‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ भारत की अर्थव्यवस्था का टर्निंग प्वाइंट
भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) के 27 देशों के बीच हुआ मुक्त व्यापार समझौता केवल एक आर्थिक करार नहीं, बल्कि भारत की वैश्विक भूमिका को नई परिभाषा देने वाला ऐतिहासिक कदम है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इसे ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कहा जाना इसके व्यापक प्रभाव, आकार और दूरगामी संभावनाओं को दर्शाता है। करीब दो दशक की बातचीत के बाद यह समझौता ऐसे समय पर सामने आया है, जब वैश्विक अर्थव्यवस्था संरक्षणवाद, व्यापार युद्ध और अस्थिर सप्लाई चेन के दबाव में है। इस समझौते के तहत भारतीय निर्यात की लगभग 93 प्रतिशत वस्तुओं को यूरोपीय बाजार में ड्यूटी-फ्री या न्यूनतम शुल्क पर प्रवेश मिलेगा। इससे कपड़ा, कालीन, हस्तशिल्प, चमड़ा, रत्न-आभूषण और एमएसएमई क्षेत्र को बड़ा लाभ होने की संभावना है। वहीं यूरोपीय संघ की मशीनरी, तकनीक और उन्नत उत्पादों को भारतीय बाजार में चरणबद्ध रियायतें मिलेंगी, जिससे निवेश और तकनीकी सहयोग को बल मिलेगा। आर्थिक दृष्टि से यह समझौता भारत की जीडीपी वृद्धि, रोजगार सृजन और विदेशी निवेश को गति दे सकता है। विशेषकर श्रम-प्रधान उद्योगों और सेवा क्षेत्र में नए अवसर पैदा होंगे। मतलब साफ है, यह डील भारत को वैश्विक सप्लाई चेन का भरोसेमंद केंद्र बनाने और आर्थिक महाशक्ति की ओर अग्रसर करने वाला निर्णायक कदम साबित हो सकती है
सुरेश गांधी
जब वैश्विक व्यवस्था
एक बार फिर संरक्षणवाद,
व्यापार युद्ध और भू-राजनीतिक
अस्थिरता के दौर से
गुजर रही है, तब
भारत और यूरोपीय संघ
(ईयू) के 27 देशों के बीच हुआ
मुक्त व्यापार समझौता केवल एक आर्थिक
करार नहीं रह जाता,
बल्कि वह भारत की
बदलती वैश्विक भूमिका का एक ऐतिहासिक
मोड़ के रूप में
सामने आया है। प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी द्वारा इसे
‘मदर ऑफ ऑल डील्स’
कहा जाना इस समझौते
के आकार, प्रभाव और दीर्घकालिक संभावनाओं
को रेखांकित करता है। या
यूं कहे यह डील
न केवल व्यापार बढ़ाने
का माध्यम है, बल्कि भारत
को वैश्विक सप्लाई चेन का भरोसेमंद
केंद्र बनाने की दिशा में
बड़ा कदम भी है।
यह समझौता ऐसे समय में
सामने आया है जब
भारत विश्व की सबसे तेज़ी
से उभरती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है
और यूरोप ऊर्जा संकट, मंदी की आशंका
तथा नई सप्लाई चेन
की तलाश से जूझ
रहा है। ऐसे में
भारत ईयू साझेदारी दोनों
के लिए एक रणनीतिक
अनिवार्यता बनकर उभरी है।
इस समझौते के तहत भारतीय
निर्यात की लगभग 93 प्रतिशत
वस्तुओं को यूरोपीय बाजार
में ड्यूटी-फ्री या बेहद
कम शुल्क पर प्रवेश मिलेगा।
इससे कपड़ा, कालीन, चमड़ा, हस्तशिल्प, रत्न-आभूषण और
रसायन जैसे श्रम-प्रधान
उद्योगों को सीधा लाभ
होगा। ये वही क्षेत्र
हैं, जिनसे देश के करोड़ों
लोगों की आजीविका जुड़ी
है।
कालीन व साड़ी उद्योग के लिए नया सवेरा
यूरोपीय यूनियन के साथ व्यापार
में अधिकांश उत्पादों पर टैरिफ शून्य
होने से भारत के
लगभग हर प्रमुख औद्योगिक
राज्य में उद्यमिता और
रोजगार की नई संभावनाएं
खुलती दिख रही हैं।
यह केवल निर्यात वृद्धि
