Tuesday, 17 February 2026

होलाष्टक: उत्सव से पहले आत्मसंयम, आस्था और प्रतीक्षा की परीक्षा

होलाष्टक: उत्सव से पहले आत्मसंयम, आस्था और प्रतीक्षा की परीक्षा 

होलाष्टक होली पर्व से पूर्व आने वाला वह विशेष कालखंड है, जिसे धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह अवधि होलिका दहन से ठीक आठ दिन पहले आरंभ होती है और परंपरागत रूप से इसे शुभ एवं मांगलिक कार्यों के लिए वर्जित माना गया है। लोकमान्यताओं और ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार इस समय ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति अस्थिर मानी जाती है, जिसके कारण विवाह, गृह प्रवेश, यज्ञोपवीत जैसे मांगलिक कार्यों से परहेज किया जाता है। होलाष्टक केवल वर्जनाओं का प्रतीक नहीं, बल्कि आत्मसंयम, भक्ति और आध्यात्मिक साधना का अवसर भी माना जाता है। इस अवधि में श्रद्धालु पूजा-पाठ, जप-तप और धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से आत्मशुद्धि का प्रयास करते हैं। मान्यता है कि यह काल मनुष्य को सांसारिक मोह-माया से हटाकर आंतरिक चेतना और सकारात्मक ऊर्जा की ओर प्रेरित करता है। धार्मिक कथाओं में भी इस समय को बुराई के अंत और अच्छाई की स्थापना से जोड़ा गया है। होलाष्टक के समापन के साथ ही होलिका दहन किया जाता है, जो अहंकार, अन्याय और नकारात्मक शक्तियों के विनाश का प्रतीक माना जाता है। यह अग्नि केवल पौराणिक घटना का स्मरण नहीं कराती, बल्कि जीवन में व्याप्त नकारात्मक प्रवृत्तियों को समाप्त करने का संदेश भी देती है. समग्र रूप से होलाष्टक भारतीय संस्कृति के उस जीवन दर्शन को दर्शाता है, जिसमें उत्सव से पहले अनुशासन, संयम और साधना को महत्व दिया गया है। यह परंपरा समाज को यह संदेश देती है कि जीवन में उल्लास और आनंद तभी सार्थक है, जब वह आत्मसंयम और आध्यात्मिक संतुलन के साथ जुड़ा हो 

सुरेश गांधी

भारत त्योहारों की भूमि है। यहां प्रत्येक पर्व केवल उत्सव नहीं बल्कि जीवन दर्शन, सामाजिक समरसता और आध्यात्मिक चेतना का संदेश देता है। इन्हीं पर्वों में रंगों का महापर्व होली भारतीय संस्कृति की जीवंतता और सामाजिक एकता का प्रतीक माना जाता है. देशभर में रंगों के महापर्व होली की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं, लेकिन उल्लास और उमंग से पहले सनातन परंपरा एक ठहराव का संदेश देती है, होलाष्टक। फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी से लेकर पूर्णिमा की रात होलिका दहन तक की आठ दिवसीय अवधि को होलाष्टक कहा गया है। होलाष्टक शब्द दो शब्दों, ‘होलीऔरअष्टकसे मिलकर बना है, जिसका अर्थ है होली से पहले आने वाली आठ दिनों की अवधि। यह वही समय होता है जब समाज होली की तैयारियों में जुट जाता है, लेकिन धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस अवधि में मांगलिक कार्यों से दूरी बनाने की सलाह दी जाती है।

