Thursday, 5 March 2026

उमंगों के संग सजा वैवाहिक उत्सव, खुशियों की रोशनी में जुड़ गए दो परिवारों के दिल

उमंगों के संग सजा वैवाहिक उत्सव, खुशियों की रोशनी में जुड़ गए दो परिवारों के दिल 

लखनऊ में स्नेह, परंपरा और सामाजिक गरिमा का अद्भुत संगम, पत्रकारिता जगत व प्रशासनिक हस्तियों ने नवदंपति को दिया आशीर्वाद

सुरेश गांधी

लखनऊ. देश-प्रदेश के प्रतिष्ठित हिन्दी दैनिक समाचार पत्र निष्पक्ष दिव्य संदेश एवं तिजारात के महाप्रबंधक एवं संपादक डॉ. राजेंद्र गौतम तथा रेखा गौतम के सुपुत्र अभय राज का विवाह सुशीला रामप्रकाश गौतम की सुपुत्री श्वेता चौधरी के साथ हर्षोल्लास और पारंपरिक वैदिक रीति-रिवाजों के बीच सकुशल सम्पन्न हो गया।

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में आयोजित इस भव्य वैवाहिक समारोह में भावनाओं की मधुर आभा और उत्सव की रंगीन छटा एक साथ देखने को मिली। मंगल गीतों और शुभकामनाओं की गूंज के बीच दोनों परिवारों में नव-उमंग और आनंद का वातावरण स्पष्ट रूप से झलक रहा था। यह अवसर केवल दो हृदयों के मिलन का नहीं, बल्कि दो संस्कारित परिवारों के स्थायी रिश्ते में बंधने का पावन क्षण बन गया।

भारत लॉन, आईआईएम रोड (निकट भारतीय प्रबंध संस्थान लखनऊ) पर आयोजित मुख्य विवाह समारोह में पत्रकारिता, प्रशासन और सामाजिक क्षेत्र की अनेक प्रतिष्ठित हस्तियों की गरिमामयी उपस्थिति रही। सचिवालय से लेकर विधानसभा तथा सूचना निदेशालय से जुड़े वरिष्ठ अधिकारी, कर्मचारी, वरिष्ठ पत्रकार और विभिन्न राजनीतिक व सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने नवदंपति को सुखमय वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद प्रदान किया।

वहीं, उत्तराखंड भवन लखनऊ में आयोजित प्रीतिभोज कार्यक्रम में भी बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिकों की उपस्थिति रही। अतिथियों ने नवविवाहित जोड़े को आशीर्वाद देते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की तथा काशी विश्वनाथ मंदिर के श्री बाबा विश्वनाथ से उनके सुखमय, मंगलमय दांपत्य जीवन के लिए प्रार्थना की।

सजावट की आकर्षक छटा, पारंपरिक स्वागत और आत्मीय आतिथ्य ने समारोह को विशेष गरिमा प्रदान की। अतिथियों ने इस शुभ अवसर पर विविध लजीज व्यंजनों का स्वाद लेते हुए परिवारजनों को शुभकामनाएं दीं। स्नेह, संस्कार और सामाजिक सम्मान से परिपूर्ण यह विवाह समारोह लंबे समय तक उपस्थित जनों की स्मृतियों में एक सुखद और प्रेरणादायी आयोजन के रूप में अंकित रहेगा।

इस अवसर पर प्रीतिभोज और आशीर्वाद समारोह में कई विशिष्ट अतिथियों की गरिमामयी उपस्थिति रही। दूरसंचार मंत्रालय, भारत सरकार से जुड़े सदस्य योगेंद्र सिंह, बहुजन समाज पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल, उत्तर प्रदेश के अपर मुख्य सचिव (गृह) संजय प्रसाद, मान्यता प्राप्त पत्रकार समिति संघ के अध्यक्ष हेमंत तिवारी तथा महामंत्री भारत सिंह सहित अनेक गणमान्य व्यक्तित्व उपस्थित रहे।

इसके साथ ही डॉ. एस.पी. सिंह, वरिष्ठ पत्रकार अनिल सिंह, दाराशिकोह, राघवेंद्र सिंह, सचिवालय संघ उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष अर्जुन देव भारती, सूचना विभाग से जुड़े पुरुषोत्तम मौर्य, अजीत खरे, योगेश श्रीवास्तव तथा सुरेश गांधी सहित बड़ी संख्या में पत्रकार, अधिकारी एवं सामाजिक प्रतिनिधियों ने नवविवाहित जोड़े को आशीर्वाद प्रदान किया और उनके सुखमय, सफल एवं मंगलमय वैवाहिक जीवन की कामना की। आत्मीयता, सामाजिक सौहार्द और शुभकामनाओं से सराबोर यह अवसर समारोह की गरिमा को और भी विशेष बना गया।

