मौनः ईश्वर
स्मरण, ध्यान और आत्मचिंतन। जब
मनुष्य इन तीनों स्तरों
पर मौन को साध
लेता है, तब उसका
अंतर्मन स्वतः शुद्ध होने लगता है।
यही मौनी अमावस्या की
मूल साधना है।
संगम स्नान : जहां देवता भी उतरते हैं
सनातन परंपरा में त्रिवेणी संगम
गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती
का मिलन, केवल भौगोलिक संगम
नहीं, बल्कि चेतना का संगम है।
मान्यता है कि मौनी
अमावस्या के दिन स्वयं
देवी-देवता संगम पर स्नान
करने आते हैं। इसी
कारण इसे माघ मास
का सबसे बड़ा स्नान
पर्व कहा गया है।
शास्त्रों में वर्णन है
कि इस दिन संगम
में डुबकी लगाने से “सौ अश्वमेघ
यज्ञ और हजार राजसूय
यज्ञ का फल प्राप्त
होता है।” यही कारण
है कि कुंभ और
माघ मेले में मौनी
अमावस्या के दिन श्रद्धालुओं
की संख्या सर्वाधिक होती है। यह
दिन मानव और दिव्य
सत्ता के बीच सेतु
बन जाता है।
ऋषभदेव और मौन की परंपरा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी
दिन आदि तीर्थंकर भगवान
ऋषभदेव ने अपनी दीर्घ
तपस्या के बाद मौन
व्रत का पारण किया
था और त्रिवेणी संगम
के पवित्र जल में स्नान
कर स्वयं को पूर्णतः ब्रह्म
में लीन किया था।
यह घटना मौनी अमावस्या
को केवल वैदिक नहीं,
बल्कि जैन परंपरा में
भी विशेष स्थान प्रदान करती है। कहा
जाता है कि ऋषभदेव
का यह मौन केवल
शब्दों का नहीं, बल्कि
अहंकार, आसक्ति और भोग से
पूर्ण विरक्ति का प्रतीक था।
यही कारण है कि
मौनी अमावस्या को योग आधारित
महाव्रत कहा गया है।
मनु, मानवता और माघ अमावस्या
एक अन्य मान्यता
के अनुसार, भगवान मनु, जिनसे मानव
जाति की उत्पत्ति मानी
जाती है का जन्म
भी माघ अमावस्या को
हुआ था। इसीलिए यह
तिथि केवल व्यक्तिगत साधना
का नहीं, बल्कि मानवता के जन्म और
मर्यादा की स्मृति का
भी पर्व है। मनु
स्मृति में जिस संयम,
धर्म और सामाजिक संतुलन
की बात कही गई
है, उसका मूल भाव
मौनी अमावस्या के मौन व्रत
में स्पष्ट दिखाई देता है।
द्वापर युग का शुभारंभ
पुराणों में उल्लेख मिलता
है कि द्वापर युग
का आरंभ भी मौनी
अमावस्या से हुआ था।
युग परिवर्तन की यह स्मृति
इस तिथि को और
भी गहन बनाती है।
यह दिन बताता है
कि समय बदलता है,
युग बदलते हैं, लेकिन आत्मसंयम
और साधना की आवश्यकता कभी
समाप्त नहीं होती।
पितृ तर्पण और अमावस्या का महत्व
अमावस्या तिथि को पितरों
को समर्पित माना गया है।
मौनी अमावस्या पर किया गया
पितृ तर्पण विशेष फलदायी माना गया है।
कहा जाता है कि
इस दिन तर्पण करने
से पितरों को शांति मिलती
है. कुल में सुख-समृद्धि आती है. वंश
वृद्धि और संतुलन बना
रहता है. गंगा और
संगम में स्नान कर
तर्पण करने से पितृ
दोष से मुक्ति का
मार्ग प्रशस्त होता है।
दान : कलियुग का सर्वोत्तम धर्म
शास्त्र कहते हैं, सतयुग
में तप श्रेष्ठ, त्रेतायुग
में ज्ञान, द्वापर में पूजन, कलियुग
में दान सर्वोत्तम, मौनी
अमावस्या पर अन्न, वस्त्र,
तिल, घी, कंबल, स्वर्ण
या सामर्थ्य अनुसार दान करने से
अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती
है। विशेष रूप से ब्रह्म
मुहूर्त में स्नान कर
किया गया दान जीवन
की अनेक बाधाओं को
दूर करता है।
सूर्योपासना और शनि पीड़ा से मुक्ति
इस दिन सूर्य
नारायण को अर्घ्य देने
का विशेष महत्व है। मान्यता है
कि इससे दरिद्रता दूर
होती है, रोग और
मानसिक कष्ट समाप्त होते
हैं, शनि दोष और
शनि पीड़ा से मुक्ति
मिलती है, सूर्य और
शनि का यह संतुलन
