Tuesday, 24 February 2026

ब्रजभूमि : जहां त्योहार नहीं, होती हैं लीलाएं

ब्रजभूमि : जहां त्योहार नहीं, होती हैं लीलाएं 

भारत का सांस्कृतिक परिदृश्य जितना व्यापक है, उतना ही भावनात्मक और प्रतीकात्मक भी। यहां त्योहार केवल कैलेंडर की तिथियां नहीं, बल्कि लोकजीवन की धड़कन हैं। इन्हीं धड़कनों में एक ऐसी परंपरा भी है जहां प्रेम का संवाद लाठियों से होता है, हंसी रंगों में घुलती है और आस्था लोकनाट्य का रूप ले लेती है। ब्रजभूमि की वही अद्भुत परंपरा है, बरसाना की लाठीमार होली। वैसे भी ब्रज क्षेत्र का सांस्कृतिक महत्व केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि लोकसंस्कृति की दृष्टि से भी अत्यंत समृद्ध रहा है। मथुरा, वृंदावन, बरसाना और नंदगांव, ये चारों स्थान मिलकर उस सांस्कृतिक भूगोल का निर्माण करते हैं जहां हर पर्व का केंद्र श्रीराधा-कृष्ण की लीलाएं हैं। ब्रज में होली खेली नहीं जाती, बल्किजीजाती है। यहां रंग केवल चेहरे पर नहीं लगते, बल्कि लोकजीवन की स्मृतियों में उतर जाते हैं। बरसाना को राधा की नगरी माना जाता है और नंदगांव को कृष्ण की बाल लीलाओं का केंद्र। यही कारण है कि इन दोनों स्थानों के बीच होली का यह संवाद विकसित हुआ 

सुरेश गांधी

ब्रजभूमि की होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि आस्था, लोकसंस्कृति और प्रेम की जीवंत परंपरा का बहुरंगी विस्तार है। मथुरा, वृंदावन, बरसाना और नंदगांव में मनाई जाने वाली होली दरअसल उस सांस्कृतिक विरासत की निरंतरता है, जिसकी जड़ें कृष्ण और राधा की लीलाओं से जुड़ी मानी जाती हैं। यहां फाल्गुन का महीना आते ही लोकगीतों, फाग, रास और रंगों की ऐसी श्रृंखला शुरू होती है जो लगभग पंद्रह दिनों तक चलती है और हर दिन एक नई परंपरा का प्रतीक बनकर सामने आता है। बरसाना की लाठीमार होली स्त्री-शक्ति और लोकहास्य का अनूठा रूप प्रस्तुत करती है, तो नंदगांव की हुरंगा होली सामुदायिक उल्लास का प्रतीक बनती है। वृंदावन की फूलों वाली होली भक्ति और सौंदर्य का सौम्य आयाम दिखाती है, वहीं होलिका दहन और धुलेंडी धार्मिक प्रतीकवाद को लोकजीवन से जोड़ते हैं। इन सभी आयामों को समेटे ब्रज की होली केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक निरंतरता और लोकचेतना का जीवंत दस्तावेज है, जो रंगों के माध्यम से परंपरा को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाता है।

फाल्गुन का महीना जैसे ही दस्तक देता है, ब्रज का वातावरण बदल जाता है। हवा में अबीर की खुशबू, गलियों में फाग के स्वर और मंदिरों में रास का उल्लास दिखाई देने लगता है। परंतु इस पूरे उत्सव का सबसे जीवंत और प्रतीकात्मक दृश्य तब सामने आता है जब बरसाना की गलियों में नंदगांव के हुरियारे प्रवेश करते हैं और सजी-धजी सखियां लाठियां उठाकर उनका स्वागत करती हैं। यह स्वागत युद्ध नहीं, बल्कि प्रेम का लोकनाट्य है, जहाँ परंपरा शरारत बन जाती है और शरारत संस्कृति का स्थायी रूप। ब्रज क्षेत्र केवल भौगोलिक परिभाषा नहीं है, बल्कि यह एक सांस्कृतिक अवधारणा है।ब्रजशब्द का अर्थ है, गायों का चरागाह, परंतु धार्मिक संदर्भ में यह वह भूमि है जहाँ श्री कृष्ण ने बाल और किशोर लीलाएं कीं। ब्रज मंडल लगभग 84 कोस क्षेत्र में फैला माना जाता है, जिसमें उत्तर प्रदेश और राजस्थान के कुछ हिस्से शामिल हैं। इस क्षेत्र का सांस्कृतिक केंद्र मथुरा और वृंदावन रहे हैं। ब्रज की पहचान केवल मंदिरों से नहीं, बल्कि लोकगीतों, परंपराओं और उत्सवों से भी है। यहाँ प्रत्येक त्योहार किसी किसी लीला से जुड़ा हुआ है।