काशी के घाटों पर पत्रकारों की होली का अनोखा रंगोत्सव

राजनीति के पेंच, प्रशासन की उलझनें और ब्रेकिंग न्यूज की भागदौड़सब रंगों में घुलकर सरल हो गईं. किसी ने चुटकी ली—“आज हेडलाइन यही है

सुरेश गांधी

सुबह की पहली किरण जब माँ गंगा की लहरों पर सुनहरी चादर बिछा रही थी, तब वाराणसी के घाटों पर एक अलग ही हलचल थी। यह सिर्फ होली का उत्सव नहीं था, यह शब्दों के साधकोंपत्रकारोंकी मस्ती, मित्रता और मुक्त हँसी का महापर्व था। दशाश्वमेध घाट से लेकर अस्सी घाट तक रंगों की फुहारें उड़ रही थीं। कैमरे जो रोज़ सियासत की सख्त तस्वीरें कैद करते हैं, आज गुलाल की धुंध में मुस्कानों को सहेज रहे थे। माइक, जो आम दिनों में तीखे सवालों से गूंजते हैं, आज ठहाकों की गूंज से सराबोर थे।

कोई वरिष्ठ पत्रकार कनिष्ठ रिपोर्टर को अबीर लगाते हुए कह रहा था—“आज खबर नहीं, सिर्फ खुमार चलेगा!” तो कोई फोटो जर्नलिस्ट गंगा किनारे खड़े होकर रंगों में भीगी टोली की तस्वीरें उतारते-उतारते खुद ही रंगों का हिस्सा बन जा रहा था। भांग की हल्की ठंडाई, बनारसी गुझिया की मिठास औरहर-हर महादेवके जयघोष के बीच संवाददाताओं की टोली ने जैसे पूरे साल की थकान गंगा में विसर्जित कर दी। राजनीति के पेंच, प्रशासन की उलझनें और ब्रेकिंग न्यूज की भागदौड़सब आज रंगों में घुलकर सरल हो गईं। किसी ने चुटकी ली—“आज हेडलाइन यही है

पत्रकारों ने तोड़ी खबरों की दीवार, रंगों से लिखी दोस्ती की इबारत!’

घाटों की सीढ़ियों पर बैठकर पुरानी कवरेज के किस्से छिड़े। किसने किस मंत्री से तीखा सवाल पूछा, किस रिपोर्ट ने तहलका मचायासब पर हंसी के छींटे पड़ते रहे। पर आज किसी में प्रतिस्पर्धा नहीं थी, केवल अपनापन था। गंगा की लहरें भी जैसे मुस्कुरा रही थीं। काशी की फिज़ा में रचा-बसा यह रंगोत्सव बता रहा था कि पत्रकार भी इंसान हैंसंवेदनाओं से भरे, रिश्तों को संजोने वाले। शाम ढलते-ढलते जब रंग हल्के पड़ने लगे, तब भी मन के रंग गाढ़े हो चुके थे। विदा लेते हुए हर किसी के चेहरे पर यही भाव था— “कल फिर खबरों की दुनिया में लौटेंगे, पर आज की यह रंगभरी याद हमारी कलम को और जीवंत बना जाएगी।काशी के घाटों पर पत्रकारों की यह होली सिर्फ उत्सव नहीं, एक संदेश थीकि शब्दों की दुनिया में भी रंग जरूरी हैं, तभी तो रपट में भी राग रहेगा और खबर में भी खुशबू।

भोले की नगरी में फूटा रंगों का ज्वार, घाटों से गलियों तक उड़ता रहा गुलाल, सैलानी भी हो गए बनारसी

भोले की नगरी में फूटा रंगों का ज्वार, घाटों से गलियों तक उड़ता रहा गुलाल, सैलानी भी हो गए बनारसी 

गुलाल की आंधी में मिटे भेदभाव, गंगा-जमुनी तहजीब की दिखी मिसाल

जोगिरा की गूंज में झूमी काशी : दशाश्वमेध से अस्सी तक रंगों की बौछार, जैतपुरा की होली बारात बनी आकर्षण

