नालों में
कैद
गंगा
: अरबों
की
योजनाएं
बेअसर,
सच
बोलता
एक
वैज्ञानिक
संत
गंगा की पुकार : आस्था नहीं, अब व्यवस्था से बहेगी निर्मल धारा
गंगा,
जिसे
हम
मां
कहते
हैं,
पूजते
हैं,
जिसके
जल
को
अमृत
मानते
हैं,
आज
वही
गंगा
हमारे
ही
बनाए
नालों
में
घुट
रही
है।
सवाल
सिर्फ
प्रदूषण
का
नहीं,
बल्कि
उस
सोच
का
है
जिसने
गंगा
सफाई
को
एक
“प्रोजेक्ट”
बना
दिया,
जबकि
यह
एक
सतत
जिम्मेदारी
थी।
हजारों
करोड़
रुपये
बहाए
गए,
घाट
चमकाए
गए,
योजनाओं
के
उद्घाटन
हुए,
लेकिन
गंगा
का
जल
अब
भी
कई
जगहों
पर
सिसकता
हुआ
दिखता
है।
क्या
सच
में
गंगा
को
पैसे
की
जरूरत
है?
या
उस
ईमानदार
व्यवस्था
की,
जो
हर
दिन
गिरते
लाखों
लीटर
सीवेज
को
उसकी
धारा
तक
पहुंचने
से
पहले
रोक
सके?
यही
सवाल
जब
ज़मीनी
हकीकत
से
टकराता
है,
तो
जवाब
चौंकाता
भी
है
और
झकझोरता
भी।
वाराणसी
से
लेकर
कानपुर
तक,
गंगा
की
पीड़ा
का
असली
कारण
अब
किसी
से
छिपा
नहीं,
90 फीसदी
प्रदूषण
नालों
और
उद्योगों
से,
और
मात्र
10 फीसदी
आमजन
की
गतिविधियों
से।
फिर
भी
दोष
अक्सर
आस्था
पर
मढ़
दिया
जाता
है,
जबकि
असल
अपराधी
व्यवस्था
की
खामियां
हैं।
इसी
कड़वे
सच
को
सामने
रखते
हुए,
एक
ऐसा
संवाद
सामने
आता
है
जहां
आस्था
और
विज्ञान
आमने-सामने
नहीं,
बल्कि
साथ
खड़े
नजर
आते
हैं।
यह
सिर्फ
सवाल-जवाब
नहीं,
बल्कि
उस
सच्चाई
का
आईना
है,
जिसमें
गंगा
की
दुर्दशा
भी
दिखती
है
और
उसका
समाधान...
सुरेश गांधी
गंगा... यह सिर्फ एक
नदी नहीं, बल्कि भारतीय चेतना, संस्कृति और अस्तित्व का
आधार है। लेकिन आज
वही गंगा प्रदूषण की
मार से कराह रही
है। करोड़ों की योजनाएं, हजारों
करोड़ का बजट, लेकिन
हालात जस के तस,
तो आखिर कमी कहां
है? इन्हीं सवालों को लेकर वरिष्ठ
पत्रकार सुरेश गांधी ने बातचीत की
संकट मोचन फाउंडेशन के
अध्यक्ष, संकट मोचन मंदिर
के महंत और आईआईटी
बीएचयु में इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग
विभाग के प्रोफेसर विश्वम्भरनाथ
मिश्र से। यह संवाद
सिर्फ सवाल-जवाब नहीं,
बल्कि गंगा के भविष्य
का वैज्ञानिक और सामाजिक विश्लेषण
है।
सुरेश
गांधी
: गंगा
की
सफाई
पर
हजारों
करोड़
रुपये
खर्च
हो
चुके
हैं,
लेकिन
ज़मीनी
स्थिति
संतोषजनक
नहीं
है।
क्या
गंगा
को
साफ
करने
के
लिए
और
पैसे
की
जरूरत
है
या
कुछ
और?
सुरेश
गांधी
: आप
बार-बार
सीवेज
की
बात
कर
रहे
हैं।
क्या
वाकई
गंगा
प्रदूषण
का
सबसे
बड़ा
कारण
यही
है?
प्रो.
मिश्र
: बिलकुल। वैज्ञानिक आंकड़े स्पष्ट कहते हैं कि
गंगा में आने वाला
करीब 85 से 90 फीसदी प्रदूषण सिर्फ सीवेज से आता है।
लोग अक्सर धार्मिक गतिविधियों को दोष देते
हैं, नहाना, पूजा, फूल-माला आदि,
लेकिन यह कुल प्रदूषण
का केवल 10 फीसदी भी नहीं है।
असल समस्या शहरों का गंदा पानी
है, जो बिना ट्रीटमेंट
के सीधे गंगा में
गिरता है। वाराणसी, कानपुर,
प्रयागराज, हर बड़े शहर
में यही स्थिति है।
सुरेश
गांधी
: तो
क्या
हम
कह
सकते
हैं
कि
गंगा
की
सफाई
का
मतलब
है,
सीवेज
को
रोकना?
प्रो.
मिश्र
: बिलकुल। अगर एक लाइन
में कहूं तो, “सीवेज
रोक दो, गंगा खुद
साफ हो जाएगी।” गंगा
की धारा में इतनी
शक्ति है कि वह
अपने भीतर के जैविक
प्रदूषण को खत्म कर
सकती है, लेकिन जब
हर दिन लाखों लीटर
गंदा पानी उसमें डाला
जाएगा, तो कोई भी
नदी असहाय हो जाएगी।
सुरेश
गांधी
: सरकार
ने
कई
एसटीपी
(सीवेज
ट्रीटमेंट
प्लांट)
बनाए
हैं।
क्या
ये
पर्याप्त
नहीं
हैं?
