Friday, 16 January 2026

मणिकर्णिका घाट : श्मशान नहीं, शाश्वत सत्य का सिंहद्वार

मणिकर्णिका घाट : श्मशान नहीं, शाश्वत सत्य का सिंहद्वार 

काशी में जब-जब विकास की बात होती है, कुछ चेहरे और कुछ दल अचानकसंस्कृति के ठेकेदारबन जाते हैं। मणिकर्णिका घाट के पुनर्निर्माण को लेकर मचाया जा रहा शोर उसी मानसिकता का ताजा उदाहरण है। वही शोर, वही धमकियां और वही भ्रम, जो कभी काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर, नमो घाट, अस्सी घाट, डालमंडी और शहर की सड़कों के सौंदर्यीकरण के समय सुनाई दिया था। मणिकर्णिका घाट श्मशान नहीं, सनातन दर्शन का जीवंत प्रतीक है। लेकिन दशकों तक यहां अव्यवस्था, गंदगी और असुरक्षा कोपरंपराकहकर स्वीकार कर लिया गया। सवाल यह है कि क्या अव्यवस्था ही संस्कृति है? क्या शोकाकुल परिजनों की पीड़ा और असुरक्षित दाह-संस्कार स्थल ही काशी की पहचान हैं? जबकि सरकार स्पष्ट कर चुकी है कि कोई मंदिर तोड़ा जा रहा है, कोई पौराणिक धरोहर नष्ट हो रही है। सभी कलाकृतियां सुरक्षित हैं और पुनर्निर्माण के बाद यथास्थान स्थापित होंगी। फिर यह हंगामा क्यों? क्योंकि कुछ लोग नहीं चाहते कि काशी व्यवस्थित हो। उन्हें काशी की आत्मा नहीं, अव्यवस्था की राजनीति प्यारी है। मोदी - योगी मॉडल ने यह साबित किया है कि विरासत के साथ विकास संभव है, और वही बात उपद्रवी राजनीति को सबसे ज्यादा चुभती है। ऐसे में बड़ा सवाल तो यही है क्या विकास से डरती राजनीति औरजैसा है वैसा रहने दोका छल काशी के पुनरुत्थान में रोड़ा अटकाने की साजिश है? यह सवाल अब हर काशीवासियों की जुबान पर है 

सुरेश गांधी

अब इन विरोधियों को कौन समझाएं यह कोई साधारण शहर नहीं, यह कोई सामान्य तीर्थ नहीं, यह कोई सिर्फ धार्मिक स्थल नहीं, काशी समय के पार खड़ा वह सत्य है, जहां जीवन और मृत्यु आमने-सामने संवाद करते हैं। और इसी काशी की आत्मा का सबसे तीखा, सबसे निर्विवाद और सबसे शाश्वत प्रतीक है, मणिकर्णिका घाट। जहां चिताओं की लपटें डराती नहीं, बल्कि जीवन का अंतिम सत्य समझाती हैं। जहां मृत्यु शोक नहीं, मुक्ति का द्वार है। जहां जलती लकड़ियों की गंध भी सनातन दर्शन का उद्घोष करती है। आज वही मणिकर्णिका घाट एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है, लेकिन कारण आध्यात्मिक नहीं, राजनीतिक उपद्रव है। या यूं कहे काशी के मणिकर्णिका घाट पर शुरू हुए पुनर्निर्माण और सौंदर्यीकरण कार्य को लेकर एक बार फिर वही राजनीतिक तत्व सक्रिय हो गए हैं, जो हर विकास परियोजना के समय भ्रम और भय का वातावरण बनाते रहे हैं। काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर से लेकर अस्सी घाट, नमो घाट और शहर की सड़कों के सौंदर्यीकरण तक, हर बार यही कहा गया कि संस्कृति नष्ट हो जाएगी, लेकिन हर परियोजना ने काशी की गरिमा को और ऊंचा किया। मणिकर्णिका घाट सदियों से मोक्ष की चेतना का केंद्र रहा है, लेकिन दशकों तक यहां बुनियादी सुविधाओं का अभाव बना रहा। आज जब सरकार सुरक्षा, स्वच्छता और मानवीय सुविधाओं के साथ घाट को व्यवस्थित कर रही है, तोजैसा है वैसा ही रहने दोका नारा फिर उछाला जा रहा है।

