बिजलीकर्मियों की हुंकार, बनारस में गूंजा ‘विद्रोह’ का स्वर, सड़कों पर हजारों कर्मी
इलेक्ट्रीसिटी अमेंडमेंट
बिल
2026 और
नए
श्रम
कानूनों
के
खिलाफ
भिखारीपुर
में
उग्र
प्रदर्शन,
रोजगार
और
उपभोक्ता
हितों
पर
संकट
का
आरोप
कर्मचारियों ने
सरकार
को
दी
आर-पार
की
चेतावनी
श्रमकानूनों को
बताया
जनविरोधी,
किसान
व
छात्र
संगठनों
का
भी
मिला
समर्थन
संघर्ष समिति
का
आरोप,
निजीकरण
से
रोजगार
और
गरीब
उपभोक्ताओं
पर
पड़ेगा
असर
सुरेश गांधी
वाराणसी. बिजली क्षेत्र में प्रस्तावित सुधारों
और निजीकरण के विरोध में
गुरुवार को बनारस में
बिजलीकर्मियों का आक्रोश खुलकर
सामने आया। विद्युत कर्मचारी
संयुक्त संघर्ष समिति उत्तर प्रदेश के बैनर तले
हजारों बिजलीकर्मियों ने इलेक्ट्रीसिटी अमेंडमेंट
बिल 2026, बिजली वितरण के निजीकरण तथा
मजदूर विरोधी बताए जा रहे
चार नए श्रम कानूनों
के खिलाफ एक दिवसीय देशव्यापी
हड़ताल के समर्थन में
भिखारीपुर स्थित प्रबंध निदेशक कार्यालय पर जोरदार सांकेतिक
प्रदर्शन किया। प्रदर्शन के दौरान कर्मचारियों
ने सरकार से प्रस्तावित बदलावों
को वापस लेने की
मांग उठाई और चेतावनी
दी कि यदि उनकी
मांगों पर विचार नहीं
हुआ तो आंदोलन और
व्यापक रूप ले सकता
है।
निजीकरण से महंगी हो सकती है बिजली
सभा को संबोधित
करते हुए वक्ताओं ने
आशंका जताई कि यदि
बिजली वितरण व्यवस्था में निजी कंपनियों
की भागीदारी बढ़ती है तो
सब्सिडी और जीवनोपयोगी दरों
की व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान
व्यवस्था में बड़े औद्योगिक
और व्यावसायिक उपभोक्ताओं पर अपेक्षाकृत अधिक
टैरिफ लगाकर घरेलू और ग्रामीण उपभोक्ताओं
को राहत दी जाती
है। इसे क्रॉस-सब्सिडी
व्यवस्था कहा जाता है।
वक्ताओं के अनुसार, निजी
कंपनियां लाभ कमाने की
प्राथमिकता के साथ काम
करेंगी, जिससे यह संतुलन बिगड़
सकता है और ग्रामीण
तथा गरीब उपभोक्ताओं के
लिए बिजली महंगी होने की आशंका
है। उनका कहना था
कि यदि क्रॉस-सब्सिडी
खत्म हुई तो घरेलू
उपभोक्ताओं पर सीधा आर्थिक
दबाव पड़ेगा।
ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा प्रभावित होने का डर
संघर्ष समिति के प्रतिनिधियों ने
कहा कि निजी कंपनियों
का मुख्य उद्देश्य लाभ अर्जित करना
होता है, इसलिए ग्रामीण
और कम लाभ वाले
क्षेत्रों में सेवा गुणवत्ता
प्रभावित हो सकती है।
उन्होंने स्मार्ट मीटर व्यवस्था को
लेकर भी चिंता जताई
और कहा कि तकनीकी
खराबी की स्थिति में
उपभोक्ताओं को अचानक बिजली
कटौती का सामना करना
पड़ सकता है। वक्ताओं
ने दावा किया कि
पूर्व में कई त्योहारों
और महत्वपूर्ण अवसरों पर तकनीकी खामियों
के कारण उपभोक्ताओं को
परेशानियों का सामना करना
पड़ा था और निजीकरण
के बाद ऐसी समस्याएं
और बढ़ सकती हैं।
कर्मचारियों की सेवा शर्तों पर मंडरा रहा खतरा
सभा में वक्ताओं
ने कहा कि यदि
नई वितरण लाइसेंस निजी कंपनियों को
