आखिर ड्रैगन के सामने क्यों कमजोर पड़ जाता है भारत का बहिष्कार मॉडल?
सीमा पर सैनिकों का साहस, कूटनीति में सख्त बयान और जनभावनाओं में उफनता राष्ट्रवाद, इन सबके बीच एक सवाल बार-बार भारतीय जनमानस को झकझोरता है। जब राष्ट्रीय अस्मिता और सुरक्षा की बात आती है तो पूरा देश एक स्वर में खड़ा दिखाई देता है, लेकिन आर्थिक मोर्चे पर वही एकजुटता क्यों बिखर जाती है? यह प्रश्न तब और गहरा हो जाता है जब तुलना होती है भारत की आर्थिक नीति की चीन और पाकिस्तान के संदर्भ में। पाकिस्तान के खिलाफ भारत की भावनात्मक, राजनीतिक और सामाजिक एकजुटता निर्विवाद रूप से मजबूत दिखाई देती है। लेकिन चीन के मामले में स्थिति बिल्कुल उलट नजर आती है। सीमा पर तनाव, रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और वैश्विक शक्ति संघर्ष के बावजूद भारत का बाजार चीन के उत्पादों से भरा पड़ा है। यह केवल व्यापार का प्रश्न नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक संरचना, औद्योगिक नीति और राजनीतिक प्राथमिकताओं का आईना भी है
सुरेश गांधी
भारतीय राजनीति में राष्ट्रवाद हमेशा
एक प्रभावशाली मुद्दा रहा है। सीमा
विवाद या सुरक्षा संकट
के समय यह भावना
व्यापक जनसमर्थन प्राप्त करती है। पाकिस्तान
के खिलाफ आर्थिक और सांस्कृतिक बहिष्कार
इसी भावना का परिणाम रहा
है। भारत-पाक व्यापार
2019 के बाद लगभग समाप्त
हो गया। भारत ने
पाकिस्तान को व्यापारिक रूप
से अलग-थलग कर
दिया। यह निर्णय भावनात्मक
और राजनीतिक रूप से लोकप्रिय
भी साबित हुआ। लेकिन जब
बात चीन की आती
है, तो वही राजनीतिक
इच्छाशक्ति व्यवहारिक कठिनाइयों में उलझ जाती
है। यह विरोधाभास बताता
है कि राष्ट्रवाद केवल
भावनाओं से संचालित नहीं
हो सकता, बल्कि उसके पीछे आर्थिक
ताकत और औद्योगिक आत्मनिर्भरता
का मजबूत आधार होना आवश्यक
है। आर्थिक आंकड़े भारत की चुनौती
को स्पष्ट रूप से उजागर
करते हैं। वर्ष 2024-25 में
भारत और चीन के
बीच द्विपक्षीय व्यापार लगभग 120 अरब डॉलर के
आसपास पहुंच चुका है। इसमें
भारत का व्यापार घाटा
85 अरब डॉलर से अधिक
है।
भारत चीन से
भारी मात्रा में आयात करता
है, जिसमें शामिल हैं, इलेक्ट्रॉनिक्स और
मोबाइल उपकरण, सोलर पैनल और
ऊर्जा उपकरण, दवा उद्योग का
कच्चा माल, ऑटोमोबाइल पार्ट्स,
औद्योगिक मशीनरी, खिलौने और उपभोक्ता उत्पाद.
औद्योगिक विशेषज्ञों के अनुसार भारत
के इलेक्ट्रॉनिक्स आयात का लगभग
70 प्रतिशत हिस्सा चीन से आता
है। फार्मा सेक्टर में उपयोग होने
वाले कच्चे रसायनों का लगभग 65 प्रतिशत
चीन पर निर्भर है।
यह स्थिति केवल आर्थिक नहीं
बल्कि रणनीतिक जोखिम भी पैदा करती
है। चीन की औद्योगिक
ताकत केवल उत्पादन क्षमता
का परिणाम नहीं, बल्कि सुविचारित आर्थिक रणनीति का उदाहरण है।
चीन आज वैश्विक विनिर्माण
उत्पादन का लगभग 30 प्रतिशत
नियंत्रित करता है। वैश्विक
निर्यात में उसकी हिस्सेदारी
14 प्रतिशत के आसपास है।
चीन ने उद्योगों को
विकेंद्रीकृत मॉडल पर विकसित
किया। छोटे शहरों और
ग्रामीण क्षेत्रों में औद्योगिक क्लस्टर
स्थापित किए गए। इससे
रोजगार के अवसर व्यापक
रूप से बढ़े और
उत्पादन लागत कम हुई।
चीन की सरकार
ने उद्योगों को व्यापक सब्सिडी,
सस्ती बिजली, आधुनिक बुनियादी ढांचा और निर्यात प्रोत्साहन
प्रदान किया। यही कारण है
कि चीन वैश्विक आपूर्ति
श्रृंखला का केंद्र बन
सका। भारत विश्व की पांचवीं सबसे
बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है
और उसका जीडीपी लगभग
3.7 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच
चुका है। लेकिन भारत
की आर्थिक संरचना सेवा क्षेत्र पर
अधिक निर्भर है। सेवा क्षेत्र
भारत की जीडीपी में
लगभग 55 प्रतिशत योगदान देता है, जबकि
विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी केवल
17 प्रतिशत के आसपास है।
भारत लंबे समय से
विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी 25 प्रतिशत
तक बढ़ाने का लक्ष्य रखता
रहा है, लेकिन यह
लक्ष्य अभी अधूरा है।
भारत का एमएसएमई क्षेत्र