सुरेश गांधी

वाराणसी। होली का जश्न हो और काशी ठहर जाए, यह संभव ही नहीं। इस बार भी फागुन ने जैसे ही दस्तक दी, पूरी नगरी ताश के पत्तों की तरह फेंटे गए रंगों में बिखर गई। घाटों से गलियों तक, छतों से चौबारों तक, मंदिरों से मोहल्लों तककृहर ओर बस रंग, राग और रौद्र उल्लास का अनंत विस्तार दिखाई दिया। सुबह की पहली किरण के साथ दशाश्वमेध घाट पर गंगा की लहरों संग उड़ता गुलाल आकाश में घुला तो लगा मानो प्रकृति स्वयं काशी की होली में सहभागी हो गई हो।होरी खेलैं रघुवीरा...” की स्वर-लहरियां गूंजीं और विदेशी सैलानी भी देसी रंग में रंगे नजर आए। कोई कैमरे में दृश्य कैद कर रहा था तो कोई खुद ही रंगों का पात्र बन गया था।

उधर अस्सी घाट युवाओं की मस्ती का केंद्र बना रहा। डीजे की धुन, ढोल-मजीरे की थाप औरजोगिरा... सारा रारा...” की गूंज के बीच युवा थिरकते रहे। गोदौलिया, चेतगंज, लहुराबीर, सिगरा, दुर्गाकुंड से लेकर लंका तक हर गली में रंगों का समंदर उमड़ पड़ा। छतों से उड़ते अबीर-गुलाल ने सड़कों को इंद्रधनुषी चादर से ढक दिया। होलिका दहन की रात ने इस उल्लास को आध्यात्मिक आभा भी दी। भद्रा समाप्त होते ही वैदिक मंत्रोच्चार के बीच अग्नि प्रज्वलित हुई। भक्त प्रह्लाद की स्मृति में जलती होलिका की लपटों के साथ लोगों ने परिवार और देश की सुख-समृद्धि की कामना की। परिक्रमा के बाद गले मिलने और अबीर लगाने का सिलसिला देर रात तक चलता रहा।

काशी के हृदय स्थल काशी विश्वनाथ धाम में पंखुड़ियों की होली ने भक्तों को भाव-विभोर कर दिया। बाबा के दरबार में भजन और फाग गूंजते रहे।हर-हर महादेवऔरबोल बमके जयघोष के बीच ऐसा लगा मानो स्वयं भोलेनाथ इस रंगोत्सव में रमे हों, भस्म और गुलाल का अद्भुत संगम काशी की आध्यात्मिकता और मस्ती को एक साथ अभिव्यक्त कर रहा था।

शहर के जैतपुरा से निकली पारंपरिक होली बारात ने इस उत्सव को और भव्य बना दिया। घोड़ा, ऊंट, ढोल-नगाड़े और सजी-धजी झांकियों के साथ निकली बारात में भूत-प्रेत और पिशाच के वेश में होरियारों की टोली आकर्षण का केंद्र रही। दूल्हा-दुल्हन के अनूठे श्रृंगार, मूसल नचावन और लोढ़ा घुमावन की परंपरा ने दर्शकों को हंसी से लोटपोट कर दिया। हिंदू-मुस्लिम सहभागिता ने गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल पेश की।

गलियों में ढोलक की थाप पर झूमती टोलियां, कहीं भांग की ठंडाई, तो कहीं गुजिया और मालपुए की मिठासकृहर क्षण उत्सवमय था। बच्चे रंगों से सने इधर-उधर दौड़ते दिखे, बुजुर्ग भी पीछे नहीं रहे। मोबाइल पर शुभकामनाओं की बौछार और फोन कॉल्स पर बधाइयों का सिलसिला चलता रहा।

घाटों पर देसी-विदेशी सैलानियों का उत्साह देखते ही बनता था। कोई रंग में भीगा गंगा आरती देख रहा था, तो कोई डीजे की धुन पर थिरक रहा था। शाम ढलते-ढलते जब रंगों की तीव्रता थोड़ी थमी, तो गंगा तट पर बैठी भीड़ के चेहरों पर संतोष और आत्मीयता की चमक थी। ऐसा प्रतीत हुआ मानो काशी ने एक बार फिर जीवन का मूलमंत्र दोहरा दिया हो, रंग केवल चेहरे पर नहीं, मन पर चढ़ते हैं। यहां होली केवल खेली नहीं जाती, जी जाती है। और अंततः हर ओर एक ही स्वर गूंजता रहाबुरा मानो होली है३ यह भोले की काशी है!”