नहीं, बल्कि क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था के पुनरुत्थान का
संकेत है। महाराष्ट्र में
इचलकरंजी के वस्त्र उद्योग,
पुणे के इंजीनियरिंग-इलेक्ट्रॉनिक्स
और ठाणे-रायगढ़ के
फार्मा सेक्टर को नए ऑर्डर
मिलने की संभावना है,
वहीं मुंबई के रत्न-आभूषण
निर्यात को गति मिलेगी।
गुजरात को सूरत के
वस्त्र-हीरा उद्योग, भरूच-वडोदरा के केमिकल्स और
राजकोट के इंजीनियरिंग निर्यात
से बड़ा लाभ होगा।
तमिलनाडु में तिरुप्पुर के
परिधान, वेल्लोर-अंबूर के चमड़ा-फुटवियर
और चेन्नई-कोयंबटूर के इंजीनियरिंग सेक्टर
वैश्विक प्रतिस्पर्धा में और मजबूत
होंगे। पश्चिम बंगाल को दार्जिलिंग चाय,
दीघा-हल्दिया के समुद्री उत्पाद
और पारंपरिक हस्तशिल्प से आजीविका आधारित
लाभ मिलेगा। असम में डिब्रूगढ़-जोरहाट की चाय, ऊपरी
असम के मसाले और
बांस-हस्तशिल्प को प्रीमियम बाजार
मिलेगा। केरल के लिए
झींगा, टूना, काली मिर्च और
इलायची किसानों-मछुआरों की आय बढ़ाने
वाले सेक्टर बनेंगे। कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में
इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मा और वस्त्र निर्यात
से हाई-वैल्यू सप्लाई
चेन मजबूत होगी। पंजाब के लुधियाना-जालंधर
और राजस्थान के जयपुर-जोधपुर
जैसे एमएसएमई व शिल्प केंद्रों
को भी सीधा लाभ
मिलेगा। कुल मिलाकर, यह
समझौता भारत के राज्यों
को स्थानीय उत्पादन से वैश्विक बाजार
तक जोड़ने वाला निर्णायक मोड़
साबित हो सकता है।
दो दशक की प्रतीक्षा और बदली वैश्विक परिस्थितियां
भारत और यूरोपीय
संघ के बीच मुक्त
व्यापार समझौते की बातचीत वर्ष
2007 में शुरू हुई थी।
बीच के वर्षों में
कई बार वार्ता रुकी,
प्राथमिकताएं बदलीं और वैश्विक परिस्थितियों
ने दिशा मोड़ी। लेकिन
बीते कुछ वर्षों में
वैश्विक अर्थव्यवस्था में आए बदलावों,
विशेषकर अमेरिका-चीन व्यापार तनाव,
कोविड के बाद सप्लाई
चेन संकट और यूक्रेन
युद्धकृने यूरोप और भारत दोनों
को एक-दूसरे के
करीब आने के लिए
मजबूर किया। भारत के लिए
यह समझौता इसलिए भी महत्वपूर्ण है
क्योंकि यह उसे केवल
एक उभरता बाजार नहीं, बल्कि वैश्विक उत्पादन और आपूर्ति का
भरोसेमंद केंद्र बनाता है। वहीं यूरोपीय
संघ के लिए भारत
एक ऐसा साझेदार है
जो लोकतांत्रिक मूल्यों, स्थिरता और विशाल बाजार,
तीनों का संगम प्रस्तुत
करता है।
इस ऐतिहासिक समझौते
का सबसे प्रत्यक्ष और
व्यावहारिक असर टैरिफ यानी
आयात-निर्यात शुल्क में कटौती के
रूप में दिखाई देगा।
समझौते के तहत भारत
की लगभग 93 प्रतिशत निर्यात योग्य वस्तुओं को यूरोपीय बाजार
में ड्यूटी-फ्री या न्यूनतम
शुल्क पर प्रवेश मिलेगा।
इसका सीधा लाभ उन
क्षेत्रों को होगा, जिनमें
भारत की परंपरागत और
श्रम-प्रधान ताकत निहित है,
कपड़ा और वस्त्र, कालीन
और हस्तशिल्प, चमड़ा उद्योग, रत्न
एवं आभूषण, रसायन और कृषि आधारित
उत्पाद, यूरोप जैसे उच्च क्रयशक्ति
वाले बाजार में शुल्क मुक्त
पहुंच भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता को कई
गुना बढ़ा देगी।
यूरोपीय संघ को भी रियायत
भारत का आर्थिक ढांचा और जीडीपी पर प्रभाव
आज भारत और
यूरोपीय संघ के बीच
द्विपक्षीय व्यापार 190 अरब डॉलर से
अधिक का है। विशेषज्ञों
का अनुमान है कि यह
समझौता लागू होने के
बाद अगले कुछ वर्षों