यह समय केवल तिथियों का क्रम नहीं, बल्कि आत्मसंयम, साधना और चेतना का काल माना गया है। शास्त्रों के अनुसार इन आठ दिनों में ग्रह उग्र स्वभाव में रहते हैं। अष्टमी को चंद्रमा, नवमी को सूर्य, दशमी को शनि, एकादशी को शुक्र, द्वादशी को गुरु, त्रयोदशी को बुध, चतुर्दशी को मंगल और पूर्णिमा को राहु प्रभावी माने जाते हैं। ग्रहों की इस उग्रता का प्रभाव मनुष्य के मन, निर्णय और कर्मों पर पड़ता है। यही कारण है कि विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, नई शुरुआत जैसे सभी मांगलिक कार्य इस अवधि में वर्जित माने गए हैं। मतलब साफ है होली का उत्सव केवल रंग खेलने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहराई से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं, पौराणिक कथाएं, वैज्ञानिक आधार और सामाजिक परंपराएं भी शामिल हैं। शास्त्रों के अनुसार होलाष्टक का समय आत्मसंयम, साधना और आध्यात्मिक चिंतन का काल माना जाता है। मान्यता है कि इस दौरान ग्रहों की स्थिति उग्र होती है, जिसका प्रभाव मनुष्य के मानसिक और सामाजिक जीवन पर पड़ सकता है।

होलाष्टक की तिथियां एवं शुभ मुहूर्त

इस साल होलाष्टक का आरंभ 24 फरवरी (मंगलवार) को फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से होगा और इसका समापन 3 मार्च 2026 को होलिका दहन के साथ होगा। फाल्गुन पूर्णिमा तिथि 2 मार्च की शाम 5.55 बजे से 3 मार्च की शाम 5.07 बजे तक रहेगी। होलिका दहन का शुभ मुहूर्त 3 मार्च को शाम 6.22 बजे से रात 8.50 बजे तक रहेगा। इसके अगले दिन 4 मार्च 2026 को रंगों वाली होली मनाई जाएगी।

नकारात्मकता नहीं, आत्मशुद्धि का समय

लोकमान्यता है कि यदि कोई व्यक्ति होलाष्टक के दौरान मांगलिक कार्य करता है तो उसे मानसिक तनाव, पारिवारिक कलह, बीमारी और बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि शास्त्र यह भी स्पष्ट करते हैं कि यह समय निषेध का नहीं, शुद्धि और दान का है। होलाष्टक में अन्नदान, वस्त्रदान, ब्राह्मण भोजन, गौसेवा और नैमित्तिक कर्म शुभ माने गए हैं। ग्रह शांति के लिए महामृत्युंजय मंत्र का जाप विशेष फलदायी माना जाता है।

ग्रहों की स्थिति और ज्योतिषीय मान्यता

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार होलाष्टक के प्रत्येक दिन किसी किसी ग्रह का उग्र प्रभाव माना जाता है। अष्टमी तिथि को चंद्रमा, नवमी को सूर्य, दशमी को शनि, एकादशी को शुक्र, द्वादशी को गुरु, त्रयोदशी को बुध, चतुर्दशी को मंगल और पूर्णिमा को राहु प्रभावी माना जाता है। लोक मान्यता है कि इन ग्रहों की उग्र स्थिति व्यक्ति के निर्णय, मानसिक संतुलन और सामाजिक कार्यों पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है। इस कारण होलाष्टक को शुभ कार्यों के लिए उपयुक्त समय नहीं माना जाता।

भक्ति और अधर्म का संघर्ष

होलाष्टक का संबंध पौराणिक कथा से भी जुड़ा हुआ है। कथा के अनुसार असुर राजा हिरण्यकश्यप स्वयं को भगवान मानता था। उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। पुत्र की भक्ति से क्रोधित होकर हिरण्यकश्यप ने फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से लगातार आठ दिनों तक प्रह्लाद को कई यातनाएं दीं। लेकिन विष्णु की कृपा से वह हर बार सुरक्षित बच गए। अंततः पूर्णिमा की रात होलिका दहन हुआ और प्रह्लाद की भक्ति की विजय हुई। यह घटना अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक बन गई और तभी से होलिका दहन और होली का पर्व मनाया जाने लगा। अत्याचारी राजा हिरण्यकश्यप और उसके परम भक्त पुत्र प्रह्लाद की कथा यह संदेश देती है कि जब अधर्म चरम पर होता है, तब भक्ति और सत्य की अग्नि उसे भस्म कर देती है। होलिका दहन उसी बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है।