रंग, राग और रौद्र-उल्लास

फागुन की अंतिम संध्या पर काशी ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया कि यहां त्योहार केवल तिथि नहीं, परंपरा और आत्मा का उत्सव होते हैं। धुलेंडी से एक दिन पूर्व पूरे शहर से लेकर देहात तक होलिका पूजन और दहन का सिलसिला चला। हर गली-मुहल्ले में सुबह से ही होलिका सजाई गई, कहीं लकड़ियों का ऊंचा ढेर, कहीं गोबर के उपलों से सजी पारंपरिक रचना, तो कहीं रंग-बिरंगे कागज़ी फूलों से अलंकृत वेदी। शाम ढलते-ढलते महिलाओं ने फाग गीतों की स्वर-लहरियों के बीच परिवार सहित होलिका का पूजन किया। आधी रात के बाद भद्रा समाप्त होते ही वैदिक मंत्रोच्चार के साथ अग्नि प्रज्वलित हुई। धू-धू कर जलती होलिका की लपटों में जैसे आस्था और उल्लास एक साथ आकाश छूने लगे। भक्त प्रह्लाद की स्मृति और भगवान श्रीकृष्ण के प्रति श्रद्धा के साथ लोगों ने देश और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की। अग्नि की परिक्रमा के बाद अबीर-गुलाल उड़ाकर एक-दूसरे को गले लगाने का क्रम शुरू हो गया।

घाटों से गलियों तक, मस्ती का रंग

होलिका दहन के साथ ही काशी की फिज़ां में होली का रंग और गहरा हो गया। गलियों से लेकर गंगा घाटों तकउड़त गुलाल लाल भए बादरकी छटा बिखर गई। अस्सी घाट पर ढोल-मजीरे और डीजे की धुन पर युवा झूमते दिखे तो दशाश्वमेध घाट पर देशी-विदेशी सैलानी रंगों में सराबोर नजर आए। विदेशी पर्यटक भी बनारसी ठंडाई का स्वाद लेते हुएजोगिरा सारा राराकी गूंज में शामिल हो गए। घाटों पर रंगों की बौछार और संगीत का समागम देर शाम तक चलता रहा।

हर मोहल्ले में उत्सव, हर चेहरे पर मुस्कान

मैदागिन, गोदौलिया, चेतगंज, लंका, लहुराबीर, सिगरा, दुर्गाकुंड, भेलूपुर, शिवपुर, सुंदरपुर, भोजूबीर से लेकर ग्रामीण अंचलों तक हर ओर रंगों की धूम रही। कहीं युवाओं की टोलियां डीजे पर थिरकती दिखीं तो कहीं महिलाएं फाग गीतों पर झूमती नजर आईं। बच्चे, बूढ़े, युवा, सभी पर रंगों का नशा चढ़ा था। मोबाइल पर शुभकामना संदेशों की झड़ी लगी रही, फोन कॉल्स पर बधाइयों का आदान-प्रदान चलता रहा। होली की यह परंपरा अब डिजिटल संवाद के साथ और व्यापक हो गई है, पर आत्मीयता वही पुरानी, गले मिलकर मुंह मीठा कराने की।

रंगभरी से धुलेंडी तक, दूना हुआ उल्लास

रंगभरी एकादशी से शुरू हुआ रंगोत्सव धुलेंडी की पूर्व संध्या तक दूना हो गया। कहीं शिव बारात निकली तो कहीं जोगिरा का आयोजन हुआ। होलिका दहन के साथ ही होली का हुड़दंग भी शुरू हो गया। डीजे की धुन पर युवा झूमते रहे, तो लोकगीतों की तान पर बुजुर्ग भी कदम मिलाते दिखे। सुरक्षा के पुख्ता इंतजामों के बीच शहर ने परंपरा और आधुनिकता का संतुलन बनाए रखा। फागुन की इस मस्ती में डूबी काशी ने एक बार फिर संदेश दिया यहां रंग केवल त्योहार नहीं, जीवन का दर्शन हैं। और सच ही तो हैकृभोले की नगरी में होली, केवल खेली नहीं जाती, जी जाती है।

उमंगों के संग सजा वैवाहिक उत्सव, खुशियों की रोशनी में जुड़ गए दो परिवारों के दिल

उमंगों के संग सजा वैवाहिक उत्सव, खुशियों की रोशनी में जुड़ गए दो परिवारों के दिल  लखनऊ में स्नेह, परंपरा और सामाजिक गरिमा का अद्भुत संगम, ...