मौनी अमावस्या को ज्योतिषीय दृष्टि
से भी अत्यंत प्रभावी
बनाता है।
तुलसीदास और माघ स्नान का महात्म्य
गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में
माघ स्नान का अद्भुत वर्णन
किया है
“माघ मकरगति रवि
जब
होई,
तीरथपतिहि
आव
सब
कोई।
देव
दनुज
किन्नर
नर
श्रेणी,
सादर
मज्जहिं
सकल
त्रिवेणी।”
अर्थात माघ मास में
सूर्य के मकर राशि
में प्रवेश करते ही देव,
ऋषि, किन्नर और मानव सभी
संगम में स्नान को
आते हैं।
कल्पवास और माघ मास
इसी महात्म्य के
कारण माघ मास में
गंगा तट पर कल्पवास
की परंपरा है। श्रद्धालु कुटी
बनाकर एक माह तक
साधना, स्नान, दान और संयम
का जीवन जीते हैं।
मौनी अमावस्या इस कल्पवास का
शिखर पर्व मानी जाती
है।
मौन में ही मोक्ष का मार्ग
शास्त्र कहते हैं, होंठों
से किए गए जप
से अधिक पुण्य मन
के जप से मिलता
है। मौनी अमावस्या इसी
आंतरिक जप का पर्व
है। यह दिन सिखाता
है कि शब्द कम
हों, भाव गहरे हों,
और साधना सच्ची हो. यही कारण
है कि कहा गया
है “मौन रहकर की
गई उपासना मोक्ष का द्वार खोल
देती है।”
खगोल-ज्योतिषीय दृष्टि से भी इस दिन कुछ विशेष ग्रह-नक्षत्र संयोग
यह मौनी अमावस्या सिर्फ धार्मिक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि खगोल-ज्योतिषीय दृष्टि से भी इस दिन कुछ विशेष ग्रह-नक्षत्र संयोग बन रहे हैं, जो राशियों पर सकारात्मक (और कुछ के लिए सावधानी योग्य) प्रभाव डाल सकते हैं। सूर्यदृचंद्रमा युति (न्यू मून/युति दृष्टि योग) : मौनी अमावस्या के दिन सूर्य और चंद्रमा एक ही राशि मकर में एक साथ होंगे, जिसे ज्योतिष में युति/नई चंद्रमा कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि इससे कर्म, अनुशासन, नीति-निर्णय और स्थिरता की ऊर्जा बढ़ती है। इस समय का प्रभाव 18 जनवरी शाम से 20 जनवरी रात तक प्रभावी रहने की संभावना है। बुध - मंगल का संयोजन (दृष्टि योग) : ग्रह बुध (वाणी, बुद्घि, व्यापार) और मंगल (ऊर्जा, साहस, कर्म) का संयोग भी बना है, जिससे कुछ राशियों को व्यक्तिगत और आर्थिक प्रगति के अवसर मिल सकते हैं. खास यह है कि इस संयोग से मिथुन राशि वालों को यातायात, नौकरी, करियर और रिश्तों में सकारात्मक बदलाव के योग बन रहे हैं। जीवनसाथी और परिवार के साथ तालमेल बेहतर होगा। नई नौकरियों और अवसरों की प्राप्ति हो सकती है। इसके अलावा मेष, कर्क, कन्या, वृश्चिक और मकर वाले राशियों पर 16 से 18 जनवरी के मंगल-सूर्य-शुक्र के त्रिग्रह योग के फल सकारात्मक होंगे, विशेषकर आर्थिक और करियर-मंच पर उन्नति के संकेत हैं। मेष, मिथुन, कर्क, कन्या और मकर राशियाँ भाग्य, धन और व्यापार में लाभ के संयोग हैं। जैसा कि जनवरी के शुरुआती दिनों में सूर्य, मंगल, बुध का संयोग तीव्र ऊर्जा उत्पन्न कर रहा है, ध्यान देने योग्य है कि : यदि आप निर्णय जल्दबाजी में लेते हैं तो विवाद, वाणी में कटुता या अनावश्यक खर्च हो सकता है. स्वास्थ्य में थोड़ी सतर्कता आवश्यक हो सकती है, खासकर काम के दबाव और तंत्रिका-संबंधित तनाव के मामलों में। मौनी अमावस्या पर बन रही ग्रह युतियाँ, सूर्य-चंद्रमा युति और बुध-मंगल का संयोग - लाभ, स्थिरता और कर्म-परिणाम के सकारात्मक अवसर पैदा कर रहे हैं। मिथुन राशि को सबसे अधिक लाभ के योग दिखाई देते हैं, जबकि मेष, कर्क, कन्या, वृश्चिक और मकर के लिए भी यह समय कैरियर और आर्थिक प्रगति का है-




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