शिव और कामदेव की कथा का आध्यात्मिक संकेत

एक अन्य धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी काल में भगवान शिव की तपस्या भंग करने के प्रयास में प्रेम के देवता कामदेव को भस्म कर दिया गया था। कामदेव की पत्नी रति के विलाप से द्रवित होकर शिव ने उन्हें पुनर्जीवन का वरदान दिया। मान्यता है कि रति ने इन आठ दिनों को विरह और प्रतीक्षा में बिताया, इसलिए यह अवधि मांगलिक कार्यों के लिए अशुभ मानी जाती है। यह कथा जीवन में संयम, धैर्य और पुनर्जन्म की आशा का संदेश देती है।

होलाष्टक में क्या नहीं करना चाहिए

सनातन मान्यताओं के अनुसार इस अवधि में कई कार्यों से परहेज करने की परंपरा है, जैसे:- विवाह और सगाई जैसे मांगलिक कार्य, गृह प्रवेश और नए घर या भूमि की खरीद, वाहन या धन निवेश, नए व्यापार की शुरुआत, मुंडन और नामकरण संस्कार, सोने-चांदी और बड़ी खरीदारी, तामसिक भोजन का सेवन, पारिवारिक विवाद और कलह. इन नियमों का उद्देश्य व्यक्ति को मानसिक और आध्यात्मिक संतुलन की ओर प्रेरित करना माना जाता है।

होलाष्टक में क्या करना शुभ माना गया है

जहां इस अवधि में मांगलिक कार्यों पर रोक होती है, वहीं धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियों को अत्यंत फलदायी माना गया है। इस दौरान पूजा-पाठ, मंत्र जाप, दान और सेवा जैसे कार्यों को शुभ माना जाता है। भगवत गीता का पाठ, महामृत्युंजय मंत्र जाप, विष्णु सहस्रनाम का पाठ और ध्यान-योग को जीवन में सकारात्मक ऊर्जा लाने वाला बताया गया है। गरीब और जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र और धन का दान करना विशेष पुण्यकारी माना जाता है। भगवान विष्णु की पूजा करना विशेष शुभ माना जाता है। भगवद गीता का पाठ जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। हनुमान भक्ति से जुड़े पाठ-जप करने की परंपरा है। पितरों का तर्पण और धार्मिक हवन करने से पारिवारिक और आध्यात्मिक कल्याण की मान्यता है। भगवान नृसिंह की पूजा आर्थिक और मानसिक बाधाओं को दूर करने वाला उपाय माना जाता है। नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र जाप, ध्यान और योग से मानसिक शांति प्राप्त करने का विधान बताया गया है। धार्मिक मान्यता है कि होलिका दहन तक किए गए ये उपाय जीवन में सुख, समृद्धि और सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं।

धार्मिक और तांत्रिक दृष्टिकोण

धार्मिक मान्यता के अनुसार होलाष्टक का समय भक्ति, तपस्या और आत्मसंयम का काल माना जाता है। इस अवधि में देवी-देवताओं की पूजा, मंत्र जाप और व्रत करने से विशेष पुण्य फल प्राप्त होने की मान्यता है। तांत्रिक मतों में यह समय साधना और सिद्धियों के लिए अनुकूल माना गया है, हालांकि मांगलिक कार्यों के लिए इसे उपयुक्त नहीं माना जाता। लोकमान्यता यह भी कहती है कि इस अवधि में माता शक्ति की कृपा प्राप्त करने के लिए चांदी से संबंधित वस्तुओं की खरीदारी शुभ मानी जाती है और इससे आर्थिक संकट दूर होने की मान्यता है।

होलाष्टक का क्षेत्रीय प्रभाव और विविध मान्यताएं

भारत की सांस्कृतिक विशेषता यह है कि यहां धार्मिक मान्यताएं क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार बदलती रहती हैं। कई क्षेत्रों में होलाष्टक का प्रभाव अधिक माना जाता है, जबकि कुछ क्षेत्रों में इसे समान रूप से स्वीकार नहीं किया जाता। लोक मान्यताओं के अनुसार उत्तर और पूर्वाेत्तर भारत के कई क्षेत्रों में होलाष्टक के दौरान भी मांगलिक कार्य किए जाते हैं और इसे दोषयुक्त नहीं माना जाता। यह विविधता भारतीय संस्कृति की समृद्धि और व्यापकता को दर्शाती है।