यह अलग बात है कि सरकार साफ कर चुकी है कि किसी मंदिर या ऐतिहासिक संरचना को नुकसान नहीं पहुंचाया जा रहा। सभी धरोहरें सुरक्षित हैं। दरअसल, समस्या विकास नहीं, व्यवस्था है, और व्यवस्था से वही लोग डरते हैं, जिनकी राजनीति अव्यवस्था पर टिकी रही है। लेकिन सरकार एवं प्रशासन शहर के जर्जर और लटकते बिजली के तार हटाने मंदिरों के सौंदर्यीकरण परपरंपरा खत्म होनेका शोर मचाने वाले उन तत्वों को जो मणिकर्णिका को ढाल बनाकर तोड़फोड़ की धमकी, भ्रामक वीडियो, अधूरे सच, और भावनात्मक उकसावे के जरिए काशी को फिर अराजकता की ओर ढकेलना चाहते हैं, के मंसूबों को ध्वस्त करने के लिए पूरी ताकत से जुट गयी है. लेकिन सवाल यह है कि क्या गंदगी, अव्यवस्था, अव्यवस्थित लकड़ी भंडारण, असुरक्षित प्लेटफार्म, गंदे मुंडन स्थल, अवशेषों का अव्यवस्थित निस्तारण और शोकाकुल परिजनों की पीड़ा, यही काशी की पहचान है? जबकि पुराण कहते हैं, यहीं भगवान विष्णु के कान का कुंडल (मणि) गिरा था। यहीं माता सती की मणि गिरी। यहीं स्वयं महादेव मृत्यु के क्षण मेंतारक मंत्रका उपदेश देते हैं। स्कंद पुराण, काशी खंड, पद्म पुराण, सब मणिकर्णिका को मोक्ष का प्रथम सोपान बताते हैं। यह घाट सिर्फ दाह-संस्कार स्थल नहीं, यह सभ्यता का दर्पण है। लेकिन दुर्भाग्य देखिए, सदियों से पूजित इस घाट को दशकों तक प्रशासनिक उपेक्षा और राजनीतिक उदासीनता के हवाले छोड़ दिया गया।

सच यह है कि मणिकर्णिका में श्रद्धा कभी कम नहीं हुई, लेकिन व्यवस्था हमेशा जर्जर रही। शवदाह प्लेटफार्म असुरक्षित, लकड़ी खुले में बिखरी, पूजा सामग्री का कोई व्यवस्थित स्थान नहीं, मुंडन स्थल अव्यवस्थित, गंगा में राख और अवशेषों का अनियंत्रित प्रवाह, बारिश में फिसलन, आग से दुर्घटनाओं का खतरा, शोक में डूबे परिजनों के लिए बैठने-ठहरने की न्यूनतम सुविधा तक नहीं, कोरोना काल ने तो इस अव्यवस्था को भयावह त्रासदी में बदल दिया था। तब भी यही राजनीतिक वर्ग मौन था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने काशी को लेकर एक स्पष्ट दृष्टि रखी, विकास ऐसा हो, जो संस्कृति को चोट पहुंचाए, बल्कि उसे और उजागर करे। काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। जिसे तोड़फोड़ कहा गया, आज वही विश्वस्तरीय आध्यात्मिक धरोहर बन चुका है। नमो घाट, अस्सी घाट, हर जगह वही आरोप लगे, हर जगह वही विरोध हुआ, और हर जगह वही विरोध आज मौन है। नगर विकास एवं ऊर्जा मंत्री .के. शर्मा एवं स्टांप पंजीयन शुल्क राज्य मंत्री रवीन्द्र जायसवाल ने स्पष्ट किया है,  कोई मंदिर नहीं तोड़ा जा रहा, कोई पौराणिक संरचना नष्ट नहीं हो रही, अहिल्याबाई होलकर की कृतियां पूर्णतः सुरक्षित, सभी कलाकृतियां संस्कृति विभाग के पास संरक्षित, पुनर्निर्माण के बाद यथास्थान पुनः स्थापित, तो फिर शोर क्यों? क्योंकि जहां व्यवस्था आती है, वहां उपद्रव की दुकान बंद होती है।