ब्रज की होली की संरचना

ब्रज की होली को यदि क्रमवार देखा जाए तो यह एक सांस्कृतिक श्रृंखला के रूप में सामने आती है। 1. फाल्गुन शुक्ल अष्टमी : फाग आरंभ. मंदिरों में फाग गायन प्रारंभ होता है। 2. लड्डू होली : बरसाना : श्रीजी मंदिर में प्रसाद स्वरूप लड्डू वर्षा की परंपरा। 3. लाठीमार होली : बरसाना : स्त्री शक्ति का सांस्कृतिक रूपक : लोकसंस्कृति का सबसे चर्चित आयोजन। ब्रज की होली में बरसाना का विशेष स्थान है। यहाँ की लाठीमार होली विश्व प्रसिद्ध है। लोककथाओं के अनुसार, कृष्ण नंदगांव से बरसाना आकर राधा और सखियों को रंग लगाते थे। सखियाँ उन्हें लाठियों से खदेड़ती थीं। आज वही परंपरा प्रतीकात्मक रूप में निभाई जाती है। इस आयोजन का समाजशास्त्रीय विश्लेषण बताता है कि यह स्त्री नेतृत्व और सामाजिक संतुलन का प्रतीक है। 4. हुरंगा होली : नंदगांव : रंगों का उन्मुक्त उत्सव : सामुदायिक सहभागिता का उत्सव। बरसाना के बाद नंदगांव में हुरंगा होली आयोजित होती है। यह आयोजन सामुदायिक संवाद का प्रतीक माना जाता है। यहाँ रंगों की उन्मुक्तता और लोकगीतों का उत्साह चरम पर होता है। 5. फूलों की होली : वृंदावन : बांके बिहारी मंदिर में फूलों से होली। भक्ति और सौंदर्य का संगम. वृंदावन की होली आध्यात्मिकता से परिपूर्ण मानी जाती है। विशेष रूप से बांके बिहारी मंदिर की फूलों वाली होली विश्वभर में प्रसिद्ध है। यहाँ रंगों की जगह फूलों का प्रयोग भक्ति के सौम्य स्वरूप को दर्शाता है। 6. रंगभरनी एकादशी : रंग खेलने की औपचारिक शुरुआत। 7. होलिका दहन : असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक। 8. धुलेंडी : रंगों का मुख्य उत्सव।

लोककथा से लोकसंस्कृति तक

ब्रज की लोकमान्यता के अनुसार, बाल्यकाल में कृष्ण अपने सखाओं के साथ नंदगांव से बरसाना आते थे और राधा तथा उनकी सखियों को रंग लगाकर छेड़ते थे। राधा की सखियां इस शरारत का उत्तर लाठियों से देती थीं और कृष्ण अपने सखाओं के साथ ढाल लेकर बचते थे। यह प्रसंग केवल कथा नहीं रहा, बल्कि धीरे-धीरे सामुदायिक परंपरा बन गया। सदियों से यह आयोजन उसी प्रतीकात्मक रूप में जीवित है। यहां लाठी शक्ति का नहीं, बल्कि संवाद का प्रतीक है। यह परंपरा बताती है कि प्रेम में भी हास्य का स्थान है और संस्कृति में भी खेल का।

जब गलियां मंच बन जाती हैं

लाठीमार होली के दिन बरसाना का पूरा नगर एक विशाल रंगमंच में बदल जाता है। श्रीजी मंदिर परिसर से लेकर संकरी गलियों तक हर जगह उत्सव का रंग दिखाई देता है। नंदगांव से आने वाले पुरुषों कोहुरियारेकहा जाता है। ये पारंपरिक वेशभूषा पहनकर आते हैं और अपने साथ ढाल रखते हैं। दूसरी ओर बरसाना की महिलाएं पारंपरिक परिधान में सजी होती हैं और हाथों में लाठियां लिए रहती हैं। ढोल, नगाड़ों और फाग गीतों के बीच जैसे ही संवाद शुरू होता है, पूरा वातावरण रोमांच से भर उठता है। यह दृश्य किसी फिल्म का नहीं, बल्कि जीवित लोकसंस्कृति का प्रतीक होता है।

स्त्री शक्ति का सांस्कृतिक रूप

बरसाना की लाठीमार होली का एक महत्वपूर्ण सामाजिक संदेश भी है। इस आयोजन में महिलाओं की भूमिका केंद्र में होती है। यह परंपरा प्रतीकात्मक रूप से यह दर्शाती है कि भारतीय लोकजीवन में स्त्री केवल उत्सव की दर्शक नहीं, बल्कि उसकी संचालक भी रही है। जब महिलाएँ लाठी चलाती हैं और पुरुष ढाल से बचते हैं, तब यह दृश्य सामाजिक संतुलन का भी प्रतीक बन जाता है। ब्रज की संस्कृति में यह स्त्री सम्मान का अनूठा लोक रूप है।

फाग गीत : ब्रज की आत्मा की आवाज

लाठीमार होली का वास्तविक सौंदर्य उसके लोकगीतों में छिपा है। ब्रजभाषा के फाग गीत इस आयोजन को केवल दृश्य नहीं, बल्कि भावनात्मक अनुभव बना देते हैं। इन गीतों में प्रेम है, व्यंग्य है, शरारत है और भक्ति भी। गीतों में कृष्ण की छेड़छाड़, राधा की नाराजगी और सखियों की चंचलता जीवंत हो उठती है। यही कारण है कि लाठीमार होली केवल दृश्य उत्सव नहीं, बल्कि श्रव्य परंपरा भी है।