होलाष्टक का वैज्ञानिक पक्ष

होलाष्टक की परंपरा केवल धार्मिक विश्वास तक सीमित नहीं है। इसका वैज्ञानिक आधार भी बताया जाता है। यह समय ऋतु परिवर्तन का होता है, जब सर्दी से गर्मी की ओर मौसम बदलता है। इस दौरान वातावरण में बैक्टीरिया और वायरस अधिक सक्रिय होते हैं। होलिका दहन के दौरान गोबर के कंडे, नीम, पलाश और अन्य औषधीय लकड़ियों से उत्पन्न धुआं वातावरण को शुद्ध करने में सहायक माना जाता है। यही कारण है कि इस अवधि में संतुलित भोजन और स्वास्थ्य के प्रति सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है।

सामाजिक परंपराएं और पारिवारिक मान्यताएं

लोक परंपराओं में यह भी कहा जाता है कि जिन नवविवाहिताओं की यह पहली होली होती है, उन्हें ससुराल के बजाय मायके में होली मनानी चाहिए। यह परंपरा परिवार और समाज में शुभ संकेत और सांस्कृतिक संतुलन का प्रतीक मानी जाती है।

निषेध नहीं, साधना का अवसर

हालांकि होलाष्टक में मांगलिक कार्यों पर रोक रहती है, लेकिन दान, पूजा, जप और सेवा को अत्यंत शुभ माना गया है। यह काल व्यक्ति को आत्ममंथन और आध्यात्मिक शुद्धि का अवसर देता है। सनातन संस्कृति का यह संदेश स्पष्ट है कि उत्सव का वास्तविक आनंद तभी संभव है जब मन और समाज दोनों संतुलित हों। होलाष्टक हमें याद दिलाता है कि हर उत्सव से पहले तप, धैर्य और आस्था की अग्नि से गुजरना आवश्यक है। होलिका दहन के साथ जब यह काल समाप्त होता है, तब रंगों की होली केवल बाहरी उल्लास नहीं, बल्कि बुराई पर अच्छाई की विजय का आध्यात्मिक उत्सव बन जाती है।

संस्कृति का संतुलन और परंपरा का संदेश

होलाष्टक भारतीय संस्कृति में केवल निषेध का काल नहीं, बल्कि जीवन में संयम, साधना और संतुलन का संदेश देता है। यह परंपरा हमें यह समझाती है कि उत्सव केवल बाहरी उल्लास नहीं, बल्कि आत्मिक शुद्धि और सामाजिक सामंजस्य का प्रतीक भी है। होलिका दहन के साथ जब यह काल समाप्त होता है, तब रंगों की होली केवल पर्व नहीं रह जाती, बल्कि बुराई पर अच्छाई की विजय और जीवन में नई ऊर्जा के आगमन का उत्सव बन जाती है।

होलाष्टक का अंत, उत्सव की शुरुआत

होलिका दहन के साथ ही होलाष्टक समाप्त होता है और समाज उत्सव में प्रवेश करता है। घरों में रंग सजते हैं, मंदिरों में उल्लास गूंजता है और गली-मोहल्लों में प्रेम भाईचारे के रंग बिखरते हैं। होलाष्टक हमें यह सिखाता है कि हर उत्सव से पहले संयम आवश्यक है, ताकि आनंद केवल बाहरी होकर आत्मिक भी हो।

संयम से उत्सव तक का सांस्कृतिक संदेश

होलाष्टक केवल निषेध का काल नहीं, बल्कि आत्ममंथन और साधना का अवसर है। सनातन संस्कृति यह संदेश देती है कि उत्सव का आनंद तभी सार्थक होता है जब मन और समाज दोनों संतुलित हों। यह आठ दिन व्यक्ति को संयम, सेवा और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग दिखाते हैं, जिसके बाद होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक बनकर जीवन में उल्लास और रंगों की नई शुरुआत करता है।