में इसमें उल्लेखनीय वृद्धि होगी। निर्यात में वृद्धि से
औद्योगिक उत्पादन बढ़ेगा, विदेशी निवेश (एफडीआई) में तेजी आएगी,
सेवा क्षेत्र को नया विस्तार
मिलेगा. अर्थशास्त्रियों के अनुसार, यह
समझौता भारत की जीडीपी
वृद्धि दर में अतिरिक्त
0.5 से 1 प्रतिशत तक का योगदान
कर सकता है। यह
किसी भी बड़ी अर्थव्यवस्था
के लिए एक महत्वपूर्ण
उपलब्धि मानी जाती है।
रोजगार सृजन : सामाजिक बदलाव की धुरी
इस समझौते का
सबसे व्यापक सामाजिक असर रोजगार के
क्षेत्र में दिखाई दे
सकता है। भारत की
बड़ी आबादी युवा है और
रोजगार सृजन उसकी सबसे
बड़ी चुनौती भी। मतलब साफ
है श्रम-प्रधान उद्योगों
में लाखों नए रोजगार के
अवसर, एमएसएमई सेक्टर को अंतरराष्ट्रीय बाजार
से सीधा जुड़ाव, यूरोपीय
निवेश से तकनीकी और
उच्च कौशल नौकरियां. यह
समझौता ‘मेक इन इंडिया’
और ‘आत्मनिर्भर भारत’ को वैश्विक मंच
पर मजबूती प्रदान करता है।
सेवा क्षेत्र और डिजिटल भारत
भारत की अर्थव्यवस्था
में सेवा क्षेत्र की
हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है।
इस समझौते में सेवाओं को
भी अहम स्थान दिया
गया है। आईटी, फिनटेक
और कंसल्टेंसी सेवाओं को यूरोप में
बेहतर पहुंच, भारतीय पेशेवरों के लिए अवसर,
डिजिटल ट्रेड और डेटा सहयोग.
यह भारत को केवल
वस्तुओं का निर्यातक नहीं,
बल्कि ज्ञान और सेवा आधारित
अर्थव्यवस्था के रूप में
स्थापित करता है।
तकनीक, निवेश और हरित भविष्य
यूरोपीय संघ तकनीक, अनुसंधान
और हरित ऊर्जा में
अग्रणी माना जाता है।
इस समझौते से ग्रीन एनर्जी
और हाइड्रोजन मिशन में सहयोग,
इलेक्ट्रिक वाहन और बैटरी
टेक्नोलॉजी का विकास, रिसर्च
एंड डेवलपमेंट में संयुक्त निवेश.
भारत की विकास यात्रा
को पर्यावरणीय संतुलन के साथ आगे
बढ़ाने में यह साझेदारी
सहायक हो सकती है।
आलोचनाएं और आशंकाएं
हर बड़े आर्थिक
निर्णय की तरह इस
समझौते पर भी सवाल
उठ रहे हैं। छोटे
उद्योगों को सस्ते यूरोपीय
उत्पादों से प्रतिस्पर्धा का
डर, कृषि और डेयरी
सेक्टर को लेकर चिंताएं,
श्रम और पर्यावरण मानकों
की शर्तें. हालांकि सरकार का तर्क है
कि सुरक्षा प्रावधान, चरणबद्ध सुधार और घरेलू नीतिगत
समर्थन से इन आशंकाओं
को संतुलित किया जाएगा।
प्रधानमंत्री मोदी की आर्थिक कूटनीति
यह समझौता प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी की उस
व्यापक रणनीति का हिस्सा है,
जिसमें भारत को वैश्विक
सप्लाई चेन का केंद्र,
भरोसेमंद व्यापारिक साझेदार और उभरती आर्थिक
महाशक्ति के रूप में
स्थापित किया जा रहा
है। यह सौदा स्पष्ट
करता है कि भारत
संरक्षणवाद नहीं, बल्कि संतुलित वैश्वीकरण के रास्ते पर
चल रहा है।
अवसर भी, जिम्मेदारी भी
भारत ईयू ‘मदर
ऑफ ऑल डील्स’ आने
वाले दशकों में भारत की
आर्थिक दिशा तय करने
की क्षमता रखता है। यह
समझौता आर्थिक विकास, रोजगार सृजन और वैश्विक
प्रभाव, तीनों को नई ऊंचाई
दे सकता है। लेकिन
इसके साथ यह जिम्मेदारी
भी जुड़ी है कि
सरकार, उद्योग और समाज, तीनों
मिलकर संतुलित और समावेशी क्रियान्वयन
सुनिश्चित करें। यदि ऐसा हुआ,
तो यह समझौता केवल
व्यापारिक नहीं, बल्कि भारत के आर्थिक
इतिहास का निर्णायक अध्याय
सिद्ध होगा। यह केवल एक
व्यापारिक करार नहीं, भारत
के भविष्य की नींव है।








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