दी जाती हैं तो
सरकारी स्वामित्व वाली बिजली कंपनियों
की भूमिका कमजोर हो सकती है।
इससे कर्मचारियों की सेवा सुरक्षा,
वेतन संरचना और सामाजिक सुरक्षा
पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
उन्होंने कहा कि निजीकरण
से बड़े पैमाने पर
रोजगार असुरक्षित होने की आशंका
है और कर्मचारियों को
भविष्य को लेकर अस्थिरता
का सामना करना पड़ सकता
है।
नए श्रम कानूनों पर भी जताई चिंता
प्रदर्शन के दौरान नए
श्रम कानूनों को लेकर भी
बिजलीकर्मियों ने कड़ा विरोध
दर्ज कराया। वक्ताओं ने बताया कि
पहले 100 से अधिक कर्मचारियों
वाली कंपनियों को किसी भी
छंटनी या संस्थान बंद
करने से पहले प्रशासन
से अनुमति लेना अनिवार्य था।
नए श्रम कोड में
यह सीमा बढ़ाकर 300 कर्मचारियों
तक कर दी गई
है। संघर्ष समिति के नेताओं का
कहना था कि इससे
299 कर्मचारियों तक वाले संस्थानों
में कार्यरत बड़ी संख्या में
कामगारों की नौकरी असुरक्षित
हो सकती है। उन्होंने
आरोप लगाया कि इससे कंपनियों
को मनमाने ढंग से कर्मचारियों
की सेवाएं समाप्त करने का रास्ता
मिल सकता है, जिससे
कामगारों के बीच असुरक्षा
और आर्थिक अस्थिरता बढ़ेगी।
किसान और छात्र संगठनों का मिला समर्थन
बिजलीकर्मियों के इस विरोध
प्रदर्शन को विभिन्न सामाजिक
संगठनों का भी समर्थन
मिला। बनारस किसान मोर्चा के पदाधिकारी अफलातून,
चौधरी राजेंद्र तथा दीक्षा छात्र
संघ से ध्रुव और
बिगुल मजदूर दस्ता की लता अपने
साथियों के साथ सभा
में शामिल हुए। उन्होंने इलेक्ट्रीसिटी
अमेंडमेंट बिल 2026, श्रम कानूनों में
बदलाव और निजीकरण की
नीति का विरोध करते
हुए इसे जनविरोधी करार
दिया।
आंदोलन को तेज करने की चेतावनी
सभा की अध्यक्षता
ई. मायाशंकर तिवारी ने की, जबकि
संचालन अंकुर पांडेय ने किया। सभा
को ई. अवधेश मिश्रा,
ई. विजय सिंह, ई.
अभिषेक मौर्य, रविंद्र यादव, रामकुमार झा, विजय नारायण,
कृष्णा सिंह, सतीश बिंद, दीपक
गुप्ता, उदयभान दुबे, जे.पी.एन.
सिंह, पंकज यादव और
चंदन कुमार सहित कई वक्ताओं
ने संबोधित किया। वक्ताओं ने एक स्वर
में कहा कि यदि
सरकार ने कर्मचारियों और
उपभोक्ताओं की चिंताओं को
नजरअंदाज किया तो आने
वाले दिनों में आंदोलन और
तेज किया जाएगा।
बिजली क्षेत्र के बदलाव पर बढ़ी बहस
देशभर में बिजली क्षेत्र में सुधार और निजीकरण को लेकर लंबे समय से बहस जारी है। सरकार जहां इसे दक्षता और निवेश बढ़ाने की दिशा में आवश्यक कदम बता रही है, वहीं कर्मचारी संगठन इसे रोजगार सुरक्षा और उपभोक्ता हितों के लिए खतरा मान रहे हैं। बनारस में हुआ यह प्रदर्शन इसी बहस का एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है, जिसने बिजली सुधारों के सामाजिक और आर्थिक प्रभावों पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

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