ब्रज की होली: भक्ति और उत्सव का अद्भुत संगम

होली का सबसे भव्य स्वरूप ब्रज क्षेत्र में देखने को मिलता है। मथुरा और वृंदावन में लगभग पंद्रह दिनों तक होली का उत्सव चलता है। यहां लठमार होली, फूलों की होली और फाग उत्सव श्रद्धा और आनंद का अनूठा संगम प्रस्तुत करते हैं। ब्रज की होली केवल उत्सव नहीं बल्कि भक्ति और प्रेम का जीवंत रूप है।

भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अनोखी परंपराएं

उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में गीत बैठकी की परंपरा विशेष प्रसिद्ध है, जहां शास्त्रीय संगीत की गोष्ठियां आयोजित होती हैं। हरियाणा में धुलंडी के दिन भाभी द्वारा देवर को हंसी-ठिठोली में सताने की परंपरा लोक संस्कृति का रोचक रूप प्रस्तुत करती है। पश्चिम बंगाल में दोल यात्रा संत चौतन्य महाप्रभु के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाती है, जिसमें जुलूस और कीर्तन का आयोजन होता है। महाराष्ट्र में रंग पंचमी के दिन सूखे गुलाल से होली खेलने की परंपरा है। गोवा में शिमगो उत्सव के तहत सांस्कृतिक कार्यक्रम और जुलूस आयोजित किए जाते हैं। पंजाब में होला मोहल्ला के दौरान वीरता और युद्ध कौशल का प्रदर्शन किया जाता है।

उत्तर-पूर्व और दक्षिण भारत की धार्मिक परंपराएं

उत्तर-पूर्व भारत के कुछ क्षेत्रों में होलिका दहन को भगवान कृष्ण द्वारा राक्षसी पूतना के वध से जोड़कर पूतना दहन के रूप में मनाया जाता है। दक्षिण भारत में मान्यता है कि होली की पूर्व संध्या पर अग्नि प्रज्ज्वलित कर उसमें गन्ना, आम की बौर और चंदन अर्पित किया जाता है, जो कामदेव और शिव की कथा से जुड़ा प्रतीक माना जाता है।

होलिका दहन: बुराई पर अच्छाई की विजय

होलिका दहन सनातन संस्कृति में अत्यंत महत्वपूर्ण अनुष्ठान है। यह केवल धार्मिक परंपरा नहीं बल्कि सामाजिक संदेश भी देता है। मान्यता है कि इस अग्नि में नकारात्मक शक्तियां समाप्त होती हैं और वातावरण शुद्ध होता है। इसी दिन होलाष्टक की अवधि समाप्त होती है और समाज उत्सव और उल्लास के रंगों में रंग जाता है।

होली का सामाजिक और सांस्कृतिक संदेश

होली केवल रंगों का त्योहार नहीं बल्कि सामाजिक समरसता और भाईचारे का प्रतीक है। यह पर्व लोगों को पुराने गिले-शिकवे भूलकर प्रेम और सौहार्द का संदेश देता है। होली हमें यह सिखाती है कि जीवन में खुशियां बांटने से ही समाज मजबूत बनता है।

आधुनिक समाज में होली की बदलती तस्वीर

समय के साथ होली के स्वरूप में परिवर्तन आया है। अब पारंपरिक उत्सव के साथ आधुनिकता का रंग भी जुड़ गया है। पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक रंगों के उपयोग की जागरूकता भी बढ़ रही है। सामाजिक संगठनों और युवाओं द्वारा स्वच्छ और सुरक्षित होली मनाने की पहल इस पर्व को और अधिक सकारात्मक बना रही है।

रंगों से भरी आध्यात्मिक यात्रा

होलाष्टक से लेकर होली तक का यह काल भारतीय संस्कृति की गहराई और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक है। यह पर्व हमें संयम, साधना, प्रेम और सामाजिक समरसता का संदेश देता है। होलिका दहन हमें यह याद दिलाता है कि बुराई चाहे कितनी भी शक्तिशाली क्यों हो, अंततः सत्य और भक्ति की विजय निश्चित होती है। वहीं रंगों की होली जीवन में उल्लास, प्रेम और नई ऊर्जा का प्रतीक बनकर समाज को एकता के सूत्र में बांधती है। होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति का जीवंत उत्सव हैकृजहां आस्था, परंपरा और सामाजिक समरसता एक साथ रंगों की तरह घुल-मिल जाती है।

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