प्रो.
मिश्र
: एसटीपी बनाना समाधान का सिर्फ एक
हिस्सा है, पूरा समाधान
नहीं। समस्या यह है कि
कई एसटीपी अपनी पूरी क्षमता
से काम नहीं कर
रहे, कई जगहों पर
सीवर लाइन ही नहीं
जुड़ी है, रखरखाव (मेंटीनेंस)
बेहद कमजोर है यानी आपने
मशीन तो लगा दी,
लेकिन उसे सही तरीके
से चला नहीं पा
रहे।
सुरेश
गांधी
: कानपुर
में
उद्योगों
को
गंगा
प्रदूषण
का
बड़ा
कारण
माना
जाता
है।
इस
पर
आपकी
क्या
राय
है?
प्रो.
मिश्र
: कानपुर का उदाहरण बहुत
महत्वपूर्ण है। वहां के
चमड़ा उद्योग (टेनरी) गंगा में भारी
मात्रा में केमिकल छोड़ते
रहे हैं। यह सिर्फ
पानी को गंदा नहीं
करता, बल्कि जलीय जीवन को
भी खत्म करता है।
हालांकि सरकार ने ईटीपी (इंफ्लूयेंट
ट्रीटमेंट प्लांट) लगाए हैं, लेकिन
जब तक उनका सख्ती
से पालन नहीं होगा,
तब तक समस्या बनी
रहेगी।
सुरेश
गांधी
: क्या
नमामि
गंगे
जैसी
योजनाएं
विफल
रही
हैं?
प्रो.
मिश्र
: मैं इसे पूरी तरह
विफल नहीं कहूंगा। इस
योजना के तहत बहुत
काम हुआ है, घाटों
का सौंदर्यीकरण, कुछ हद तक
सीवर सिस्टम में सुधार। लेकिन
समस्या यह है कि
हमने “दिखने वाले काम” ज्यादा
किए, “असल काम” कम।
गंगा की सफाई घाटों
को सुंदर बनाने से नहीं, बल्कि
नालों को रोकने से
होगी।
सुरेश
गांधी
: आप
वैज्ञानिक
हैं।
गंगा
प्रदूषण
को
वैज्ञानिक
दृष्टि
से
कैसे
समझते
हैं?
प्रो.
मिश्र
: जब सीवेज गंगा में गिरता
है, तो पानी में
बीओडी (बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड) बढ़ जाता है।
इसका मतलब है कि
पानी में ऑक्सीजन कम
हो जाती है, जिससे
मछलियां मरने लगती हैं,
पानी जहरीला हो जाता है,
रोग फैलने का खतरा बढ़
जाता है. इसलिए जरूरी
है कि हर बूंद
गंदे पानी को पहले
वैज्ञानिक तरीके से ट्रीट किया
जाए।
सुरेश
गांधी
: तो
समाधान
क्या
है?
क्या
कोई
व्यावहारिक
रास्ता
है?
प्रो.
मिश्र
: समाधान बिल्कुल है, लेकिन इसके
लिए इच्छाशक्ति चाहिए।
✔️ हर नाले
को
एसटीपी
से
जोड़ना
होगा
✔️ छोटे-छोटे
डिसेंट्रलाइज्ड
ट्रीटमेंट
सिस्टम
लगाने
होंगे
✔️ उद्योगों पर
सख्त
निगरानी
✔️ स्थानीय समुदाय
की
भागीदारी
सबसे जरूरी है,
“रोकथाम” (प्रीवेंशन), न कि “इलाज”
(ट्रीटमेंट)।
सुरेश
गांधी
: गंगा
के
प्रति
लोगों
की
आस्था
बहुत
गहरी
है।
क्या
यह
आस्था
समाधान
का
हिस्सा
बन
सकती
है?
प्रो.
मिश्र
: बिलकुल। गंगा सिर्फ नदी
नहीं, मां है। अगर
हर व्यक्ति यह संकल्प ले
कि वह गंगा में
गंदगी नहीं डालेगा, तो
आधी समस्या वहीं खत्म हो
जाएगी। लेकिन आस्था के साथ-साथ
जिम्मेदारी भी जरूरी है।
सुरेश
गांधी
: अंत
में,
आप
सरकार
और
समाज
को
क्या
संदेश
देना
चाहेंगे?
प्रो.
मिश्र
: मेरा संदेश बहुत सरल है,
गंगा को “प्रोजेक्ट” मत
बनाइए, इसे “जीवित इकाई”
की तरह समझिए। पैसा
खर्च करने से ज्यादा
जरूरी है, सही दिशा
में काम करना। जब
तक नालों का पानी गंगा
में गिरता रहेगा, तब तक कोई
भी योजना सफल नहीं होगी।
और सबसे महत्वपूर्ण, “गंगा
को बचाना है, तो उसे
गंदा करना बंद करना
होगा।”
यह संवाद सिर्फ एक इंटरव्यू नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। गंगा को बचाने की लड़ाई भावनाओं से नहीं, बल्कि विज्ञान, प्रबंधन और ईमानदार नीति से जीती जाएगी। आज जरूरत है कि हम यह समझें, गंगा की सफाई कोई “सरकारी योजना” नहीं, बल्कि राष्ट्रीय दायित्व है। अगर हम आज नहीं चेते, तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी। मां गंगा आज भी बह रही हैं... लेकिन सवाल है, क्या हम उन्हें बहने देंगे या गंदगी में घुटने देंगे?



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