रंगों का आध्यात्मिक अर्थ

ब्रज की होली में रंगों का प्रयोग भी प्रतीकात्मक माना जाता है। यहाँ गुलाल केवल सजावट नहीं, बल्कि भावनाओं का रंग है। लाल रंग प्रेम का प्रतीक है, पीला भक्ति का और हरा जीवन का। पारंपरिक रूप से फूलों से बने रंगों का प्रयोग किया जाता था। आज भी कई स्थानों पर यह परंपरा जीवित है। जब बरसाना की गलियों में गुलाल उड़ता है तो ऐसा लगता है जैसे वातावरण भी प्रेम में रंग गया हो।

सांस्कृतिक मनोविज्ञान का उत्सव

लाठीमार होली केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि सामाजिक मनोविज्ञान का भी उत्सव है। यह त्योहार तनाव को हास्य में बदल देता है और औपचारिकताओं को संवाद में। यहाँ कोई हारता नहीं, कोई जीतता नहींकृसिर्फ प्रेम का रंग गहरा होता है। ब्रज की संस्कृति में उत्सव का यही अर्थ हैकृसमाज को जोड़ना।

परंपरा का संरक्षण क्यों जरूरी

आज जब वैश्वीकरण और डिजिटल संस्कृति के प्रभाव से लोक परंपराएँ बदल रही हैं, तब बरसाना की लाठीमार होली जैसे आयोजन हमें अपनी सांस्कृतिक जड़ों की याद दिलाते हैं। यह केवल पर्यटन का आयोजन नहीं बल्कि सांस्कृतिक धरोहर है। इसे संरक्षित करना केवल प्रशासन का नहीं, समाज का भी दायित्व है। लोक परंपराएँ तभी जीवित रहती हैं जब समाज उन्हें आत्मसात करता है। बरसाना की लाठीमार होली इस बात का प्रमाण है कि भारत की संस्कृति केवल इतिहास नहीं, बल्कि वर्तमान की जीवित चेतना है।

पर्यटन और सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था

समय के साथ बरसाना की लाठीमार होली अंतरराष्ट्रीय पहचान प्राप्त कर चुकी है। देश-विदेश से हजारों पर्यटक इस आयोजन को देखने आते हैं। सांस्कृतिक शोधकर्ता, फोटोग्राफर और विदेशी पर्यटक इस आयोजन को भारतीय लोकसंस्कृति का जीवंत उदाहरण मानते हैं। उत्तर प्रदेश सरकार ने भी इसे सांस्कृतिक पर्यटन के रूप में विकसित किया है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बड़ा लाभ मिलता है। होली के दौरान होटल, हस्तशिल्प, मिठाई और रंग बाजारों में विशेष रौनक दिखाई देती है।

प्रशासन और परंपरा का संतुलन

लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ को देखते हुए प्रशासन विशेष व्यवस्थाएँ करता है। सुरक्षा, स्वास्थ्य और यातायात प्रबंधन के साथ-साथ आयोजन की पारंपरिक गरिमा बनाए रखने का प्रयास किया जाता है। ड्रोन निगरानी, मेडिकल कैंप और पुलिस व्यवस्था के कारण आयोजन अधिक सुरक्षित हुआ है। आधुनिक तकनीक और परंपरा का यह संतुलन इस आयोजन को और व्यवस्थित बनाता है।

बदलते समय में परंपरा की निरंतरता

आधुनिकता के प्रभाव के बावजूद बरसाना की लाठीमार होली का मूल स्वरूप आज भी वैसा ही है जैसा सदियों पहले था। मंचीय कार्यक्रम और लाइव प्रसारण जैसे नए आयाम जुड़ गए हैं, लेकिन लोक परंपरा की आत्मा अब भी जीवित है। यह आयोजन बताता है कि भारतीय संस्कृति समय के साथ बदलती जरूर है, पर अपनी जड़ों से अलग नहीं होती।  

जब रंग संस्कृति बन जाते हैं

बरसाना की लाठीमार होली केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि भारतीय लोकजीवन की रंगीन आत्मकथा है। यहाँ प्रेम शरारत बनता है, शरारत परंपरा बनती है और परंपरा संस्कृति का शाश्वत रूप ले लेती है। जब बरसाना की गलियों में लाठियाँ ढाल से टकराती हैं और गुलाल हवा में उड़ता है, तब लगता है कि समय ठहर गया है और ब्रज की लीलाएँ फिर जीवित हो उठी हैं। यही इस उत्सव की सबसे बड़ी शक्ति हैकृयह अतीत को वर्तमान से जोड़ता है और भावनाओं को परंपरा में बदल देता है। बरसाना की लाठीमार होली हमें सिखाती है कि रंग केवल त्योहार का हिस्सा नहीं, बल्कि संस्कृति की भाषा हैं।

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