Wednesday, 11 March 2026

तेल, डॉलर और जंग : मिडिल ईस्ट की आग में झुलसा भारत की रसोई?

तेल, डॉलर और जंग : मिडिल ईस्ट की आग में झुलसा भारत की रसोई? 

दुनिया की भू-राजनीति में कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं जिनका असर केवल सीमाओं या सेनाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह सीधे आम आदमी के जीवन को प्रभावित करने लगती हैं। पश्चिम एशिया में अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच बढ़ता सैन्य तनाव इसी तरह का संकट बनता जा रहा है। यह संघर्ष हजारों किलोमीटर दूर मिडिल ईस्ट में भले चल रहा हो, लेकिन इसकी आंच भारत की रसोई तक महसूस की जा रही है। भारत में एलपीजी सिलेंडरों की कीमतों में बढ़ोतरी, कॉमर्शियल गैस सिलेंडरों की कमी, छोटे दुकानदारों की परेशानियां और होटल-रेस्तरां उद्योग की चिंताएं इस संकट के संकेत हैं। चाय-नाश्ते की दुकानों से लेकर बड़े रेस्तरां तक गैस संकट की चर्चा है। दरअसल यह युद्ध केवल तीन देशों के बीच की लड़ाई नहीं है। इसके पीछे तेल, डॉलर, वैश्विक ऊर्जा व्यापार और भू-राजनीतिक रणनीतियों का एक जटिल समीकरण छिपा हुआ है। यही कारण है कि मिडिल ईस्ट की जंग आज पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रही है 

सुरेश गांधी

पश्चिम एशिया को लंबे समय से दुनिया की ऊर्जा राजनीति का केंद्र माना जाता है। दुनिया के सबसे बड़े तेल और गैस भंडार इसी क्षेत्र में हैं। सऊदी अरब, ईरान, इराक, कतर, कुवैत और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के प्रमुख स्रोत हैं। विश्व अर्थव्यवस्था अभी भी बड़े पैमाने पर तेल और गैस पर निर्भर है। परिवहन, उद्योग, बिजली उत्पादन और रोजमर्रा की जिंदगी के अधिकांश काम इन ऊर्जा स्रोतों से जुड़े हुए हैं। इसलिए जब भी मिडिल ईस्ट में युद्ध या राजनीतिक अस्थिरता बढ़ती है, उसका असर अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार पर तुरंत दिखाई देने लगता है। मिडिल ईस्ट संकट को समझने के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य का महत्व समझना बेहद जरूरी है। यह समुद्री मार्ग फारस की खाड़ी और अरब सागर को जोड़ता है और दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक है। दुनिया के कुल तेल व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी मार्ग से होकर गुजरता है। सऊदी अरब, ईरान, इराक और कुवैत से निकलने वाला तेल इसी रास्ते से वैश्विक बाजार तक पहुंचता है। यदि किसी कारण से इस समुद्री मार्ग में बाधा आती है तो पूरी दुनिया में ऊर्जा संकट पैदा हो सकता है। अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने इसी मार्ग की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है।

देखा जाएं तो भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता देश है। तेजी से बढ़ती आबादी, औद्योगिक विकास और शहरीकरण के कारण देश में ऊर्जा की मांग लगातार बढ़ रही है। लेकिन घरेलू उत्पादन इस मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है। भारत अपनी कुल तेल जरूरतों का लगभग 85 से 90 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से आयात करता है। एलपीजी के मामले में भी स्थिति लगभग इसी तरह है। देश की कुल एलपीजी आवश्यकता का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा आयात के जरिए पूरा किया जाता है। इन आयातों का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है और इनमें से अधिकांश आपूर्ति होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते होती है। भारत में एलपीजी की खपत पिछले एक दशक में तेजी से बढ़ी है। प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के बाद करोड़ों नए परिवार गैस कनेक्शन से जुड़े हैं। आज देश में हर साल लगभग 31 मिलियन टन एलपीजी की खपत होती है। इसमें से लगभग 87 प्रतिशत गैस घरेलू रसोई में इस्तेमाल होती है, जबकि शेष हिस्सा होटल, रेस्तरां और अन्य व्यावसायिक गतिविधियों में उपयोग किया जाता है। जब मिडिल ईस्ट में युद्ध जैसी स्थिति बनती है और ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होती है, तो उसका असर सबसे पहले गैस और पेट्रोलियम उत्पादों पर दिखाई देता है।