लगभग 11 करोड़ लोगों को
रोजगार देता है, लेकिन
यह क्षेत्र पूंजी, तकनीक और वैश्विक प्रतिस्पर्धा
की चुनौतियों से जूझ रहा
है। औद्योगिक विकास का लाभ बड़े
कॉरपोरेट समूहों तक सीमित होने
की आलोचना भी लगातार होती
रही है। चीन ने
औद्योगिक विस्तार के माध्यम से
रोजगार के व्यापक अवसर
उत्पन्न किए।
भारत में आर्थिक
विकास के बावजूद रोजगार
सृजन एक गंभीर चुनौती
बना हुआ है। रिपोर्टों
के अनुसार भारत में शीर्ष
10 प्रतिशत लोगों के पास देश
की लगभग 70 प्रतिशत संपत्ति केंद्रित है। आर्थिक असमानता
औद्योगिक विस्तार और सामाजिक स्थिरता
दोनों को प्रभावित करती
है। भारत में युवाओं की
बड़ी आबादी रोजगार की तलाश में
है। यदि औद्योगिक क्षेत्र
मजबूत नहीं होता तो
यह जनसंख्या अवसर के बजाय
चुनौती बन सकती है।
भारतीय बाजार अत्यंत मूल्य संवेदनशील है। उपभोक्ता कम
कीमत में अधिक विकल्प
चाहता है। चीन ने
इसी मनोविज्ञान को समझते हुए
सस्ते और विविध उत्पादों
की बड़ी श्रृंखला तैयार
की। भारतीय बाजार में चीन की
सफलता केवल उत्पादन लागत
की वजह से नहीं
है, बल्कि उसकी आपूर्ति श्रृंखला
की दक्षता भी महत्वपूर्ण कारण
है। चीन का लॉजिस्टिक्स
नेटवर्क दुनिया के सबसे तेज
और सस्ते परिवहन तंत्रों में शामिल है।
भारतीय राजनीति में चीन के
खिलाफ कठोर बयान और
बहिष्कार की मांग समय-समय पर उठती
रही है। लेकिन जमीनी
स्तर पर बाजार का
व्यवहार अलग कहानी बयान
करता है। यह स्थिति
बताती है कि भारत
का राष्ट्रवाद भावनात्मक रूप से मजबूत
है, लेकिन आर्थिक स्तर पर अभी
आत्मनिर्भर नहीं बन पाया
है।
भारत सरकार ने
‘मेक इन इंडिया’ और
‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसे अभियानों के
माध्यम से घरेलू उत्पादन
को बढ़ावा देने का प्रयास
किया है। मोबाइल निर्माण
क्षेत्र में भारत तेजी
से उभरा है। रक्षा
उत्पादन में स्वदेशीकरण पर
जोर दिया जा रहा
है। भारत सेमीकंडक्टर, सोलर
ऊर्जा और डिजिटल तकनीक
के क्षेत्र में निवेश आकर्षित
कर रहा है। लेकिन
विशेषज्ञों का मानना है
कि चीन जैसी औद्योगिक
क्षमता विकसित करने में भारत
को अभी लंबा समय
लग सकता है। भारत
आज वैश्विक शक्ति संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका
निभा रहा है। कई
बहुराष्ट्रीय कंपनियां चीन के विकल्प
के रूप में भारत
की ओर देख रही
हैं। भारत वैश्विक आपूर्ति
श्रृंखला में वैकल्पिक उत्पादन
केंद्र बनने की दिशा
में आगे बढ़ रहा
है। लेकिन इसके लिए भारत
को बुनियादी ढांचे, श्रम सुधार, लॉजिस्टिक्स
और औद्योगिक नीति में व्यापक
सुधार करने होंगे। भारत
को चीन की आर्थिक
चुनौती का मुकाबला करने
के लिए केवल राष्ट्रवादी
बयानबाजी से आगे बढ़ना
होगा।
इसके लिए आवश्यक
है औद्योगिक विकेंद्रीकरण, एमएसएमई क्षेत्र को तकनीकी और
वित्तीय सहयोग, उत्पादन लागत कम करने
के लिए नीति सुधार,
कौशल विकास और रोजगार विस्तार,
ग्रामीण और अर्ध-शहरी
क्षेत्रों में उद्योग विस्तार.
भारत के सामने सबसे
बड़ी चुनौती यह है कि
वह अपनी राष्ट्रवादी भावनाओं
को आर्थिक शक्ति में परिवर्तित करे।
पाकिस्तान के खिलाफ दिखाई
देने वाली भावनात्मक एकजुटता
चीन के मामले में
इसलिए संभव नहीं हो
पाती क्योंकि दोनों देशों के साथ भारत
के आर्थिक संबंधों की प्रकृति अलग
है। भारत यदि औद्योगिक
क्षमता, रोजगार सृजन और तकनीकी
नवाचार पर ध्यान केंद्रित
करता है तो वह
वैश्विक प्रतिस्पर्धा में मजबूत स्थान
हासिल कर सकता है।
मतलब साफ है भारत
के सामने यह प्रश्न केवल
व्यापारिक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता का है। यदि
भारत आर्थिक रूप से मजबूत
बनता है तो वह
वैश्विक राजनीति में भी प्रभावशाली
भूमिका निभा सकेगा। सीमा
पर सैनिकों की वीरता भारत
की सुरक्षा का प्रतीक है,
लेकिन आर्थिक मोर्चे पर आत्मनिर्भरता ही
राष्ट्र की वास्तविक शक्ति
बन सकती है। भारत
को भावनात्मक राष्ट्रवाद से आगे बढ़कर
आर्थिक राष्ट्रशक्ति के निर्माण की
दिशा में निर्णायक कदम
उठाने होंगे।


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