50,000 करोड़ का सच और काशी का भविष्य

काशी में अब तक लगभग 50,000 करोड़ रुपये के विकास कार्य हो चुके हैं। और यह प्रक्रिया रुकेगी नहीं। यह पैसा काशी की आत्मा बेचने के लिए नहीं, बल्कि उसकी गरिमा लौटाने के लिए खर्च हुआ है। आज काशी, धार्मिक पर्यटन का वैश्विक केंद्र है, रोजगार का बड़ा स्रोत बन रही है, अव्यवस्था से निकलकर व्यवस्था की ओर बढ़ रही है, उपद्रव बनाम सुधारः फैसला काशी को करना है, आज सवाल मणिकर्णिका का नहीं, मानसिकता का है। क्या काशी को गंदगी में छोड़ दिया जाए? अव्यवस्था में कैद रखा जाए? श्रद्धा के नाम पर अमानवीय हालात बनाए रखें? या फिर, संवेदनशीलता, सम्मान और सुरक्षा के साथ उसके स्वरूप को और सशक्त बनाया जाए? अंतिम सत्य मणिकर्णिका तो किसी पार्टी की बपौती है, किसी नेता की ढाल। यह सनातन सत्य है, और सत्य को व्यवस्थित होने से डर नहीं लगता। जो लोग आज शोर मचा रहे हैं, वे काशी से नहीं, व्यवस्था से डर रहे हैं। और काशी, अब डरने के दौर से निकल चुकी है। इतिहास साक्षी है, काशी कभी टूटने से नहीं, ठहर जाने से कमजोर हुई है। और हर बार शोर मचाने वाले इतिहास के हाशिए पर चले गए हैं।

जब-जब काशी बदली, तब-तब हंगामा हुआ

अहिल्याबाई होलकर के घाट निर्माण पर भी विरोध, अंग्रेजी काल में घाटों के पक्के होने पर असहमति, स्वतंत्रता के बाद सड़क, बिजली, जल व्यवस्था पर विरोध, हाल के सालों में काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर, अस्सी घाट, नमो घाट, डालमंडी, गोदौलिया, चौक, लटकते तारों और संकरी गलियों का सुधारीकरण, आज काशी के विकास को चार चांद लगा रहे है. मतलब साफ है हर बार कहा गया, काशी नष्ट हो जाएगी और हर बार काशी ने स्वयं कहा, “मैं नष्ट नहीं होती, मैं निखरती हूँ।” 

'पत्र लिखें, पर थोड़ा धैर्य रखें'

सुमित्रा महाजन ने इस मुद्दे पर आक्रोशित लोगों को सलाह दी. उन्होंने कहा कि जिन्हें दुख पहुंचा है, उन्हें शासन को पत्र लिखकर अपनी भावनाएं बतानी चाहिए और कहना चाहिए कि हमें दुख हुआ है, आप इसे ठीक करें. सरकार इतिहास और विरासत को मानती है, इसलिए हमें थोड़ा इंतजार करना चाहिए कि वे इसे कितनी जल्दी और बेहतर तरीके से ठीक करते हैं. "काशी विश्वनाथ कॉरिडोर में अहिल्या माता की मूर्ति स्थापित करना सरकार की ऐतिहासिक समझ को दर्शाता है. किसी ने मांग नहीं की थी, फिर भी सरकार ने उनके योगदान को सम्मान दिया." इंदौर की छत्रियों का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि जब ट्रस्ट ध्यान नहीं देते, तब नगर निगम और सरकार को ही आगे आकर संरक्षण का काम करना पड़ता है

काम पूरा होने के बाद उन्हें उनके मूल रूप

में फिर से स्थापित किया जाएगा : डीएम

जिला अधिकारी सत्येंद्र कुमार ने कहा कि पुनर्विकास योजना के तहत पुनर्निर्माण कार्य के दौरान, घाट पर दीवारों में लगी कुछ कलाकृतियां प्रभावित जरूर हुई हैं। उन्होंने कहा कि लेकिन ऐसी सभी कलाकृतियों और मूर्तियों को संस्कृति विभाग द्वारा विधिवत संरक्षित किया गया है तथा एक सुरक्षित स्थान पर रखा गया है एवं काम पूरा होने के बाद उन्हें उनके मूल रूप में फिर से स्थापित किया जाएगा।

ड्रीम प्रोजेक्ट

ड्रीम प्रोजेक्ट के तहत एक दो मंजिला भवन, 38 शवों के नए प्लेटफार्म, प्रवेश प्रांगण, अप्रोच मार्ग, पंजीकरण कार्यालय, आंगन सहित आगंतुक भवन, लकड़ी के ढुलाई का रैंप, पेयजल की सुविधा, प्रतीक्षालय, शौचालय और दर्शन व्यू गैलरी भी शामिल होगी. इसके साथ ही बाढ़ में आने वाले शवों को अंतिम संस्कार के लिए भी लंबा इंतजार नहीं करना पड़ेगा. पूर्व मंत्री नीलकंठ तिवारी ने कहा कि बड़ी बात ये है कि इस नवीनीकरण में आने वाले मूर्तिकलाओं और मंदिरों को संरक्षित किया जाएगा और उनका भी नवीनीकरण किया जाएगा. इसमें आधुनिक सुविधाओं के साथ संस्कार का भी समावेश होगा.

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