मिडिल ईस्ट में चल रही जंग ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था कितनी नाजुक है। अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच बढ़ता तनाव केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं है, बल्कि तेल, डॉलर और वैश्विक शक्ति संतुलन का जटिल खेल है। इस संघर्ष की लपटें अब भारत तक पहुंच चुकी हैं और इसका असर आम लोगों की रसोई से लेकर होटल उद्योग तक महसूस किया जा रहा है। एलपीजी संकट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ऊर्जा सुरक्षा केवल आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि भारत को भविष्य में इस तरह के संकटों से बचना है तो उसे ऊर्जा आत्मनिर्भरता और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की दिशा में तेजी से आगे बढ़ना होगा। तभी देश की अर्थव्यवस्था और आम लोगों की रसोई दोनों सुरक्षित रह सकेंगी।

महंगाई की सीधी मार

हाल के दिनों में गैस सिलेंडरों की कीमतों में बढ़ोतरी ने आम लोगों को झटका दिया है। कॉमर्शियल सिलेंडरों की कमी के कारण चाय-नाश्ते की दुकानों और छोटे रेस्तरां को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। जहां पहले 10 रुपये में मिलने वाली चाय अब 15 या 20 रुपये में मिलने लगी है, वहीं नाश्ते की प्लेट और अन्य खाद्य पदार्थों के दाम भी बढ़ गए हैं। कुछ दुकानदारों का कहना है कि गैस सिलेंडर महंगा होने के कारण उन्हें अपनी कीमतें बढ़ानी पड़ी हैं।

होटल और रेस्तरां उद्योग की चिंता

एलपीजी संकट का असर होटल और रेस्तरां उद्योग पर भी दिखाई देने लगा है। कई रेस्तरां ने अपने मेनू में बदलाव करना शुरू कर दिया है। कुछ जगहों पर व्यंजनों की संख्या कम कर दी गई है, जबकि कुछ जगहों पर थाली के दाम बढ़ा दिए गए हैं। कुछ रेस्तरां अब गैस की जगह इलेक्ट्रिक तंदूर और इंडक्शन चूल्हों का इस्तेमाल करने लगे हैं। होटल उद्योग से जुड़े संगठनों का कहना है कि यदि गैस आपूर्ति में सुधार नहीं हुआ तो कई होटल और रेस्तरां बंद होने की स्थिति में पहुंच सकते हैं।

पेट्रो-डॉलर का वैश्विक खेल

मिडिल ईस्ट की राजनीति में तेल के साथ-साथ पेट्रो-डॉलर की अवधारणा भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पेट्रो-डॉलर उस व्यवस्था को कहा जाता है जिसमें अंतरराष्ट्रीय तेल व्यापार अमेरिकी डॉलर में किया जाता है। 1970 के दशक के बाद से यह व्यवस्था वैश्विक आर्थिक प्रणाली की आधारशिला बन गई है। अमेरिका की आर्थिक शक्ति काफी हद तक इसी व्यवस्था पर आधारित है। इसलिए मिडिल ईस्ट में होने वाले राजनीतिक और सैन्य घटनाक्रमों को केवल क्षेत्रीय संघर्ष के रूप में नहीं देखा जा सकता।

रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद बदला तेल बाजार

रूस-यूक्रेन युद्ध ने वैश्विक तेल बाजार की दिशा बदल दी। पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर प्रतिबंध लगाने के बाद रूस ने अपना तेल एशियाई देशों को बेचना शुरू किया। भारत ने भी इस अवसर का फायदा उठाते हुए रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदना शुरू किया। इस रणनीति ने भारत को कुछ हद तक वैश्विक तेल संकट से बचाने में मदद की। लेकिन मिडिल ईस्ट में नया युद्ध शुरू होने से ऊर्जा बाजार में फिर से अनिश्चितता बढ़ गई है।

भारत की ऊर्जा कूटनीति

ऊर्जा संकट से निपटने के लिए भारत ने पिछले कुछ वर्षों में ऊर्जा कूटनीति को मजबूत किया है। भारत अब केवल खाड़ी देशों पर निर्भर नहीं है, बल्कि अमेरिका, रूस, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका से भी ऊर्जा आयात कर रहा है। इसके अलावा भारत ने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार भी विकसित किए हैं ताकि संकट के समय देश के पास आपातकालीन ऊर्जा भंडार उपलब्ध रहे।

ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा

दीर्घकालिक समाधान के रूप में भारत को ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाने होंगे। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, बायोगैस और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे विकल्प भविष्य में ऊर्जा सुरक्षा के महत्वपूर्ण साधन बन सकते हैं। इसके साथ-साथ इलेक्ट्रिक वाहनों और एथेनॉल मिश्रण जैसी नीतियां भी भारत की ऊर्जा निर्भरता को कम कर सकती हैं।

सिलेंडर की कीमत और बढ़ती महंगाई

हाल के दिनों में गैस सिलेंडरों की कीमतों में बढ़ोतरी ने आम लोगों को झटका दिया है। इसके साथ ही कॉमर्शियल सिलेंडरों की आपूर्ति में आई कमी ने छोटे कारोबारियों की परेशानियां बढ़ा दी हैं। देश के कई शहरों में चाय-नाश्ते की दुकानों, ढाबों और छोटे रेस्तरां में गैस की कमी का असर दिखाई देने लगा है। जहां पहले 10 रुपये में मिलने वाली चाय अब 15 से 20 रुपये तक पहुंच गई है, वहीं नाश्ते की प्लेट और अन्य खाद्य पदार्थों के दाम भी बढ़ गए हैं। कुछ दुकानदारों का कहना है कि गैस सिलेंडर महंगा होने के कारण उन्हें अपनी कीमतें बढ़ानी पड़ी हैं। यानी मिडिल ईस्ट की जंग की कीमत भारत का आम आदमी चुका रहा है।

कॉमर्शियल सिलेंडरों की किल्लत

कॉमर्शियल गैस सिलेंडरों की कमी ने होटल और रेस्तरां उद्योग को भी प्रभावित किया है। कई जगहों पर सिलेंडर लेने के लिए लंबी कतारें लग रही हैं। कुछ दुकानदारों का दावा है कि गैस सिलेंडरों की कालाबाजारी भी शुरू हो गई है। जहां पहले 19 किलो का कॉमर्शियल सिलेंडर लगभग 2000 रुपये में मिल जाता था, वहीं अब इसकी कीमत 2500 से 2800 रुपये तक पहुंचने की खबरें सामने रही हैं। कुछ मामलों में सिलेंडर हासिल करने के लिए अतिरिक्त पैसे देने पड़ रहे हैं। यह स्थिति छोटे दुकानदारों के लिए बेहद मुश्किल साबित हो रही है।

रेस्तरां उद्योग की मुश्किलें

गैस की कमी के कारण कई रेस्तरां ने अपने मेनू में बदलाव करना शुरू कर दिया है। कुछ जगहों पर व्यंजनों की संख्या कम कर दी गई है, जबकि कुछ जगहों पर थाली के दाम बढ़ा दिए गए हैं। कुछ रेस्तरां अब गैस की जगह इलेक्ट्रिक तंदूर और इंडक्शन चूल्हों का इस्तेमाल करने लगे हैं। होटल उद्योग के कई संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि गैस आपूर्ति में सुधार नहीं हुआ तो कई होटल और रेस्तरां बंद होने की स्थिति में पहुंच सकते हैं।

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